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Friday, 19 June 2026

एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- पत्र - 8 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

"तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फिर तुम्हारे दर्शनशास्त्र की वह शिक्षा कहाँ गई जो हमें कर्म करते हुए मरने का उपदेश देती है?"

    क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें निष्क्रिय रहने की सलाह दे रहा हूँ? मैंने स्वयं को लोगों की भीड़ से अलग किया है और अपने द्वार बंद कर लिए हैं, लेकिन इसका कारण यह है कि मैं अधिक से अधिक लोगों का हित कर सकूँ। मेरा एक भी दिन आलस्य में नहीं बीतता। मैं रात का भी एक हिस्सा अध्ययन के लिए सुरक्षित रखता हूँ। नींद के लिए मेरे पास समय नहीं होता जब तक वह मुझे परास्त न कर दे, मैं काम करता रहता हूँ। मेरी आँखें देर रात तक जागने से थक जाती हैं और झुकने लगती हैं... फिर भी मैं उन्हें कार्य में लगाए रखता हूँ।

    मैंने केवल समाज से ही नहीं बल्कि व्यवसायों से भी और विशेष रूप से अपने निजी कामों से भी स्वयं को अलग कर लिया है। जो कार्य मैं कर रहा हूँ, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए है। वे ही मेरे लेखन से लाभान्वित हो सकेंगी। मैं अपने अनुभव से प्राप्त स्वास्थ्यवर्धक उपदेशों को लिख रहा हूँ, जैसे कोई उपयोगी मरहम के नुस्खे लिखता है। मैंने इन्हें अपने घावों पर आज़माया है। वे अभी पूरी तरह भले न भरे हों, पर उनका फैलना रुक गया है। जीवन का जो सही मार्ग मुझे बहुत भटकने और थक जाने के बाद मिला, वही अब मैं दूसरों को दिखा रहा हूँ।

    मेरा संदेश यह है, "उन वस्तुओं से दूर रहो जो बहुसंख्यक लोगों को प्रिय लगती हैं और उन उपहारों से भी जो भाग्य प्रदान करता है। उनसे सावधान रहो, उनसे डरो और संयोग से प्राप्त होने वाली हर अच्छी वस्तु का प्रतिरोध करो। जैसे मछली आशा के प्रलोभन से फँसती है और शिकार चारे से पकड़ा जाता है, वैसे ही मनुष्य भी फँस जाता है। क्या तुम इन्हें भाग्य का वरदान समझते हो? नहीं, ये जाल हैं। जो व्यक्ति सुरक्षित जीवन जीना चाहता है, उसे इन लुभावने उपकारों से यथासंभव दूर रहना चाहिए। हम अभागे लोग यह समझते हैं कि हमने इन्हें पकड़ रखा है जबकि वास्तव में इन्होंने हमें पकड़ रखा होता है।"

                                         

    तुम्हारा यह जीवन-पथ एक खाई की ओर जाता है। ऐसी ऊँची स्थिति से नीचे उतरने का अर्थ है गिरना। और जब समृद्धि हमें धक्का देने लगती है, तब हम उसका विरोध भी नहीं कर सकते। हम चाहें कि केवल एक बार गिरें या कम-से-कम सीधे खड़े हुए गिरें, पर हमें इसकी भी अनुमति नहीं मिलती। भाग्य केवल हमें गिराता ही नहीं बल्कि उलट देता है और फिर कुचल भी देता है।

    इसलिए जीवन के इस स्वस्थ और कल्याणकारी नियम को अपनाओ। "शरीर को उतना ही सुख दो जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो। उसके साथ कठोरता बरतो ताकि वह मन का आज्ञापालन करना सीखे। भोजन केवल भूख मिटाने के लिए हो, पेय केवल प्यास बुझाने के लिए। वस्त्र ठंड से रक्षा के लिए हों और घर केवल मौसम की कठोरताओं से बचने के लिए। यह कोई महत्व नहीं रखता कि वह घर मिट्टी का बना है या विदेशी संगमरमर से सुसज्जित। विश्वास करो, मनुष्य फूस की छत के नीचे भी उतना ही सुरक्षित रह सकता है जितना सोने के महल में। उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करो जिन्हें अनावश्यक परिश्रम केवल दिखावे और सजावट के लिए खड़ा करता है। याद रखो कि केवल मन ही वास्तव में अद्भुत है और महान मन के लिए उसके अतिरिक्त कुछ भी महान नहीं है।"



    यदि मैं ये बातें स्वयं से और आने वाली पीढ़ियों से कह रहा हूँ तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं तब से अधिक उपयोगी कार्य कर रहा हूँ जब मैं वकील के रूप में किसी की ज़मानत कराता था, किसी वसीयत पर मुहर लगाता था या किसी सीनेटर पद के उम्मीदवार की सहायता में अपना प्रभाव और वाणी लगाता था? विश्वास करो, जो लोग देखने में कुछ नहीं करते प्रतीत होते हैं, वे अक्सर सबसे बड़े कार्य कर रहे होते हैं क्योंकि वे मानव और दैवीय दोनों विषयों पर विचार कर रहे होते हैं।

    अब मुझे इस पत्र को समाप्त करना चाहिए और जैसा कि मेरी आदत बन गई है, मुझे इस पत्र का मूल्य भी चुकाना होगा। लेकिन यह भुगतान मेरी अपनी पूँजी से नहीं होगा। मैं अभी भी एपिक्यूरस के खजाने से उधार ले रहा हूँ। आज मुझे उसके लेखन में यह वचन मिला:

"दर्शन का दास बनो ताकि तुम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सको।"

    जो लोग स्वयं को दर्शन की आज्ञाकारिता में समर्पित कर देते हैं, उनकी स्वतंत्रता किसी भविष्य की तिथि तक नहीं टाली जाती। उन्हें उसी क्षण स्वतंत्रता मिल जाती है। क्योंकि दर्शन की यह दासता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

    शायद तुम पूछो कि मैं एपिक्यूरस के इतने सुंदर वचनों का उल्लेख क्यों करता हूँ, अपने स्टोइक विद्यालय के नहीं। लेकिन क्या कोई कारण है कि इन्हें केवल एपिक्यूरस की संपत्ति माना जाए, न कि समस्त मानवता की?कितने ही कवि ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें दार्शनिकों ने कहा है या कहना चाहिए था। मुझे न तो त्रासदीकारों का उल्लेख करने की आवश्यकता है और न ही उन नाटककारों का जो हास्य और त्रासदी के बीच की शैली में लिखते हैं। यहाँ तक कि साधारण मूक-अभिनय (माइम) में भी अनेक अत्यंत गहन पंक्तियाँ मिलती हैं।

मैं तुम्हें पब्लिलियस की एक पंक्ति सुनाता हूँ, जो अभी जिस विषय पर मैं चर्चा कर रहा था, उसी से संबंधित है:

"जो वस्तु केवल इच्छा करने से मिल जाए, वह वास्तव में तुम्हारी संपत्ति नहीं है।"

मुझे याद है कि तुमने स्वयं यही विचार और भी बेहतर तथा संक्षिप्त रूप में व्यक्त किया था, "जिसे भाग्य तुम्हारा बनाता है, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं होता।" और मैं तुम्हारी एक और इससे भी श्रेष्ठ उक्ति का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता, "जो भलाई दी जा सकती है, वह वापस भी ली जा सकती है।"

इन बातों का मूल्य मैं तुम्हारे खाते में नहीं लिख रहा.ये तो तुम्हारी अपनी ही संपत्ति हैं।

अभी के लिए विदा।

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग पाँच: शायद कोई मंशा)

  भाग पाँच: शायद कोई मंशा By Simon Poe पुराने पुल की जगह पत्थर का एक नया पुल बना दिया गया है , लेकिन वह घटना भुलाई नहीं गई है। वह कहावतों ...