प्रिय लूसीलियस
हर दिन और हर क्षण हमें यह दिखा देता है कि हम कितने तुच्छ और क्षणभंगुर हैं। प्रत्येक नया अनुभव किसी न किसी नए प्रमाण के साथ हमें हमारी विस्मृत नश्वरता का स्मरण कराता है। समय का निरंतर प्रवाह हमें मृत्यु के विषय में सोचने के लिए विवश कर देता है, ठीक उसी समय जब हमारा मन अनंतता पर विचार कर रहा होता है।
आप सोच रहे होंगे कि यह भूमिका किस ओर संकेत कर रही है? यह बात कॉर्नेलियस सेनेसियो के विषय में है। एक प्रतिष्ठित, कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानित रोमन अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन)। आप उन्हें जानते थे। साधारण परिस्थितियों से उठकर उन्होंने अपने परिश्रम और योग्यता के बल पर ऊँचा स्थान प्राप्त किया था। भविष्य में उनकी उन्नति और भी सरल होने वाली थी क्योंकि प्रतिष्ठा प्राप्त करना जितना कठिन होता है, उसे और बढ़ाना उतना कठिन नहीं होता। धन का भी यही स्वभाव है। निर्धनता से धन का संचय बहुत धीरे-धीरे आरंभ होता है। जब तक मनुष्य गरीबी की स्थिति से बाहर नहीं निकलता, तब तक संपत्ति बढ़ती नहीं। परंतु सेनेसियो उस अवस्था तक पहुँच चुके थे जहाँ उनके लिए धन-संपत्ति तीव्र गति से बढ़ने वाली थी। इसमें उनकी दो अत्यंत प्रभावशाली योग्यताओं ने सहायता की थी। वे धन कमाना भी जानते थे और उसे सुरक्षित रखना भी। इन दोनों में से कोई एक गुण भी किसी व्यक्ति को धनी बना सकता था।
वे अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे अपनी संपत्ति की जितनी सावधानी से देखभाल करते थे, उतनी ही अपने स्वास्थ्य की भी। उस दिन भी, जैसा कि उनका नियम था, वे प्रातःकाल मुझसे मिलने आए। उसके बाद वे संध्या तक अपने एक गंभीर रूप से बीमार मित्र के शय्यापाश में बैठे उसकी सेवा करते रहे। रात्रि-भोज के समय वे पूरी तरह प्रसन्न और स्वस्थ दिखाई दे रहे थे। पर अचानक उन्हें गले में तीव्र पीड़ा (एंजाइना) का ऐसा दौरा पड़ा कि उनका गला सूज गया और वे ठीक से साँस भी नहीं ले पा रहे थे। भोर होने तक ही उनका जीवन समाप्त हो गया। इस प्रकार, एक पूर्णतः स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति के सभी दैनिक कर्तव्यों का पालन करने के केवल कुछ ही घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। वे देश और विदेश, दोनों स्थानों पर निजी निवेश कर रहे थे और लाभ कमाने के उद्देश्य से हर प्रकार के सार्वजनिक कार्यों में भी लगे हुए थे। ठीक उसी समय, जब प्रत्येक कार्य उनके पक्ष में सफल हो रहा था और धन निरंतर उनके पास आ रहा था, मृत्यु ने उन्हें अपने साथ ले लिया।
"अब अपने नाशपाती के पेड़ लगाने का समय है, हे मेलिबोयस;
अब अपनी अंगूर की बेलों को व्यवस्थित करने का समय है।"
जब मनुष्य कल का भी स्वामी नहीं है, तब पूरे जीवन की योजनाएँ बनाना कितना मूर्खतापूर्ण है! कितना बड़ा भ्रम है कि कोई व्यक्ति लंबे-लंबे कार्यक्रम बनाते हुए कहे, “मैं संपत्ति खरीदूँगा और भवन बनवाऊँगा। मैं ऋण दूँगा और उन्हें वापस वसूल करूँगा। मैं सार्वजनिक पदों पर आसीन होऊँगा और उसके बाद लंबी तथा निश्चिंत वृद्धावस्था का आनंद लेने के लिए सेवानिवृत्त हो जाऊँगा।” विश्वास कीजिए, सब कुछ अनिश्चित है। यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो भाग्यशाली प्रतीत होते हैं। किसी को भी भविष्य के बारे में अपने लिए कोई निश्चित आश्वासन नहीं देना चाहिए। जिस वस्तु को हम इस समय अपने हाथों में थामे हुए हैं, वही हमारे हाथों से फिसल सकती है। जिस क्षण को हम पकड़ लेना चाहते हैं, उसे भी संयोग एक ही पल में समाप्त कर सकता है। समय का प्रवाह तो अपने निश्चित क्रम से चलता रहता है, परंतु हम स्वयं अपने भविष्य के विषय में अज्ञान के अंधकार में रहते हैं। यदि मेरा अपना जीवन ही अनिश्चित है तो प्रकृति की इस निश्चित व्यवस्था से मुझे क्या लाभ?
हम दूर-दूर की यात्राओं की योजनाएँ बनाते हैं। विदेशी तटों की यात्रा के बाद बहुत समय बाद घर लौटने की कल्पना करते हैं। हम सैनिक जीवन की योजना बनाते हैं और कठिन युद्ध-अभियानों के बाद मिलने वाले लंबे समय से प्रतीक्षित पुरस्कारों की आशा करते हैं। हम प्रांतों के राज्यपाल बनने और पदोन्नति प्राप्त करने के स्वप्न देखते हैं।इसी बीच मृत्यु हमारे बिल्कुल पास खड़ी रहती है। पर हम उसके बारे में तभी सोचते हैं जब वह किसी और के जीवन में आती है। हम प्रतिदिन मृत्यु के असंख्य उदाहरण देखते हैं, पर वे हमारे मन पर केवल उतनी ही देर प्रभाव डालते हैं, जितनी देर तक वे हमें चकित करते हैं। इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि जिस घटना के किसी भी दिन घटित होने की संभावना थी, उसके किसी विशेष दिन घट जाने पर हम आश्चर्य करें? मानव-जीवन का एक निश्चित अंत है, जिसे हमारे भाग्य की अटल और अपरिहार्य व्यवस्था ने निर्धारित कर रखा है। लेकिन हममें से कोई भी यह नहीं जानता कि वह उस अंतिम क्षण के कितना निकट पहुँच चुका है। इसलिए हमें अपने मन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए मानो हम जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हों। किसी भी कार्य को कल पर न टालें। हमें प्रतिदिन अपने जीवन का हिसाब चुकता कर लेना चाहिए।
हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कभी पूर्ण नहीं होता। उसका कोई-न-कोई भाग हमेशा भविष्य के लिए टलता रहता है। जो व्यक्ति प्रत्येक दिन अपने जीवन को अंतिम रूप दे देता है, उसे समय की कभी कमी नहीं होती। समय की इसी अनुभूत कमी से भय उत्पन्न होता है और भविष्य के प्रति निरंतर बनी रहने वाली तृष्णा हमें भीतर-ही-भीतर कचोटती रहती है। इस चिंता से अधिक दुखद और कुछ नहीं कि आगे क्या होगा और घटनाओं का परिणाम क्या निकलेगा। हम निरंतर इस भय में जीते रहते हैं कि हमारे पास कितना समय शेष है और भविष्य हमारे लिए क्या लेकर आएगा। तो फिर इस मानसिक अशांति से मुक्ति कैसे मिले? इसका केवल एक ही उपाय है। अपने जीवन को भविष्य पर आश्रित न रहने देना बल्कि उसे वर्तमान में ही समेट लेना। लोग भविष्य से इसलिए चिपके रहते हैं क्योंकि वे वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। परंतु जब मैं अपने प्रति अपना समस्त दायित्व पूरा कर चुका होता हूँ। मेरा मन दृढ़तापूर्वक यह स्वीकार कर लेता है कि एक दिन और एक समूचे जीवनकाल में कोई वास्तविक अंतर नहीं है, तब वह आने वाले सभी दिनों और भविष्य की समस्त घटनाओं को व्यापक दृष्टि से देख सकता है और समय की संपूर्ण धारा का शांत एवं प्रसन्न भाव से अवलोकन कर सकता है। जब किसी का मन अनिश्चितताओं के प्रति स्थिर और संतुलित हो जाए, तब भाग्य के उतार-चढ़ाव और उसकी चंचलता उसे क्यों विचलित करें?
इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जीना शीघ्र आरंभ करो। प्रत्येक दिन को एक संपूर्ण जीवन के समान समझो। जो व्यक्ति इस प्रकार अपने को तैयार करता है और प्रत्येक दिन को ही अपना सम्पूर्ण जीवन मानकर जीता है, वही वास्तव में निश्चिंत और सुरक्षित रहता है। इसके विपरीत, जो लोग केवल भविष्य की आशाओं के सहारे जीते हैं, उनके हाथों से वर्तमान का प्रत्येक क्षण फिसलता चला जाता है। वे लोभ और मृत्यु-भय के वश में हो जाते हैं। यह अत्यंत दयनीय अवस्था है, जो जीवन की हर दूसरी वस्तु को भी दुखमय बना देती है। इसी भावना के कारण मैकेनास ने वह अत्यंत चौंका देने वाली प्रार्थना की थी, जिसमें वह बीमारी, शारीरिक विकृति और अंततः क्रूस पर कीलों से जड़ दिए जाने जैसी भीषण यातना तक सहने को तैयार हो जाता है। बस एक ही शर्त पर कि इन सब कष्टों के बीच उसका जीवन कुछ और लंबा हो जाए।
मेरे हाथ निर्बल कर दो,
मेरे पैरों को शक्तिहीन बना दो,
मेरी पीठ पर कूबड़ उगा दो,
मेरे सारे दाँत गिरा दो,
पर जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मुझे सब स्वीकार है।
मुझे जीने दो, मुझे जीने दो,
चाहे मुझे क्रूस की नोक पर ही क्यों न बैठना पड़े,
बस मुझे जीने दो।
यदि यह प्रार्थना पूरी हो जाती तो वह अत्यंत भयानक होती क्योंकि उसमें जीवन के नाम पर केवल यातना को लंबा करने की याचना की गई है। यदि वह सचमुच क्रूस पर चढ़ाए जाने तक भी जीवित रहने की इच्छा रखता था तो मैं उसे पूर्णतः मामूली व्यक्ति मानता। सुनिए, वह क्या कहता है, “जब तक मेरे टूटे-फूटे और अशक्त शरीर में कुछ जान बची है, तब तक तुम मुझे निर्बल कर सकते हो। जब तक मुझे अपने विकृत और टेढ़े-मेढ़े शरीर में कुछ और समय जीने को मिल जाए, तब तक तुम मुझे विकृत कर सकते हो। तुम मुझे लटका सकते हो और क्रूस पर चढ़ा सकते हो।” क्या अपने ही घाव को ढोते चले जाना इतना मूल्यवान है? क्या उस क्रूस पर फैले हुए लटके रहना उचित है। जबकि इस प्रकार मनुष्य पीड़ा की सबसे बड़ी राहत अर्थात उसके अंत को ही टाल रहा होता है? क्या केवल अंतिम साँस लेने के लिए जीवन को बनाए रखना इतना अधिक मूल्यवान है? ऐसे मनुष्य के लिए तो बस ईश्वर की दया की ही कामना की जा सकती है। वह इस लज्जाजनक और कोमल कविता के द्वारा क्या कहना चाहता है? इस अत्यंत हीन भय के साथ यह सौदेबाज़ी क्यों? जीवन के लिए यह घृणित याचना क्यों? मुझे नहीं लगता कि उसने कभी वर्जिल को यह पंक्ति पढ़ते हुए सुना होगा—
“क्या मृत्यु इतनी दुःखद है?”
मैकेनास सबसे भीषण प्रकार की पीड़ा की कामना करता है। उसे और भी असहनीय बना देता है क्योंकि वह चाहता है कि वह पीड़ा लंबी चले और उसे लंबे समय तक सहना पड़े। इसके बदले उसे क्या प्राप्त होता है? निस्संदेह, कुछ अधिक लंबा जीवन। पर वह कैसा जीवन है, जो केवल लंबी होती हुई मृत्यु है? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो कष्टों के बीच धीरे-धीरे क्षीण होता रहे, जिसके अंग एक-एक करके शिथिल पड़ते जाएँ, जो बार-बार साँस के लिए तड़पता रहे और फिर भी एक ही बार में प्राण त्याग देने के बजाय इस दशा को स्वीकार करे? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो पहले से ही दुर्बल, विकृत और अपने कंधों तथा वक्ष पर भद्दी सूजन से फूला हुआ हो, जिसके पास क्रूस पर चढ़ाए जाने के अतिरिक्त भी मर जाने के अनेक कारण हों। फिर भी वह उस भयावह फाँसी के ढाँचे से बँधे रहने तथा ऐसी साँसें लेते रहने की इच्छा रखे जो अपने साथ इतनी सारी यातनाएँ लेकर आती हों?
अब तुम्हें स्वीकार करना चाहिए कि प्रकृति हम पर बहुत दयालु है क्योंकि उसने मृत्यु को अपरिहार्य बना दिया है। फिर भी, अनेक लोग मैकेनास से भी कहीं अधिक निकृष्ट समझौते करने को तैयार रहे हैं। केवल जीवन कुछ और लंबा करने के लिए किसी मित्र के साथ विश्वासघात कर देना अथवा अपने ही बच्चों को स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति के लिए सौंप देना ताकि उन्हें उस दिन के प्रकाश को कुछ और समय तक देखने का अवसर मिल सके, जो उनके असंख्य अपराधों का साक्षी है। हमें जीवन के प्रति इस मोह को त्याग देना चाहिए। हमें यह सीखना चाहिए कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि तुम कष्ट कब सहते हो, क्योंकि देर-सवेर तुम्हें कष्ट सहना ही है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि तुम कितने लंबे समय तक जीते हो, बल्कि यह है कि तुम कितना अच्छा जीवन जीते हो। अनेक बार, अच्छा जीवन जीने का अर्थ यही होता है कि मनुष्य बहुत लंबे समय तक जीवित न रहे।
अभी के लिए विदा
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