Tuesday, 4 August 2026

ज्ञान का पुनरावलोकन करने एवं सीमित आवश्यकता के बारे में -- पत्र - 108

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें नोमेन्टम स्थित अपने ग्रामीण निवास से शुभकामनाएँ भेजता हूँ। मेरी कामना है कि तुम्हारा मन उत्कृष्ट बने। यह कामना वास्तव में देवताओं की कृपा की कामना भी है क्योंकि जो व्यक्ति सचमुच स्वयं पर उपकार करता है, उसे सभी देवताओं की सद्भावना और सहायता भी प्राप्त होती है। फिलहाल उन लोगों की इस धारणा को एक ओर रख दो कि हममें से प्रत्येक को एक संरक्षक देवता प्रदान किया गया है। ऐसा देवता नहीं जो उच्च श्रेणी का हो बल्कि निम्न श्रेणी का, जिन्हें ओविड (एक रोमन कवि) ने 'साधारण देवता' कहा है। फिर भी, इस विचार को अभी के लिए अलग रखते हुए यह स्मरण रखना कि हमारे पूर्वज, जो इस विश्वास को मानते थे, निश्चय ही स्टोइक विचारधारा के निकट रहे होंगे क्योंकि वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक व्यक्तिगत जीनियस (संरक्षक आत्मा) अथवा स्त्रियों के लिए, एक व्यक्तिगत जूनो (एक शक्तिशाली देवी) को नियुक्त मानते थे। किसी अन्य अवसर पर हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि क्या देवताओं के पास इतना अवकाश है कि वे सामान्य मनुष्यों के दैनिक कार्यों की भी देखभाल कर सकें। अभी के लिए इतना निश्चित जान लो कि चाहे हमें ऐसे संरक्षक मिले हों या हमें भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया हो, किसी व्यक्ति के लिए सबसे भयंकर अभिशाप यही है कि तुम प्रार्थना करो। वह स्वयं अपना ही शत्रु बन जाए।



    परन्तु तुम्हें यह प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं कि देवता किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाएँ जो दण्ड का अधिकारी प्रतीत होता है। मैं तो कहता हूँ कि वे उसके प्रति पहले से ही प्रतिकूल हैं, चाहे देखने में ऐसा लगे कि वह उनकी कृपा का आनंद ले रहा है। यदि तुम मानव जीवन की परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन उन्हें जैसी वे वास्तव में हैं, वैसा करो न कि जैसा उनका वर्णन किया जाता है तो तुम्हें ज्ञात होगा कि अधिकांश अवसरों पर हमारी विपत्तियाँ हमें कोई वास्तविक हानि नहीं पहुँचातीं। कितनी ही बार तथाकथित विपत्ति ही सुख का कारण और आरम्भ सिद्ध हुई है! कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि कोई व्यक्ति भारी प्रशंसा और सम्मान के बीच पदोन्नत होता गया, ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँचता गया। जबकि वास्तव में वह किसी खड़ी चट्टान के किनारे की ओर बढ़ रहा था। यहाँ तक कि उसका पहले का स्थान भी इतना ऊँचा था कि वहाँ से गिरने का जोखिम बना हुआ था। 

    किन्तु यदि तुम उस अंतिम सीमा को ध्यान में रखो जिसके आगे प्रकृति किसी को नहीं गिराती तो स्वयं पतन में भी स्वभावतः कुछ भी बुरा नहीं है। हमारे समस्त कार्यों का अंत निकट ही है। मैं फिर कहता हूँ, भाग्यशाली व्यक्ति का पतन भी निकट है और दुर्भाग्यग्रस्त व्यक्ति की मुक्ति भी निकट है। इन्हें लंबा तो हम स्वयं ही बनाते हैं। अपनी आशाओं और भय के कारण हम उन्हें खींचते चले जाते हैं। बुद्धिमानी इसी में है कि प्रत्येक बात का मूल्यांकन अपनी मरणशीलता को ध्यान में रखकर किया जाए। तुम्हें अपने आनंद को भी सीमित रखना चाहिए और अपने भय को भी। किसी भी वस्तु का बहुत लंबे समय तक आनंद न लेना ही उचित है ताकि किसी वस्तु से बहुत लंबे समय तक भयभीत भी न रहना पड़े।

    पर मैं इस दोष को केवल इसी सीमा तक क्यों सीमित करूँ? वास्तव में ऐसा कोई कारण नहीं है कि तुम किसी भी वस्तु को भयावह समझो। जो बातें हमें आतंकित और भयभीत करती हैं, वे केवल भ्रममात्र हैं। हममें से किसी ने भी सत्य का अन्वेषण नहीं किया। हम तो केवल अपने भय एक-दूसरे को सौंपते चले आते हैं। कोई भी इतना साहस नहीं करता कि उन बातों के निकट जाकर, जो लोगों को विचलित करती हैं, स्वयं भय के वास्तविक स्वरूप और उसके वास्तविक महत्व को समझे। भय की असत्यता और आधारहीनता आज भी इसलिए स्वीकार की जाती है क्योंकि किसी ने उसका खण्डन नहीं किया है। इसलिए हमें चाहिए कि तथ्यों की गहराई से जाँच करने के महत्व को समझें। तब हमें ज्ञात होगा कि जिन बातों से लोग डरते हैं, वे अल्पकालिक, अनिश्चित और वास्तव में हानिरहित होती हैं। हमारे मन का भ्रम ठीक वैसा ही है जैसा लुक्रेतियस ने कहा है—

“जैसे बच्चे अँधेरे में उन वस्तुओं से काँपते और डरते हैं जिन्हें वे देख नहीं पाते, वैसे ही हम भी दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं।”

    तो फिर क्या? क्या हम, जो दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं, किसी भी बच्चे से अधिक मूर्ख नहीं हैं? किन्तु, लुक्रेतियस, इस विषय में तुम भूल करते हो। ऐसा नहीं है कि हम दिन के उजाले में भयभीत होते हैं बल्कि हमने अपने जीवन से सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु को अन्धकारमय बना लिया है। हमें कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता न यह कि वास्तव में हमारे लिए क्या हानिकारक है और न यह कि क्या हितकर है। हम जीवन भर बिना सोचे-समझे हर ओर भागते रहते हैं। परन्तु इससे न तो हम रुकते हैं और न ही अधिक सावधानी से कदम बढ़ाना सीखते हैं। तुम स्वयं देख सकते हो कि अँधेरे में उतावलेपन से दौड़ना कितना पागलपन है। हमारे व्यवहार का परिणाम यह होता है कि जब लौटना पड़ता है तो हमें अधिक समय लगता है। किन्तु यह जाने बिना कि हम कहाँ जा रहे हैं, हम उसी दिशा में और अधिक वेग से बढ़ते चले जाते हैं, जिस ओर हमारा अंधा आग्रह हमें ले जा रहा होता है।

    यदि हम चाहें, तो प्रकाश प्राप्त हो सकता है। किन्तु यह केवल एक ही प्रकार से संभव है। मानवीय और दैवीय विषयों का ऐसा ज्ञान प्राप्त करके जो केवल सतही न हो बल्कि मन पर स्थायी रूप से अंकित हो। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य बार-बार अपने ज्ञान का पुनरावलोकन करे, उसे अपने जीवन में लागू करे और निरन्तर यह जाँचता रहे कि वास्तव में कौन-सी वस्तुएँ अच्छी हैं, कौन-सी बुरी हैं, किन वस्तुओं को भूलवश अच्छा या बुरा कहा जाता है, क्या सम्माननीय है और क्या लज्जाजनक तथा दैवीय विधान (प्रोविडेन्स) का वास्तविक स्वरूप क्या है। मानव बुद्धि को भी इन्हीं सीमाओं तक बँधे रहने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो यह स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह स्वर्ग-मण्डल की सीमा से भी परे दृष्टि डाले और विचार करे कि यह जगत किस ओर अग्रसर है, इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है और इतनी तीव्र गति से यह किस अंतिम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। 

    किन्तु इस दिव्य चिंतन से अपने मन को हटाकर हमने उसे तुच्छ और निम्न विषयों में लगा दिया है तथा उसे लोभ का दास बना दिया है। हमने आकाश-मण्डल, उसकी सीमाओं और समस्त जगत का संचालन करने वाले उसके अधिपतियों की उपेक्षा कर दी, ताकि पृथ्वी को खोदकर यह खोज सकें कि उसमें से कौन-सी हानिकारक वस्तुएँ निकाली जा सकती हैं; मानो जो कुछ प्रकृति ने हमें सहज रूप से दिया था, उससे हम संतुष्ट ही न हों। हमारे दिव्य जनक ने जो कुछ हमारे लिए हितकारी था, उसे बिना हमारे खोजे ही सहज उपलब्ध करा दिया था। उन्होंने उसकी प्राप्ति के लिए हमें प्रतीक्षा नहीं कराई बल्कि उसे उदारतापूर्वक प्रदान किया। जो कुछ हमारे लिए हानिकारक था, उसे उन्होंने पृथ्वी की गहराइयों में छिपा दिया। इसलिए यदि किसी के विरुद्ध शिकायत की जा सकती है तो वह केवल हम स्वयं हैं। प्रकृति की इच्छा के विरुद्ध, जिसने उन विनाशकारी वस्तुओं को छिपाकर रखा था, हमने ही उन्हें खोजकर अपने विनाश के साधन बाहर निकाल लिए। हमने अपने मन को भोग-विलास के हवाले कर दिया। जबकि भोग-विलास ही सभी विपत्तियों का प्रारम्भ है और स्वयं को महत्त्वाकांक्षा, यश-लालसा तथा अन्य उतनी ही व्यर्थ और निरर्थक वस्तुओं के अधीन कर दिया।

    तो फिर मैं तुम्हें क्या करने की सलाह देता हूँ? यह नहीं कि तुम कोई नई बात करो क्योंकि जिन रोगों का हम उपचार करना चाहते हैं वे नए नहीं हैं। सबसे पहले स्वयं विचार करो कि वास्तव में क्या आवश्यक है और क्या अनावश्यक। जो आवश्यक है, वह हर स्थान पर मिल सकता है। लेकिन अनावश्यक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य को अपना सारा समय और परिश्रम लगाना पड़ता है। मैं यह नहीं कहता कि यदि तुम स्वर्णजटित शय्याओं और रत्नजड़ित पात्रों को तुच्छ समझो तो स्वयं पर गर्व करो। अनावश्यक वस्तुओं का तिरस्कार करने में कौन-सा विशेष सद्गुण है? अपने ऊपर तब गर्व करना, जब तुम आवश्यक वस्तुओं की भी अपेक्षा न रखो।राजसी वैभव का त्याग कर देना, विशालकाय जंगली सूअरों के मांस, राजहंसों की जिह्वाओं तथा विलासी भोजन की उन सब अति की इच्छा न करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। विलासिता की प्रवृत्ति तो इतनी विकृत हो जाती है कि वह अब किसी पूरे प्राणी को खाने में भी संतुष्ट नहीं होती बल्कि विभिन्न प्राणियों के केवल चुने हुए अंगों का स्वाद लेना चाहती है। 

    मैं तुम्हारी प्रशंसा तब करूँगा जब तुम साधारण रोटी की भी परवाह न करोगे और अपने मन को यह विश्वास दिला दोगे कि घास केवल पशुओं के चरने के लिए ही नहीं उगती बल्कि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य के लिए भी भोजन बन सकती है। जब तुम यह समझ जाओगे कि हमारा पेट जिसे हम मानो किसी सुरक्षित भंडार की तरह महँगे व्यंजनों से भरते रहते हैं, वह वृक्षों की पत्तियों से भी भरा जा सकता है। हमें केवल अपनी भूख शांत करनी चाहिए। भोजन के प्रकार को लेकर आग्रह नहीं करना चाहिए। इससे क्या अंतर पड़ता है कि पेट में क्या गया? वह वहाँ अधिक समय तक रहने वाला तो नहीं है। तुम्हें ऐसी भोजन-मेज़ प्रिय लगती है जिस पर स्थल और समुद्र, दोनों से प्राप्त व्यंजन सजे हों। कुछ इसलिए अधिक प्रिय होते हैं कि वे बिल्कुल ताज़े लाए गए हैं। कुछ इसलिए कि उन्हें कृत्रिम रूप से खिलाकर-पिलाकर इतना मोटा कर दिया गया है कि वे अपने ही भार से फटने को हों और अपना आकार तक संभाल न पा रहे हों। तुम्हें ये सब व्यंजन उनके कलात्मक और आकर्षक विन्यास के कारण प्रिय लगते हैं। पर वास्तव में, चाहे उन्हें कितनी ही कठिनाई से प्राप्त किया गया हो और कितनी ही कुशलता से पकाया और मसालेदार बनाया गया हो, पेट में पहुँचने के बाद वे सब एक ही प्रकार की गंदगी में परिवर्तित हो जाते हैं। यदि तुम भोजन के सुखों का तिरस्कार करना चाहते हो तो यह सोचो कि अंततः तुम्हारा भोजन कहाँ पहुँचता है।

    मुझे स्मरण है कि जब अत्तालस ने ये बातें कही थीं, तब सब लोग उनकी कितनी प्रशंसा करते थे, “लंबे समय तक मैं धन-संपत्ति के मोह में पड़ा रहा। जहाँ-जहाँ भी मैं उसे चमकते हुए देखता, उसे देखकर चकित रह जाता और यह समझता था कि भीतर से भी वह वैसी ही होगी जैसी बाहर से दिखाई देती है। फिर एक अवसर पर मैंने किसी नगर की सम्पूर्ण समृद्धि का सार्वजनिक प्रदर्शन देखा। वहाँ चाँदी और सोने पर उकेरे गए पात्र थे। उनसे भी अधिक मूल्यवान पदार्थों से बनी वस्तुएँ थीं। ऐसे वस्त्र थे जो केवल हमारे राज्य की सीमाओं के बाहर से ही नहीं बल्कि हमारे शत्रुओं की सीमाओं के पार से मँगाए गए दुर्लभ रंगों से रँगे हुए थे। दोनों ओर असाधारण रूप और सौन्दर्य वाले दास और दासियाँ खड़े थे। संक्षेप में, साम्राज्य की अपार संपत्ति अपने वैभव के जो भी साधन प्रस्तुत कर सकती थी, वे सब वहाँ प्रदर्शित थे। मैंने मन ही मन कहा, ‘यह सब तो केवल उन इच्छाओं को और भड़काने का उपाय है, जो पहले ही पर्याप्त प्रबल हैं। धन का यह प्रदर्शन आखिर किसलिए है? क्या हम यहाँ केवल लोभ का पाठ सीखने के लिए एकत्र हुए हैं?’ वास्तव में, वहाँ से लौटते समय मेरे भीतर धन पाने की लालसा उतनी भी नहीं रही जितनी वहाँ जाते समय थी। मैंने धन की उपेक्षा इसलिए नहीं की कि वह अनावश्यक है बल्कि इसलिए कि वह तुच्छ है। क्या तुमने नहीं देखा कि इतनी सावधानी से व्यवस्थित और धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला वह सारा जुलूस कुछ ही घंटों में समाप्त हो गया? जो वस्तु पूरे एक दिन तक भी टिक नहीं सकती, क्या वही हमारे पूरे जीवन पर अधिकार कर ले? मेरे मन में यह विचार भी आया कि वह समस्त वैभव अपने स्वामियों के लिए भी उतना ही अनावश्यक था, जितना उसे देखने वाले दर्शकों के लिए।”

    “इसी कारण, जब भी मेरी आँखें इस प्रकार के वैभव पर ठहरती हैं या जब मैं किसी भव्य भवन, उत्तम प्रशिक्षण पाए हुए दासों की पूरी पंक्ति अथवा सुन्दर कहारों के कंधों पर उठाई जा रही पालकी को देखता हूँ तो मैं अपने आप से कहता हूँ, ‘तुम क्यों इतने प्रभावित और विस्मित हो रहे हो? यह तो केवल एक प्रदर्शन है।’ लोग इन वस्तुओं के वास्तविक स्वामी नहीं होते। वे केवल उनका प्रदर्शन करते हैं। जिस क्षण ये वस्तुएँ हमें आकर्षित करती हैं, उसी क्षण वे नष्ट होने की दिशा में भी बढ़ रही होती हैं। इसके बजाय अपना ध्यान वास्तविक धन-संपदा की ओर लगाओ। थोड़े में संतुष्ट रहना सीखो। पूरे उत्साह तथा निर्भीकता के साथ यह घोषणा करो—

‘हमारे पास जल है। हमारे पास साधारण दलिया है। आओ, हम सुख के लिए स्वयं ज्यूपिटर से भी स्पर्धा करें।’

मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि हम इन वस्तुओं के बिना भी यही चुनौती दें। अपने सुखी जीवन का आधार सोने और चाँदी को बनाना जितना लज्जाजनक है, उतना ही लज्जाजनक उसे केवल जल और साधारण दलिया पर आधारित करना भी है।

    “यदि ये वस्तुएँ भी उपलब्ध न हों तो मैं क्या करूँ?” क्या तुम यह पूछ रहे हो कि घोर निर्धनता की औषधि क्या है? भूख की अंतिम सीमा स्वयं उपवास और मृत्यु है। यदि ऐसा न मानो तो फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम अपार धन-संपत्ति के दास हो या अत्यन्त अल्प साधनों के? यदि भाग्य किसी वस्तु को तुमसे छीन ही सकता है, तो यह क्या महत्त्व रखता है कि वह वस्तु बहुत बड़ी थी या बहुत छोटी? यह जल और यह साधारण दलिया भी किसी दूसरे के अधिकार में हो सकते हैं। वास्तव में स्वतंत्र वह नहीं है, जिस पर भाग्य का प्रभाव कम पड़ता हो। स्वतंत्र तो वह है, जिस पर भाग्य का कोई भी प्रभाव न पड़ सके। यही सत्य है। यदि तुम ज्यूपिटर को, जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, चुनौती देना चाहते हो तो तुम्हें भी किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं रखनी चाहिए।”

अत्तालस हमें यही शिक्षा दिया करते थे। यही शिक्षा प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को दी है। यदि तुम बार-बार इन बातों पर मनन करने का प्रयास करोगे तो तुम्हारा लक्ष्य वास्तव में सुखी बनना होगा, केवल सुखी दिखाई देना नहीं अर्थात तुम अपने लिए सुखी बनना चाहोगे, दूसरों की दृष्टि में नहीं।

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