Sunday, 5 July 2026

बासुस के विचार के संदर्भ में -- पत्र - 30 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

मैंने औफिडियस बैसस को देखा है, जो एक बेहतर व्यक्ति हैं। उन्हें पक्षाघात (स्ट्रोक) हो चुका है और वे वृद्धावस्था के बढ़ते हुए प्रभाव से संघर्ष कर रहे हैं। वे अब भी लड़ रहे हैं किंतु यह ऐसी पकड़ है जिससे वे कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे क्योंकि बुढ़ापे ने अपने भारी बोझ से उन्हें हर ओर से दबा दिया है। तुम जानते हो कि उनका शरीर हमेशा से ही दुबला-पतला और दुर्बल रहा है। उन्होंने लंबे समय तक उसे संभाले रखा था या अधिक सही कहूँ तो किसी तरह चलाए रखा था। लेकिन अचानक उनकी शक्ति ने उनका साथ छोड़ दिया है।

By Suza 

    यह वैसा ही है जैसे किसी नाव में पानी भरने लगे। तुम एक छेद बंद करते हो फिर दूसरा छेद बन जाता है। लेकिन जब वह कई जगहों से खुलने और टूटने लगती है तब उसे ठीक करने का कोई उपाय नहीं रह जाता। वह बस एक टपकती हुई नाव बन जाती है। वृद्ध शरीर की स्थिति भी ऐसी ही होती है। कुछ समय तक अस्थायी उपाय उसे संभाले रख सकते हैं। लेकिन जब उसके हर जोड़ ढीले पड़ने लगें, किसी जर्जर मकान की दरारों की तरह; जब तुम एक समस्या को संभालो और इस बीच कोई दूसरी समस्या उभर आए तब बाहर निकलने का मार्ग खोजने का समय आ जाता है।

    फिर भी हमारे मित्र बासुस का मन पहले की तरह ही प्रसन्न और जीवंत है। दर्शन यही करता है। वह मनुष्य को मृत्यु के सामने भी प्रसन्न रहने की शक्ति देता है। शरीर की कैसी भी अवस्था हो, उसे साहसी और आनंदित बनाए रखता है। शरीर के क्षीण होने पर भी वह हिम्मत नहीं हारता। एक महान कप्तान फटे हुए पालों के साथ भी जहाज़ चलाता रहता है। यहाँ तक कि यदि उसे जहाज़ का बहुत-सा सामान समुद्र में फेंकना पड़ जाए तब भी वह अपने पोत के बचे-खुचे हिस्सों को सही दिशा में आगे बढ़ाता रहता है। हमारा बासुस भी यही कर रहा है। वह अपने अंत को इतनी शांत मुद्रा से देखता है कि यदि वह किसी दूसरे के अंत को भी इसी प्रकार देखता तो तुम उसे निस्संग समझ बैठते। लूसीलियस, यह बहुत बड़ी बात है। यह अनेक वर्षों की साधना से प्राप्त होने वाला पाठ है कि जब ऐसा समय आ जाए जिससे बच निकलने का कोई उपाय न हो तब मनुष्य शांति के साथ विदा हो सके।

    मृत्यु के अन्य प्रकारों में आशा का कुछ न कुछ अंश बना रहता है। कोई बीमारी कम हो सकती है। आग बुझ सकती है। गिरती हुई इमारत उन लोगों को कुचले बिना ही धराशायी हो सकती है जिन्हें वह दबाने वाली थी। जिन्हें समुद्र ने निगल लिया था, वे कभी-कभी उतनी ही प्रबलता से सुरक्षित बाहर फेंक दिए जाते हैं जितनी प्रबलता से वे उसमें बह गए थे। सैनिक भी कभी-कभी दंडित व्यक्ति के गले पर रखी अपनी तलवार वापस खींच लेता है। किन्तु जिसे वृद्धावस्था मृत्यु की ओर खींच रही हो, उसके लिए आशा करने को कुछ भी नहीं बचता। केवल वही ऐसा व्यक्ति है जिसे बचाया नहीं जा सकता। यह मृत्यु का सबसे कोमल रूप है पर साथ ही सबसे धीमा भी।

    मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो हमारा बासुस अपने ही अंतिम संस्कार में उपस्थित हो। अपने शरीर को दफ़नाने के लिए तैयार कर रहा हो। स्वयं के बाद भी जीवित रह रहा हो। अपनी हानि (अर्थात् स्वयं को खोने की हानि) को वैसे ही सहन कर रहा हो जैसा किसी दार्शनिक को करना चाहिए। वह मृत्यु के विषय में बहुत बातें करता है और हमें यह समझाने का पूरा प्रयास करता है कि यदि इस घटना में कुछ अप्रिय या भयावह है तो उसका दोष मृत्यु का नहीं बल्कि मरने वाले व्यक्ति का है। मृत्यु के उस क्षण में उससे अधिक कोई पीड़ा नहीं होती जितनी उसके बाद होती है। वह कहता है, “जो व्यक्ति किसी ऐसी चीज़ से डरता है जो उसके साथ घटित ही नहीं होने वाली, वह मूर्ख है। उतना ही मूर्ख वह भी है जो ऐसी चीज़ से डरता है जिसका उसे कोई अनुभव ही नहीं होगा। क्या कोई सचमुच यह मानता है कि वह मृत्यु का अनुभव करेगा जबकि वास्तव में मृत्यु ही वह अवस्था है जिसके कारण वह किसी भी चीज़ का अनुभव करना बंद कर देता है?” इसी कारण वह कहता है, “मृत्यु हर प्रकार की बुराई से इतनी दूर है कि वह बुराई के भय से भी परे है।”

    मैं जानता हूँ कि ये सब बातें पहले भी अनेक बार कही जा चुकी हैं। वास्तव में कही जानी भी चाहिए। किन्तु जब मैंने इन्हें पुस्तकों में पढ़ा या उन लोगों से सुना जो स्वयं किसी तत्काल खतरे में नहीं थे तब इनका मुझ पर उतना प्रभाव नहीं पड़ा। इस बार... हालांकि, इन बातों का मुझ पर बहुत गहरा असर हुआ क्योंकि यह व्यक्ति ऐसी मृत्यु के बारे में बोल रहा था जो उसके बिल्कुल निकट थी। मैं तुम्हें अपनी राय बताता हूँ। मेरे विचार में वह व्यक्ति अधिक साहसी होता है जो मृत्यु के ठीक द्वार पर खड़ा है, बनिस्बत उसके जो केवल उसकी निकटता में है। क्योंकि जब मृत्यु सामने आ खड़ी होती है तब वह ऐसे लोगों को भी उस चीज़ का सामना करने की प्रेरणा दे देती है जिसे किसी भी स्थिति में टाला नहीं जा सकता। इसी प्रकार वह ग्लैडिएटर, जो पूरे युद्ध के दौरान भयभीत रहा हो, अंततः अपने प्रतिद्वंद्वी के सामने अपना गला प्रस्तुत कर देता है और स्वयं उसकी डगमगाती तलवार की नोक को अपने भीतर प्रवेश करा देता है। किन्तु जब मृत्यु केवल निकट हो, यद्यपि उसका आना निश्चित हो, तब उसका सामना करने के लिए अडिग मानसिक शक्ति की आवश्यकता होती है। ऐसी शक्ति बहुत कम लोगों में पाई जाती है। उसका वास्तविक प्रदर्शन केवल एक बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है।

    इसलिए मुझे उसे सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई। मानो वह स्वयं मृत्यु पर निर्णय सुना रहा हो और मुझे बता रहा हो कि जब कोई उसे बिल्कुल निकट से देख लेता है तब वह कैसी प्रतीत होती है। मैं कल्पना करता हूँ कि यदि कोई व्यक्ति जिसने मृत्यु का अनुभव किया हो, फिर से जीवित होकर लौट आए और तुम्हें बताए कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है तो तुम उसकी बात पर बहुत अधिक विश्वास करोगे और उसे अत्यंत प्रामाणिक मानोगे। उसी प्रकार, मृत्यु के निकट आने पर जो व्याकुलता उत्पन्न होती है उसके बारे में सबसे विश्वसनीय जानकारी तुम्हें उन्हीं लोगों से मिल सकती है जो उसके बिल्कुल समीप खड़े रहे हों जिन्होंने न केवल उसे आते हुए देखा हो बल्कि उसका स्वागत भी किया हो। ऐसे लोगों में तुम बासुस को भी गिन सकते हो।

    वह नहीं चाहता था कि हम किसी भ्रम में पड़ें। उसने कहा कि मृत्यु से डरना उतना ही मूर्खतापूर्ण है जितना वृद्धावस्था से डरना। क्योंकि जैसे युवावस्था के बाद बुढ़ापा आता है, वैसे ही बुढ़ापे के बाद मृत्यु आती है। “जो मरना नहीं चाहता, उसने वास्तव में कभी जीना भी नहीं चाहा क्योंकि जीवन हमें इस शर्त पर दिया गया है कि उसका अंत मृत्यु में होगा। मृत्यु ही हमारी यात्रा का अंतिम गंतव्य है। इसलिए उससे डरना पागलपन है। हमें भय अनिश्चितता से लगता है। जो बातें निश्चित होती हैं उनकी हम केवल प्रतीक्षा करते हैं। मृत्यु एक ऐसी अनिवार्य शर्त है जो सब पर समान रूप से और बिना किसी अपवाद के लागू होती है। जब सब लोग उसी बंधन के अधीन हैं तो कौन शिकायत कर सकता है कि उस पर अन्याय हुआ है? न्याय का पहला तत्व समानता है।”

    “किन्तु इस समय मुझे प्रकृति की ओर से कोई पक्ष-समर्थन करने की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति की इच्छा यह नहीं है कि हम उसके अपने नियमों के अतिरिक्त किसी और नियम के अधीन हों। जो कुछ वह एकत्र करती है उसे वह फिर विघटित भी करती है। जिसे वह विघटित करती है उसे वह फिर से एकत्र भी कर लेती है। यदि ऐसा हो कि वृद्धावस्था किसी व्यक्ति को धीरे-धीरे मुक्त करे, उसे जीवन से अचानक और हिंसक रूप से न छीन ले बल्कि उसे क्रमशः और शांतिपूर्वक विदा होने दे तो उस व्यक्ति को सभी देवताओं का धन्यवाद करना चाहिए। वास्तव में उसे ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि उसे जीवन का पूरा आनंद और पर्याप्त हिस्सा मिल चुका है। इससे पहले कि उसे विश्राम के लिए बुलाया जाए। वह विश्राम जो नश्वर प्राणियों के लिए अनिवार्य है और थके हुए लोगों के लिए स्वागतयोग्य भी।”

    “तुम ऐसे लोगों को देखते हो जो मरने की इच्छा करते हैं बल्कि मृत्यु की माँग उतनी ही दृढ़ता से करते हैं जितनी दृढ़ता से लोग सामान्यतः जीवन की माँग करते हैं। मुझे नहीं पता कि इनमें से कौन मुझे अधिक प्रेरणादायक लगता है, वे जो मृत्यु की कामना करते हैं या वे जो मृत्यु का सामना शांत प्रसन्नता के साथ करते हैं। क्योंकि मृत्यु की इच्छा कभी-कभी पागलपन या क्रोध के किसी अचानक उभार से भी उत्पन्न हो सकती है। पर ऐसी शांत स्थिरता एक परिपक्व और दृढ़ निर्णय का परिणाम होती है। बहुत-से लोग क्रोध या आवेश में मृत्यु की ओर बढ़ जाते हैं। पर ऐसा कोई नहीं होता जो मृत्यु को अपनी ओर आते हुए देखकर उसका प्रसन्न मन से स्वागत करे। जब तक कि उसने लंबे समय से उसे स्वीकार न कर लिया हो और उसके प्रति स्वयं को समर्पित न कर दिया हो।”

    इसलिए मुझे स्वीकार करना होगा कि यद्यपि बासुस से बार-बार मिलने के मेरे कई कारण थे। आख़िर वह मेरा प्रिय मित्र था। फिर भी विशेष रूप से मैं यह देखना चाहता था कि क्या हर बार मुझे वह वैसा ही मिलेगा। क्या उसके शरीर के दुर्बल होने के साथ-साथ उसकी मानसिक शक्ति भी क्षीण हो जाएगी? किन्तु हुआ इसका उलटा। उसकी मानसिक ऊर्जा तो लगातार बढ़ती ही गई। जैसे रथ-दौड़ में सातवें और अंतिम चक्कर के दौरान, जब विजय की माला सामने दिखाई देने लगती है तब घोड़ों का उत्साह और अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में वह अक्सर एपिक्यूरियस (Epicurus) की शिक्षाओं के अनुरूप कहा करता था, “सबसे पहले, मुझे आशा है कि उस अंतिम श्वास में कोई पीड़ा नहीं होगी। यदि होगी भी तो वह बहुत थोड़े समय की होग। यही बात अपने-आप में एक सांत्वना है। क्योंकि तीव्र पीड़ा कभी लंबे समय तक नहीं टिकती।लेकिन यदि उस क्षण, जब आत्मा शरीर से अलग हो रही हो, कोई यातना हो भी तो मैं स्वयं को इस विचार से सांत्वना दूँगा कि उस पीड़ा के बाद मैं फिर किसी भी पीड़ा का अनुभव नहीं कर सकूँगा। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी वृद्ध साँस अब केवल किसी तरह मेरे होंठों से लगी हुई है और उसे शरीर से बाहर निकालने के लिए किसी बड़े बल की आवश्यकता नहीं है। जिस आग को भरपूर ईंधन मिल रहा हो, उसे बुझाने के लिए पानी डालना पड़ता है और कभी-कभी पूरे भवन का ढह जाना भी आवश्यक हो जाता है। लेकिन वह आग जिसका ईंधन समाप्त हो चुका हो, अपने-आप ही बुझ जाती है।”

    मेरे प्रिय लूसीलियस, मुझे इन शब्दों को सुनकर बहुत प्रसन्नता होती है। ऐसा नहीं है कि ये मेरे लिए नई बातें हैं बल्कि ऐसा है मानो वे अब मेरे सामने प्रत्यक्ष वास्तविकता बन गई हों। क्यों? क्या मैंने बहुत-से लोगों को अपने जीवन के अंत तक पहुँचते हुए नहीं देखा है? निश्चय ही देखा है। लेकिन वे लोग मुझ पर अधिक गहरा प्रभाव डालते हैं जो जीवन के प्रति किसी घृणा के बिना मृत्यु का सामना करते हैं। जो मृत्यु की ओर स्वयं नहीं बढ़ते बल्कि उसे अपने पास आने देते हैं।

    वास्तव में वह कहा करता था कि जो यातना हम अनुभव करते हैं, वह हमारी अपनी ही बनाई हुई होती है। जब हमें विश्वास हो जाता है कि मृत्यु निकट आ गई है तब हम भयभीत हो उठते हैं। किन्तु क्या मृत्यु हर व्यक्ति के निकट नहीं है। हर स्थान पर और हर क्षण तैयार खड़ी हुई? वह कहता था, “हमें यह याद रखना चाहिए कि जब कोई विशेष कारण हमें मृत्यु के निकट आता हुआ प्रतीत होता है तब भी मृत्यु के अनेक अन्य कारण उससे भी अधिक निकट होते हैं जिनसे हम डरते तक नहीं। किसी व्यक्ति को उसके शत्रु ने मार डालने की धमकी दी थी।लेकिन उससे पहले ही एक पाचन-रोग ने उसे मृत्यु तक पहुँचा दिया। यदि हम अपने भय के कारणों का थोड़ा विश्लेषण करें तो पाएँगे कि उनमें से कुछ वास्तविक हैं जबकि कुछ केवल कल्पित हैं। हम वास्तव में मृत्यु से नहीं डरते बल्कि मृत्यु के विचार से डरते हैं। मृत्यु स्वयं तो सदैव हमसे समान दूरी पर रहती है। इसलिए यदि मृत्यु से कभी डरना उचित है तो हर समय उससे डरना चाहिए। आखिर ऐसा कौन-सा समय है जो मृत्यु के अधीन नहीं है?”

    लेकिन मुझे डर है कि तुम इन लंबे पत्रों से मृत्यु से भी अधिक घृणा करने लगोगे! इसलिए मैं यहीं रुकता हूँ। जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है यदि तुम चाहते हो कि मृत्यु से कभी भय न लगे तो उसके बारे में सदैव विचार करते रहो।


अभी के लिए 

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