प्रिय लूसीलियस
“आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ युगों में भाषण कौशल की शैली पतित हो जाती है? क्यों किसी समय लेखकों में एक प्रकार का दोष प्रचलित हो जाता है। कभी सब कुछ अत्यधिक शब्दाडंबरपूर्ण और लंबा-चौड़ा हो जाता है तो कभी कोमल, बनावटी और गान जैसी कृत्रिम शैली का बोलबाला होता है? कभी ऐसी प्रबल अभिव्यक्तियाँ फैशन बन जाती हैं जो अपने विषय की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र होती हैं। कभी अधूरे वाक्यों तथा संकेतों की, जिनमें कही हुई बात से अधिक अनकहा निहित रहता है। कभी किसी युग में रूपकों का प्रयोग बिना किसी संकोच के अत्यधिक किया जाता है। इसका कारण वही है जिसे यूनानियों में एक प्रसिद्ध कहावत के रूप में कहा जाता है, ‘जैसा हमारा जीवन होता है, वैसी ही हमारी वाणी होती है।’
जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके बोलने के ढंग से मेल खाते हैं, उसी प्रकार किसी युग की वाणी की शैली भी उसके नागरिकों के आचरण के अनुरूप होती है। जब अनुशासन शिथिल पड़ जाता है और उसके स्थान पर विलासिता आ जाती है। यदि भाषा का पतन केवल एक-दो व्यक्तियों तक सीमित न रहकर सामान्य स्वीकृति प्राप्त कर ले तो वह व्यापक आत्म-विलास का निश्चित संकेत होता है।
प्रतिभा की अवस्था मन की अवस्था से भिन्न नहीं हो सकती। यदि मन स्वस्थ, संतुलित, गंभीर और संयमी है तो प्रतिभा भी पूर्णतः संयत रहती है। यदि मन दोषपूर्ण है तो प्रतिभा भी उसी प्रकार उग्र और असंयमित हो जाती है। क्या आप नहीं देखते कि जब मन अपनी शक्ति खो देता है तो अंग शिथिल पड़ जाते हैं और पैर घसीटकर चलते हैं? यदि मन कोमल और दुर्बल हो जाए तो उसकी मृदुता चाल में भी दिखाई देती है। यदि वह ऊर्जावान और प्रचंड हो तो कदम तेज़ पड़ते हैं। यदि वह विक्षिप्त हो या क्रोध से उन्मत्त (जो विक्षिप्तता के समान ही अवस्था है) तो शरीर की गति भी अस्त-व्यस्त हो जाती है और वह चलने के बजाय मानो दौड़ता हुआ आगे बढ़ता है। जब यह बात शरीर के संबंध में सत्य है तो प्रतिभा के संबंध में तो और भी अधिक सत्य होगी क्योंकि प्रतिभा पूरी तरह मन से मिली हुई है और उसी से अपना स्वरूप, अपनी दिशा और अपना मूल सिद्धांत प्राप्त करती है।
मेसेनास (Maecenas, रोम के बड़े राजनेता एवं कूटनीतिज्ञ) के जीवन-व्यवहार के विषय में इतनी प्रसिद्ध बातें हैं कि मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह कैसे चलता था, कितना विलासी था, लोगों की दृष्टि अपनी ओर आकर्षित करना उसे कितना प्रिय था। वह अपने दोषों को छिपाने का कोई प्रयास नहीं करता था। फिर हम क्या कहें? क्या उसकी गद्य-शैली भी उसके ढीले-ढाले, बिना कसे हुए वस्त्र की तरह शिथिल नहीं है? क्या उसकी भाषा भी उसके वस्त्रों, उसके सेवकों, उसके भवन और उसकी पत्नी की भाँति उतनी ही आडंबरपूर्ण नहीं है? यदि वह सीधे मार्ग पर बना रहता, यदि समझे जाने से बचने का जान-बूझकर प्रयास न करता। यदि अपनी भाषा में भी उच्छृंखल न होता तो वह अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति सिद्ध हो सकता था। उसके लेखन में आपको यही दिखाई देगा, एक शराबी व्यक्ति की शैली, उलझी हुई, भटकती हुई और स्वच्छंदताओं से परिपूर्ण।
“छोटी जलधारा के किनारे, तट पर, पत्तों से आच्छादित वन।”
यह भी देखिए—
“वे अपनी छोटी नौकाओं से गहरे जल को चीरते हैं और पीछे लहरों की घुमावदार रेखा में मानो उद्यान छोड़ जाते हैं।”
और यह फिर क्या है? अथवा ये पंक्तियाँ—
“वह अपनी प्रेयसी के केशों को घुँघराला करता है और अपने होंठों से कबूतरों-सा स्पर्श करता हुआ आह भरते हुए बोलना आरंभ करता है, उन वन-स्वामियों की भाँति जो झुकी हुई गर्दनों के साथ स्वयं को मुकुट धारण कराते हैं।”
“वे सुधरने से रहित लोग हैं। वे दावतों में मनुष्यों की परीक्षा लेते हैं। मदिरा-पात्र के सहारे घरों को जोत डालते हैं और मृत्यु की ओर प्रलोभन बिछाते हैं।”
“ऐसी प्रतिभा, जो अपने ही उत्सव-दिवस की भी शायद ही साक्षी देती है।”
“पीली मोमबत्ती के रेशे और शोर मचाती चक्की।”
“माता या पत्नी द्वारा ढका हुआ अग्निकुंड।”
जब आप इन उदाहरणों को पढ़ते हैं तो क्या आपके मन में तुरंत यह विचार नहीं आता कि यह उसी व्यक्ति की रचना है जो नगर में सदैव ढीला-ढाला अंगरखा पहनकर घूमता था? क्योंकि जब सीज़र की अनुपस्थिति में उसे शासन का दायित्व सौंपा गया था, तब भी वह सैनिकों को दैनिक संकेत-शब्द (पासवर्ड) देते समय कमरबंद नहीं बाँधता था। यही वह व्यक्ति था जो न्यायासन पर, वक्ताओं के मंच पर और प्रत्येक सार्वजनिक सभा में सिर पर शॉल डाले उपस्थित होता था, जिसके दोनों ओर उसके कान बाहर निकले रहते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी हास्य-नाटक में किसी धनी व्यक्ति के भागे हुए दास का रूप दिखाया जाता है। यही वह व्यक्ति था जो गृहयुद्धों के चरम समय में, जब पूरा नगर शस्त्रों से सुसज्जित और अशांत था, जनता के बीच केवल दो हिजड़ों को साथ लेकर निकलता था, जो उससे भी अधिक पुरुषोचित प्रतीत होते थे। यही वह व्यक्ति था जिसने अपनी एक ही पत्नी से मानो हज़ार बार विवाह किया।
उसके ये वाक्य इतने स्वच्छंद ढंग से जोड़े गए, इतनी लापरवाही से बिखेरे गए और अपने शब्द-विन्यास में सामान्य प्रयोग से इतने भिन्न, यह स्पष्ट कर देते हैं कि उसका चरित्र भी उतना ही विचित्र, उतना ही भ्रष्ट और उतना ही विकृत था। उसकी दयालुता की बहुत प्रशंसा की जाती है क्योंकि उसने तलवार का कम प्रयोग किया, रक्तपात से परहेज़ किया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन केवल अपने उच्छृंखल आचरण में किया। किन्तु वह अपनी इस प्रशंसा को भी अपनी कृत्रिम और टेढ़ी-मेढ़ी गद्य-शैली से स्वयं नष्ट कर देता है क्योंकि उससे स्पष्ट हो जाता है कि वह उदार या सौम्य नहीं बल्कि केवल कोमल और दुर्बल था। कोई भी व्यक्ति उसके घुमावदार वाक्य-विन्यास, असामान्य शब्द-प्रयोग और विचित्र विचारों से यह बात समझ सकता है। उसके विचार प्रायः महान होते हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति में दृढ़ता का अभाव है। यह उस व्यक्ति का मन है जिसे अत्यधिक समृद्धि ने पथभ्रष्ट कर दिया था।
कुछ मामलों में दोष व्यक्ति का होता है। कुछ में युग का। जब समृद्धि व्यापक आत्म-विलास को जन्म देती है तो सबसे पहले वस्त्रों और श्रृंगार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है। उसके बाद गृह-सज्जा को लेकर अत्यधिक चिंता होने लगती है। फिर ध्यान स्वयं भवनों की ओर मुड़ता है। एक नया भाग जोड़कर साधारण घर को विशाल प्रासाद बना दिया जाता है। भीतर की दीवारें विदेशों से लाए गए संगमरमर से चमक उठती हैं। छत की टाइलें स्वर्ण से अलंकृत कर दी जाती हैं और खाँचेदार छतों की छवि चमकदार फर्श की टाइलों में प्रतिबिंबित होने लगती है। इसके बाद वैभव भोजन की मेज़ तक पहुँच जाता है। नवीनता और प्रचलित व्यवस्था में परिवर्तन ही फैशन बन जाते हैं, जो कभी भोजन के अंत में परोसा जाता था, वही अब आरंभ में परोसा जाने लगता है। जो व्यंजन पहले अतिथियों के आगमन पर प्रस्तुत किया जाता था, वही अब उनके विदा होते समय परोसा जाता है।
जब मन सामान्य और परंपरागत बातों को अस्वीकार करने तथा स्थापित रीति-रिवाजों को तुच्छ समझने का अभ्यस्त हो जाता है, तब वह भाषा में भी नवीनता खोजने लगता है। कभी वह प्राचीन और अप्रचलित शब्दों को फिर से प्रचलन में लाता है। कभी सामान्य प्रयोग को विकृत कर देता है, यहाँ तक कि ऐसे नए शब्द भी गढ़ लेता है जिन्हें पहले कभी किसी ने नहीं सुना। और कभी, जैसा कि इस समय विशेष रूप से प्रचलित है, चमत्कारपूर्ण रूपकों की भरमार को ही उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श मान लिया जाता है। कुछ वक्ता अपने विचार को जान-बूझकर अधूरा छोड़ देते हैं। उनका विश्वास होता है कि यदि वाक्य केवल संकेत देकर समाप्त कर दिया जाए और उसका आशय श्रोता स्वयं समझ ले तो उनकी अधिक प्रशंसा होगी। कुछ अन्य किसी विचार को छोड़ ही नहीं पाते। वे उसे निरंतर खींचते और विस्तार देते चले जाते हैं। कुछ लोग किसी शैलीगत विशेषता को इतनी दूर तक ले जाते हैं कि वह दोष बन जाती है। यद्यपि किसी महान प्रयत्न में कभी-कभी ऐसा करना उचित हो सकता है, पर वे वहीं नहीं रुकते; बल्कि उस दोष से ही प्रेम करने लगते हैं।
अतः जहाँ कहीं भी आप पतित वक्तृत्व-शैली को प्रचलन में आते देखें, वहाँ यह निश्चय समझिए कि आचरण के अन्य रूप भी मार्ग से भटक चुके हैं। जैसे वस्त्रों और भोजों में विलासिता समाज के भीतर व्याप्त रोग का लक्षण होती है, उसी प्रकार जब असंयमित वक्तृत्व सामान्य व्यवहार बन जाता है तो वह इस बात का प्रमाण होता है कि जिन मनों से वे शब्द निकलते हैं, उनका भी पतन हो चुका है।
पतित भाषिक प्रयोगों को केवल सामान्य या निम्न स्तर के श्रोता ही नहीं अपनाते बल्कि अधिक शिक्षित लोग भी उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। इस पर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उनके टोगा (रोमी परिधान) भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी रुचि एक जैसी होती है। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि प्रशंसा केवल दोषयुक्त रचना की ही नहीं होती बल्कि स्वयं उन दोषों की भी की जाती है। ऐसा सदा से होता आया है। कोई भी प्रतिभा कभी लोकप्रिय नहीं हुई जिसके कुछ दोषों को लोगों ने क्षमा न किया हो। आप किसी भी महान व्यक्ति का नाम ले लीजिए। मैं बता सकता हूँ कि उसके समकालीनों ने उसके कौन-से दोषों की उपेक्षा की और किन्हें जान-बूझकर अनदेखा किया। मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों के उदाहरण दे सकता हूँ जिनके दोषों को दोष नहीं माना गया और कुछ ऐसे भी जिनके दोष ही उनके लिए गुण बन गए। इसी प्रकार मैं ऐसे अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्तियों के उदाहरण भी दे सकता हूँ, जिन्हें आदर्श माना जाता है। किन्तु यदि उनके दोषों को सुधार दिया जाए तो उनकी समस्त विशिष्टता ही नष्ट हो जाए क्योंकि उनके दोष उनकी उत्कृष्टताओं के साथ इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं कि एक को हटाने पर दूसरा भी समाप्त हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, वक्तृत्व-शैली के लिए कोई स्थायी नियम नहीं होता। वह समाज की प्रचलित परंपरा के अनुसार बदलती रहती है और समाज की वह परंपरा भी अधिक समय तक एक-सी नहीं रहती। आज के हमारे अनेक वक्ता प्राचीन काल के शब्दों को खोज-खोजकर अपनाते हैं ताकि उनकी भाषा बारह पट्टिकाओं (प्राचीन रोम की सबसे पहली लिखित विधि-संहिता) के विधि-संग्रह जैसी प्रतीत हो। उनके लिए ग्रैकस, क्रासुस और कुरियो भी अत्यधिक नवीन और परिष्कृत हैं। इसलिए वे अपियस और कोरुंकानियस के युग तक लौट जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग इसके बिल्कुल विपरीत मार्ग अपनाते हैं। वे ऐसा कोई शब्द प्रयोग नहीं करना चाहते जो केवल वर्तमान प्रचलन से बाहर हो। परिणामस्वरूप उनकी भाषा साधारण, फीकी और नीरस हो जाती है।
ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ समान रूप से दोषपूर्ण हैं। उसी प्रकार यह भी भूल है कि केवल ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाए जो असाधारण हों या जिनमें काव्यात्मक आभा हो और सामान्य तथा प्रचलित शब्दों से पूरी तरह बचा जाए। मेरी दृष्टि में दोनों समान रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। एक व्यक्ति आवश्यकता से अधिक अपने श्रृंगार में लगा रहता है। जबकि दूसरा आवश्यकता से भी कम। एक अपने पैरों के बाल तक उखाड़ डालता है। दूसरा अपनी बगल के बालों तक की उपेक्षा करता है।
अब शब्द-विन्यास के प्रश्न पर आइए। वहाँ मैं आपको कितने प्रकार के दोष गिना सकता हूँ! कुछ लोग कठोर और झटकेदार शैली को पसंद करते हैं। यदि कोई वाक्य स्वाभाविक रूप से बहुत सहज और प्रवाहपूर्ण बन जाए तो वे जान-बूझकर उसके शब्दों का क्रम बदल देते हैं क्योंकि उनकी इच्छा होती है कि प्रत्येक शब्द-संयोजन अचानक और असंगत प्रतीत हो। उन्हें लगता है कि जो कुछ कानों को असमतल और खुरदरा लगे, उसी में पुरुषोचित दृढ़ता निहित है।
दूसरी ओर, कुछ लोग इतनी कोमलता और मधुरता के साथ लिखते हैं कि उनकी रचना वक्तृत्व-कला की अपेक्षा संगीत-रचना जैसी प्रतीत होने लगती है। क्या मुझे उन लोगों का भी उल्लेख करना चाहिए जो कुछ शब्दों को जान-बूझकर बहुत देर तक रोककर रखते हैं और श्रोता को उनकी प्रतीक्षा कराते हुए अंततः उन्हें वाक्य के अंत में लाकर रखते हैं? उस सुगढ़ सिसेरोनियन वाक्य-विन्यास का क्या कहें, जो अपने सुंदर गठन के कारण श्रोता को मधुर प्रतीक्षा में बाँधे रखता है, जब तक कि वह अंत में पूर्ण न हो जाए और जो अपनी निश्चित लय से कभी विचलित नहीं होता? दोष केवल वाक्यों के गठन में ही नहीं होता। दोष तब भी होता है जब विचार निर्बल और बालसुलभ हों या उनमें ऐसा असंयम हो कि वे शालीनता की सीमा से आगे बढ़ जाएँ अथवा वे अत्यधिक अलंकृत और आवश्यकता से अधिक मधुर हों या केवल सुनने में प्रभावशाली लगें, परंतु उनके भीतर कोई वास्तविक सार या अर्थ न हो।
ऐसे दोषों को प्रायः एक ही ऐसा वक्ता लोकप्रिय बना देता है, जो अपने समय की वक्तृत्व-कला पर प्रभुत्व रखता है। फिर अन्य लोग उसका अनुकरण करते हैं और एक-दूसरे को भी उसी दिशा में प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, जब सालुस्त लिख रहे थे, तब अधूरे विचार, वाक्यांशों का अचानक समाप्त हो जाना और रहस्यपूर्ण संक्षिप्तता को उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श माना जाता था। लूशियस अर्रुन्तियस, जो अत्यंत संयमी व्यक्ति था और प्यूनिक युद्ध का इतिहासकार भी, सालुस्त का अनुयायी था और उसी प्रकार की शैली में लिखने में विशेष दक्ष था। सालुस्त ने एक स्थान पर लिखा है, “उसने चाँदी के बल पर एक सेना प्राप्त कर ली”; अर्थात उसने धन देकर सेना खरीद ली। अर्रुन्तियस को यह प्रयोग इतना प्रिय लगा कि उसने लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर उसका उपयोग किया। एक स्थान पर वह लिखता है, “उन्होंने हमारे सैनिकों की पराजय करवा दी।” दूसरे स्थान पर, “सिराक्यूज़ के राजा हीएरो ने युद्ध खड़ा कर दिया।” और एक अन्य स्थान पर, “इस समाचार ने पानहोर्मस को रोमनों के सामने आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया।”
ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं। उसका पूरा ग्रंथ ऐसे प्रयोगों से भरा हुआ है। जो अभिव्यक्तियाँ सालुस्त के यहाँ कभी-कभार मिलती हैं, वही अर्रुन्तियस के यहाँ बार-बार बल्कि लगभग हर जगह दिखाई देती हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है। सालुस्त के यहाँ वे स्वाभाविक रूप से आ गई थीं। जबकि अर्रुन्तियस उन्हें जान-बूझकर खोजकर लाता था। तुम देख सकते हो कि जब कोई व्यक्ति किसी दोष को ही अनुकरण का आदर्श बना लेता है, तब क्या होता है। सालुस्त ने एक स्थान पर 'शीतकालीन जल' जैसा प्रयोग किया। अर्रुन्तियस ने प्यूनिक युद्ध के प्रथम ग्रंथ में लिखा, 'ऋतु अचानक शीतकाल बन गई।' दूसरे स्थान पर, यह बताने के लिए कि वर्ष अत्यंत ठंडा था। उसने लिखा, 'पूरा वर्ष शीतकाल बना रहा।' और एक अन्य स्थान पर, 'तब उसने साठ मालवाहक जहाज़ भेजे, जिनमें सैनिकों और आवश्यक नाविकों के अतिरिक्त कोई भार नहीं था क्योंकि उत्तर की हवा शीतकाल की तरह चल रही थी।' वह जहाँ भी अवसर मिलता, उस शब्द को ठूँस देता था।
सालुस्त ने एक स्थान पर कहा, 'गृहयुद्ध के बीच भी वह सदाचार और न्यायप्रियता की प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।' अर्रुन्तियस स्वयं को रोक नहीं सका और अपने प्रथम ग्रंथ में तुरंत लिख बैठा कि रेगुलस की 'प्रतिष्ठा' अत्यंत महान थी। इस प्रकार के दोष और ऐसे अन्य दोष जो केवल अनुकरण से प्राप्त होते हैं। आत्म-विलास या पतित मन के लक्षण नहीं हैं। किसी व्यक्ति के स्वभाव का अनुमान केवल उसके अपने दोषों से लगाया जा सकता है। उन दोषों से जो उसके अपने व्यक्तित्व से उत्पन्न होते हैं। जब वह क्रोधित होता है तो उसकी भाषा भी क्रोधपूर्ण हो जाती है। जब वह व्याकुल होता है तो उसकी भाषा भी अत्यधिक उग्र हो जाती है; और जब वह आडंबरप्रिय तथा बनावटी होता है तो उसकी भाषा भी शिथिल, ढीली और निर्बल हो जाती है।
उन लोगों पर ध्यान दीजिए जिन्हें आप देखते हैं। जो अपनी दाढ़ी के सारे या अधिकांश बाल उखाड़ डालते हैं या केवल होंठों के चारों ओर का थोड़ा-सा भाग साफ़ रखते हैं और शेष बाल बढ़ने देते हैं। जो अत्यंत भड़कीले रंगों के चोगे पहनते हैं या बहुत ढीले बुने हुए टोगा धारण करते हैं। वे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते जो लोगों की दृष्टि से ओझल रह जाए। उनकी इच्छा केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने और सबकी निगाहें अपनी ओर खींचने की होती है। लोग उनकी निंदा करें, इसकी उन्हें परवाह नहीं। उनके लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे चर्चा का विषय बने रहें। मेसेनास और उन सभी लेखकों की गद्य-शैली भी ऐसी ही है, जो भूलवश नहीं बल्कि जान-बूझकर और सोच-समझकर त्रुटियाँ करते हैं। यह किसी गहरे मानसिक दोष का परिणाम है। जिस प्रकार शराब पीने पर वाणी तब तक लड़खड़ाने नहीं लगती जब तक कि उसका भार मन पर हावी होकर उसे डगमगा न दे या परास्त न कर दे, उसी प्रकार उसकी गद्य-शैली का यह उन्माद, इसे और क्या कहा जाए? किसी व्यक्ति को तब तक प्रभावित नहीं करता, जब तक उसका मन पहले ही विचलित न हो चुका हो। इसलिए हमें सबसे अधिक अपने मन की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि अर्थ, वाणी, आचरण, मुखमुद्रा और चाल, सब उसी से उत्पन्न होते हैं। यदि मन स्वस्थ और संतुलित है तो उसकी भाषा भी दृढ़, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण होगी। पर यदि मन ही डगमगा जाए, तो उसके साथ शेष सब कुछ भी बिखर जाता है। जब तक उनके राजा की रक्षा होती है, तब तक सब एकचित्त रहते हैं। परंतु यदि वह नष्ट हो जाए तो वे अपनी निष्ठा भी त्याग देते हैं।
मन हमारा राजा है। जब तक वह सुरक्षित और अक्षुण्ण रहता है, तब तक हमारे अन्य सभी अंग अपना-अपना कार्य भली-भाँति करते हैं तथा उसके प्रति आज्ञाकारी और अधीन बने रहते हैं। परंतु यदि वही डगमगाने लगे तो वे भी अस्थिर हो जाते हैं। यदि वह सुख-भोग के आगे समर्पण कर दे तो उसकी समस्त योग्यताएँ और क्रियाशीलता मुरझा जाती हैं। उसका प्रत्येक प्रयत्न शिथिलता और आलस्य का परिचायक बन जाता है।
चूँकि मैंने यह उपमा दी है। इसलिए इसे आगे भी बढ़ाता हूँ। हमारा मन कभी राजा होता है और कभी अत्याचारी। जब वह सम्माननीय और सदाचारी आचरण की ओर उन्मुख रहता है, अपने संरक्षण में दिए गए शरीर के कल्याण की चिंता करता है और किसी भी निकृष्ट या लज्जाजनक कार्य का आदेश नहीं देता, तब वह राजा होता है। परंतु जब वह असंयमी, लोभी और कामुक हो जाता है, तब वह अपने श्रेष्ठ नाम को छोड़कर उस भयानक और घृणित नाम को धारण कर लेता है और अत्याचारी बन जाता है।
तब उच्छृंखल भावनाएँ उस पर अधिकार कर लेती हैं और उसे अपने भार से दबा देती हैं। आरंभ में वह निश्चय ही प्रसन्न होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे जनता तब प्रसन्न होती है जब उसे ऐसा दान या अनुग्रह मिलता है जो अंततः उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होता है और वह बिना किसी वास्तविक लाभ के पेट भरकर खाती है, लालच में ऐसी वस्तुओं पर भी टूट पड़ती है जिन्हें वह वास्तव में उपभोग नहीं कर सकती। किन्तु जब इस अत्याचारी की बीमारी धीरे-धीरे उसकी शक्ति को क्षीण कर देती है और भोग-विलास का विष उसकी हड्डियों और स्नायुओं तक पहुँच जाता है, तब वह उन लोगों को देखकर आनंद लेने लगता है जिन्हें उसने अपनी ही असीम लालसा के कारण अपने समान निष्प्रयोज्य बना दिया है। वह स्वयं भोग करने में असमर्थ होकर दूसरों के भोग-विलास को देखकर परोक्ष सुख प्राप्त करता है और उनकी वासनाओं का सहभागी तथा साक्षी बन जाता है, क्योंकि अतिभोग ने उससे स्वयं भोग करने की क्षमता ही छीन ली होती है।
यद्यपि उसके सामने सुख-सुविधाओं और भोग की वस्तुओं की कोई कमी नहीं होती, फिर भी उनसे उसे संतोष की अपेक्षा अधिक पीड़ा मिलती है क्योंकि वह उन सबका पूरा उपभोग नहीं कर सकता। वह उन सभी भोग-विलासों को अपने कंठ और उदर से नहीं गुज़ार सकता। न ही वह सुंदर युवकों और स्त्रियों की पूरी भीड़ के साथ अपनी वासनाओं की तृप्ति कर सकता है। वस्तुतः उसे इस बात का दुख होता है कि शरीर की सीमित क्षमता के कारण उसके सुख का बड़ा भाग उसकी पहुँच से बाहर रह जाता है।
प्रिय लूसीलियस, क्या यह पागलपन नहीं है? हममें से कोई भी स्वयं को नश्वर नहीं समझता। कोई भी स्वयं को दुर्बल नहीं मानता बल्कि हममें से कोई यह भी नहीं सोचता कि वह केवल एक ही व्यक्ति है। हमारे रसोईघरों को देखिए, जहाँ कितने ही चूल्हे जल रहे हैं और रसोइए इधर-उधर दौड़ते हुए भोजन बनाने में लगे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि यह सारा कोलाहल केवल एक ही पेट के लिए भोजन तैयार कर रहा है? हमारे मदिरा-भंडारों को देखिए, जहाँ अनेक पीढ़ियों की पुरानी मदिराओं से भरे हुए भंडारगृह हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि इतने वर्षों और इतने प्रदेशों की मदिराएँ केवल एक ही पेट के उपभोग के लिए संचित की गई हैं? देखिए, कितने विशाल क्षेत्रों में भूमि जोती जा रही है, कितने हजारों किसान हल चला रहे हैं और कुदाल चला रहे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि सिसिली और उत्तर अफ्रीका, दोनों स्थानों के खेत केवल एक ही पेट के लिए बोए जा रहे हैं? हम पूर्णतः स्वस्थ और संतुलित कब होंगे? हम अपनी इच्छाओं को संयमित कब करेंगे? तब, जब हममें से प्रत्येक स्वयं का सही आकलन करेगा, अपने शरीर की सीमाओं को समझेगा। यह जान लेगा कि वह वास्तव में कितना कम धारण कर सकता है और कितने थोड़े समय के लिए।किन्तु प्रत्येक प्रकार के आत्मसंयम की दिशा में आपको जितनी सहायता इस विचार से मिलेगी कि जीवन अल्प है और उसका जो थोड़ा-सा भाग हमारे पास है, वह भी अनिश्चित है, उतनी किसी अन्य बात से नहीं मिलेगी।अपने प्रत्येक कर्म में मृत्यु को अपनी दृष्टि के सामने रखिए।
अभी के लिए विदा
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