Monday, 6 July 2026

संतुलित साधनों के संदर्भ में -- पत्र - 39 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस

निश्चय ही मैं तुम्हारे अनुरोध के अनुसार वे संक्षिप्त ग्रंथ तैयार करूँगा जो सावधानीपूर्वक व्यवस्थित हों और सीमित दायरे में साररूप से प्रस्तुत किए गए हों। किन्तु संभव है कि तुम्हें ऐसे संक्षेपों की अपेक्षा नियमित और क्रमबद्ध अध्ययन से अधिक लाभ हो। जिसे आजकल सामान्यतः ब्रेवियारियम (संक्षिप्त सार-संग्रह) कहा जाता है उसे उस समय, जब लैटिन अपनी शुद्ध अवस्था में बोली जाती थी, सुम्मारियम कहा जाता था। सीखने की अवस्था में हमें पहले प्रकार की सामग्री की अधिक आवश्यकता होती है जबकि दूसरा प्रकार तब उपयोगी होता है जब हम पहले से ही विषय को जानते हों। क्योंकि पहला हमें सिखाता है। दूसरा हमें स्मरण कराता है। फिर भी, मैं तुम्हें दोनों ही उपलब्ध कराऊँगा।

    जहाँ तक तुम्हारा और मेरा संबंध है, किसी विशेष लेखक की माँग करने का कोई कारण नहीं है। केवल अपरिचित व्यक्ति ही अपने समर्थन में प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करता है। मैं वह लिखूँगा जो तुम मुझसे चाहते हो, लेकिन अपने ही ढंग से। इस बीच, तुम्हारे पास और भी बहुत-से लेखकों की रचनाएँ उपलब्ध हैं जो मुझे लगता है कि तुम्हें पर्याप्त रूप से सही मार्ग पर बनाए रखेंगी। बस दार्शनिकों की सूची या अनुक्रमणिका उठा लो। उसे देखकर ही तुम्हारे भीतर परिश्रम करने की प्रेरणा जाग उठेगी। जब तुम देखोगे कि तुम्हारे हित के लिए कितने लोगों ने श्रम किया है तब तुम्हारी भी इच्छा होगी कि तुम स्वयं उन लोगों में से एक बनो।

    किसी उदात्त और महान प्रकृति का यह सबसे श्रेष्ठ गुण है कि वह सम्माननीय उदाहरणों से प्रेरणा ग्रहण करती है। उच्च चरित्र वाला कोई भी व्यक्ति निकृष्ट और तुच्छ बातों में आनंद नहीं लेता। उसे तो महानता का दर्शन ही आकर्षित करता है और ऊपर उठाता है। जिस प्रकार अग्नि की लौ सदैव ऊपर की ओर उठती है और उसे न तो दबाया जा सकता है, न ही स्थिर रखा जा सकता है, उसी प्रकार हमारा मन भी निरंतर गतिशील रहता है। जितना अधिक वह शक्तिशाली होता है, उतना ही अधिक जीवंत और सक्रिय होता है। किन्तु वह व्यक्ति वास्तव में सौभाग्यशाली है जो इस ऊर्जा को शुभ और श्रेष्ठ कार्यों की ओर मोड़ देता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को भाग्य के अधिकार-क्षेत्र से बाहर स्थापित कर लेता है। वह समृद्धि को संयमित रखता है, विपत्तियों को छोटा कर देता है, उन वस्तुओं को तुच्छ समझता है जिनकी अन्य लोग प्रशंसा करते हैं।



    महान आत्मा विशाल धन-संपत्ति को तुच्छ समझती है। वह अपार वैभव की अपेक्षा सीमित और संतुलित साधनों को अधिक पसंद करती है। क्योंकि संयम उपयोगी और जीवनदायी होता है जबकि अति-समृद्धि अपनी अधिकता के कारण मनुष्य को हानि पहुँचाती है। यह उसी प्रकार है जैसे गेहूँ की ऐसी भारी उपज जिसका भार बालियों को झुका दे। या फलों का ऐसा बोझ, जो शाखाओं को तोड़ डाले।  या ऐसे पशु, जो इतने अधिक बच्चे उत्पन्न करें कि उनमें से सभी परिपक्वता तक न पहुँच सकें। मनुष्य का मन भी इसी प्रकार प्रभावित होता है, जब वह अत्यधिक समृद्धि द्वारा बिगाड़ दिया जाता है। तब वह उस समृद्धि का उपयोग न केवल दूसरों के अहित के लिए करता है बल्कि अंततः अपने ही नुकसान के लिए भी।

    कौन-सा शत्रु कभी किसी मनुष्य के साथ उतनी कठोरता से पेश आया है जितनी कठोरता से कुछ लोगों के अपने ही सुख और भोग-विलास उनके साथ पेश आते हैं? उनकी इच्छाएँ अनियंत्रित होती हैं, मानो उन्मादग्रस्त। वे क्षमायोग्य भी न होतीं, यदि उनका दुष्परिणाम केवल उन्हीं पर न पड़ता। यह भी बिना कारण नहीं है कि वे ऐसे उन्माद से पीड़ित रहते हैं। क्योंकि जो इच्छाएँ प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती हैं, वे अनिवार्य रूप से अनंत की ओर बढ़ती चली जाती हैं। प्रकृति ने हमारी आवश्यकताओं की एक सीमा निर्धारित कर रखी है परंतु शून्य और विकृत इच्छाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि उनकी कोई सीमा नहीं होती। हमारी आवश्यकताएँ उपयोगिता द्वारा मापी जाती हैं। लेकिन उसके आगे सीमा-रेखा कहाँ खींची जा सकती है?

    इस प्रकार वे स्वयं को भोग-विलास में डुबो देते हैं और उनके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि फिर उनके बिना रह ही नहीं सकते। उनकी सबसे बड़ी दुर्दशा यह है कि जो वस्तुएँ कभी विलासिता थीं, वे अब उनके लिए आवश्यकताएँ बन चुकी हैं। वे अपने सुखों का उपभोग नहीं करते बल्कि उनके दास बन जाते हैं। सबसे बुरी बात यह है कि वे अपने भीतर की सबसे निकृष्ट प्रवृत्तियों से भी प्रेम करने लगते हैं। उनकी स्थिति का सबसे भयावह पक्ष यह है कि वे न केवल अपने लज्जाजनक आचरण में आनंद लेते हैं बल्कि उसे उचित भी मानने लगते हैं। जब अवगुण ही आचरण का नियम बन जाता है, तब सुधार या उपचार की कोई संभावना शेष नहीं रहती।

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