Sunday, 2 August 2026

फ़ैबियानस की लेखन शैली के बारे में -- पत्र - 98 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


आप अपने पत्र में मुझे लिखते हैं कि आपने पैपिरियस फ़ैबियानस की पुस्तक 'ऑन पॉलिटिक्स' बड़े मनोयोग से पढ़ी। लेकिन अंततः उससे निराश हुए। फिर, यह भूलकर कि वह दर्शनशास्त्र की एक कृति है, आप उसकी रचना-शैली की आलोचना करने लगते हैं।

    मान लीजिए कि आप सही हैं कि वे शब्दों को बिना किसी विशेष क्रम में व्यवस्थित किए ही प्रवाहित होने देते हैं। सबसे पहले, उसी में भी अपना एक आकर्षण है। यह ऐसी शैली है जो सहज और अविरल रूप से बहने वाले विचार-विमर्श के लिए उपयुक्त होती है। मेरे विचार से, लापरवाही से लिखने और स्वाभाविक प्रवाह के साथ लिखने में बहुत बड़ा अंतर है। इसके अतिरिक्त, एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण भेद भी है। मेरी दृष्टि में फ़ैबियानस अपने विचारों को स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होने देते हैं। परंतु उन्हें अनियंत्रित बाढ़ की तरह नहीं बहने देते। उनकी भाषा समृद्ध और विस्तृत है। किंतु वह निरंतर आगे बढ़ती रहती है और कभी भी अपना संयम नहीं खोती। आरंभ से ही ऐसा प्रतीत होता है कि उनके लेखन को अत्यधिक घिसा-पिटा या बार-बार संशोधित नहीं किया गया है। फिर भी, यदि आपकी ही राय को स्वीकार कर लिया जाए तो भी उनका उद्देश्य हमारे शब्दों को नहीं बल्कि हमारे आचरण को व्यवस्थित करना था। उन्होंने यह कृति कानों को प्रसन्न करने के लिए नहीं बल्कि मन को शिक्षित करने के लिए लिखी थी। 



    इसके अतिरिक्त, यदि वे स्वयं सामने उपस्थित होकर बोल रहे होते तो आपको उनके वाक्यों की बारीकियों का विश्लेषण करने का अवसर ही नहीं मिलता क्योंकि आप उनके संपूर्ण वक्तव्य के प्रभाव से ही अभिभूत हो जाते। किसी वक्ता की ऊर्जा और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण जो बातें हमें सुनते समय अत्यंत प्रिय लगती हैं, वे प्रायः पढ़ने पर उतनी आकर्षक नहीं लगतीं। फिर भी, पहली ही दृष्टि में किसी का ध्यान आकर्षित कर लेना कोई साधारण बात नहीं है, भले ही सूक्ष्म परीक्षण करने पर उसमें कुछ दोष दिखाई दें। मेरे विचार में, वह वक्ता अधिक महान है जो आरंभ में ही श्रोताओं की स्वीकृति और प्रशंसा प्राप्त कर लेता है, उस वक्ता की अपेक्षा जिसे लोगों की स्वीकृति धीरे-धीरे अर्जित करनी पड़ती है। फिर भी, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि दूसरा प्रकार का वक्ता अधिक विश्वसनीय होता है और भविष्य में उत्कृष्ट उपलब्धियों का अधिक दृढ़ आश्वासन देता है।

    दार्शनिक के लिए अत्यधिक परिष्कृत और शब्द-सज्जा पर अत्यधिक ध्यान देने वाला भाषण उपयुक्त नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति अपने शब्दों में ही संकोची हो तो वह साहस और दृढ़ता कब दिखाएगा या अपने प्राणों को जोखिम में डालने का साहस कब करेगा? फ़ैबियानस अपनी वाणी में लापरवाह नहीं थे बल्कि वे उसके प्रति अनावश्यक चिंता नहीं करते थे। इसी कारण आपको उनकी शैली में कुछ भी भद्दा या असभ्य नहीं मिलेगा। उनके शब्दों का चयन अत्यंत उपयुक्त है। किंतु उनमें कहीं भी कृत्रिमता या बनावट नहीं है। वर्तमान प्रचलन के विपरीत, वे शब्दों के स्वाभाविक क्रम को उलट-पुलट नहीं करते। फिर भी उनकी अभिव्यक्ति, यद्यपि सामान्य बोलचाल की भाषा से ली गई है, अत्यंत उत्कृष्ट है। उनके लेखन में आपको उदात्त और भव्य विचार मिलते हैं। वे विचार सूक्तियों (संक्षिप्त और चमत्कारपूर्ण वाक्यों) में जबरन नहीं बाँधे गए हैं, बल्कि विस्तारपूर्वक व्यक्त किए गए हैं। निस्संदेह, हमें कुछ ऐसे स्थान मिल सकते हैं जहाँ भाषा पर्याप्त संक्षिप्त नहीं है, या वाक्य-रचना आज के मानकों के अनुसार कुछ कम सुसंगठित अथवा कम सुरुचिपूर्ण प्रतीत होती है। किंतु समग्र रूप से देखें तो उसमें कहीं भी निरर्थक परिष्कार या दिखावटी अलंकरण का कोई चिह्न नहीं है। निस्संदेह, किसी को उसमें विभिन्न रंगों वाले संगमरमर की चमक, शयनकक्षों तक पानी पहुँचाने वाली जल-व्यवस्था, गरीबों की छोटी कोठरी अथवा वे सभी विलासपूर्ण सुविधाएँ नहीं मिलेंगी जिन्हें हमारी भोग-विलासी रुचियाँ इसलिए चाहती हैं क्योंकि साधारण सौंदर्य से उनका संतोष नहीं होता। परंतु, जैसा कि कहा जाता है, वह एक अच्छी तरह निर्मित भवन है। 

    इसके अतिरिक्त, शैली के विषय में लोगों की रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कुछ लोग ऐसी शैली चाहते हैं जिसमें तनिक भी खुरदरापन न हो; जबकि कुछ लोग इतनी ऊबड़-खाबड़ शैली पसंद करते हैं कि यदि कोई वाक्य स्वाभाविक रूप से अधिक सहज और सुचारु बन गया हो तो वे जान-बूझकर उसे भी तोड़-मरोड़ देते हैं और उसके अंतिम भाग को इस प्रकार अधूरा छोड़ देते हैं कि वह पाठक की अपेक्षा के अनुरूप न हो। सिसरो को पढ़िए।उनकी शैली आरंभ से अंत तक एक समान और सुसंगत रहती है। जब वे किसी वाक्य को पूर्ण करते हैं तो उसका समापन कोमल और सहज होता है। किंतु उसमें कमी, कोमलता या दुर्बलता नहीं होती। इसके विपरीत, असिनियस पोलियो की शैली झटकेदार और आकस्मिक है। वह वहाँ रुक जाती है जहाँ पाठक इसकी बिल्कुल अपेक्षा नहीं करता। सिसरो के यहाँ प्रत्येक वाक्य सुव्यवस्थित और पूर्ण समापन तक पहुँचता है। जबकि पोलियो के यहाँ वाक्य प्रायः अचानक टूट जाते हैं। केवल कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहाँ वे किसी निश्चित लय और एकरूप विन्यास का पालन करते हैं।

    आप यह भी कहते हैं कि आपको उनकी पूरी कृति सपाट और पर्याप्त ऊँचाई से रहित प्रतीत होती है। किंतु मुझे उनमें यह दोष दिखाई नहीं देता। उनकी शैली सपाट नहीं है बल्कि संयमित है। वह उनके शांत, संतुलित और सुव्यवस्थित मन के अनुरूप ढली हुई है। वह समतल है, किंतु निम्न नहीं। निस्संदेह, उसमें वह प्रखर वक्तृत्व-कला नहीं है, न वे उत्तेजक प्रभाव हैं जिनकी आप अपेक्षा करते हैं और न ही सूक्तियों के समान अचानक चमत्कृत कर देने वाला प्रभाव। लेकिन यदि पूरी कृति को समग्र रूप में देखा जाए तो उसकी कलात्मकता के विषय में आपका जो भी मत हो, वह अपने स्वरूप में उदात्त और गरिमामयी है। उसकी शैली स्वयं शायद असाधारण विशिष्टता न रखती हो। परंतु वह अपने पाठक को विशिष्टता अवश्य प्रदान करती है। 

    अब बताइए, आप किस लेखक को फ़ैबियानस से श्रेष्ठ मानते हैं? यदि आप सिसरो का नाम लें जिनकी दार्शनिक पुस्तकों की संख्या लगभग फ़ैबियानस के समान ही है तो मैं इसे स्वीकार कर लूँगा। किंतु कोई रचना केवल इसलिए तुच्छ नहीं हो जाती कि वह सर्वश्रेष्ठ से कुछ नीचे है। यदि आप असिनियस पोलियो का नाम लें तो उसे भी मैं स्वीकार करूँगा। पर मेरा उत्तर केवल इतना होगा कि इतने विशाल साहित्यिक क्षेत्र में तीसरे स्थान पर आना भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। आप लिवी का नाम भी प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने ऐसे संवाद (संवादात्मक ग्रंथ) भी लिखे हैं जो इतिहास और दर्शन, दोनों का समन्वय हैं। ऐसी पुस्तकें भी लिखी हैं जो विशेष रूप से दर्शनशास्त्र पर केंद्रित हैं। उनके लिए भी मैं स्थान दूँगा। परंतु यह भी देखिए कि केवल इन तीन लेखकों और शैली के इन तीन महान आचार्यों, से पीछे रह जाने पर भी फ़ैबियानस कितने अन्य लेखकों से आगे निकल जाते हैं। यही अपने आप में उनकी महानता का प्रमाण है।

    फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें प्रत्येक गुण विद्यमान है। यद्यपि उनकी शैली उदात्त है, पर वह साहसपूर्ण नहीं है। यद्यपि उसमें विस्तार है, फिर भी उसमें वेग और प्रहार-शक्ति का अभाव है। वह चमत्कृत करने वाली अपेक्षा अधिक स्पष्ट है। आप कहते हैं, “उसमें दुर्गुणों की कठोर निंदा नहीं मिलती, संकटों के प्रति उत्साहपूर्ण चुनौती नहीं है, भाग्य के सामने गर्वपूर्ण प्रत्युत्तर नहीं है और महत्त्वाकांक्षा पर तिरस्कारपूर्ण प्रहार भी नहीं है। मैं चाहता हूँ कि विलासिता को फटकारा जाए, व्यभिचार को सार्वजनिक रूप से लज्जित किया जाए और आक्रामकता को कुचल दिया जाए। उसमें वक्तृत्व-कला की तीक्ष्णता, त्रासदी की भव्यता और हास्य-नाटक की सरलता, इन सबका कुछ न कुछ अंश होना चाहिए।” 

    परंतु आप चाहते हैं कि उनका ध्यान शब्दों पर हो। जबकि शब्द अपने आप में बहुत छोटी और गौण वस्तु हैं। उन्होंने अपने विषय की महानता का साथ चुना है। वे अपनी वाग्मिता का प्रदर्शन नहीं करते बल्कि वाग्मिता उनके पीछे उसी प्रकार चलती है जैसे किसी व्यक्ति के पीछे उसकी छाया चलती है। निस्संदेह, उनके लेखन में कुछ कमियाँ भी मिलेंगी। कहीं-कहीं विषय अधूरा रह जाएगा, कुछ अंश ढीले ढंग से लिखे हुए प्रतीत होंगे और कुछ शब्द ऐसे होंगे जो पाठक को न तो झकझोरेंगे और न ही उत्तेजित करेंगे। मैं यह सब स्वीकार करता हूँ। अनेक वाक्य बिना कोई विशेष प्रभाव छोड़े ही निकल जाएँगे और कभी-कभी उनकी शैली कुछ शिथिल तथा अत्यधिक विस्तारपूर्ण भी लगेगी। किन्तु इसके साथ ही, उनके पूरे लेखन में आपको पर्याप्त प्रकाश मिलेगा और ऐसे लंबे-लंबे अंश भी मिलेंगे जिनमें तनिक भी नीरसता नहीं होगी। अंततः वे आपको यह विश्वास दिलाने में सफल होंगे कि उन्होंने जो कुछ लिखा है, उस पर वे स्वयं सच्चे मन से विश्वास करते हैं। आपको स्पष्ट हो जाएगा कि उनका उद्देश्य आपको अपने विचारों से परिचित कराना है, न कि केवल आपको प्रसन्न करना। उनकी संपूर्ण रचना का लक्ष्य मनुष्य की उन्नति और उसके चरित्र की उत्कृष्टता है। वह तालियों और प्रशंसा की आकांक्षा नहीं करती।

    मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि उनकी रचनाएँ ऐसी ही हैं, यद्यपि मुझे उनका प्रत्येक विवरण अब स्मरण नहीं है। मेरे मन में जो बात आज भी बनी हुई है, वह उनकी शैली और स्वर का एक समग्र प्रभाव है। ठीक वैसे ही जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की स्मृति बनी रहती है जिसे हम बहुत लंबे समय से जानते हों, किंतु हाल के दिनों में उससे निकटता से बातचीत न हुई हो। निश्चय ही, जब मैंने उन्हें स्वयं बोलते हुए सुना था, तब भी उनकी रचनाएँ मुझे ऐसी ही प्रतीत हुई थीं, पूर्णतः दोषरहित नहीं, किंतु अत्यंत समृद्ध। उनका लेखन ऐसा था कि वह किसी प्रतिभाशाली और आशाजनक युवक को उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित कर सकता था, साथ ही उसके मन में यह आशा भी जगा सकता था कि वह एक दिन उनसे आगे निकल सकेगा। मेरे विचार में, यही प्रोत्साहन का सबसे प्रभावशाली रूप है। जब कोई लेखक हमें उसका अनुकरण करने के लिए प्रेरित तो करे। पर साथ ही यह निराशा भी उत्पन्न कर दे कि उसकी बराबरी कभी नहीं की जा सकती, तब वह प्रेरणा उत्साहवर्धक नहीं रहती बल्कि हतोत्साहित कर देती है। जो भी हो, फ़ैबियानस अत्यंत प्रचुर अभिव्यक्ति-शक्ति वाले लेखक थे। यद्यपि उनके लेखन के कुछ अंश आलोचना के योग्य हो सकते हैं, फिर भी समग्र रूप में उनका साहित्य अत्यंत भव्य, प्रभावशाली और प्रशंसनीय था।


अभी के लिए विराम 

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