प्रिय लूसीलियस
मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुम मुझे इतनी बार पत्र लिखते हो क्योंकि इस प्रकार तुम मुझे अपना स्वरूप दिखाते हो जितना किसी अनुपस्थित व्यक्ति के लिए संभव है। ऐसा कभी नहीं होता कि तुम्हारा पत्र मुझे मिले और मुझे तुरंत यह न लगे कि हम साथ हैं। यदि अनुपस्थित मित्रों के चित्र हमें आनंद देते हैं, हमारी स्मृति को ताज़ा कर देते हैं और वियोग की पीड़ा को कुछ सांत्वना देकर हल्का कर देते हैं। यद्यपि वह सांत्वना आभासी और रिक्त ही क्यों न हो तो पत्र कितने अधिक आनंददायक होते हैं क्योंकि वे अनुपस्थित मित्र के वास्तविक चिह्न और वास्तविक समाचार लेकर आते हैं। क्योंकि किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष देखने में जो सबसे मधुर बात होती है, वही एक ऐसे पत्र में भी मिल जाती है जिस पर मित्र के हाथों की छाप अंकित हो... पहचान का वह सुखद क्षण।
तुम लिखते हो कि तुम्हें दार्शनिक सेरापियो (Serapio) को सुनने का अवसर मिला, जब वे तुम्हारे क्षेत्र के पास कुछ समय के लिए ठहरे थे। “उनकी शैली यह है कि वे शब्दों की एक प्रबल धारा बहा देते हैं। वे उन्हें एक-एक करके नहीं छोड़ते बल्कि मानो झुंड के झुंड आगे हाँक देते हैं। इतने शब्द एक साथ निकलते हैं कि उन्हें सँभालने के लिए एक आवाज़ भी पर्याप्त नहीं पड़ती!” मुझे किसी दार्शनिक में यह शैली पसंद नहीं है। दार्शनिक की वाणी उतनी ही संयमित और सुव्यवस्थित होनी चाहिए जितना उसका जीवन। जो कुछ भी अत्यधिक उतावलेपन में होता है, वह व्यवस्थित नहीं हो सकता। इसी कारण होमर (Homer) ने अपने काव्य में हिम-तूफ़ान के समान तीव्र और अविराम वाणी युवा वक्ता को दी है जबकि मधु से भी अधिक मधुर और शांत प्रवाह वाली वाणी वृद्ध वक्ता के हिस्से में रखी है।
मेरा विश्वास करो, जिस शब्द-प्रवाह का तुमने वर्णन किया है, वह किसी गंभीर और महत्त्वपूर्ण कार्य करने तथा उसे सिखाने वाले व्यक्ति की अपेक्षा व्याख्यान-मंच के लिए अधिक उपयुक्त है। यह नहीं कि मैं शब्दों की धीमी टपकन या रुक-रुककर बहने वाली धारा चाहता हूँ। लेकिन मैं बाढ़ जैसी उफनती वाणी भी नहीं चाहता। वक्ता को न तो श्रोताओं के कानों को प्रतीक्षा करते-करते थका देना चाहिए और न ही उन पर शब्दों का ऐसा प्रहार करना चाहिए कि वे अभिभूत हो जाएँ। क्योंकि अत्यन्त क्षीण और निर्धन-सी वाणी श्रोताओं को कम सजग बनाती है। वे उसकी धीमी और अटकती हुई गति से ऊब जाते हैं। फिर भी, जो बात हमें थोड़ी प्रतीक्षा कराती है, उससे हम उस बात की अपेक्षा अधिक आसानी से सीखते हैं जो हमारे सामने से उड़ती हुई निकल जाती है। फिर, हम कहते हैं कि उपदेश या शिक्षाएँ शिष्य को 'प्रदान' की जाती हैं। जो बात भागती चली जाए, उसे भला प्रदान करना कैसे कहा जा सकता है?
इसके अतिरिक्त, जो वाणी सत्य की खोज करती है, वह बनावटी नहीं बल्कि सरल और स्वाभाविक होनी चाहिए। यह लोकप्रिय वक्तृत्व-शैली सत्य से कोई संबंध नहीं रखती। उसका उद्देश्य भीड़ को उत्तेजित करना, असावधान कानों पर चुपके से अधिकार कर लेना और उन्हें आवेग के बल पर बहा ले जाना होता है। वह स्वयं को जाँच-परख के लिए प्रस्तुत नहीं करती बल्कि तुरंत आगे निकल जाती है। लेकिन यदि वाणी स्वयं ही असंयमित हो तो वह हमें अनुशासन कैसे सिखा सकती है? यह भी याद रखो कि जिस वाणी का उद्देश्य मन को स्वस्थ करना है, उसे हमारे भीतर गहराई तक उतरना चाहिए। जो औषधियाँ शरीर में ठहरती ही नहीं, वे प्रभावी नहीं हो सकतीं। और वैसे भी, यह लोकप्रिय शैली प्रायः खोखली और निरर्थक होती है। उसमें सार से अधिक शोर होता है। मुझे ऐसी वाणी चाहिए जो मेरे भय को शांत करे, मेरे क्रोध को संयमित करे, मेरे भ्रमों को दूर करे, मेरे भोग-विलास को सीमित करे और मेरे लोभ को धिक्कारे। इनमें से कौन-सा कार्य जल्दबाज़ी में किया जा सकता है? कौन-सा वैद्य यात्रा करते-करते ही रोगियों का उपचार कर देता है?
ज़रा इस पर भी विचार करो। शब्दों के ऐसे कोलाहल से जो बिना किसी विवेक के निरंतर दौड़ता चला जाता है, कोई विशेष आनंद भी प्राप्त नहीं होता। सामान्यतः जब कोई ऐसी बात घटती है जिसे तुम असंभव समझते थे तो उसके बारे में एक बार सुन लेना ही तुम्हारे लिए पर्याप्त होता है। इसी प्रकार उन लोगों की वाणी भी है जो शब्दों को बस दौड़ाते रहते हैं। उन्हें एक बार सुन लेना ही काफ़ी है। आख़िर ऐसी वाणी में ऐसा क्या होता है जिसे कोई सीखना चाहे या जिसका अनुकरण करना चाहे? जब किसी वक्ता की वाणी अव्यवस्थित, अनियंत्रित और रुकने में असमर्थ हो तो उसके मन के बारे में क्या निर्णय किया जा सकता है? जैसे कोई व्यक्ति ढलान पर दौड़ते हुए ठीक वहाँ नहीं रुक पाता जहाँ उसका इरादा था बल्कि अपने शरीर के वेग के कारण उससे कहीं आगे निकल जाता है, वैसे ही वाणी की यह अत्यधिक तीव्रता स्वयं अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रखती। ऐसी वाणी दर्शन के लिए उपयुक्त नहीं है। दर्शन को अपने शब्दों को सावधानी से रखना चाहिए, उन्हें उगलना नहीं चाहिए। उसे एक-एक कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
“तुम्हारा क्या मतलब है? क्या वाणी को कभी-कभी उड़ान नहीं भरनी चाहिए?” निश्चय ही भरनी चाहिए। लेकिन इस प्रकार कि उसकी गरिमा बनी रहे। अत्यधिक उग्रता उस गरिमा को छीन लेती है। दर्शन में महान शक्ति होनी चाहिए पर वह शक्ति नियंत्रण में होनी चाहिए। उसकी वाणी एक निरंतर बहने वाली धारा के समान होनी चाहिए बाढ़ के समान उफनती हुई नहीं।
मैं तो किसी वकील को भी इतनी तीव्र गति से बोलने की अनुमति शायद ही दूँ। क्योंकि ऐसी वाणी बिना नियंत्रण के आगे बढ़ती चली जाती है और फिर उसे वापस नहीं बुलाया जा सकता। ऐसे में न्यायनिर्णायक (जूरी) उसका अनुसरण कैसे कर पाएँगे? विशेषकर इसलिए कि जूरी के सदस्य कभी-कभी अनुभवहीन और अप्रशिक्षित भी होते हैं। यहाँ तक कि जब कोई वकील अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के उत्साह में हो या अपनी भावनाओं के आवेग में बह रहा हो, तब भी उसे अपनी वाणी की गति और विचारों के संचय को उतनी ही सीमा में रखना चाहिए जितना श्रोता का कान ग्रहण कर सके।
इसलिए तुम ठीक ही करोगे यदि उन लोगों की परवाह न करो जो यह देखते हैं कि कोई कितना बोलता है, यह नहीं कि कितना अच्छा बोलता है। और यदि चुनाव करना ही पड़े तो मैं चाहूँगा कि तुम रुक-रुककर बोलो, जैसे पबलियस विनिशियस (Publius Vinicius) बोलते थे। जब किसी ने एसेलियस (Asellius) से पूछा कि विनीशियस की वाणी कैसी थी तो उसने उत्तर दिया, “टुकड़ों-टुकड़ों में।” जैसा कि जरमिनियस वेरीयस (Geminius Varius) ने कहा था, “मैं नहीं समझता कि तुम उस व्यक्ति को वक्ता कैसे कह सकते हो। वह तीन शब्द भी एक साथ नहीं जोड़ पाता।” फिर भी, तुम विनीशियस की तरह बोलना क्यों न पसंद करोगे? तो क्या हुआ यदि कोई मसखरा तुम्हें वैसा ही कुछ कह दे जैसा एक व्यक्ति ने विनीशियस से कहा था, जब वह शब्द खोजते हुए बोल रहे थे, मानो भाषण नहीं दे रहे हों बल्कि किसी को लिखवा रहे हों। उसने कहा, “कहो, क्या तुम कुछ कहने भी वाले हो?” फिर भी, यद्यपि क्विंटस हेटेरियस (Quintus Haterius) अपने समय के अत्यंत प्रसिद्ध वक्ता थे, उनकी तीव्र और अविराम बोलने की शैली वही चीज़ है जिससे मैं किसी समझदार व्यक्ति को बचने की सलाह दूँगा। वे कभी नहीं रुकते थे, कभी साँस लेने के लिए भी ठहरते नहीं थे। एक बार बोलना शुरू करते तो केवल अंत आने पर ही रुकते थे।
मेरा विचार है कि कुछ बातें कुछ जातियों और लोगों के स्वभाव के अधिक अनुकूल होती हैं और कुछ कम। यूनानियों में ऐसी भाषिक उच्छृंखलता को सहन किया जा सकता है। पर हम रोमन तो लिखते समय भी विराम-चिह्न लगाने का ध्यान रखते हैं। सिसरो (Cicero) जो रोमन वाक्पटुता के महान स्रोत थे, वे भी एक-एक कदम बढ़ते हुए आगे बढ़ते थे। रोमन वाणी अधिक सावधान होती है। वह स्वयं का मूल्य समझती है और दूसरों को भी उसका मूल्यांकन करने का अवसर देती है। फैबिआनस (Fabianus) जीवन-चर्या में भी उत्कृष्ट व्यक्ति थे, ज्ञान की गहराई में भी और साथ ही वाक्पटु भी थे। यद्यपि यह अंतिम गुण अपेक्षाकृत कम महत्त्व का है। वे अपने व्याख्यान उत्साहपूर्ण आवेग के साथ नहीं बल्कि प्रभावी और व्यवस्थित ढंग से देते थे। उनके बारे में यह कहा जा सकता था कि उनमें भाषा की सहजता थी परन्तु अत्यधिक तीव्र गति नहीं थी। मैं मानता हूँ कि यह गुण एक बुद्धिमान व्यक्ति में हो सकता है, यद्यपि मैं इसे अनिवार्य नहीं मानता। निश्चय ही उसकी वाणी बिना किसी बाधा के प्रवाहित हो। परन्तु प्रवाह और उफान में अंतर है। मैं उफनती हुई धारा की अपेक्षा संयमित और नियंत्रित प्रवाह को अधिक पसंद करता हूँ।
तुम्हें उस संक्रामक प्रवृत्ति से दूर रहने की सलाह देने का मेरे पास एक और कारण है। तुम ऐसी बोलने की शैली को अपनी लज्जा-भावना खोए बिना अपना ही नहीं सकते। तुम्हें अपनी संवेदनशीलता को कुंठित करना होगा और कभी स्वयं को सुनना नहीं होगा। वह लापरवाह और बेलगाम वेग अपने साथ अनेक ऐसे शब्द और अभिव्यक्तियाँ ले आएगा जिन्हें तुम स्वयं आलोचना के योग्य समझोगे। मैं फिर कहता हूँ, अपनी शालीनता और मर्यादा-बोध को खोए बिना तुम इसे प्राप्त नहीं कर सकते।
इसके अतिरिक्त, इसके लिए तुम्हें प्रतिदिन अभ्यास करना पड़ता है। इसका अर्थ है कि अपनी शक्ति विषय-वस्तु के बजाय शब्दों पर लगाना। यदि शब्दों का तीव्र प्रवाह तुम्हें सहज रूप से प्राप्त हो बिना किसी विशेष प्रयास के भी, तब भी तुम्हें उसे नियंत्रण में रखना चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार एक बुद्धिमान व्यक्ति की चाल-ढाल विनम्र और संयमित होनी चाहिए उसी प्रकार उसकी वाणी भी नियंत्रित होनी चाहिए, उतावली नहीं। मेरे समस्त निष्कर्ष का सार और मेरा निर्देश, यह है, धीरे बोलो।
अभी के लिए विदा
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