Monday, 3 August 2026

ग्रंथों के अध्ययन के विषय में -- पत्र - 106 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारा प्रश्न ऐसी बात से संबंधित है जिसे जानने का कोई प्रयोजन नहीं है, सिवाय इसके कि उसे जान लिया जाए। फिर भी, केवल इसी कारण से तुम उसे शीघ्र जान लेना चाहते हो और उन ग्रंथों की प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं हो जिन्हें मैं इस समय संपूर्ण नीतिशास्त्र के विषय पर तैयार कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अभी दे दूँगा। पर उससे पहले मैं यह लिखना चाहता हूँ कि तुम्हें ज्ञान प्राप्त करने की अपनी प्रबल इच्छा को किस प्रकार संयमित रखना चाहिए। मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी यह तीव्र जिज्ञासा कहीं तुम्हारे लिए ही हानिकारक न बन जाए। तुम्हें प्रत्येक उस विषय को नहीं अपनाना चाहिए जो तुम्हारे सामने आ जाए। न ही प्रत्येक विषय की संपूर्ण गहराई में लोभपूर्वक उतर जाना चाहिए। किसी विषय का एक अंश भी तुम्हें उसके समग्र स्वरूप का बोध करा सकता है। हमें अपने सामर्थ्य के अनुसार ही भार उठाना चाहिए। अपनी क्षमता से अधिक बोझ अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। जितना पीने की इच्छा हो, उतना नहीं बल्कि जितना धारण कर सको, उतना ही पीना चाहिए। हाँ, केवल अपना दृष्टिकोण उचित बनाए रखो। समय आने पर तुम उतना ही धारण करने में समर्थ हो जाओगे, जितना तुम्हारी इच्छा होगी। मन जितना अधिक ग्रहण करता है, उतना ही अधिक विस्तृत होता जाता है।



    मुझे स्मरण है कि अत्तालस (Attalus) हमें किस प्रकार शिक्षा दिया करते थे, जब हम निरंतर उनके व्याख्यानों में उपस्थित रहते थे। हम सबसे पहले पहुँचते और सबसे अंत में लौटते थे। यहाँ तक कि जब वे टहल रहे होते, तब भी हम उनसे विभिन्न विषयों का विवेचन करने का आग्रह करते थे क्योंकि वे केवल शिष्यों को स्वीकार ही नहीं करते थे बल्कि स्वयं भी उन्हें खोजते थे। वे कहा करते थे, “गुरु और शिष्य, दोनों का उद्देश्य एक ही होना चाहिए। गुरु का उद्देश्य प्रगति कराना और शिष्य का उद्देश्य प्रगति करना।” जो व्यक्ति किसी दार्शनिक के साथ अध्ययन करता है, उसे प्रतिदिन अपने साथ कुछ-न-कुछ लाभ लेकर लौटना चाहिए या तो अधिक स्वस्थ मन लेकर या ऐसा मन जो उपचार ग्रहण करने के लिए पहले से अधिक खुला हो। ऐसा वह अवश्य करेगा क्योंकि दर्शन की शक्ति इतनी महान है कि वह केवल अपने विद्यार्थियों की ही नहीं बल्कि संयोगवश उपस्थित रहने वालों की भी सहायता करती है। जो लोग धूप में निकलते हैं, उनका रंग साँवला हो जाता है, चाहे वे इस उद्देश्य से बाहर न निकले हों। जो लोग कुछ देर इत्र की दुकान में बैठे रहते हैं, वे वहाँ की सुगंध अपने साथ ले जाते हैं। उसी प्रकार जो लोग किसी दार्शनिक के सान्निध्य में रहते हैं, वे भी अनिवार्य रूप से अपने साथ कोई-न-कोई लाभ लेकर जाते हैं, चाहे उन्होंने उसके लिए कोई विशेष प्रयास न किया हो। ध्यान दो, मैं यह कहता हूँ, “चाहे वे कोई प्रयास न करें” न कि “चाहे वे उसका विरोध ही क्यों न करें।”

    “तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या हम ऐसे लोगों को नहीं जानते जिन्होंने वर्षों तक किसी दार्शनिक के साथ अध्ययन किया, फिर भी जिन पर उसका तनिक भी रंग नहीं चढ़ा?” निश्चय ही जानता हूँ। ऐसे लोग भी जो अत्यंत नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं। पर मैं उन्हें दर्शन के विद्यार्थी नहीं बल्कि केवल अनुयायी या साथ लगे रहने वाले लोग कहूँगा। कुछ लोग सीखने के लिए नहीं, केवल सुनने के लिए आते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम वाणी, संगीत या कथा का आनंद लेने के लिए रंगमंच की ओर आकर्षित हो जाते हैं। तुम देख सकते हो कि ऐसे श्रोताओं का अधिकांश भाग दार्शनिक प्रवचन को केवल मनोरंजन का साधन समझता है। वे न तो अपने किसी दोष का त्याग करना चाहते हैं, न ही ऐसा कोई जीवन-सिद्धांत अपनाना चाहते हैं जिसके अनुसार अपने आचरण को संयमित कर सकें। वे तो केवल कानों को सुख पहुँचाने वाला आनंद प्राप्त करने आते हैं। कुछ लोग तो अपनी लेखन-पट्टिकाएँ भी साथ लाते हैं। पर विषय-वस्तु को लिखने के लिए नहीं बल्कि केवल सुंदर वाक्यांशों को उतार लेने के लिए ताकि बाद में उन्हें दोहरा सकें। उनसे दूसरों को उतना ही कम लाभ होता है, जितना स्वयं उन्हें उनसे हुआ होता है। कुछ लोग प्रभावशाली भाषणों से भावविभोर हो जाते हैं और वक्ता की भावनाओं से स्वयं भी प्रभावित हो उठते हैं। उनके चेहरे पर उत्साह दिखाई देता है। उनका मन उद्दीप्त हो उठता है। वे उन फ़्राइजीय (प्राचीन भूभाग अथवा क्षेत्र) नपुंसकों के समान उन्मत्त हो जाते हैं, जो बाँसुरी की ध्वनि पर संकेत मिलते ही उन्माद में आ जाते हैं। उन्हें बहा ले जाने वाली चीज़ खोखले शब्दों की ध्वनि नहीं बल्कि विषय की गरिमा और सौंदर्य होता है। जब कोई मृत्यु के भय के विरुद्ध निर्भीकता से बोलता है या भाग्य की चंचलता का साहसपूर्वक सामना करने की शिक्षा देता है, तब वे तुरंत वैसा ही आचरण करने के लिए तैयार हो जाते हैं जैसा उन्होंने सुना है। वे अत्यंत ग्रहणशील होते हैं। उन्हें जैसा बनने के लिए कहा जाता है, वे वैसा ही बनने को तैयार हो जाते हैं। यदि वह प्रेरणा उनके भीतर बनी रहे और यदि उनका यह उत्तम संकल्प लोगों द्वारा, जो सदाचरण के सबसे बड़े निरुत्साहक होते हैं, नष्ट न कर दिया जाए। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने भीतर उत्पन्न उस संकल्प को अपने घर तक सुरक्षित ले जा पाते हैं।

    श्रोता को प्रेरित करना और उसके भीतर उचित आचरण की इच्छा जगाना सरल है क्योंकि प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य के भीतर सद्गुणों की नींव और उनके बीज पहले से ही रख दिए हैं। हम सब ऐसे ही गुणों के लिए जन्म लेते हैं। जब कोई हमें प्रेरणा देता है तो हमारे भीतर का सद्गुण मानो निद्रा से जाग उठता है। क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि जब रंगमंच पर ऐसी पंक्तियाँ कही जाती हैं जिन्हें हम सब सत्य मानते और स्वीकार करते हैं, तब पूरा दर्शक-वर्ग तालियों की गूँज से भर उठता है? निर्धनता बहुत-सी वस्तुओं से वंचित होती है, पर लोभ हर वस्तु से वंचित होता है। लोभी मनुष्य किसी का भी हितैषी नहीं होता। सबसे बढ़कर वह स्वयं अपने ही प्रति अहितकारी होता है।

    सबसे निकृष्ट अपराधी भी इन पंक्तियों पर ताली बजाता है और अपने ही दुर्गुणों पर किए गए प्रहार को सुनकर प्रसन्न होता है। तब ज़रा सोचो कि जब यही बातें कोई दार्शनिक कहता है। हितकारी उपदेशों को काव्य की लय में ढालकर इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वे अशिक्षित लोगों के मन में और भी गहराई तक उतर जाएँ तो उनका प्रभाव कितना अधिक होता होगाक्योंकि, जैसा कि क्लेआन्थेस कहा करते थे—

“जिस प्रकार हमारी श्वास की ध्वनि संकरे घुमावों वाली तुरही से होकर गुजरती है और उसके फैले हुए मुख से निकलकर अधिक प्रबल हो जाती है, उसी प्रकार छंद के कठोर अनुशासन में ढल जाने पर हमारे विचार भी अधिक प्रभावशाली हो उठते हैं।”

जब वही बातें साधारण गद्य में कही जाती हैं तो उन पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता और न ही वे उतना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। परंतु जब किसी उत्कृष्ट विचार के साथ छंद का निश्चित विन्यास, दीर्घ और ह्रस्व मात्राओं का क्रम जुड़ जाता है, तब वही विचार मानो अधिक शक्तिशाली भुजा द्वारा फेंका गया हो, इस प्रकार अधिक प्रभावशाली हो उठता है। धन के प्रति आसक्ति न रखने के विषय में बहुत कुछ कहा जाता है। लंबे-लंबे उपदेश दिए जाते हैं कि वास्तविक संपत्ति मन में होती है, धन-कोष में नहीं। यह कि वास्तव में धनी वही है जो अपनी निर्धनता के अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है और थोड़े में ही अपने को समृद्ध बना लेता है। किन्तु हमारे मन पर कहीं अधिक प्रभाव तब पड़ता है, जब हम इस प्रकार के पद्य सुनते हैं, जिसकी आवश्यकताएँ सबसे कम हैं, उसी मनुष्य को सबसे कम आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति जितना पर्याप्त है, उसी को चाह सकता है, उसके पास वही सब है जिसकी उसे आवश्यकता है।

    जब हम ऐसी बातें सुनते हैं तो हमें स्वीकार करना ही पड़ता है कि वे सत्य हैं। यहाँ तक कि जो लोग अपने पास जो कुछ है उससे कभी संतुष्ट नहीं होते, वे भी इन बातों की प्रशंसा करते हैं, तालियाँ बजाते हैं और ऊँचे स्वर में कहते हैं कि वे धन से घृणा करते हैं। जब तुम लोगों में ऐसी प्रतिक्रिया देखो तो अवसर का पूरा लाभ उठाओ। उन पर अपने सभी तर्कों का भार डाल दो। उन सूक्ष्म भेदों, न्याय-युक्तियों, कुतर्कों तथा अन्य चतुर किन्तु निष्फल युक्तियों को पीछे छोड़ दो। लोभ के विरुद्ध बोलो। भोग-विलास के विरुद्ध बोलो। जब तुम देखो कि तुम्हारी बातों का प्रभाव पड़ रहा है और श्रोता प्रभावित हो रहे हैं, तब और भी अधिक दृढ़ता से बोलो। तुम्हें आश्चर्य होगा कि ऐसा भाषण कितना लाभदायक सिद्ध होता है, जब उसका उद्देश्य केवल उपचार करना हो और वह पूर्णतः अपने श्रोताओं के कल्याण के लिए समर्पित हो। युवाओं के हृदयों को सम्माननीय और उचित आचरण के प्रति प्रेम की ओर मोड़ना सरल है। जब लोगों को अभी भी शिक्षा दी जा सकती है अर्थात जब वे केवल थोड़े-से ही भ्रष्ट हुए हों, तब सत्य उन पर अपना प्रभाव स्थापित कर देता है। यदि उसे कोई योग्य प्रवक्ता मिल जाए।

    जहाँ तक मेरा अपना संबंध है, जब मैं अत्तालस को दुर्गुणों, भ्रांतियों और जीवन की सभी बुराइयों के विरुद्ध अपने भाषण के उत्कर्ष पर बोलते हुए सुनता था, तब मुझे प्रायः समस्त मानव जाति पर दया आने लगती थी। मुझे लगता था कि अत्तालस एक महान व्यक्ति हैं, जो मानवीय परिस्थितियों की सर्वोच्च सीमा से भी ऊपर उठ चुके हैं। वे स्वयं कहा करते थे कि वे एक राजा हैं। पर मुझे लगता था कि वे राजा से भी बढ़कर हैं क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति थे जो राजाओं की भी निंदा कर सकते थे। जब वे निर्धनता की प्रशंसा करने लगते, यह तर्क देते हुए कि हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से अधिक की सारी संपत्ति केवल ऐसा बोझ है जो हमें दबाती है, तब मैं प्रायः व्याख्यान से निकलते समय निर्धन बन जाना चाहता था। जब वे हमारे भोग-विलास की कठोर आलोचना करते, पवित्र शरीर, संयमित आहार और निर्मल मन की प्रशंसा करते, ऐसा मन जो केवल अवैध भोगों से ही नहीं बल्कि अनावश्यक भोगों से भी मुक्त हो तब मैं भी अपने भोगी पेट पर संयम लगाने का निश्चय कर लेता था।

    ल्यूसीलियस, उस समय मैंने जो कुछ संकल्प किए थे, उनमें से कुछ आज भी मेरे साथ बने हुए हैं। उस समय मैं पूरे उत्साह के साथ आत्म-संयम के मार्ग पर चला था। जब बाद में मैंने फिर से अपेक्षाकृत सामान्य तथा सामाजिक जीवन-शैली अपना ली, तब भी उन अच्छे अभ्यासों में से कुछ को मैंने कभी नहीं छोड़ा। तब से लेकर आज तक मैंने सीप (oysters) और कुकुरमुत्ते (mushrooms) खाना छोड़ रखा है। ये वास्तव में पोषक भोजन नहीं हैं। ये तो केवल ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन हैं जो पहले से तृप्त व्यक्ति को भी और अधिक खाने के लिए उकसाते हैं। पेटू मनुष्य की यही इच्छा होती है कि वह अपनी क्षमता से अधिक पेट भरता रहे। ये पदार्थ आसानी से निगल लिए जाते हैं और उतनी ही आसानी से उल्टी होकर बाहर भी आ जाते हैं। उसी समय से मैंने सुगंधित तेलों का प्रयोग भी त्याग दिया। मेरे विचार में शरीर की सबसे उत्तम सुगंध यही है कि उसमें किसी प्रकार की कृत्रिम सुगंध न हो। तब से मैंने अपने पेट को मदिरा से भी मुक्त रखा है। जीवन भर मैंने गर्म स्नानागारों (सार्वजनिक स्नान-गृहों) से भी दूरी बनाए रखी है। मुझे लगता है कि शरीर को अत्यधिक गर्म करके फिर पसीना बहाकर उसे निचोड़ देना न तो किसी उपयोग का कार्य है और न ही संयमपूर्ण बल्कि यह विलासिता और भोग-वृत्ति का प्रतीक है। अन्य कुछ अभ्यास, जिन्हें मैंने पहले छोड़ दिया था, समय के साथ फिर मेरे जीवन में लौट आए। किंतु अब भी, यद्यपि मैं उनका पूर्ण त्याग नहीं करता, उन पर अत्यंत कठोर संयम रखता हूँ। ऐसा संयम लगभग पूर्ण विरक्ति (abstinence) के समान ही है बल्कि कई बार उससे भी अधिक कठिन होता है क्योंकि कुछ आदतों को पूरी तरह छोड़ देना उन्हें केवल सीमित कर देने की अपेक्षा अधिक सरल होता है।

    जब से मैंने तुम्हें यह बताना शुरू किया है कि युवावस्था में मैं दर्शन के प्रति जितनी उत्कटता से समर्पित था, उतनी शीघ्रता से अब वृद्धावस्था में भी उसके पीछे नहीं दौड़ता, तब मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मैं पाइथागोरस के प्रति गहरे अनुराग से अभिभूत था। सोतियोन ने मुझे बताया कि पाइथागोरस ने पशु-आहार का त्याग क्यों किया था। बाद में सेक्स्टियस ने भी ऐसा ही क्यों किया। दोनों के कारण अलग-अलग थे। परंतु दोनों ही अत्यंत प्रभावशाली थे। सेक्स्टियस का मत था कि मनुष्य बिना पशुओं का वध किए भी पर्याप्त भोजन प्राप्त कर सकता है। जब रक्तपात को स्वाद और भोग के लिए अपनाया जाता है, तब मनुष्य में क्रूरता की आदत विकसित हो जाती है। वह यह भी कहा करता था कि विलासिता के साधनों को कम करना चाहिए। वह तर्क देकर सिद्ध करता था कि भोजन में अत्यधिक विविधता हमारे शरीर की प्रकृति के अनुकूल नहीं है तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 

    दूसरी ओर, पाइथागोरस समस्त प्राणियों के परस्पर संबंध और आत्माओं के एक रूप से दूसरे रूप में गमन की बात करता था। यदि उसकी बात पर विश्वास किया जाए तो कोई भी आत्मा कभी नष्ट नहीं होती बल्कि केवल उस अत्यल्प क्षण के लिए अपनी क्रिया से विराम लेती है, जब वह एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। अंततः हम जानेंगे कि उसे फिर से मनुष्य का शरीर प्राप्त करने से पहले कितने युगों तक और कितनी बार एक निवास से दूसरे निवास में जाना पड़ता है। इस प्रकार पाइथागोरस ने मनुष्यों में दुष्कर्मों का भय उत्पन्न किया, विशेष रूप से पितृहत्या का। क्योंकि यदि किसी शरीर में उनके किसी संबंधी की आत्मा निवास कर रही हो तो वे अनजाने में ही अपने माता या पिता की आत्मा पर चाकू या अपने दाँतों से आघात कर सकते हैं। जब सोतियोन ने इन सब बातों का अपने तर्कों द्वारा विस्तार से वर्णन किया, तब उसने आगे कहा—

क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि आत्माएँ एक शरीर के बाद दूसरे शरीर में प्रवेश करती हैं। जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह वास्तव में केवल आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण है? क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि इन पालतू पशुओं, इन वन्य जीवों और इन समुद्री प्राणियों में ऐसी आत्मा निवास कर रही है जो कभी किसी मनुष्य की थी? क्या तुम यह विश्वास नहीं करते कि इस संसार में कोई भी वस्तु वास्तव में नष्ट नहीं होती बल्कि केवल अपना स्थान बदलती है। जैसे आकाशीय पिंड निश्चित कक्षाओं में निरंतर घूमते रहते हैं, वैसे ही प्राणियों की आत्माएँ भी युग-युगांतर तक चक्र लगाती रहती हैं और अंततः वहीं लौट आती हैं जहाँ से उन्होंने यात्रा आरंभ की थी? महान पुरुषों ने इन बातों पर विश्वास किया है।  अतः यदि तुम चाहो तो निर्णय देने से विरत रहो। परंतु मन को खुला रखो। यदि ये बातें सत्य हैं तो पशु-आहार का त्याग करने का अर्थ है किसी भी प्राणी को हानि न पहुँचाना। यदि ये असत्य हैं, तब भी इससे केवल मितव्ययिता का ही पालन होता है। क्रूरता का त्याग करने से तुम्हारा क्या नुकसान होगा? मैं तो केवल तुम्हें सिंहों और गिद्धों के भोजन से ही वंचित कर रहा हूँ।

    इन बातों से प्रेरित होकर मैंने पशु-आहार का त्याग कर दिया। एक वर्ष बाद यह आदत मेरे लिए न केवल सहज हो गई बल्कि आनंददायक भी लगने लगी। मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि मेरा मन पहले की अपेक्षा अधिक प्रखर और सजीव हो गया है। आज भी मुझे संदेह है कि शायद वास्तव में ऐसा ही था। क्या तुम जानना चाहोगे कि फिर मैंने इसका त्याग क्यों कर दिया? जब मैं युवा था, वह टाइबेरियस के शासन के आरंभिक वर्षों का समय था। उस समय विदेशी मूल के धर्मों का दमन किया जा रहा था। पशु-आहार से विरत रहना उन धर्मों के अनुयायी होने का प्रमाण माना जाता था। इसलिए मेरे पिता के आग्रह पर जो लोकनिंदा से नहीं डरते थे बल्कि दर्शन से ही घृणा करते थे, मैं अपनी पुरानी भोजन-प्रणाली पर लौट आया। वास्तव में, मुझे पहले की तरह अच्छा भोजन करने के लिए मनाना उनके लिए कोई कठिन काम नहीं था। अत्तालस प्रायः ऐसे बिस्तर की सिफारिश किया करते थे जो शरीर के भार से धँस न जाए। मैं आज भी, वृद्धावस्था में भी, उसी प्रकार का बिस्तर उपयोग करता हूँ। ऐसा बिस्तर जिस पर लेटने के बाद शरीर का कोई निशान नहीं रह जाता। 

    तुम्हें यह सब बताने का मेरा उद्देश्य केवल यह दिखाना था कि जब नए-नए विद्यार्थी को प्रेरित करने और उत्साहित करने वाला कोई व्यक्ति मिल जाता है, तब वह सदाचार के प्रत्येक रूप के प्रति कितनी तीव्र उत्सुकता से भर उठता है। परंतु कुछ दोष शिक्षकों की ओर से भी होता है क्योंकि वे हमें यह सिखाते हैं कि किसी विषय पर तर्क-वितर्क कैसे किया जाए, यह नहीं कि जीवन कैसे जिया जाए। कुछ दोष विद्यार्थियों की ओर से भी होता है, क्योंकि वे अपने मन को श्रेष्ठ बनाने के लिए नहीं बल्कि अपनी वाक्पटुता को निखारने के उद्देश्य से अध्ययन करने आते हैं। परिणाम यह हुआ है कि जो कभी दर्शन था, वह अब केवल भाषाशास्त्र बनकर रह गया है।

    किसी भी विद्याक्षेत्र का अध्ययन करते समय मनुष्य का उद्देश्य क्या है, इसका बहुत महत्त्व होता है। जब कोई भावी साहित्य-विद्वान वर्जिल की अपनी प्रति का अध्ययन करता है और उसकी यह उत्कृष्ट पंक्ति पढ़ता है, “समय उड़ता चला जाता है और फिर कभी लौटकर नहीं आता।” तो उसके मन में यह विचार नहीं आता कि “हमें सावधान हो जाना चाहिए। यदि हमने शीघ्रता नहीं की तो हम पीछे रह जाएँगे। यह क्षणभंगुर समय निरंतर भागा जा रहा है और हमें भी अपने साथ बहाए लिए जा रहा है। हम लापरवाही में बहते चले जा रहे हैं। हम सदा टालमटोल करते रहते हैं। अवसर तीव्र गति से निकलता जा रहा है और फिर भी हम विलंब किए जाते हैं।” नहीं, वह तो इसे केवल इस उद्देश्य से पढ़ता है कि यह देख सके कि जब-जब वर्जिल समय के तीव्र गति से बीतने की बात करता है, तब-तब वह 'उड़ता है' (fugit लैटिन शब्द जो उड़ कर जल्दी से चले जाना से संबंधित है) शब्द का ही प्रयोग करता है, जैसे कि निम्नलिखित पंक्तियों में—

“हम नश्वर प्राणियों के जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले उड़ जाते हैं। 

उनके स्थान पर रोग, दुःखद वृद्धावस्था, कष्ट और पीड़ा आ जाती है। 

अंत में कठोर तथा निर्मम मृत्यु हमें अपने साथ ले जाती है।”

    जो व्यक्ति दर्शन की ओर दृष्टि रखता है, वह इन्हीं पंक्तियों को पढ़कर उनका उचित अर्थ ग्रहण करता है। वह कहता है, “वर्जिल कभी यह नहीं कहता कि समय ‘बीतता’ है। वह सदा यही कहता है कि समय ‘उड़ता’ है। इसका कारण यह है कि उड़ना गति का सबसे तीव्र रूप है। उसका आशय यह है कि जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले हमसे दूर हो जाते हैं। फिर हम स्वयं भी उस सबसे तीव्र धावक के वेग के अनुरूप अपने कदम क्यों न बढ़ाएँ? हमारे श्रेष्ठ दिन शीघ्रता से बीतते जा रहे हैं। उनके बाद निकृष्ट दिन आने वाले हैं। हमारा जीवन एक भंडारण-पात्र के समान है। उसमें जो सबसे शुद्ध अंश होता है, वही सबसे पहले निकाल लिया जाता है। सारी तलछट तथा मटमैला अंश नीचे बैठ जाता है। क्या हम यह होने देंगे कि हमारे जीवन का सर्वोत्तम भाग दूसरों के लिए निकल जाए और अपने लिए केवल अवशेष ही बचाकर रखें? इन पंक्तियों को सदैव स्मरण रखो। इन्हें अपने लिए देववाणी के समान मानो—

“हम नश्वर प्राणियों के जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले उड़ जाते हैं।”

    सबसे अच्छे दिन ही क्यों? क्योंकि जो शेष रह जाता है, वह अनिश्चित होता है। सबसे अच्छे दिन ही क्यों? क्योंकि युवावस्था में हम सीखने में समर्थ होते हैं। उस समय हमारा मन अभी भी लचीला होता है और उसे श्रेष्ठ मार्ग की ओर मोड़ा जा सकता है। यही वह अवस्था है जो कठोर परिश्रम के लिए, अध्ययन द्वारा बुद्धि को और श्रम द्वारा शरीर को विकसित करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होती है। जो समय उसके बाद बचता है, वह अधिक धीमा, अधिक थका हुआ और जीवन के अंत के अधिक निकट होता है। इसलिए हमें अपने सभी व्यर्थ के मनोरंजनों को त्याग देना चाहिए और पूरे मन से केवल इसी एक लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम क्षणभंगुर समय की तीव्र गति को तब समझें, जब बहुत देर हो चुकी हो और उसे रोक पाना असंभव हो। हमें प्रत्येक नए दिन का इस प्रकार स्वागत करना चाहिए कि मानो वही जीवन का सबसे उत्तम दिन हो जो हमें प्राप्त होने वाला है। उसे अपने जीवन की पूँजी में जोड़ते जाना चाहिए। जीवन निरंतर उड़ता चला जा रहा है। हमें उसे पकड़ लेना चाहिए।

    जो व्यक्ति साहित्य-विद्वान की दृष्टि से पढ़ता है, वह इस बात पर विचार नहीं करता कि हमारे जीवन के सर्वोत्तम दिन सबसे पहले क्यों चले जाते हैं, कि उनके स्थान पर रोग आ जाता है, कि वृद्धावस्था। जबकि हम अब भी अपनी युवावस्था में ही मग्न रहते हैं, धीरे-धीरे हमारे सिर पर आ खड़ी होती है। इसके बजाय वह कहता है कि वर्जिल सदैव 'रोग' और 'वृद्धावस्था' शब्दों का साथ-साथ प्रयोग करता है। वास्तव में वह ऐसा करता भी है। उचित कारण से करता है क्योंकि वृद्धावस्था एक ऐसा रोग है जिसका कोई उपचार नहीं है। वह आगे कहता है, इसके अतिरिक्त, वर्जिल वृद्धावस्था के साथ एक स्थिर विशेषण का प्रयोग करता है। वह उसे ‘दुखद’ कहता है—

‘और उनके स्थान पर रोग
और दुखद वृद्धावस्था आ जाती है...’

एक अन्य स्थान पर वह कहता है—

‘जहाँ पीले पड़ चुके रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।’

    एक ही सामग्री से प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने अनुरूप विचार ग्रहण करता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। एक ही घास के मैदान में बैल घास खोजता है, कुत्ता खरगोश खोजता है और सारस छिपकली खोजता है। जब तीन व्यक्ति, एक प्राचीन वस्तुओं का अध्येता, एक साहित्य-विद्वान और एक दार्शनिक, सिसेरो की कृति ऑन द रिपब्लिक (On the Republic) को पढ़ते हैं तो उनमें से प्रत्येक का ध्यान अलग-अलग बातों पर जाता है। दार्शनिक इस बात पर आश्चर्य करता है कि न्याय के विरुद्ध इतने अधिक तर्क कैसे प्रस्तुत किए जा सकते हैं। उसी अंश को पढ़ते हुए प्राचीन वस्तुओं का अध्येता इस तथ्य पर ध्यान देता है कि रोम के दो ऐसे राजा थे, जिनमें से एक का कोई पिता नहीं था और दूसरे की कोई माता नहीं थी। सर्वियस की माता के विषय में कोई निश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है। एन्कस के विषय में यह नहीं कहा जाता कि उसका कोई पिता था। केवल इतना कहा जाता है कि वह नूमा का पौत्र था। 

    वह यह भी उल्लेख करता है कि जिस पदाधिकारी को हम आज 'तानाशाह' (dictator) कहते हैं, उसे प्राचीन काल में 'जनता का प्रधान' (master of the populace) कहा जाता था। इसका प्रमाण आज भी ऑगरों के अभिलेखों में मिलता है। इसका एक और प्रमाण यह है कि तानाशाह द्वारा नियुक्त अधिकारी को 'अश्वदल का प्रधान' (master of horse) कहा जाता है। वह यह भी इंगित करता है कि रोम्यूलस की मृत्यु सूर्यग्रहण के समय हुई थी। राजतंत्र के काल में भी जनता के समक्ष अपील करने की व्यवस्था विद्यमान थी। इसका उल्लेख पोंटिफ़ों के अभिलेखों में भी मिलता है। फेनेस्टेला तथा कुछ अन्य लेखक भी इसी मत का समर्थन करते हैं। 

    जब साहित्य-विद्वान इन्हीं ग्रंथों की व्याख्या करता है तो वह सबसे पहले यह बताता है कि सिसेरो ने 'वास्तव में' (re ipsa) के स्थान पर रिप्से (reapse) और 'स्वयं' (se ipse) के स्थान पर 'सेप्से' (sepse) शब्दों का प्रयोग किया है। इसके बाद वह भाषा-प्रयोग में समय के साथ आए परिवर्तनों की चर्चा करता है। उदाहरण के लिए, सिसेरो लिखता है, “उसके हस्तक्षेप ने हमें फिर से उसी लाइम लाइन (lime line) तक लौटा दिया,” अर्थात दौड़ की समाप्ति-रेखा तक। जिसे हम आज दौड़ की चॉक लाइन (chalk line) कहते हैं, उसे प्राचीन लेखक लाइम लाइन अथवा चुने की रेखा (lime line) कहा करते थे। इसके बाद वह एनियस की विभिन्न पंक्तियाँ एकत्र करता है, विशेषकर वे जो स्किपियो अफ़्रीकानस के विषय में हैं—

“जिसकी सहायता का मूल्य
न तो कोई नागरिक चुका सकता था,
और न ही कोई शत्रु।”

    इन पंक्तियों के आधार पर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि प्राचीन लेखकों के यहाँ ऑप्स (ops - सहायता) शब्द का अर्थ केवल 'सहायता' ही नहीं बल्कि 'प्रयत्न' या 'परिश्रम' भी होता था। क्योंकि एनियस का आशय यह है कि न तो कोई नागरिक और न ही कोई शत्रु, स्किपियो के परिश्रम का मूल्य कभी चुका सकता था। इसके बाद वह यह जानकर स्वयं को बधाई देता है कि उसे वर्जिल की इस पंक्ति का स्रोत मिल गया है—

“जिसके ऊपर स्वर्ग का विशाल द्वार गर्जना करता है।”

वह कहता है कि एनियस ने यह पंक्ति होमर से ली थी। वर्जिल ने उसे एनियस से ग्रहण किया क्योंकि सिसेरो ने अपनी उसी कृति On the Republic में एनियस का यह द्विपद उद्धृत किया है—

“यदि किसी मनुष्य के लिए स्वर्ग पर चढ़ना उचित है,
तो केवल मेरे लिए ही स्वर्ग का महान द्वार खुला है।”

    परंतु मेरा अपना उद्देश्य न तो प्राचीन वस्तुओं का अध्येता बनना है और न ही साहित्य-विद्वान। मेरा कार्य कुछ और ही है। मैं केवल यह सलाह देता हूँ कि जब हम दार्शनिकों को पढ़ें या उन्हें सुनें, तब हमारा ध्यान अपने उस लक्ष्य पर केंद्रित होना चाहिए, जो सुखमय जीवन की प्राप्ति है। हमें प्राचीन शब्दों, नए गढ़े गए शब्दों, विचित्र रूपकों और अलंकारों की खोज में नहीं लगे रहना चाहिए बल्कि ऐसे हितकारी उपदेशों तथा साहस और प्रेरणा से परिपूर्ण वचनों की तलाश करनी चाहिए जिन्हें हम शीघ्र ही अपने जीवन में व्यवहार में ला सकें। हमें उन्हें इतनी अच्छी तरह आत्मसात कर लेना चाहिए कि हमारे शब्द कर्म में परिवर्तित हो जाएँ।

    परंतु जिन लोगों ने मानवजाति के साथ सबसे बड़ा अहित किया है, उनमें सबसे बुरे वे हैं जो दर्शन को किसी व्यवसाय या शिल्प की भाँति धन लेकर सिखाते हैं। स्वयं अपना जीवन अपनी ही शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत ढंग से जीते हैं क्योंकि जिन दोषों की वे दूसरों में निंदा करते हैं, उन्हीं दोषों के वे स्वयं प्रत्यक्ष उदाहरण होते हैं। इस प्रकार वे यह भली-भाँति सिद्ध कर देते हैं कि उनकी शिक्षा कितनी निष्फल है। 

    ऐसी शिक्षा से मुझे उतना ही लाभ हो सकता है जितना उस नाविक से, जिसे समुद्र में तूफ़ान आने पर स्वयं समुद्री बीमारी घेर ले। जब लहरें तीव्र वेग से उठ रही हों, पतवार को दृढ़ता से थामने वाला हाथ चाहिए हो, समुद्र की प्रचंड शक्ति से संघर्ष करना पड़े और प्रबल हवा में पाल समेटने हों, तब ऐसे नाविक का क्या उपयोग जो स्वयं घबराकर उल्टियाँ करने लगे? जीवन तो किसी भी समुद्री यात्रा की अपेक्षा कहीं अधिक भीषण तूफ़ानों से घिरा हुआ है। मुझे ऐसा व्यक्ति नहीं चाहिए जो केवल उपदेश देता रहे। मुझे ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मेरा मार्गदर्शन कर सके। 

    वे जो कुछ कहते हैं, श्रोताओं की भीड़ के सामने जो भी सुंदर भाषण देते हैं, वह सब किसी और से लिया हुआ होता है। वे शब्द प्लेटो, ज़ेनो, क्रिसिपस, पोसिडोनियस अथवा दर्शन के अन्य महान आचार्यों के होते हैं। वे यह कैसे सिद्ध करेंगे कि वे विचार वास्तव में उनके अपने हैं? मैं बताता हूँ, वे तभी ऐसा सिद्ध कर सकते हैं, जब वे स्वयं अपने उपदेशों के अनुसार जीवन व्यतीत करें। 

    अब मैं वह सब कह चुका हूँ जो मैं तुम्हें बताना चाहता था। अब मैं तुम्हारे अनुरोध का पालन करूँगा। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं एक नए पत्र में दूँगा ताकि किसी ऐसे कठिन विषय को पढ़ते समय, जिसके लिए गंभीर और एकाग्र मन से सुनना आवश्यक है, तुम अनावश्यक रूप से थक न जाओ।


अभी के लिए विराम 


No comments:

Post a Comment

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...