प्रिय लूसीलियस
तुम्हारी समझ-बूझ और विवेक कहाँ चले गए? तुम्हारे चरित्र की दृढ़ता का क्या हुआ? क्या तुम इतनी तुच्छ-सी बात से व्याकुल हो रहे हो? तुम्हारे दासों ने देखा कि तुम व्यस्त हो। उन्होंने इसे भाग निकलने का अवसर समझ लिया। यदि तुम्हें धोखा देने वाले तुम्हारे मित्र होते... चलो, प्रचलित किन्तु गलत शब्द का ही प्रयोग कर लें ताकि उनके मित्रोचित व्यवहार न करने का दोष और भी अधिक स्पष्ट हो तो निश्चय ही तुम्हारे सारे कामों की हानि होती। परंतु इस स्थिति में तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ा। तुमने केवल ऐसे लोगों को खोया है जो तुम्हारी अच्छी सेवा नहीं करते थे और जो तुम्हें एक कठिन स्वामी समझते थे।
इस घटना में न तो कुछ असाधारण है और न ही अप्रत्याशित। ऐसी बातों पर व्यथित होना उतना ही हास्यास्पद है जितना स्नानागार में पानी के छींटे पड़ने, भीड़ में धक्का लग जाने या कीचड़ भरे मार्ग पर कपड़े मैले हो जाने की शिकायत करना। जीवन भी हम पर वही परिस्थितियाँ लादता है जिनका सामना हम स्नानागार, भीड़ या यात्रा के दौरान करते हैं। कुछ बातें जान-बूझकर किए गए आघात होंगी। कुछ केवल संयोगवश घटित होंगी। जीवन फूलों की सेज नहीं है। तुम एक लंबी यात्रा पर निकले हो। इस मार्ग में तुम्हारा ठोकर खाना, किसी से टकरा जाना, गिर पड़ना, थक जाना और यह कह उठना... “अब मैं मर जाना चाहता हूँ”, अनिवार्य है। हालाँकि यह केवल एक क्षणिक उद्गार होगा। किसी स्थान पर तुम किसी साथी को पीछे छोड़ दोगे, किसी दूसरे स्थान पर किसी का अंतिम संस्कार करोगे और कहीं किसी अन्य के कारण भयभीत हो जाओगे। इसी प्रकार की घटनाओं से भरे इस ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर तुम्हें आगे बढ़ना होगा।
यदि कोई सचमुच मरना चाहता है तो उसे अपने को उन सभी बातों के लिए तैयार कर लेना चाहिए जो आगे आने वाली हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि वह उस स्थान पर आ पहुँचा है जहाँ गर्जन सुनाई देता है, जहाँ-,विलाप और प्रतिशोधी चिंताओं ने अपना निवास बना रखा है। जहाँ भयंकर रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।
इन्हीं लोगों के बीच तुम्हें अपना जीवन बिताना है। तुम इन बातों से बच नहीं सकते, पर उनसे ऊपर अवश्य उठ सकते हो; और यदि तुम बार-बार उन पर विचार करोगे तथा भविष्य में आने वाली बातों का पहले से अनुमान लगाते रहोगे, तो ऐसा करने में सफल हो जाओगे।
जिस परिस्थिति के लिए मनुष्य लंबे समय से स्वयं को तैयार करता रहा हो, उसका सामना वह अधिक धैर्य के साथ करता है। जिन कष्टों की पहले से अपेक्षा की गई हो, उन्हें भी सहा जा सकता है। इसके विपरीत, जो लोग तैयार नहीं होते, वे अत्यंत तुच्छ बातों से भी भयभीत हो जाते हैं। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमने किसी भी संभावना की उपेक्षा न की हो। क्योंकि प्रत्येक नई बात अधिक गंभीर प्रतीत होती है। इसलिए निरंतर चिंतन यह सुनिश्चित करेगा कि तुम किसी भी संकट का सामना एक नए सैनिक की तरह न करो।
“मेरे दास मुझे छोड़कर भाग गए।” हाँ, और किसी दूसरे व्यक्ति के दासों ने उससे चोरी की है, उस पर अपराध का आरोप लगाया है, उसकी हत्या की है, उसके साथ विश्वासघात किया है, उसे पैरों तले रौंदा है, उसे विष देकर या झूठे अभियोग लगाकर नष्ट करने का प्रयास किया है। जिन बातों को तुम अपने दुखों की सूची मानते हो, उनका अनुभव बहुत-से लोग कर चुके हैं। बहुत-से लोग आगे भी करेंगे। अनेक प्रकार के अस्त्र हमारी ओर लक्षित हैं। उनमें से कुछ पहले ही हमें घायल कर चुके हैं। कुछ हमारी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और शीघ्र ही हम तक पहुँचने वाले हैं। कुछ, जो किसी और के लिए छोड़े गए थे, हमें केवल छूते हुए निकल जाते हैं। जिन बातों का सामना करने के लिए हमारा जन्म हुआ है, उनसे हमें कभी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। किसी को भी उनकी शिकायत नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे सभी मनुष्यों के लिए समान हैं। मेरा आशय यह है कि वे समान हैं क्योंकि जिन कष्टों से कुछ लोग बच जाते हैं, वे भी ऐसे कष्ट हैं जिन्हें वे भोग सकते थे। कोई नियम तभी न्यायसंगत होता है जब वह सब पर समान रूप से लागू होता है, न कि केवल तब जब उसका अनुभव सबको हो। अपने मन को न्यायप्रिय बनाओ। अपनी नश्वरता का जो कर हमें चुकाना है, उसे बिना शिकायत चुकाएँ।
शीत ऋतु शीत लेकर आती है। हमें ठिठुरना पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु फिर उष्णता लेकर आती है। हमें पसीना बहाना पड़ता है। मौसम की अनियमितता हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हमें बीमार पड़ना पड़ता है। कहीं हमारा सामना हिंसक पशुओं से होगा तो कहीं ऐसे मनुष्यों से, जो किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होते हैं। हमें जल से भी हानि पहुँचेगी और अग्नि से भी। हम इस व्यवस्था को बदल नहीं सकते। हम केवल इतना कर सकते हैं कि एक सज्जन पुरुष के योग्य दृढ़ चरित्र धारण करें ताकि जीवन की आकस्मिक घटनाओं को साहसपूर्वक सह सकें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखें। प्रकृति इस दृश्य जगत का संचालन परिवर्तन के माध्यम से करती है। बादलों से घिरे आकाश के बाद निर्मल आकाश आता है। शांत समुद्र के बाद वह उथल-पुथल से भर उठता है। वायु बारी-बारी से चलती है। रात्रि के बाद दिन आता है। आकाश का एक भाग उदित होता है और दूसरा अस्त हो जाता है। इन्हीं परस्पर विरोधी परिवर्तनों के कारण संसार का अस्तित्व बना रहता है। हमें अपने मन को इसी नियम के अनुरूप ढालना चाहिए। उसका अनुसरण करना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। जो कुछ भी घटित हो, हमें यह समझना चाहिए कि उसका घटित होना आवश्यक था। प्रकृति को दोष देने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। जिसे सुधारा नहीं जा सकता, उसे धैर्यपूर्वक सहना ही सर्वोत्तम है। जो दैवी सत्ता समस्त घटनाओं के क्रम का संचालन करती है, उसके साथ बिना शिकायत चलना चाहिए। जो सैनिक अपने सेनापति के पीछे चलते हुए कुड़कुड़ाता है, वह अच्छा सैनिक नहीं होता।
अतः आओ, हम अपने भाग में आए आदेशों को निरंतर उत्साह और दृढ़ता के साथ स्वीकार करें। इस अत्यंत सुंदर विश्व द्वारा निर्धारित मार्ग को न छोड़ें क्योंकि हमारे भविष्य के समस्त अनुभव उसी के साथ गुंथे हुए हैं। आओ, इस विराट जगत के संचालक ज्यूपिटर को हमारे अपने क्लेआन्थेस के उन उत्कृष्ट पदों में संबोधित करें, जिन्हें मैं वाग्मिता के आचार्य सिसेरो के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अनुवाद करने का साहस कर रहा हूँ। यदि ये तुम्हें पसंद आएँ तो उनका श्रेय मुझे देना। यदि पसंद न आएँ, तो समझ लेना कि मैंने केवल सिसेरो का अनुकरण किया है—
हे पिता, उच्च आकाश के स्वामी,
जहाँ भी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा मार्गदर्शन करो।
मैं तत्पर हूँ और शीघ्र ही आज्ञा का पालन करूँगा।
यदि मैं अनिच्छुक होकर भी कराहूँ,
तो भी मुझे जाना ही होगा,
जो कार्य मैं सद्गुणी होता तो अपनी इच्छा से करता,
उसी को अब मुझे विवश होकर दुःख सहते हुए करना पड़ेगा।
भाग्य इच्छुक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है,
और अनिच्छुक को घसीटकर ले जाता है।
हमें इसी प्रकार जीना और इसी प्रकार बोलना चाहिए कि भाग्य हमें सदैव तैयार और तत्पर पाए। यही वह दृढ़ चरित्र है जिसने स्वयं को भाग्य के प्रति समर्पित कर दिया है। इसके विपरीत वह दुर्बल और पतित मनुष्य है, जो संघर्ष करता रहता है, विश्व-व्यवस्था के प्रति बुरा विचार रखता है और स्वयं को सुधारने के बजाय देवताओं को सुधारना अधिक उचित समझता है।
अभी के लिए विदा
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