Monday, 6 July 2026

दर्शन के प्रति समर्पण के संदर्भ में -- पत्र - 37

प्रिय लूसीलियस 

मन की उत्कृष्टता से स्वयं को बाँधने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है कि तुम अपने दिए हुए वचन और अपने द्वारा खाई गई प्रतिज्ञा को निभाओ। एक उत्कृष्ट मनुष्य बनने की प्रतिज्ञा। कोई व्यक्ति केवल मज़ाक में ही तुम्हें यह कह सकता है कि यह सेवा सरल और आरामदायक है। मैं नहीं चाहता कि तुम धोखा खाओ। इस अत्यंत सम्माननीय प्रतिज्ञा के शब्द उसी दूसरी, अत्यंत अपमानजनक प्रतिज्ञा के समान हैं, “जलाया जाना, बाँधा जाना, और तलवार से मारा जाना।” जो लोग ग्लैडिएटर बनकर अपना जीवन बेच देते हैं और भोजन तथा पेय के बदले अपना रक्त चुकाते हैं, वे इन सब कष्टों को अपनी इच्छा के विरुद्ध सहने के लिए अनुबंधित होते हैं।  लेकिन तुम इन्हें अपनी इच्छा से और स्वेच्छा से सहने के लिए प्रतिबद्ध हो। उन्हें अपने हथियार नीचे रख देने और भीड़ की दया की परीक्षा लेने का अवसर मिलता है।  लेकिन तुम न अपने हथियार नीचे रखोगे और न ही अपने जीवन की भीख माँगोगे। तुम्हें अपने पैरों पर खड़े हुए, अपराजित अवस्था में मरना होगा। कुछ अतिरिक्त दिनों या वर्षों को प्राप्त कर लेने से क्या लाभ? एक बार जन्म लेने के बाद हमें किसी प्रकार की मोहलत नहीं मिलती।


By Inayat Malik 

    “तो फिर,” तुम पूछते हो, “मुझे इससे मुक्ति कैसे मिलेगी?” तुम इसकी शर्तों से बच नहीं सकते। लेकिन उन पर विजय अवश्य पा सकते हो। “शक्ति अपना मार्ग खोज लेती है।” दर्शन तुम्हें वही शक्ति प्रदान करेगा। यदि तुम सुरक्षित रहना चाहते हो, शांत रहना चाहते हो, सुखी रहना चाहते हो और सबसे बढ़कर यदि तुम स्वतंत्र होना चाहते हो तो स्वयं को दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

    मूर्खता नीच, तुच्छ, घृणित और दासवत होती है। अनेक प्रबल भावनाओं की अधीन रहती है। ये भावनाएँ अत्यंत कठोर स्वामी हैं। कभी वे बारी-बारी से तुम पर शासन करती हैं और कभी सब मिलकर। बुद्धि तुम्हें उनसे मुक्त करती है। केवल बुद्धि ही स्वतंत्रता है। उस तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है। वह सीधा मार्ग है। तुम भटकोगे नहीं, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ो। यदि तुम चाहते हो कि सब वस्तुएँ तुम्हारे अधीन हों तो स्वयं को तर्कबुद्धि के अधीन कर दो। जब तर्क तुम्हारा शासक बन जाएगा, तब तुम बहुत-सी चीज़ों के शासक बन जाओगे। तर्क से तुम सीखोगे कि क्या कार्य करना है और किस प्रकार करना है। तुम केवल संयोगवश किसी चीज़ से नहीं टकराओगे।

    तुम किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं बता सकते जो यह जानता हो कि उसने उस वस्तु की इच्छा करना कैसे शुरू किया जिसकी वह अब इच्छा करता है। लोग अपने विचारपूर्वक बनाए गए उद्देश्यों से नहीं चलते बल्कि मन की चंचल इच्छाओं द्वारा इधर-उधर धकेले जाते हैं। कभी-कभी हम भाग्य का अच्छा उपयोग कर लेते हैं। लेकिन उतनी ही बार भाग्य हम पर हावी हो जाता है। आगे बढ़ने के बजाय बहते चले जाना लज्जाजनक है। घटनाओं के बवंडर के बीच स्वयं को पाकर आश्चर्य से यह पूछना भी लज्जाजनक है, “मैं यहाँ कैसे पहुँच गया?”


अभी के लिए विदा 

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