प्रिय लूसीलियस
मैं सचमुच चाहता हूँ कि तुम्हारा मित्र वैसा ही बने जैसा तुम चाहते हो। मैंने उसके सुधार का कार्य आरम्भ भी कर दिया है। किन्तु वह अत्यन्त कठिन स्वभाव का सिद्ध हो रहा है बल्कि बात इससे भी अधिक गंभीर है। वह कठोर नहीं बल्कि अत्यन्त दुर्बल स्वभाव का व्यक्ति है, जिसे बहुत पुराने और गहरे जमे हुए दुर्व्यसनों ने भ्रष्ट कर दिया है।
मेरे एक प्रिय शौक से एक उदाहरण लेने दो। हर बेल पर कलम नहीं चढ़ाई जा सकती। यदि बेल बहुत पुरानी और गाँठदार हो गई हो अथवा दुर्बल और पतली हो तो वह या तो नई शाखा को स्वीकार ही नहीं करती या यदि स्वीकार भी कर ले तो उसका पोषण नहीं कर पाती। फलतः वह उससे ठीक प्रकार जुड़ नहीं पाती और न ही उसके गुण और स्वभाव को अपनाती है। इसी कारण हम प्रायः पहला चीरा भूमि के ऊपर लगाते हैं ताकि यदि बेल अनुकूल प्रतिक्रिया न दे तो हम दूसरी बार भूमि के नीचे कलम लगाकर पुनः प्रयास कर सकें।
जिस व्यक्ति के विषय में तुम मुझे इतने निर्देशों के साथ लिख रहे हो, उसमें आन्तरिक शक्ति का अभाव है। उसने अपने दोषों को खुली छूट दे रखी है। वह एक ही समय में निर्बल भी है और जड़ भी। इसलिए वह न तो तर्क को ग्रहण कर सकता है और न ही उसका पोषण कर सकता है। “किन्तु वह स्वयं भी तो यही चाहता है।” इस बात पर विश्वास मत करो। मेरा यह अर्थ नहीं कि वह तुमसे असत्य कह रहा है बल्कि वह स्वयं यह समझता है कि वह ऐसा चाहता है। अभी वह भोग-विलास से ऊब गया है। पर शीघ्र ही उससे फिर मेल-मिलाप कर लेगा।
“लेकिन वह कहता है कि वह अपने जीवन-ढंग से ऊब चुका है।” इसमें कोई संदेह नहीं। पर ऐसा कौन है जो कभी अपने जीवन-ढंग से ऊबा न हो? लोग अपने दोषों से प्रेम भी करते हैं और उनसे घृणा भी करते हैं। इसलिए उसके विषय में अभी कोई निर्णय सुरक्षित रखो, जब तक वह अपने आचरण से यह प्रमाणित न कर दे कि वह और भोग-विलास वास्तव में एक-दूसरे के शत्रु बन चुके हैं। इस समय तो केवल इतना ही है कि दोनों के बीच अस्थायी अनबन चल रही है।
अभी के लिए विराम
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