प्रिय लूसीलियस
अपने मित्र से कहो कि वह इतना साहसी बने कि उन लोगों की आलोचना को तुच्छ समझ सके जो कहते हैं कि वह छाया और आराम का जीवन खोज रहा है। अपने प्रतिष्ठित पद को छोड़ रहा है और जबकि वह इससे भी बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता था। उसने सब कुछ छोड़कर शांति को चुन लिया है। उसे प्रतिदिन, एक-एक करके, उन्हें यह दिखाना चाहिए कि अपने ही कार्यों और मामलों पर ध्यान देना उसके लिए कितना लाभकारी है।
जो लोग दूसरों की ईर्ष्या का कारण बनते हैं, वे हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं। कुछ को एक ओर धकेल दिया जाता है और कुछ गिर पड़ते हैं। समृद्धि एक अशांत वस्तु है। वह स्वयं को ही व्याकुल कर देती है। वह बुद्धि को भ्रमित कर देती है और हमेशा एक ही प्रकार से नहीं क्योंकि वह लोगों को भिन्न-भिन्न दिशाओं में उकसाती है। कुछ को सत्ता की ओर तो कुछ को भोग-विलास की ओर। कुछ उससे फूलकर घमंडी हो जाते हैं जबकि कुछ उससे निर्बल और पूरी तरह शक्तिहीन हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे अच्छी तरह संभाल लेते हैं। हाँ, ऐसे लोग हैं, जैसे कुछ लोग मदिरा को भी अच्छी तरह संभाल लेते हैं। लेकिन इससे तुम्हें यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि भाग्यशाली वह व्यक्ति है जिसके चारों ओर बहुत-से अनुयायी जमा रहते हैं। वे उसके चारों ओर वैसे ही इकट्ठा होते हैं जैसे पशु किसी जलाशय के चारों ओर। वे पानी पीते हैं और उसे गंदला कर देते हैं।
“लोग उसे शौकिया आदमी और निकम्मा कह रहे हैं।” तुम जानते हो कि कुछ लोगों के बोलने का ढंग ही विकृत होता है। वे बातों को उलट अर्थ में कहते हैं। वे उसे पहले भाग्यशाली और सफल व्यक्ति कहा करते थे तो उससे क्या सिद्ध होता है? क्या वह वास्तव में ऐसा था? उसी प्रकार मुझे इस बात की भी कोई परवाह नहीं कि कुछ लोग उसे अत्यधिक कठोर और गंभीर समझते हैं। अरिस्टो कहा करते थे, "मैं एक प्रसन्नचित्त और भीड़ में लोकप्रिय युवक की अपेक्षा एक गंभीर और कठोर युवक को देखना अधिक पसंद करूँगा। क्योंकि जो मदिरा आगे चलकर उत्तम बनती है, वह नई होने पर तीखी और कड़वी होती है जबकि जो मदिरा पात्र में ही स्वादिष्ट लगती है, वह समय की कसौटी पर टिक नहीं पाती।
तो उन्हें उसे 'कठोर' और 'अपने हितों का शत्रु' कहने दो। यदि वह सद्गुण की साधना में और उदार विद्याओं के अध्ययन में निरंतर लगा रहे तो यह कठोरता समय के साथ उत्तम फल देगी। और उदार विद्याओं से मेरा अभिप्राय उन विषयों से नहीं है जिनका थोड़ा-बहुत ज्ञान ही पर्याप्त हो। मेरा आशय उन विद्याओं से है जिनमें मन को पूरी तरह डुबो देना पड़ता है।
अब सीखने का समय है। “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या ऐसा कोई समय भी होता है जो सीखने का समय न हो?” बिल्कुल नहीं। जीवन के हर समय सीखना सम्मानजनक है। लेकिन इसी के साथ ऐसा भी समय आता है जब प्रारम्भिक शिक्षा लेना सम्मानजनक नहीं रह जाता। यह लज्जाजनक बल्कि हास्यास्पद है कि कोई वृद्ध व्यक्ति अभी भी अक्षरज्ञान ही प्राप्त कर रहा हो। शिक्षा युवावस्था में प्राप्त कर लेनी चाहिए और फिर वृद्धावस्था में उसका उपयोग करना चाहिए।
अतः यदि तुम अपने मित्र को उसकी सर्वोत्तम क्षमता तक पहुँचने में सहायता करोगे तो तुम अपने ऊपर बहुत बड़ा उपकार करोगे। कहा जाता है कि यही वे अनुग्रह हैं जिन्हें माँगना चाहिए और यही वे अनुग्रह हैं जिन्हें प्रदान करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सर्वोच्च प्रकार के उपकार हैं जिन्हें देना भी उतना ही लाभदायक है जितना उन्हें प्राप्त करना।
वैसे भी, अब वह स्वतंत्र नहीं रहा। वह अपना वचन दे चुका है। जितना लज्जाजनक किसी ऋण का भुगतान न करना है उससे भी अधिक लज्जाजनक अपनी ही अपेक्षाओं को पूरा न करना है। पहले प्रकार के ऋण को चुकाने के लिए व्यापारी को लाभदायक समुद्री यात्रा की आवश्यकता होती है। किसान को खेती के लिए उपजाऊ भूमि और अनुकूल मौसम की आवश्यकता होती है। लेकिन तुम्हारे मित्र पर जो ऋण है, उसे वह केवल अपनी इच्छा और तत्परता से चुका सकता है और किसी अन्य प्रकार से नहीं।
भाग्य का उसके आचरण पर कोई अधिकार नहीं है। उसे स्वयं ही उसका नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहिए ताकि उसका मन पूर्ण शांति में अपनी परिपूर्णता प्राप्त कर सके। ऐसा कि वह न किसी हानि को हानि समझे न किसी लाभ को लाभ बल्कि जो कुछ भी घटित हो, उसके प्रति उसका दृष्टिकोण समान बना रहे। यदि साधारण सांसारिक वस्तुओं का ढेर उसके चारों ओर लगा हो तो भी वह अपनी संपत्तियों से ऊँचा बना रहता है। यदि संयोगवश उन ढेरों में से एक या वे सभी ढेर गिर जाएँ तो भी वह स्वयं किसी प्रकार छोटा नहीं हो जाता।
यदि उसका जन्म फ़ारस में हुआ होता तो वह बचपन से ही धनुष चलाना सीख रहा होता। यदि जर्मनी (पाठकों की सुविधा के लिए देश का नाम दिया गया है। उस समय संभवतः किसी और शब्द का प्रोयोग किया गया होगा।) में हुआ होता तो वह बाल्यावस्था से ही हल्का भाला फेंकने का अभ्यास कर रहा होता। यदि वह हमारे पूर्वजों के समय में जीवित होता तो उसने घुड़सवारी और आमने-सामने के युद्ध की शिक्षा प्राप्त की होती। प्रत्येक व्यक्ति को अपने समाज की प्रशिक्षण-पद्धति के अनुसार ऐसे कौशल सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है बल्कि उनसे यह अपेक्षा भी की जाती है। तो फिर तुम्हारे मित्र को किस कला का अभ्यास करना चाहिए? ऐसी कला का, जो उसे हर प्रकार के हथियार और हर प्रकार के शत्रु के विरुद्ध समर्थ बनाए मृत्यु की बिल्कुल परवाह न करने की कला।
कोई भी इस बात पर संदेह नहीं करता कि मृत्यु में कुछ भयावह है। कुछ ऐसा जो केवल शरीर ही नहीं बल्कि हमारी तर्कशील प्रकृति को भी झकझोर देता है क्योंकि उसे आत्म-प्रेम के लिए ही बनाया गया है। यदि हम स्वाभाविक रूप से और अपनी सहज प्रवृत्ति के अनुसार मृत्यु की ओर उसी प्रकार अग्रसर होते जैसे सभी प्राणी आत्म-सुरक्षा की प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं तो उसके लिए स्वयं को तैयार करने और अभ्यास करने की कोई आवश्यकता न होती। कोई व्यक्ति इसलिए प्रशिक्षण नहीं लेता कि आवश्यकता पड़ने पर वह गुलाबों की शय्या पर शांति से लेट सके बल्कि वह स्वयं को इसलिए कठोर बनाता है कि यातना के बीच भी अपने कर्तव्य से विमुख न हो। यदि आवश्यकता पड़े तो घायल होने पर भी पूरी रात पहरा दे सके बिना अपने भाले का सहारा लिए। क्योंकि जो लोग किसी सहारे के सहारे टिक जाते हैं, वे अंततः सो जाते हैं।
मृत्यु में कोई हानि नहीं है क्योंकि हानि तो किसी ऐसे व्यक्ति की हो सकती है जो अस्तित्व में हो। लेकिन यदि तुम्हारी इच्छा लंबे जीवन की है तो यह स्मरण रखो कि जो वस्तुएँ हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती हैं। वे वास्तव में नष्ट नहीं होतीं। वे उस प्रकृति में सुरक्षित रहती हैं जहाँ से वे आई थीं और शीघ्र ही फिर लौटने वाली हैं। वे अस्तित्व में रहना बंद कर देती हैं पर नष्ट नहीं होतीं। मृत्यु, जिससे हम इतना भय खाते हैं और जिसका सामना करने से बचते हैं जीवन को केवल बीच में रोकती है, उसे चुरा नहीं लेती। एक दिन फिर आएगा जो हमें पुनः प्रकाश में ले आएगा। यद्यपि बहुत-से लोग ऐसे दिन को स्वीकार करने से इंकार कर दें, यदि लौटने से पहले उन्हें सब कुछ भूलना न पड़ता।
किसी और दिन मैं तुम्हें अधिक विस्तार से समझाऊँगा कि जो वस्तुएँ नष्ट होती हुई प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में केवल रूपांतरित होती हैं। जो व्यक्ति लौटने की आशा के साथ विदा होता है, उसे शांत मन से विदा होना चाहिए। प्रकृति के चक्रों पर विचार करो। तुम देखोगे कि वहाँ कुछ भी वास्तव में समाप्त नहीं होता बल्कि वस्तुएँ बारी-बारी से नीचे जाती हैं और फिर ऊपर उठती हैं। ग्रीष्म ऋतु समाप्त हो गई है पर अगला वर्ष उसे फिर लौटा लाएगा। शीत ऋतु चली गई है पर अपने नियत महीनों में वह फिर लौटेगी। रात्रि ने सूर्य को ढक लिया है लेकिन दिन शीघ्र ही रात्रि को हटाकर स्वयं आ जाएगा। तारे भी अपने पूर्व मार्गों को दोहराते हैं। आकाश का एक भाग निरंतर उदित होता है जबकि दूसरा अस्त होता रहता है।
अच्छा, अब मैं इसे यहीं समाप्त करता हूँ लेकिन एक बात और जोड़ दूँ। न तो छोटे बच्चे मृत्यु से डरते हैं और न ही चंचल तथा भटकते मन वाले लोग। उनकी अवस्था ही उन्हें निश्चिंतता प्रदान करती है। यह अत्यंत लज्जाजनक बात होगी यदि बुद्धि हमारे लिए वह न कर सके जो मूर्खता उनके लिए कर देती है।
अभी के लिए विदा
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