प्रिय लूसीलियस
मैं नोमेन्टम स्थित अपने निवास (विला) में भाग आया हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि मैं नगर से बचने के लिए ऐसा कर रहा हूँ? नहीं, मैं उस बुखार से बचना चाहता था जो धीरे-धीरे मुझ पर चढ़ रहा था और जिसने मुझे अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया था। मेरे चिकित्सक का कहना था कि इसका आरंभ तेज़ और अनियमित नाड़ी से हो चुका है। इसलिए मैंने तुरंत अपनी गाड़ी तैयार करने का आदेश दिया। मेरी प्रिय पौलीना ने मुझे रोकने का बहुत प्रयास किया, फिर भी मैं प्रस्थान करने पर अडिग रहा। मैं केवल वही बात दोहरा रहा था जो मेरे गुरु गैलियो ने उस समय कही थी, जब यूनान में उन्हें बुखार आने वाला था। वे तुरंत जहाज़ पर सवार हो गए और बार-बार कहते रहे कि उनकी बीमारी उनके शरीर के कारण नहीं बल्कि उस स्थान के कारण है। मैंने यही बात पौलीना से भी कही। वह मेरे स्वास्थ्य को लेकर अत्यंत चिंतित रहती है। वास्तव में, यह जानकर कि उसका जीवन और उसकी आत्मा पूरी तरह मेरी आत्मा से जुड़ी हुई है, अब मैं उसके कारण अपने स्वास्थ्य की भी चिंता करने लगा हूँ। बढ़ती आयु ने मुझे अनेक परिस्थितियों का सामना करने में अधिक दृढ़ बना दिया है। पर इस एक मामले में मैं अपनी वृद्धावस्था का लाभ खो बैठता हूँ। अब मुझे लगता है कि इस वृद्ध शरीर के भीतर अभी भी एक ऐसा युवा मनुष्य रहता है जिसे कुछ लाड़-प्यार और संरक्षण की आवश्यकता है। चूँकि मैं उसे यह नहीं समझा पाता कि वह मुझे प्रेम करते हुए कुछ अधिक साहस दिखाए। इसलिए अंततः वही मुझ पर यह प्रभाव डाल देती है कि मैं अपने ही जीवन और स्वास्थ्य का पहले से अधिक सावधानीपूर्वक ध्यान रखूँ।
देखो, सम्माननीय भावनाओं के आगे कभी-कभी झुकना ही पड़ता है। ऐसे अवसर आते हैं जब किसी प्रियजन के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए मनुष्य को, चाहे कितनी ही पीड़ा क्यों न हो, अपने प्राण छोड़ती हुई साँसों को भी वापस बुलाना पड़ता है और मानो उन्हें अपने मुख में ही रोककर रखना पड़ता है। एक सज्जन मनुष्य को उतने समय तक नहीं जीना चाहिए जितना उसे अच्छा लगे बल्कि उतने समय तक जीना चाहिए जितना उसका कर्तव्य अपेक्षा करता है। जो व्यक्ति अपनी पत्नी या अपने मित्र के लिए अपना जीवन कुछ और लंबा करने को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता और मरने पर ही अड़ा रहता है, वह वास्तव में अत्यंत आत्मलिप्त है। जब प्रियजनों का हित इसकी माँग करे, तब मनुष्य को अपने मन से यह अपेक्षा करनी चाहिए कि यदि वह केवल मरना ही नहीं चाहता बल्कि मरने की प्रक्रिया आरम्भ भी कर चुका हो, तब भी वह उसे रोक दे और स्वयं को उनके हित के लिए समर्पित कर दे।
दूसरे के लिए जीवन की ओर लौट आना एक महान आत्मा का लक्षण है। महान व्यक्तियों ने अनेक बार ऐसा किया है। इसके अतिरिक्त, यदि तुम्हें यह ज्ञात हो कि तुम्हारा सावधानीपूर्वक जीवित रहना तुम्हारे किसी प्रियजन को प्रसन्न करता है, उसके लिए उपयोगी है और उसकी हार्दिक इच्छा भी यही है तो मुझे लगता है कि अपनी वृद्धावस्था में अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना अत्यंत उदात्त और करुणामय आचरण है। यद्यपि जीवन के इस पड़ाव पर अपने अस्तित्व के प्रति कुछ अधिक निश्चिंत हो जाना और जीवन जीने के ढंग में कुछ अधिक निर्भीक होना भी अपने आप में बड़ा सुखद लगता है। इसके अलावा, अपने प्रति ऐसी सावधानी महान आनंद और पुरस्कार भी साथ लाती है। भला इससे अधिक सुखद और क्या हो सकता है कि तुम अपनी पत्नी को इतने प्रिय हो कि उसी कारण तुम स्वयं भी अपने लिए अधिक प्रिय बन जाओ? इस प्रकार मेरी पौलीना मुझे केवल अपनी आशंकाओं का ही नहीं बल्कि मेरी अपनी चिंताओं का भी भार उठाने के लिए विवश कर देती है।
मुझे लगता है कि तुम यह जानने के इच्छुक होगे कि मेरी यह यात्रा कितनी सफल रही। जैसे ही मैं नगर के भारी और दूषित वातावरण से दूर हुआ तथा उन रसोइयों के धुएँ और दुर्गंध से मुक्त हुआ, जहाँ जलती हुई आग के साथ हानिकारक धुआँ और धूल बाहर निकलते रहते हैं, वैसे ही मैंने अपने स्वास्थ्य में तत्काल परिवर्तन अनुभव किया। तुम कल्पना कर सकते हो कि जब मैं अपने अंगूर के बागों में पहुँचा तो मेरी शक्ति कितनी बढ़ गई होगी। चरागाह में छोड़े गए किसी पशु की भाँति मैं पूरे उत्साह से भोजन पर टूट पड़ा। परिणाम यह हुआ कि अब मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ। मेरे शरीर की दुर्बलता और मन की शिथिलता का नामोनिशान नहीं रहा। अब मैं फिर से पूरी एकाग्रता के साथ अपने अध्ययन में लगने लगा हूँ।
किन्तु इसके लिए केवल स्थान बदल लेना किसी काम का नहीं, जब तक कि मन स्वयं अपने लिए समय निकालना न सीख ले और व्यस्ततम क्षणों के बीच भी अपने भीतर एक ऐसा आश्रय-स्थल सुरक्षित न रखे जहाँ वह विश्राम कर सके। इसके विपरीत, यदि तुम अवकाश की खोज में हमेशा दूर-दराज़ स्थानों का चयन करते रहोगे तो हर जगह तुम्हें कोई-न-कोई ऐसी वस्तु मिल जाएगी जो तुम्हारा ध्यान भटका देगी। कहा जाता है कि एक व्यक्ति ने सुकरात से शिकायत की कि यात्राओं से उसे कोई लाभ नहीं हुआ। इस पर सुकरात ने उत्तर दिया, “ऐसा होना स्वाभाविक ही था क्योंकि यात्रा के दौरान तुम स्वयं को भी अपने साथ ले गए थे।” यदि कुछ लोग स्वयं से दूर जा सकते तो उनका जीवन कितना बेहतर हो जाता! उनके सारे दबाव, चिंताएँ, कमज़ोरियाँ और भय उनके अपने ही भीतर से उत्पन्न होते हैं। समुद्र पार करने या किसी दूसरे नगर में जाकर बसने से क्या लाभ, यदि तुम अपने कष्टों से छुटकारा पाना चाहते हो? तुम्हें किसी दूसरे स्थान पर नहीं बल्कि स्वयं एक भिन्न मनुष्य बनना होगा। कल्पना करो कि तुम एथेंस या रोड्स पहुँच गए हो या अपनी इच्छा से कोई भी नगर चुन लो। उस स्थान का स्वभाव तुम्हारे लिए क्या परिवर्तन ला देगा? तुम तो अपना स्वभाव अपने साथ ही लेकर जाओगे।
तुम अब भी धन को एक परम शुभ वस्तु मानोगे और उस चीज़ से पीड़ित रहोगे जिसे तुम भ्रमवश और अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अपनी निर्धनता समझते हो। तुम्हारे पास चाहे जितनी भी संपत्ति हो, यदि किसी दूसरे के पास तुमसे अधिक होगी तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पास उतनी ही कमी है जितनी उससे तुम्हारी संपत्ति कम है। तुम सार्वजनिक पद और प्रतिष्ठा को भी अभी तक एक महान उपलब्धि मानते रहोगे। इसलिए जब एक व्यक्ति कौंसल चुना जाएगा और दूसरा पुनः उसी पद पर निर्वाचित होगा तो तुम्हारा मन व्याकुल हो उठेगा। जब भी तुम सरकारी अभिलेखों में किसी का नाम बार-बार अंकित देखोगे, तुम्हारे भीतर ईर्ष्या जाग उठेगी। सफलता पाने का तुम्हारा उन्माद इतना प्रबल बना रहेगा कि यदि कोई तुमसे आगे निकल जाए तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे पीछे कोई भी नहीं है।
तुम मृत्यु को अब भी सबसे बड़ी बुराई मानते रहोगे। जबकि मृत्यु में सबसे बुरी बात स्वयं मृत्यु नहीं बल्कि उससे पहले का भय है। तुम केवल वास्तविक खतरों से ही नहीं बल्कि उनकी मात्र आशंकाओं से भी आतंकित रहोगे और निरंतर काल्पनिक भय तथा मन की कल्पनाओं से व्याकुल बने रहोगे। तुम्हें इससे क्या लाभ होगा कि तुम आर्गोस के अनेक नगरों से बचकर निकल आए और शत्रुओं के बीच से अपना मार्ग बनाते हुए भाग निकले? शांति भी तुम्हारे भीतर भय उत्पन्न कर देगी। एक बार जब मन भय के आगे समर्पण कर देता है, तब सुरक्षित परिस्थितियों में भी उसका आत्मविश्वास टिक नहीं पाता। निरर्थक चिंताओं का अभ्यस्त हो जाने के कारण वह अपनी ही सुरक्षा सुनिश्चित करने की क्षमता खो बैठता है। तब वह खतरे का बुद्धिमानी से सामना नहीं करता बल्कि उससे भागता है। जबकि वास्तव में हम खतरों के प्रति सबसे अधिक असुरक्षित तभी हो जाते हैं, जब हम उनका सामना करने के बजाय उनसे मुँह मोड़ लेते हैं।
तुम अपने किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु या उससे बिछुड़ जाने को अब भी जीवन का सबसे बड़ा आघात मानते रहोगे। जबकि ऐसा करना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना अपने घर को सुशोभित करने वाले सुंदर वृक्षों से पत्तों के झड़ने पर विलाप करना। जो कुछ भी तुम्हें प्रिय है, उसे उसी दृष्टि से देखो, जिस दृष्टि से तुम हरे-भरे पत्तों को देखते हो जब तक वे बने रहें, उनका आनंद लो। समय बीतने के साथ उनमें से कुछ न कुछ अवश्य झड़ जाएगा। पर उनका खो जाना सहना कठिन नहीं होता क्योंकि नए पत्ते फिर उग आते हैं। तुम्हारे प्रियजनों के बिछुड़ जाने का भी यही स्वरूप है जिन्हें तुम अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख मानते हो। उनका स्थान दूसरे लोग ले सकते हैं। हालाँकि वे वही व्यक्ति बनकर पुनः जन्म नहीं लेते।
“लेकिन वे वही व्यक्ति नहीं होंगे।” और तुम स्वयं भी तो वही नहीं रहोगे। प्रत्येक दिन तुम्हें बदल देता है, और प्रत्येक घंटा भी। अंतर केवल इतना है कि जब दूसरे लोग हमसे छिन जाते हैं, तब वह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। पर अपने ही भीतर होने वाला परिवर्तन हमारी दृष्टि से ओझल रहता है क्योंकि वह बाहर से दिखाई नहीं देता।दूसरे लोग हमसे छिन जाते हैं। लेकिन उसी समय हम स्वयं भी धीरे-धीरे, बिना जाने, अपने आप से छिनते जा रहे होते हैं। तुम्हें इन परिवर्तनों का बोध नहीं होगा, न ही तुम इन दुखों का कोई उपचार कर सकोगे। फिर भी तुम कुछ बातों की आशा करके और कुछ से निराश होकर स्वयं अपने लिए कष्ट उत्पन्न करते रहोगे। बुद्धिमानी इसी में है कि इन दोनों का संतुलन बनाए रखा जाए। न तो संदेह के बिना आशा करो और न ही आशा के बिना संदेह।
यात्रा अपने आप में किसी मनुष्य के लिए क्या कर सकी है? वह न तो भोग-विलास पर नियंत्रण रखती है, न इच्छाओं को संयमित करती है, न क्रोध के आवेगों को रोकती है और न ही प्रेम के उग्र आक्रमणों को शांत करती है। संक्षेप में, वह मन के किसी भी विकार को दूर नहीं करती। वह न तो विवेक प्रदान करती है और न ही भ्रांतियों का निवारण करती है। वह केवल दृश्य बदल देती है, जिससे थोड़ी देर के लिए हमारा ध्यान उसी प्रकार बँधा रहता है, जैसे कोई नया खिलौना किसी बच्चे का मन बहला देता है। इसके अतिरिक्त, यात्रा उस मन की चंचलता को और बढ़ा देती है, जो पहले से ही अस्वस्थ हो। वास्तव में, रथ की गति ही हमें अधिक बेचैन और चिड़चिड़ा बना देती है। परिणाम यह होता है कि जो लोग किसी स्थान पर जाने के लिए अत्यंत उत्सुक थे, वे वहाँ से लौटने के लिए उससे भी अधिक उत्सुक हो जाते हैं। वे उन पक्षियों के समान होते हैं जो एक डाल से दूसरी डाल पर उड़ जाते हैं और जितनी शीघ्रता से आए थे, उससे भी अधिक शीघ्रता से वहाँ से चले जाते हैं। यात्रा तुम्हें विभिन्न जातियों और समुदायों से परिचित कराएगी। वह तुम्हें विचित्र आकार वाले पर्वत, अपरिचित मैदान और कभी न सूखने वाली धाराओं से सिंचित घाटियाँ दिखाएगी। वह तुम्हें कुछ नदियों की विशेषताओं का भी ज्ञान कराएगी जैसे, नील नदी का ग्रीष्म ऋतु में बाढ़ के साथ उफान पर आना। टाइग्रिस नदी का कुछ दूरी तक भूमिगत बहने के बाद दृष्टि से ओझल हो जाना और फिर पूर्ण वेग के साथ पुनः प्रकट होना अथवा मीयांडर नदी का बार-बार घुमाव लेना। एक ऐसा विषय जिसे कवि बड़े चाव से अलंकृत करते हैं और अनेक बार अपने ही प्रवाह के निकट लौट आने के बाद फिर आगे बढ़ जाना। किंतु यह सब तुम्हें न शरीर से बेहतर बनाएगा और न ही मन से।
हमें अपना समय अध्ययन में और ज्ञानियों के प्रामाणिक उपदेशों के अध्ययन में लगाना चाहिए ताकि जो बातें पहले ही खोजी जा चुकी हैं उन्हें सीख सकें। जिनका अभी तक पता नहीं चला है उनकी खोज कर सकें। यही वह मार्ग है जिसके द्वारा मन को उसकी दयनीय दासता से मुक्त करके स्वतंत्रता प्राप्त कराई जा सकती है। परंतु जब तक तुम्हें यह ज्ञान नहीं है कि किससे बचना चाहिए और किसका अनुसरण करना चाहिए। जब तक तुम न्याय और अन्याय, सम्माननीय और अपमानजनक के भेद से अनभिज्ञ हो, तब तक तुम वास्तव में यात्रा नहीं कर रहे होते बल्कि केवल भटक रहे होते हो। तुम्हारा इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान भागते फिरना तुम्हें कोई लाभ नहीं पहुँचाएगा क्योंकि तुम अपनी भावनाओं को भी अपने साथ लेकर यात्रा कर रहे हो। तुम्हारे कष्ट भी तुम्हारे साथ-साथ चलते हैं। बल्कि मेरी तो यह कामना है कि वे तुम्हारा केवल पीछा कर रहे होते क्योंकि तब वे तुमसे कुछ दूर तो रहते! किंतु वास्तविकता यह है कि तुम उनसे आगे नहीं निकल रहे बल्कि उन्हें अपनी पीठ पर ढो रहे हो। तुम जहाँ कहीं भी जाते हो, वही जलाने वाली व्याकुलताएँ तुम्हारे ऊपर बोझ बनी रहती हैं।
रोगी व्यक्ति को किसी स्थान की नहीं बल्कि उपचार की आवश्यकता होती है। यदि किसी का पैर टूट जाए या कोई जोड़ अपनी जगह से खिसक जाए तो वह न रथ पर चढ़ता है और न जहाज़ पर। वह किसी वैद्य को बुलाता है ताकि वह टूटी हुई हड्डी को जोड़ दे या खिसके हुए जोड़ को उसके स्थान पर बैठा दे। क्या तुम समझते हो कि जब मन इतने स्थानों पर टूट-फूट गया हो और विकृत हो गया हो, तब केवल स्थान बदलने से वह स्वस्थ हो जाएगा? तुम्हारा रोग इतना गंभीर है कि उसका उपचार इधर-उधर घूमने से नहीं हो सकता। यात्रा किसी को न वैद्य बनाती है और न वक्ता। कोई भी कला केवल स्थान बदलने से नहीं सीखी जाती। तो क्या तुम यह समझते हो कि सभी कलाओं में सर्वोच्च, प्रज्ञा... यात्रा करते-करते प्राप्त हो जाएगी? मुझ पर विश्वास करो, ऐसी कोई यात्रा नहीं है जो तुम्हें इच्छाओं, क्रोध के आवेगों और भय से परे पहुँचा सके। यदि ऐसा होता तो समूची मानव जाति वहाँ झुंड के झुंड पहुँच चुकी होती। जब तक तुम अपने कष्टों के कारणों को अपने साथ लिए संसार भर में भटकते फिरोगे, तब तक वे कष्ट तुम्हें सताते और पीड़ा पहुँचाते रहेंगे। क्या तुम्हें आश्चर्य होता है कि भागते रहने से तुम्हें कोई लाभ नहीं हो रहा? जिससे तुम भाग रहे हो, वही तुम्हारे साथ है। तुम्हें अपने दोषों को सुधारना होगा, अपने ऊपर लदे बोझ को उतार फेंकना होगा और अपनी इच्छाओं को स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखना होगा। अपने मन से समस्त दुष्टता का निष्कासन कर दो।
यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी यात्राएँ सुखद हों तो इस बात का ध्यान रखो कि तुम किन लोगों की संगति करते हो। जब तक तुम्हारा साथ लोभी और कृपण लोगों के साथ रहेगा, तब तक लोभ तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा। जब तक तुम अभिमानी लोगों के बीच रहोगे, तब तक अहंकार भी तुमसे चिपका रहेगा। यदि तुम किसी जल्लाद को अपना घनिष्ठ मित्र बना लोगे तो तुम क्रूरता से मुक्त नहीं हो सकोगे। व्यभिचारियों की संगति तुम्हारी वासनाओं को और अधिक भड़काएगी। यदि तुम सचमुच अपने दुर्गुणों से मुक्त होना चाहते हो तो तुम्हें उन लोगों के आचरण से दूर रहना होगा जिनमें वे दुर्गुण विद्यमान हैं। यदि कोई कृपण, व्यभिचारी, क्रूर या छल करने वाला व्यक्ति तुम्हारे निकट रहे तो वह तुम्हें बहुत हानि पहुँचाएगा। पर वास्तविकता यह है कि ये सब दोष पहले से ही तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। इसलिए अपने आदर्शों को श्रेष्ठ बनाओ। या तो दोनों कैटो में से किसी एक के साथ रहो या लेलियस अथवा ट्यूबेरो के साथ और यदि तुम यूनानियों की संगति पसंद करते हो तो सुकरात या ज़ेनो के साथ समय बिताओ। पहले तुम्हें सिखाएँगे कि आवश्यकता पड़ने पर कैसे मरना चाहिए। दूसरे यह कि आवश्यकता आने से पहले ही मृत्यु के लिए कैसे तैयार हो जाना चाहिए। क्रिसिपस या पोसिडोनियस की संगति में रहो। वे तुम्हें मानवीय और दैवीय विषयों का ज्ञान देंगे। वे तुम्हें यह सिखाएँगे कि तुम्हारा परिश्रम मधुर वाणी बोलने और अपने शब्दों से लोगों को मोहित करने में नहीं बल्कि अपने मन को दृढ़ बनाने और उसे विपत्तियों का सामना करने योग्य कठोर बनाने में होना चाहिए।
हमारे इस तूफ़ानी और अशांत जीवन के लिए केवल एक ही सुरक्षित आश्रय है, भविष्य की घटनाओं से ऊपर उठ जाना, दृढ़ता से खड़े रहना और भाग्य के प्रहारों का खुले रूप से, बिना विचलित हुए, सीधे सामना करने के लिए सदैव तैयार रहना। प्रकृति ने हमें साहसी बनने के लिए उत्पन्न किया है। उसने कुछ प्राणियों को उग्र बनाया, कुछ को चतुर और कुछ को भयभीत। पर मनुष्य को उसने एक गौरवपूर्ण और उदात्त आत्मा प्रदान की है, जो यह नहीं खोजती कि सबसे अधिक सुरक्षित कहाँ रहा जाए बल्कि यह खोजती है कि सबसे अधिक सम्मानपूर्वक कहाँ जिया जाए। यह आत्मा उस विराट विश्वात्मा के अत्यंत निकट है, जिसका वह अनुसरण करती है और जहाँ तक नश्वर मनुष्य की सामर्थ्य पहुँच सकती है, उसके समान बनने का प्रयत्न करती है। ऐसी आत्मा निरंतर उन्नति करती है। उसे विश्वास रहता है कि वह प्रशंसा और सम्मान की अधिकारी है। वह प्रत्येक वस्तु पर अधिकार रखती है और प्रत्येक वस्तु से श्रेष्ठ है। इसलिए उसे किसी भी वस्तु के अधीन नहीं होना चाहिए और न ही किसी ऐसी बात को इतना भारी समझना चाहिए कि वह मनुष्य को दबा सके, "मृत्यु और दुःख, ये केवल देखने में ही भयावह प्रतीत होते हैं।"
यदि मनुष्य उनका पूरी तरह सामना कर सके और उनके अँधेरे को भेदकर निकल जाए तो वे तनिक भी भयावह नहीं रह जाते। बहुत-सी वस्तुएँ जो रात में डरावनी प्रतीत होती हैं। दिन के उजाले में हास्यास्पद लगती हैं। “मृत्यु और दुःख, देखने में भयावह प्रतीत होने वाले रूप।” हमारे कवि वर्जिल ने यह बात अत्यंत सुंदर ढंग से कही है। उन्होंने उन्हें वास्तव में नहीं बल्कि 'दिखने में' भयावह कहा अर्थात वे भयावह प्रतीत तो होते हैं पर वास्तव में नहीं होते। मैं फिर पूछता हूँ, इन बातों में वास्तव में ऐसा क्या भयानक है, जैसा लोग सामान्यतः मानते हैं? लूसीलियस, मैं तुमसे पूछता हूँ, मनुष्य होकर परिश्रम से क्यों डरना चाहिए? मनुष्य होकर मृत्यु से क्यों भयभीत होना चाहिए? मैं अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जो यह मानते हैं कि जो काम वे स्वयं नहीं कर सकते, वह असंभव है। वे कहते हैं कि हमारे स्टोइक सिद्धांत मानव-स्वभाव की क्षमता से परे हैं। किन्तु मेरा मनुष्य के बारे में विचार इससे कहीं अधिक ऊँचा है। मनुष्य वास्तव में इन बातों को करने में समर्थ है। पर वह उन्हें करना नहीं चाहता। जिसने भी सच्चे मन से प्रयास किया है, क्या उसने कभी इस कार्य को अपनी शक्ति से परे पाया है? क्या उसे यह कार्य करते समय सदैव अपेक्षा से अधिक सरल नहीं लगा? वस्तुओं की कठिनाई हमारे आत्मविश्वास को नष्ट नहीं करती बल्कि हमारे आत्मविश्वास की कमी ही वस्तुओं को कठिन बना देती है।
यदि तुम्हें किसी आदर्श की आवश्यकता हो तो सुकरात को देखो, एक अत्यंत धैर्यवान वृद्ध। उन्होंने हर प्रकार के कष्ट सहे। फिर भी न तो निर्धनता ने उन्हें पराजित किया (हालाँकि उनके घरेलू क्लेशों ने उसे और भी कठिन बना दिया था) और न ही उन शारीरिक परिश्रमों ने जिन्हें उन्हें सहना पड़ा, जिनमें सैनिक सेवा भी सम्मिलित थी।घर में भी वे अनेक कठिनाइयों से घिरे रहे, चाहे हम उनकी असभ्य और कटुभाषिणी पत्नी को देखें या उनके उन बच्चों को, जिन्हें शिक्षा देना असंभव था और जो अपने पिता की अपेक्षा अपनी माता के अधिक समान थे। घर के बाहर उनका जीवन या तो युद्ध में बीता या अत्याचारपूर्ण शासन के अधीन अथवा ऐसी स्वतंत्रता में जो युद्ध और अत्याचारियों से भी अधिक क्रूर सिद्ध हुई। युद्ध सत्ताईस वर्षों तक चला। उसके समाप्त होने पर राज्य तीस अत्याचारियों के शासन के अधीन आ गया, जिनमें से अनेक व्यक्तिगत रूप से सुकरात के शत्रु थे। अंततः उन पर सबसे गंभीर अपराधों का अभियोग लगाया गया। उन पर धर्म को नष्ट करने तथा युवाओं को देवताओं, अपने माता-पिता और राज्य के विरुद्ध भड़काकर उन्हें भ्रष्ट करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद कारावास और हेमलॉक का विषपान आया। इन सबका सुकरात के मन पर इतना भी प्रभाव नहीं पड़ा कि उनके चेहरे के भाव तक बदल जाते। यह कितना विलक्षण और अनुपम गुण था! जीवन के अंतिम क्षण तक किसी ने भी सुकरात को न तो सामान्य से अधिक प्रसन्न देखा और न ही कम प्रसन्न। भाग्य के अत्यंत तीव्र उतार-चढ़ावों के बीच भी वे सदा एक समान बने रहे।
क्या तुम दूसरा आदर्श भी देखना चाहोगे? तो युवा कैटो को देखो, जिस पर भाग्य के आघात अधिक प्रबल और अधिक निरंतर हुए। प्रत्येक अवसर पर और अंततः अपनी मृत्यु के समय भी, कैटो ने यह सिद्ध किया कि एक साहसी मनुष्य भाग्य को चुनौती देते हुए जी भी सकता है और मर भी सकता है। उसने अपना समूचा जीवन या तो गृहयुद्धों में एक सैनिक के रूप में बिताया अथवा ऐसी शांति के समय में, जो पहले से ही गृहयुद्ध को जन्म दे रही थी। तुम कह सकते हो कि उसने भी, सुकरात की भाँति, दासों के बीच स्वतंत्रता के प्रति स्वयं को समर्पित कर दिया था। यदि तुम यह नहीं मानते कि पोम्पेई, सीज़र और क्रैसस स्वतंत्रता के सहयोगी थे। राजनीतिक परिस्थितियाँ चाहे जितनी बार बदलीं, किसी ने भी कैटो के चरित्र में कभी कोई परिवर्तन नहीं देखा। चाहे वह किसी पद पर निर्वाचित हुआ हो या पराजित, अभियोजक के रूप में हो या किसी प्रांत में, चाहे राजनीतिक भाषण दे रहा हो, सेना में हो या मृत्यु का सामना कर रहा हो। हर परिस्थिति में उसका चरित्र एक-सा बना रहा।संक्षेप में, जब राष्ट्र गहन संकट में था। एक ओर सीज़र अपनी पूर्ण शक्ति से सुसज्जित दस सेनाओं और अनेक विदेशी राष्ट्रों के समर्थन के साथ खड़ा था और दूसरी ओर पोम्पेई था, तब कैटो उन सबके विरुद्ध अकेला खड़े होने के लिए तैयार था। जब एक पक्ष सीज़र की ओर झुक रहा था और दूसरा पोम्पेई की ओर, तब केवल कैटो ही ऐसा था जिसने गणराज्य का पक्ष लिया। यदि तुम उस समय की मानसिक छवि बनाना चाहते हो तो एक ओर समूची सामान्य जनता की कल्पना करो। साधारण लोग, जो विद्रोह के लिए उत्साहित थे, दूसरी ओर सर्वोच्च कुलीन और अश्वारोही वर्ग, अर्थात राज्य के सबसे प्रतिष्ठित लोग और इनके बीच केवल दो अवशेष, गणराज्य और कैटो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ, जब तुम यह दृश्य देखोगे, तब तुम्हें यह पंक्ति स्मरण आएगी, “अत्रेयुस का पुत्र, प्रियम और उन दोनों का संहारक— अकिलीस।”
दोनों पक्षों की निंदा होती है और दोनों के हाथों से उनके अस्त्र मानो छिन जाते हैं, जब कैटो दोनों के विषय में अपना निर्णय प्रकट करता है। वह कहता है, “यदि सीज़र विजयी हुआ तो मैं मृत्यु को चुनूँगा। यदि पोम्पेई विजयी हुआ तो मैं निर्वासन स्वीकार करूँगा।” ऐसे व्यक्ति को भय किस बात का हो सकता था? उसने अपनी पराजय और विजय, दोनों ही स्थितियों के लिए अपने लिए ऐसे कठोर परिणाम पहले ही निश्चित कर लिए थे, जैसे उसके सबसे कट्टर शत्रु भी उसके लिए निर्धारित कर सकते थे। अंततः वह अपनी ही आज्ञा के अनुसार मरा।
इस प्रकार तुम देख सकते हो कि मनुष्य परिश्रम सहने में समर्थ है। कैटो ने अफ्रीका के निर्जन मरुस्थलों के बीच अपनी सेना का नेतृत्व पैदल किया। तुम देख सकते हो कि मनुष्य प्यास भी सह सकता है। कैटो अपनी अस्त्र-शस्त्रों से रहित और पराजित सेना के बचे हुए सैनिकों को सूखी पहाड़ियों के पार ले जा रहा था। पूर्ण कवच पहने हुए भी उसने अपने होंठों को जल से नहीं भिगोया और जब कहीं पानी उपलब्ध होता तो वह सबसे अंत में पीता। तुम देख सकते हो कि पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठा जा सकता है। जिस दिन कैटो चुनाव हार गया, उसी दिन उसने गेंद का खेल खेला। तुम यह भी देख सकते हो कि अधिक शक्तिशाली लोगों से भयभीत हुए बिना भी जिया जा सकता है। कैटो ने एक साथ पोम्पेई और सीज़र, दोनों को चुनौती दी। जबकि कोई दूसरा व्यक्ति एक को अप्रसन्न करने का साहस भी नहीं करता था क्योंकि ऐसा करने का अर्थ दूसरे की कृपा प्राप्त करना होता। तुम देख सकते हो कि मृत्यु और निर्वासन, दोनों से ऊपर भी उठा जा सकता है। कैटो ने स्वयं अपने लिए निर्वासन और मृत्यु का निर्णय किया और उनके बीच युद्ध को भी स्वीकार किया।
जब हम अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकते हैं, तब हम भी इन्हीं कष्टों का उसी धैर्य और दृढ़ता से सामना करने में समर्थ हो जाते हैं। इसकी शुरुआत हमें भोग-विलास का तिरस्कार करने से करनी चाहिए। वे अपनी असंख्य माँगों के द्वारा हमें दुर्बल और पुरुषार्थहीन बना देते हैं तथा हमें भाग्य से भी बहुत कुछ माँगने का अभ्यस्त बना देते हैं। इसके बाद हमें धन का भी तिरस्कार करना चाहिए क्योंकि वह दासता का प्रतिफल है। हमें सोना, चाँदी और उन सब वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए जो समृद्ध घरों को बोझिल बना देती हैं। स्वतंत्रता बिना मूल्य चुकाए प्राप्त नहीं होती। यदि तुम उसे अत्यधिक मूल्यवान समझते हो तो तुम्हें अन्य सभी वस्तुओं का मूल्य कम समझना होगा।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment