प्रिय लूसीलियस
यदि, जैसा कि तुम्हारे पत्र से पता चलता है, तुम मानसिक उत्कृष्टता (उत्तम चरित्र और बुद्धि) की ओर बढ़ने में निरंतर लगे हुए हो तो तुम वही कर रहे हो जो तुम्हारे लिए सबसे अच्छा और सबसे लाभदायक है। इसके लिए प्रार्थना करना कितना मूर्खतापूर्ण है! यह ऐसी कामना है जिसे तुम स्वयं ही पूरा कर सकते हो।
तुम्हें स्वर्ग की ओर हाथ उठाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें मंदिर के पुजारी से विशेष प्रवेश की याचना करने की भी आवश्यकता नहीं है, मानो देवप्रतिमा के अधिक निकट पहुँच जाने से हमारी प्रार्थना अधिक अच्छी तरह सुनी जाएगी। ईश्वर तुम्हारे निकट है... तुम्हारे साथ है... तुम्हारे भीतर है। मैं यह बात गंभीरता से कहता हूँ, लूसीलियस। एक पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करती है जो हमारे सभी शुभ और अशुभ कर्मों की साक्षी और संरक्षिका है। हम उस आत्मा के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वह आत्मा भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करती है। वास्तव में, ईश्वर के बिना कोई मनुष्य अच्छा नहीं बन सकता। क्या कोई ऐसा है जो ईश्वर की सहायता के बिना भाग्य के उतार-चढ़ावों से ऊपर उठ सके? महान और उदात्त विचार तथा सही और धर्मपूर्ण सलाह, ईश्वर ही हमें प्रदान करता है। प्रत्येक अच्छे मनुष्य में एक देवता निवास करता है। वह कौन-सा देवता है, यह अज्ञात रहता है।
यदि संयोगवश तुम ऐसे वन में पहुँचो जो अत्यन्त प्राचीन और असाधारण ऊँचे वृक्षों से घना भरा हो, जहाँ एक-दूसरे में उलझी शाखाएँ दिन के प्रकाश को भीतर आने से रोक देती हों तो उस वनस्थल की ऊँचाई, एकान्तता और धरती के ऊपर इतनी गहरी तथा अखंड छाया का आश्चर्य तुम्हें यह विश्वास दिलाएगा कि वहाँ कोई दिव्य सत्ता विद्यमान है। यदि तुम किसी गुफा को देखो जो समय के प्रभाव से गहराई तक क्षरित हो चुकी हो, किसी ऐसे विशाल कक्ष को जो मनुष्य के हाथों से नहीं बनाया गया हो बल्कि प्रकृति ने स्वयं पर्वत की जड़ों में खोखला कर दिया हो तो वह तुम्हारे मन में धार्मिक विस्मय और श्रद्धा का भाव उत्पन्न करेगा। हम महान नदियों के उद्गम-स्थलों का सम्मान करते हैं। जहाँ कोई तीव्र जलधारा अचानक किसी छिपे हुए स्रोत से फूट पड़ती है, वहाँ हम वेदी स्थापित करते हैं। गर्म जल के स्रोत धार्मिक अनुष्ठानों के स्थान बन जाते हैं और अनेक झीलों को उनकी गहन अंधकारमयता या अथाह गहराई के कारण पवित्र माना गया है। इसी प्रकार, यदि तुम किसी ऐसे मनुष्य को देखो जो संकटों से निर्भय हो, इच्छाओं से अप्रभावित हो, विपत्ति में प्रसन्नचित्त रहे और तूफ़ानों के बीच भी शांत बना रहे, जो समस्त मानवजाति से ऊपर उठ चुका हो और देवताओं के समकक्ष खड़ा दिखाई दे तो क्या उसके प्रति तुम्हारे मन में गहरी श्रद्धा और आदर का भाव नहीं जाग उठेगा?
क्या तुम यह नहीं कहोगे, “यहाँ कुछ ऐसा उपस्थित है जो इतना महान और इतना उदात्त है कि हम यह विश्वास ही नहीं कर सकते कि यह उसी तुच्छ शरीर के समान है जिसमें यह निवास करता है। एक दिव्य शक्ति इस मनुष्य पर अवतरित हुई है। वह उत्कृष्ट और अनुशासित मन, जो हर वस्तु को अपने से छोटा समझते हुए उसके पार चला जाता है, जो हमारे सभी भय और सभी लालसाओं पर हँसता है, किसी स्वर्गीय शक्ति से प्रेरित है। इतनी महान सत्ता दिव्यता के सहारे के बिना सीधी खड़ी नहीं रह सकती। इसलिए उसका अस्तित्व बहुत अंश तक उसी स्थान में है जहाँ से वह यहाँ उतरी है। जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी को स्पर्श करती हैं फिर भी उनका वास्तविक अस्तित्व अपने उद्गम-स्थल में ही रहता है, उसी प्रकार वह महान और पवित्र मन, वह मन जिसे हमें दिव्यता का अधिक निकट ज्ञान कराने के लिए भेजा गया है। यद्यपि हमारे बीच रहता है फिर भी अपनी मूल सत्ता में ही स्थित रहता है। उसका आधार वहीं है। उसी की ओर उसका लक्ष्य और प्रयोजन है। वह हमारे कार्य-व्यवहारों में सम्मिलित अवश्य होता है। परन्तु ऐसा हमारे से श्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में करता है।”
तो वह मन कैसा है? वह ऐसा मन है जो अपने ही गुणों के प्रकाश से चमकता है। क्या हम किसी व्यक्ति की प्रशंसा उन गुणों के लिए करते हैं जो वास्तव में किसी और के हैं? इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? क्या हम उन वस्तुओं पर आश्चर्य करते हैं जो एक क्षण में किसी दूसरे के पास चली जा सकती हैं? इससे अधिक नासमझी और क्या होगी? सोने की लगाम घोड़े को बेहतर नहीं बना देती। उसी प्रकार, वह सिंह जिसका अयाल सोने के आभूषणों से सजा दिया गया हो, जिसे वश में कर लिया गया हो और तरह-तरह की सजावटी वस्तुओं से लाद दिया गया हो, तथा जिसे उसके प्रशिक्षक आगे बढ़ाते हों, वह उस जंगली सिंह से कितना भिन्न है जिसकी आत्मा अब भी अजेय है! निस्संदेह वही सिंह श्रेष्ठ है जो आक्रमण करते समय अपनी स्वाभाविक उग्रता में दिखाई देता है, जैसा प्रकृति ने उसे बनाया है; जिसकी कठोर और स्वाभाविक शोभा किसी बाहरी आभूषण की मोहताज नहीं है बल्कि जिसका वैभव केवल उसे देखने वालों के मन में उत्पन्न भय और विस्मय में निहित है। वह उस दूसरे सुस्त, स्वर्णाभूषणों से सजे हुए प्राणी से कहीं अधिक महान है।
किसी मनुष्य को केवल उसी बात पर गर्व करना चाहिए जो वास्तव में उसकी अपनी हो। हम बेल (अंगूर की लता) की प्रशंसा तभी करते हैं जब उसकी शाखाएँ अंगूरों के गुच्छों से लदी हों। जब वह इतनी फलवती हो कि उसे संभालने वाले सहारे भी उसका भार न उठा सकें। क्या कोई सचमुच उस बेल को अधिक पसंद करेगा जिस पर सोने के फल और सोने की पत्तियाँ लटका दी गई हों? फल के साथ होना ही बेल का विशिष्ट गुण है। उसी प्रकार मनुष्य में भी हमें उसी चीज़ की प्रशंसा करनी चाहिए जो वास्तव में उसकी अपनी हो। तो क्या हुआ यदि उसके पास सुंदर दास हों, भव्य घर हो, विशाल ज़मीन-जायदाद हो या बड़ी पूँजी और निवेश हों? ये सभी वस्तुएँ उसके चारों ओर हैं। वे उसके भीतर नहीं हैं। उसमें उसी गुण की प्रशंसा करो जिसे न कोई उससे छीन सकता है और न कोई उसे प्रदान कर सकता है। उस गुण की जो मनुष्य होने की वास्तविक और विशिष्ट पहचान है।
क्या तुम पूछते हो कि वह क्या है? वह है मन। मन के भीतर पूर्ण रूप से विकसित हुई तर्कबुद्धि। क्योंकि मनुष्य एक विवेकशील (तर्कशील) प्राणी है। इसलिए उसका कल्याण तभी पूर्ण होता है जब वह उस उद्देश्य को पूरा करे जिसके लिए उसका जन्म हुआ है। लेकिन यह तर्कबुद्धि उससे क्या अपेक्षा करती है? सबसे सरल बात कि वह अपनी प्रकृति के अनुरूप जीवन जिए। पर हमारी सामूहिक मूर्खता ही इसे कठिन बना देती है। हम एक-दूसरे को निरंतर दोषों और बुराइयों की ओर धकेलते रहते हैं। जब सभी लोग हमें आगे उसी दिशा में बढ़ा रहे हों तथा कोई भी हमें रोकने या सही मार्ग पर लौटाने वाला न हो, तब हमें स्वस्थ और सद्गुणपूर्ण जीवन की ओर वापस कैसे लाया जा सकता है?
अभी के लिए विराम
विदा
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