Sunday, 2 August 2026

मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति के बारे में -- पत्र - 100

 प्रिय लूसीलियस 


यह अत्यंत खीझ उत्पन्न करने वाली बात होती है कि किसी सुखद सपने से अचानक जगा दिया जाए क्योंकि जो सुख उससे छिन जाता है, वह चाहे काल्पनिक ही क्यों न हो, उसका प्रभाव वास्तविक होता है। तुम्हारे पत्र ने भी मेरे साथ कुछ ऐसा ही किया। उसने मुझे उस समय बाधित कर दिया, जब मैं ऐसे चिंतन में पूर्णतः तल्लीन था, जो मुझे अत्यंत प्रिय है और अवसर मिलता तो मैं उसे और भी देर तक जारी रखता। मैं आत्मा की अमरता के विषय में विचार करने का आनंद ले रहा था। इतना ही नहीं, मैं उस पर विश्वास करने के लिए भी तैयार हो गया था। मैं उन महान पुरुषों के मतों के प्रति सहानुभूति अनुभव कर रहा था, जो इस अत्यंत मनोहर संभावना का समर्थन करते हैं।  हालाँकि वे उसे पूरी तरह सिद्ध नहीं कर पाते। मैंने स्वयं को इस महान आशा के हवाले कर दिया था। मैं अपने वर्तमान जीवन से पहले ही विरक्त होने लगा था। अपने दुर्बल जीवन के शेष बचे हुए अंशों से भी मेरा मन ऊब चुका था। मेरे सामने उस असीम काल में प्रवेश करने और शाश्वतता का अधिकारी बनने की संभावना थी। पर तभी तुम्हारा पत्र आ पहुँचा और मैं जैसे नींद से जगा दिया गया। इस प्रकार मेरा वह मनोहर स्वप्न टूट गया। फिर भी, यदि मैं तुमसे कुछ समय के लिए छुटकारा पा सका तो मैं उसे फिर खोज निकालूँगा और पुनः प्राप्त कर लूँगा।


    तुम्हारे पत्र का आरंभ इस बात पर ज़ोर देता है कि मैं उस विवेचना को पूरा नहीं कर पाया, जिसमें मैं स्टोइक मत के इस सिद्धांत को सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था कि मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति भी एक प्रकार का शुभ है। तुम्हारा कहना है कि मैं हमारे विरोधियों की इस आपत्ति का समाधान नहीं कर सका, “कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु यह तो ऐसी ही पृथक वस्तुओं से मिलकर बना है।” प्रिय लूसीलियस, तुम्हारी यह कठिनाई उसी विवेचना के अंतर्गत आने वाले एक दूसरे विषय से संबंधित है। इसलिए मैंने न केवल उसका उत्तर देना स्थगित रखा बल्कि उससे संबंधित अन्य प्रश्नों की चर्चा भी नहीं की क्योंकि, जैसा कि तुम जानते हो, नीतिशास्त्र में कुछ ऐसे विषय भी सम्मिलित होते हैं जो तर्कशास्त्र के क्षेत्र में आते हैं। 

    इसी कारण अब तक मैंने केवल उन्हीं विषयों पर विचार किया है जो सीधे-सीधे नीतिशास्त्र से संबंधित हैं जैसे कि क्या अपने अंतिम दिन के बाद तक अपनी चिंता का विस्तार करना मूर्खता और निरर्थकता है अथवा क्या हमारे सभी शुभ हमारे साथ ही समाप्त हो जाते हैं और हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद कुछ भी हमारा नहीं रहता? क्या उस वस्तु से, जो हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद घटित होगी और जिसका अनुभव हम कभी नहीं कर सकेंगे, पहले से ही किसी लाभ की आशा की जा सकती है या उसका कोई लाभ अनुभव किया जा सकता है? ये सभी प्रश्न नीतिशास्त्र से संबंधित हैं। इसलिए मैंने उन्हें उनके उचित स्थान पर ही रखा है। लेकिन इस स्टोइक सिद्धांत के विरुद्ध तर्कशास्त्रियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को अलग रखना आवश्यक था। इसलिए मैंने उन्हें एक ओर रख दिया। अब, चूँकि तुम पूरे विषय का निरूपण चाहते हो। इसलिए मैं उन सभी आपत्तियों का क्रमशः उल्लेख करूँगा और फिर एक-एक करके उनका खंडन करूँगा।

    मेरे प्रतिवादों को समझने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि मैं पहले कुछ प्रारंभिक बातें कहूँ। मेरा आशय क्या है? कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो अखंड होती हैं जैसे, एक मनुष्य। कुछ अन्य संयुक्त होती हैं जैसे, एक जहाज़, एक घर, अथवा वे सभी वस्तुएँ जो विभिन्न भागों के परस्पर जुड़ने से एक इकाई बनती हैं। कुछ ऐसी होती हैं जो पृथक-पृथक भागों से मिलकर बनी होती हैं, जिनका प्रत्येक भाग अपनी अलग सत्ता बनाए रखता है जैसे, एक सेना, एक जनसमुदाय या एक सीनेट। इन अंतिम प्रकार की संस्थाओं के जिन घटकों से उनका निर्माण होता है। वे विधि या कार्य के आधार पर एक साथ जुड़े रहते हैं पर स्वभावतः वे अलग-अलग व्यक्ति ही होते हैं। अब मुझे और कौन-सी प्रारंभिक बातें कहनी चाहिए? हम स्टोइकों का सिद्धांत है कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। इसका कारण यह है कि कोई भी एक शुभ वस्तु एक ही आत्मा के नियंत्रण और संचालन में होनी चाहिए अर्थात किसी एक शुभ वस्तु का संचालन करने वाली शक्ति भी एक ही होनी चाहिए। यदि कभी तुम इसका प्रमाण चाहो तो यह बात स्वयं अपने स्वरूप से सिद्ध की जा सकती है। फिलहाल मुझे इसे एक आधारभूत मान्यता के रूप में स्वीकार करना पड़ा है क्योंकि हमारे ही सिद्धांतों का उपयोग हमारे विरुद्ध किया जा रहा है।

    इस प्रकार हमारा प्रतिपक्षी कहता है, “तुम यह दावा करते हो कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु जिस यश की तुम बात कर रहे हो, वह तो सज्जनों की अनुकूल धारणा है। प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति के कथन का नाम नहीं है। न ही अपयश किसी एक व्यक्ति के प्रतिकूल निर्णय का परिणाम है। उसी प्रकार यश भी केवल किसी एक सद्गुणी व्यक्ति को प्रसन्न करने का विषय नहीं है। यश तभी अस्तित्व में आता है, जब अनेक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति एक ही मत पर सहमत होते हैं। अतः यश अनेक व्यक्तियों के निर्णयों का परिणाम है। ऐसे व्यक्तियों के निर्णयों का, जो एक-दूसरे से पृथक हैं। इसलिए यश कोई शुभ नहीं हो सकता।”

    इसके अतिरिक्त वह कहता है, “यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं। लेकिन प्रशंसा तो वाणी है। एक अर्थपूर्ण कथन। परंतु वाणी, चाहे वह सज्जनों की ही क्यों न हो, स्वयं कोई शुभ वस्तु नहीं है। यद्यपि एक सज्जन व्यक्ति की प्रत्येक विशेषता प्रशंसनीय और सराहनीय होती है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य शुभ ही हो। वह ताली भी बजाता है और हूट भी करता है। पर कोई भी न तो उसकी ताली को शुभ कहता है और न ही उसके हूट करने को जैसे, कोई उसकी छींक या उसकी खाँसी को शुभ नहीं कहता। इसलिए यश कोई शुभ वस्तु नहीं है। 

    अंत में हमें यह बताओ कि यह शुभ किसका है, प्रशंसा करने वाले का या प्रशंसा पाने वाले का? यदि तुम कहते हो कि यह प्रशंसा पाने वाले का शुभ है तो यह उतना ही हास्यास्पद होगा, जितना यह कहना कि किसी दूसरे व्यक्ति का उत्तम स्वास्थ्य मेरा स्वास्थ्य है। पर जो व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, उसकी प्रशंसा करना एक श्रेष्ठ कर्म है। इसलिए शुभ तो उसी का है जो प्रशंसा करता है क्योंकि वही उसका कर्म है। हमारा नहीं, जिनकी प्रशंसा की जा रही है। यही तो विवाद का विषय था।” 

    अब मैं इन प्रत्येक बिंदुओं पर क्रमशः विचार करूँगा। सबसे पहले, यह प्रश्न कि क्या कोई शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर बन सकता है जो एक-दूसरे से पृथक हों। यह विषय अभी भी विचाराधीन है और दोनों पक्षों के समर्थक विद्यमान हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यश के लिए अनेक व्यक्तियों की स्वीकृति आवश्यक है? नहीं। वह तो एक ही सज्जन व्यक्ति के निर्णय से भी पूर्ण हो सकता है क्योंकि यह वही सज्जन व्यक्ति है जो यह निर्णय करता है कि हम भी सज्जन हैं।

    “यह कैसे संभव है?” हमारा प्रतिपक्षी कहता है। “क्या प्रतिष्ठा केवल एक व्यक्ति के सम्मान का नाम होगी? क्या अपयश केवल एक व्यक्ति की निंदा से उत्पन्न हो जाएगा? मैं तो यह मानता हूँ कि यश का क्षेत्र कहीं अधिक व्यापक होता है और उसके लिए अनेक लोगों की सहमति आवश्यक है।” परंतु प्रतिष्ठा और अपयश का विषय यश से भिन्न है। क्यों? इसलिए कि यदि किसी सज्जन व्यक्ति की मेरे बारे में अच्छी राय है तो मेरी स्थिति वही है मानो सभी सज्जन व्यक्तियों की मेरे बारे में वही राय हो। वास्तव में, यदि वे सब मुझे जानते होते तो उनकी भी वही राय होती। उनका निर्णय एक ही होता है और वह समान रूप से सत्य पर आधारित होता है। वे एक-दूसरे से असहमत नहीं हो सकते। इसलिए यह मानना उचित है कि उन सबका निर्णय एक ही है क्योंकि उनके लिए कोई भिन्न निर्णय लेना संभव ही नहीं है। 

पर जहाँ यश अर्थात व्यापक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, वहाँ एक व्यक्ति की राय पर्याप्त नहीं होती। पहले प्रसंग में एक व्यक्ति का निर्णय सभी का प्रतिनिधित्व कर सकता है क्योंकि यदि सभी सज्जन व्यक्तियों से पूछा जाए तो उनका निर्णय सर्वसम्मत होगा। दूसरे प्रसंग में, विभिन्न लोग भिन्न-भिन्न निर्णय करते हैं। ऐसी स्थिति में सहमति प्राप्त होना कठिन होता है, और पूरा विषय संदेह, अनिश्चितता तथा शंका से भरा रहता है। क्या तुम यह समझते हो कि सभी लोग एक ही मत के हो सकते हैं? ऐसा तो एक ही व्यक्ति के भीतर भी नहीं होता। सज्जन व्यक्ति के मामले में निर्णय का आधार सत्य होता है। सत्य की शक्ति भी एक ही होती है तथा उसका स्वरूप भी एक ही होता है। लेकिन अन्य लोगों के मामले में वे असत्य बातों को स्वीकार करते हैं। असत्य कभी स्थिर नहीं रहता। वह सदा परिवर्तनशील होता है तथा मतभेद और असहमति को जन्म देता है।

    “पर प्रशंसा तो केवल एक कथन है और कथन कोई शुभ वस्तु नहीं है।” जब स्टोइक यह कहते हैं कि यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं, तब उनका आशय किसी कथन से नहीं बल्कि एक धारणा या निर्णय से होता है। वास्तव में, कोई सज्जन व्यक्ति कुछ कहे बिना भी यदि यह निर्णय कर ले कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है तो वह व्यक्ति प्रशंसित हो चुका है। इसके अतिरिक्त, प्रशंसा और स्तुतिगान एक ही बात नहीं हैं। स्तुतिगान के लिए वाणी आवश्यक है। इसी कारण कोई 'अंत्येष्टि-प्रशंसा' नहीं कहता बल्कि 'अंत्येष्टि-प्रशस्ति' कहता है क्योंकि प्रशस्ति का कार्य उसे सार्वजनिक रूप से बोलकर व्यक्त करना है। जब हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, तब हमारा आशय यह नहीं होता कि लोग उसके विषय में मधुर शब्द बोलेंगे बल्कि यह होता है कि वे उसके बारे में अनुकूल निर्णय करेंगे। इसलिए प्रशंसा तब भी होती है, जब कोई व्यक्ति बिना कुछ कहे किसी सज्जन के विषय में अच्छा विचार रखता है और केवल अपने मन में ही उसकी प्रशंसा करता है। 

    इसके अतिरिक्त, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, प्रशंसा का संबंध मन की वृत्ति से है, न कि उन शब्दों से जो उस प्रशंसा को व्यक्त करके सार्वजनिक रूप से प्रकट करते हैं। किसी की प्रशंसा करना अर्थात यह निर्णय करना कि वह प्रशंसा का पात्र है। जब हमारा त्रासदी-कवि कहता है कि “उस व्यक्ति द्वारा प्रशंसित होना, जो स्वयं प्रशंसित है, अत्यंत गौरव की बात है,” तो उसका अभिप्राय यह है कि “उस व्यक्ति द्वारा, जो स्वयं प्रशंसा के योग्य है।” जब एक अन्य प्राचीन कवि कहता है कि “प्रशंसा कलाओं का पोषण करती है,” तो उसका आशय स्तुतिगान से नहीं है क्योंकि वास्तव में स्तुतिगान ही कलाओं को नष्ट कर देता है। वस्तुतः, जनसाधारण की प्रशंसा ने जितना वक्तृत्व-कला और उन सभी कलाओं को भ्रष्ट किया है जो केवल श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए विकसित की जाती हैं, उतना किसी और चीज़ ने नहीं किया। निश्चय ही, प्रतिष्ठा के लिए उसका उच्चारित होना आवश्यक है। लेकिन यश बिना बोले भी विद्यमान हो सकता है। उसके लिए केवल एक अनुकूल निर्णय पर्याप्त है। यश केवल मौन रहने वालों के बीच ही पूर्ण नहीं होता बल्कि उन लोगों के बीच भी पूर्ण रहता है जो उसका विरोध करते हैं और उसे दबाने का प्रयास करते हैं। मैं तुम्हें यश और प्रसिद्धि के बीच का अंतर बताता हूँ। प्रसिद्धि का आधार जनसाधारण का निर्णय होता है। जबकि यश का आधार सज्जन व्यक्तियों का निर्णय होता है।

    “यश अर्थात किसी सज्जन व्यक्ति को सज्जनों द्वारा दी गई प्रशंसा, किसका शुभ है? क्या वह उस व्यक्ति का शुभ है जिसकी प्रशंसा की जाती है, या उसका जो प्रशंसा करता है?” वह दोनों का शुभ है। जब मेरी प्रशंसा की जाती है, तब वह मेरा शुभ है क्योंकि स्वभावतः मेरे मन में सभी मनुष्यों के प्रति स्नेह है। मुझे इस बात का आनंद होता है कि मैंने अच्छा आचरण किया है तथा ऐसे लोगों से मिला हूँ जो मेरे सद्गुणों के प्रति कृतज्ञ हैं। उनकी कृतज्ञता इस शुभ को अनेक लोगों से संबंधित बना देती है। फिर भी वह मेरा भी शुभ है क्योंकि मेरी मनोवृत्ति ऐसी है कि मैं दूसरों के शुभ को भी अपना शुभ मानता हूँ, विशेषकर उन लोगों का, जिनके लिए मैं स्वयं किसी शुभ का कारण बना हूँ। वही शुभ उन लोगों का भी है जो प्रशंसा करते हैं क्योंकि वे यह कार्य सद्गुणपूर्वक करते हैं। प्रत्येक सद्गुणपूर्ण कर्म स्वयं एक शुभ है। यदि मैं स्वयं सद्गुणी न होता तो उन्हें भी यह शुभ प्राप्त न होता। इस प्रकार, उचित और योग्य प्रशंसा दोनों पक्षों के लिए शुभ है। ठीक उसी प्रकार जैसे उचित निर्णय, निर्णय देने वाले के लिए भी शुभ होता है और उस व्यक्ति के लिए भी, जिसे उस निर्णय का लाभ प्राप्त होता है। निस्संदेह, तुम यह स्वीकार करोगे कि न्याय उस व्यक्ति के लिए भी शुभ है जिसके भीतर वह गुण है। उस व्यक्ति के लिए भी जिसे उसका उचित अधिकार प्राप्त होता है। उसी प्रकार, किसी योग्य व्यक्ति की प्रशंसा करना न्याय है। इसलिए यह शुभ दोनों पक्षों का होता है।

    इन कुतर्क करने वालों के उत्तर में इतना ही पर्याप्त है। हमें अपना उद्देश्य इन सूक्ष्म और तुच्छ विवादों में उलझना नहीं बनाना चाहिए और न ही दर्शन को उसकी गरिमा से गिराकर ऐसी क्षुद्र बातों तक ले आना चाहिए।सीधे और खुले मार्ग पर चलना कितना अधिक संतोषजनक है बजाय इसके कि मनुष्य स्वयं ही घुमावदार रास्ते बनाए और फिर बड़े कष्ट से उन्हीं पर लौटने को विवश हो। इस प्रकार के तर्क-वितर्क वास्तव में चतुर वाद-विवाद करने वालों के बौद्धिक विनोद मात्र हैं।

    मुझे तो इसके बजाय यह बताओ कि अपने मन को अनंत तक विस्तृत करना कितना स्वाभाविक है। मानव-मन एक महान और उदात्त वस्तु है। वह अपने लिए कोई सीमा स्वीकार नहीं करता, सिवाय उन सीमाओं के जिन्हें वह स्वयं देवत्व के साथ साझा करता है। सबसे पहले, वह किसी संकीर्ण मातृभूमि को स्वीकार नहीं करता। चाहे वह इफिसस हो, अलेक्ज़ान्द्रिया हो अथवा कोई और अधिक जनसंख्या वाला और अधिक भव्य नगर ही क्यों न हो। उसकी वास्तविक मातृभूमि वह है जो समस्त विश्व की ऊँचाइयों और सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए है, स्वयं आकाश का विशाल मंडल। उसी के भीतर समुद्र और पृथ्वी दोनों स्थित हैं। उसी के भीतर वायु का निम्न प्रदेश मनुष्यों और देवताओं के बीच भेद भी स्थापित करता है और उन्हें जोड़ता भी है। उसी में असंख्य दैवी शक्तियाँ अपने-अपने निश्चित स्थानों पर स्थित रहकर निरंतर अपने-अपने कार्यों की सावधानीपूर्वक देखरेख करती हैं। दूसरे, मन अपने लिए सीमित जीवनकाल को भी स्वीकार नहीं करता। वह कहता है, “समस्त वर्ष मेरे हैं। कोई भी युग महान बुद्धियों के लिए बंद नहीं है। कोई भी काल चिंतन के लिए अनुपलब्ध नहीं है। जब वह दिन आएगा जो इस दैवी और मानवीय तत्वों के मिश्रण को अलग कर देगा, तब मैं इस शरीर को वहीं छोड़ दूँगा जहाँ मैंने उसे पाया था। स्वयं को देवताओं को समर्पित कर दूँगा। अभी भी मैं उनसे पृथक नहीं हूँ। केवल इस पृथ्वी-निर्मित शरीर का भार ही मुझे उनसे अलग रखे हुए है।”

    हमारा समूचा नश्वर जीवन केवल प्रतीक्षा का एक काल है। उस श्रेष्ठ और अधिक दीर्घ जीवन की एक भूमिका मात्र। जिस प्रकार हमारी माताओं का गर्भ हमें दस महीनों तक अपने भीतर रखता है। हमें अपने लिए नहीं बल्कि उस संसार के लिए तैयार करता है जहाँ हम पहली बार श्वास लेने और खुले वातावरण में जीवित रहने योग्य होकर प्रकट होते हैं; उसी प्रकार शैशव से लेकर वृद्धावस्था तक का यह समस्त जीवन भी हमें एक दूसरे जन्म के लिए तैयार करता है। हमारी प्रतीक्षा में एक नया आरंभ है, एक भिन्न अवस्था हमारा इंतज़ार कर रही है। अभी हम स्वर्गलोक को केवल दूर से ही सहन कर सकते हैं। इसलिए उस निर्णायक क्षण की निडर होकर प्रतीक्षा करो। वह तुम्हारे मन का अंतिम क्षण नहीं है। केवल शरीर का अंतिम क्षण है। अपने चारों ओर की प्रत्येक वस्तु को किसी सराय में रखे हुए सामान के समान समझो। तुम्हें आगे बढ़ जाना है। जैसे तुम प्रकृति की आज्ञा से इस संसार में आए थे, वैसे ही उसी मार्ग से लौट भी जाओगे। तुम्हें अपने साथ उससे अधिक कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं है जितना तुम लेकर आए थे बल्कि सत्य तो यह है कि जो कुछ तुम अपने साथ जीवन में लाए थे, उसका भी अधिकांश यहीं छोड़ना पड़ेगा। तुम्हारे शरीर का यह त्वचा-रूपी आवरण, जो तुम्हारा सबसे निकट का वस्त्र है, तुमसे अलग कर दिया जाएगा। तुम अपने मांस से, अपने पूरे शरीर में प्रवाहित रक्त से तथा उन हड्डियों और स्नायुओं से भी अलग कर दिए जाओगे, जो तुम्हारे कोमल और तरल अंगों को सहारा देते हैं।

    जिस दिन से तुम अपने जीवन का अंतिम दिन समझकर भयभीत होते हो, वही तुम्हारी अनंतता का जन्मदिन है।अपना बोझ उतार दो। तुम विलंब क्यों कर रहे हो? क्या तुमने इससे पहले भी उस शरीर को नहीं छोड़ा था, जिसमें तुम छिपे हुए थे। बाहर नहीं आए थे? तुम ठहरना चाहते हो, तुम विरोध करते हो। किंतु उस समय भी तुम्हें तुम्हारी माता के प्रबल प्रयासों से बाहर निकाल दिया गया था। तुम रोते और विलाप करते हो। वास्तव में जन्म लेते समय भी मनुष्य यही करता है। पर तब तुम्हें क्षमा किया जा सकता था क्योंकि तुम बिल्कुल अनभिज्ञ और अनुभवहीन होकर संसार में आए थे। जब तुम्हें अपनी माता के गर्भ के उस गर्म और कोमल आश्रय से बाहर भेजा गया, तब पहली बार स्वतंत्र वायु ने तुम्हें स्पर्श किया। फिर तुमने किसी कठोर हाथ का स्पर्श अनुभव किया। उस समय तुम अत्यंत कोमल थे और संसार के विषय में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए इस अपरिचित वातावरण से भयभीत और विस्मित हो गए थे। किन्तु अब तुम्हारे लिए यह कोई नई बात नहीं है कि तुम उस वस्तु से अलग हो जाओ, जिसका कभी तुम एक भाग थे। अतः अब शांति के साथ उन अंगों को छोड़ दो जिनकी तुम्हें अब आवश्यकता नहीं रही। उस शरीर का त्याग कर दो जिसमें तुम इतने लंबे समय तक निवास करते रहे हो। वह तो वैसे भी फट जाएगा, चूर-चूर हो जाएगा और नष्ट हो जाएगा। तुम शोक क्यों करते हो? यही तो प्रकृति का नियम है। जिस प्रकार प्रसव के बाद गर्भ की झिल्ली नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार यह शरीर भी नष्ट होने के लिए ही है। तुम उससे ऐसा प्रेम क्यों करते हो मानो वह वास्तव में तुम्हारा अपना हो? वह तो केवल तुम्हारा आवरण था। वह दिन अवश्य आएगा जो तुम्हें इस मलिन और दुर्गंधयुक्त उदर के संबंध से अलग करके बाहर ले जाएगा।

    जहाँ तक संभव हो, अभी से अपने को इस शरीर से अलग करो। उन सुखों से भी दूर हो जाओ, सिवाय उनके जो शरीरधारी जीवन की आवश्यकताओं से जुड़े हुए हैं। अभी से अपने शरीर से विरक्ति उत्पन्न करो और किसी अधिक ऊँची तथा अधिक उदात्त वस्तु का चिंतन करो। समय आने पर प्रकृति के रहस्य तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएँगे। वर्तमान का यह कुहासा हट जाएगा और चारों ओर से निर्मल प्रकाश तुम्हें आलोकित करेगा। अपने मन में उस प्रकाश की महानता की कल्पना करो, जहाँ असंख्य तारों का तेज एक साथ मिल जाता है। वहाँ इस शांति को भंग करने वाली कोई छाया नहीं होगी। आकाश का प्रत्येक भाग समान रूप से प्रकाशित होगा। दिन और रात का क्रम तो केवल इस निम्न वायुमंडल का नियम है। 

    जब तुम अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ उस पूर्ण प्रकाश का दर्शन करोगे, तब स्वीकार करोगे कि अब तक तुम अंधकार में ही जीते रहे थे। अभी तुम उसे केवल अपनी आँखों की इन संकीर्ण खिड़कियों के माध्यम से धुंधले रूप में देखते हो, फिर भी दूर से ही उस पर विस्मित हो उठते हो। तब वह दिव्य प्रकाश तुम्हें कैसा प्रतीत होगा, जब तुम उसे उसके अपने ही लोक में प्रत्यक्ष देखोगे? ऐसे विचार मन में किसी भी तुच्छ, क्षुद्र या पतित भावना को स्थान नहीं लेने देते। वे बताते हैं कि देवता प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम उनकी स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास करें, आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार रखें, और अपनी दृष्टि अमरत्व पर स्थिर करें। जिस व्यक्ति के मन में यह विचार दृढ़ हो जाता है, वह किसी भी सेना से नहीं डरता, रणभेरी की ध्वनि से विचलित नहीं होता और किसी भी प्रकार की धमकी से भयभीत नहीं होता। वह भयभीत हो भी क्यों? क्योंकि वह तो मृत्यु की प्रतीक्षा भी आशा और उत्सुकता के साथ करता है।

    किन्तु वह व्यक्ति भी, जो यह मानता है कि मन केवल उतनी ही देर तक बना रहता है, जितनी देर वह शरीर के बंधन में रहता है और उससे मुक्त होते ही तुरंत विलीन हो जाता है, फिर भी मृत्यु के बाद भी अपने को उपयोगी बनाने का प्रयत्न करता है। हालाँकि वह हमारी आँखों से ओझल हो जाता है, फिर भी—

“उसका पराक्रम और उसके कुल की महिमा
बार-बार हमारे मन में आती रहती है।”

यह विचार करो कि महान व्यक्तियों के उत्तम उदाहरणों से हमें कितना लाभ होता है। तब तुम समझोगे कि महान पुरुषों की स्मृति उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति से किसी प्रकार कम उपयोगी नहीं होती।


अभी के लिए विदा 

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