Tuesday, 4 August 2026

दर्शन को अपनाने वाले व्यक्ति के बारे में -- पत्र - 109

 प्रिय लूसीलियस 


तुमने मुझसे पूछा था कि यूनानी शब्द सोफिस्मैटा (sophismata) के लिए लैटिन में क्या शब्द है। इसके लिए अनेक शब्द गढ़ने के प्रयास किए गए हैं किन्तु कोई एक शब्द सर्वमान्य नहीं हो पाया। न तो हमें वास्तव में ऐसे कुतर्क प्रिय हैं और न ही हम उनका उपयोग करते हैं। इसलिए उनके लिए प्रयुक्त शब्द भी हमें विशेष पसंद नहीं है। मेरे विचार से सिसेरो द्वारा प्रयुक्त शब्द 'कुतर्क' (cavillationes) सबसे उपयुक्त है। जो लोग इन कुतर्कों में उलझे रहते हैं, वे सचमुच ऐसे प्रश्न गढ़ लेते हैं जो लोगों को उलझन में डाल दें किन्तु इससे उनका जीवन तनिक भी बेहतर नहीं बनता। न वे अधिक साहसी बनते हैं, न अधिक संयमी और न ही उनका चरित्र अधिक उदात्त होता है।



    इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति स्वयं के उपचार के लिए दर्शन को अपनाता है, तब उसका मन विशाल हो जाता है और उसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकने लगता है। उसके जितना निकट जाओ, उसकी श्रेष्ठता उतनी ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे ऊँचे पर्वतों के साथ होता है। दूर से उनकी ऊँचाई उतनी स्पष्ट नहीं दिखाई देती। परन्तु निकट पहुँचने पर उनका वास्तविक विराट स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाता है। प्रिय लूसीलियस, वास्तविक दार्शनिक भी ऐसा ही होता है। वह जो सचमुच दर्शन का जीवन जीता है, न कि छल-कपट या शब्द-कौशल के सहारे। वह एक ऊँचे शिखर पर स्थित होता है, अद्भुत, उन्नत और वास्तव में महान। वह कृत्रिम उपायों से अपनी ऊँचाई नहीं बढ़ाता, न ही पंजों के बल खड़े होकर स्वयं को वास्तविकता से अधिक ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है। वह अपने वास्तविक कद से ही संतुष्ट रहता है। वह संतुष्ट क्यों न हो? वह उस ऊँचाई तक पहुँच चुका है जहाँ तक भाग्य का हाथ भी नहीं पहुँच सकता। इसलिए वह सामान्य मानवीय परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है और हर स्थिति में स्वयं के प्रति समान बना रहता है, चाहे उसका जीवन सहज रूप से आगे बढ़े या बाधाओं और कठिनाइयों से जूझता हुआ आगे बढ़े। ऐसी अटल स्थिरता उन कुतर्कों से प्राप्त नहीं हो सकती जिनकी चर्चा मैं कुछ समय पहले कर रहा था। मन उनसे खेलता अवश्य है किन्तु उससे कोई लाभ नहीं होता बल्कि वे दर्शन को उसकी ऊँची प्रतिष्ठा से गिराकर साधारण धरातल पर ले आते हैं। 

    मैं तुम्हें कभी-कभी ऐसे अभ्यास में लगे रहने से नहीं रोकूँगा। पर केवल तब, जब तुम्हारे पास करने के लिए कोई अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य न हो। किन्तु उनमें एक बड़ी बुराई यह है कि वे अपनी दिखावटी सूक्ष्मता से हमें आकर्षित कर लेते हैं, हमारा ध्यान बाँधे रखते हैं और हमें विलम्ब में डाल देते हैं। जबकि उसी समय हमें कहीं अधिक गंभीर और महत्त्वपूर्ण विषय बुला रहे होते हैं। वास्तव में, पूरे जीवन की अवधि भी केवल यह एक बात सीखने के लिए पर्याप्त नहीं पड़ती कि जीवन को स्वयं कोई अत्यधिक महत्त्व की वस्तु न समझा जाए। “तो क्या जीवन का संचालन अपने हाथ में ले लेना चाहिए?” तुम पूछते हो। हाँ, पर वह दूसरा कार्य है। अपने जीवन पर पूर्ण अधिकार किसी ने भी तब तक प्राप्त नहीं किया, जब तक उसने पहले स्वयं जीवन से अत्यधिक आसक्ति करना छोड़ नहीं दिया।


अभी के लिए विदा 

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