Monday, 6 July 2026

शब्दों के संदर्भ में -- पत्र - 38 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम्हारा यह आग्रह उचित है कि हम एक-दूसरे को अधिक बार पत्र लिखें। संवाद के इतना लाभकारी होने का कारण यह है कि वह धीरे-धीरे मन के भीतर प्रवेश करता है। पहले से तैयार किए गए और भीड़ के सामने दिए गए भाषण अधिक शोर तो पैदा करते हैं। उनमें आत्मीयता कम होती है। दर्शन तो सदुपदेश है। कोई भी व्यक्ति उपदेश ऊँचे और गूँजते स्वर में नहीं देता। निश्चय ही ऐसे अवसर आते हैं जब किसी प्रकार का प्रेरणात्मक भाषण देना आवश्यक होता है। यदि मैं उसे ऐसा कहूँ, जब कोई व्यक्ति संकोच कर रहा हो और उसे आगे बढ़ाने के लिए एक धक्का चाहिए। लेकिन जब उद्देश्य केवल सीखने की प्रेरणा देना नहीं बल्कि वास्तव में किसी को सीखाना हो, तब इन अपेक्षाकृत शांत और संयत वचनों का सहारा लेना पड़ता है। वे अधिक आसानी से मन में प्रवेश करते हैं और टिके भी रहते हैं क्योंकि आवश्यकता बहुत अधिक शब्दों की नहीं होती बल्कि ऐसे शब्दों की होती है जो प्रभावशाली हों।


By Stevie Unknown 

    उन्हें बीजों की तरह बिखेरा जाना चाहिए। बीज स्वयं तो बहुत छोटी-सी वस्तु होता है फिर भी जब वह उचित स्थान पर गिरता है तो अपनी अंतर्निहित शक्ति को विकसित करता है और एक विशाल तथा निरंतर बढ़ने वाले पौधे में बदल जाता है। तर्क और विचार भी इसी प्रकार काम करते हैं। जब तुम उन्हें देखते हो तो वे आकार में छोटे प्रतीत होते हैं। लेकिन जब उन्हें व्यवहार में लाया जाता है तो वे विकसित होकर फैलते हैं। कुछ ही शब्द कहे जाते हैं। यदि मन उन्हें भली-भाँति ग्रहण कर ले तो वे ऊँचे और सशक्त बन जाते हैं। 

    मैं फिर कहता हूँ, शब्द बीजों के समान कार्य करते हैं। यद्यपि वे छोटे होते हैं फिर भी बहुत कुछ कर दिखाते हैं। किन्तु, जैसा मैंने कहा, उन्हें ग्रहण करने वाला मन उनके योग्य होना चाहिए और उन्हें अपने भीतर आत्मसात करना चाहिए। तब वही मन उन विचारों को पुनः उत्पन्न करेगा। जितना उसने प्राप्त किया था उससे कहीं अधिक फल उत्पन्न करेगा।


अभी के लिए विदा 

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