प्रिय लूसीलियस
मैंने मारुलस को उसके शिशु पुत्र की मृत्यु के बाद लिखा था, वह पत्र संलग्न है। जब मुझे यह समाचार मिला कि वह इस शोक से अत्यन्त व्यथित है। उस पत्र में मैंने सामान्य ढंग नहीं अपनाया। मुझे लगा कि उसके साथ कोमलता से व्यवहार नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे सांत्वना से अधिक फटकार की आवश्यकता थी। क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी अत्यन्त बड़े दुख को सहन करने में कठिनाई अनुभव कर रहा हो, तब कुछ समय के लिए उसे छूट देनी चाहिए ताकि उसका शोक स्वयं ही धीरे-धीरे शांत हो जाए या कम-से-कम अपनी प्रारम्भिक तीव्रता खो दे। किन्तु जो लोग जान-बूझकर अपने शोक को बनाए रखते हैं और उसे स्वयं पालते-पोसते हैं, उन्हें आरम्भ से ही डाँटना चाहिए और उन्हें यह सीखना चाहिए कि कभी-कभी आँसू भी उपहास का विषय बन जाते हैं।
क्या तुम सांत्वना की अपेक्षा करते हो? यहाँ तुम्हें सांत्वना नहीं बल्कि फटकार मिलेगी। क्या अपने पुत्र की मृत्यु को सहने में तुम इतने दुर्बल हो गए हो? यदि तुम्हारे किसी मित्र की मृत्यु हो जाती, तब तुम क्या करते? जो पुत्र चला गया, वह तो अभी केवल भविष्य की एक अनिश्चित आशा था, एक नन्हा-सा शिशु। उसके साथ तो जीवन का केवल एक छोटा-सा अंश ही समाप्त हुआ है। हम तो मानो दुख करने के बहाने खोजते फिरते हैं। जब शिकायत करने का कोई उचित कारण भी नहीं होता, तब भी हम अपने भाग्य को दोष देना चाहते हैं, मानो हमें कभी वास्तविक दुख का सामना ही न करना पड़े। फिर भी, सच तो यह है कि मैं तुम्हें सदैव इतना धैर्यवान समझता था कि तुम बड़े-से-बड़े दुर्भाग्य का भी साहसपूर्वक सामना कर सको, उन काल्पनिक दुखों की तो बात ही क्या, जिन पर लोग केवल सामाजिक परम्परा निभाने के लिए विलाप करते हैं। यदि तुम्हें सबसे बड़ी हानि भी उठानी पड़ती अर्थात किसी सच्चे मित्र को खोना पड़ता, तब भी तुम्हारा प्रयत्न इस बात पर होना चाहिए था कि तुम्हें ऐसा मित्र कभी मिला था, इस बात का आनंद मनाओ न कि इस बात का शोक करो कि अब वह तुम्हारे पास नहीं रहा।
लेकिन अधिकांश लोग यह विचार ही नहीं करते कि उन्हें कितने बड़े वरदान प्राप्त हुए हैं और उन्होंने जीवन में कितने गहन आनंद का अनुभव किया है। यही कारण है कि तुम्हारा शोक केवल व्यर्थ ही नहीं बल्कि कृतघ्नता का भी परिचायक है। क्या उस मित्र का साथ पाना व्यर्थ था? इतने वर्षों का साथ, इतने अनुभव जो तुमने मिलकर बाँटे, समान रुचियाँ, साझा प्रयत्न और गहरी मित्रता, क्या यह सब कुछ शून्य हो गया? क्या तुम अपने मित्र के साथ-साथ अपनी मित्रता को भी दफना देना चाहते हो? यदि उससे तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, तभी तो उसके वियोग पर शोक करने का कोई अर्थ बनता है। मुझ पर विश्वास करो, जिन्हें हमने सच्चे मन से प्रेम किया है, वे संयोगवश हमसे बिछड़ जाने पर भी बहुत बड़े अंश में हमारे साथ बने रहते हैं। जो समय बीत चुका है, वह हमारा अपना है। जो हमारे अतीत का हिस्सा बन चुका है, उससे अधिक सुरक्षित कोई संपत्ति नहीं होती। भविष्य की आशाओं में डूबकर हम उन वरदानों के प्रति कृतघ्न हो जाते हैं जो हमें पहले ही मिल चुके हैं। हम यह भी भूल जाते हैं कि यदि वह आशान्वित भविष्य कभी आया भी तो शीघ्र ही वह भी अतीत बन जाएगा।
जो व्यक्ति केवल वर्तमान क्षण में ही सुख खोजता है, वह अपने जीवन के आनंद को स्वयं ही अत्यन्त संकीर्ण बना देता है। सुख तो भविष्य और अतीत, दोनों में निहित है। भविष्य में आशा का सुख है और अतीत में स्मृतियों का। अंतर केवल इतना है कि भविष्य अनिश्चित है, वह आए भी या नहीं किन्तु अतीत का होना कभी असत्य नहीं हो सकता। फिर इससे बढ़कर मूर्खता और क्या होगी कि मनुष्य अपनी सबसे सुरक्षित संपत्ति को ही अपने हाथों से फिसल जाने दे? आओ, उस आनंद में संतोष पाना सीखें जिसे हम जीवन के कुएँ से पहले ही निकाल चुके हैं। बशर्ते हमारा मन ऐसी छलनी न हो, जिसमें से हर मूल्यवान अनुभव रिसकर बाहर निकल जाए।
ऐसे असंख्य लोगों के उदाहरण मिलते हैं जिनके पुत्र युवावस्था की दहलीज़ पर ही चल बसे, फिर भी वे लोग सीधे श्मशान से निकलकर सीनेट या किसी अन्य सार्वजनिक सभा में पहुँचे और बिना आँसू बहाए तुरंत अपने कर्तव्यों के पालन में लग गए। और उन्होंने ठीक ही किया। पहला कारण यह है कि जिस शोक से कुछ भी प्राप्त नहीं होना, उसे करने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरा, जो घटना एक व्यक्ति के साथ घटी है और जो अंततः हम सबकी भी नियति है, उसके लिए शिकायत करना अनुचित है। तीसरा, जब हम स्वयं भी उसी मंज़िल से बहुत दूर नहीं हैं जहाँ वह पहुँच चुका है, तब उसके वियोग पर विलाप करना बुद्धिमानी नहीं बल्कि मूर्खता है। इसलिए हमें और भी अधिक धैर्य तथा संतुलन बनाए रखना चाहिए क्योंकि हम भी उसी व्यक्ति के पीछे-पीछे उसी मार्ग पर चले आ रहे हैं।
ज़रा विचार करो कि समय कितनी तीव्र गति से बीत रहा है। सोचो, वह दूरी कितनी छोटी है जिसे हम इतनी शीघ्रता से पार कर लेते हैं। देखो, समस्त मानव-समुदाय उसी एक दिशा में अग्रसर है। हमारे बीच केवल समय का थोड़ा-सा अंतर है। वह चाहे हमें कितना ही बड़ा क्यों न दिखाई दे, वास्तव में वह बहुत छोटा है। जिसे तुम खोया हुआ समझते हो, वह केवल तुमसे कुछ पहले आगे निकल गया है। इससे अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि मनुष्य उस व्यक्ति के लिए रोए जो उसी मार्ग पर उससे कुछ पहले चल पड़ा है, जिस मार्ग पर स्वयं उसे भी अवश्य चलना है? क्या कोई उस घटना पर शोक करता है जिसके घटित होने का उसे पहले से ही ज्ञान था या क्या उसे यह मालूम नहीं था कि मनुष्य नश्वर है? यदि नहीं था तो वह स्वयं को धोखा दे रहा था। जो व्यक्ति इस बात की शिकायत करता है कि कोई मर गया, वह वास्तव में इस बात की शिकायत कर रहा है कि वह मनुष्य था। हम सब एक ही नियम के अधीन जीवन जीते हैं। जो जन्म लेता है, उसे एक दिन अवश्य मरना पड़ता है। हमारे बीच केवल समय का अंतर है किन्तु अंत सबको समान बना देता है।
हमारे जन्म के पहले दिन और अंतिम दिन के बीच का सारा समय अनिश्चित और परिवर्तनशील है। यदि उसे हमारे दुखों के आधार पर आँका जाए, तो वह एक छोटे बच्चे के लिए भी बहुत लंबा प्रतीत होता है। लेकिन यदि उसकी तीव्र गति को देखा जाए तो वह वृद्ध से वृद्ध व्यक्ति के लिए भी अत्यन्त छोटा है। इस संसार में सब कुछ असुरक्षित है, छलपूर्ण है और मौसम से भी अधिक परिवर्तनशील है। हर वस्तु डगमगाती रहती है और भाग्य की इच्छा के अनुसार पल-भर में अपने विपरीत रूप में बदल जाती है। मानव जीवन के इस सारे कोलाहल और अस्थिरता के बीच केवल एक ही बात ऐसी है जो पूरी तरह निश्चित है— मृत्यु। फिर भी विडम्बना यह है कि लोग उसी एक सत्य की शिकायत करते हैं जिसमें किसी प्रकार का छल या धोखा नहीं है।
"लेकिन वह तो अभी बालक ही था जब उसकी मृत्यु हो गई।" इस समय मैं यह नहीं कह रहा कि जो व्यक्ति कम आयु में मर जाता है, वह अधिक भाग्यशाली होता है। बल्कि उस व्यक्ति के जीवन पर विचार करो जिसने वृद्धावस्था तक पहुँचने का अवसर पाया। उस वृद्ध को उस बालक की तुलना में वास्तव में कितना अधिक लाभ मिला? अपने मन में समय की असीम विशालता की कल्पना करो। समूचे ब्रह्मांड को अपने विचारों में समेटो, फिर उस अनन्त काल की तुलना उस अवधि से करो जिसे हम मानव-जीवन कहते हैं। तब तुम्हें स्पष्ट दिखाई देगा कि जिस जीवन को हम इतनी उत्कट इच्छा से लंबा करना चाहते हैं, वह वास्तव में कितना तुच्छ और क्षणभंगुर है। उस थोड़े-से जीवन का कितना बड़ा भाग आँसुओं और चिंताओं में बीत जाता है! कितना समय मृत्यु आने से पहले ही उसकी कामना करने में निकल जाता है! कितना समय रोगों में व्यतीत होता है, और कितना भय में! फिर जीवन का एक बड़ा हिस्सा असहाय बाल्यावस्था में बीत जाता है और दूसरा निष्फल वृद्धावस्था में। इतना ही नहीं, लगभग आधा जीवन तो नींद में ही निकल जाता है। इन सबके साथ यदि तुम दुःख, शोक और निरन्तर बने रहने वाले संकटों को भी जोड़ दो तो समझ जाओगे कि सबसे लंबा जीवन जीने वाला मनुष्य भी वास्तव में जीने के लिए बहुत थोड़ा ही समय पाता है।
क्या कोई व्यक्ति केवल इसलिए अधिक अभागा हो जाता है कि उसे अपेक्षाकृत जल्दी मरना पड़ा? ऐसा कौन मानेगा? उसकी यात्रा थकान आने से पहले ही समाप्त हो गई। जीवन अपने आप में न तो अच्छा है और न बुरा; वह तो केवल अच्छाई और बुराई के प्रकट होने का एक मंच है। इसलिए उसने वास्तव में कुछ नहीं खोया, सिवाय उस दाँव के जिसमें परिस्थितियाँ पहले से ही उसके विरुद्ध थीं। यह संभव था कि वह संयमी और बुद्धिमान बनता। तुम्हारे मार्गदर्शन और देखभाल से उसका चरित्र उत्तम बन सकता था। लेकिन अधिक संभावना तो यही थी कि उसका जीवन भी अधिकांश लोगों की तरह ही बीतता। ज़रा चारों ओर देखो, कितने ही प्रतिष्ठित और कुलीन परिवारों के युवक भोग-विलास के कारण पतन की धूल में मिल गए हैं। अपनी वासनाओं और दूसरों की वासनाओं के वशीभूत होकर वे अनैतिक जीवन में फँस गए। ऐसा शायद ही कोई दिन बीतता हो जब वे मद्यपान या किसी घोर दुष्कर्म में लिप्त न हों। इन सबको देखकर स्पष्ट है कि उस बालक के भविष्य में आशा की अपेक्षा भय की संभावना कहीं अधिक थी।
इसलिए तुम्हें जान-बूझकर शोक करने के कारण नहीं खोजने चाहिए। न ही छोटी-सी विपत्ति को अत्यधिक व्याकुल होकर बड़ा बना देना चाहिए। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा कि असाधारण धैर्य या वीरता का प्रदर्शन करो। तुम्हारे बारे में मेरी धारणा इतनी छोटी नहीं है कि मैं समझूँ, इस घटना का सामना करने के लिए तुम्हें अपना सारा साहस जुटाना पड़ेगा। जो तुम अनुभव कर रहे हो, वह वास्तविक शोक नहीं बल्कि केवल एक तीखी चुभन है। उसी चुभन को तुम स्वयं शोक का रूप दे रहे हो। यदि तुम्हारे मनोबल का आधार यही है कि तुम एक ऐसे बालक के वियोग में टूट जाओ जो अपने पिता की अपेक्षा अपनी धाय (दूध पिलाने वाली) को अधिक जानता था तो फिर दर्शन ने तुम्हें अब तक कितना लाभ पहुँचाया है?
तो क्या मैं अब कठोरता का उपदेश दे रहा हूँ? क्या मैं चाहता हूँ कि अंतिम संस्कार के समय भी तुम्हारे चेहरे पर कोई भाव न आए? क्या मैं तुम्हें यह भी मना कर रहा हूँ कि तुम्हारे मन में दुख की पहली लहर तक न उठे? काभी नहीं। वह सद्गुण नहीं बल्कि अमानवीयता होगी कि मनुष्य अपने प्रियजन के निर्जीव शरीर को उसी निर्विकार भाव से देखे, जिस भाव से वह उसे जीवित अवस्था में देखा करता था या जब परिवार का एक सदस्य उससे सदा के लिए अलग हो जाए, तब उसके हृदय में पहली बार भी कोई वेदना न उठे। यदि मैं ऐसा निषेध भी करूँ, तब भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हमारे वश में नहीं होतीं। आँसू तो उन्हें रोकने का प्रयत्न करने पर भी निकल पड़ते हैं। उनका बह जाना मन के लिए एक प्रकार का हल्कापन और राहत लेकर आता है।
तो फिर क्या करना चाहिए? आँसुओं को आने दो। लेकिन उन्हें बुलाओ मत। जो आँसू स्वाभाविक भावावेग से स्वयं बह निकलें, उन्हें बहने दो। पर ऐसे आँसू मत बहाओ जो केवल दूसरों की नकल करने के लिए बहाए जाएँ।अपने वास्तविक शोक में कृत्रिम प्रदर्शन मत जोड़ो। दूसरों का अनुसरण करने के लिए अपने दुख को उससे अधिक मत बढ़ाओ जितना वह वास्तव में है। क्योंकि शोक का प्रदर्शन हमसे उतनी माँग करता है, जितनी स्वयं शोक भी नहीं करता। आख़िर कितने लोग हैं जो सचमुच केवल अपने दुख के कारण रोते हैं? जब देखने वाला कोई होता है, तब उनकी सिसकियाँ और भी ऊँची हो जाती हैं। जब वे अकेले होते हैं, तब उनके मुँह से कोई आवाज़ तक नहीं निकलती। लेकिन जैसे ही कोई भीतर आता है, वे फिर से विलाप करने लगते हैं। तभी वे अपना सिर पीटते हैं। जबकि यह काम वे तब भी कर सकते थे, जब कोई उनका हाथ पकड़ने वाला न होता। तभी वे अपने लिए मृत्यु की कामना करने लगते हैं। तभी वे पलंग से लुढ़ककर ज़मीन पर गिर पड़ते हैं। पर जैसे ही दर्शक हट जाता है, उनका शोक भी समाप्त हो जाता है। इस विषय में भी और जीवन की अनेक अन्य बातों की तरह, हम एक दोष से ग्रस्त हैं।हम अपने आचरण का निर्धारण अपनी आवश्यकता या विवेक से नहीं बल्कि दूसरों की नकल और प्रचलित रीति के अनुसार करते हैं। हम प्रकृति का साथ छोड़कर भीड़ का अनुसरण करने लगते हैं। जबकि भीड़ न तो कभी अच्छा मार्गदर्शक होती है और न ही किसी बात में स्थिर। जब वे किसी व्यक्ति को धैर्यपूर्वक अपना शोक सहते हुए देखते हैं तो उसे निष्ठुर और हृदयहीन कह देते हैं। जब किसी को मृत शरीर पर गिरकर बिलखते देखते हैं तो उसे कमजोर और दुर्बल कहने लगते हैं। इसलिए ऐसे सभी व्यवहारों का निर्णय विवेक की कसौटी पर होना चाहिए, न कि भीड़ की राय पर। इससे अधिक मूर्खता क्या होगी कि मनुष्य शोक की ख्याति प्राप्त करने की चेष्टा करे या आँसुओं को ही अपनी स्वीकृति और सम्मान का आधार बना ले?
मेरा विश्वास है कि बुद्धिमान व्यक्ति भी कभी-कभी आँसू बहाता है। कभी इसलिए कि वह उन्हें बहने देता है और कभी इसलिए कि वे अपने आप उमड़ पड़ते हैं। दोनों में क्या अंतर है, यह मैं स्पष्ट करता हूँ। जब किसी प्रियजन की असमय मृत्यु का समाचार पहली बार हमें आघात पहुँचाता है, जब हम उस शरीर को अपनी बाँहों में थामे होते हैं जो कुछ ही क्षणों बाद हमारी गोद से उठकर अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब प्रकृति की अनिवार्यता हमारे आँसू निकाल लाती है। जैसे शोक का आघात हमारी साँसों को झकझोर देता है और पूरा शरीर काँप उठता है, वैसे ही वह आँखों के पास संचित नमी को भी दबाकर बाहर ले आता है। ऐसे आँसू भीतर उठे स्वाभाविक आवेग के कारण निकलते हैं। वे हमारी इच्छा से नहीं बल्कि अनायास बहते हैं। किन्तु कुछ आँसू ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम स्वयं बहने देते हैं। जब हम अपने बिछुड़े हुए प्रियजनों की स्मृतियों में लौटते हैं और अपने शोक में भी एक मधुरता का अनुभव करते हैं। जब उनकी प्रिय बातें, उनका प्रसन्न साथ और उनका स्नेहपूर्ण समर्पण स्मरण में आता है तब हमारी आँखों से आँसू वैसे ही बह निकलते हैं जैसे आनंद के क्षणों में। ऐसे आँसुओं को हम स्वयं स्थान देते हैं। पर पहले प्रकार के आँसू हम पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। इसलिए यदि तुम्हारे पास कोई खड़ा हो या तुम्हारे निकट बैठा हो, तो केवल उसके कारण अपने आँसू मत रोकना और न ही उसकी उपस्थिति के कारण स्वयं को रुलाने का प्रयत्न करना। क्योंकि न आँसू बहाना और न आँसू रोक लेना, इनमें से कोई भी बात उतनी लज्जाजनक नहीं है, जितनी कि बनावटी आँसू बहाना। आँसुओं को तभी आने दो, जब वे स्वाभाविक रूप से स्वयं आएँ।
आँसू बहाते हुए भी मनुष्य के भीतर शांति और आत्मसंयम बना रह सकता है। बुद्धिमान लोगों ने भी अनेक बार आँसू बहाए हैं, किन्तु इससे उनके चरित्र की गरिमा कभी कम नहीं हुई। उनके आँसुओं में इतना संयम होता है कि वे एक साथ अपनी मर्यादा और अपनी मानवीय संवेदना, दोनों को सुरक्षित रखते हैं। मैं फिर कहता हूँ, मनुष्य प्रकृति के अनुरूप चल सकता है और साथ ही अपनी गरिमा भी बनाए रख सकता है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो अपने किसी प्रिय परिजन के अंतिम संस्कार में भी सम्मान के पात्र बने रहे। उनके चेहरे पर अपने प्रिय के प्रति सच्चा स्नेह स्पष्ट दिखाई देता था। पर उसमें शोक का कोई कृत्रिम प्रदर्शन नहीं था। उनके मन में जो भी भाव थे, वे स्वाभाविक और निष्कपट थे। शोक में भी एक मर्यादा होती है और बुद्धिमान व्यक्ति उसी मर्यादा का पालन करता है। आँसुओं में भी सीमा होनी चाहिए जैसे, जीवन की हर दूसरी चीज़ में होती है। अत्यधिक शोक और अत्यधिक हर्ष, दोनों ही मूर्खता के लक्षण हैं।
जिसे स्वीकार करना ही पड़े, उसे शांत मन से स्वीकार करो। इसमें ऐसा क्या हुआ है जो न कभी पहले हुआ हो या जिस पर विश्वास न किया जा सके? इसी समय न जाने कितनी शवयात्राओं की तैयारी हो रही है, कितने कफ़न खरीदे जा रहे हैं और तुम्हारे शोक समाप्त कर लेने के बाद भी न जाने कितने लोग अपने प्रियजनों के लिए विलाप कर रहे होंगे। जब भी तुम्हें यह याद आए कि वह एक बालक था, तब यह भी याद रखना कि वह एक मनुष्य था। इसलिए उसके लिए किसी निश्चित भविष्य की गारंटी कभी नहीं थी। भाग्य किसी को भी अनिवार्य रूप से वृद्धावस्था तक नहीं पहुँचाता। वह जब उचित समझता है, जीवन-यात्रा वहीं समाप्त कर देता है।
फिर भी, उसके विषय में बार-बार बात करो और जितना संभव हो उसकी स्मृति का सम्मान करते रहो। यदि उसकी याद कटुता से मुक्त होगी तो वह बार-बार तुम्हारे पास लौटेगी। क्योंकि कोई भी व्यक्ति सदैव दुःखी रहने वाले के साथ समय बिताना नहीं चाहता, फिर स्वयं दुःख के साथ कौन रहना चाहेगा? यदि उसकी कोई भोली-भाली बातें थीं, कोई बालसुलभ चुटकुले या मासूम शरारतें थीं जो तुम्हें प्रसन्न करती थीं तो उन्हें बार-बार याद करो और सुनाया करो। एक पिता के रूप में तुमने उसके भविष्य के बारे में जो सुंदर आशाएँ सँजोई थीं, उन्हें भी निस्संकोच स्मरण करो। अपने प्रियजनों को भूल जाना, उनकी स्मृतियों को उनके शरीर के साथ ही दफना देना, बहुत रोना लेकिन उन्हें शायद ही कभी याद करना, यह संवेदनशीलता नहीं बल्कि अमानवीयता का प्रमाण है। पक्षी और वन्य पशु भी अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, किन्तु उनका स्नेह केवल एक उग्र और लगभग उन्मत्त आवेग होता है। जैसे ही उनका बच्चा मर जाता है, उनका वह लगाव भी समाप्त हो जाता है। किन्तु एक विवेकशील मनुष्य के लिए ऐसा व्यवहार उचित नहीं है। उसे शोक करना छोड़ देना चाहिए, पर स्मरण करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
मैं किसी भी प्रकार से मेट्रोडोरस की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शोक से मिलता-जुलता एक सुख भी होता है और ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को उसी सुख की खोज करनी चाहिए। मेट्रोडोरस ने अपनी बहन को लिखे एक पत्र में कहा है, "शोक से मिलता-जुलता एक प्रकार का सुख भी होता है और ऐसी स्थिति में मनुष्य को उसकी तलाश करनी चाहिए।" इन शब्दों के विषय में तुम्हारा क्या मत होगा, इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। क्योंकि इससे अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है कि कोई व्यक्ति शोक के बीच ही सुख खोजने निकले? बल्कि शोक के माध्यम से ही आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न करे और आँसुओं के बीच भी किसी मनोहर अनुभव की तलाश करे! और यही लोग हम पर अत्यधिक कठोर होने का आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं कि हमारे उपदेश बहुत कठोर हैं, केवल इसलिए कि हम यह कहते हैं या तो शोक को मन में प्रवेश ही मत करने दो और यदि वह आ जाए तो उसे शीघ्र ही विदा कर दो। अब बताओ, इनमें से कौन-सी बात अधिक कठिन और कम मानवीय प्रतीत होती है। मित्र के वियोग पर शोक को अपने ऊपर हावी न होने देना या फिर उसी शोक के बीच सुख का शिकार करने निकल पड़ना?
हमारी शिक्षा तो कहीं अधिक गरिमापूर्ण है। हम कहते हैं कि जब स्वाभाविक भावावेग मनुष्य से कुछ आँसू निकलवा ले और उसका पहला उबाल शांत हो जाए, तब उसे अपने मन को शोक के हवाले नहीं कर देना चाहिए। क्या सचमुच तुम यह कहना चाहते हो कि शोक में भी सुख मिलाकर उसे हल्का किया जाए? यह तो वैसा ही है जैसे किसी रोते हुए बच्चे को मिठाई देकर चुप कराया जाए, या दूध पिलाकर उसकी रुलाई रोक दी जाए। यह बुद्धिमानों के लिए नहीं बल्कि छोटे बच्चों को बहलाने का उपाय है।
क्या तुम यह भी स्वीकार नहीं करोगे कि जब पुत्र की चिता जल रही हो या कोई प्रिय मित्र अपने अंतिम श्वास ले रहा हो, तब कम-से-कम उस समय तो सुख का अंत हो जाना चाहिए? क्या हमारे शोक में भी आनंद की गुदगुदी बनी रहनी चाहिए? बताओ, अधिक गरिमापूर्ण क्या है? मन से शोक को दूर कर देना या शोक के बीच ही सुख को प्रवेश दे देना? मैंने तो केवल यह कहा था कि सुख को शोक के बीच आने दिया जाता है। पर मेट्रोडोरस तो इससे भी आगे बढ़कर कहता है कि शोक के भीतर से ही सुख को निकाल लेना चाहिए। वह कहता है, "शोक से मिलता-जुलता एक सुख होता है।" ऐसी बात हम स्टोइक कह सकते हैं, लेकिन तुम नहीं। क्योंकि तुम्हारे मत में केवल एक ही वस्तु शुभ है, सुख। केवल एक ही वस्तु अशुभ है, पीड़ा। फिर भला शुभ और अशुभ के बीच कोई समानता या निकटता कैसे हो सकती है? लेकिन मान लो कि ऐसी कोई समानता है भी तो क्या यह उसका अन्वेषण करने का उचित अवसर है? क्या हम शोक के बीच बैठकर यह खोजने लगें कि उसमें कहीं कोई मधुर या सुखद तत्व छिपा हुआ है? चिकित्सा में भी कुछ ऐसे उपचार होते हैं जो शरीर के किसी अंग के लिए लाभदायक होते हैं। लेकिन दूसरे अंगों पर उनका प्रयोग अनुचित और लज्जाजनक माना जाता है। जो उपचार एक स्थान पर उचित होता है, वही घाव की स्थिति बदल जाने पर अनुचित प्रतीत होने लगता है। तो क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि तुम शोक का उपचार सुख से करना चाहते हो? हृदय के इस गहरे घाव के लिए कहीं अधिक गंभीर, संयमपूर्ण और दृढ़ उपचार की आवश्यकता है।
इसके बजाय हमें यह समझाना चाहिए कि जो मर चुका है, उसे किसी भी बुराई का कोई अनुभव नहीं हो सकता क्योंकि यदि उसे किसी बात का अनुभव हो रहा है तो वह मरा ही नहीं है। मैं फिर कहता हूँ, जो अब अस्तित्व में ही नहीं है, उसे कोई भी पीड़ा नहीं पहुँचा सकती। क्योंकि यदि उसे पीड़ा पहुँच रही है तो इसका अर्थ है कि वह अभी जीवित है। ज़रा सोचो, उसे किस बात से कष्ट हो सकता है, अपने अस्तित्व के समाप्त हो जाने से या किसी प्रकार के शेष बचे हुए अस्तित्व से? यदि उसका अस्तित्व ही नहीं रहा तो उसे किसी यातना का अनुभव कैसे होगा? जहाँ चेतना ही नहीं है, वहाँ पीड़ा का अनुभव भी नहीं हो सकता। यदि किसी रूप में उसका अस्तित्व बना हुआ है तो उसने मृत्यु की सबसे बड़ी हानि से मुक्ति पा ली है क्योंकि मृत्यु की सबसे बड़ी हानि तो यही मानी जाती है कि मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
जो व्यक्ति अपने उस प्रियजन के लिए रो रहा है, जिसे युवावस्था में ही मृत्यु ने छीन लिया, उससे हमें यह भी कहना चाहिए कि ब्रह्मांड के अनंत काल की तुलना में युवा हो या वृद्ध, हर मनुष्य का जीवन समान रूप से छोटा है।मनुष्य की सबसे लंबी आयु भी उस अनंत काल की तुलना में इतनी नगण्य है कि उसे एक क्षणांश भी नहीं कहा जा सकता। क्षणांश तो फिर भी कुछ होता है। पर हमारा जीवन तो उसके सामने मानो कुछ भी नहीं है। यही नगण्य-सा जीवन हम सबको समान रूप से मिला हुआ है। हम कितने मूर्ख हैं कि इसी को लेकर इतना मोह और विलाप करते हैं!
मैंने यह सब तुम्हें इसलिए नहीं लिखा कि मुझे लगा तुम अब भी किसी विलंबित उपचार की प्रतीक्षा कर रहे हो। मुझे पूरा विश्वास है कि ये सभी बातें तुम स्वयं भी अपने मन से कह चुके होगे। मेरा उद्देश्य तो केवल इतना था कि थोड़ी देर के लिए तुम अपने वास्तविक स्वरूप और अपने विवेक को भूल बैठे थे। इसलिए तुम्हें उसकी याद दिलाऊँ और साथ ही तुम्हें यह साहस दूँ कि भविष्य में भाग्य के प्रत्येक आघात का दृढ़ता से सामना कर सको। भाग्य के प्रहारों को केवल संभावनाएँ मत समझो; उन्हें ऐसी घटनाएँ मानो जिनका घटित होना एक दिन निश्चित है।
अभी के लिए विदा
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