Thursday, 10 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय तीन: मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग)

1909 में गुर्जिएफ़ ने निर्णय लिया कि अब शिक्षक के रूप में अपने नए जीवन की शुरुआत करने का समय आ गया है। अपनी पहली पुस्तक हेरल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में वह इसका कारण बताते हुए कहता है कि उस समय ‘मनुष्यों के बीच एक व्यापक... मनोविकृति’ फैली हुई थी, जिसे ऑकल्टिज़्म या स्पिरिचुअलिज़्म कहा जाता था। उस समय वे ताशकंद में थे, जो अब सोवियत मध्य एशिया का हिस्सा है। वहाँ, मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग की तरह, हर प्रकार के गूढ़वाद और रहस्यवाद के प्रति जबरदस्त उत्सुकता थी। मैडम ब्लावात्स्की और रुडोल्फ़ स्टाइनर के सिद्धांतों में, सीआन्स (मृत आत्माओं से संपर्क करने की कथित बैठकें), मेज़ थपथपाकर आत्माओं से संपर्क करने और आत्मा द्वारा उपचार जैसी बातों में। और इसमें कोई संदेह नहीं कि गुर्जिएफ़ ने सोचा होगा कि वे इन सभी फैशनेबल गूढ़वादियों और रहस्यवादियों से मिलाकर भी अधिक ‘गुप्त ज्ञान’ जानते थे।



बहरहाल, वे स्पिरिचुअलिस्ट और थियोसोफ़िकल मंडलियों में जाने लगे। वे कहते हैं:

मेरे जीवन की परिस्थितियाँ इतनी अनुकूल रहीं कि छह महीने के भीतर न केवल मेरा संपर्क इन लोगों की बड़ी संख्या से हो गया बल्कि एक बहुत बड़े समूह में तथाकथित “परलोक की घटनाओं” को उत्पन्न करने का प्रसिद्ध “विशेषज्ञ” और मार्गदर्शक भी मान लिया गया।’

कुछ ही समय में, उनके अनुसार, उन्हें सभी अलौकिक ज्ञान का महान उस्ताद माना जाने लगा। वे अपनी ‘तरकीबें पैदा करने के कौशल’ के बारे में खुलकर बात करते हैं। इसलिए यह काफी संभव है कि उनके द्वारा उत्पन्न किए गए सभी ‘मनोवैज्ञानिक चमत्कार’ वास्तविक नहीं थे। इस समय उनका उद्देश्य ऐसे शिष्यों का एक समूह बनाना था जो स्वयं पर नियंत्रण की शक्ति की वास्तविक खोज में हों न कि उन उन्मादी उत्साही लोगों की तरह, जो उस समय सेंट पीटर्सबर्ग में रासपुतिन[1] के पीछे चल रहे थे। वे बताते हैं कि उनका उद्देश्य था, ‘जो कुछ मैं पहले ही सीख चुका था, उसे लोगों के जीवन में डाल सकूँ।’ अर्थात वे अपने विचारों को प्रयोग में लाकर उनकी परीक्षा करना चाहते थे। वे अपने विद्यार्थियों को ‘गिनी पिग’ अर्थात प्रयोग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्तियों के रूप में देखते थे।

उनकी सफलता जाहिर तौर पर काफी बड़ी थी। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि उन्होंने तीन अलग-अलग शहरों में तीन समूह बना लिए। हालाँकि वे यह नहीं बताते कि वे शहर कौन-से थे। इस समय के गुर्जिएफ़ के बारे में हमें लगभग कुछ भी पता नहीं है। उसके शिष्यों द्वारा लिखे गए किसी भी विवरण की शुरुआत इतनी पुरानी अवधि से नहीं होती। गुर्जिएफ़ स्वयं कहते हैं कि उन्होंने ताशकंद का अपना काम इसलिए समाप्त करने का निर्णय लिया क्योंकि वहाँ के लोग केवल तीन या चार अलग-अलग प्रकारों में आते थे और उन्हें लगा कि वास्तविक सफलता तभी संभव है जब उनके समूहों में मनुष्य के सभी प्रकारों के प्रतिनिधि हों। उनके अनुसार ऐसे कुल अट्ठाईस प्रकार हैं। इसलिए 1912 में उन्होंने रूस जाने का निर्णय लिया।

संभव है कि यह निर्णय 13 सितंबर 1911 को लिए गए एक संकल्प का परिणाम था। ‘हेरल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में वे इसकी ठीक तारीख बताते हैं। उस दिन, उनके अनुसार, उन्होंने अगले इक्कीस वर्षों तक ‘एक प्रकार का कृत्रिम जीवन जीने’ की शपथ ली। ऐसा जीवन जो पहले से तय किए गए एक कार्यक्रम के अनुसार और कुछ निश्चित सिद्धांतों के आधार पर संचालित किया जाना था।

कृत्रिम जीवन’ से उनका ठीक-ठीक क्या मतलब था? बेनेट का कहना उचित है कि गुर्जिएफ़ से मिलने वाले अधिकांश लोगों को लगता था कि वे किसी न किसी तरह ‘अपने आपको छिपा रहे हैं।’ जो लोग उन्हें अच्छी तरह जान पाए... जहाँ तक वास्तव में कोई उन्हें कभी पूरी तरह जान पाया, उन्हें लगता था कि वे एक भूमिका निभा रहे हैं और लोगों के प्रति कभी भी सीधे और सहज ढंग से प्रतिक्रिया नहीं देते। लेकिन उस्पेन्स्की जैसे शिष्यों को इस बात में कोई संदेह नहीं था कि इसका कारण यह नहीं था कि गुर्जिएफ़ के पास छिपाने के लिए कुछ था। इसका कारण यह था कि वे मानते थे कि वे अपने शिष्यों के साथ केवल एक वस्तुनिष्ठ ढंग अपनाकर ही कुछ निश्चित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। ठीक वैसे जैसे डॉक्टर अपने रोगी के साथ व्यवहार करता है और उसका उद्देश्य उन पर कुछ निश्चित प्रभाव उत्पन्न करना था। (आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी ऐसा बहुत करते हैं। उदाहरण के लिए, वे अपने प्रयोग के विषय को बता सकते हैं कि वह एक निश्चित प्रतिक्रिया अनुभव करेगा ताकि यह देखा जा सके कि क्या वह स्वयं को विश्वास दिला देता है कि उसे कोई ऐसा उद्दीपन प्राप्त हुआ है जो वास्तव में मौजूद ही नहीं था। ऐसे प्रयोगों में विषय से झूठ बोलना प्रयोग का आवश्यक हिस्सा होता है।) ताशकंद में दो वर्षों तक ‘शिक्षण’ करने के बाद संभव है कि गुर्जिएफ़ को लगा हो कि अब अपने शिष्यों के साथ एक नए प्रकार के संबंध की आवश्यकता है। गुरु और शिष्यों वाला संबंध नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक और उसके सहायकों जैसा संबंध।

अपने समूहों को संगठित करने के अतिरिक्त गुर्जिएफ़ अनेक व्यावसायिक गतिविधियों में भी लगे हुए थे। वे रेलवे और सड़कों की आपूर्ति तथा निर्माण के सरकारी ठेकों, पशुओं के व्यापार (जैसा कि उनके बढ़ई बनने से पहले उनके पिता भी करते थे), तथा दुकानों, रेस्तराँ और सिनेमाघरों के संचालन का उल्लेख करते हैं। वे कालीनों और प्राचीन वस्तुओं का व्यापार भी करते थे। 1912 में उन्होंने अपने विभिन्न व्यवसाय बेच दिए और दस लाख से अधिक रूबल प्राप्त किए। इसके बाद वे मॉस्को चले गए। वहाँ उन्होंने एक संपत्ति खरीदी और ‘मनुष्य के सामंजस्यपूर्ण विकास के संस्थान’ (Institute for the Harmonious Development of Man) की स्थापना की तैयारी शुरू कर दी।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गुर्जिएफ़ दुर्भाग्यशाली थे। उन्होंने ‘गुप्त ज्ञान’ की खोज में पंद्रह वर्ष बिताए थे और उसके बाद अगले तीन वर्ष धन-संपत्ति बनाने में लगाए थे। अब वे अपना संस्थान शुरू करने के लिए तैयार थे। अपनी जीवन-भर की साधना और कार्य को एक संगठित रूप देने के लिए, लेकिन ठीक उसी समय यूरोप अब तक के सबसे विनाशकारी और व्यापक युद्ध में डूबने वाला था। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की कोई जानकारी नहीं थी। बाद में उन्होंने कहा कि उन्होंने रूस को इसलिए चुना था क्योंकि वह ‘शांतिपूर्ण, समृद्ध और शांत’ था। एशिया और अफ्रीका में बिताए उनके वर्षों ने उन्हें आने वाली घटनाओं का कोई संकेत नहीं दिया था।

बेनेट को पूरा विश्वास है कि इन वर्षों में गुर्जिएफ़ का आना-जाना राजदरबार के उच्च वर्गों में था और उनकी मुलाकात ज़ार से भी हुई थी। निस्संदेह, वे ऐसे व्यक्ति थे जो उस समय की रूसी राजनीति पर पूरी तरह सकारात्मक प्रभाव डाल सकते थे। बेनेट का सुझाव है कि उनका संबंध ज़ार के आस-पास के एक उदारवादी दल से था और उन्हें ‘घृणित रासपुतिन के प्रभाव का प्रतिरोध करने वाले व्यक्ति’ के रूप में सामने लाया गया था। यह टिप्पणी उस समय की रूसी राजनीति के बारे में जानकारी की कमी को दर्शाती है। उस समय रासपुतिन का ज़ार पर बहुत कम या लगभग कोई प्रभाव नहीं था, यद्यपि ज़ारिना अब भी उस पर विश्वास करती थी। उसकी शराबखोरी और अनुचित आचरण के कारण उसका प्रभाव पहले ही कम हो चुका था। जहाँ तक रासपुतिन के किसी राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न है, वह उदारवाद और विवेकशीलता की दिशा में था। (1914 में उसने ज़ार को युद्ध में जाने से रोकने के लिए बहुत प्रयास किए थे।) इसलिए गुर्जिएफ़ के ‘प्रतिरोधी प्रभाव’ या ‘counter influence’ के रूप में इस्तेमाल किए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी, गुर्जिएफ़ राजदरबार के इतना निकट अवश्य थे कि उनकी पहचान ज़ारिना की एक परिचारिका, काउंटेस ओस्ट्रोव्स्का से हुई, जिससे उन्होंने विवाह कर लिया।

अब, अंततः, हमें गुर्जिएफ़ से हुई मुलाकातों के प्रत्यक्ष विवरणों का सहारा लेने का अवसर मिलता है। इनमें सबसे आरंभिक विवरण संभवतः ‘ग्लिमपेसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) नामक एक ‘कहानी’ या निबंध है, जिसे 1914 में गुर्जिएफ़ के मॉस्को स्थित एक शिष्य ने लिखा था (गुर्जिएफ़ के प्रोत्साहन से)। इसमें उस समय का वर्णन है जब गुर्जिएफ़ पहली बार मॉस्को आए थे। अनाम लेखक बताता है कि अपने जीवन के एक दौर में उनकी रुचि गूढ़ विद्याओं में हो गई थी। निस्संदेह, वे क़बाला, टैरो आदि पर पुस्तकें पढ़ रहे थे। उन्होंने इस खोज को ऐसे उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जो विशेष रूप से रूसी प्रतीत होता है। (बर्द्याएव एक घटना सुनाते हैं कि सुबह पाँच बजे एक चर्चा-समूह के एक सदस्य ने कहा, ‘हम अभी सोने नहीं जा सकते। हमने अभी तक यह तय ही नहीं किया कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं।’) उनका एक मित्र, जिसे वे ‘A.’ कहकर संबोधित करते हैं, भी गूढ़ ज्ञान की खोज में उतना ही डूबा हुआ था। फिर अचानक उस मित्र की इस विषय में रुचि जाती हुई प्रतीत हुई। लेखक को यह पता नहीं था कि वह गुर्जिएफ़ से मिल चुका था।

एक दिन लेखक ने मॉस्को के एक समाचार-पत्र में ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन’ (The Struggle of the Magicians) नामक बैले का विज्ञापन देखा। उसके लेखक का नाम जी. आइ. गुर्जिएफ (G. I. Gurdjieff) दिया गया था। जब उसने यह बात A. को बताई तो उसके मित्र ने कुछ अनिच्छा के साथ स्वीकार किया कि वह गुर्जिएफ़ को जानता है और उसने मुलाकात की व्यवस्था करने का प्रयास करने पर सहमति दे दी।

एक रविवार की दोपहर A. ने फोन किया। सात बजे रेलवे स्टेशन पर रहना। हम मिस्टर गुर्जिएफ़ से मिलने जा रहे हैं।’ लेखक को यह असुविधाजनक लगा। उसका कुछ महत्वपूर्ण काम था। लेकिन उसने उस काम को टालने का निश्चय किया और समय पर पहुँच गया। उसका परिचित वहाँ प्रतीक्षा कर रहा था और दोनों एक ऐसी जगह के लिए ट्रेन पर सवार हुए जिसे लेखक ‘मॉस्को के निकट एक ग्रामीण विश्राम-स्थल’ कहता है। रास्ते में A. ने उसे गुर्जिएफ़ के बारे में कुछ बताया कि उन्होंने वर्षों तक पूर्व के देशों में भटकते हुए बिताए थे और अब मॉस्को के निकट एक संस्थान स्थापित करने का निश्चय किया था। इस विवरण में यह गलत बात भी कही गई थी कि गुर्जिएफ़ दो या तीन वर्ष पहले रूस आए थे और सेंट पीटर्सबर्ग में रहते थे। गुर्जिएफ़ ने, हमेशा की तरह, इस गलती को कभी सुधारा नहीं, यद्यपि उन्होंने ‘ग्लिमपेसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) को अपने शिष्यों के बीच प्रसारित होने दिया।

स्टेशन से एक घोड़ागाड़ी, स्लीज उन्हें एक देहाती मकान के फाटक तक ले गई। वे मुख्य द्वार से भीतर गए, भारी परदों से ढँके एक बिल्कुल अँधेरे प्रवेश-कक्ष से गुज़रे और एक ऐसे कमरे में पहुँचे जहाँ एक अधेड़ व्यक्ति नीची गद्दीदार सीट पर बैठा हुक्का पी रहा था।

इन शुरुआती घटनाओं को बताना उपयोगी है क्योंकि जैसा कि हम आगे देखेंगे, भावी शिष्यों से मिलने का यह गुर्जिएफ़ का एक विशिष्ट तरीका था। अचानक फोन करना और कहना, ‘फलाँ जगह पर इतने बजे पहुँचो।’ इसका उद्देश्य केवल लोगों में जिज्ञासा पैदा करना नहीं था बल्कि उन लोगों को छाँटना भी था जिनमें पर्याप्त उत्साह और दृढ़ निश्चय नहीं था।

लेखक के अनुसार गुर्जिएफ़ का चेहरा पूर्वी लोगों जैसा था। विशेष रूप से उसकी आँखों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। अपने आप में इसलिए नहीं बल्कि इसलिए कि वे जिस तरह मुझे देख रहे थे, वह ऐसा नहीं था मानो वे  मुझे पहली बार देख रहे हों बल्कि ऐसा था जैसे वे मुझे बहुत लंबे समय से और बहुत अच्छी तरह जानते हों।’ दीवारें और फर्श दुर्लभ पूर्वी कालीनों से ढँके थे और छत पर सुंदर रेशमी शॉल लटक रहे थे। प्रकाश कमल के फूल जैसी दिखाई देने वाली एक विशाल काँच की गोलाकार रोशनी से आ रहा था। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ ने एक उपयुक्त ‘रहस्यवादी’ वातावरण बनाने की पूरी तैयारी कर रखी थी। लेकिन उनकी बातचीत का स्वर अत्यंत ठोस और व्यावहारिक निकला और यही बात उनसे मिलने वाले अधिकांश ‘साधकों’ को प्रभावित करती थी। वे रूसी भाषा बहुत खराब और हिचकिचाते हुए बोलते थे। (उनकी मातृभाषाएँ यूनानी और अर्मेनियाई थीं)।

गुर्जिएफ़ ने सबसे पहले हर्मेटिक सूत्र ‘एज़ अबव सो बिलो’ (As above, so below)... जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे,’ पर व्याख्यान देना शुरू किया। उन्होंने पहले इसे मनुष्य के जीवन से समझाया, फिर स्वयं पृथ्वी के जीवन से और उसके बाद सौरमंडल की ओर बढ़ गए। उन्होंने ‘लॉ ऑफ थ्री’ (Law of Three), तीन के नियम,’ के बारे में बताया... तीन शक्तियाँ— क्रिया, प्रतिरोध और संतुलन। स्वाभाविक ही है कि इस सारी बात से उस गूढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाले व्यक्ति की साँस कुछ देर के लिए थम-सी गई।

इसके बाद गुर्जिएफ़ ने अपनी मूल ‘ब्रह्मांड-विज्ञान संबंधी’ (मनोवैज्ञानिक नहीं) व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की। चूँकि इस पुस्तक में मेरा अधिक संबंध गुर्जिएफ़ के मनोवैज्ञानिक विचारों से होगा, इसलिए इस समय उनकी ब्रह्मांड-विज्ञान संबंधी अवधारणा का संक्षिप्त परिचय देना सुविधाजनक होगा।

गुर्जिएफ़ के अनुसार ब्रह्मांड एक जीवित जीव है, जिसमें सात स्तर हैं और इनमें सबसे ऊँचा स्तर परम बुद्धि का है। इन स्तरों की कल्पना एक ऐसी सीढ़ी के रूप में की जा सकती है, जिसके माध्यम से ऊर्जा नीचे की ओर संचारित होती है और एक स्तर से दूसरे स्तर पर जाते हुए अपना स्वरूप बदलती जाती है। इस अर्थ में गुर्जिएफ़ की व्यवस्था क़बाला[2] की व्यवस्था जैसी है, जिसकी ‘ट्री लाइफ’ (Tree of Life- जीवन-वृक्ष) को भी एक ऐसी सीढ़ी की तरह देखा जा सकता है, जो नीचे मनुष्य से ऊपर ईश्वर तक पहुँचते हुए घूमती और मुड़ती जाती है। बेशक, ये ‘स्तर’ आध्यात्मिक वास्तविकता के क्षेत्र हैं, भौतिक संसार नहीं। लेकिन ‘जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे’ के नियम के कारण इन्हें भौतिक संसारों के रूप में भी देखा जा सकता है। इसी कारण गुर्जिएफ़ अपने सात स्तरों को ब्रह्मांड के सात अस्तित्वों से जोड़ते हैं: चंद्रमा, पृथ्वी, ग्रह, सूर्य, आकाशगंगा, समस्त संसारों की संपूर्णता और परम सत्ता। चंद्रमा सबसे निचले स्तर पर है और उस स्तर पर रहने वाला कोई भी व्यक्ति कम-से-कम छियानबे नियमों के अधीन होता है। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य केवल अड़तालीस नियमों के अधीन हैं। ग्रह चौबीस नियमों के अधीन हैं। और परम सत्ता केवल एक नियम अपने स्वयं के नियम, के अधीन है। गुर्जिएफ़ इस पूरी व्यवस्था को ‘रे ऑफ क्रीएशन’ (Ray of Creation—सृष्टि की किरण) कहते हैं।

जिन लोगों को यह बात समझ में न आए, उन्हें चिंता न करने की सलाह दी जाती है। इसके बिना भी गुर्जिएफ़ के विचारों का सार समझा जा सकता है। गुर्जिएफ़ के ब्रह्मांड-विज्ञान में उतना ही महत्वपूर्ण एक और विचार है—‘ऑक्टेव’ (सप्तक) के स्वरों का। मूलतः यही वह प्रमुख नियम है जो हमारी मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करता है। हर व्यक्ति ने यह अवश्य देखा होगा कि हम अपने लिए निर्धारित किए गए दीर्घकालीन लक्ष्यों तक बहुत कम पहुँच पाते हैं। हम कोई महत्वपूर्ण संकल्प लेते हैं और दृढ़ निश्चय करते हैं कि उसे पूरा करेंगे। एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए। कुछ समय तक हम अपने लक्ष्य की ओर बिना विचलित हुए सीधी रेखा में आगे बढ़ते रहते हैं। फिर, बिना इसका ध्यान दिए, हम अपनी प्रारंभिक प्रेरणा खो देते हैं और अपनी दिशा को थोड़ा बदल लेते हैं। बाद में फिर अपनी दिशा बदलते हैं। कभी-कभी हम ऐसा इतनी बार करते हैं कि अंततः हम ठीक उसका उलटा करने लगते हैं, जिसे करने के लिए हमने शुरुआत की थी। (उदाहरण के लिए, इससे यह समझाया जा सकता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के इतने सारे योद्धा अंततः दबंग और अत्याचारी क्यों बन जाते हैं।)

गुर्जिएफ़ के अनुसार इसका कारण ‘ऑक्टेव के नियम’ में निहित है। कंपनों (vibrations) की दृष्टि से देखें तो ऑक्टेव में दो स्थान ऐसे हैं जहाँ कंपन अन्य स्थानों की तुलना में ‘कमज़ोर’ होते हैं— Mi और Fa के बीच तथा Ti और Do के बीच। इन स्वरों के बीच पूर्ण स्वरों के बजाय अर्ध-स्वर होते हैं। और जब हमारी ऊर्जाओं की बात आती है, तो ये वही बिंदु हैं जहाँ, यदि हमें जान-बूझकर अतिरिक्त ऊर्जा या बल न दिया जाए तो हमारी दिशा बदल जाती है।

रचनात्मक प्रक्रियाएँ अवरोही ऑक्टेवों पर निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए, इस पुस्तक को लिखते समय मैंने सबसे पहले गुर्जिएफ़ के पूरे चिंतन पर विचार किया और उसे सात अध्यायों में बाँटने की योजना बनाई। यदि मेरे पास ऐसा कोई कंप्यूटर होता जो मेरी पूरी कल्पना को तुरंत शब्दों में बदल सकता तो यह पुस्तक दस मिनट में लिखी जा सकती थी। लेकिन जब उसे सात भागों में बाँट दिया गया, तब मुझे यह तय करना पड़ा कि प्रत्येक भाग में क्या रखना है और क्या छोड़ देना है। यदि इस पुस्तक का अंतिम रूप मेरी मूल कल्पना से कुछ भी मिलता-जुलता हुआ है तो इसका कारण केवल यही होगा कि मैंने ऑक्टेव के नियम को लागू किया और कुछ निश्चित बिंदुओं पर उस प्रारंभिक प्रेरणा को जान-बूझकर फिर से सशक्त किया। अर्थात मैंने काम को बीच में रोका और इस बात पर सावधानीपूर्वक दोबारा विचार किया कि मैं क्या कर रहा था। हर लेखक या कलाकार या संगीतकार, उस प्रक्रिया से भली-भाँति परिचित है जिसका मैं वर्णन कर रहा हूँ। इसीलिए चित्रकार बार-बार पीछे हटकर अपने कैनवास को देखता है, फिर उससे दूर चला जाता है, उस पर रात भर विचार करता है और अगले दिन नए सिरे से उसके पास लौटता है। किसी कलाकृति की रचना एक ही लगातार बिना रुके किए गए प्रयास में नहीं हो सकती। यदि कलाकार इस नियम की उपेक्षा करता है तो उसकी रचना का ‘रीढ़ टूट जाना’ बिल्कुल शाब्दिक अर्थ में हो सकता है। (इसी कारण बाल्ज़ाक के इतने सारे उपन्यास अत्यंत शानदार ढंग से शुरू होते हैं, लेकिन उनका अंत बहुत खराब होता है।)

इन सभी नियमों की रूपरेखा ‘ग्लिमपेसे ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) के लेखक को समझाने के बाद गुर्जिएफ़ बताते हैं कि मनुष्य के शरीर की तुलना तीन मंज़िलों वाली एक फैक्टरी से की जा सकती है। सिर, छाती और पेट। ये तीनों अलग-अलग प्रकार के ‘भोजन’ पर काम करते हैं। पेट को मांस और पेय की आवश्यकता होती है। छाती को हवा की जबकि मस्तिष्क को प्रभावों या अनुभवों (impressions) की आवश्यकता होती है। यह गुर्जिएफ़ की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था कि प्रभाव और अनुभव भी उतने ही ‘भोजन’ हैं जितनी रोटी और इनके बिना हम भूखे रह जाएँगे। संवेदी-वंचना (sensory deprivation) पर किए गए प्रयोगों में, जिनमें व्यक्ति को एक अँधेरे कमरे में रखा जाता है, उनके इस कथन की वास्तविकता सिद्ध हुई है। लेकिन 1912 में ऐसे प्रयोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और इसलिए उनका यह कथन विचित्र और बिना किसी प्रमाण के प्रतीत होता था। यह उन अनेक उदाहरणों में से एक है जो गुर्जिएफ़ की अंतर्दृष्टियों की चौंका देने वाली सटीकता को दर्शाते हैं।गुर्जिएफ़ के अनुसार, ये तीनों प्रकार के ‘भोजन’ अलग-अलग ऑक्टेव से संबंधित हैं।

अंत में उसने नए शिष्य को अपने बैले ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के बारे में कुछ बताया। उन्होंने समझाया कि इसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन करना था, लेकिन इसमें कुछ पवित्र नृत्य भी शामिल थे, जिनके अर्थ ‘तीन के नियम’ और ‘सात के नियम’ से संबंधित थे। (हम पहले ही देख चुके हैं कि गुर्जिएफ़ ने इन नृत्यों और इन नियमों के बारे में सारमंग मठ में कैसे सीखा था।) गुर्जिएफ़ अपने समय की अधिकांश कला के प्रति बहुत कठोर और उपेक्षापूर्ण थे। उनका कहना था कि वह कला पूरी तरह व्यक्तिपरक है। वह केवल व्यक्तिगत कलाकार की न्यूरोसिस का प्रतिबिंब है। वस्तुनिष्ठ कला एक अलग बात है क्योंकि उसका उद्देश्य सभी लोगों तक एक ही सार्वभौमिक अर्थ पहुँचाना होता है।

‘ग्लिम्पसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) नामक यह ‘कहानी’ इस दृश्य के साथ समाप्त होती है कि A. खिड़की के परदे हटा देता है और पता चलता है कि बाहर दिन निकल चुका है... वास्तव में सुबह के नौ बज चुके हैं। गुर्जिएफ़ उन दोनों को वापस स्टेशन तक ले जाने के लिए एक घोड़ागाड़ी मँगवाते हैं। और यहीं यह अधूरा-सा विवरण समाप्त हो जाता है।

‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के माध्यम से ही पी. डी. उस्पेन्स्की, जो गुर्जिएफ़ के सबसे प्रभावशाली व्याख्याकार और प्रचारकों में से एक बने, उस व्यक्ति से परिचित हुए, जिसके विचारों के प्रति वे अपने शेष जीवन को समर्पित करने वाले थे।

उस्पेन्स्की भी, गुर्जिएफ़ की तरह, ‘गुप्त ज्ञान’ का खोजी थे और 1914 में उसकी खोज में भारत गए थे। वहाँ उनकी मुलाकात कई ऐसे गुरुओं से हुई जिन्होंने उन्हें अपने विद्यालयों में प्रवेश देने की पेशकश की, लेकिन उस्पेन्स्की की भारत में बस जाने की कोई इच्छा नहीं थी। वे मॉस्को लौट आए, जहाँ उन्होंने ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के बारे में एक सूचना देखी और अपने समाचार-पत्र के लिए उसके बारे में एक प्रतिकूल टिप्पणी लिखी। 1915 के वसंत में उस्पेन्स्की ने सेंट पीटर्सबर्ग के लोगों के सामने ‘गुप्त ज्ञान’ की अपनी खोज के बारे में कई व्याख्यान दिए। वहाँ उनके परिचित बने दो लोगों ने उन्हें उस काकेशस के यूनानी व्यक्ति के बारे में बताया जो ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) का रचयिता था। उस्पेन्स्की प्रभावित नहीं हुए। गुर्जिएफ़ की बातें उन्हें किसी और रहस्यवादी ढोंगी जैसी लगीं। गुर्जिएफ़ से उनकी पहली मुलाकात ने इस धारणा को बदल दिया, लेकिन उन्हें बुरी तरह उलझन में भी डाल दिया। एक पिछली गली के छोटे-से कैफ़े में उनका परिचय गुर्जिएफ़ से कराया गया। वे ‘पूर्वी प्रकार का व्यक्ति था, अब जवान नहीं रहे थे (गुर्जिएफ़ की आयु लगभग चालीस वर्ष थी), जिनकी काली मूँछें और भेदती हुई आँखें थीं। वे मुझे इसलिए चकित कर रहे थे क्योंकि ऐसा लगता था मानो वे भेष बदले हुए हों और उस जगह तथा उसके वातावरण से बिल्कुल मेल न खाते हों।’ गुर्जिएफ़ काकेशस के लहजे में बोलते थे जो किसी रूसी व्यक्ति को वैसा ही सुनाई देता होगा, जैसा किसी अंग्रेज़ को लैंकाशायर का बहुत भारी स्थानीय लहजा सुनाई दे अर्थात ऐसा लहजा, जिसे आम तौर पर गहरी या सूक्ष्म विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जाता।

उन्होंने पूर्वी दर्शन और ‘सत्य की खोज’ के बारे में बातचीत की और उस्पेन्स्की को जल्दी ही यह समझ में आ गया कि गुर्जिएफ़ उन अधिकांश बातों का स्वयं अनुभव कर चुके थे, जिनके बारे में वे बात कर रहे थे। इस बिंदु पर गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की को अपने कुछ शिष्यों की एक बैठक में आने का निमंत्रण दिया। वहाँ जाते समय उन्होंने उस्पेन्स्की को बताया कि जिस मकान में बैठक होने वाली थी, उसे किराये पर लेने में उन्होंने कितना भारी खर्च किया था। उन्होंने यह भी बताया कि मॉस्को के अनेक प्रोफेसर और कलाकार उसके विचारों में रुचि रखते थे। लेकिन जब उस्पेन्स्की ने उनके नाम पूछे तो गुर्जिएफ़ चुप हो गए। वे उस मकान पर पहुँचे और उस्पेन्स्की को यह देखकर कुछ संकोच हुआ कि वह तो स्कूल के अध्यापकों को मिलने वाले साधारण मकान जैसा था और वह भी किराया-मुक्त। गुर्जिएफ़ ने उन्हें अपने भारी खर्च की कहानी क्यों सुनाई थी? ऐसा लगता था मानो गुर्जिएफ़ जान-बूझकर उस्पेन्स्की की पहली धारणा को ही सही साबित करना चाहते हों कि वे किसी तरह का ठग या लोगों को अपने जाल में फँसाने वाला व्यक्ति हैं।

शिष्य’ स्कूल के अध्यापक जैसे दिखाई देते थे। उनमें से एक ने ‘Glimpses of Truth’ की पांडुलिपि ऊँचे स्वर में पढ़ी। उस्पेन्स्की को वह उलझी हुई और खराब ढंग से लिखी हुई लगी। उन्होंने पूछा कि गुर्जिएफ़ के शिष्य कौन-सी प्रणाली का अध्ययन कर रहे हैं। उन्हें उत्तर मिला, ‘अपने ऊपर काम करना’ (work on oneself)। लेकिन इसके बारे में और कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके अलावा, गुर्जिएफ़ ने पूछा कि क्या इस कहानी को किसी समाचार-पत्र में छापा जा सकता है। उस्पेन्स्की को कहना पड़ा कि नहीं। यह बहुत लंबी है और इसका न तो ठीक से आरंभ है, न अंत। ऐसा लग रहा था मानो गुर्जिएफ़ अपने व्यक्तिगत प्रचार के लिए उस्पेन्स्की का इस्तेमाल करना चाहते हों।

लेकिन उसी पिछली गली के कैफ़े में हुई बाद की मुलाकातों ने उस्पेन्स्की के मन में यह संदेह बिल्कुल नहीं रहने दिया कि गुर्जिएफ़ के पास वास्तविक ज्ञान था। गुर्जिएफ़ ने उससे दो बातें कहीं, जिन्होंने उन्हें तुरंत प्रभावित किया। पहली यह कि मनुष्य मूलतः एक ‘मशीन’ है, जो केवल अपने वातावरण पर प्रतिक्रिया करता है और दूसरी यह कि हमारा यह सोचना गलत है कि हमारे भीतर कोई एक अहं या कोई एक स्वतंत्र ‘मैं’ (I) है। हमारे भीतर दर्जनों ‘मैं’ हैं, संभवतः हजारों। इसीलिए हमारे लिए निरंतर एक ही ढंग से काम करना या व्यवहार करना इतना कठिन है। एक ‘मैं’ नए वर्ष का संकल्प लेता है, लेकिन कुछ ही घंटों बाद कोई दूसरा ‘मैं’ नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है और उस संकल्प को तोड़ने का निर्णय कर लेता है। यह धरातल से जुड़ी हुई मनोविज्ञान की ऐसी बात थी, जो उस्पेन्स्की के मूलतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बहुत आकर्षित करती थी।

जब गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की को बताया कि मॉस्को के उनके शिष्य सालाना एक हजार रूबल फीस देते हैं तो उस्पेन्स्की ने कहा कि यह रकम काफी अधिक लगती है। इस पर गुर्जिएफ़ ने समझाया कि उनके शिष्यों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे जो कुछ प्राप्त करते हैं, उसके लिए भुगतान करें। पहली बात यह कि लोग उस वस्तु का मूल्य नहीं समझते जिसे वे बहुत आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। दूसरी बात यह कि जो व्यक्ति साल में इतनी रकम भी नहीं जुटा सकता, वह संभवतः ‘कार्य’ (the work) में अच्छा नहीं होगा। गुर्जिएफ़ इस बात पर ज़ोर देते थे कि स्वयं को बदलने की शक्ति पैदा करने में सक्षम लोग वे होते हैं जो योग्य और कार्यकुशल होते हैं, न कि वे न्यूरोटिक स्वप्नदर्शी जो केवल कल्पनाओं में जीते हैं।

उनके संबंधों में निर्णायक मोड़ तब आया जब उस्पेन्स्की ने पूछा, क्या मशीन बने रहना बंद करना संभव है?’ गुर्जिएफ़ ने उत्तर दिया, यदि तुमने ऐसे प्रश्न अधिक बार पूछे होते तो शायद हमारी बातचीत कहीं पहुँच सकती थी। मशीन होना बंद करना संभव है, लेकिन इसके लिए सबसे पहले मशीन को जानना आवश्यक है।’

कहा जा सकता है कि आखिरकार उस्पेन्स्की ने सही प्रश्न पूछ लिया था और गुर्जिएफ़ ने सही उत्तर दे दिया था। अब से उस्पेन्स्की पूरी तरह यह सीखने के लिए समर्पित हो गए कि गुर्जिएफ़ उसे क्या सिखाना चाहते थे।

गुर्जिएफ़ ने कहा, मनुष्य एक कारागार में है। यदि उसे वहाँ से भाग निकलने का कोई अवसर प्राप्त करना है तो उसे सबसे पहले यह अनुभव करना होगा कि वह कारागार में है। जब तक वह इस बिंदु तक नहीं पहुँचता, तब तक वह कुछ भी शुरू नहीं कर सकता। इसके बाद प्रश्न उठता है। इससे बाहर कैसे निकला जाए? यहाँ गुर्जिएफ़ ने एक ऐसी बात कही जो उसके पूरे कार्य के केंद्र में है। लोगों के एक समूह के पास अकेले व्यक्ति की तुलना में भाग निकलने का अधिक अच्छा अवसर होता है क्योंकि वे मिलकर एक सुरंग खोद सकते हैं। अकेले व्यक्ति के लिए बाहर निकलने की संभावना बहुत कम होती है। क्योंकि मनुष्य मूलतः सोया हुआ है। वह सोचता है कि उसकी रोज़मर्रा की चेतना ही ‘जाग्रत चेतना’ है। उस अचेतन अवस्था के विपरीत जिसमें वह हर रात चला जाता है। यही शायद उसकी सबसे बड़ी भूल है। वास्तव में, जब हम सुबह जागते हैं तो हम केवल सोई हुई चेतना के ही एक दूसरे रूप में प्रवेश करते हैं। हम केवल परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया करते हैं और वही करते हैं जो कल और उससे पहले के दिन करते आए थे। कुछ चीज़ें हमें ‘जागने’ की क्षणिक झलक दे सकती हैं। अचानक आया कोई संकट, अपने पूरे जीवन-ढंग को बदलने की आवश्यकता का अनुभव, यहाँ तक कि किसी यात्रा या छुट्टी पर निकलना भी। एक माँ जब पहली बार अपने नवजात बच्चे को गोद में उठाती है तो वह एक क्षण के लिए ‘जाग’ सकती है और अचानक उसे यह एहसास हो सकता है कि जिस चेतना को वह अपने जीवन के हर दिन स्वाभाविक मानकर जीती आई है, वह आवश्यक नहीं है। जीवन पूरी तरह अलग हो सकता है, कहीं अधिक रोमांचक और जटिल। संक्षेप में, वह स्वतंत्र है। लेकिन यदि दस मिनट बाद ही वह स्वयं से पूछे, यह स्वतंत्रता क्या है?’ तो वह उसे पहले ही भूल चुकी होती है।

गुर्जिएफ़ के दृष्टिकोण को समझना शायद तब आसान हो जाए, यदि ‘मशीन’ कहने के बजाय हम ‘रोबोट’ शब्द का इस्तेमाल करें। मेरे अचेतन मन में एक रोबोट है, जो मेरे लिए बहुत-से काम करता है। जब मैं टाइप करना, कार चलाना या कोई विदेशी भाषा सीखना शुरू करता हूँ तो मुझे यह सब कठिनाई के साथ और पूरी चेतना से, एक-एक कदम करके सीखना पड़ता है। लेकिन जल्दी ही मेरा ‘रोबोट-वैलेट’ (रोबोट-नौकर) मेरी जगह काम सँभाल लेता है और ‘मैं’ जितनी तेजी और कुशलता से नहीं कर सकता, उससे कहीं अधिक तेजी और कुशलता से टाइप करने या गाड़ी चलाने लगता है। यह रोबोट अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका महत्व आँका नहीं जा सकता। जब मैं बच्चा था, तब वह बहुत कम कुशल था और इसी कारण मैं भद्दा और अनाड़ी था तथा हर काम में मुझे कहीं अधिक प्रयास करना पड़ता था। अब मेरा रोबोट जीवन जीने के अधिकांश कामों का बोझ मेरे कंधों से उठा लेता है।

लेकिन इसमें एक समस्या है। वह केवल वही काम नहीं करता जो मैं चाहता हूँ कि वह करे जैसे, टाइप करना या फ़्रेंच बोलना। वह वे काम भी करता है जिन्हें मैं नहीं चाहता कि वह करे। मुझे संगीत और कविता पसंद है, लेकिन जब मैं किसी सिम्फनी को सुन लेता हूँ या किसी कविता को लगभग दर्जन भर बार पढ़ लेता हूँ तो उसका आधा प्रभाव समाप्त हो जाता है क्योंकि उस समय सुनने वाला ‘मैं’ नहीं बल्कि मेरा रोबोट होता है। यदि मेरा ध्यान किसी दूसरी बात में उलझा हुआ हो तो वह मेरे लिए खाना खा लेता है। यहाँ तक कि वह मेरी पत्नी के साथ प्रेम भी कर सकता है। मैं बहुत-से रोचक और नए अनुभवों से वंचित रह जाता हूँ क्योंकि मैं इस रोबोट पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो गया हूँ।

स्पष्ट है कि गुर्जिएफ़ इसी रोबोट और उसके प्रति हमारी गुलामी की बात कर रहा है। मैं चीज़ों की ‘नवीनता’ का अनुभव करने के लिए इस रोबोट को कुछ समय के लिए निष्क्रिय कर सकता हूँ। एक-दो गिलास शराब रोबोट को ढीला कर देते हैं। मेस्केलिन या एल एस डी (LSD)[3] जैसी मनःप्रभावी (psychedelic) दवाएँ रोबोट को पूरी तरह निष्क्रिय कर देती हैं और इसका परिणाम यह होता है कि नशा करने वाला व्यक्ति वास्तविकता की ऐसी चमक के सामने आ जाता है जो उसे चकाचौंध कर देती है। कोई फूल या पेड़ इतना वास्तविक प्रतीत हो सकता है कि उसका ध्यान उसी पर अटक जाता है और वह अर्थ से फूटता हुआ दिखाई देता है।

समस्या यह है कि ऐसी दवाएँ रोबोट को पूरी तरह निष्क्रिय कर देती हैं और यही वह स्थिति नहीं है जिसकी आवश्यकता है। आखिर हमने रोबोट को विकसित ही इसलिए किया था क्योंकि हम अधिक स्वतंत्रता चाहते थे। उसे पूरी तरह पंगु बना देना बुद्धिमानी नहीं है। वास्तव में, वास्तविक स्वतंत्रता के क्षणों में ‘वास्तविक मैं’ और रोबोट एक पूर्ण सामंजस्य में आ गए प्रतीत होते हैं। विलियम जेम्स कहते हैं कि कोई फुटबॉल खिलाड़ी वर्षों तक शानदार ढंग से खेल सकता है, फिर एक दिन वह अपने भीतर की किसी बाधा को पार कर जाता है और अचानक उससे कोई गलती ही नहीं होती। ऐसा लगता है मानो खेल स्वयं उसे खिला रहा हो। या कोई संगीतकार अचानक यह अनुभव कर सकता है कि वह अपने वाद्य को एक विचित्र पूर्णता के साथ बजा रहा है। ऐसे नियंत्रण के स्तर पर, जिसे उसने इससे पहले कभी हासिल नहीं किया था। वास्तव में, फॉन्टेनब्लो के जंगल में जॉन बेनेट के साथ भी यही हुआ था। सिवाय इसके कि उसका ‘वाद्य’ उसका अपना शरीर और उसका अपना मन था, जो अचानक उसकी इच्छानुसार किसी भी मनोदशा को उत्पन्न कर सकता था। और इस प्रकार की स्वतंत्रता किसी मनःप्रभावी दवा के माध्यम से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए ‘वास्तविक मैं’ और ‘रोबोट’ के बीच सक्रिय सहयोग आवश्यक है। उदाहरण के लिए, हर लेखक जानता है कि थोड़ी-सी शराब उसकी झिझक या मानसिक अवरोधों को दूर कर सकती है और उसे अधिक स्वतंत्रता से लिखने में मदद कर सकती है। तीन या चार गिलास उसे ऐसी गर्म और सुखद अवस्था में पहुँचा सकते हैं जिसमें उसे लगता है कि वह टाइपराइटर पर कोई महान कृति उँडेल सकता है। लेकिन अगली सुबह जब वह पढ़ता है कि उसने क्या लिखा था तो वह बकवास निकलती है। शराब ने उसकी झिझक और मानसिक अवरोध तो दूर कर दिए थे, लेकिन उसने उन आलोचनात्मक नियंत्रणों को भी हटा दिया था जो सही शब्द और सही अभिव्यक्ति का चुनाव करते हैं। शराब उस कठिन परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती जो उस अचानक होने वाली ‘सफल छलाँग’ या ‘break-through’ को जन्म देता है अर्थात आलोचना और प्रेरणा, रोबोट और ‘वास्तविक मैं’ के बीच होने वाला पूर्ण सहयोग।

इस तरह व्यक्त करने पर हम समझना शुरू कर सकते हैं कि गुर्जिएफ़ का लक्ष्य क्या था। हम विलियम जेम्स के ‘second wind’ दूसरी साँस’ की बात कर रहे हैं, उन विचित्र शक्ति-प्रवाहों की, जिनमें हमें लगता है कि हम सामान्य से अधिक जीवंत हो गए हैं। हम इन्हें अपनी इच्छा से उत्पन्न करने की आशा कैसे कर सकते हैं? इसका उत्तर है, कामों को ‘स्वचालित रूप से’ न करके, आँखें केवल बाहरी दुनिया पर टिकाए हुए जीवन में बहते न चले जाकर। पहला कदम है। अंदर की ओर देखना और ‘वास्तविक मैं’ तथा रोबोट के बीच के जटिल संबंध का निरीक्षण करना। यह ध्यान की कोई विधि नहीं है, न रहस्यवाद की, न शारीरिक आत्म-अनुशासन की। यह मुख्यतः ज्ञान प्राप्त करने का एक तरीका है। ऐसा तरीका जो कुछ निश्चित बातों को जानने पर निर्भर करता है।



[1] पूरा नाम ग्रिगोरी रासपुतिन (Grigori Rasputin) था। वे रूसी साम्राज्य के अंतिम दौर के एक प्रसिद्ध रहस्यवादी, धार्मिक साधक और आध्यात्मिक प्रभावशाली व्यक्ति थे। वे ज़ार निकोलस द्वितीय और विशेष रूप से उनकी पत्नी ज़ारिना अलेक्ज़ान्द्रा के निकट पहुँच गए थे।

[2] यहाँ Qabalah (कबाला) यहूदी रहस्यवादी परंपरा है और Tree of Life (जीवन-वृक्ष) उसकी एक प्रमुख प्रतीकात्मक संरचना है।

[3] लाइसरजिक एसिड डायएथाइलामाइड। यह एक शक्तिशाली मनोप्रभावी (psychedelic) पदार्थ है, जो चेतना, धारणा, विचार और संवेदनाओं में गहरे बदलाव पैदा कर सकता है।

 

Wednesday, 9 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय दो: प्रारंभिक वर्ष)

वह व्यक्ति कौन था, जिसकी संकेंद्रित शक्ति से भरी उपस्थिति ने उसके इतने सारे समकालीनों को प्रभावित किया?



गुर्जिएफ़ के बारे में प्रकाशित शुरुआती विवरणों में से एक जे. जी. बेनेट की पुस्तक (ह्वट आर वी लिविंग?) ‘What Are We Living For? में मिलता है, जो 1949 में प्रकाशित हुई थी। उसी वर्ष जब गुर्जिएफ़ की मृत्यु हुई। बेनेट कहते हैं, जो लोग ऐसी बातों में रुचि रखते हैं, वे कई वर्षों से यह जानते रहे हैं कि एक असाधारण शिक्षक पश्चिम में आ चुका था। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने ज्ञान के उन स्रोतों तक पहुँच प्राप्त कर ली थी, जिन तक उससे पहले किसी पश्चिमी अन्वेषक की पहुँच नहीं हुई थी।” वे आगे लिखते हैं, गुर्जिएफ़ अपने तिरासीवें जन्मदिन से आगे निकल चुके हैं... उनका जन्म कॉकस क्षेत्र में एक पुराने यूनानी परिवार में हुआ था, जो सौ वर्ष से भी अधिक पहले एशिया माइनर की प्राचीन यूनानी बस्तियों में से किसी एक से वहाँ आकर बसा था। बचपन के आरंभिक वर्षों से ही उन्हें अनेक असाधारण व्यक्तियों से मिलने के अवसर मिले। इन लोगों के संपर्क से उनमें यह विश्वास पैदा हुआ कि मनुष्य और संसार के बारे में यूरोपीय विज्ञान और साहित्य में प्रचलित धारणाओं में कोई अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ छूट गई है। वही विज्ञान और साहित्य, जिनका अध्ययन करने के लिए उन्हें तैयार किया गया था।”

वास्तव में, गुर्जिएफ़ की मृत्यु के समय उनकी आयु तिरासी वर्ष के आस-पास भी नहीं थी। उनके पासपोर्ट में उनकी जन्मतिथि 28 दिसंबर 1877 दी गई थी। यदि यह तारीख सही है तो उनकी मृत्यु उनके बहत्तरवें जन्मदिन से कुछ ही पहले हुई थी। अपनी पुस्तक ‘दि ऑकल्ट’ (The Occult) में मैंने 1873 की तारीख को अधिक संभावित माना है। जन्म-वर्ष में इस अंतर से गुर्जिएफ़ की राष्ट्रीयता के प्रश्न पर थोड़ा फर्क पड़ता है। यदि उनका जन्म 1873 में हुआ था तो वे तुर्की के नागरिक थे और यदि दिसंबर 1877 में हुआ था तो वे रूसी थे क्योंकि उनका जन्मस्थान गुमरू (Gumru) 1877 के रूस-तुर्की युद्ध के दौरान रूस के अधिकार में आ गया था। बाद में ज़ार के पिता के नाम पर इसका नाम अलेक्ज़ान्द्रोपोल रख दिया गया।

गुर्जिएफ़ के पिता यूनानी थे और उनकी माँ आर्मेनियाई। लगभग 1878 में उनका परिवार पास के शहर कार्स चला गया। 1877 में कार्स पर रूसियों ने अधिकार कर लिया था और वहाँ रहने वाले बहुत-से तुर्कों का नरसंहार किया गया था। जब कार्स रूस का हिस्सा बना तो हजारों तुर्क वहाँ से बाहर चले गए और हजारों रूसी वहाँ आकर बस गए। यह समझना महत्वपूर्ण है कि गुर्जिएफ़ का जन्म एक ऐसे जातीय मिश्रण वाले वातावरण में हुआ था अर्थात एक सुरक्षित और स्थिर संस्कृति के ठीक विपरीत परिस्थिति में। ऐसी परिस्थितियाँ व्यक्ति के भीतर अपनी जड़ों से कटे होने और असुरक्षा की भावना पैदा कर सकती हैं, लेकिन वे जीवित रहने की इच्छा को भी तीव्र कर सकती हैं। गुर्जिएफ़ जन्मजात रूप से जीवित रहने वाला व्यक्ति (survivor) थे।

उनके पिता पेशे से बढ़ई थे, लेकिन अपनी पसंद से वे एक बार्ड (bard) अर्थात पेशेवर कथावाचक थे। शुरू से ही गुर्जिएफ़ के भीतर अतीत के साथ गहरा संबंध-बोध था। उनके पिता एपिक ऑफ गिलगमेश (Epic of Gilgamesh)[1] यानी गिलगमेश के महाकाव्य के कुछ अंश सुनाया करते थे। एक दिन गुर्जिएफ़ ने एक पत्रिका में पढ़ा कि पुरातत्त्वविदों ने बेबीलोनिया में उस महाकाव्य की प्राचीन पट्टिकाएँ खोज निकाली हैं। वे बताते हैं कि उन्हें यह जानकर “इतनी आंतरिक उत्तेजना हुई, मानो मेरा भविष्य का भाग्य ही इस पूरी बात पर निर्भर करता हो।” उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि पत्रिका में छपी महाकाव्य की पंक्तियाँ लगभग वैसी ही थीं जैसी उनके पिता उन्हें सुनाया करते थे और फिर भी वे पंक्तियाँ हजारों वर्षों से मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आई थीं। यहाँ महत्वपूर्ण बात वह निहित संकेत है जिसे लेखक सीधे नहीं कहता, यदि प्राचीन ज्ञान का एक रूप इस तरह जीवित रह सकता था तो संभव है कि प्राचीन ज्ञान के दूसरे रूप भी इसी तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहे हों।

अधिकांश बच्चों की तरह गुर्जिएफ़ भी “occult” यानी गूढ़ विद्याओं और परा-मानसिक घटनाओं की दुनिया से आकर्षित थे। लेकिन अधिकांश बच्चों से अलग, इस क्षेत्र में उन्हें कुछ प्रत्यक्ष अनुभव भी प्राप्त हुए। अपने शिक्षक फादर बोगाचेव्स्की के घर पर गुर्जिएफ़ ने एक ‘टेबल रैपिंग’ (table rapping) सत्र देखा। इसमें मेज़ का एक पाया प्रश्नों के उत्तर देने के लिए थपथपाने या खटखटाने लगता था। उस समय गुर्जिएफ़ अपनी प्रिय बहन की मृत्यु के कारण अभी भी गहरे शोक में थे। उस पूरी रात वे जागते रहे और मृत्यु के बाद जीवन की समस्या के बारे में सोचते रहे। जब गुर्जिएफ़ ने अपने पहले शिक्षक, फादर बोर्श से ऐसी बातों के बारे में पूछा तो बोर्श ने दृढ़ता से कहा कि यह सब बकवास है। इसके परिणामस्वरूप गुर्जिएफ़ को उस व्यक्ति की बात पर ही संदेह होने लगा, जिसे वे पहले ज्ञान का साक्षात रूप मानते थे। उन्होंने इस विषय पर पुस्तकें उधार लेकर पढ़ीं, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।

एक बार एक मंदबुद्धि-सी भविष्यवक्ता ने उनकी मौसी से कहा कि गुर्जिएफ़ के शरीर के दाहिने हिस्से में एक बुरा घाव होगा और उनके साथ किसी आग्नेयास्त्र से दुर्घटना होगी। वास्तव में वह घाव उन्हें कुछ समय से परेशान कर रहा था, लेकिन उन्होंने इसके बारे में किसी को नहीं बताया था। एक सप्ताह बाद, जब वे बत्तखों का शिकार करने गए हुए थे तो गुर्जिएफ़ के पैर में गोली लग गई। इसके बाद गुर्जिएफ़ स्वयं उस भविष्यवक्ता के पास गए। वह दो जलती हुई मोमबत्तियों के बीच बैठी और काफी देर तक उनके अंगूठे के नाखून को घूरती रही जिसमें उसे ‘चित्र’ दिखाई देते थे। उसने जो भविष्यवाणियाँ की थीं, वे भी पूरी हुईं। हालाँकि गुर्जिएफ़ हमें यह नहीं बताते कि वे भविष्यवाणियाँ क्या थीं।

1888 में गुर्जिएफ़ ने एक बच्चे के चीखने की आवाज़ सुनी। उन्होंने देखा कि बच्चों के एक समूह ने एक यज़ीदी लड़के के चारों ओर एक घेरा बना रखा था। (यज़ीदी एक धार्मिक संप्रदाय था, जिसे आम तौर पर शैतान-पूजक माना जाता था।) वह लड़का उस घेरे से बाहर निकलने में असमर्थ था। जैसे ही गुर्जिएफ़ ने घेरे का एक हिस्सा मिटा दिया, बच्चा उससे बाहर निकल सका। गुर्जिएफ़ इस घटना से बहुत प्रभावित हुए। वह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास जाकर पूछते रहे कि इस घटना का क्या अर्थ हो सकता है। एक आदमी ने उनसे कहा कि बच्चों ने उनके साथ मज़ाक किया था। दूसरे ने कहा कि यह केवल हिस्टीरिया का एक रूप था। बाद के वर्षों में गुर्जिएफ़ ने यही प्रयोग एक यज़ीदी स्त्री के साथ किया। जब उसके चारों ओर एक घेरा खींचा गया तो वह उसके बाहर नहीं जा सकी। उसे बाहर खींचने के लिए गुर्जिएफ़ और एक दूसरे ताकतवर आदमी को मिलकर ज़ोर लगाना पड़ा। गुर्जिएफ़ ने यह भी पुष्टि की कि जब किसी यज़ीदी को घेरे से बाहर खींचा जाता है तो वह कैटालेप्सी (एक ऐसी अवस्था जिसमें शरीर लगभग जड़ हो जाता है) में चला जाता है। यदि उसे फिर से घेरे के भीतर रख दिया जाए तो यह अवस्था समाप्त हो जाती है। अन्यथा, गुर्जिएफ़ के अनुसार, यह तेरह या इक्कीस घंटे बाद अपने-आप समाप्त हो जाती है।

एक सुबह गुर्जिएफ़ ने स्त्रियों के एक समूह को उत्तेजित होकर बातें करते देखा। उनसे उन्हें पता चला कि एक युवक, जिसे पिछले दिन दफनाया गया था, ततार लोगों की प्रथा के अनुसार मिट्टी की केवल हल्की परत के नीचे। रात में घर लौटने के लिए चल पड़ा था। किसी ने उसे देख लिया और शोर मचा दिया। पड़ोसियों ने उस शव का गला काट दिया और उसे वापस कब्रिस्तान ले गए। (दुनिया के इस हिस्से में पिशाचों की कहानियाँ प्रचलित हैं।) एक बार फिर गुर्जिएफ़ ने अपने परिचित हर व्यक्ति से पूछा कि इस घटना का क्या अर्थ हो सकता है।

अलेक्ज़ान्द्रोपोल से माउंट द्ज़ाद्ज़ुर पर स्थित एक संत की समाधि तक जाने वाले तीर्थयात्रियों के एक समूह के साथ गुर्जिएफ़ ने देखा कि एक लकवाग्रस्त व्यक्ति रेंगते हुए संत की समाधि तक पहुँचा और फिर वहाँ से पूरी तरह स्वस्थ होकर पैदल वापस चला गया। वह तब भी उतना ही चकित हुआ जब एक लंबे सूखे के दौरान अन्ताकिया का एक पादरी चमत्कार करने वाली एक धार्मिक प्रतिमा लेकर आया और बारिश के लिए प्रार्थना की। जब जुलूस वापस नगर की ओर लौट रहा था, तभी बादल घिर आए और मूसलाधार बारिश होने लगी।

गुर्जिएफ़ के घर के बगल में एक युवा विवाहित स्त्री ‘तेज़ी से फैलने वाले क्षय रोग’ से मर रही थी। एक सुबह, ठीक उस समय जब एक डॉक्टर गुर्जिएफ़ से कह रहा था कि वह स्त्री शीघ्र ही मर जाएगी, उसकी सास बगीचे में गुलाब के फलों को (rose hips)[2] तोड़ने की अनुमति माँगने आई। उसने बताया कि उसे स्वप्न में वर्जिन मेरी दिखाई दी थीं और उन्होंने उससे कहा था कि गुलाब के फलों को दूध में उबालकर उस मरती हुई स्त्री को पिलाए। डॉक्टर हँस पड़ा। लेकिन अगली सुबह गुर्जिएफ़ ने उस ‘मरती हुई’ स्त्री को चर्च से बाहर निकलते देखा। एक सप्ताह बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी। डॉक्टर ने समझाया कि यह सब महज़ संयोग था।

कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि बचपन और किशोरावस्था में गुर्जिएफ़ के सामने असामान्य घटनाएँ सामान्य से कहीं अधिक संख्या में आईं, मानो नियति उनकी अत्यंत सक्रिय बुद्धि को किसी निश्चित दिशा में ले जाना चाहती हो। उनका परिवार चाहता था कि वह पादरी बने। उसके पहले ‘शिक्षक’ फादर बॉर्श, जो कार्स मिलिट्री स्कूल के डीन थे (और व्यवहारतः पूरे क्षेत्र के ‘बिशप’ के समान प्रभाव रखते थे), इस बात पर ज़ोर देते थे कि पादरियों को चिकित्सा का कुछ ज्ञान भी होना चाहिए क्योंकि यदि बीमारी शरीर में हो और वे आत्मा को ठीक करने की कोशिश करते रहें तो वे अपना समय व्यर्थ कर सकते हैं। गुर्जिएफ़ का स्वाभाविक झुकाव हस्तकौशल की ओर भी था। उन्हें चीज़ों से छेड़छाड़ करना, उन्हें खोलना और फिर ठीक करना अच्छा लगता था। घर की टूटी-फूटी वस्तुओं की मरम्मत भी वह करते थे। वे अलेक्ज़ान्द्रोपोल जाकर तरह-तरह की मरम्मत का काम करके जेब-खर्च कमा लिया करते थे। (वह शर्म के कारण वहाँ जाते थे। वह नहीं चाहते थे कि कार्स में किसी को पता चले कि उनका परिवार कितना गरीब था।) इस प्रकार उनका समय धर्मशास्त्र, चिकित्सा और जूते ठीक करने या घड़ियों की मरम्मत जैसे हस्तकौशल के कामों के बीच बँटा रहता था।

ऐसा लगता है कि डीन बॉर्श ने गुर्जिएफ़ के जीवन-कार्य की नींव उन टिप्पणियों से रख दी थी जो वे मानव-स्वभाव के सामान्य ‘नियमों’ के बारे में करते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने बताया कि बहुत-से वयस्क इसलिए परिपक्व नहीं हो पाते क्योंकि अपने व्यक्तित्व को पूर्ण करने के लिए उन्हें विपरीत लिंग के ‘उपयुक्त प्रकार’ का व्यक्ति नहीं मिलता। यदि कोई व्यक्ति अपने लिए उस उपयुक्त प्रकार के व्यक्ति को नहीं खोज पाता तो संभव है कि अंततः उसे दूसरे दर्जे का कोई साथी मिल जाए, जो उसके व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से विकसित होने से रोक दे। डीन के अनुसार इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसके पास विपरीत लिंग का वह व्यक्ति हो जो उसके अनुरूप हो, तभी वह अपनी संभावनाओं को साकार कर सकता है। यह विचार सुनने में ऐसा लगता है मानो यह प्लेटो या गोएथे से लिया गया हो, लेकिन डीन ने इसका श्रेय ‘हमारे बहुत दूर के पूर्वजों’ को दिया। इससे फिर ऐसा प्रतीत होता था कि यह किसी प्राचीन ज्ञान का अंश है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चला आया था।

किशोरावस्था के शुरुआती वर्षों में गुर्जिएफ़ कभी तारीखों के बारे में स्पष्ट नहीं होते। उन्होंने तिफ़्लिस के रेलवे स्टेशन पर भट्ठी जलाने वाले कर्मचारी (stoker) की नौकरी कर ली। इसी दौरान उनकी पहली महत्वपूर्ण मित्रता अपने ही उम्र के एक व्यक्ति से हुई। उसका नाम सार्किस पोगोसियन था और वह धर्मशास्त्र का विद्यार्थी था। उसका पिता तुर्की का रंगरेज़ था। गुर्जिएफ़ के अनुसार, वह उन अलौकिक घटनाओं से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए एचमियादज़िन गया, जो उसे लगातार परेशान कर रहे थे। एचमियादज़िन आर्मेनियाई लोगों के लिए वही धार्मिक महत्त्व रखता था जो मुसलमानों के लिए मक्का का। वह अपने साथ एक पार्सल लेकर गया था, जिसे उसे एक युवा नवदीक्षित साधु तक पहुँचाना था। उस नवदीक्षित ने उसे अपने कमरे में रहने के लिए आमंत्रित किया।

उस समय गूर्जिएफ़ की अपनी विचार-दिशा मूलतः धार्मिक थी। वे तीर्थस्थलों पर जाते और धार्मिक स्थलों पर प्रार्थना करते थे। (यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि यदि परिस्थितियाँ कुछ अलग होतीं तो गुर्जिएफ़ यूनानी ऑर्थोडॉक्स चर्च का एक आर्किमैंड्राइट[3] बन सकते थे या रासपुतिन जैसे अत्यंत अपरंपरागत धार्मिक शिक्षक का रूप भी ले सकते थे।) बाद में पोगोसियन जो अब पादरी बनने के लगभग कगार पर था, तिफ़्लिस में गुर्जिएफ़ के पास रहने आया। पादरी बनने का विचार पोगोसियन को उदास करता था। जब गुर्जिएफ़ ने उसे स्टेशन पर नौकरी करने का सुझाव दिया तो वह तुरंत तैयार हो गया और ताला बनाने वाला बन गया। इस समय गुर्जिएफ़ ने कई महीने तिफ़्लिस और कार्स के बीच प्रस्तावित रेलवे मार्ग का सर्वेक्षण करने में बिताए। उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उन कस्बों और गाँवों के प्रभावशाली लोगों से संपर्क करना शुरू किया, जहाँ से रेलवे गुजरने वाली थी। उन्हें वहाँ रेलवे का एक ‘पड़ाव’ बनवाने की पेशकश की। उनमें से अधिकांश ने उन्हें रिश्वत दे दी।

तिफ़्लिस लौटकर उनके पास इतना पैसा था कि वे रेलवे की नौकरी छोड़कर अपना पूरा समय पढ़ने में लगा सकें। लंबी चर्चाओं के बाद वे और पोगोसियन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कोई ‘गुप्त ज्ञान’ अवश्य है, जो प्राचीन काल से चला आ रहा है। उन्होंने स्थानीय पुस्तक-विक्रेता से बहुत-सी पुरानी आर्मेनियाई पुस्तकें खरीद ली थीं। अब वे प्राचीन आर्मेनियाई राजधानी एनी के खंडहरों में चले गए, वहाँ एक झोंपड़ी बनाई और अपना पूरा दिन अध्ययन तथा विचार-विमर्श में बिताने लगे।

यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि ऐसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता गुर्जिएफ़ को उस क्षेत्र में रूसी-तुर्की युद्ध के बाद पैदा हुई अस्थिर परिस्थितियों के कारण मिली थी। यदि गुर्जिएफ और पोगोसियन सेंट पीटर्सबर्ग या कॉन्स्टेंटिनोपल में पैदा हुए होते तो उनके लिए उस ‘व्यवस्था’ में समा जाने और कोई सम्मानजनक पेशा अपना लेने से बचना कठिन होता। एशिया के उस इलाके में, जो कुछ हद तक अमेरिकी ‘वाइल्ड वेस्ट’ जैसा था, किसी को बहुत अधिक परवाह नहीं थी कि वे अपने परिवार की योजनाओं को नज़रअंदाज़ करके अपने अजीबोगरीब विचारों के पीछे क्यों जा रहे हैं।

इसलिए गुर्जिएफ़ और पोगोसियन अपना दिन बातें करने और उस प्राचीन नगर के खंडहरों में खोजबीन करने में बिता सकते थे। एक दिन भूमिगत रास्ते की खोज करते हुए उन्हें एक साधु की कोठरी मिली, जिसमें प्राचीन आर्मेनियाई भाषा में लिखी कुछ सड़ती हुई चर्मपत्र-पांडुलिपियाँ थीं। वे इन पांडुलिपियों को पढ़ने और समझने के लिए अलेक्ज़ान्द्रोपोल लौटे। पता चला कि वे किसी फादर आरेम को लिखे गए पत्र थे। उनमें से एक में कुछ ‘रहस्यों’ का उल्लेख था और उसके परिशिष्ट में ‘सरमूंग ब्रदरहुड’ का उल्लेख था, जो कभी सिरानूश नामक नगर में अस्तित्व में था। उन्होंने इस नाम को उस गूढ़ (esoteric) बंधुत्व के नाम के रूप में पहचान लिया, जिसके बारे में उनकी एक पुस्तक में कहा गया था कि वह ईसा से लगभग 2500 वर्ष पहले तक पुराना था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ये पांडुलिपियाँ सातवीं शताब्दी ईस्वी की थीं और उनमें जिस ‘निव्स्सी’ नामक नगर का उल्लेख था, वह वर्तमान मोसुल था। उनका यह भी मानना था कि सरमूंग ब्रदरहुड के वंशज वर्तमान ‘ऐसोर’ लोग थे। पांडुलिपि में लिखा था कि यह गुप्त विद्यालय निव्स्सी से तीन दिन की यात्रा की दूरी पर स्थित एक घाटी में चला गया था। वह स्थान बहुत दूर नहीं था। सीधे दक्षिण की ओर कुछ सौ मील। गुर्जिएफ़ और पोगोसियन ने तय किया कि यह देखना उचित होगा कि उस प्राचीन विद्यालय के कोई चिह्न अभी भी वहाँ मौजूद हैं या नहीं। अब उन्हें केवल इस अभियान के लिए धन की आवश्यकता थी। वह धन उन्हें आर्मेनियाई देशभक्तों की एक स्थानीय समिति से मिला, जिसने ‘मूश’ नामक स्थान पर एक अभियान भेजने का निर्णय लिया था। पोगोसियन ने उन्हें अपने और गुर्जिएफ़ को इस अभियान का प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए राज़ी कर लिया। इस प्रकार गुर्जिएफ़ ‘गुप्त ज्ञान’ की खोज में अपनी पहली यात्रा पर निकल पड़े।

दुर्भाग्य से, गुर्जिएफ़ ने यह बताना पसंद नहीं किया कि उन्होंने वहाँ वास्तव में क्या सीखा। वे अपनी पुस्तक ‘मीटिंग्स विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings with Remarkable Men) में बताते हैं कि वे और पोगोसियन दक्षिण की ओर गए और यात्रा के बड़े हिस्से में उन्होंने अपने आपको कॉकस के ततार लोगों के रूप में छिपाए रखा। उन्हें ऐसी अफ़वाहें सुनने को मिली थीं कि शिलालेखों की नकल करने की कोशिश करने वाले अंग्रेज़ों को ऐसोर लोगों ने ज़िंदा चमड़ी उतारकर मार डाला था। एक स्थान पर पोगोसियन को एक जहरीली मकड़ी ने काट लिया। गुर्जिएफ़ ने चाकू से ज़हर को काटकर निकालने की कोशिश की, लेकिन घाव में संक्रमण हो गया। एक आर्मेनियाई पादरी, जिसे उन्हें एक पत्र पहुँचाना था, ने उन्हें एक महीने तक अपने घर में रखा। उस पादरी ने गुर्जिएफ़ को अपने पास मौजूद एक पुराने नक्शे की कहानी सुनाई। एक रूसी राजकुमार ने वह नक्शा 500 पाउंड में खरीदने की पेशकश की थी और अंततः उसकी नकल करने की अनुमति के लिए 200 पाउंड दिए थे। गुर्जिएफ़ ने नक्शा देखने का अनुरोध किया और उसे देखकर अत्यंत उत्साहित हो गए। वह प्राचीन मिस्र का नक्शा था। जब पादरी घर से बाहर था, तब गुर्जिएफ़ और पोगोसियन ने किसी तरह वह नक्शा हासिल कर लिया और उसकी नकल कर ली। गुर्जिएफ़ स्वीकार करते हैं कि यह अनैतिक था, लेकिन उन्हें लगता था कि ऐसा करना आवश्यक था। बाद में स्मिर्ना में गुर्जिएफ़ और पोगोसियन नाविकों के दो गुटों के बीच हुई मारपीट में फँस गए और दोनों को मामूली चोटें आईं। अगले दिन बंदरगाह पर उन नाविकों ने उन्हें पहचान लिया। वे उन नाविकों के प्रति आभार व्यक्त करने आए थे। पता चला कि वे अंग्रेज़ थे। जब उन्हें पता चला कि गुर्जिएफ़ और पोगोसियन अलेक्ज़ान्द्रिया जाना चाहते हैं तो उनमें से दो नाविक इसकी व्यवस्था करने के लिए चले गए। परिणाम यह हुआ कि गुर्जिएफ़ और पोगोसियन एक अंग्रेज़ी युद्धपोत पर मिस्र के लिए रवाना हो गए। गुर्जिएफ़ जहाज़ के पीतल के हिस्सों को चमकाने का काम करते थे और पोगोसियन इंजन-कक्ष में काम करते थे। पोगोसियन ने जहाज़ के साथ लिवरपूल जाने का निर्णय लिया, जहाँ वह इंजीनियर बन गए। गुर्जिएफ़ मिस्र गए और फिर यरूशलम पहुँचे, जहाँ वह रूसी पर्यटकों के लिए पेशेवर गाइड बन गए। लेकिन हमें यह नहीं बताया जाता कि क्या गुर्जिएफ़ और पोगोसियन को वास्तव में अपना सरमूंग ब्रदरहुड मिला या गुर्जिएफ़ ने ‘रेत से ढके होने से पहले के मिस्र’ के अपने नक्शे के माध्यम से कोई महत्त्वपूर्ण खोज की। हाँ, वह एक विचित्र संयोग की बात अवश्य बताते हैं। यह मिस्र की उनकी दूसरी यात्रा थी। एक पिरामिड के नीचे बैठकर वे अपने नक्शे की प्रति देख रहे थे। उन्होंने ऊपर देखा तो पाया कि एक सफेद बालों वाला व्यक्ति उनके सामने खड़ा है। उस व्यक्ति ने बड़े उत्साह से पूछा कि गुर्जिएफ़ को यह नक्शा कहाँ से मिला। वह वही राजकुमार निकला जिसने आर्मेनियाई पादरी को उसकी नकल करने के लिए 200 पाउंड दिए थे। उसका नाम प्रिंस यूरी लुबोवेद्स्की था। गुर्जिएफ़ और वह घनिष्ठ मित्र बन गए।

बेनेट का विश्वास था कि अंततः गुर्जिएफ़ को अपना सरमूंग ब्रदरहुड या उनके आधुनिक वंशज मिल गए थे। बेनेट ने स्वयं ‘निव्स्सी से तीन दिन की घुड़सवारी की दूरी पर स्थित घाटी’ का पता लगाया और निष्कर्ष निकाला कि वह स्थान शेख़ अदी था, जो यज़ीदियों का प्रमुख पवित्र स्थल है। गुर्जिएफ़ यह भी बताते हैं कि इस ब्रदरहुड का एक केंद्र उत्तरी हिमालय में स्थित ‘ओल्मान’ मठ में था, जहाँ उनके अनुसार उन्होंने तीन महीने बिताए थे। ऐसा संभव है कि वहीं गुर्जिएफ़ ने अंततः उन रहस्यों की खोज की, जिन्हें एक दिन वह अपने शिष्यों तक पहुँचाने वाले थे।

अब तक पाठक के मन में शायद यह विचार आने लगा होगा कि गुर्जिएफ़ बहुत बड़ा मज़ाक करने वाला व्यक्ति रहे होंगे और उन्होंने अपनी ‘सत्य की खोज’ की यह अद्भुत कहानी स्वयं गढ़ ली होगी। इसलिए मैं एक ऐसी घटना का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो उसके गूढ़ ज्ञान के अधिकार को प्रमाणित करती है। ‘मीटिंग्स विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings with Remarkable Men) पुस्तक में वे एक प्रतिभाशाली रूसी युवती विटवित्स्काया से अपनी मुलाकात की कहानी सुनाते हैं। उसने गुर्जिएफ़ को बताया कि वह संगीत के प्रभाव से हमेशा आकर्षित रही है। उसका विश्वास था कि संगीत अपने प्रभाव उत्पन्न करता है। किसी प्रकार के कंपन के माध्यम से, जो हमारे शरीर के जैविक कंपनों पर असर डालते हैं। अफ़ग़ानिस्तान के एक मठ में उसने सीखा था कि पियानो पर कुछ निश्चित स्वरों को बजाकर श्रोताओं पर विशेष प्रकार के प्रभाव कैसे उत्पन्न किए जा सकते हैं। गुर्जिएफ़ स्वयं उसकी कुछ धारणाओं की पुष्टि इस प्रकार कर सके कि उसने बताया कि उसने एसेनी लोगों के बीच एक पौधे को केवल आधे घंटे में उसके बीज से उगते देखा था और यह प्राचीन हिब्रू संगीत के माध्यम से किया गया था।

फ्रिट्ज़ पीटर (Fritz Peters) अपनी पुस्तक ‘चाइल्डहुड विद गुर्जिएफ’ (Childhood With Gurdjieff) में बताते हैं कि एक रूसी परिवार प्रीएरे आया था। गुर्जिएफ़ ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे देख सकते हैं कि उस परिवार की बेटी कुछ निश्चित संगीत-स्वरों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है और यदि एक खास कॉर्ड बजाया जाए तो वह बेहोशी जैसी तंद्रा (trance) में चली जाएगी। उस अनजान लड़की को कमरे में बुलाया गया। गुर्जिएफ़ ने अपने पियानोवादक हार्टमैन से पियानो बजाने को कहा। जैसे ही उसने वह निश्चित कॉर्ड बजाया, लड़की बेहोश होकर गिर पड़ी और उसे होश में लाने में काफी समय लगा। गुर्जिएफ़ ने उसे कई बार इस प्रयोग को दोहराने के लिए राज़ी कर लिया। हर बार पीटर्स ने देखा कि जागने के बाद लड़की के चेहरे पर उलझन और हिस्टीरिया के लक्षण दिखाई देते थे। पीटर्स को पूरा विश्वास हो गया कि इस पूरे मामले में किसी प्रकार की मिलीभगत की कोई संभावना नहीं थी।

तो, इस प्रकार का ज्ञान वह ज्ञान था जिसकी खोज गुर्जिएफ़ कर रहे थे। ऐसा ज्ञान जो मनुष्यों पर शक्ति प्रदान कर सके। लेकिन वह केवल शक्ति के लिए शक्ति में रुचि नहीं रखते थे। वे जानना चाहते थे कि एक यज़ीदी लड़का ‘जादुई घेरे’ के भीतर क्यों बंद हो जाता है और एक निश्चित कॉर्ड किसी लड़की को ट्रांस में क्यों पहुँचा सकता है। विट्वित्स्काया ने उसे इस प्रश्न का एक हिस्सा समझाया, जब उसने गुर्जिएफ़ को ‘मोनोसाइकी ब्रेथ्रेन’ से सीखे हुए रहस्यों के बारे में बताया। उसने कहा कि जब उपस्थित लोग बिल्कुल उन परिस्थितियों के अनुरूप होते थे जिनकी आवश्यकता थी, तो वह अपनी इच्छा से उन सभी में हँसी, आँसू, द्वेष, दयालुता आदि उत्पन्न कर सकती थी। अर्थात मनुष्यों की भावनाओं को इस तरह सक्रिय किया जा सकता था मानो वे मशीनें हों। गुर्जिएफ़ के गूढ़ धर्मों के अध्ययन से प्राप्त शायद सबसे महत्त्वपूर्ण धारणा यही थी कि मनुष्य लगभग पूरी तरह यांत्रिक है। वह मानते हैं कि वह ‘जीवित’ है क्योंकि वह हँसता है, रोता है, क्रोधित होता है और दुख महसूस करता है। लेकिन गुर्जिएफ़ के अनुसार वास्तव में ये प्रतिक्रियाएँ कुछ निश्चित उद्दीपनों के प्रति कंप्यूटर जैसी प्रतिक्रियाओं से अधिक कुछ नहीं हैं। सिर्फ़ प्रतिवर्त क्रियाएँ (reflexes)। गुर्जिएफ़ के बारे में बेनेट की एक पुस्तक के शीर्षक ‘इज़ देयर लाइफ ऑन अर्थ?’ (Is There Life on Earth?) का अर्थ भी यही है। उत्तर है: बहुत कम। जिसे हम जीवन कहते हैं, उसका अधिकांश हिस्सा यांत्रिक प्रतिक्रिया है।

लेकिन क्या हम अपने इन यांत्रिक तंत्रों से कुछ हद तक स्वतंत्र हो सकते हैं? जब लोगों ने गुर्जिएफ़ से यह प्रश्न पूछा तो उन्होंने उनसे कहा कि उन्होंने अभी-अभी स्वतंत्र इच्छा विकसित करने की दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।

संगीत के बारे में विट्वित्स्काया की खोज स्पष्ट रूप से दिखाती है कि यह ‘मशीन’ कंपनों द्वारा नियंत्रित होती है। इस मामले में संगीत के कंपन द्वारा। और इस अंतर्दृष्टि की पुष्टि तब हुई जब गुर्जिएफ़ ने तुर्केस्तान के एक ‘सरमूंग’ मठ में कुछ समय बिताया। उन्हें और उनके मित्र सोलोविएफ़ को आँखों पर पट्टी बाँधकर वहाँ ले जाया गया और उनसे शपथ ली गई कि वे उस मठ का स्थान कभी प्रकट नहीं करेंगे, चाहे वे अनुमान लगाकर उसका पता ही क्यों न लगा लें। वहाँ गुर्जिएफ़ ने एक बार फिर प्रिंस लुबोवेद्स्की को देखा और यह उनकी अंतिम मुलाकात थी। लुबोवेद्स्की उन्हें मठ के ‘महिलाओं के प्रांगण’ में ले गया, जहाँ उन्हें पवित्र नृत्य देखने को मिले। वहाँ उन्होंने कुछ विचित्र ‘उपकरण’ देखे, जिनका उद्देश्य पुजारिनों को पवित्र नृत्यों की मूल शारीरिक मुद्राएँ सिखाना था। गुर्जिएफ़ के अनुसार, प्रत्येक उपकरण एक त्रिपाद पर खड़े एक स्तंभ से बना था। इस स्तंभ से अलग-अलग स्थानों पर सात ‘शाखाएँ’ या भुजाएँ निकली हुई थीं। प्रत्येक भुजा स्वयं सात हिस्सों में विभाजित थी और ये अलग-अलग हिस्से बॉल-एंड-सॉकेट जोड़ से जुड़े हुए थे... ठीक मनुष्य के कंधे के जोड़ की तरह। वहाँ एक अलमारी भी थी जिसमें कई प्लेटें रखी थीं और प्रत्येक प्लेट पर एक रहस्यमय शिलालेख था। इन शिलालेखों में ‘भुजाओं’ की स्थिति बदलने के निर्देश दिए गए थे। ये विभिन्न स्थितियाँ पवित्र नृत्यों की अलग-अलग मुद्राओं और गतियों की मूल वर्णमाला थीं। गुर्जिएफ़ कहते हैं कि जब उन्होंने इन नृत्यों को देखा तो वे इस बात से स्तब्ध थे कि उनके नृत्य में कौन-सा अर्थ या भाव निहित था इसलिए नहीं क्योंकि उस समय वे उसे समझते ही नहीं थे बल्कि इसलिए कि वे उन्हें जिस बाहरी सटीकता और पूर्णता के साथ करते थे, वह अद्भुत थी। निश्चित रूप से यही नृत्य उन गतियों का आधार बने जिन्हें बाद में गुर्जिएफ़ ने अपने शिष्यों को सिखाया। मैंने स्वयं ग्लॉस्टरशायर के शेरबोर्न हाउस में बेनेट के शिष्यों को ये नृत्य करते देखा है, इसलिए मैं पुष्टि कर सकता हूँ कि उनकी सटीकता और पूर्णता ध्यान को पूरी तरह बाँध लेती है और एक विचित्र सौंदर्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है।

लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात भुजाओं और उनके खंडों की संख्या है। सात गुणा सात। जैसा कि हम आगे देखेंगे, गुर्जिएफ़ की शिक्षा का तकनीकी पक्ष ‘ऑक्टेव’ की धारणा पर निर्भर करता है अर्थात स्वरक्रम के सात सुर, जिसके बाद फिर पहले सुर पर वापसी होती है। उनका दावा है कि ब्रह्मांड सृष्टि के सात स्तरों से बना है, जो कंपन के सात स्तर भी हैं। कंपन की यह धारणा गुर्जिएफ़ की विचारधारा के केंद्र में है। मनुष्य ‘सात के नियम’ के अधीन है। मनुष्य के सात ‘मन’ या केंद्र भी हैं, जिनमें बौद्धिक मन सबसे निचला या कम-से-कम सबसे भद्दा और कम कुशल है। इसके अलावा एक गतिशील केंद्र है, जो शरीर को नियंत्रित करता है। एक भावनात्मक केंद्र, एक यौन केंद्र, एक सहज-बोध केंद्र तथा एक उच्चतर भावनात्मक और एक उच्चतर चिंतन केंद्र भी है। वह एक दूसरे नियम, ‘तीन के नियम’, के भी अधीन है। यह नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया तीन शक्तियों का परिणाम होती है न कि दो शक्तियों का, जैसा कि विज्ञान मानता है। पहली दो शक्तियाँ धनात्मक और ऋणात्मक केवल एक-दूसरे को संतुलित करती हैं। उन्हें तीसरी शक्ति की एक प्रकार की प्रेरणा की आवश्यकता होती है। ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि स्तंभ के आधार पर बना त्रिपाद इसी ‘तीन के नियम’ का प्रतीक था।

संक्षेप में, ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ ने अपने अधिकांश महत्त्वपूर्ण मूल सिद्धांत उन्हीं सरमूंग मठों से प्राप्त किए, जहाँ उन्हें एक शिष्य के रूप में स्वीकार किया गया था। हम कह सकते हैं कि उनकी खोज एनी के खंडहरों में स्थित उस भूमिगत साधु-कक्ष से शुरू हुई और हिमालय के सरमूंग मठ में समाप्त हुई। सत्य की उनकी खोज का विवरण खंडित है और कभी-कभी उलझा हुआ भी। वह बताता है कि वे उन लोगों के एक समूह के सदस्य थे, जो स्वयं को ‘सत्य के खोजी’ कहते थे और जिनके नेता प्रिंस लुबोवेद्स्की थे। लेकिन ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) में इन दूसरे ‘खोजियों’ की भूमिका बहुत ही मामूली दिखाई देती है। लेकिन शायद उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कथन उनकी पहली पुस्तक ‘हेराल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में मिलता है। उसमें वे कहते हैं कि मध्य एशिया के एक सूफ़ी मठ में कुछ समय बिताने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनके प्रश्नों के उत्तर ‘मनुष्य की अचेतन मानसिकता के क्षेत्र में’ पाए जा सकते हैं अर्थात उसके अचेतन मन में।

दूसरे शब्दों में, वास्तविक उत्तर पहले से ही हमारे भीतर मौजूद हैं। उन्हें केवल बहुत सूक्ष्म आत्म-अवलोकन के द्वारा और हम जो देखते हैं उसके बारे में तर्क करने तथा उसका विश्लेषण करने के माध्यम से खोजा जा सकता है। इसलिए व्यावहारिक दृष्टि से हम गुर्जिएफ़ की ‘खोज’ के बाकी हिस्से को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, जो उसे एशिया के विभिन्न स्थानों तक ले गया। ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) उनके शुरुआती दिनों की एक स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है, लेकिन इसे सावधानी के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इस पुस्तक का एक पूरा खंड बताता है कि ‘सत्य के खोजी’ गोबी मरुस्थल में एक खोए हुए नगर की खोज में निकले थे और अपने साथ बीस फुट ऊँचे खंभे जैसे पायों (stilts) को ले गए थे ताकि वे रेत के तूफ़ानों के ऊपर से चल सकें। यह कहानी शुद्ध कल्पना जैसी लगती है। बेनेट का मानना है कि यह संभवतः उन लोगों का रूपक है जो सत्य को ‘वहाँ बाहर’ खोजते हैं न कि ‘यहाँ भीतर’। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस पुस्तक में कितना हिस्सा गढ़ा हुआ है। उसका सबसे बड़ा महत्त्व इस बात में है कि गुर्जिएफ़ की चार पुस्तकों में यही सबसे आसानी से समझ में आने वाली और पठनीय पुस्तक है और यह हमें एक वास्तविक मनुष्य के रूप में गुर्जिएफ़ की बहुत अच्छी तस्वीर देती है। वे पैसे कमाने के अपने विभिन्न संदिग्ध तरीकों का वर्णन करने से भी कभी नहीं हिचकते जैसे, गौरैयाओं को पकड़ना, उन्हें अलग-अलग रंगों में रंगना और ‘अमेरिकी कैनरी’ के नाम पर बेचना। उनके विभिन्न साथियों की कहानियाँ यहाँ तक कि उनके कुत्ते की कहानी भी, उन्हें एक उदार और स्नेही व्यक्ति के रूप में दिखाती हैं। जो लोग उन्हें अच्छी तरह जानते थे, उनके अनुभव भी इस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। लेकिन यह संभावना बहुत कम है कि हम कभी ठीक-ठीक जान पाएँगे कि 1891 में उनके साहसिक जीवन की शुरुआत करने से लेकर लगभग 1910 तक उन्होंने क्या किया। 1891 में उन्होंने अपनी यात्राएँ शुरू की थीं और उनकी उम्र चौदह या उन्नीस वर्ष रही होगी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जन्म की कौन-सी तारीख सही मानी जाए। लगभग 1910 में वे पहली बार मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में आत्म-ज्ञान के शिक्षक के रूप में दिखाई देते हैं। यह लगभग निश्चित लगता है कि इस बीच एक ऐसा दौर आया था जब गुर्जिएफ़ पेशेवर सम्मोहनकर्ता और चमत्कार दिखाने वाले बन गए थे जिसे उनके आलोचक निस्संदेह ‘छद्मविद्’ या ठग कहेंगे। ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) के ‘एकिम बे’ वाले अध्याय में वे बताते हैं कि उन्होंने और एकिम बे ने ताशकंद में पैसों की अपनी तत्काल आवश्यकता पूरी करने के लिए एक सभागार किराए पर लिया और सम्मोहन तथा अन्य घटनाओं का एक ‘जादुई’ प्रदर्शन किया। बेनेट की पुस्तक ‘गुर्जिएफ: मेकिंग ए न्यू वर्ल्ड’ (Gurdjieff: Making a New World) में एक असाधारण तस्वीर है, जिसमें बालों वाले युवा गुर्जिएफ़ ‘पेशेवर सम्मोहनकर्ता’ के रूप में दिखाई देते हैं। वे किसी मंच की पृष्ठभूमि के सामने खड़े हैं और देखने में विक्टोरियाई युग के किसी पैंटोमाइम नाटक के खलनायक जैसे लगते हैं। बेनेट का अनुमान है कि गुर्जिएफ़ का यह ‘पेशेवर’ दौर लगभग 1907 से 1910 तक चला।

लेकिन इन शुरुआती वर्षों की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना लगभग 1904 में घटी। यह घटना गोबी मरुस्थल के किनारे स्थित एक नगर के पास हुई थी और उसका वर्णन उनकी अंतिम पुस्तक ‘लाइफ इज़ रियल ओनली देन, वेन ‘आय एम’ (Life Is Real Only Then, When ‘I Am’) में मिलता है। कुछ समय से गुर्जिएफ़ का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था। वास्तव में इसकी शुरुआत 1896 में हुई थी, जब क्रेट द्वीप पर उन्हें एक भटकी हुई गोली लग गई थी। इसके बाद उन्होंने रूस तक पैदल लौटने का निर्णय लिया। 1902 में एक दूसरी ‘भटकी हुई गोली’ ने उन्हें मृत्यु के बहुत निकट पहुँचा दिया। गोबी मरुस्थल के किनारे, यांगिहिसार के पास किसी स्थान पर वे तीन महीने तक बेहोश रहे। दो वर्ष बाद उन्होंने ज़ार के सैनिकों और क्रांतिकारियों के एक समूह के बीच आ जाने की भूल की। तीसरी भटकी हुई गोली ने फिर उनकी जान लगभग ले ही ली। विचित्र संयोग से वे फिर उसी स्थान पर स्वास्थ्य लाभ करते हुए पाए गए, जो गोबी मरुस्थल के किनारे था।

एक शाम, जब उनका शारीरिक स्वास्थ्य ठीक हो चुका था, गुर्जिएफ़ चाँदनी में लेटा हुए पिछले कुछ वर्षों के बारे में सोच रहे थे। उनके विचार उन्हें गहरी उदासी में ले गए। वास्तव में उनकी अपनी कमियाँ उन्हें इतनी भयानक लगीं कि उन्हें अपने पूर्णतः निरर्थक होने का अनुभव होने लगा। उनके विचारों की नकारात्मक धारा इतनी शक्तिशाली थी कि वे उनसे मुक्त नहीं हो पा रहे थे। उन्हें लगा कि वे बेहोश होने वाले हैं। तभी ऊँटों की हलचल ने उनका ध्यान भंग किया और उन्हें ‘आत्मा की इस अँधेरी रात’ से बाहर निकलने में सहायता मिली। एक झरने के पास लेटे हुए उन्होंने आत्म-परीक्षण की प्रक्रिया शुरू की। उन्हें लगा कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जो विभिन्न ‘शक्तियाँ’ अर्जित की थीं, उनका इस्तेमाल उनकी सबसे बुरी प्रवृत्तियों की संतुष्टि के लिए हुआ था। आत्म-प्रेम, अहंकार, गर्व और यौन वासना के लिए। गुर्जिएफ़ के अनुसार उनकी शक्तियाँ ‘इतने ऊँचे स्तर तक पहुँच चुकी थीं कि केवल कुछ घंटों की आत्म-तैयारी के बाद मैं दस मील की दूरी से एक याक को मार सकता था या चौबीस घंटों में जीवन-शक्तियों को इतनी सघनता से संचित कर सकता था कि पाँच मिनट में एक हाथी को सुला सकता था।’ फिर भी इन अर्ध-जादुई शक्तियों के बावजूद वे स्वयं को मशीन से कुछ अधिक नहीं समझते थे। वे कुछ सेकंड से अधिक समय तक ‘स्व-स्मरण’ (self-remembering) अर्थात तीव्र आत्म-जागरूकता की अवस्था बनाए रखने में अभी भी असमर्थ थे।

वे अपनी आत्म-जागरूकता को बढ़ाने और अपने आंतरिक अस्तित्व को तात्कालिकता की भावना से झकझोरने के लिए क्या कर सकते थे? पुराने संत कीलों के बिस्तर पर सोते थे और खुरदरे बालों से बने वस्त्र पहनते थे। गुर्जिएफ़ भी ऐसी ‘यांत्रिक’ साधनाएँ आज़मा चुके थे, लेकिन उन्होंने पाया कि वे पर्याप्त नहीं थीं। उन्होंने तय किया कि एकमात्र रास्ता कोई बहुत बड़ा त्याग करना है। उदाहरण के लिए, कोई पक्का धूम्रपान करने वाला व्यक्ति तंबाकू छोड़ सकता है ताकि उससे वंचित रहने की पीड़ा लगातार एक तरह की ‘अलार्म घड़ी’ का काम करती रहे। लेकिन वे किस चीज़ का त्याग करें? सोचते-सोचते मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि मैं जानबूझकर अपने पास मौजूद असाधारण शक्ति का उपयोग करना बंद कर दूँ... तो मेरे भीतर ऐसी कोई स्मरण कराने वाली शक्ति अवश्य उत्पन्न होगी।’ संक्षेप में, वे अपनी सम्मोहन और टेलीपैथी की शक्तियों का त्याग करने वाले थे।

जैसे ही मैंने इस विचार का अर्थ समझा, ऐसा लगा मानो मेरा पुनर्जन्म हो गया हो। मैं उठ खड़ा हुआ और झरने के चारों ओर एक छोटे बछड़े की तरह दौड़ने लगा।’

इसके बाद गुर्जिएफ़ ने शपथ ली कि वे फिर कभी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल केवल आत्म-संतुष्टि के लिए नहीं करेंगे बल्कि केवल ‘वैज्ञानिक’ उद्देश्यों के लिए करेंगे।

यही वह क्षण था जब वह केवल एक ‘जादूगर’, अपने समकालीन एलीस्टर क्रॉली की तरह रहना बंद कर एक शिक्षक बन गए । यह उनके जीवन के एक नए युग की शुरुआत थी।

लेखक: कॉलिन विल्सन 

[1]गिलगमेश का महाकाव्य’ प्राचीन मेसोपोटामिया का एक महान महाकाव्य है और विश्व के सबसे प्राचीन ज्ञात साहित्यिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसकी कथा उरुक के शक्तिशाली राजा गिलगमेश और उसके प्रिय मित्र एन्किडु के इर्द-गिर्द घूमती है। मित्र की मृत्यु के बाद गिलगमेश मृत्यु और अमरत्व के रहस्य को जानने की यात्रा पर निकलता है। इस यात्रा के माध्यम से महाकाव्य मित्रता, प्रेम, मृत्यु, मनुष्य की सीमाओं और जीवन के अर्थ जैसे सार्वभौमिक प्रश्नों पर विचार करता है। 

[2] गुलाब के फूल के बाद बनने वाला फल

[3] ग्रीक ऑर्थोडॉक्स और कुछ अन्य पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्चों में पादरियों की एक वरिष्ठ धार्मिक उपाधि है। सामान्यतः यह किसी वरिष्ठ मठवासी या मठ के प्रमुख/वरिष्ठ पादरी को दी जाती है।

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय तीन: मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग)

1909 में गुर्जिएफ़ ने निर्णय लिया कि अब शिक्षक के रूप में अपने नए जीवन की शुरुआत करने का समय आ गया है। अपनी पहली पुस्तक ‘ हेरल्ड ऑफ कमिंग ...