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Friday, 10 July 2026

मन की सूक्ष्मता के संदर्भ में -- पत्र - 57 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


जब मुझे बाइए छोड़कर नेपल्स लौटना पड़ा तो मैंने फिर से नाव से जाने का साहस नहीं किया। लोगों ने कहा कि समुद्र में तूफ़ान है और मुझे इस बात पर सहज ही विश्वास हो गया। लेकिन पूरे मार्ग में इतना कीचड़ था कि कोई यह समझ सकता था कि मैं नाव से ही वहाँ पहुँचा हूँ। उस दिन मुझे मानो पूरे एथलीटों वाले कठोर अभ्यास का अनुभव करना पड़ा क्योंकि कीचड़ से निकलते ही हम सीधे नेपल्स की सुरंग की धूल में जा पहुँचे। उस कालकोठरी से अधिक लंबी और उससे अधिक अँधेरी कोई जगह नहीं हो सकती। वहाँ जलती हुई मशालें भी केवल इतना ही कर पाती थीं कि हमें अँधेरा दिखाई दे। वे उसके पार देखने में हमारी कोई सहायता नहीं करती थीं। यदि वहाँ कहीं कुछ प्रकाश होता भी तो धूल उसे ढँक देती। खुली जगह में भी धूल बहुत कष्टदायक होती है। फिर सोचो, उस स्थान में उसका क्या हाल रहा होगा, जहाँ वह बंद वातावरण में, बिना किसी वायु-आवागमन के, बार-बार ऊपर उठती, फिर उसी स्थान पर लौटकर उन लोगों पर गिर पड़ती थी, जो उसे उड़ा रहे थे। इस प्रकार हमें एक ही समय में दो परस्पर विपरीत कष्ट सहने पड़े। उसी एक मार्ग पर, उसी एक दिन, हम कीचड़ और धूल, दोनों से एक साथ जूझते रहे।


By Kimura Buzan 

    फिर भी, उस अँधेरे ने मुझे सोचने के लिए कुछ दिया। क्योंकि मैंने अनुभव किया कि उसका मेरे मन पर एक प्रकार का प्रभाव पड़ा। भय तो नहीं था पर उस अपरिचित परिस्थिति की नवीनता और अप्रियता के कारण मेरे भीतर एक परिवर्तन अवश्य उत्पन्न हुआ। अब मैं अपने विषय में नहीं कह रहा हूँ क्योंकि मैं तो एक सहनीय मनुष्य होने से भी बहुत दूर हूँ, पूर्ण मनुष्य होने की तो बात ही अलग है बल्कि उस व्यक्ति के विषय में कह रहा हूँ, जिस पर भाग्य का अब कोई वश नहीं रह गया है। उसका मन भी ऐसे अवसरों पर प्रभावित होगा। उसके चेहरे का रंग भी बदल जाएगा। प्रिय लूसीलियस, कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे कोई भी सद्गुण मनुष्य को पूरी तरह नहीं बचा सकता। प्रकृति स्वयं सद्गुणी व्यक्ति को यह स्मरण कराती रहती है कि वह भी नश्वर है। इसलिए दुःखद घटनाओं पर उसके चेहरे के भाव बदल जाएँगे। आकस्मिक घटनाओं से वह चौंक उठेगा और बहुत अधिक ऊँचाई से नीचे देखने पर उसे चक्कर भी आ सकता है। यह भय नहीं है बल्कि प्रकृति की ऐसी सहज प्रतिक्रिया है जिस पर तर्क का कोई अधिकार नहीं चलता।

    इसी प्रकार कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अत्यन्त साहसी होते हैं और अपना रक्त बहाने के लिए भी तत्पर रहते हैं पर दूसरों का रक्त नहीं देख सकते। कुछ लोग ताज़े घाव को छूते या देखते ही मूर्छित हो जाते हैं जबकि कुछ पुराने और सड़े हुए घाव को देखकर बेहोश हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो तलवार का वार सह लेना, तलवार को अपनी आँखों के सामने देखने की अपेक्षा अधिक सहज समझते हैं। इसलिए जैसा कि मैंने कहा, मैंने जो अनुभव किया वह कोई भावावेश नहीं था बल्कि केवल एक परिवर्तन था। जैसे ही मैं फिर दिन के प्रकाश में लौटा, मेरी प्रसन्नता बिना किसी प्रयास और बिना किसी सचेत इच्छा के स्वयं लौट आई।

    तब मैंने अपने आप से वही पुरानी बातचीत आरम्भ की कि हम कितने मूर्ख हैं जो कुछ बातों से अधिक और कुछ से कम डरते हैं। जबकि उन सबका अंत एक ही होता है। इससे क्या अंतर पड़ता है कि कोई व्यक्ति गिरती हुई बालकनी के नीचे दबकर मरे या चट्टानों के धँसकने से? वास्तव में कोई अंतर नहीं है। फिर भी कुछ लोग चट्टानों के धँसकने से अधिक भयभीत होते हैं। जबकि दोनों ही समान रूप से प्राणघातक हैं क्योंकि भय परिणाम की अपेक्षा उसके कारण को अधिक महत्त्व देता है।

    तुम यह मत समझो कि मैं उन स्टोइक दार्शनिकों की बात कर रहा हूँ जो यह मानते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी अत्यन्त भारी वस्तु के नीचे दबकर मर जाए तो उसकी आत्मा उस घटना से बच नहीं सकती क्योंकि उसे तुरंत बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिलता। वह उसी क्षण तितर-बितर हो जाती है। पर मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ। वास्तव में, मेरा विचार है कि ऐसा कहने वाले लोग भूल करते हैं। जिस प्रकार अग्नि को दबाकर नष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि जो भी वस्तु उसे दबाती है, उसके चारों ओर से वह निकल जाती है। जिस प्रकार वायु न तो मुट्ठी के प्रहार से क्षतिग्रस्त होती है, न चाबुक की चोट से बल्कि केवल उस वस्तु के चारों ओर घूम जाती है जो उसे विचलित करती है। उसी प्रकार मन भी, जो अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व से बना है, शरीर के भीतर न तो पकड़ा जा सकता है और न ही टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है। अपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण वह उन सभी वस्तुओं के आर-पार निकल जाता है जो उस पर दबाव डालती हैं। जैसे बिजली दूर-दूर तक चमकती और फैलती है, फिर भी एक बहुत छोटे-से छिद्र से अपना मार्ग बना लेती है, उसी प्रकार मन, जो अग्नि से भी अधिक सूक्ष्म है, प्रत्येक प्रकार के शरीर के आर-पार निकल जाने में समर्थ है।

    अतः हमें इस बात की जाँच करनी चाहिए कि क्या मन अमर हो सकता है। पर कम-से-कम इस बात के प्रति तुम निश्चिंत रह सकते हो कि यदि वह शरीर के नष्ट होने के बाद भी जीवित रहता है तो किसी भी प्रकार उससे कुचला या नष्ट नहीं किया जा सकता। क्योंकि अमरता ऐसी नहीं होती जिसमें कोई अपवाद संभव हो और जो वस्तु शाश्वत है, उसे कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता।


अभी के लिए विदा 

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 2 (संतों की प्रार्थनाएँ/एक: फ्लोरेंस की प्रार्थना)

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