Tuesday, 25 April 2017

उजला कपड़ा पेनो नक्को

आज सुबह जब मैं अपनी ही बिगड़ी हुई तबीयत से नासाज़ थी तभी गली में एक हल्ला मच गया। माँ इस वक़्त मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही थीं। इस हल्ले से मेरा और माँ का जी मचल गया। माँ जल्दी से उठकर बाहर की तरफ़ लपकी। मैंने आवाज़ों के सहारे परिस्थिति का आकलन करने की अपनी कानाई कोशिशें ज़ारी कर दीं।

माँ अब तक मेरे बिस्तर से उठकर जा चुकी थीं। थोड़ी देर बाद मुझे किसी के दर्द से चिल्लाने की चुभने वाली तेज़ कराहट सुनाई दी। मुझे लगा कोई हादसा हो गया है शायद। मैं बिस्तर से उठकर जाना चाहती थी, पर मैं नाकाम हो गई। लगभग दो घंटे तक मैंने काफ़ी कोशिशें की पर कोई फायदा नहीं हुआ। आसपास कोई बच्चा भी नहीं था कि गली का हाल जान लूँ। घड़ी पर नज़र डाली तो 11 बज रहे थे। बीमारी में वक़्त काफ़ी धीरे चलता है, यह जानकार मैंने लंबी साँसें लीं और आँखें बंद कर लीं।

इसके बाद गली में काफ़ी शांति का माहौल महसूस हुआ और मुझे मुट्ठी भर की नींद आ गई। अपने आप जब आँखें खुलीं तो सामने की दीवार पर नज़रें टिकीं। साढ़े ग्यारह का वक़्त हो चला था। मैं पसीने में भीगी हुई थी। माँ मेरे सिरहाने के पास आकर न जाने कब से बैठी हुई थीं। मैंने बिना देरी किए उनसे पूछा तो पता चला कि मेरे बचपन के दोस्त की मम्मी सीढ़ियों से गिर गई थीं। काफ़ी चोट आई थी। डॉक्टर को बुलाया गया था।

डॉक्टर ने घबराने की कोई बात नहीं वाली बात कही।

वो आराम कर रही थी। इसलिए माँ और गली की औरतें मिलकर उनके घर के काम कर रही थीं। माँ ने खाना बनाया तो साज़िया की अम्मी ने झाड़ू लगा दी और गीता की मम्मी ने कपड़े धोये।
हम, मेरी उम्र से भी कई सालों से बड़े रिश्ते वाले पड़ोसी हैं। कितने बरस हो गए एक साथ रहते। झगड़ा लड़ाई सब कुछ होता है पर जब इस तरह के मामले आते हैं तो गली के बच्चे तक एक नज़र आते हैं। इसके बीच न तो किसी की कंठी आड़े आती है और न ही किसी का ताबीज़। शायद इंसान की मूल भावनाएँ जाग जाती हैं और समाज की सामाजिक परवरिश हार जाती है।

मुझे आजतक सामाजिक और धार्मिक अलगाव वाली परवरिश का फंडा रास नहीं आया। यह इतना हावी है की प्रसादजी और कलामजी को एक साथ रहने के लिए रोकता रहता है। यह उनको भुला देता है कि कोशिका धर्म क्या है या फिर इंसानियत का धर्म क्या है! दुबे जी और महरा जी का अंतर तो बहुत डरावना है। इसमें शोषण की लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया है। 

मुझे आज भी आदि मानव के बारे में जानना और पढ़ना बहुत पसंद है। उसका जीवन अस्थायी और यायावर जरूर था पर वह सहधर्मिता को जानता और मानता, दोनों था। उसके कारवां मुझे बड़े ही हसीन मालूम पड़ते हैं। वो जानता था कि वो धरती पर एक औसत उम्र का मुसाफ़िर है। धर्म के बगैर जीना उसे आता था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई होती थी। शरीर के निचले हिस्से को पत्तों से ढककर रखते थे। सब कुछ सामान्य और अनगढ़ था। जंगल बिना दिवारों वाला घर था तो आसमान सिर के ऊपर का खुला रसीलेदार रोशनदान। जंगल के जानवर उसके पड़ोसी थे। 

                              अल्फ्रेड मरतींज द्वारा निर्मित

मर्द और औरत के रिश्ते भी इतने खुले हुए थे। वे आज़ादी और एक दूसरे के सम्मान की परिभाषा जानते थे। बच्चे मिट्टी में सनकर बड़े हो जाते और संक्रमण का कोई खौफ़ नहीं था। बिना क़लमे और श्लोक वाले लोग। बिना धर्म ग्रन्थों वाली सभ्यता के बाशिंदें। बड़े अस्पताल नहीं थे क्योंकि वह प्रकृति के क़रीब था। प्रकृति सम्माननीय माँ थी। वही उसके दुख में सहारा थी, वही उसकी प्रथम उपचारिणी माता थी। वह उसकी पोषिका थी। आप सोचिए इसके बारे में। एक बार आलोचना वाले दिमाग को ज़रा टेबल पर रखकर सोचिए।

आदि मानव और मानवी सीमा का अर्थ जानता था और थी। उपभोग और संतुलित प्रयोग में उसे अच्छे से अंतर ज्ञात था। वह संयमी था। लालची नहीं था। जल की जरूरत प्यास बुझाने तक थी न कि बिजली के बड़े संयत्र बनाकर खड़े करने की। उसके पास प्रोफ़ेसनल डिग्रियाँ नहीं थी। वह समझदार था अपितु चालाक नहीं, धोखेबाज़ वाला चालाक।

पर समय के साथ विकास नामक तत्व ने जब उसके दिमाग पर दस्तक दी तो पासों के पलटने में देरी नहीं हुई। पासे पलटे तो धारदार और नुकीले औज़ार उपज गए जो बहुत खतरनाक साबित हुए। इन्हीं अंधे औजारों ने कुछ न देखा और न समझा बस अपने काटने के धर्म के अनुयायी बने। सब मेरा है। वे हमारा शब्द भूल गए।

ये औज़ार, अपने साथ एक सामाजिक व्यावहारिक शब्दावली लाये जिसने उसके रहने और उपभोग के तौर तरीकों को बदल दिया। प्रकृति अब सम्मान के बनिस्पत उपभोग के रूप में रह गई। उपभोग क्षय का प्रतीक है और असीम उपभोग महाविनाश का प्रतीक बनने लगा। कमाल का असंतुलित व्यापक तराजू नज़र आता है। वहाँ बीती खुशियाँ हैं जो वर्तमान में कहने और सुनने की बैठक भर के लिए हैं। हमारे यहाँ एक व्यक्ति बहुत अमीर जिसका चार लोगों का आलीशान बंगला है तो कई बच्चों को खाना नहीं मिलता और वे मर रहे हैं। 


हमारा वर्तमान इतना भूखा है कि वह बदहवाशी में किसी अजगर की तरह सबकुछ निगले जा रहा है। नई तकनीकों और ख़्वाहिशों से लैस ये अजगर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। इस अजगर को रोकने के उपाय भी हैं। जाति या वर्ग व्यवस्था पर नज़र दौड़ाई जाये तब बहुत कुछ समझ आ जाता है। कितना शोषण छिपा है इन दोनों टर्मों में। रही सही कसर धर्म और उसके पाखंड ने पूरी कर दी। इसलिए संघर्ष होते रहेंगे। संघर्ष हमारे दौर का अनिवार्य अंग है। 
  

Sunday, 16 April 2017

ऑनलाइन फोटो लीकेज़ और मरम्मत

दिल्ली विश्वविद्यालय की उस छात्रा के कदम के पीछे के कारण को पड़ते हुए एक बात फिर से सोची जानी चाहिए। वह जरूरी बात है। लड़के ने निजी पलों की फोटो ऑनलाइन डाल दिये जाने की धमकी दी थी। वह इस बात से घबरा गई थी। इस बात से मुझे मसान फिल्म की 'देवी' का किरदार याद आ जाता है। क्या उस लड़की ने यह फिल्म नहीं देखी थी? हो सकता है देखी हो, हो सकता है नहीं भी। पर क्यों जरूरी है देवी?

'देवी' ऑनलाइन और बे-ऑनलाइन समाज की सोच को समझने में मदद तो करती ही है साथ ही वह जानती है कि 'मुझे' आत्महत्या नहीं करनी है। वो इज्जत नाम के पर्दे को धकियाकर इसी बीमार समाज में जी कर दिखाती है। अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीती है। दिलचस्प बात यह भी है कि देवी गंगा किनारे वाली लड़की है। उसका पहनावा और बोलचाल मासूम और साधारण है। और तो और दिमाग खराब हो तो नौकरी भी लात मार के चल देती है। हालांकि फिर भी लोग यह कहेंगे कि यह तो फिल्म में है। रियल ज़िंदगी में कोई भी शर्म से मर जाएगा। हो सकता है मर जाये, पर आगे यह भी हो सकता है न मरे। यह दुनिया है। यहाँ कुछ भी हो सकता है।



जब मैं लाज या लज्जा शब्द सोचती हूँ तब मुझे यह बड़े लिजलिजे से मालूम होते हैं। जैसे गर्मी के कारण पिघला हुआ गुड़। जैसे शहद की टपकती हुई बूंद। और भी। अभी याद नहीं आ रहा। यह परंपरा का हिस्सा है जो सड़ा हुआ टमाटर है। यह औरत के शरीर की बनावट और उसके अपने शरीर के साथ रहने के तौर तरीक़े से चिपके हुए कई सदियों से उसे दीमक की तरह खा रहा है। कुटर--कुटर ऐसी ही आवाज़ मैंने बांस में लगी दीमकों से सुनी थी कुछ वक़्त पहले। लाज, शरीर और औरत की हरकतों से कितने महीन तरीके से जुड़ा है कि इसे अलग कर के देखा नहीं गया कभी। चेहरा, छाती या हर वो अंग जो ढकने के लिए निर्देशित है सब छुपा लो। वह प्रक्रिया छुपा लो जिसे दो लोगों पाया जाता है। कितने दकियानूस नियम हैं। सिर्फ औरत के लिए। औरत शिकार है। कितना कोमल शिकार।

जो नहीं शर्माएगी, वो तो बदचलन है। खुला निमंत्रण भी है आओ और जो चाहे कर लो। यही सोचता है यह लोगों का बेतरतीब गुच्छा। भीड़ है। क्योंकि समाज ये नहीं होते। होते हैं क्या?

ए लड़कियों! सुनो। तुम्हारी पॉर्न फिल्में करोड़ो के कारोबार को हर साल निबाह जाती हैं। जब लोगों को पॉर्न देखते हुए शर्म नहीं आती तो तुम क्यों इतना घबरा जाती हो ऑनलाइन फोटो लीकेज़ से?  क्या लोगों के तुमसे जुदा अंग होते हैं? क्या स्तनों का प्रकार अलग होता है? क्या जो लोग तुम्हारी फोटो देखकर हाआआ...कर के मुंह खोलते हैं या खोलती हैं, उनका जिस्म तुमसे जुदा है? ज़िंदगी के सबसे बड़े डर को सामना कर के समझा जा सकता है कि वह डर बहुत छोटा था। मत डरिए इन सब बातों से। सभी लोगों में एक खामोश लड़ाकू (वरियर) होता है। उसे उभारिए और लड़ जाइए। यही नियम और उसूल है।

अपनी ज़िंदगी को यूं न खत्म करो। लड़े बिना हार जाना सबसे बड़ा अपराध खुद के और कुदरत के खिलाफ है। क्या आपको नहीं पता कि लिक्स होने पर रींच से उसे दुरुस्त किया जा सकता है। जब पानी के पाईप ठीक कर दिये जाते हैं तो ज़िंदगी को क्यों नहीं मरम्मत के संदर्भ में देखा जा सकता! हमारी ज़िंदगी के साथ कुछ अटपटा होगा या वह बीमार कर दी जाएगी तो आपको डॉक्टर बनना ही होगा।  

फोटो लीक्स की धमकी देना एक अपराध है पर कानून ने उसकी मदद नहीं की। बल्कि कहा समझौता कर लो। कानून से यकीन उठ सा गया है। हमारी एक समाज के नाते, एक संस्था के नाते भी बहुत बड़ी लापरवाही सामने आती है। हम ज़िंदगियों को लेकर संवेदनशील नहीं है। हमें अपने समाज और कानून की कड़ी आलोचना करनी ही होगी। 







Saturday, 1 April 2017

मृत्यु

अपने कपड़ों में लगे रक्त की गंध से वह भागने का प्रयास कर रहे थे। इसी प्रयत्न में वे बहुत देर से चले जा रहे थे। उन्हें स्वयं भी नहीं पता था कि उनके पग किस डगर और पथ पर हैं। जहां मस्तिष्क कहता वे वहीं पग बढ़ा देते।
वातावरण में तेज़ धूप थी और गरम लू सौगात के रूप में हर जगह फैली हुई थी। गर्मी अपने चरम पर थी। सूर्य मानों कुपित होकर आग उगल रहे थे। आसपास की सुखी हुई और बेजान घास एक चिंगारी की प्रतीक्षा में बैठी हुई थी। आकाश का सूनापन अपने में विशाल हो चला था। दृष्टि आसमान की ओर देख नहीं सकती थी। और तो और कहीं भी बादल का एक छींटा तक नहीं था।
खगों का भी न तो अता था और न ही पता। कदापि किन्हीं तरूओं की शीतल छाया में किन्हीं ओट में वे अपने जीवन की इस भीषण गर्मी से रक्षा कर रहे थे।
कुछ क्षणों के लिए उन्होंने इस माहौल में अपने दायें हाथ की ओट माथे पर बनाई और चारों ओर देखा। निर्जल और निर्जन भूमि दूर प्रदेश तक फैली हुई थी। वे भली प्रकार से परिचित थे कि ये युद्ध का परिणाम है। इसी के चलते आवरण में इस प्रकार की स्थिति बन पड़ी है। पर वे तो घर की ओर लौट रहे हैं। वे इन सब के बारे में पुनः नहीं सोचना चाहते। उनके ईश्वर मन ने कहा, “ये आप किस प्रकार के स्मृति चित्र में उलझ गए? ये आपका कार्य नहीं। आप ईश्वर हैं। अतः ईश्वर के समान ही व्यवहार करें।”
मानव मन कुछ न बोल सका। वे क्षत विक्षत था। युद्ध के कारण उसकी मानवता पर गहरा आघात पहुंचा था। वह विषाद की खाई के गुप्प अंधेरे में घुट रहा था।
पर इतना तय था कि ये अवतार मन की अकुलाहट के कारण अस्थिर था। वह सूर्य को आदेश देना चाहते थे कि अपना सूर्यताप कम करे ताकि सभी को आराम मिले। पर न जाने क्या सोचकर आदेश नहीं दिया। तीन चार लंबी लंबी सांसें लेने के पश्चात आगे बढ़ गए।
उनकी पीली और चमकदार पवित्र धोती पर रक्त के धब्बे अब तक सूर्य ताप के कारण सुखकर काले बन गए थे और एक तीव्र गंध लेकर उनके साथ-साथ चल रहे थे। बहुमूल्य आभूषण और मोतियों की मालायें उनको अब सहन नहीं हो रही थीं। माथे के ऊपर रखा स्वर्ण मुकुट जिसमें कि मोहक मोर पंख लगा था, वह भी कदापि युद्ध भूमि में कहीं गिर चुका था। इस बात की उनको खबर भी नहीं थी।

                           लोटी गारिनों द्वारा चित्रित 

नमकीन बहते स्वेद से उनकी श्याम वर्ण पर चमकीली देह छिल गई थी। उनके चलने पर हिलते डुलते आभूषण त्वचा की छिलन पर भयंकर पीड़ा छोड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद वे उकता गए और मालाओं को तीव्रता से खींच कर नीचे फेंक दिया। जहां-जहां वे मालाएँ गिरीं तहां तहां हरी घास उग आई और जहां मुकुट गिरा वहाँ हरा भरा किसी प्रकार का पेड़ यकायक उग आया। विचित्र बात थी कि ईश्वर के इस अवतार ने अपनी दिव्यता के प्रमाण को धीरे धीरे अपने से अलग कर दिया था। कदापि वे अवतार की वेषभूषा से अलग होना चाह रहे थे। यह चमत्कार था। पर दिव्यता अलग की जा रही थी।  
पर उद्विग्न मन ने उन्हें पस्त कर दिया था। थोड़ी देर जब उन्होंने कानों को टिका कर रखा तो एक संवाद की भिनभिनाहट सुनाई पड़ी। कानों को दायें और बाएँ घुमाया। पर उन्हें आवाज़ का पता नहीं चला। ध्यान लगाया। नेत्रों को बंद किया तो पता चला कि उनके अंतर में ही संवाद गूंज रहे थे।
मनुष्य मन और दिव्य मन के मध्य। देव मन ने कहा, “आप ऐसा बिलकुल नहीं कर सकते। लोग क्या कहेंगे कि उनके ईश्वर को क्या हो गया है! आप ईश्वर हैं। सर्वशक्तिमान। सर्वज्ञ। सर्वव्यापी। समस्त सृष्टि के पालनकर्ता होने के पश्चात भी आप इस व्यवहार में जकड़ गए हैं। अपनी बनाई सृष्टि की चिंता करना ठीक नहीं। मत सोचिए कुछ भी। युद्ध तो होना निश्चित था ही। याद रखिये, आप एक ईश्वर हैं। लोगों की कामना पूरी करने वाले। एक देवता अवतार।”
मनुष्य मन के नेत्र अधखुले थे। वह देव मन की बातों को सुनकर कुछ न बोल सका। क्या कहता? ईश्वर मन तो महान होता है। उसे कौन काट सकता है! पर इतना निश्चित था कि जो भीषण युद्ध अभी कुछ समय पहले हुआ उसके विषाद के दल दल में वे धँसे चले जा रहे थे।
इस क्षण के बाद उन्होंने पग फिर आगे बढ़ा दिये। इस बार उनकी चेष्टा में बहुत ऊर्जा थी। युद्ध के शस्त्रों के प्रयोग का परिणाम मानव और पृथ्वी पर समान रूप से पड़ा था। पृथ्वी ने मानों अपने पिता के मरने पर मुंडन करवा लिया है। इस मुंडन में उसने अपने समस्त संसाधनों को खो दिया। कुछ भी नहीं बचा उसके पास। उसके नेत्र भी सुख गए थे।
बहुत देर से चलने के कारण उन्हें सिर चकराने और मितली की स्थिति को देखना पड़ा। आँखें चौंधियाँ गईं। दो पल अनुभव हुआ कि वे गिर जाएंगे।
...और ऐसा हुआ भी।
देवता भूमि पर गिरे या वह मनुष्य। ये पता नहीं चला। पर उनमें से कोई एक गिर गया था। निर्जीव और मूर्छित होकर।
अब तक अंधेरा होना आरंभ हो गया था। समय की बेल जब आगे बढ़ी तब सांझ के मुस्काते अंधेरे तले दोनों में से किसी एक को होश आया। नेत्र खोल कर देखा तो उन्होंने अपने आप को हरी हरी पत्तियों से लदे एक वृक्ष के नीचे पाया।
थोड़ा कमर पर बल लगाकर धड़ को उठाया और पीछे पड़े काले पत्थर पर टेक लगा ली। सिर को हौले हौले इधर से उधर घुमाया। कुछ न देख, सुन, सूंघ और अनुभव कर पाने पर नेत्रों को बंद कर लिया।
इस अंतराल को बीतते हुए देरी न लगी और उषा ने दिन के द्वार पर दस्तक दे दी।
आँखें खुली तो उनकी थकान हल्की कम हो गई थी। पल को सोचा कि दाऊ भईया को ये संदेश भेज दूँ कि मैं तनिक भी उचित अनुभव नहीं कर रहा। कोई रथ भिजवा दें तो मैं द्वारका आ जाऊँ। पर इस बीहड़ स्थान से कैसे और किससे संदेश भिजवाया जाये, जैसे ही वे इतना सोचने बैठे ही थे कि सिर फिर चकरा उठा। कई तीव्र और भयानक प्रहार उनके मस्तिष्क पर होने लगे। वो तड़प उठे। चक्करों के साथ उनको उल्टी भी होने लगी।
उन्हें इस क्षण यशोदा मैया की स्मृतियों ने घेर लिया। जब वे बाल रूप में थे तभी से लोगों ने उन्हें भगवान कहना शुरू कर दिया था। वो कहाँ कहलाना चाहते थे। मैया उन्हें कतई ईश्वर नहीं मानती थीं। वे तो केवल उन्हें अपना कन्हैया मानती थीं। किसी भी प्रकार विकट समय में घंटों उनके पास बैठी रहती थीं। माँ अपने बच्चों को कभी भी अकेला नहीं रहने देती। दुख या विपत्ति के समय में तो सबसे पहले आगे खड़ी रहती है। यदि आज यहाँ यशोदा मैया होती तो नजाने उनकी कन्हैया को देख कर क्या दशा होती।
उन्होंने स्वयं अपने को किसी प्रकार संभाला और ये निर्णय किया कि वे मैया के पास जरूर जाएंगे। वहीं उनका आराम है। वहीं उनका चैन है। वे द्वारकाधीश नहीं बनेंगे। वापस नंदगांव जाएंगे।
इसी सोच में कुछ क्षणों के लिए उन्होंने अपने सृष्टि नयनों को बंद किया। इस मन की चंचलता में वे फंस गए थे। फिर सोचने लगे कि यहाँ उनको कौन लाया या वो किस प्रकार यहाँ आ पहुंचे? क्योंकि वे तो मूर्छित हो गए थे। इधर उधर आवाज़ें सुनने का प्रयास किया। किन्तु महीन आवाज़ों में भी किसी मनुष्य और जन्तु की उन्हें बू तक न मिली।
उन्हें हल्की हवा में बहुत आराम मिल रहा था। निकट ही बहते हुए झरने की ध्वनि को अभी तक उनके चंचल मन ने सुनने नहीं दिया था। वे हर्षित हो कर अपनी जग मुस्कान फैलाने लगे। अपने दर्द को सहते हुए उठे और झरने की ओर चल दिये।
हाथों की कटोरी से उन्होंने कई बार अपने मुख को धोया। उन्हें इस अवस्था में देखकर कौन कहेगा कि ये महान अवतार हैं। वे बिलकुल मनुष्य बन बैठे थे। वे सोच रहे थे। वे भटक गए थे। वे स्मृति मोह में फंस गए थे। लाखों लोगों की मृत्यु को अपने कंधे पर लेकर चल रहे थे। आत्मग्लानि से पूर्ण थे। वे गीता उपदेशक नहीं थे। वे तो मनुष्य थे।
हाथों की अंजुली से ही उन्होंने जलपान किया। उनका मन शांत हुआ। गीले हाथों से ही सिर को कई बार धोया। स्वेद से छलनी हो चुकी त्वचा पर शीतल जल डालने पर संतुष्टि मिली। नजाने इन दोनों में से किसको आराम मिल रहा था। ईश्वर को या मनुष्य को। ईश्वर तो इन सब से ऊपर है।
ईश्वर, वह क्या है, कैसा है, किस स्वाद का है, उसकी भूख क्या है, उसकी जिह्वा क्या है,.. कोई नहीं जानता। किसने उसकी रचना की अथवा उसने अपनी रचना कैसे की ये भी कहानियों में तो लिखा है पर उन कहानियों में कितनी कल्पना है और कितना यर्थाथ है, किसे पता?
पर यहाँ इस व्यक्ति पर भगवान के अवतार होने का आरोप है। उसे तो लोग ईश्वर ही मानते हैं। इनके कई नाम हैं। ये ज्ञान की राशि है। पर उनके इस अवतार में एक मनुष्य भी बसता है। शायद इसलिए वह इस दशा में यहाँ उपस्थित हैं। शरीर के कष्ट एक यर्थाथ के समान हैं। उसका दर्द मन का बहका देता है।
जल की शीतलता का प्रभाव इस गर्मी में अधिक समय नहीं रह सका। ताप की तीव्रता से वे फिर मूर्छित दशा की तरफ जाने लगे। उन्हें अपने सिर में कई चलचित्र चलते हुए दिखाई देने लगे। चित्र में रक्त रंजीत शव दिखे। वह भय युक्त हो गए। इतने अधिक शव। किसी का धड़ है तो मुंडी नहीं, किसी का हस्त नहीं है, किसी का पैर नहीं। हृदय भेदी क्रंदन मानो ध्वनियों का गुच्छा बनाकर उनसे टकरा रहा था।  इस प्रकार के चित्र से वे भागने लगे। उन सब में एक समानता थी कि वे सब एक मामूली मानव थे। इनका युद्ध में संहार हुआ था।
अब वे संभलकर उन चित्रों को ध्यानपूर्वक देखने लगे। सदैव आभामंडित रहने वाला मुख इन चित्रों को देखने के कारण स्वेदयुक्त हो चला। हर शव को यह पीतवस्त्रधारी व्यक्ति सूक्ष्म दृष्टि से देखने लगा। कौन पांडव सैनिक हैं और कौन कौरव सैनिक हैं इसका बिलकुल पता नहीं चला। उनका धर्म वध हुआ था अथवा उनकी अधर्म हत्या की गई थी, इस प्रश्न ने उनके आगे आकर अंधेरा आच्छादित कर दिया।
ये तो निर्जीव शव थे। फिर भी इन चित्रों में वे शव उनसे उठ कर सवाल कर रहे थे।
ये शव व्यर्थ में भगवान के मस्तिष्क को अपने प्रहार से घायल कर रहे थे। उसी चित्र में एक भुने हुए गेंहू के रंग का व्यक्ति अपने दायें हाथ में एक कटा हुआ लहूलुहान शीश लेकर उनके आगे आकर खड़ा हो गया। उसने सफ़ेद मैली धोती पहनी थी। रक्त के कुछ धब्बे उसकी धोती पर पड़ गए थे। वे गर्मी से तो व्याकुल नहीं था पर उस शीश को देखकर अपने अश्रुओं को बहा रहा था।
शीश उनके पास लाते हुए बोला, “आप ही माधव हैं?”
उनके उत्तर से पूर्व वह पुनः शीश की ओर देखते हुए बोला, “हाँ। मुझे विदित है कि आप ही माधव हैं। आपके कभी दर्शन नहीं हुए। पर आपकी इतनी ख्याति है कि आपको कौन नहीं पहचान लेगा। आज आप से मिलने का अवसर मिला है। इससे पूर्व आपके कभी दर्शन नहीं हुए थे। पर आज मुझे आपके दर्शन का दिव्य अवसर मिल गया।”
वे अभी तक उसे सुन रहे थे। सुनकर बोले, “मैं माधव नहीं हूँ। देखो! मेरी दशा। मैं तो तुम्हारे समान ही एक साधारण मानुष हूँ।”
व्यक्ति सिर हिलाते हुए बोला, “नहीं कृष्ण, ऐसे न कहिए। आप मोरपंख मुकुट धारी हो। आप पीताम्बर हो। सुदर्शनधारी हो। देखिये मेरे हस्त में ये जो शीश है, ये मेरा छोटा भाई था। इसकी पांडव कौरव युद्ध में मृत्यु हो गई। ये अधर्मी नहीं था। ये तो केवल अपने राजा की आज्ञा का पालन कर रहा था। न करता तो कहाँ जाता। आपकी सेना में शामिल नहीं किया गया। इस छोटे से सैनिक को धर्मराज युधिष्ठिर से मिलने ही नहीं दिया गया। अब इसके परिवार को देखने वाला कोई नहीं। इसे जीवित कर दीजिये प्रभु। जीवित कर दीजिये।
वे बोले, “मैं कैसे जीवित कर सकता हूँ? और वैसे भी ये विधि का विधान है कि जो जीवित है वह तो मरेगा ही। यही सृष्टि का नियम है।”
वह व्यक्ति बिलख पड़ा। बोला, “क्या मेरा भाई अभिमन्यु और उत्तरा के गर्भ पुत्र परीक्षित से भिन्न है? उसे भी तो आपने जीवित किया था। वह जीवित हुआ, तो मेरा भाई भी क्यों नहीं हो सकता? दया कीजिये प्रभु।” वह ऐसा कह अपने घुटनों के बल गिर कर बैठ गया।
वे चुप हो गए।
माधव ने अपनी आंखे बंद कर ली।... फिर लंबी सांसें और कुछ भी नहीं।
पर...वे चिल्ला उठे। चलते हुए चलचित्र तुरंत अदृश्य हो गए। उनके पैर के तले पर एक विषैला बाण लगा। वे बिलख गए।
इस बाण के चालक ने जब उनके सम्मुख आकर देखा तब वह द्रवित हो उनके चरणों में गिर पड़ा।
अपने इस कृत्य की क्षमा मांगते हुए बोला, “मुझे क्षमा कीजिये प्रभु। अपनी त्रुटिवश आप पर बाण चला बैठा।”
वे व्यथित पीढ़ा से कहराते हुए बिना देखे ही बोले, “क्षमा मत मांगो। तुमने तो मेरा उद्धार किया है। मुझे जीवन से मुक्ति दिला दी। मैं अपने मनुष्य अंतर मन में चल रहे विचित्र संवादों से त्रस्त था। प्रश्नों का उत्तर भी नहीं दे पा रहा था। जीवन के कृत्यों के फलों को भुगत रहा था। मैं भी एक साधारण व्यक्ति था। मेरी भी एक माँ थी, एक प्रेमिका, सखा थे, भाई थे। मैं द्रवित हूँ। मनुष्य योनि में हूँ। पश्चाताप में हूँ। मैं वैसा ही था जैसे सब थे।...
परंतु लोगों ने भगवान बना दिया। और यहाँ तक पहुंचा दिया।”
इतना कहने के बाद वे हल्का मुस्कुराए और अपने प्राण त्याग दिये।    
इतने में सोये हुए मुरली पर किसी के नरम हाथों का स्पर्श पड़ा तो वह जाग उठा। बोला, “माँ आप!
कितना बजा है?”
माँ ने चादर संभालते हुए कहा, “9... फिर वही सपना देख रहा था?”

मुरली ने हाँ में सिर हिलाया। और छत की तरफ़ देखकर उठ कर चला गया। माँ उसे जाते हुए उसके सपने के बारे में सोचने लगी।  

Tuesday, 21 March 2017

'एक्स सेंट' वाली औरतें

कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जो बुरी तरह से चुभती हैं। कल फेसबुक पर किसी पढ़े-लिखे जनाब की पोस्ट देखी तब कुछ और जानकारी लेने के लिए मैंने उस पोस्ट के बारे में तमाम तरह के किए गए कमेंट्स भी पढ़ लिए। अब पोस्ट का ब्योरा दिया जाये। पोस्ट में एक सुंदर लड़की का फोटो था जिसने पाकिस्तान नाम की एक पट्टी डाली हुई थी। वह शायद किसी सुंदरता प्रतियोगिता की एक प्रतियोगी थी। उसने सफ़ेद रंग के अन्तः वस्त्र पहने हुए थे। फोटो को डालते हुए यह लिखा गया था कि वह जनाब जल्द से जल्द पड़ोसी देश से अच्छे रिश्ते के इच्छुक हैं। नीचे दी गई टिप्पणियाँ बेहद निचले दर्ज़े की थीं। एक जनाब ने स्तनों के बारे में लिखा था कि नीचे ज़्यादा ही लटक रहे हैं, किसी ने लिखा था कटवी है बच कर रहा जाये.., ऐसे ही और भी बातें थीं। अब बात किसी पाकिस्तानी महिला के संदर्भ में कही जाये या फिर भारतीय या अन्य किसी देश की औरत के बारे में, यह क्यों नहीं उस देश के बहुत से पुरुषों की मानसिकता परिचायक समझा जाए। जो देश के खिलाफ़ बोलता है, वो देश द्रोही है पर जो औरत की बातों बातों में इज्जत ही ले लेते हैं वे क्या कहलाएंगे इसके लिए भी शब्दावली की जरूरत है। अब बात घटिया मानसिकता वाले कह कर पूरी नहीं हो सकती।

आज की ही बात है। एक लड़की जो कि बस से उतरने के लिए खड़ी हुई तो दो नौ जवान लड़कों की नज़रें उसके स्तनों से तर गईं। एक लड़का बड़े हल्के से बोला-'आह!' ऐसे दृश्य मुझे ही नहीं और भी बाक़ी लड़कियों को दिखते हैं। कई तो इन हरकतों का शिकार भी होती हैं। बक़ौल राजेंद्र यादव, नारी से अधिक नारी का आइडिया हमें हमेशा सम्मोहित करता रहा है।(1) अब इस नारी का आइडिया और सम्मोहन को समझे तो पता चलेगा कि सड़क से बहुत से मेहनतकश मज़दूरों में से एकाद साईकिल पर सवार जाते हुए आदमी बस के इंतज़ार में खड़ी लड़कियों को पूरी ऊर्जा के साथ आँख मारकर सर(जल्दी) से निकल जाते हैं। इसी तरह गाड़ी में कुछ तमीज़दार गुज़रते हुए अपनी मुंडी हिला हिलाकर बग़ल में बैठने का निमंत्रण देते हैं। कुछ दो पहिये वाले जरा ज़्यादा सत्यानाशी स्टाइलिश होते हैं। उनके इशारे सबसे गंदे होते हैं। अब लोग बोलेंगे कि तुम लड़कियों की ही ग़लती है। आवाज़ नहीं उठातीं तुम लोग! पर मामला औरत को एक इंसान की तरह न देख कर एक सेक्स ऑब्जेक्ट में देखने का है। कई लोग तो लड़की को देखकर दिमाग में ही रेप कर देते हैं और नॉर्मल चेहरे में ही दिखते हैं। एक जेंटलमैन की तरह। तो क्या इसके लिए भी आवाज़ उठाई जाएगी!

बात आवाज़ उठाने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि ऐसी हरकतें हमारे लोगों(बाहर के लोगों में भी) के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग आख़िर क्योंकर हैं? भारत के बारे में मैंने बहुत लंबे समय तक एक चमकीली गलतफहमी पाल रखी थी। यह हाल के समय में ही मुझसे दूर हो रही है। गलतफहमी यह कि भारतीय संस्कृति बहुत महान है। पता नहीं क्या फ़लाना-ढमकाना हमारे यहाँ हुआ है। ऐसा माना जाता है तो वैसा माना जाता है। तो ये, तो वो....उफ़्फ़! अब मुझे ऐसा लगता है कि जिस देश की संस्कृति और इतिहास को हद से ज़्यादा गौरवपूर्ण रचाया और दिखाया गया हो तो उस पर शक़ किया जाना चाहिए। किसी भी देश का इतिहास या संस्कृति महान नहीं होनी चाहिए। उसे ऊबड़ खाबड़ मानवीय घटनाओं से भरा होना चाहिए। ऊबड़ खाबड़ होने की निशानी यह बतलाएगी कि संघर्ष कितने महान रहे होंगे। आज जिस आज़ादी को मैं जी रही हूँ, लिख रही हूँ, बोल रही हूँ, पढ़ रही हूँ, सोच रही हूँ, समझ रही हूँ, ...वह ऐसे नहीं आई मेरे पास। इसके पीछे तमाम महिलाओं और पुरुषों के संघर्ष रहे हैं।

हमारे समय में जिसकी मैं साक्षी बन रही हूँ, दैनिक दिनचर्या में औरत और प्रकृति दोनों की कोई अच्छी दशा और दिशा नहीं है। मार्क्स अंकल के एक कथन का महान आशय यह रहा है कि अगर किसी समाज में पर्यावरण को समझना हो, जानना हो तो उस समाज में औरत की स्थिति देख लेनी चाहिए।(2) बात में दम है। कल जब एक कोर्ट ने गंगा और यमुना को जीवित मानने की बात कही तो मुझे ज़रा अटपटा लगा। आपको यह बात समझने में इतनी देर क्यों हुई कि नदिया जीवित ही होती हैं? ख़ैर, माना तो सही।... अच्छा नदी की बात चली है तो आप सिंधु नदी को भी जानते होंगे, जो पड़ोसी मुल्क में भी बहती है और हमारे मुल्क में भी। पाकिस्तान में भी सिंधु का पानी, पानी ही होता है और हिंदुस्तान में भी वह पानी, पानी ही होता है। तो उस पाकिस्तान की लड़की पर क्या इसलिए भद्दे इशारे किए जाने चाहिए क्योंकि वह पड़ोसी मुल्क से ताल्लुक रखती है, जिससे हमारे रिश्ते अच्छे नहीं रहते? सोचिए ज़रा! ... फेसबुक पर एक मजेदार पोस्ट या 'लाईक्स' की भूख को शांत करने के लिए ऐसी हरकतें करने वाले बहुत से लोग हैं। असल रोज़मर्रा में भी ऐसे बहुत से लोग दिख ही जाते हैं। वास्तविक और आभासी दुनिया में ऐसे बहुत से  लोग मिलकर 'डेंजर ज़ोन' बना देते हैं। इसी ज़ोन के चलते फिर हमें वैधानिक सी चेतावनी दी जाती है- रात के अंधेरे में घर से बाहर न निकलें...!

                                                  प्राचीन मिस्त्र में इत्र बनाते हुए लोगों का चित्र

किसी भी घर, परिवार और मुल्क की इज्जत लेने का सबसे अच्छा तरीका औरतों को इस्तेमाल करने का निकाल लेते हैं। किसी औरत पर वैचारिक हमला भी करना हो तो उसे एक महान गाली दी जाएगी जिससे उसे अव्वल दर्ज़े का नुकसान पहुंचाया जाये। वास्तव में लोगों को यह समझना ही पड़ेगा कि औरत वह नहीं है जो किसी मर्द के द्वारा लगाए गए सेंट को सूंघकर उसके पास चिपक जाएगी। यह कंपनियों की बेईमान कल्पना है। 'एक्स इफेक्ट'  टीवी विज्ञापनों में चलता है। औरत के पास अपना दिमाग है। इसलिए उनमें इतनी समझ तो है कि सेंट सूंघकर किसी से नहीं चिपका जा सकता। 'एक्स इफेक्ट' औरतें यहाँ नहीं रहती हैं वो तो बस बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रचनात्मक हैड के दिमाग में रहती हैं। गलती उनकी भी नहीं। कहीं से उन्हों ने ढमकाना कोर्स किया होगा या करने वाली होगी।
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1 व 2-दलित आंदोलन का इतिहास, मोहनदास नैमिशराय





      

Monday, 20 March 2017

उस एक को इतना बड़ा मकान क्यों चाहिए?

जब यू पी चुनाव के परिणाम घोषित हुए तब कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। डिग्रीधारियों और बे-डिग्रीधारियों ने जम कर जीत हार का फेसबुकिया विश्लेषण किया। इसमें मेरा नाम भी शामिल है। अपने को छूट नहीं दी जानी चाहिए। मुझे सबसे अजीब हैरत कुछ बातों को पढ़कर हुई। पहली यह कि यू पी की मुख्यमंत्री रह चुकीं, मायावती पढ़कर वक्तव्य देती हैं और इस बार राम मंदिर बनकर ही रहेगा। इसके अलावा योगी जी का मुख्यमंत्री बनना भी लोगों को अपने युग के चमत्कारों में से एक लग रहा है। फ़ेहरिश्त तो लंबी है ही। क्या कीजिएगा! अटपटा से लेकर चटपटा सबकुछ मिलेगा। मैं इस सूची में दिलचस्पी ज़रा कम रखती हूँ। इसमें शामिल कुछ बातों पर ध्यान देना ठीक रहेगा।

अगर मायावती पढ़कर ही अपनी बात रखती हैं तो इसमें गलत क्या है? पढ़कर बोलने में क्या हर्ज़ा है? मज़े की बात यह है कि ख़ूब पढे लिखे लोग जिन्हों ने स्त्री विमर्श पर शोध करके किताबें लिखी हैं और जिन पर बोलने के लिए IIC और IHC में बकायदा हाल बुक किए जाते हैं, उन्हीं लोगों की तरफ से मायावती जी के लिए ऐसे बयान सुनकर अच्छा नहीं लगा। आलोचना यदि उनकी राजनीति के लिए की जाती तो बात समझ आती। एक लाईन में किसी के बोलने के तौर तरीक़े पर पंच मारना बेहद अजीब है।
 
पढ़कर बोलना विवादों से दूर रखता है। यह एक कला है जो सबके बस की बात नहीं। पढ़ना धैर्य को समझाता है। इससे मुलाक़ात करवाता है। शब्द और उसकी अहमियत को सहेज कर रखता है। लिखने के लिए लोग सोचते हैं। एक एक बात की परख की जाती है। इसलिए यह वाज़िब है कि पढ़ने वाला इस बात को समझता है और वह संतुलित बोलता है। मायावती का क्षेत्र राजनीति का है। इसलिए मुझे लगता है कि वह वर्तमान नेत्रियों और नेताओं में अच्छा बोलती हैं। आजकल इतने अधिक विवाद हो रहे हैं कि इनसे बचने का यह अच्छा माध्यम है। अब बात उनके बोलने के लहज़े और तरीके पर करें तो सभी की अपनी निजी शैली होती है। इसमें आलोचना मुझे समझ से परे प्रतीत होती है। सभी का अलग उच्चारण होता है। इसलिए इस शैली की आलोचना के बजाय उनके द्वारा की जानी वाली राजनीति पर बहस हो तो अच्छा रहे।  
 
                                                           फ्रांस की केव पेंटिंग 
  
दूसरा बयान ज़रा सा विवादस्पद है। वो राम लला पर है। रामकथा को मैं मोटे तौर पर कुछ तरीक़ों से जानती हूँ। पहला स्रोत रामायण धारावाहिक और दूसरा अपने कुछ लोगों से सुनी हुई पुरानी कहानियों के आधार पर। हाँ, संक्षिप्त रामायण की एक किताब भी है घर में पर मैं उसे पूरा नहीं पढ़ पाई कभी। इसी तरह और भी कई स्रोतों से रामकथा से बावस्ता पड़ता रहा है। इसके अलावा एक दिलचस्प बात और यह है कि रचनात्मक लेखन की पढ़ाई के दौरान मेरे सर ने बताया था कि रामायण और महाभारत तरह तरह के किरदारों की खान हैं। इसलिए रामकथा या महभारत को देखने की मेरे पास धार्मिक दृष्टि न के बराबर है। मैं यह भी नहीं कहूँगी कि राम या कृष्ण का नाम आते ही मेरा सिर श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है। ऐसा कभी नहीं हुआ। यदि कभी कहीं मंदिर भी जाना हुआ तो मुझे पूजा का कोई बढ़िया ख़याल नहीं आया। मैं मंदिर भी स्थापत्य की कला को देखने जाती हूँ। मेरा मक़सद कभी भी पूजा-पाठ नहीं रहा।
 
मेरी माँ बहुत सी राम कहानियाँ के छोटे छोटे टुकड़े सुनाती हैं। ये कहानियाँ बहुत दिलचस्प होती हैं क्योंकि इनमें
राम एक ऐतिहासिक मिथक पुरुष के रूप में आते हैं। वे भगवान की तरह बर्ताव नहीं करते। उनका संवाद एक मामूली मच्छर से भी होता है और मच्छर बराबर की बात रखता है। राम भी आलोच्य हैं। मिथक ऐसे ही होने चाहियें। कृष्ण भी ऐसी दशा दिशा में आते हैं। मतलब की आप उन पर एक आलोच्य निगाह भी रख सकते हैं। इस्कॉन मंदिर वाले अगर उन्हें पूजते हैं तब आप यह भी देखिये कि मंदिर का सम्पूर्ण वातावरण वे लोग कृष्णमय बनाकर रखते हैं। मानसिकता में कृष्ण भजन ऐसे बैठ जाते हैं कि व्यक्ति हरे रामा हरे कृष्णा करने लगता है। यह एक अलग विषय है सोचने समझने के लिए। मुझे संवाद करने वाले मिथक ज़्यादा पसंद है। वे कतई नहीं जो संवाद ही नहीं करते। वास्तव में संवाद उन तारों की खोज भी करता है जो मनुष्य के विकास में बुने गए हैं। ख़ुद मनुष्य ने इन्हें अपनी समझ से बुना है। अगर मिथक पूजनीय और पहुँच से दूर एक लिबास पहना दिया जाये तो वास्तव में यह तरीका सोचने या मंथन करने की क्षमता को मार देता है। मनुष्य को यह सोचना चाहिए कि इस पृथ्वी पर राम और मच्छर का समान अस्तित्व रहा है। इसका रूपक ऐसे भी लिया जा सकता है- सूक्ष्म या अति सूक्ष्म और विराट की सत्ता साथ साथ रही है। बरबरी के दर्जे पर। 
 
                                                    यह भी केव पेंटिंग का नमूना है
 
 
मानवजाति के एक खूंखार और घटिया मानसिकता वाले गिरोह ने जात पात का बंटवारा कर इस पृथ्वी को अव्वल दर्ज़े का नुकसान ही पहुंचाया है। इसके नियम क़ानूनों को ठेंगा दिखाया है। इसलिए मुझे वे सभी संघर्ष, जो इस शोषण के खिलाफ़ किए गए हैं, सबसे अच्छे जान पड़ते हैं। जो राम मंदिर मनाने की वकालत करते हैं वे सबसे पहले गटर में घुस कर एक रोज़ काम कर लें। बेवकूफाना ज़िद्द करना बहुत घटिया लगता है। ऐसे हाल में जब बेरोजगारी, भुखमरी, मानव तस्करी, तापमान का बदलाव, रेप, बाल शोषण और इसी तरह के तमाम मुद्दे और परेशानियाँ सामने हैं तो हम आज 21वीं सदी में धर्म को लेकर डोल रहे हैं।    
 
राम मंदिर बनने को लोग इतना क्यों तवज्जो देते हैं? मंदिर या मस्जिद हमारे देश में अनेको हैं। अब्दुल्ला नाम का बच्चा रोज़ ख़ुदा के मंदिर और मस्जिद दोनों को देखकर हैरान हो जाता है कि 'तुझ एक को इतना बड़ा मकान' है और मेरे पास तो कुछ भी नहीं। मैं उस जगह को एक ऐसी जगह में तब्दील करने की राय रखती हूँ जहां बैठकर लोग तरह तरह के विषयों पर बात करें। जहां एक किताबघर खोल देना चाहिए। कम से कम किताब पढ़कर लोग इल्म हासिल करेंगे और जानेंगे कि दुनिया वास्तव में धर्म की चाश्नी में  नहीं है। उसका अपना एक भूगौल है। उसकी अपनी कुछ प्रवृत्तियाँ हैं। उसका ख़ुद का एक बर्ताव है। इंसान को न तो अब मंदिर की ज़रूरत है न मस्जिद की। इबादत के लिए बहुत सी जगहें हैं। अब पंडित और मौलवियों के भाषण की भी जरूरत नहीं। बल्कि जरूरत इस बात की है कि ख़ुद की अंतरात्मा में उस नूर की तलाश कर ली जाये। बाकी सब छोड़ कर आसपास फैली असमानता और अशांति के खिलाफ़ मोर्चा खोला जाये। पढ़ा जाये उन विद्वानों को जो समाज की अपनी  समझ किताबों में दे गए हैं। मैं आज भी उस क़तार में खड़ा होना मुनासिब नहीं समझती जो बेवकूफ़ों से बनी हो। जो धर्म के पीछे अंधी दौड़ में जा रही हो। यकीन मानिए यह चश्मा उतार दीजिये। आप बहुत सुलझे हुए इंसान बन जाएंगे। 


Wednesday, 8 March 2017

हार्मोन-शार्मोन...हाय रब्बा

आप एक तो देर से आईं और तिस पर भी दुरुस्त नहीं हो पाईं। सबसे पहले मैम, आपका शुक्रिया कि आपने 'हार्मोन आउटबर्स्ट' की जानकारी दी। वरना तो हमें पता ही नहीं था कि शारीरिक विज्ञान आख़िर है कौन सी चिड़िया का नाम! है न मैम! आप जानवरों को प्यार करती हैं इसलिए आप शाकाहार और मांसाहार में आसानी से बच गईं। लेकिन आप तीन बिदुओं में नप गईं, पहला ' दो जेंटलमैन बिहारी गार्ड और दूसरा 'हार्मोन समीकरण' और तीसरा 'लक्ष्मण रेखा।' 
 
मैम आप कैसे किसी प्रदेश के व्यक्तियों को ऐसी निगाह से देख सकती हैं? हालांकि आपने जेंटलमैन शब्द जोड़ लिया फिर भी आप बच नहीं पाईं यह बताने से कि आप एक प्रदेश के लोगों के बारे में क्या सोचती हैं? मैम, क्या आपके पास डेटा-वेटा है कि उसी प्रदेश विशेष के लोग सुरक्षा देने का काम करते हैं? होगा तभी आप बोल रही हैं? मैम, आप भारत के लोगों को इस निगाह से देखती हैं जबकि भारत को देखने के तमाम तरह के फ़लक हैं! जब जस्टिस काटजू उस प्रदेश के लोगों पर जोक बनाते हैं तब मुझे लगता है आपको बहुत हंसी आती होगी। मैम मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि महिला दिवस पर आपके बारे में मैं यह सोच रही हूँ। मैं भी कुछ सालों बाद आपकी उम्र में आऊँगी और क्या यही सोच रखूंगी यही सोच रही हूँ। 
 
डियर मैम, पानी फेरने टाइप-वाइप का काम कर दिया आपने। कहाँ कि जुनून छिन कर लाये थे...अपने हकों की...और आप तो हमारी बीरादरिन बहन होकर अपने ही लोटे में छेद का के बैठ गईं। उफ़्फ़!!! मैं और आप भी 16 या 17 बरस की उम्र से गुज़रे थे। हमने और आपने किसी पर अपना आउटबर्स्ट नहीं मारा...उफ़्फ़ !...फिर आपको कैसे लगा कि ई हर्मोनवा गड़बड़ हो जाता है। मैम, आपके और मेरी तमाम पूर्वज औरतों के न बाहर निकलने से गुलज़ार अंकल बतूता पर गाना लिख बैठ गए। सोचो वो औरतें जो इतिहास में गुमनामी की सांसें ले रही हैं, वो बाहर निकली होतीं तो क्या ग़ज़ब का देश होता अपना!...अगर औरतें घर से बाहर निकलीं होतीं तो वो भी इब्न बतूता से कम नहीं होतीं। मैंने तो अपना एक नाम कुछ दिन पहले ही इबनी बतूती रखने या फिर चीनी यात्री या फिर वास्को डिगामी रखने का मन बनाया था। लेकिन आप तो कह रही हैं लक्ष्मण रेखा ही खींच दो। मन करता है अपना माथा ही धून लूँ। मैम, पीछे की तरफ़ क्यों धक्का दे रही हैं? हमको यह तरक-वरक समझ में नहीं आ रहा। हम आपसे डिस-गरी (disagree) होते हैं। 
 
मन तो बहुत है लिखने का लेकिन अभी आप ज़रा ख़ुद ही सोचिए कि आप क्या बोल गईं ! चलिये, गले लगिए। महिला दिवस की बधाई आपको।


Saturday, 4 March 2017

'ℼ'

आठ मार्च आने वाला है। चलिये कुछ सोच लें!
1.
कुछ दिन पहले हिन्दी की ख़ासी चर्चित पत्रिका के पन्ने पलटते हुए मैं आख़िर तक पहुँच गई। यह पत्रिका देखने का अच्छा तरीका है। पर उस जगह मुझे लगभग 15 मिनट रुकना भी पड़ा। लेख तस्लीमा नसरीन के बारे में था। ऐसा नहीं है कि यह मेरी पसंद की लेखिका हैं। उनका लिखा हुआ पसंद है। उनके बारे में जानने की इच्छा हुई सो पढ़ना शुरू किया। वह लेख एक अनुवाद था। मुझे अनुवादिका का नाम अभी याद नहीं आ रहा। उस लेख में नसरीन साहिबा की एक बड़ी परेशानी की बात थी। उन्हें रहने के लिए कोई भी घर नहीं मिल रहा। वह इस चलते लगभग नुकीली ज़िंदगी जी रही हैं। अभी वह जिस मकान में रह रही हैं वह उनके किसी मित्र का है, जिसे मित्र का बेटा कुछ ही दिनों में बेचने वाला है। इसलिए उन्होने रहने के लिए घर खोजने की क़वायद शुरू कर दी है।
क्योंकि वह बांग्लादेश से ताल्लुक रखती हैं इसलिए भारत में उस जगह की महक लेने की वह भरपूर कोशिश में रहती हैं। दिल्ली की चर्चित जगह सीआर पार्क उर्फ चित्तरंजन पार्क को वह अपना ठिकाना बनाना चाहती हैं। लेकिन उन्हें कोई भी अपना मकान किराए पर नहीं देना चाहता। लेखिका के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान के समय आज के सबसे बड़े नेता ने तस्लीमा नसरीन के नाम और उनकी दशा को वादे के साथ भाषणों में जगह दी थी। पर वे अब भूल गए हैं। वे उनका नाम भी नहीं लेते। इस लेखिका का संघर्ष ज्यों-का-त्यों है।
सोचिए हम कितने गुमान में कहते हैं कि हम भारत के लोग लोकतन्त्र के हिमायती हैं। पर यह भी है कि सिर्फ़ बातों के गुब्बारे फुलाने में। एक सेमिनार हुआ नहीं कि सबसे पहले चिल्लाने लगते हैं। गौर से देखने में गुरमेहर कौर और तसलीमा नसरीन, दोनों ही कट्टरता की शिकार हैं। एक को उसका देश छुड़वा दिया गया और दूसरी को दिल्ली। बहुत बड़ा फ़र्क नहीं है। ध्यान से सोचिए! 'पुरो' को उसका ठिकाना मिल गया पर कईयों को अभी तक नहीं मिला है। कई और भी हैं जो अपने मन मुताबिक़ ठिकाने की तलाश में भटक रही हैं। पर वे हार नहीं मानतीं। ठिकानों की मार क्यों पड़ रही है जबकि हम कितनी तरक्की कर रहे हैं? एक चैन की ज़िंदगी क्यों नहीं मिल सकती, जबकि धर्म और राज्य भलाई और सेवा के लिए हैं?



 2. 
दो साल पहले की बात है। जब मैं नौकरी किया करती थी। अपने बलबूते पर एक घर(कमरा) खरीदने की तमन्ना रखती थी। इसी को पूरा करने के लिए बैंक लोन लेने का भयानक ख़याल सुहाने सपने की तरह आया। इस बाबत मैंने बैंक के कस्टमर केयर को फोन लगा दिया। मैंने उनके सभी सवालों का जवाब बड़ी खूबसूरती से दिया और पूछा- 'क्या मुझे लोन मिल जाएगा?' दूसरी तरफ से उस स्पीकर ने पूछा- 'आपको घर की क्या जरूरत है?' मैं बहुत हैरान हुई। कहा- 'है।... इसलिए जानकारी इकट्ठी कर रही हूँ। ताकि ख़ुद का घर ले पाऊँ।' वो एकदम से हंसने लगा और तुरंत बोला- 'अरे आप तो दूसरे घर जाएंगी जहां आपका अपना घर होगा। अभी तो आप अपने मम्मी पापा के साथ होंगी। वही आपका घर है।' मैंने फोन रख दिया और लोन का ख़याल त्याग दिया। हालांकि बाद तक मैंने ख़ुद से किस्तों में कमरा या फ्लैट ख़रीदने के कई ख़याली पुलाव पकाए। पकाने में कोई बुराई नहीं। अब ऐसा लगता है कमरे के बारे में सोचकर ही बहादुरी का काम किया था।... कितना कुछ जतला दिया जाता है कि तुम एक लड़की हो। आप यह कह सकते हैं कि मुझे दुनियावी चीज़ों का लालच है। लेकिन मुझे इस बात की फिक्र नहीं। मुझे फिक्र उस सवाल से है, जो मुझसे पूछा गया था। मैं आख़िर अपना घर क्यों नहीं ले सकती?

3.
आपने ज़रूर गणित के 'ℼ' को एक न एक बार चाहा होगा। इसे पाई कहा जाता है। इसका मूल्य 22/7 या 3.14 कई जगह सटाया होगा। यह गणित में रहने वाला बहुत मज़ेदार निशान है। जैसे ही दिखता है हमारे दिमाग में तुरंत आ जाता है कि अब इसकी जगह 22/7 भी चिपकाया जा सकता है। यह याद में ठहर जाने वाली बात भी है। लेकिन याद में ठहर जाने और किसी बात के साथ चिपक जाने में अंतर है। मैं ख़ुद भी इसी बात की शिकार हूँ। मैं भी कई बार 'ℼ' की तरह महसूस करती हूँ। ऐसा लगता है कि लोगों को अपने अनुसार देखती हूँ जबकि वह अलग हैं। वे सभी अपने अनुसार हैं। यह बात आपको आजकल एक जुमले में पढ़ने को मिल जाएगी कि हम दुनिया को दुनिया जैसी है न देखकर वैसे देखते हैं जैसे हम हैं। बात सही भी है। मैंने 'ℼ' का ज़िक्र कुछ सोचकर ही किया है।



मैंने 'ℼ' के साथ एक जांच की। मैंने इस बात को कुछ लोगों से बांटा भी है कि मैं 'ℼ' जैसा महसूस करने लगी हूँ। वे मुझ पर हंस देते हैं। इस बात को हमें समझना चाहिए। अक्सर लोग किसी न किसी फिक्स खयाल के मारे होते हैं। जैसे 'ℼ' के बारे में मैंने अपने चार दोस्तों से बात की। मैंने कहा-'कुछ बताओं इसके बारे में।' उनके जवाब काफी आशा अनुरूप ही थे। किसी ने 'लाइफ ऑफ पाई' का नाम भी लिया पर सभी ने उसके मूल्य के बारे में ज़रूर कहा। कारण उन्होंने स्कूल में इसके बारे में जाना था। सवाल हल किए थे। तभी से दिमाग में 'ℼ'  जम गया है। ...अभी समझे कि मैं 'ℼ'  की तरह क्यों महसूस करती हूँ! जिसे देखो वह अपनी जमी-जमाई प्रतिक्रिया उड़ेलने को तैयार बैठा है। हमने एक ही सूत्र से सारे सवालों को हल करने की कसं खाई है। कहीं कुछ हुआ नहीं कि अपना अपना 'ℼ' लिए सभी खड़े हो जाते हैं। गुरमेहर को शिकार बनाने वाले भी ऐसे ही हैं जो सेट पैटर्न के शिकार हैं। गुंडों का दिमाग होता तो भयानक ही है। इसलिए गुंडों से डर लगता है। पर उन लोगों के बारे में आप क्या कहेंगे जो सफ़ेद कॉलर वाले गुंडे हैं? वास्तव में ये सभी सफ़ेद कॉलर वाले वो लोग हैं जो रूढ़िवाद से ऊपर उठ नहीं पाते और हर सवाल या मसले को 'ℼ' समझ कर हल कर लेना चाहते हैं। आजकल 'ℼ'  मूल्य देशभक्ति है जो सिर्फ़ नारे में दिखती है। आपको क्या लगता है?

सोचिए तो इन सवालों पर...!

भाषा के बारे में -- पत्र - 112

 प्रिय लूसीलियस  “आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ युगों में भाषण कौशल की शैली पतित हो जाती है? क्यों किसी समय लेखकों में एक प्रकार ...