प्रिय लूसीलियस
तुम उन बातों की टोह क्यों लगाए रहते हो जो शायद तुम्हारे साथ घटें। परंतु यह भी संभव है कि कभी घटें ही नहीं? मेरा आशय आग लगने, भवनों के ढह जाने और ऐसी ही अन्य घटनाओं से है, जो कभी-कभी हमारे साथ घट तो जाती हैं पर उनका उद्देश्य हमें हानि पहुँचाना नहीं होता। इसके बजाय, उन बातों पर दृष्टि रखो जो वास्तव में तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए तत्पर हैं, जो तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र रचती हैं, और उनसे बचने का प्रयास करो। यद्यपि जहाज़ का डूब जाना या रथ से गिर पड़ना जैसी दुर्घटनाएँ निश्चय ही गंभीर होती हैं, फिर भी वे विरले ही घटती हैं। परंतु एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को जो खतरा होता है, वह तो प्रतिदिन उपस्थित रहने वाली बात है।
इनसे बचने के लिए स्वयं को तैयार करो और अपना ध्यान इन्हीं पर केंद्रित करो। इससे अधिक सामान्य, अधिक निरंतर और अधिक कपटपूर्ण कोई विपत्ति नहीं है। तूफ़ान आने से पहले उसके लक्षण दिखाई देते हैं। भवन गिरने से पहले चरमराने लगते हैं। धुआँ आग लगने का संकेत दे देता है। किंतु मनुष्यों द्वारा पहुँचाई जाने वाली हानि तत्काल आती है। वह जितनी निकट होती है, उतनी ही अधिक सावधानी से छिपाई जाती है। जिन लोगों से तुम मिलते हो, उनके चेहरे पर विश्वास करना भूल है। उनका रूप तो मनुष्य का होता है, किंतु स्वभाव जंगली पशुओं का। अंतर केवल इतना है कि पशुओं का पहला आक्रमण ही सबसे अधिक खतरनाक होता है। वे किसी को छोड़कर फिर लौटकर उसका पीछा नहीं करते। वे केवल तभी आक्रमण करते हैं जब भूख या भय उन्हें विवश कर देता है। इसके विपरीत, मनुष्य तो प्रायः दूसरे मनुष्य का विनाश करने में ही आनंद अनुभव करता है।
फिर भी, जब तुम यह विचार करो कि अन्य मनुष्यों से तुम्हें किस प्रकार के खतरे हो सकते हैं, तब तुम्हें मनुष्यों के एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों का भी स्मरण रखना चाहिए। एक व्यक्ति पर इसलिए दृष्टि रखो कि उससे तुम्हें हानि न पहुँचे। दूसरे के प्रति इसलिए सावधान रहो कि तुम्हारे कारण उसे कोई हानि न हो। दूसरों की सफलता में प्रसन्नता प्रकट करो, उनके दुख और विपत्ति में सहानुभूति रखो। यह स्मरण रखो कि कब तुम्हें सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहिए और कब सावधानी से काम लेना चाहिए।
यदि तुम इस प्रकार जीवन व्यतीत करोगे तो तुम्हें क्या प्राप्त होगा? यह आवश्यक नहीं कि तुम हर प्रकार की हानि से बच जाओगे लेकिन कम-से-कम तुम उस हानि का शिकार अनजाने में नहीं बनोगे। जहाँ तक संभव हो, अपने को दर्शन की शरण में ले जाओ। दर्शन तुम्हारी रक्षा करेगा। उसके आश्रय में तुम सुरक्षित रहोगे या कम-से-कम पहले से अधिक सुरक्षित अवश्य रहोगे। लोग तभी एक-दूसरे से टकराते हैं जब वे एक ही मार्ग पर चल रहे होते हैं।
पर तुम्हें अपने दर्शन का प्रदर्शन या उसका घमंड नहीं करना चाहिए। अनेक लोग केवल इसलिए संकट में पड़ गए हैं कि उन्होंने अपने दार्शनिक जीवन का भद्दे ढंग से प्रदर्शन किया। तुम दर्शन का उपयोग अपने दोषों को दूर करने के लिए करो, न कि दूसरों की आलोचना करने के लिए। दर्शन को सामान्य जीवन-पद्धति से अलग मत करो, और न ही ऐसा प्रतीत होने दो कि वह केवल इसलिए संसार की हर बात की निंदा करता है क्योंकि वह स्वयं उन कार्यों से विरत रहता है। बिना किसी प्रदर्शन के और बिना लोगों में विरोध या वैमनस्य उत्पन्न किए भी, बुद्धिमानी और दर्शन का आचरण किया जा सकता है।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment