प्रिय लूसीलियस
मैं तुम्हें बताऊँगा कि अधिक सुरक्षित जीवन जीने के लिए तुम्हें किन बातों से सावधान रहना चाहिए। परंतु इन उपदेशों को उसी प्रकार समझना, जैसे मैं तुम्हें आर्देआ (दलदली क्षेत्रों के कारण स्वास्थ्य के लिए चुनौतियों भरा क्षेत्र) प्रदेश में स्वस्थ रहने के उपाय बता रहा हूँ। अपने मन को उन कारणों पर केंद्रित करो जो एक मनुष्य को दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए प्रेरित करते हैं। तुम्हें पाँच कारण मिलेंगे— आशा, ईर्ष्या, घृणा, भय और अनादर।
इन सबमें सबसे कम महत्त्वपूर्ण अनादर है, यहाँ तक कि बहुत-से लोग इसे एक प्रकार का उपाय मान लेते हैं। निश्चय ही तिरस्कृत होना पीड़ादायक है। पर उसकी पीड़ा अधिक समय तक नहीं रहती। यह प्रायः बिना सोचे-समझे और आकस्मिक रूप से किया जाता है। युद्ध में भी कोई उस शत्रु पर प्रहार नहीं करता जो पहले ही गिर चुका हो। प्रहार उसी पर किया जाता है जो अब भी खड़ा है। जहाँ तक दुष्ट लोगों की आशाओं का प्रश्न है, उनसे तुम तभी बच सकते हो जब तुम्हारे पास ऐसा कुछ न हो जो उन्हें उस वस्तु की लालसा करने के लिए उकसाए जो उनकी नहीं है। तुम्हारे पास ऐसी कोई वस्तु भी न हो जो सबसे अलग दिखाई देती हो। यदि कोई वस्तु लोगों की दृष्टि में आ जाए और दुर्लभ हो तो वे छोटी-सी वस्तु के लिए भी लालायित हो उठते हैं। ईर्ष्या से तुम तब बचोगे जब स्वयं को लोगों के ध्यान का केंद्र नहीं बनाओगे, अपनी संपत्ति का प्रदर्शन नहीं करोगे और एकांत में संतोषपूर्वक जीवन जीना सीखोगे। घृणा या तो किसी को ठेस पहुँचाने से उत्पन्न होती है, जिससे तुम किसी को उकसाए बिना बच सकते हो या फिर वह बिना किसी कारण के भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा सौम्य और विनम्र स्वभाव ही तुम्हारी रक्षा करेगा। बहुत-से लोगों ने इस संकट का सामना किया है। यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी रहे हैं जिन्हें कभी कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं मिला, फिर भी उन्हें लोगों की घृणा सहनी पड़ी।
यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे भयभीत न हों, तो तुम्हें संयमित जीवन और कोमल स्वभाव अपनाना चाहिए। लोगों को यह ज्ञात होने दो कि वे बिना किसी भय के तुम्हें अप्रसन्न कर सकते हैं। यह भी सुनिश्चित करो कि उनके लिए तुमसे फिर से मेल-मिलाप करना सरल हो। भय का कारण बनना घर में उतना ही कष्टदायक है जितना सार्वजनिक जीवन में, चाहे तुमसे, तुम्हारे दास भय खाते हों या स्वतंत्र व्यक्ति। प्रत्येक मनुष्य में तुम्हें हानि पहुँचाने की पर्याप्त शक्ति होती है। फिर जो लोग दूसरों में भय उत्पन्न करते हैं, वे स्वयं भी भयग्रस्त रहते हैं। कोई भी व्यक्ति दूसरों को भयभीत करके स्वयं चिंता से मुक्त नहीं रह सका है। अब केवल तिरस्कार शेष रह जाता है। उसे सीमित रखना प्रत्येक मनुष्य के अपने अधिकार में है। यदि वह उसे स्वयं अपनी इच्छा से स्वीकार करे, न कि इसलिए कि वह वास्तव में उसका अधिकारी है। विद्या और संस्कृति का अध्ययन उसकी कटुता को कम कर देता है। इसी प्रकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति के निकट रहने वालों से संबंध रखना भी सहायक होता है। ऐसे लोगों से परिचय रखना तुम्हारे लिए उपयोगी होगा। पर उनसे अत्यधिक घनिष्ठता मत बढ़ाना। कहीं ऐसा न हो कि उपचार ही रोग से अधिक कष्टदायक सिद्ध हो।
सामान्य रूप से तुम्हारे लिए सबसे अधिक लाभदायक यही होगा कि तुम शांत रहो, दूसरों से बहुत कम बात करो। पर अपने आप से बहुत अधिक संवाद करो। बातचीत में एक सूक्ष्म और मोहक आकर्षण होता है। जैसे मदिरापान या यौन-संबंध मनुष्य से उसके रहस्य उगलवा लेते हैं, वैसे ही बातचीत भी उसके गुप्त भेद प्रकट करा देती है। जो कुछ कोई सुन लेता है, उसे अपने तक सीमित नहीं रखता। न वह केवल उतना ही बताता है जितना उसने सुना था। न ही वह किसी घटना का वर्णन उसके स्रोत का उल्लेख किए बिना करता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई-न-कोई ऐसा होता है, जिसे वह वही सब सौंप देता है जो स्वयं उसे सौंपा गया था। यदि वह अपनी वाचालता पर संयम भी रखे तथा केवल एक ही व्यक्ति तक बात सीमित रखे, तब भी वह एक से अनेक श्रोताओं को जन्म दे देता है। इस प्रकार जो बात अभी थोड़ी देर पहले तक एक रहस्य थी, वही शीघ्र ही जन-चर्चा का विषय बन जाती है।
सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार यह है कि मनुष्य किसी के साथ अन्याय न करे। जिन लोगों में आत्मसंयम का अभाव होता है, उनका जीवन सदा व्याकुल और अशांत रहता है। उनका भय उनके दुष्कर्मों के अनुपात में ही होता है। उन्हें कभी विश्राम नहीं मिलता। दुष्कर्म करने के बाद उनका मन उद्विग्न रहता है और वे किसी दूसरे कार्य में मन नहीं लगा पाते। उनका अंतःकरण उन्हें आगे बढ़ने नहीं देता बल्कि बार-बार उन्हें स्वयं के सामने खड़ा कर देता है। जो व्यक्ति दंड की अपेक्षा करता है, वह वास्तव में दंड भोग ही रहा होता है। जो दंड का अधिकारी है, वह निरंतर उसी की आशंका करता रहता है। दोषपूर्ण अंतःकरण के साथ सुरक्षा तो संभव है पर मानसिक शांति नहीं। अपराधी यह सोचता रहता है कि वह पकड़ा जा सकता है, चाहे वास्तव में वह पकड़ा न भी गया हो। उसकी नींद अशांत रहती है। जब भी वह किसी दूसरे के अपराध की चर्चा करता है, उसका ध्यान अपने ही अपराध की ओर चला जाता है। उसे लगता है कि उसका अपराध न तो पर्याप्त रूप से छिपा है और न ही पूरी तरह ढका हुआ है। अपराधी को कभी-कभी छिपे रहने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इस बात का निश्चिंत विश्वास कभी नहीं मिल सकता कि वह सचमुच छिपा हुआ है।
अभी के लिए विराम
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