प्रिय लूसीलियस
तुम्हारे पत्रों का उत्तर देने में मुझे जो कुछ विलंब हुआ है, उसका कारण अत्यधिक व्यस्तता नहीं है। इस बहाने पर विश्वास मत करना। मेरे पास पर्याप्त समय है। जो भी समय चाहता है, उसके पास भी पर्याप्त समय होता है। किसी के पीछे काम नहीं पड़ा रहता बल्कि लोग स्वयं काम के पीछे भागते हैं और व्यस्त रहने को अपनी समृद्धि का प्रमाण समझते हैं। तो फिर ऐसी कौन-सी बात थी जिसने मुझे तुरंत तुम्हें उत्तर लिखने से रोक दिया? इसका कारण यह था कि तुम्हारा प्रश्न मेरे व्यापक कार्य का एक भाग है। जैसा कि तुम जानते हो, मेरा उद्देश्य नीतिशास्त्र पर एक विस्तृत ग्रंथ तैयार करना है, जिसमें उससे संबंधित सभी प्रश्नों का क्रमबद्ध और विस्तारपूर्वक विवेचन हो। इसलिए मैं यह सोच रहा था कि क्या तुम्हें तब तक प्रतीक्षा करने के लिए कहूँ, जब तक उस विषय का क्रम न आ जाए या फिर निर्धारित क्रम को छोड़कर पहले ही तुम्हें अपना निर्णय बता दूँ। किन्तु चूँकि तुम्हारा प्रश्न बहुत दूर से मेरे पास पहुँचा है इसलिए मैंने उचित नहीं समझा कि तुम्हें और अधिक प्रतीक्षा कराऊँ। अतः मैं इस विषय को उसके निर्धारित क्रम से अलग करके प्रस्तुत करूँगा। तुम्हारे माँगे बिना भी उससे संबंधित अन्य आवश्यक बातें तुम्हें लिख भेजूँगा।
क्या तुम सोच रहे हो कि वे कौन-सी बातें होंगी? वे ऐसी बातें हैं जिन्हें जानना उपयोगी होने की अपेक्षा अधिक रुचिकर होता है जैसे तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर, क्या ‘शुभ’ एक भौतिक वस्तु है?
कोई शुभ वस्तु, जहाँ तक वह हित पहुँचाती है, क्रिया करती है और जो क्रिया करता है, वह भौतिक होता है।शुभ वस्तु मन पर प्रभाव डालती है और एक प्रकार से उसे आकार देती तथा उसका गठन करती है। आकार देना तथा गठन करना भौतिक वस्तु के ही गुण हैं। शरीर के शुभ भौतिक हैं। इसलिए, चूँकि मन भी भौतिक है, मन के शुभ भी भौतिक हैं। चूँकि मनुष्य स्वयं भौतिक है इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो वस्तुएँ मनुष्य का पोषण करती हैं तथा उसके स्वास्थ्य को बनाए रखती या पुनः स्थापित करती हैं, वे भौतिक हैं; अतः मनुष्य का शुभ भी भौतिक है।
मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस बात में कोई संदेह होगा कि भावनाएँ भी भौतिक होती हैं, जैसे क्रोध, प्रेम और शोक (तुम्हारे प्रश्न से बाहर की एक बात का उल्लेख करूँ तो) क्योंकि निश्चय ही तुम यह स्वीकार करते हो कि वे हमारे चेहरे की अभिव्यक्ति बदल देती हैं, हमारे माथे पर बल डाल देती हैं, हमारे मुख को शिथिल कर देती हैं, लज्जा से चेहरा लाल कर देती हैं या उसे पीला पड़ जाने देती हैं। तो क्या तुम यह समझते हो कि शरीर पर इतने स्पष्ट चिह्न किसी अभौतिक वस्तु द्वारा अंकित किए जा सकते हैं?
यदि भावनाएँ भौतिक हैं, तो मन की दुर्बलताएँ भी, जैसे लोभ, क्रूरता और वे दोष जो गहरे जड़ पकड़ चुके हैं और असाध्य बन गए हैं, भौतिक ही हैं। इसलिए दुर्गुण भी भौतिक है। उसके सभी रूप जैसे, दुष्टता, ईर्ष्या और अहंकार भी भौतिक हैं। अतः सद्गुण भी भौतिक हैं। पहला कारण यह है कि वे इन दुर्गुणों के विपरीत हैं। दूसरा यह कि वे भी तुम्हें उसी प्रकार के संकेत प्रदान करते हैं। तुम किसी मनुष्य की आँखों में साहस से उत्पन्न तेज, विवेक से उत्पन्न एकाग्रता, मर्यादा से उत्पन्न संयम और शांति, प्रसन्नता से उत्पन्न संतुलन, कठोरता से उत्पन्न दृढ़ता तथा कोमल स्वभाव से उत्पन्न सहजता को देख सकते हो। जो वस्तुएँ शरीर के रंग और रूप में परिवर्तन लाती हैं, वे स्वयं भौतिक होती हैं क्योंकि वे शरीरों पर ही अपना प्रभाव डालती हैं। जिन सभी सद्गुणों का मैंने उल्लेख किया है, वे शुभ हैं। उनके आधार पर जो कुछ भी है, वह भी शुभ है।
निश्चय ही तुम्हें इसमें कोई संदेह नहीं होगा कि जो कुछ स्पर्श कर सकता है या जिसका स्पर्श किया जा सकता है। वह भौतिक है जैसा कि लुक्रेतियस कहता है, “भौतिक वस्तु के अतिरिक्त न तो कोई किसी को स्पर्श कर सकता है और न ही स्वयं स्पर्श किया जा सकता है।”
जिन बातों का मैंने उल्लेख किया है, उनमें से कोई भी शरीर को स्पर्श किए बिना उसमें परिवर्तन उत्पन्न नहीं कर सकती। इसलिए वे सब भौतिक हैं।
इसके अतिरिक्त, जो भी वस्तु आगे बढ़ाने, बाध्य करने, रोकने या संयमित करने की शक्ति रखती है, वह भौतिक होती है। तो फिर क्या भय हमें नहीं रोकता? क्या साहसिकता हमें आगे नहीं बढ़ाती और वीरता हमें प्रेरित नहीं करती? क्या संयम हमें नियंत्रित नहीं करता और हमें वापस नहीं बुलाता? क्या प्रसन्नता हमें ऊँचा नहीं उठाती और शोक हमें नीचे नहीं गिरा देता?
संक्षेप में, हम जो कुछ भी करते हैं, वह या तो सद्गुण के आदेश पर करते हैं या दुर्गुण के आदेश पर। जो वस्तु शरीर को आदेश देती है, वह भौतिक होती है जैसे, जो वस्तु शरीर पर बल का प्रयोग करती है, वह भी भौतिक होती है। शरीर का शुभ भौतिक है। मनुष्य का शुभ भी शरीर का ही शुभ है। इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक है।
अब जबकि मैंने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे दिया है तो अब मुझे उस आपत्ति का पहले ही उत्तर दे देना चाहिए जिसे मैं तुम्हारे मन में उठते हुए देख रहा हूँ, “हम तो यहाँ मानो चौपड़ खेल रहे हैं।” हम अपने मन को तुच्छ बातों में व्यर्थ लगा रहे हैं। ऐसी बातों में जो मनुष्य को अच्छा बनने के बजाय केवल चतुर बनाती हैं। बुद्धिमान बनना इससे कहीं अधिक स्पष्ट बल्कि कहना चाहिए कहीं अधिक सरल बात है। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक पांडित्यपूर्ण अध्ययन की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी हम दर्शन को भी उसी प्रकार तुच्छ बातों में नष्ट कर रहे हैं, जैसे अपनी अन्य संपत्तियों को नष्ट करते हैं। अध्ययन में भी, अन्य सभी बातों की तरह, हम अति के दोष से ग्रस्त हैं। हम जीवन के लिए नहीं बल्कि विद्यालय के लिए सीख रहे हैं।
अभी के लिए विदा
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