Monday, 3 August 2026

बुद्धिमान व्यक्तियों के व्यवहार के बारे में -- पत्र - 107 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम यह जानना चाहते हो कि क्या एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान व्यक्ति की सहायता कर सकता है। हम कहते हैं कि बुद्धिमान वह है जो समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण है और जिसने परम श्रेष्ठता के शिखर को प्राप्त कर लिया है। तब प्रश्न उठता है जो व्यक्ति पहले ही परम कल्याण को प्राप्त कर चुका है, उसकी सहायता करना कैसे संभव है?



    सज्जन व्यक्ति एक-दूसरे के लिए सहायक होते हैं क्योंकि उनमें से प्रत्येक दूसरे के सद्गुणों का अभ्यास कराता है और उसकी प्रज्ञा को उसके अनुरूप स्थिति में बनाए रखता है। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को किसी ऐसे साथी की आवश्यकता होती है जिसके साथ वह विचारों की तुलना कर सके और उनकी गहराई से जाँच-पड़ताल कर सके। जैसे कुशल पहलवानों का प्रशिक्षण अभ्यास से होता है। संगीतज्ञ अपने समान दक्ष संगीतज्ञों की संगति से प्रेरित होते हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी अपने सद्गुणों को सक्रिय बनाए रखने की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार वह स्वयं अपने सद्गुणों को सक्रिय रखता है, उसी प्रकार दूसरा बुद्धिमान व्यक्ति भी उन्हें सक्रिय बनाए रखने में उसकी सहायता करता है। अब प्रश्न यह है कि एक बुद्धिमान दूसरे की सहायता कैसे करेगा? वह उसे प्रेरित करेगा और सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) कर्मों के अवसरों की ओर उसका ध्यान आकर्षित करेगा। इसके अतिरिक्त, बुद्धिमान व्यक्ति अपने कुछ विचारों को व्यक्त करेगा और दूसरे को अपनी खोजों से सीखने का अवसर देगा क्योंकि स्वयं उसके लिए भी सदैव कुछ-न-कुछ नया खोजने और अपने चिंतन का विस्तार करने की संभावना बनी रहती है। 

    दुष्ट व्यक्ति दूसरे दुष्ट व्यक्ति को हानि पहुँचाता है और उसके क्रोध को भड़काकर, उसके विषाद का समर्थन करके तथा उसकी इन्द्रिय-भोग की प्रवृत्तियों की प्रशंसा करके उसे और भी अधिक दुष्ट बना देता है। जब दुष्ट लोग अपनी-अपनी बुराइयों को एक साथ जोड़ देते हैं, तब वे अपनी सबसे निकृष्ट अवस्था में पहुँच जाते हैं और अनेक अपराध मिलकर एक बड़े दुष्कर्म का रूप ले लेते हैं। इसके विपरीत, एक सज्जन व्यक्ति दूसरे सज्जन व्यक्ति की सहायता करता है। 

   "पर कैसे?" तुम पूछते हो। वह उसे प्रसन्नता प्रदान करेगा और उसके आत्मविश्वास को दृढ़ करेगा। उनकी पारस्परिक शान्ति को देखकर दोनों का आनन्द और भी बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त, वे एक-दूसरे को कुछ विषयों का ज्ञान भी देंगे क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति भी सब कुछ नहीं जानता। यदि वह सब कुछ जानता भी हो, तब भी कोई दूसरा व्यक्ति किसी तथ्य तक पहुँचने का अधिक संक्षिप्त मार्ग खोज सकता है और उसे बता सकता है, जिससे सम्पूर्ण विषय को समझना अधिक सरल हो जाए। एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता केवल अपनी शक्ति से ही नहीं करेगा। यह तो स्वाभाविक है, बल्कि उस व्यक्ति की अपनी शक्ति का भी उपयोग करेगा जिसकी वह सहायता कर रहा है। निस्सन्देह, दूसरा व्यक्ति अकेला छोड़ दिए जाने पर भी अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सकता है जैसे, धावक की गति उसकी अपनी होती है। फिर भी, उत्साहवर्धन मिलने पर उसे सहायता अवश्य मिलती है। 

    "वास्तव में एक बुद्धिमान दूसरे की सहायता नहीं करता। प्रत्येक अपनी ही सहायता करता है। यदि तुम इसे समझना चाहते हो तो उनमें से किसी एक की विशिष्ट क्षमता को हटा दो। तब दूसरे के पास सक्रिय करने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।" यदि तुम इस प्रकार तर्क करते हो तो तुम्हें यह भी कहना पड़ेगा कि मधु में कोई मिठास नहीं होती। सोचो, कोई व्यक्ति मधु खाने की इच्छा करता है। वह उसके स्वाद से इसलिए आकर्षित होता है क्योंकि उसकी जिह्वा और तालु उस स्वाद के अनुरूप हैं। पर यदि वे उस अवस्था में न हों तो वही मधु उसे अप्रिय लगेगा। वास्तव में, कुछ लोग रोग के कारण मधु को भी कड़वा अनुभव करते हैं। इसी प्रकार, दोनों बुद्धिमानों का समुचित अवस्था में होना आवश्यक है, एक इस योग्य हो कि सहायता कर सके और दूसरा इस योग्य कि सहायता ग्रहण कर सके। 

    "परन्तु जिस वस्तु में पहले से ही अत्यधिक ऊष्मा हो, उसे और गरम करना व्यर्थ है, उसी प्रकार जो व्यक्ति परम कल्याण को प्राप्त कर चुका है, उसकी सहायता करना भी निरर्थक है। क्या एक ऐसा किसान, जिसके पास खेती के सभी उपकरण पहले से उपलब्ध हैं, किसी दूसरे से उपकरण माँगता है? क्या अग्रिम पंक्ति के लिए पर्याप्त रूप से शस्त्र-सज्जित सैनिक को और हथियारों की आवश्यकता होती है? उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। वह जीवन के लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित और सशस्त्र है।" इन आपत्तियों का मेरा उत्तर यह है: जिस वस्तु में अत्यधिक ऊष्मा हो, उसे भी उस तापमान को बनाए रखने के लिए ऊष्मा की निरन्तर आपूर्ति की आवश्यकता होती है। 

     "किन्तु ऊष्मा तो अपने स्वभाव से ही उष्ण होती है।" सबसे पहले, तुम ऐसी वस्तुओं की तुलना कर रहे हो जो एक-दूसरे से अत्यन्त भिन्न हैं। ऊष्मा एक ही प्रकार की वस्तु है जबकि सहायता अनेक प्रकार की हो सकती है। दूसरे, ऊष्मा को उष्ण बने रहने के लिए किसी अतिरिक्त ऊष्मा की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन की उचित अवस्था को बनाए नहीं रख सकता, जब तक कि वह अपने समान बुद्धिमान व्यक्तियों को अपना मित्र न बनाए ताकि वह उनके साथ अपने सद्गुणों को साझा कर सके। इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी सद्गुणों के बीच परस्पर मैत्री होती है। इसलिए एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता इस प्रकार करता है कि वह अपने समान व्यक्ति के सद्गुणों से प्रेम करता है और बदले में अपने सद्गुणों को भी उसके प्रेम के योग्य बनाता है। समान गुण वाली वस्तुएँ परस्पर आनन्द प्रदान करती हैं, विशेषकर जब वे सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) हों और उन्हें ग्रहण करने वाले लोग एक-दूसरे की श्रेष्ठता का पारस्परिक सम्मान और अनुमोदन करना जानते हों। 

    फिर, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि को पूर्ण दक्षता के साथ केवल दूसरा बुद्धिमान व्यक्ति ही सक्रिय कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल एक मनुष्य ही दूसरे मनुष्य की बुद्धि को विवेकपूर्ण ढंग से सक्रिय कर सकता है। अतः जैसे बुद्धि को प्रेरित करने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, वैसे ही पूर्ण बुद्धि को सक्रिय करने के लिए पूर्ण बुद्धि की ही आवश्यकता होती है।

     'सहायता' शब्द का प्रयोग उस स्थिति में भी किया जाता है जब लोग हमें मध्यम श्रेणी की वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं जैसे, धन-संपत्ति, प्रभाव, सुरक्षा तथा जीवन में उपयोगी या वांछनीय अन्य साधन। इन बातों के सम्बन्ध में बुद्धिमान व्यक्ति को मूर्ख से भी सहायता मिल सकती है। किन्तु वास्तविक सहायता वह है जो किसी व्यक्ति के मन को प्रकृति के अनुरूप सक्रिय करे। ऐसी सहायता जो सहायता करने वाले के अपने सद्गुण तथा उस व्यक्ति के सद्गुण, जिसकी सहायता की जा रही है, दोनों के माध्यम से सम्पन्न हो। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि इससे सहायता करने वाले को भी लाभ न पहुँचे क्योंकि जब कोई दूसरे के सद्गुण को सक्रिय करता है, तब वह अनिवार्य रूप से अपने ही सद्गुण को भी सक्रिय करता है। 

    परन्तु यदि तुम परम कल्याण और उसे उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को भी एक ओर रख दो, तब भी बुद्धिमान व्यक्ति एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं। क्योंकि एक बुद्धिमान के लिए दूसरे बुद्धिमान को प्राप्त करना स्वयं में ही चयन के योग्य है। प्रत्येक सद्गुणी व्यक्ति स्वभावतः प्रत्येक अन्य सद्गुणी व्यक्ति को प्रिय होता है। इसलिए उनमें से प्रत्येक एक सद्गुणी व्यक्ति से उतना ही स्नेह रखता है जितना स्वयं अपने प्रति। अपने इस कथन को सिद्ध करने के लिए मुझे इस विषय को छोड़कर एक दूसरे प्रश्न पर आना होगा। क्या बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने ही विचार से निर्णय करेगा या वह किसी दूसरे से भी परामर्श लेगा? सामान्य सार्वजनिक और निजी कार्यों में अर्थात जिसे हम मानवीय जीवन की सामान्य परिस्थितियाँ कह सकते हैं, उसे दूसरे का परामर्श लेना ही पड़ता है। इन विषयों में उसे अन्य लोगों की सलाह की आवश्यकता होती है, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर, नाविक, विधिवेत्ता और न्यायाधीश को भी कभी-कभी दूसरों की सलाह लेनी पड़ती है। इसलिए एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे बुद्धिमान की सहायता उसे उचित कार्य-पद्धति का सुझाव देकर करता है। जैसा कि मैंने कहा है, उच्च तथा गंभीर विषयों में भी वह सम्माननीय (सदाचारपूर्ण) बातों पर अपने विचार साझा करके तथा अपने चिंतन और मनन का योगदान देकर उपयोगी सिद्ध होता है। इतना ही नहीं, प्रकृति के अनुरूप तो यह भी है कि मनुष्य अपने मित्रों को अपनाए और उनकी उन्नति में उतना ही आनन्द अनुभव करे जितना अपनी स्वयं की उन्नति में करता है। वास्तव में, यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो सद्गुण हमारे भीतर अधिक समय तक टिक नहीं सकेगा क्योंकि सद्गुण हमारे भावों और सद्भावनाओं के सक्रिय अभ्यास से ही पुष्ट और विकसित होता है।

    प्रत्येक सद्गुण हमें यह आदेश देता है कि हम अपनी वर्तमान परिस्थितियों का सर्वोत्तम उपयोग करें। भविष्य के बारे में विचार करें। सोच-विचार करके निर्णय लें और अपने मन को एकाग्र रखें। एकाग्रता और कार्यकुशलता किसी सहायक साथी के होने से और अधिक सुदृढ़ हो जाती है। इसी कारण सद्गुणी व्यक्ति ऐसे मनुष्य की खोज करेगा जो या तो पहले से ही पूर्ण बुद्धिमान हो अथवा पूर्णता के अत्यन्त निकट पहुँच चुका हो। ऐसे पूर्ण व्यक्ति से उसे जो सहायता प्राप्त होगी, वह यह है कि उसकी योजनाएँ उस साझा प्रज्ञा के द्वारा अधिक समर्थ बन जाएँगी जो दोनों में समान रूप से विद्यमान है। कहा जाता है कि लोग दूसरों के मामलों में अपनी अपेक्षा अधिक सूझ-बूझ रखते हैं। यह बात उन लोगों पर लागू होती है जो आत्म-प्रेम के कारण अंधे हो जाते हैं या संकट के समय भय से इतने व्याकुल हो उठते हैं कि अपना ही हित नहीं देख पाते। जब मनुष्य चिंता से मुक्त और भय से परे हो जाता है, तभी वह वास्तव में बुद्धिमान बनता है। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बुद्धिमान व्यक्ति भी अपने मामलों की अपेक्षा दूसरों के मामलों में अधिक स्पष्टता से देख पाता है। इसके अतिरिक्त, वे एक-दूसरे को वह अत्यन्त मधुर और सम्माननीय उपहार भी देते हैं—“एक जैसी इच्छाएँ और एक जैसे द्वेष।” साथ मिलकर कार्य करने पर वे उत्कृष्ट परिणाम उत्पन्न करते हैं। 

    मैंने तुम्हारी इस जिज्ञासा का समाधान कर दिया है। हालाँकि इसका उचित स्थान उन विषयों में था जिनकी चर्चा मैं अपने नीतिशास्त्र संबंधी ग्रंथों में कर रहा हूँ। जैसा कि मैं तुम्हें बार-बार बताता हूँ। यह समझो कि ऐसे प्रश्नों के माध्यम से हम केवल अपनी बुद्धि का अभ्यास कर रहे हैं। किन्तु मेरा मन बार-बार यही सोचता है। इस विषय से मुझे क्या लाभ होगा? यह मुझे अधिक साहसी, अधिक न्यायप्रिय और अधिक संयमी कैसे बनाएगा? मैं अभी कर्म के लिए तैयार नहीं हूँ। मुझे अभी भी वैद्य की आवश्यकता है। तुम मुझसे ऐसे ज्ञान की माँग क्यों करते हो जिसका कोई वास्तविक उपयोग नहीं है? तुमने मुझसे बड़े-बड़े वचन दिए थे। लेकिन जो परिणाम मुझे दिखाई देते हैं, वे अत्यन्त अल्प हैं। तुमने कहा था कि यदि चारों ओर तलवारें चमक रही हों, यदि तलवार की धार मेरे गले पर रख दी जाए, तब भी मैं निर्भय रहूँगा। तुमने कहा था कि यदि चारों ओर अग्नि धधक रही हो या यदि अचानक उठी हुई प्रचण्ड आँधी मेरी नाव को समुद्र में इधर-उधर उछाल रही हो, तब भी मैं सुरक्षित रहूँगा। इसलिए मुझे ऐसी साधना सिखाओ जिससे मैं सुख-भोग और यश, दोनों का तिरस्कार कर सकूँ। उसके बाद तुम मुझे जटिल प्रश्नों का समाधान करना, दुरूह बातों को स्पष्ट करना और गूढ़ विषयों का भेदन करना सिखाना। अभी तो मुझे वही सिखाओ जो अनिवार्य है।


अभी के लिए विदा 

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