Tuesday, 4 August 2026

न्याय के बारे में -- पत्र - 111

प्रिय लूसीलियस 


तुम चाहते हो कि मैं उस प्रश्न पर अपना मत तुमको भेजूँ जिस पर हमारे विद्यालय में बहस चलती रही है कि क्या न्याय, साहस, विवेक और अन्य सद्गुण सजीव प्राणी हैं। प्रिय लूसीलियस, इस प्रकार की सूक्ष्म चर्चाओं ने लोगों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि हम अपने मन को तुच्छ विषयों में उलझाते हैं और अपना अवकाश ऐसे वाद-विवादों में नष्ट करते हैं जिनसे कोई लाभ नहीं होता। मैं तुम्हारे अनुरोध का पालन करूँगा और हमारे मत-पंथ का सिद्धांत प्रस्तुत करूँगा। लेकिन पहले ही बता दूँ कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। मेरा विचार है कि कुछ विषय केवल उन्हीं लोगों के लिए उपयुक्त हैं जो यूनानी जूते और चोगे पहनने का शौक रखते हैं। अतः मैं तुमको बताऊँगा कि हमारे पूर्ववर्तियों को किन तर्कों ने प्रेरित किया था या यों कहें कि वे स्वयं कौन-से तर्क प्रस्तुत करते थे। मन एक सजीव सत्ता है। इसमें कोई विवाद नहीं है क्योंकि मन ही हमें सजीव प्राणी बनाता है और 'सजीव प्राणी' (animalia) शब्द भी उसी से व्युत्पन्न है। परन्तु सद्गुण तो केवल एक निश्चित प्रकार से व्यवस्थित मन है। अतः सद्गुण एक सजीव प्राणी है।



    फिर एक और तर्क प्रस्तुत किया जाता है।  सद्गुण कोई कार्य करता है। परन्तु किसी भी कार्य का संपादन प्रेरणा के बिना नहीं हो सकता। अतः, क्योंकि सद्गुण में प्रेरणा है और प्रेरणा केवल किसी सजीव प्राणी में ही होती है। इसलिए सद्गुण एक सजीव प्राणी है। कोई यह आपत्ति कर सकता है, “यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है, तो क्या स्वयं सद्गुण में भी सद्गुण होगा?” क्यों नहीं होगा? जिस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक कार्य सद्गुण के माध्यम से करता है, उसी प्रकार सद्गुण भी अपने कार्य स्वयं अपने ही माध्यम से करता है।

    “यदि ऐसा है, तो सभी कलाएँ भी सजीव प्राणी होंगी। इसी प्रकार वे सभी बातें भी जिन्हें हम अपने मन में विचारते और धारण करते हैं। तब तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि हमारे वक्ष की संकीर्ण सीमा के भीतर हजारों सजीव प्राणी निवास कर रहे हैं और हममें से प्रत्येक व्यक्ति या तो असंख्य सजीव प्राणियों का समूह है अथवा अपने भीतर ऐसे असंख्य सजीव प्राणियों को धारण किए हुए है।” क्या आपको आश्चर्य है कि इस आपत्ति का उत्तर कैसे दिया जाए? यद्यपि इनमें से प्रत्येक एक सजीव प्राणी होगा, फिर भी वे सजीव प्राणियों की बहुलता नहीं होंगे। यह कैसे? यदि तुम पूरे ध्यान और एकाग्रता से सुनोगे तो मैं बताता हूँ। 

    प्रत्येक सजीव प्राणी का अपना पृथक् द्रव्य या अस्तित्व होना चाहिए। परन्तु जिन सजीव प्राणियों की तुम बात कर रहे हो, उनमें प्रत्येक का केवल एक ही मन है। इसलिए उनमें से प्रत्येक केवल एक ही सजीव प्राणी हो सकता है, अनेक सजीव प्राणी नहीं। मैं स्वयं भी एक सजीव प्राणी हूँ और एक मनुष्य भी हूँ। फिर भी तुम यह नहीं कहोगे कि हम दो हैं। ऐसा क्यों नहीं? क्योंकि दो होने के लिए दोनों का एक-दूसरे से पृथक् होना आवश्यक है। मेरा आशय यह है कि एक का दूसरे से अलग अस्तित्व होना चाहिए। तभी वे दो कहलाएँगे। जो कुछ एक ही सत्ता में अनेक रूपों में विद्यमान होता है, वह एक ही प्रकृति के अधीन होता है। इसलिए वह एक ही माना जाता है। मेरा मन एक सजीव प्राणी है और मैं भी एक सजीव प्राणी हूँ। फिर भी हम दो नहीं हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि मेरा मन मेरा ही एक अंग है। कोई वस्तु तभी अपने आप में पृथक् गिनी जाती है जब उसका स्वतंत्र अस्तित्व हो। जब तक वह किसी अन्य वस्तु का एक घटक बनी रहती है, तब तक उसे एक भिन्न वस्तु नहीं माना जा सकता। ऐसा क्यों? क्योंकि जो वस्तु वास्तव में भिन्न है, उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होना चाहिए। उसका अपना विशिष्ट गुण होना चाहिए। वह अपने आप में पूर्ण होनी चाहिए।

    मैंने पहले ही तुमको सावधान कर दिया था कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। यदि इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो केवल सद्गुण ही नहीं बल्कि उनके विपरीत दोष भी सजीव प्राणी माने जाएँगे। साथ ही क्रोध, भय, शोक तथा अविश्वास जैसे मनोवेग भी। बात यहीं नहीं रुकेगी। प्रत्येक मत और प्रत्येक विचार भी सजीव प्राणी ठहराया जाएगा। यह बात किसी भी प्रकार स्वीकार करने योग्य नहीं है। मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य स्वयं मनुष्य नहीं होता। कोई पूछ सकता है, “न्याय क्या है?” उत्तर है, एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन। “तो यदि मन एक सजीव प्राणी है क्या न्याय भी सजीव प्राणी होगा?” बिल्कुल नहीं। 

    न्याय मन की एक अवस्था है। उसकी एक विशिष्ट क्षमता है। एक ही मन अनेक प्रकार की अवस्थाओं और रूपों को धारण करता है। किन्तु जब-जब वह कोई भिन्न कार्य करता है, तब-तब वह कोई नया सजीव प्राणी नहीं बन जाता। इसी प्रकार, मन द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य भी सजीव प्राणी नहीं होता। यदि न्याय एक सजीव प्राणी है। इसी प्रकार साहस तथा अन्य सभी सद्गुण भी तो क्या वे कभी सजीव प्राणी होना छोड़ देते हैं और फिर से बन जाते हैं अथवा वे सदा ही ऐसे बने रहते हैं? सद्गुणों का तो अंत नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो इस एक ही मन के भीतर अनेक बल्कि असंख्य सजीव प्राणी निरंतर विचरण कर रहे होंगे।

    कोई यह कह सकता है, “वे अनेक नहीं हैं क्योंकि वे एक ही सत्ता से जुड़े हुए हैं। वे उसी एक सत्ता के अंग और उसके घटक हैं।” तो क्या हम अपने मन की कल्पना उसी प्रकार कर रहे हैं जैसी हाइड्रा (बहुत से सिरों वाला यूनानी पौराणिक राक्षस) की होती है जिसके प्रत्येक सिर अपने-आप लड़ता है और अपने-आप ही हानि पहुँचाता है? फिर भी उन सिरों में से कोई भी स्वयं एक सजीव प्राणी नहीं है। वे केवल एक सजीव प्राणी के सिर हैं। जबकि स्वयं हाइड्रा एक ही सजीव प्राणी है। इसी प्रकार, किसी ने भी यह नहीं कहा कि काइमेरा (यूनानी पौराणिक राक्षस जिसके सिर कई पशुओं से मिलकर बने हैं) के भीतर का सिंह या अजगर स्वयं एक-एक सजीव प्राणी हैं। वे तो उसके अंग हैं और अंग स्वयं सजीव प्राणी नहीं होते। 



    फिर आप किस आधार पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि न्याय एक सजीव प्राणी है? “क्योंकि वह कार्य करता है अर्थात वह उपकार करता है। जो कुछ कार्य करता है और उपकार करता है, उसमें प्रेरणा होती है जिसमें प्रेरणा होती है, वह सजीव प्राणी होता है।” यह तर्क तभी सही है जब वह प्रेरणा उसकी अपनी हो। किन्तु न्याय के मामले में प्रेरणा न्याय की अपनी नहीं बल्कि मन की होती है।


    प्रत्येक सजीव प्राणी अपनी मृत्यु तक अपनी मूल पहचान बनाए रखता है। मनुष्य, जब तक वह जीवित रहता है, मनुष्य ही रहता है। घोड़ा घोड़ा ही रहता है और कुत्ता कुत्ता ही रहता है। वे किसी दूसरी वस्तु में परिवर्तित नहीं हो सकते। मान लीजिए कि न्याय अर्थात एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन एक सजीव प्राणी है। यदि हम इसे स्वीकार कर लें तो साहस भी एक सजीव प्राणी होगा क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन है।परन्तु यह किसका मन है? क्या वही मन, जो अभी कुछ क्षण पहले न्याय था? यदि ऐसा है तो वह मन तो पहले से ही उस पूर्ववर्ती सजीव प्राणी में स्थित है। वह किसी दूसरे सजीव प्राणी में स्थानांतरित नहीं हो सकता। उसे उसी सजीव प्राणी में बने रहना होगा, जिसमें उसने अपना अस्तित्व प्रारम्भ किया था।

    इसके अतिरिक्त, एक ही मन दो सजीव प्राणियों का नहीं हो सकता, अनेक का तो और भी नहीं। यदि न्याय, साहस, आत्मसंयम और अन्य सभी सद्गुण सजीव प्राणी हैं तो वे एक ही मन के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? उनमें से प्रत्येक का अपना-अपना मन होना चाहिए। अन्यथा वे सजीव प्राणी नहीं होंगे। अनेक सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। इस बात को हमारे प्रतिपक्षी भी स्वीकार करते हैं। न्याय का शरीर क्या है? “मन।” साहस का शरीर क्या है? “वही मन।” किन्तु दो सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। वे कहते हैं, “वही एक मन कभी न्याय का रूप धारण करता है, कभी साहस का और कभी आत्मसंयम का।” ऐसा तभी संभव होता, यदि मन न्याय होने के समय साहस न होता। साहस होने के समय आत्मसंयम न होता। किन्तु वास्तव में सभी सद्गुण एक ही समय में विद्यमान रहते हैं। फिर प्रत्येक सद्गुण अलग-अलग सजीव प्राणी कैसे हो सकता है। जबकि मन एक ही है और वह एक से अधिक सजीव प्राणियों की रचना नहीं कर सकता? 

    अंत में, कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरे सजीव प्राणी का अंग नहीं होता। किन्तु न्याय मन का एक अंग है। अतः न्याय सजीव प्राणी नहीं है।

    मुझे लगता है कि मैं ऐसी बात पर परिश्रम व्यर्थ कर रहा हूँ जो स्वयं स्पष्ट है। ऐसी बात जिस पर वाद-विवाद करने के बजाय खीझ प्रकट करनी चाहिए। कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरी वस्तु का अंग नहीं होता। अपने चारों ओर समस्त प्राणियों के शरीरों को देखिए। उनमें से कोई भी अपने विशिष्ट रंग, आकार और परिमाण के बिना नहीं है। दैवी सृष्टिकर्ता की बुद्धि पर आश्चर्य करने के अनेक कारण हैं। उनमें से एक, मेरे विचार से, यह भी है कि इस विशाल सृष्टि में कोई भी वस्तु दूसरी के बिल्कुल समान नहीं बनती। जो वस्तुएँ देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं, वे भी सावधानी से तुलना करने पर भिन्न निकलती हैं। सृष्टिकर्ता ने असंख्य प्रकार की पत्तियाँ बनाई हैं। प्रत्येक की अपनी अलग विशेषता है। उसने असंख्य सजीव प्राणी भी बनाए हैं। किन्तु उनमें से कोई भी दूसरे के ठीक समान आकार का नहीं है। न ही ऐसा है जिसमें कम-से-कम कुछ भिन्नता न हो। सृष्टिकर्ता ने मानो अपने लिए यह नियम निर्धारित किया कि जो वस्तुएँ भिन्न हों, वे रूप और परिमाण में भी एक-दूसरे से भिन्न और असमान हों। परन्तु, जैसा कि तुम स्टोइक कहते हो, सभी सद्गुण समान हैं। अतः वे सजीव प्राणी नहीं हैं। 

    कोई भी सजीव प्राणी ऐसा नहीं होता जो अपने कार्य स्वयं न करता हो। किन्तु सद्गुण अपने-आप कुछ नहीं करता बल्कि वह केवल मनुष्य के साथ मिलकर ही कार्य करता है। सभी सजीव प्राणी या तो विवेकयुक्त होते हैं जैसे, मनुष्य अथवा अविवेकी होते हैं जैसे, जंगली पशु और पालतू मवेशी। सद्गुण निश्चय ही विवेकयुक्त है। किन्तु वह न मनुष्य है और न देवता। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है।

    विवेकयुक्त कोई भी सजीव प्राणी तब तक कोई कार्य नहीं करता, जब तक पहले किसी विशेष वस्तु की छाप उसके मन पर न पड़े; फिर उसके भीतर प्रेरणा उत्पन्न न हो; और अंत में उसकी स्वीकृति उस प्रेरणा की पुष्टि न कर दे।

    मैं आपको बताता हूँ कि स्वीकृति क्या है। “मेरे लिए चलना उचित है।” मैं तभी चलता हूँ जब पहले मैं अपने आप से यह कहता हूँ और इस निर्णय को स्वीकार कर लेता हूँ। “मेरे लिए बैठना उचित है।” तभी मैं बैठता हूँ।किन्तु इस प्रकार की स्वीकृति सद्गुण में नहीं पाई जाती। मान लीजिए कि वह सद्गुण विवेक है। तब विवेक इस निर्णय को कैसे स्वीकार करेगा कि “मेरे लिए चलना उचित है”? यह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। विवेक अपना ध्यान उस वस्तु के हित पर रखता है जिससे वह संबद्ध है, अपने स्वयं के हित पर नहीं क्योंकि वह स्वयं न चल सकता है और न बैठ सकता है। अतः विवेक में स्वीकृति नहीं होती और जिसमें स्वीकृति नहीं होती, वह विवेकयुक्त सजीव प्राणी नहीं हो सकता। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है तो वह विवेकयुक्त सत्ता होगी। किन्तु वह ऐसी विवेकयुक्त सत्ता नहीं है। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है और प्रत्येक शुभ सद्गुण है तो प्रत्येक शुभ भी एक सजीव प्राणी होगा। हमारा मत-पंथ इस बात को स्वीकार करता है। 

    अपने पिता की रक्षा करना एक शुभ कर्म है। सीनेट में विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी एक शुभ कर्म है और न्यायपूर्वक निर्णय देना भी एक शुभ कर्म है। अतः अपने पिता की रक्षा करना भी एक सजीव प्राणी होगा और विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी। यह तर्क इतनी दूर तक पहुँच जाएगा कि आप हँसे बिना नहीं रह सकेंगे। विवेकपूर्वक मौन रहना भी एक शुभ कर्म है और उत्तम प्रकार से भोजन करना भी। अतः मौन रहना और भोजन करना भी सजीव प्राणी ठहरेंगे। निस्संदेह, मैं इन पांडित्यपूर्ण असंगतियों के साथ परिहास करना और उनका उपहास उड़ाना बंद नहीं करूँगा। यदि न्याय और साहस सजीव प्राणी हैं, तो वे निश्चय ही पृथ्वी पर रहने वाले सजीव प्राणी होंगे। प्रत्येक पृथ्वीवासी सजीव प्राणी बीमार पड़ता है, भूखा होता है और प्यासा भी होता है। अतः न्याय भी बीमार पड़ेगा, साहस भी भूखा होगा और दया भी प्यासी होगी।

    मुझे आगे उनसे यह भी पूछना चाहिए कि इन सजीव प्राणियों का आकार कैसा है। क्या उनका रूप मनुष्य जैसा है या घोड़े जैसा अथवा किसी जंगली पशु जैसा? यदि वे उन्हें देवताओं के समान गोलाकार बताएँ तो मैं पूछूँगा कि क्या लोभ, विलासिता और उन्माद भी उसी प्रकार गोलाकार हैं? क्योंकि उनके अनुसार वे भी सजीव प्राणी हैं। यदि वे उन्हें भी गोलाकार मान लें तो मैं यह भी पूछूँगा कि क्या विवेकपूर्वक चलना भी एक सजीव प्राणी है। उन्हें इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। फिर यह भी कहना पड़ेगा कि चलना एक सजीव प्राणी है और वह भी गोलाकार। 

    तुमको यह नहीं समझना चाहिए कि मैं हमारे मत-पंथ का पहला व्यक्ति हूँ जो तत्काल अपने विचार प्रस्तुत कर रहा है और अपना स्वतंत्र मत रखता है। क्लीन्थीस और क्राइसिपस भी इस बात पर सहमत नहीं थे कि ‘चलना’ वास्तव में क्या है। क्लीन्थीस का कहना है कि यह वह प्राणवायु है जो प्रधान नियामक शक्ति (directive faculty) से पैरों तक फैलती है। जबकि क्राइसिपस का मत है कि चलना स्वयं वही प्रधान नियामक शक्ति है। तो फिर, क्राइसिपस के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, प्रत्येक व्यक्ति अपनी विचार-स्वतंत्रता का प्रयोग क्यों न करे और इन सजीव प्राणियों का उपहास क्यों न उड़ाए, जिनकी संख्या इतनी अधिक है कि स्वयं यह संसार भी उन्हें समाहित नहीं कर सकता?

    प्रतिपक्षी कहता है, “सद्गुण अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं हालाँकि वे सजीव प्राणी हैं। जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक ही समय में कवि भी हो सकता है और वक्ता भी, फिर भी वह एक ही व्यक्ति रहता है, उसी प्रकार ये सद्गुण सजीव प्राणी तो हैं। परन्तु अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं। एक ही मन, प्रत्येक सद्गुण के संबंध में एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित होने के कारण, न्यायशील भी होता है, विवेकशील भी और साहसी भी।” विवाद यहीं समाप्त हो जाता है। अब हम सहमत हैं। क्योंकि मैं भी फिलहाल यह स्वीकार कर लेता हूँ कि मन एक सजीव प्राणी है। इस विषय में अपना अंतिम निर्णय मैं बाद के लिए स्थगित रखता हूँ। किन्तु मैं यह स्वीकार नहीं करता कि मन के कार्य स्वयं सजीव प्राणी हैं। यदि ऐसा मान लिया जाए तो प्रत्येक शब्द भी सजीव प्राणी होगा और कविता की प्रत्येक पंक्ति भी। यदि विवेकपूर्ण वाणी एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो वाणी भी एक सजीव प्राणी होगी। इसी प्रकार, यदि विवेकपूर्ण काव्य-पंक्ति एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो कविता की एक पंक्ति भी सजीव प्राणी होगी। तब तो 'मैं शस्त्रों और उस पुरुष का गान करता हूँ' भी एक सजीव प्राणी ठहरेगा। किन्तु वे उसे गोलाकार सजीव प्राणी नहीं कह सकते क्योंकि उसके छह चरण हैं।

    “भगवान के लिए!” तुम कहोगे, “इस समय मैं कैसी उलझी हुई जाल-बुनाई कर रहा हूँ!” मैं तो यह कल्पना करके ही हँस पड़ता हूँ कि भाषिक अशुद्धियाँ (solecisms), अपभ्रष्ट शब्द (barbarisms) और न्याय-तर्क (syllogisms) भी सजीव प्राणी हैं। किसी चित्रकार की भाँति मैं उन्हें उपयुक्त मुखाकृतियाँ भी दे देता हूँ। क्या वास्तव में हम भौंहें चढ़ाकर और माथे पर बल डालकर इसी प्रकार की बातों पर विचार कर रहे हैं? क्या मैं कैसिलियस के शब्दों में यह नहीं कह सकता, “क्या ही गंभीर मूर्खता है!” यह सब नितांत हास्यास्पद है। अतः आओ, इसके स्थान पर ऐसी बातों की ओर ध्यान दें जो हमारे लिए उपयोगी और कल्याणकारी हों। आओ यह विचार करें कि हम सद्गुणों तक कैसे पहुँच सकते हैं और कौन-सा मार्ग हमें वहाँ ले जाएगा। 

    मुझे यह मत सिखाओ कि साहस एक सजीव प्राणी है या नहीं बल्कि यह सिखाओ कि साहस के बिना कोई भी सजीव प्राणी सुखी नहीं हो सकता। अर्थात जब तक वह आकस्मिक घटनाओं का सामना करने की शक्ति प्राप्त नहीं कर लेता और प्रत्येक संभावित परिस्थिति पर पहले से विचार करके उनके घटित होने से पहले ही उन पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता। साहस क्या है? यह मानव की दुर्बलता का अभेद्य दुर्ग है। जो व्यक्ति अपने को इससे सुरक्षित कर लेता है, वह जीवनरूपी घेराबंदी को शांतचित्त होकर सहन कर सकता है क्योंकि वह अपनी ही शक्ति और अपने ही शस्त्रों का उपयोग करता है। इस प्रसंग में मैं तुमको हमारे स्टोइक दार्शनिक पोसिडोनियस का मत बताना चाहता हूँ—

“यह कभी मत समझो कि भाग्य के दिए हुए शस्त्र तुम्हें सुरक्षित रखेंगे। भाग्य का सामना अपने ही शस्त्रों से करो। भाग्य मनुष्य को भाग्य के विरुद्ध लड़ने के लिए शस्त्र नहीं देता। इसलिए जो लोग शत्रु का सामना करने के लिए सुसज्जित होते हैं, वे प्रायः भाग्य का सामना करने के लिए निःशस्त्र रह जाते हैं।”

    यह सत्य है कि सिकन्दर ने फ़ारसियों, हाइरकेनियों, भारतीयों तथा पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई अनेक जातियों को पराजित कर उनके राज्यों का विनाश कर दिया था। किन्तु स्वयं वह एक मित्र की हत्या करने के बाद और दूसरे मित्र को खो देने के बाद अंधकारमय निराशा में पड़ा रहा, कभी अपने अपराध पर शोक करता और कभी अपने वियोग पर। इतने अधिक राजाओं और राष्ट्रों का विजेता भी क्रोध और विषाद से पराजित हो गया। उसने अपनी वासनाओं को छोड़कर शेष सब पर अधिकार करने का प्रयास किया। 

    जो लोग समुद्रों के पार तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने की लालसा रखते हैं और अपने को तभी अत्यन्त भाग्यशाली समझते हैं जब उनकी सेनाएँ अनेक प्रान्तों पर अधिकार कर लें तथा पुराने राज्यों में नए प्रदेश जोड़ दें, वे कितनी बड़ी भूल करते हैं! वे उस राज्य से अनभिज्ञ रहते हैं जो देवत्व के समान महान है। अपने ऊपर शासन करना और यही सभी प्रकार के शासन में सबसे महान शासन है। मुझे उस न्याय की पवित्रता का उपदेश दो जो दूसरों के हित का ध्यान रखता है और अपने लिए केवल इतना ही चाहता है कि उसे कार्य करने का अवसर मिलता रहे। उसका स्वार्थ और यश-लिप्सा से कोई संबंध न हो। वह अपने-आप में ही संतुष्ट रहे। 

    सबसे बढ़कर, प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन में इस सिद्धांत को दृढ़तापूर्वक स्थापित कर लेना चाहिए। “मुझे किसी पुरस्कार की अपेक्षा किए बिना न्यायशील होना चाहिए।” नहीं, केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसे अपने-आप को इस बात के लिए भी तैयार करना चाहिए कि वह इस परम सुंदर सद्गुण के लिए उदारतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पित करने में आनंद अनुभव करे। उसके सभी विचार यथासंभव व्यक्तिगत लाभ से दूर रहने चाहिए। तुम्हें किसी न्यायपूर्ण कर्म के प्रतिफल की ओर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि न्यायपूर्ण कर्म करने का सबसे बड़ा पुरस्कार स्वयं न्यायपूर्ण कर्म करना ही है।

    मैंने थोड़ी देर पहले जो बात तुम्हें बताई थी, उसी पर निरंतर ध्यान लगाए रखो। तुम्हारी निष्पक्षता और न्यायप्रियता से कितने लोग परिचित हैं, इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग चाहते हैं कि उनके सद्गुणों का प्रचार हो, वे वास्तव में सद्गुण के लिए नहीं बल्कि यश के लिए प्रयत्न करते हैं। क्या तुम बिना प्रसिद्धि पाए भी न्यायशील रहने को तैयार नहीं हो? वास्तव में, अनेक अवसर ऐसे आएँगे जब तुम्हें न्यायशील होने के साथ-साथ अपयश भी सहना पड़ेगा। यदि तुम बुद्धिमान हो तो अपने उत्तम आचरण के कारण प्राप्त हुई उस बदनामी में भी प्रसन्नता का अनुभव करोगे।


अभी के लिए विदा 

No comments:

Post a Comment

न्याय के बारे में -- पत्र - 111

प्रिय लूसीलियस  तुम चाहते हो कि मैं उस प्रश्न पर अपना मत तुमको भेजूँ जिस पर हमारे विद्यालय में बहस चलती रही है कि क्या न्याय, साहस, विवेक और...