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Monday, 3 August 2026

जीवन और परिस्थितियों के बारे में -- पत्र - 105 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारी समझ-बूझ और विवेक कहाँ चले गए? तुम्हारे चरित्र की दृढ़ता का क्या हुआ? क्या तुम इतनी तुच्छ-सी बात से व्याकुल हो रहे हो? तुम्हारे दासों ने देखा कि तुम व्यस्त हो। उन्होंने इसे भाग निकलने का अवसर समझ लिया। यदि तुम्हें धोखा देने वाले तुम्हारे मित्र होते... चलो, प्रचलित किन्तु गलत शब्द का ही प्रयोग कर लें ताकि उनके मित्रोचित व्यवहार न करने का दोष और भी अधिक स्पष्ट हो तो निश्चय ही तुम्हारे सारे कामों की हानि होती। परंतु इस स्थिति में तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ा। तुमने केवल ऐसे लोगों को खोया है जो तुम्हारी अच्छी सेवा नहीं करते थे और जो तुम्हें एक कठिन स्वामी समझते थे। 



    इस घटना में न तो कुछ असाधारण है और न ही अप्रत्याशित। ऐसी बातों पर व्यथित होना उतना ही हास्यास्पद है जितना स्नानागार में पानी के छींटे पड़ने, भीड़ में धक्का लग जाने या कीचड़ भरे मार्ग पर कपड़े मैले हो जाने की शिकायत करना। जीवन भी हम पर वही परिस्थितियाँ लादता है जिनका सामना हम स्नानागार, भीड़ या यात्रा के दौरान करते हैं। कुछ बातें जान-बूझकर किए गए आघात होंगी। कुछ केवल संयोगवश घटित होंगी। जीवन फूलों की सेज नहीं है। तुम एक लंबी यात्रा पर निकले हो। इस मार्ग में तुम्हारा ठोकर खाना, किसी से टकरा जाना, गिर पड़ना, थक जाना और यह कह उठना... “अब मैं मर जाना चाहता हूँ”, अनिवार्य है। हालाँकि यह केवल एक क्षणिक उद्गार होगा। किसी स्थान पर तुम किसी साथी को पीछे छोड़ दोगे, किसी दूसरे स्थान पर किसी का अंतिम संस्कार करोगे और कहीं किसी अन्य के कारण भयभीत हो जाओगे। इसी प्रकार की घटनाओं से भरे इस ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर तुम्हें आगे बढ़ना होगा। 

    यदि कोई सचमुच मरना चाहता है तो उसे अपने को उन सभी बातों के लिए तैयार कर लेना चाहिए जो आगे आने वाली हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि वह उस स्थान पर आ पहुँचा है जहाँ गर्जन सुनाई देता है, जहाँ-,विलाप और प्रतिशोधी चिंताओं ने अपना निवास बना रखा है।  जहाँ भयंकर रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।

    इन्हीं लोगों के बीच तुम्हें अपना जीवन बिताना है। तुम इन बातों से बच नहीं सकते, पर उनसे ऊपर अवश्य उठ सकते हो; और यदि तुम बार-बार उन पर विचार करोगे तथा भविष्य में आने वाली बातों का पहले से अनुमान लगाते रहोगे, तो ऐसा करने में सफल हो जाओगे। 

    जिस परिस्थिति के लिए मनुष्य लंबे समय से स्वयं को तैयार करता रहा हो, उसका सामना वह अधिक धैर्य के साथ करता है। जिन कष्टों की पहले से अपेक्षा की गई हो, उन्हें भी सहा जा सकता है। इसके विपरीत, जो लोग तैयार नहीं होते, वे अत्यंत तुच्छ बातों से भी भयभीत हो जाते हैं। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमने किसी भी संभावना की उपेक्षा न की हो। क्योंकि प्रत्येक नई बात अधिक गंभीर प्रतीत होती है। इसलिए निरंतर चिंतन यह सुनिश्चित करेगा कि तुम किसी भी संकट का सामना एक नए सैनिक की तरह न करो। 

    “मेरे दास मुझे छोड़कर भाग गए।” हाँ, और किसी दूसरे व्यक्ति के दासों ने उससे चोरी की है, उस पर अपराध का आरोप लगाया है, उसकी हत्या की है, उसके साथ विश्वासघात किया है, उसे पैरों तले रौंदा है, उसे विष देकर या झूठे अभियोग लगाकर नष्ट करने का प्रयास किया है। जिन बातों को तुम अपने दुखों की सूची मानते हो, उनका अनुभव बहुत-से लोग कर चुके हैं। बहुत-से लोग आगे भी करेंगे। अनेक प्रकार के अस्त्र हमारी ओर लक्षित हैं। उनमें से कुछ पहले ही हमें घायल कर चुके हैं। कुछ हमारी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और शीघ्र ही हम तक पहुँचने वाले हैं। कुछ, जो किसी और के लिए छोड़े गए थे, हमें केवल छूते हुए निकल जाते हैं। जिन बातों का सामना करने के लिए हमारा जन्म हुआ है, उनसे हमें कभी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। किसी को भी उनकी शिकायत नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे सभी मनुष्यों के लिए समान हैं। मेरा आशय यह है कि वे समान हैं क्योंकि जिन कष्टों से कुछ लोग बच जाते हैं, वे भी ऐसे कष्ट हैं जिन्हें वे भोग सकते थे। कोई नियम तभी न्यायसंगत होता है जब वह सब पर समान रूप से लागू होता है, न कि केवल तब जब उसका अनुभव सबको हो। अपने मन को न्यायप्रिय बनाओ। अपनी नश्वरता का जो कर हमें चुकाना है, उसे बिना शिकायत चुकाएँ।

    शीत ऋतु शीत लेकर आती है। हमें ठिठुरना पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु फिर उष्णता लेकर आती है। हमें पसीना बहाना पड़ता है। मौसम की अनियमितता हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हमें बीमार पड़ना पड़ता है। कहीं हमारा सामना हिंसक पशुओं से होगा तो कहीं ऐसे मनुष्यों से, जो किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होते हैं। हमें जल से भी हानि पहुँचेगी और अग्नि से भी। हम इस व्यवस्था को बदल नहीं सकते। हम केवल इतना कर सकते हैं कि एक सज्जन पुरुष के योग्य दृढ़ चरित्र धारण करें ताकि जीवन की आकस्मिक घटनाओं को साहसपूर्वक सह सकें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखें। प्रकृति इस दृश्य जगत का संचालन परिवर्तन के माध्यम से करती है। बादलों से घिरे आकाश के बाद निर्मल आकाश आता है। शांत समुद्र के बाद वह उथल-पुथल से भर उठता है। वायु बारी-बारी से चलती है। रात्रि के बाद दिन आता है। आकाश का एक भाग उदित होता है और दूसरा अस्त हो जाता है। इन्हीं परस्पर विरोधी परिवर्तनों के कारण संसार का अस्तित्व बना रहता है। हमें अपने मन को इसी नियम के अनुरूप ढालना चाहिए। उसका अनुसरण करना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। जो कुछ भी घटित हो, हमें यह समझना चाहिए कि उसका घटित होना आवश्यक था। प्रकृति को दोष देने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। जिसे सुधारा नहीं जा सकता, उसे धैर्यपूर्वक सहना ही सर्वोत्तम है। जो दैवी सत्ता समस्त घटनाओं के क्रम का संचालन करती है, उसके साथ बिना शिकायत चलना चाहिए। जो सैनिक अपने सेनापति के पीछे चलते हुए कुड़कुड़ाता है, वह अच्छा सैनिक नहीं होता।

    अतः आओ, हम अपने भाग में आए आदेशों को निरंतर उत्साह और दृढ़ता के साथ स्वीकार करें। इस अत्यंत सुंदर विश्व द्वारा निर्धारित मार्ग को न छोड़ें क्योंकि हमारे भविष्य के समस्त अनुभव उसी के साथ गुंथे हुए हैं। आओ, इस विराट जगत के संचालक ज्यूपिटर को हमारे अपने क्लेआन्थेस के उन उत्कृष्ट पदों में संबोधित करें, जिन्हें मैं वाग्मिता के आचार्य सिसेरो के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अनुवाद करने का साहस कर रहा हूँ। यदि ये तुम्हें पसंद आएँ तो उनका श्रेय मुझे देना। यदि पसंद न आएँ, तो समझ लेना कि मैंने केवल सिसेरो का अनुकरण किया है—

हे पिता, उच्च आकाश के स्वामी,
जहाँ भी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा मार्गदर्शन करो। 
मैं तत्पर हूँ और शीघ्र ही आज्ञा का पालन करूँगा।

यदि मैं अनिच्छुक होकर भी कराहूँ,
तो भी मुझे जाना ही होगा,
जो कार्य मैं सद्गुणी होता तो अपनी इच्छा से करता,
उसी को अब मुझे विवश होकर दुःख सहते हुए करना पड़ेगा।

भाग्य इच्छुक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है,
और अनिच्छुक को घसीटकर ले जाता है।

    हमें इसी प्रकार जीना और इसी प्रकार बोलना चाहिए कि भाग्य हमें सदैव तैयार और तत्पर पाए। यही वह दृढ़ चरित्र है जिसने स्वयं को भाग्य के प्रति समर्पित कर दिया है। इसके विपरीत वह दुर्बल और पतित मनुष्य है, जो संघर्ष करता रहता है, विश्व-व्यवस्था के प्रति बुरा विचार रखता है और स्वयं को सुधारने के बजाय देवताओं को सुधारना अधिक उचित समझता है।


अभी के लिए विदा 

Friday, 31 July 2026

मनुष्य जीवन और शिकायतों के बारे में -- पत्र - 94 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम अभी भी किसी बात से व्यथित हो; तुम अभी भी शिकायत किए जा रहे हो। क्या तुम्हें यह समझ नहीं आता कि इन सबमें वास्तव में बुराई केवल तुम्हारा व्यथित होना और शिकायत करना ही है? यदि तुम मेरी राय पूछो तो मैं कहूँगा कि किसी मनुष्य के लिए कोई भी वस्तु तब तक भयानक नहीं होती, जब तक वह स्वयं प्रकृति की व्यवस्था में किसी बात को भयानक न मान ले। जिस दिन मैं किसी परिस्थिति को सहन करने में असमर्थ हो जाऊँगा, उसी दिन मैं स्वयं को भी सहन करने योग्य नहीं रहूँगा। 'मैं बीमार हूँ, यह तो मेरे जीवन की स्वाभाविक संभावना थी। 'मेरे दास बीमार पड़ गए हैं। मेरी आय घट गई है। मेरा घर जर्जर होकर चरमराने लगा है। मुझे हानि, शारीरिक पीड़ा, कठिन परिश्रम और चिंताओं ने घेर लिया है' , ऐसा होता है बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि ऐसा होना ही था। ये घटनाएँ पूर्वनियत हैं। ये कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटनाएँ नहीं हैं। 



    इस पर विश्वास करो, मैं इस समय अपने हृदय की सबसे गहरी भावना तुम्हारे सामने प्रकट कर रहा हूँ। जो कुछ भी प्रतिकूल और कठिन प्रतीत होता है, उसके संबंध में मैंने अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया है। मैं ईश्वर की केवल आज्ञा का पालन नहीं करता बल्कि उसकी इच्छा से सहमत होता हूँ। मैं उसका अनुसरण अपनी स्वेच्छा से करता हूँ। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ। मेरे साथ जो कुछ भी घटित होगा, मैं उसे बिना शोक किए और बिना उदासी का मुख बनाए स्वीकार करूँगा। जीवन जो भी कर (देय मूल्य) मुझसे माँगेगा, मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक चुका दूँगा। जिन बातों के कारण हम कराहते हैं और भयभीत हो जाते हैं, वे वास्तव में जीवन के कर (देय मूल्य) मात्र हैं। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, न तो उनसे छूट की आशा करो और न ही उसकी कामना करो।

    तुम मूत्राशय के दर्द से पीड़ित थे, तुम्हें चिंताजनक पत्र मिले और तुम्हारी हानियाँ लगातार बढ़ती रहीं। संक्षेप में कहूँ तो तुम्हें अपने प्राणों का भय सताने लगा। लेकिन क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं था कि जब तुम दीर्घायु होने की प्रार्थना कर रहे थे, तब वास्तव में तुम इन्हीं सब बातों की भी प्रार्थना कर रहे थे? लंबा जीवन इन सबको अपने भीतर समेटे रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक लंबी यात्रा में धूल, कीचड़ और वर्षा, सब कुछ आता है। “मैं तो जीना चाहता था, पर इन सब कष्टों के बिना।” इस प्रकार की कोमल और दुर्बल वाणी एक पुरुष को शोभा नहीं देती। तुम इसे जैसे चाहो वैसे समझो। पर मैं तुम्हारे लिए जो प्रार्थना करता हूँ, वह केवल सद्भावना से ही नहीं बल्कि पूरी गंभीरता से करता हूँ, “ईश्वर और देवियाँ तुम्हें कभी भी विलासिता की गोद में न बैठाए रखें।” अपने आप से पूछो, यदि कोई देवता तुम्हें यह विकल्प दे कि तुम अपना जीवन बाज़ार की सुख-सुविधाओं के बीच बिताना चाहते हो या सैनिक शिविर में तो तुम किसे चुनोगे? 

    प्रिय लूसीलियस, जीवन एक युद्ध-अभियान है। इसी कारण जो लोग कठिनाइयों को सहते हैं, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चढ़ते-उतरते हैं और सबसे जोखिम भरे अभियानों में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, वही सच्चे वीर होते हैं और वही शिविर के नेता बनने योग्य होते हैं। इसके विपरीत, जो लोग आराम और सुविधा में पड़े-पड़े धीरे-धीरे निष्क्रिय होते रहते हैं, जबकि सारा कठिन कार्य दूसरे लोग करते हैं, वे पिंजरे में पाले जाने वाले फाख्तों के समान हैं। वे केवल इसलिए सुरक्षित दिखाई देते हैं क्योंकि कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता।


अभी के लिए विदा 


Wednesday, 8 July 2026

मन के विकार को दूर करने के संदर्भ में -- पत्र - 50 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


चूँकि तुम्हारा पत्र मुझे उसके भेजे जाने के कई महीनों बाद प्राप्त हुआ इसलिए मैंने पत्रवाहक से यह पूछना उचित नहीं समझा कि तुम कैसे हो। इतनी लंबी अवधि के बाद वह यदि कुछ बता भी पाता तो उसके लिए असाधारण स्मरण-शक्ति की आवश्यकता होती! किन्तु मुझे आशा है कि अब तुम इस प्रकार जीवन जी रहे हो कि तुम जहाँ कहीं भी हो, मुझे यह ज्ञात रहे कि तुम कैसे हो। आख़िर तुम्हारा और कौन-सा प्रयत्न होना चाहिए, सिवाय इसके कि तुम प्रतिदिन स्वयं को पहले से बेहतर मनुष्य बनाओ। प्रतिदिन किसी-न-किसी दोष का परित्याग करो। यह समझो कि जिन बातों को तुम अपनी परिस्थितियों की कमियाँ समझते हो, वे वास्तव में तुम्हारे अपने ही दोष हैं।


Ethiopian Art  

    क्योंकि हम प्रायः उन दोषों के लिए समय और स्थान को दोषी ठहराते हैं जो वास्तव में जहाँ भी हम जाएँ, हमारे साथ ही चलते रहते हैं। तुम जानते हो कि मेरी पत्नी के पास हारपास्टे नाम की एक विदूषी स्त्री है, जो बहुत समय से हमारे घर में पैतृक आश्रिता के रूप में रह रही है। (मुझे ऐसे लोगों से, जिन्हें केवल मनोरंजन के लिए रखा जाता है, अत्यन्त अरुचि है। यदि मुझे कभी किसी मूर्ख पर हँसने की इच्छा होती है तो मुझे दूर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैं स्वयं पर ही हँस लेता हूँ।) तो हुआ यह कि वह विदूषी स्त्री अचानक अपनी दृष्टि खो बैठी। जो बात मैं कह रहा हूँ, उस पर विश्वास करना कठिन है। किन्तु यह बिल्कुल सत्य है। उसे यह तक मालूम नहीं कि वह अंधी हो चुकी है। वह बार-बार अपनी परिचारिका से कमरा बदलने के लिए कहती रहती है और शिकायत करती है कि उसका कमरा पर्याप्त प्रकाशयुक्त नहीं है।

    तुम भली-भाँति समझ सकते हो कि जिस बात पर हम उसके प्रसंग में हँसते हैं, वही बात हम सबके साथ भी घटती है। कोई भी यह नहीं समझता कि वह लोभी है या धनलोलुप। कम-से-कम अंधे लोग तो किसी मार्गदर्शक की माँग करते हैं। पर हम बिना किसी मार्गदर्शक के भटकते रहते हैं और कहते हैं,“मैं महत्वाकांक्षी नहीं हूँ। रोम में रहने का यही ढंग है।” “मैं फिजूलखर्च नहीं हूँ। बड़े नगर में रहने के लिए कुछ विशेष खर्च तो करने ही पड़ते हैं।” “यह मेरी गलती नहीं कि मुझे शीघ्र क्रोध आ जाता है या अभी तक मैंने जीवन की कोई स्थिर दिशा नहीं बनाई। यह तो युवावस्था का स्वाभाविक व्यवहार है।” हम स्वयं को क्यों धोखा देते हैं? हमारा रोग हमारे बाहर नहीं है। वह हमारे भीतर, हमारे प्राणों की गहराई तक समाया हुआ है। हमारे स्वस्थ होने में इतनी कठिनाई इसलिए आती है कि हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम रोगग्रस्त हैं। हमारे रोग असंख्य हैं और अत्यन्त गंभीर भी। यदि हम उनका उपचार प्रारम्भ भी कर दें, तब भी उनसे पूरी तरह मुक्त होने में कितना समय लग सकता है! परन्तु अभी तो स्थिति यह है कि हमने डॉक्टर की खोज भी आरम्भ नहीं की है।

    और हमारा यह रोग अभी-अभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यदि ऐसा होता तो इसका उपचार अपेक्षाकृत सरल होता। डॉक्टर हमें सही मार्ग दिखा देता। हमारे मन, जो अभी युवा और ग्रहणशील होते, उसका अनुसरण कर लेते। यदि आज हमें अपने स्वाभाविक मार्ग पर लौटाना कठिन हो गया है तो उसका कारण केवल यह है कि हम स्वयं उस मार्ग को छोड़ चुके हैं। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए शिक्षा ग्रहण करने में हमें लज्जा आती है। परन्तु, ईश्वर के लिए बताओ, इतने महान गुण की प्राप्ति के लिए शिक्षा लेना भला कैसी लज्जा की बात है? क्योंकि यह आशा करना व्यर्थ है कि ऐसा गुण संयोगवश स्वयं हमारे भीतर उत्पन्न हो जाएगा। इसके लिए परिश्रम करना ही पड़ता है। किन्तु यह परिश्रम कठिन नहीं होता, बशर्ते कि हम समय रहते आरम्भ कर दें। जैसा कि मैंने कहा है, अपने मन को उसके विकार गहरे जड़ पकड़ने से पहले ही गढ़ना और सीधा करना शुरू कर दें।

    फिर भी, जब ये विकार गहराई तक जड़ जमा चुके हों, तब भी मैं निराश नहीं होता। निरंतर और एकाग्र प्रयास किसी भी प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। बलूत की लकड़ियों को चाहे वे कितनी ही टेढ़ी-मेढ़ी क्यों न हो गई हों, सीधा किया जा सकता है। टेढ़े वृक्ष-तनों को गर्मी देकर मोड़ा जाता है और उनके स्वाभाविक आकार को बदलकर उन्हें वैसा रूप दिया जाता है जैसा हम चाहते हैं। तो फिर मन के लिए अपने को नया रूप देना कितना अधिक सरल है! मन तो किसी भी द्रव से अधिक लचीला और अधिक सहजता से ढलने वाला है। आख़िर मन है ही क्या? वह तो एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित प्राणवायु (श्वास) मात्र है। तुम देखते ही हो कि वायु, अन्य किसी भी पदार्थ से अधिक हल्की होने के कारण, उसी अनुपात में सबसे अधिक परिवर्तनशील और अनुकूलनशील भी होती है।

    यह सत्य है कि इस समय हमारे भीतर दोषों का निवास है। वे बहुत लंबे समय से हमारे भीतर बसे हुए हैं। फिर भी, प्रिय लूसीलियस, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम्हें आशा छोड़ देनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति पहले दोषपूर्ण हुए बिना उत्कृष्ट चरित्र का स्वामी नहीं बनता। हम सब पहले ही दोषों के वश में आ चुके हैं और सद्गुण सीखने का अर्थ है— अपने दोषों को भूलना और उनसे मुक्त होना। फिर भी, जब हम अपने आत्म-संशोधन के कार्य में लगते हैं तो हमें उत्साह बनाए रखना चाहिए। क्योंकि एक बार जब सद्गुण वास्तव में हमारे अधिकार में आ जाता है तब वह सदा के लिए हमारा हो जाता है। सद्गुण को फिर भुलाया नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जो गुण किसी वस्तु के स्वभाव के अनुरूप नहीं होते, वे वहाँ स्थिर नहीं रह पाते। इसलिए उन्हें हटाया और त्यागा जा सकता है। परन्तु जो वस्तु अपने स्वाभाविक स्थान पर आ जाती है, वह वहीं दृढ़तापूर्वक स्थिर रहती है। सद्गुण हमारे स्वभाव के अनुरूप है जबकि दोष हमारे स्वभाव के प्रतिकूल हैं।

    किन्तु जैसे एक बार प्राप्त हो जाने पर सद्गुण हमें छोड़कर नहीं जाते और उन्हें बनाए रखना सरल हो जाता है, वैसे ही उन्हें प्राप्त करने की शुरुआत करना कठिन होता है। क्योंकि दुर्बल और रोगग्रस्त मन की यह विशेषता होती है कि वह उस वस्तु से भयभीत रहता है जिसका उसने अभी तक अनुभव नहीं किया है। इसलिए उसे प्रारम्भ करने के लिए मानो बाध्य करना पड़ता है। परन्तु एक बार आरम्भ हो जाने पर यह औषधि कड़वी नहीं लगती बल्कि जैसे-जैसे वह रोग का उपचार करती है, वैसे-वैसे आनंद भी प्रदान करती है। अन्य प्रकार की चिकित्सा में सुख उपचार के बाद प्राप्त होता है। किन्तु दर्शन का उपचार एक साथ ही औषधि भी है और आनंद भी।


अभी के लिए विदा 

Monday, 6 July 2026

बेहतर इंसान बनने के संदर्भ में -- पत्र - 34 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

जब-जब मैं तुम्हारे पत्रों और तुम्हारे कार्यों से यह जानता हूँ कि तुमने स्वयं को भी कितना पीछे छोड़ दिया है, तब-तब मेरा हृदय गर्व से भर उठता है। मैं आनंद से पुलकित हो जाता हूँ। अपने वर्षों का बोझ झाड़ देता हूँ और फिर से युवावस्था की ऊष्मा का अनुभव करने लगता हूँ। क्योंकि तुमने बहुत पहले ही भीड़ का साथ छोड़ दिया था। यदि कोई किसान अपने वृक्ष को फलते देखकर प्रसन्न होता है, यदि कोई पशुपालक अपने पशुओं को संतान उत्पन्न करते देखकर आनंदित होता है, यदि कोई व्यक्ति अपने संरक्षण में पले युवक को वयस्क होते देखकर ऐसा अनुभव करता है मानो वह स्वयं ही परिपक्व हुआ हो तो तुम क्या सोचते हो कि उस व्यक्ति को कितना आनंद होता होगा जिसने किसी के बौद्धिक विकास का मार्गदर्शन किया हो और उस अपरिपक्व मन को अचानक पूर्ण विकसित होते देखा हो? मैं तुम्हें अपना कहता हूँ। तुम मेरी कृति हो। तुम्हारी क्षमता को पहचानकर सबसे पहले मैंने ही तुम्हें अपने संरक्षण में लिया था। मैंने ही तुम्हें प्रोत्साहित किया, आगे बढ़ाया, तुम्हें रुकने नहीं दिया बल्कि निरंतर प्रेरित करता रहा। मैं अब भी यही कर रहा हूँ। अंतर केवल इतना है कि अब मैं दौड़ में तुम्हारा उत्साह बढ़ा रहा हूँ और बदले में तुम मेरा उत्साह बढ़ा रहे हो।



    “और क्या कहूँ?” तुम पूछते हो। “मैं तो हर समय तत्पर हूँ।” यही तो मुख्य बात है। केवल आधी नहीं, जैसा कि उस कहावत में कहा जाता है कि ‘अच्छी शुरुआत आधा काम पूरा कर देती है।’ यह ऐसा विषय है जो मन पर निर्भर करता है। इसलिए जब कोई व्यक्ति अच्छा बनने की इच्छा कर लेता है तो अच्छाई का एक बड़ा भाग पहले ही प्राप्त हो जाता है।

    क्या तुम जानते हो कि मैं अच्छे मनुष्य से क्या अभिप्राय रखता हूँ? वह जो पूर्ण है। वह जो सिद्ध और परिपक्व हो चुका है। वह जिसे कोई भी शक्ति, कोई भी बाध्यता, किसी भी प्रकार से गलत कार्य करने के लिए विवश नहीं कर सकती। मुझे विश्वास है कि यदि तुम दृढ़ता से लगे रहोगे, निरंतर आगे बढ़ते रहोगे और अपने सभी कर्मों तथा वचनों को एक-दूसरे के अनुरूप और सामंजस्यपूर्ण बनाओगे, मानो वे सब एक ही साँचे में ढले हों। तुम ऐसे ही अच्छे मनुष्य बनोगे। यदि किसी व्यक्ति के कर्म परस्पर असंगत हों तो इसका अर्थ है कि उसका मन अभी तक सही रूप से व्यवस्थित और संतुलित नहीं हुआ है।

स्वयं ही महत्वपूर्ण पंक्तियों के रचनाकार बनने के संदर्भ में -- पत्र - 33 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम चाहते हो कि मैं इन पत्रों का समापन भी पहले के पत्रों की तरह उद्धरणों के साथ करूँ। वे उद्धरण हमारे अपने दर्शन-मत के आचार्यों से लूँ। लेकिन उन्होंने वाक्चातुर्य के आकर्षक टुकड़ों में स्वयं को व्यस्त नहीं रखा। उनकी समस्त रचना गंभीर, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण है। जहाँ कोई विशेष बात शेष भागों से अलग उभरकर दिखाई देती है, वहाँ तुम निश्चय ही समझ सकते हो कि पूरी रचना का स्तर एक-सा नहीं है। एक अकेला वृक्ष किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता, जब पूरा वन ही समान ऊँचाई तक उठा हुआ हो।


From Sartel 

    कविताएँ ऐसे कथनों से भरी पड़ी हैं और इतिहास-ग्रंथ भी। इसलिए तुम यह मत समझो कि ऐसे विचार केवल एपिक्यूरस के हैं। वे तो सबकी साझी संपत्ति हैं और विशेष रूप से हमारी भी। लेकिन उसके यहाँ वे अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि वे बहुत कम दिखाई देते हैं। वे अप्रत्याशित होते हैं और क्योंकि यह आश्चर्यजनक लगता है कि ऐसा व्यक्ति, जो कोमलता और विलासिता का उपदेशक माना जाता है, इतनी साहसपूर्ण बातें कह सकता है। कम-से-कम अधिकांश लोग उसके बारे में यही सोचते हैं। किन्तु मेरी दृष्टि में एपिक्यूरस वास्तव में साहसी था, भले ही वह लंबी बाँहों वाले वस्त्र पहनता रहा हो। साहस, परिश्रम और युद्ध के योग्य मन केवल कठोर जीवन जीने वालों में ही नहीं पाए जाते। वे उतनी ही अच्छी तरह फ़ारसियों में भी मिल सकते हैं जितनी उन लोगों में जो कमर पर तलवार की पेटी बाँधते हैं।

    इसलिए तुम्हारे पास उद्धरणों और चुने हुए अंशों की माँग करने का कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार की बातें दूसरे लेखकों के यहाँ चुनकर उद्धृत की जाती हैं, वे हमारे दर्शन-मत के ग्रंथों में निरंतर मिलती रहती हैं। इस कारण हमारे यहाँ वैसे आकर्षक वाक्य नहीं हैं जिनकी तुम्हें अपेक्षा है। हमारे यहाँ खरीदार दुकान में प्रवेश करके निराश नहीं होते कि बाहर जो दिखाया गया था, भीतर उससे अधिक कुछ नहीं है। हम उन्हें यह स्वतंत्रता देते हैं कि वे ग्रंथ के जिस भाग को चाहें, उसी को प्रदर्शनीय नमूना मान लें। मान लो कि हम कुछ कथनों को भीड़ से अलग निकालना चाहें तो उन्हें किसके नाम से जोड़ेंगे? क्या ज़ीनो (Zeno) के? क्या क्लीन्थीस (Cleanthes) के? क्या क्रिसिपस  (Chrysippus) के? क्या पोसिडोनियस (Posidonius) के? या पैनैटियस (Panaetius) के? हम किसी एक सम्राट के अधीन नहीं हैं। हममें से प्रत्येक अपनी स्वतंत्रता का दावा करता है। एपिक्यूरस के अनुयायियों में हर्मार्खुस (Hermarchus) या मेट्रोडोरस (Metrodorus) जो कुछ भी कहते हैं, उसका श्रेय अंततः एक ही व्यक्ति को दिया जाता है। उस परंपरा में हर व्यक्ति मानो एक ही गुरु के निर्देशन और संरक्षण में बोलता है। किन्तु हमारे पास तो इतनी अधिक और समान रूप से उत्कृष्ट संपदा है कि हम चाहकर भी किसी एक को अलग नहीं कर सकते। मैं फिर कहता हूँ, हम ऐसा नहीं कर सकते कि केवल निर्धन व्यक्ति ही अपने पशुधन की गिनती करता रहता है।

    तुम अपनी दृष्टि जहाँ भी डालोगे, वहाँ तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा जो अपने आप में उत्कृष्ट माना जाता, यदि शेष रचना भी उतनी ही उत्कृष्ट न हो तो भी। इसी कारण तुम्हें यह आशा छोड़ देनी चाहिए कि तुम कभी महान विचारकों की रचनाओं का केवल थोड़ा-सा नमूना लेकर उन्हें समझ सकोगे। तुम्हें उन्हें संपूर्णता में पढ़ना होगा और संपूर्णता में ही समझना होगा। विषय का विवेचन उसके अनुरूप क्रम में किया जाता है, और एक ऐसी बौद्धिक रचना निर्मित की जाती है जिसमें से यदि कोई भाग हटा दिया जाए, तो पूरी संरचना ही ढह जाए। फिर भी, मुझे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि तुम उसके अलग-अलग अंगों का अध्ययन करो, बशर्ते कि तुम्हारी दृष्टि संपूर्ण व्यक्तित्व पर बनी रहे। सुंदर स्त्री वह नहीं होती जिसकी केवल एड़ी या कंधे की प्रशंसा की जाए बल्कि वह होती है जिसकी समग्र छवि हमारे मन को इस प्रकार आकर्षित कर ले कि हम उसके अलग-अलग अंगों पर ध्यान ही न दें।

    लेकिन यदि तुम फिर भी आग्रह करोगे तो मैं तुम्हारे प्रति कंजूसी नहीं करूँगा बल्कि उन्हें मुट्ठी भर-भरकर बाँटूँगा। ऐसे कथनों के ढेर लगे हुए हैं। उन्हें केवल उठा लेने की आवश्यकता है, उन्हें इकट्ठा करने का कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। वे बूँद-बूँद करके नहीं आते बल्कि एक सतत प्रवाह के रूप में आते हैं। वे सब एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं।

    मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे कथन आरंभिक विद्यार्थियों और दर्शन-मत के बाहर के श्रोताओं के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। अलग-अलग कथन अधिक आसानी से मन पर प्रभाव डालते हैं क्योंकि वे पद्य की पंक्तियों की तरह स्वतंत्र और पूर्ण होते हैं। इसी कारण हम बच्चों को कहावतें कंठस्थ कराते हैं। वे बातें भी जिन्हें यूनानी लोग ‘ख्रेयाइ’ कहते हैं क्योंकि बालक का मन अभी उतनी ही बातों को ग्रहण कर सकता है। उसमें इससे बड़ी चीज़ों के लिए अभी पर्याप्त स्थान नहीं होता। किन्तु यह लज्जाजनक है कि जो व्यक्ति वास्तव में प्रगति कर रहा हो, वह केवल सुन्दर वाक्यांशों को पकड़कर बैठे या याद किए हुए कुछ सामान्य कथनों के सहारे स्वयं को टिकाए रखे। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए! उसे ये बातें स्वयं कहनी चाहिए, केवल याद की हुई बातें दोहरानी नहीं चाहिए। यह शर्म की बात है कि कोई वृद्ध व्यक्ति या लगभग वृद्ध हो चुका व्यक्ति, अपनी बुद्धि किसी पाठ्य-पुस्तक से प्राप्त करे। “यह ज़ीनो ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? “यह क्लीन्थीस ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? तुम कब तक किसी दूसरे के आदेश के अधीन चलते रहोगे? स्वयं नेतृत्व संभालो। अपने बल पर कुछ ऐसा कहो जो स्मरणीय हो। अपनी ही निधि से कुछ बाहर लाओ।

    इसलिए मुझे लगता है कि वे सभी लोग जो कभी स्वयं रचनाकार नहीं बनते बल्कि हमेशा केवल व्याख्याकार बने रहते हैं और जो किसी दूसरे की छाया में स्वयं को छिपाए रखते हैं, उनमें कुछ भी महान नहीं होता। क्योंकि उन्होंने कभी उस ज्ञान को व्यवहार में लाने का साहस नहीं किया जिसे सीखने में उन्होंने इतना लंबा समय बिताया है। उन्होंने अपनी स्मृति को दूसरों के शब्दों से भर लिया है। लेकिन स्मरण रखना एक बात है और जानना दूसरी। स्मरण रखने का अर्थ है किसी बात को याद करके सुरक्षित रखना जबकि जानने का अर्थ है उन बातों को वास्तव में अपना बना लेना। इस प्रकार कि किसी आदर्श का सहारा न लेना पड़े और हर समय अपने गुरु की ओर निर्देशों के लिए न देखना पड़े। “ज़ीनो ने यह कहा था और क्लीन्थीस ने वह कहा था।” तुम और पुस्तक के बीच कुछ दूरी तो होनी चाहिए! तुम कब तक विद्यार्थी बने रहोगे? अब स्वयं शिक्षक भी बनो। मैं ऐसी बातें क्यों सुनूँ जिन्हें मैं स्वयं पढ़ सकता हूँ? “जब बातें बोलकर कही जाती हैं तो बहुत अंतर पड़ता है,” कोई कह सकता है। हाँ, लेकिन तब नहीं, जब बोलने वाला केवल किसी दूसरे के शब्द उधार लेकर दोहरा रहा हो, जैसे कोई नकलनवीस करता है।

    उन लोगों के संबंध में जो कभी अपने जीवन का नेतृत्व स्वयं नहीं संभालते, एक और समस्या भी है। वे पहले तो उन विषयों में अपने आचार्यों का अनुसरण करते हैं जिनमें बाकी सभी लोग अपनी स्वतंत्र राय बना चुके हैं। फिर वे उन विषयों में भी उनका अनुसरण करते हैं जो अभी भी अनुसंधान और विचार-विमर्श के अधीन हैं। यदि हम केवल अब तक खोजी गई बातों से ही संतुष्ट हो जाएँ तो कभी कोई नई खोज नहीं हो सकेगी। और फिर, जो लोग केवल अनुयायी बने रहते हैं, वे कभी कुछ नया नहीं खोजते बल्कि वे तो खोजने का प्रयास भी नहीं करते।

    तो फिर क्या मैं अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर नहीं चलूँगा? निश्चय ही चलूँगा। मैं प्राचीन मार्ग का उपयोग करूँगा।लेकिन यदि मुझे कोई दूसरा मार्ग मिल जाए जो अधिक सीधा हो और जिसमें उतार-चढ़ाव कम हों तो मैं उसी मार्ग को अपनाऊँगा। जिन लोगों ने हमसे पहले इन सिद्धांतों को विकसित किया, वे हमारे स्वामी नहीं हैं बल्कि हमारे मार्गदर्शक हैं। सत्य सबके लिए खुला हुआ है। उस पर अभी किसी का एकाधिकार नहीं हुआ है। उसमें से बहुत कुछ अभी भी उन लोगों के लिए शेष है जो भविष्य में आएँगे।


अभी के लिए विदा 

जीवन की पूर्णता के संदर्भ में -- पत्र - 32 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

मैं तुम्हारे बारे में जानकारी लेता रहा हूँ। जब भी तुम्हारे इलाके से कोई व्यक्ति यहाँ से होकर आता है, मैं उससे पूछता हूँ कि तुम क्या कर रहे हो। अपना समय कहाँ बिताते हो और किन लोगों के साथ रहते हो। तुम मुझे धोखा नहीं दे सकते! मैं मानो हर समय तुम्हारे साथ ही हूँ। ऐसे जियो मानो मुझे तुम्हारे हर कार्य के बारे में सुनने को मिलने वाला हो... नहीं, मानो उसे अपनी आँखों से देखने वाला हूँ!


By Monet  

    क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारे बारे में जो कुछ मैं सुनता हूँ, उसमें मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता किस बात से होती है? यह कि मुझे तुम्हारे बारे में कुछ भी सुनने को नहीं मिलता। जिन अधिकांश लोगों से मैं पूछताछ करता हूँ, वे यह नहीं जानते कि तुम कैसे हो। यह तुम्हारे लिए लाभदायक है कि तुम्हारा उन लोगों से कोई संबंध नहीं है जो तुमसे भिन्न हैं और जिनकी इच्छाएँ तुम्हारी इच्छाओं से अलग हैं। वास्तव में, मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हें तुम्हारे मार्ग से विचलित नहीं किया जा सकता और तुम अपने संकल्प पर दृढ़ रहोगे, चाहे तुम्हारे चारों ओर परेशान करने वाले लोगों की कितनी ही भीड़ क्यों न जमा हो जाए।

    तो फिर समस्या क्या है? मुझे यह भय नहीं है कि वे तुम्हें बदल देंगे बल्कि यह भय है कि वे तुम्हारी प्रगति में बाधा डालेंगे। जो व्यक्ति तुम्हें केवल विलंबित ही कर देता है, वह भी बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाता है, विशेषकर इसलिए कि जीवन इतना छोटा है। हम अपनी अस्थिरता के कारण इसे और भी छोटा बना देते हैं, जब हम बार-बार नई शुरुआत करते रहते हैं। हम अपने जीवन को टुकड़ों में बाँट देते हैं। उसके चिथड़े-चिथड़े कर डालते हैं।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस! शीघ्रता करो और सोचो कि यदि कोई शत्रु तुम्हारा पीछा कर रहा होता तो तुम कितनी अधिक गति से आगे बढ़ते। यदि तुम देखते कि घुड़सवार तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहे हैं और तुम्हारे पीछे हटने के मार्ग को बाधित कर रहे हैं तो तुम कितनी तेजी दिखाते। वास्तव में, यही हो रहा है। तुम्हारा पीछा किया जा रहा है। अपनी गति बढ़ाओ! निकल भागो। स्वयं को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा लो। बार-बार अपने आप को स्मरण दिलाओ कि मरने से पहले जीवन की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच जाना कितना अद्भुत है और फिर शेष समय को शांति से बिताना केवल अपने ऊपर निर्भर रहते हुए। क्योंकि जब कोई सच्चा सुख प्राप्त कर लेता है तो समय की अधिक अवधि उसे और अधिक सुखी नहीं बना सकती। आह! वह दिन कब आएगा जब तुम्हें यह अनुभव होगा कि समय का तुम्हारे लिए कोई महत्त्व नहीं रह गया है और तुम पूर्ण शांति में रहोगे। भविष्य की कोई चिंता किए बिना जो कुछ तुम हो और जो कुछ तुम्हारे पास है, उसी में पूरी तरह संतुष्ट? क्या तुम जानना चाहते हो कि लोगों को भविष्य के प्रति इतना लालची क्या बनाता है? यह कि उनमें से कोई भी अभी तक वास्तव में स्वयं का स्वामी नहीं बना है।

    तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारे लिए और भी बहुत-सी चीज़ों की कामना की थी। लेकिन मेरी कामना यह है कि तुम उनकी उन सभी उदार इच्छाओं को तुच्छ समझो। उनकी प्रार्थनाओं में, तुम्हें समृद्ध बनाने के लिए बहुत-से लोगों से कुछ न कुछ छीन लिया जाता है। जो कुछ वे तुम्हें दिलाना चाहते हैं, वह किसी और से लेकर ही तुम्हें दिया जा सकता है। मेरी कामना यह है कि तुम स्वयं अपने स्वामी बनो। तुम्हारा मन, जो अभी अपनी चिंताओं के कारण इधर-उधर भटकता फिरता है, अंततः ठहर जाए और अपने भीतर ही निश्चिंत तथा संतुष्ट हो जाए। तुम उन सच्ची अच्छाइयों को पहचानो जो वास्तव में तुम्हारी अपनी हैं। उन्हें समझते ही अपना बना लो ताकि फिर तुम्हें अतिरिक्त वर्षों की कोई आवश्यकता न महसूस हो। आवश्यकताओं से ऊपर उठने, मुक्ति पाने और वास्तव में स्वतंत्र होने के लिए मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जो पहले से ही पूर्ण हो।

मन एवं परिश्रम के संदर्भ में -- पत्र - 31 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

मैं अपने लूसीलियस को पहचानता हूँ! वह अब अपने वचनों को सच करना शुरू कर रहा है। इसी तरह लगे रहो!क्योंकि तुम्हारे भीतर वह चरित्रबल था कि तुम हर प्रकार की उत्कृष्टता प्राप्त करने का प्रयास करो और उन वस्तुओं को पैरों तले रौंद दो जिन्हें लोग सामान्यतः बहुत मूल्यवान समझते हैं। मैं तुम्हें जितना महान और सद्गुणी देखना चाहता हूँ, वह उससे अधिक नहीं है जिसकी ओर तुम स्वयं पहले से प्रयत्नरत थे। तुमने जो नींव रखी है, वह बहुत विस्तृत है। अब उसके परिणाम को भी अपने प्रयास जितना ही भव्य बनाओ। अपने इस निर्माण-कार्य को उसकी पूर्णता तक पहुँचाओ!

By Monet 

    संक्षेप में कहूँ तो तुम्हारे लिए अपने कान बंद कर लेना ही बुद्धिमानी होगी। लेकिन उन्हें बंद करने के लिए केवल मोम पर्याप्त नहीं होगा। तुम्हें उससे कहीं अधिक मज़बूत अवरोध की आवश्यकता है जितना कि कहा जाता है कि यूलिसिस ने अपने साथियों के कानों में लगाया था। जिस स्वर से वे डरते थे, वह मोहक था। पर वह जनता की आवाज़ नहीं थी। जिस आवाज़ से तुम्हें डरना चाहिए, वह किसी एक चट्टान से नहीं आती। वह तुम्हारे चारों ओर, हर दिशा और हर देश से गूँजती रहती है। इसलिए अपनी यात्रा ऐसे करो कि केवल किसी एक स्थान को न पार करो जहाँ कपटी सुख तुम्हें लुभाने के लिए खड़े हों बल्कि संसार के सभी नगरों को पार कर जाओ। जो लोग तुमसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं, उनकी बातों पर भी ध्यान मत दो। उनकी मंशा भले ही अच्छी हो पर वे तुम्हारे लिए जिन चीज़ों की कामना करते हैं, वे वास्तव में अच्छी नहीं हैं। यदि तुम सचमुच समृद्ध होना चाहते हो तो देवताओं से प्रार्थना करो कि जिन बातों की वे लोग तुम्हारे लिए कामना करते हैं, उनमें से कोई भी पूरी न हो। क्योंकि वे जिन वस्तुओं का ढेर तुम्हारे ऊपर लगा हुआ देखना चाहते हैं, वे वास्तविक अर्थ में 'भलाई' नहीं हैं। सच्ची भलाई केवल एक ही है और वही सुख का कारण भी है तथा उसका आधार भी है। अपने ऊपर विश्वास और अपने चरित्र पर भरोसा।

    लेकिन यदि तुम कभी उस अवस्था को प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें कठिन परिश्रम को कोई विशेष महत्त्व नहीं देना चाहिए और उसे उन चीज़ों में समझना चाहिए जो न अच्छी हैं, न बुरी।क्योंकि यह संभव नहीं कि एक ही वस्तु कभी बुरी हो और कभी अच्छी, कभी हल्की और सहज सहन करने योग्य हो तथा कभी भयावह और असहनीय। परिश्रम स्वयं में कोई अच्छाई नहीं है। तो फिर अच्छाई क्या है? परिश्रम की परवाह न करना। इसी कारण मैं उन लोगों की निंदा करने को प्रवृत्त होता हूँ जो तुच्छ और मूल्यहीन वस्तुओं के लिए बहुत अधिक श्रम करते हैं। दूसरी ओर, जब लोग सम्माननीय और श्रेष्ठ लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं तो मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ। उससे भी अधिक तब, जब वे पूरे उत्साह और दृढ़ता के साथ लगे रहते हैं तथा स्वयं को पराजित या निराश नहीं होने देते। तब मैं कहता हूँ, “यही उचित है! आगे बढ़ो! चुनौती का सामना करो! गहरी साँस लो और उस पहाड़ी पर चढ़ जाओ, यदि कर सको, तो एक ही छलाँग में!”

    महान आत्माएँ कठिन परिश्रम से ही पुष्ट और पोषित होती हैं। इसलिए तुम्हें अपनी इच्छा और अपना लक्ष्य उन वस्तुओं में से नहीं चुनना चाहिए जिनकी प्राप्ति के लिए तुम्हारे माता-पिता ने कभी देवताओं से प्रार्थना की थी। सामान्य रूप से भी, जिसने बड़े कार्य कर दिखाए हों, उसके लिए यह लज्जाजनक है कि वह अभी भी देवताओं को परेशान करता फिरे। तुम्हें प्रार्थनाओं की क्या आवश्यकता है? अपनी समृद्धि स्वयं निर्मित करो! तुम ऐसा कर सकोगे, यदि तुमने भली-भाँति समझ लिया है कि जो कुछ सद्गुण के साथ मिला हुआ है, वही अच्छा है। जो कुछ बुरे आचरण के साथ जुड़ा हुआ है, वही लज्जाजनक है। कोई वस्तु तब तक प्रकाशमान नहीं होती जब तक उसमें प्रकाश का कुछ अंश न मिला हो। कोई वस्तु तब तक काली नहीं होती जब तक उसमें कुछ अंधकार न हो या उसने किसी प्रकार का कालापन ग्रहण न किया हो। कोई वस्तु अग्नि की सहायता के बिना गर्म नहीं होती और न ही वायु के प्रभाव के बिना ठंडी होती है। ठीक इसी प्रकार, किसी वस्तु को सम्माननीय या लज्जाजनक बनाने वाली चीज़ उसका सद्गुण या दुर्गुण के साथ संबंध होना है।

    तो फिर अच्छाई क्या है? वास्तविक तथ्यों का ज्ञान। बुराई क्या है? वास्तविक तथ्यों का अज्ञान। जो मनुष्य वास्तव में बुद्धिमान और कुशल है, वह परिस्थितियों के अनुसार किसी वस्तु को स्वीकार करेगा या उससे बचेगा। लेकिन जिन चीज़ों से वह बचता है उनसे वह भयभीत नहीं होता और जिन चीज़ों को वह चुनता है उनकी वह अंधी प्रशंसा भी नहीं करता, यदि उसका मन महान और अजेय है। 

    मैं तुम्हें स्वयं को नीचा दिखाने से रोकता हूँ। मैं तुम्हें निराश और हताश होने से भी रोकता हूँ। केवल परिश्रम से मुँह न मोड़ना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसका स्वागत करो। “लेकिन यदि वह काम अपमानजनक हो तो?” तुम कहते हो। “यदि वह अनावश्यक हो या तुच्छ कारणों से कराया जा रहा हो? क्या ऐसा परिश्रम बुरा नहीं है?” नहीं, वह उससे अधिक बुरा नहीं है जितना आकर्षक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए किया गया परिश्रम। तुम्हारी सहनशीलता स्वयं तुम्हारे साहस और आत्मबल का प्रमाण है। जब तुम कठिन कार्यों की ओर स्वयं को प्रेरित करते हुए कहते हो, “देर किस बात की? एक सच्चा पुरुष पसीने से नहीं डरता।”

    इसके अतिरिक्त, पूर्ण सद्गुण उस जीवन की समता और स्थिरता में निहित है जो सभी परिस्थितियों में स्वयं के साथ सामंजस्य बनाए रखता है। यह तब तक संभव नहीं जब तक मनुष्य को मानवीय तथा दैवीय विषयों का ज्ञान न हो और उनमें भेद करने की क्षमता न हो। यही सर्वोच्च कल्याण है। यदि तुम इसे प्राप्त कर लो तो तुम देवताओं के याचक नहीं बल्कि उनके सहचर बनने लगते हो।

    तुम पूछते हो, “मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?” तुम्हें न तो आल्प्स पर्वत को पार करना होगा, चाहे पेनाइन दर्रे से या ग्रेयन दर्रे से, न सिर्टियन उथले जलों में नौकायन करना होगा, न इलिरिया के दुर्गम पर्वतीय प्रदेशों को पार करना होगा और न ही उन जलडमरूमध्यों के निकट जाना होगा जहाँ स्किल्ला और कैरिब्डिस स्थित हैं। फिर भी तुम इन सब कठिनाइयों से केवल अपने उस तुच्छ प्रांतीय पद के लिए गुज़र चुके हो। नहीं, यह मार्ग सुरक्षित भी है और सुखद भी और ऐसा मार्ग है जिसके लिए प्रकृति ने तुम्हें पहले से ही सक्षम बनाया है। प्रकृति ने तुम्हें कुछ उपहार दिए हैं और यदि तुम उन्हें त्याग न दो तो तुम ऊपर उठकर देवता के समान हो जाओगे।

धन तुम्हें देवताओं के समान नहीं बना सकता क्योंकि ईश्वर के पास कोई संपत्ति नहीं होती। बैंगनी किनारी वाला वस्त्र भी तुम्हें ऐसा नहीं बना सकता क्योंकि ईश्वर वस्त्रहीन है। यश भी यह कार्य नहीं कर सकता न ही आत्म-प्रदर्शन और अपने नाम को दूर-दूर तक फैलाना क्योंकि किसी का भी ईश्वर से व्यक्तिगत परिचय नहीं है। बहुत-से लोग बिना किसी दंड के उसके बारे में बुरा सोचते हैं। न ही दासों का वह समूह जो नगर में और नगर के बाहर तुम्हारी पालकी उठाकर चलता है, तुम्हें धन्य बना सकता है क्योंकि सबसे महान और सबसे शक्तिशाली ईश्वर स्वयं ही सब कुछ वहन करता है। सौंदर्य और शारीरिक बल भी तुम्हें धन्यता प्रदान नहीं कर सकते क्योंकि इनमें से कोई भी वृद्धावस्था के आक्रमण को सहन नहीं कर पाता। इसलिए तुम्हें अपने प्रयास उस वस्तु के लिए करने चाहिए जो समय के साथ नष्ट नहीं होती और जिसे कोई बाधा रोक नहीं सकती। वह क्या है? वह है मन। परंतु ऐसा मन जो सीधा, महान और सद्गुणी हो। उसे तुम और क्या कहोगे, सिवाय इसके कि वह मानव शरीर में निवास करने वाला ईश्वर है?

    लेकिन तुम उस देवतुल्य स्वरूप को सोने या चाँदी से नहीं गढ़ सकते क्योंकि ऐसी सामग्रियों से ऐसी कोई प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती जो वास्तव में ईश्वर के समान हो। यह बात याद रखो कि जब देवता मनुष्यों पर प्रसन्न और अनुकूल थे, तब उनकी प्रतिमाएँ मिट्टी की हुआ करती थीं।


अभी के लिए विदा 

ऐसा मन किसी मुक्त दास या साधारण दास में भी उतना ही पाया जा सकता है जितना कि रोमन अश्वारोही वर्ग के किसी व्यक्ति में।

आख़िर रोमन अश्वारोही, मुक्त दास या दास क्या हैं?

ये तो केवल महत्वाकांक्षा या अन्याय से उत्पन्न नाम मात्र हैं।

मनुष्य चूल्हे के एक छोटे-से कोने से भी स्वर्ग तक पहुँच सकता है।

अतः उठो, और स्वयं को भी ऐसा रूप दो जो देवत्व के योग्य हो।

Saturday, 4 July 2026

आत्मावलोकन के संदर्भ में -- पत्र 29 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

"तुम हमारे मित्र मार्सेलिनस के बारे में पूछते हो और जानना चाहते हो कि वह कैसा है। वह अब कम ही मिलने आता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उसे सत्य सुनने का भय है। लेकिन इस समय उसे उससे कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सत्य केवल उसी व्यक्ति से कहना चाहिए जो उसे सुनने के लिए तैयार हो।"


Rembrandt van Rjin

    इसी कारण लोग अक्सर डायोजनीज़ और अन्य सिनिक दार्शनिकों के बारे में संदेह व्यक्त करते हैं, जो वाणी की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग करते थे। वे जिस किसी से भी मिलते, उसे उपदेश देते थे। क्या वे ऐसा करने में सही थे? यदि वे लोग, जिन्हें डाँटा-फटकारा जा रहा था, बहरे और गूँगे होते—चाहे जन्म से या किसी रोग के कारण—तो क्या होता? तुम कहते हो, “शब्दों में कंजूसी क्यों की जाए? उनका कोई मूल्य तो नहीं है। मैं यह नहीं जान सकता कि जिसे मैं समझा रहा हूँ, उसकी सहायता कर पाऊँगा या नहीं। लेकिन यदि मैं बहुतों को समझाऊँ तो निश्चित ही किसी-न-किसी की सहायता कर दूँगा। मुझे तो बीज को व्यापक रूप से बिखेर देना चाहिए। यदि बहुत-से प्रयास किए जाएँ तो उनमें से कुछ न कुछ अवश्य सफल होंगे।” लेकिन, प्रिय ल्यूसीलियस, मुझे नहीं लगता कि किसी महान व्यक्ति को ऐसा करना चाहिए। इससे उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव कम हो जाता है। यदि वह अपने शब्दों को बहुत अधिक सामान्य बना दे तो उन्हीं लोगों के बीच उनका पर्याप्त महत्व नहीं रह जाता जिन्हें वह वास्तव में सुधार सकता था। एक धनुर्धर को कभी लक्ष्य भेदना और कभी चूकना नहीं चाहिए। जो कुछ संयोगवश परिणाम देता है, वह कोई कला नहीं है। बुद्धिमत्ता एक कला है। उसे निश्चित सफलता की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो उससे लाभ उठा सकें और उन लोगों से दूर रहना चाहिए जिनके लिए अब कोई आशा नहीं बची है। फिर भी, उन्हें बहुत जल्दी नहीं छोड़ देना चाहिए। निराशाजनक परिस्थितियाँ असाधारण उपायों की माँग करती हैं।

    लेकिन मैं अभी तक अपने मार्सेलिनस के विषय में निराश नहीं हुआ हूँ। उसे अभी भी बचाया जा सकता है, परंतु केवल तभी जब तुरंत उसकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाया जाए। वास्तव में यह भी खतरा है कि वह अपने उद्धारक को ही अपने साथ नीचे खींच ले क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत प्रबल है। पर इस समय उसका झुकाव बुराई की ओर है। फिर भी, मैं इस जोखिम का सामना करने जाऊँगा। मैं उसे उसकी त्रुटियाँ दिखाने का साहस करूँगा। वह वही करेगा जो वह प्रायः करता है। वह हर बात को ऐसे मज़ाक में उड़ा देगा कि शोकग्रस्त व्यक्ति भी हँस पड़े। पहले वह स्वयं का उपहास करेगा और फिर मेरा। मैं जो कुछ कहने वाला हूँ, वह उसकी हर बात को टालने का प्रयत्न करेगा। वह हमारे दर्शन-सम्प्रदाय की छानबीन करेगा और हमारे दार्शनिकों पर आरोप लगाने के लिए आपत्तियाँ खोज निकालेगा—कहीं धन-लाभ, कहीं प्रेमिकाएँ, कहीं पेटूपन। वह मुझे एक दार्शनिक दिखाएगा जो व्यभिचार में पकड़ा गया हो, दूसरे को किसी भोजनालय में और तीसरे को राजमहल में।

    वह मुझे मार्कस लेपिडस के दार्शनिक सलाहकार एरिस्टो का उदाहरण देगा, जो अपनी पालकी में यात्रा करते हुए ही व्याख्यान दिया करते थे, क्योंकि वे उस समय का उपयोग अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए तैयार करने में करते थे। जब किसी ने पूछा कि वह किस दार्शनिक विद्यालय से संबंधित हैं तो स्कौरस ने मज़ाक में कहा, “निश्चित रूप से वह पेरिपैटेटिक नहीं हैं!” जब उस प्रतिष्ठित पुरुष जूलियस ग्रेकिनुस से उनके बारे में राय पूछी गई तो उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता। मुझे तो यह भी नहीं पता कि वह पैदल चलकर क्या करते हैं।” मानो उनसे किसी रथ-चालक के बारे में पूछा गया हो!

    वे सभी ढोंगी लोग, जो दर्शन का व्यापार करते हैं और जिनके लिए दर्शन को हाथ न लगाना ही अधिक सम्मानजनक होता, मार्सेलिनस मेरे विरुद्ध उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगा। लेकिन मैंने उसके उपहास को सहने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे मुझे हँसी में उड़ाने का प्रयास करे। संभव है कि मैं उसे रुला दूँ। और यदि वह हँसता ही रहे तो भी मैं अपने दुःखों के बीच यह सोचकर प्रसन्न होऊँगा कि उस पर पागलपन का कम-से-कम एक प्रसन्नचित्त रूप तो आया है। किन्तु ऐसी प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं टिकती। ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो लोग अभी उन्मत्त होकर हँस रहे होते हैं, थोड़ी ही देर बाद वही लोग उन्मत्त होकर विलाप भी कर रहे होते हैं।

    मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं उसके पास जाऊँगा और उसे दिखाऊँगा कि जब बहुत-से लोग उसे कम मूल्य का समझते थे, तब भी वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान था। भले ही मैं उसके दोषों को पूरी तरह काट न सकूँ, कम-से-कम उनके बढ़ने को रोक दूँगा। वे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, लेकिन कुछ समय के लिए शांत अवश्य हो जाएँगे। और संभव है कि वे सचमुच समाप्त ही हो जाएँ, यदि यह विराम एक आदत बन जाए। इसे तुच्छ नहीं समझना चाहिए। वास्तव में, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो तो रोग का अच्छा विराम भी स्वास्थ्य के समान ही माना जाता है।

    जब तक मैं उसके लिए तैयारी कर रहा हूँ, तब तक तुम्हारे लिए ये मेरे निर्देश हैं। तुममें क्षमता है। तुम समझते हो कि तुम कहाँ रहे हो और अब कहाँ हो और इससे यह भी अनुमान लगा सकते हो कि तुम किस दिशा में जा रहे हो। अपने आचरण को व्यवस्थित करो। अपने मनोबल को ऊँचा उठाओ। भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु के सामने दृढ़ता से खड़े रहो। उन लोगों की परवाह मत करो जो तुम्हें डराने का प्रयास करते हैं। यदि कोई व्यक्ति उस स्थान पर भीड़ से डरता हो जहाँ एक समय में केवल एक ही व्यक्ति निकल सकता है तो वह कितना मूर्ख दिखाई देगा, है न? तुम्हारी मृत्यु के विषय में भी यही बात लागू होती है। यद्यपि बहुत-से लोग तुम्हें मृत्यु की धमकी दे सकते हैं पर वे सब एक साथ तुम्हारे पास नहीं पहुँच सकते। प्रकृति ने इस व्यवस्था को इसी प्रकार बनाया है। एक ही व्यक्ति तुमसे प्राण छीन लेगा, ठीक वैसे ही जैसे एक ही व्यक्ति ने तुम्हें प्राण दिए थे।

    यदि तुममें कुछ भी लज्जा होती तो तुम मुझे इस अंतिम भुगतान से मुक्त कर देते। लेकिन चूँकि मेरा ऋण अब लगभग समाप्त होने को है, इसलिए मैं कंजूसी नहीं करूँगा—नहीं, मैं भी नहीं! जो कुछ तुम पर मेरा बकाया है, उसे चुका दूँगा। मैंने कभी भी जनसाधारण को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं की क्योंकि वे मेरे ज्ञान को स्वीकार नहीं करते और मुझे उस बात का कोई ज्ञान नहीं है जिसे वे स्वीकार करते हैं।

    “यह किसने कहा?” तुम पूछते हो, मानो तुम्हें यह न मालूम हो कि मैं अपनी पूँजी कहाँ से लाता हूँ। यह एपिक्यूरस ने कहा था। लेकिन पेरिपैटेटिक, अकादमिक, स्टोइक और सिनिक—सभी दार्शनिक सम्प्रदायों के लोग एक स्वर में तुम्हें यही बात कहेंगे। आख़िर ऐसा कौन-सा व्यक्ति है जो सद्गुण को प्रिय मानता हो और साथ ही जनसाधारण का प्रिय भी हो? लोक-प्रशंसा तो दुष्कर्मों में निपुणता के द्वारा प्राप्त की जाती है। तुम्हें स्वयं को उनके जैसा बनाना पड़ता है। जब तक वे तुम्हें अपने जैसा न पहचान लें, वे तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे। किन्तु महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम दूसरों को कैसे दिखाई देते हो बल्कि यह है कि तुम स्वयं को कैसे देखते हो। जब लोग निकृष्ट हों, तब उनकी प्रेम-प्राप्ति किसी ऐसे उपाय से नहीं की जा सकती जो स्वयं निकृष्ट न हो।

    तो फिर दर्शन से तुम्हें क्या लाभ मिलेगा जबकि उसका इतना सम्मान किया जाता है और वह सभी कलाओं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों से कहीं श्रेष्ठ है? बस यही कि तुम लोगों को प्रसन्न करने की अपेक्षा स्वयं को प्रसन्न करना अधिक पसंद करोगे, कि तुम अपने बारे में किए जाने वाले निर्णयों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता की चिंता करोगे, कि तुम देवताओं और मनुष्यों—दोनों के भय से मुक्त होकर जीवन बिताओगे और यह कि तुम या तो अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करोगे अथवा उनका अंत कर दोगे। इसके विपरीत, यदि मैं तुम्हें सामान्य भीड़ द्वारा अत्यधिक सराहा जाता देखूँ, यदि तुम्हारे आने पर वैसे ही शोर और तालियाँ गूँजें जैसी मूकाभिनय के प्रदर्शनों में गूँजती हैं, यदि नगर भर में स्त्रियाँ और बालक तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते फिरें तो मुझे तुम पर दया आएगी। और क्यों न आए? क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए तुमने कौन-सा मार्ग अपनाया है।

अभी के लिए विदा 

अपने दोषों को पहचानकर उपचार करने के संदर्भ में -- पत्र - 28 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा केवल तुम्हारे साथ ही हुआ है? क्या तुम्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि इतने व्यापक भ्रमण के बाद, इतने विविध स्थानों पर जाने के बाद भी, तुम अपने मन की उदासी और बोझिलता को दूर नहीं कर पाए? मानो यह कोई नई बात हो! तुम्हें स्थान नहीं, अपने मन को बदलना चाहिए। चाहे तुम समुद्र पार कर लो, चाहे — जैसा हमारे कवि वर्जिल ने कहा है, “भूमियाँ और नगर पीछे छूटते चले जाएँ”, फिर भी तुम्हारे दोष और कमज़ोरियाँ तुम्हारे साथ-साथ चलती रहेंगी, जहाँ कहीं भी तुम जाओगे।


By Adolph Tidemand 

    तुम्हारी ही तरह शिकायत करने वाले एक व्यक्ति से सुकरात (Socrates) ने कहा था, “तुम्हें यह देखकर आश्चर्य क्यों होता है कि यात्रा से तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ जबकि तुम स्वयं अपनी ही संगति में यात्रा कर रहे हो? जो चीज़ तुम्हारे मन पर बोझ बनी हुई है, वही तुम्हें घर से बाहर भी ले गई थी।” नए देशों से तुम्हें क्या लाभ होगा? नगरों और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किस काम आएगा? अंततः तुम्हारी यह सारी भागदौड़ व्यर्थ सिद्ध होगी। क्या तुम पूछते हो कि तुम्हारा यह पलायन क्यों निष्फल है? इसका कारण यह है कि तुम स्वयं को अपने साथ लिए फिरते हो।

    तुम्हें अपने मन पर पड़े हुए बोझ को उतार फेंकना होगा। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे तब तक कोई भी स्थान तुम्हें सुखद नहीं लगेगा। समझो कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति वैसी ही है जैसी वर्जिल (Virgil) ने सिबिल (भविष्यवक्ता स्त्री) के बारे में वर्णित की है। उस समय जब वह व्याकुल और उन्मत्त हो उठती है क्योंकि उसके भीतर एक विशाल शक्ति निवास कर रही होती है जो उसकी अपनी नहीं है, “वह भविष्यवक्ता उछलती है, तड़पती है और अपने हृदय से उस देवता को बाहर झटक देने का प्रयास करती है।” तुम भी उसी प्रकार भीतर से अशांत हो। तुम्हारा मन अनेक चिंताओं, इच्छाओं और व्याकुलताओं से भरा हुआ है। उनसे मुक्त हुए बिना न तो तुम्हें शांति मिलेगी न किसी स्थान में संतोष।

    तुम इधर-उधर भटकते फिरते हो, अपने ऊपर पड़े बोझ को झटककर उतार फेंकने की कोशिश में। परंतु जितना अधिक तुम भागते-दौड़ते हो, वह बोझ उतना ही अधिक भारी और कष्टदायक हो जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी जहाज़ का माल। यदि वह ठीक प्रकार से रखा गया हो तो जहाज़ पर उसका बहुत कम प्रभाव पड़ता है। लेकिन यदि वह इधर-उधर खिसकने लगे तो शीघ्र ही जहाज़ का एक भाग नीचे झुकने लगता है और वह संकट में पड़ जाता है। इसी प्रकार, तुम जो कुछ भी करते हो, वह अंततः तुम्हारे ही विरुद्ध काम करता है। तुम्हारी हर गतिविधि तुम्हें ही हानि पहुँचाती है क्योंकि तुम एक ऐसे व्यक्ति को झकझोर रहे हो जो पहले से ही बीमार है।

    लेकिन जब तुम्हारे भीतर जो कुछ विकृत और अशांत है, वह दूर हो जाएगा, तब हर स्थान-परिवर्तन तुम्हें सुखद लगने लगेगा। यदि तुम्हें पृथ्वी के सबसे दूरस्थ कोनों में भी निर्वासित कर दिया जाए तब भी तुम जिस किसी बर्बर या अपरिचित प्रदेश में पहुँचोगे, उसे अपने लिए एक आतिथ्यपूर्ण आश्रय के रूप में पाओगे। तुम कहाँ जाते हो, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि जाते समय तुम स्वयं कैसे व्यक्ति हो। इसी कारण हमें अपने मन को किसी एक स्थान से बाँधकर नहीं रखना चाहिए। हमें इस विश्वास के साथ जीना चाहिए, “मेरा जन्म केवल किसी एक स्थान के लिए नहीं हुआ है। यह समस्त संसार ही मेरी मातृभूमि है।” यदि यह बात तुम्हारे लिए स्पष्ट होती तो तुम्हें यह देखकर आश्चर्य न होता कि हर बार किसी स्थान से ऊब जाने पर दूसरे प्रदेश में जाने से भी तुम्हें कोई लाभ नहीं मिलता। यदि तुम सचमुच यह मानते कि प्रत्येक प्रदेश तुम्हारा अपना है तो जिस पहले स्थान पर तुम थे, उसी में संतुष्ट हो गए होते।

    वास्तव में, तुम यात्रा कम और भटकाव अधिक कर रहे हो। तुम एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जा रहे हो। फिर उसे छोड़कर किसी और स्थान पर पहुँच जाते हो। लेकिन जिस वस्तु की तुम खोज कर रहे हो अर्थात् अच्छा जीवन जीने की कला, वह तो हर स्थान पर प्राप्त की जा सकती है। क्या किसी नगर का बाज़ार (फोरम) जितना शोरगुल वाला कोई और स्थान हो सकता है? फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वहाँ भी शांतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है। फिर भी, यदि मुझे अपनी इच्छा से रहने का स्थान चुनने की स्वतंत्रता हो तो मैं उस मोहल्ले से भी दूर रहना पसंद करूँगा जहाँ से बाज़ार दिखाई देता हो। क्योंकि जिस प्रकार कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो सबसे सुदृढ़ और स्वस्थ शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, उसी प्रकार कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जो उस मन के लिए अनुकूल नहीं होते जो अच्छा तो है पर अभी शक्ति प्राप्त कर रहा है और पूर्णता तक नहीं पहुँचा है। अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि अच्छा जीवन केवल स्थान बदलने से नहीं मिलता। फिर भी वह ऐसे वातावरण का चयन करता है जो उसके चरित्र, आत्मसंयम और आंतरिक विकास के लिए सहायक हो। जो मन अभी साधना के मार्ग पर है, उसे अनावश्यक विकर्षणों और प्रलोभनों से बचाना भी आवश्यक है।

    मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो स्वयं को लहरों के बीच झोंक देते हैं, जो कोलाहल और हलचल भरे जीवन को उचित मानते हैं और प्रतिदिन कठिन परिस्थितियों से जूझने को ही आदर्श समझते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों को सहन तो कर लेगा पर उन्हें स्वयं नहीं चुनेगा। वह संघर्ष और युद्ध जैसी जीवन-स्थिति के बजाय शांत और स्थिर जीवन को प्राथमिकता देगा। यदि तुमने अपने स्वयं के दोषों से छुटकारा पा लिया है तो फिर दूसरों के दोषों से लगातार लड़ते रहने में बहुत लाभ नहीं है। कोई कह सकता है, “तीस अत्याचारियों ने सुकरात (Socrates) को गिरफ्तार कर लिया था। फिर भी वे उसके मनोबल को तोड़ नहीं सके।” तो इससे क्या अंतर पड़ता है कि मालिक या उत्पीड़क कितने हैं? दासता तो अंततः एक ही चीज़ है। जो व्यक्ति उस एक चीज़, दासता को तुच्छ समझना सीख लेता है, वह स्वतंत्र है, चाहे उसके चारों ओर अत्याचार करने वालों की कितनी ही बड़ी भीड़ क्यों न खड़ी हो।

    अब विदा लेने का समय आ गया है। लेकिन पहले मुझे अपना बंदरगाह-कर चुका देना चाहिए, “अपने दोषों की पहचान ही उपचार का प्रारंभ है।” मुझे लगता है कि यहाँ एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही है। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह गलत कर रहा है, वह स्वयं को सुधारने की इच्छा भी नहीं रखता। अपने को सुधारने से पहले तुम्हें अपनी गलती का एहसास होना चाहिए। कुछ लोग तो अपने दोषों पर गर्व करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोगों के मन में उपचार का कोई विचार होगा? निश्चय ही नहीं क्योंकि वे अपनी बुरी आदतों को ही गुण समझते हैं।

    अपने विरुद्ध यथासंभव कठोर आरोप लगाओ। फिर जाँच-पड़ताल करो। पहले अभियोग लगाने वाले की भूमिका निभाओ, फिर न्यायाधीश की, और अंत में पक्ष-वकील की। कभी-कभी स्वयं को दोषी ठहराओ!

अभी के लिए विदा 

मन की उत्कृष्टता के संदर्भ में -- पत्र - 27 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

“तुम कहते हो, ‘तुम मुझे उपदेश कैसे दे सकते हो? क्या तुमने पहले स्वयं को उपदेश दे लिया है? क्या तुमने अपने जीवन को पूरी तरह व्यवस्थित कर लिया है? क्या इसी कारण तुम्हारे पास दूसरों को सुधारने का समय है?’ मैं इतना पाखंडी नहीं हूँ कि स्वयं बीमार रहते हुए दूसरों को उपचार बताऊँ। नहीं, मैं भी मानो उसी रोगियों के वार्ड में पड़ा हूँ, जहाँ तुम हो। मैं तुमसे हमारी साझा बीमारी के बारे में बात कर रहा हूँ और उन उपायों को बाँट रहा हूँ जो हम दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए मेरी बात ऐसे सुनो जैसे मैं स्वयं से बात कर रहा हूँ। मैं तुम्हें अपने निजी कक्ष में आने दे रहा हूँ और तुम्हारे सामने खड़े रहते हुए स्वयं को ही निर्देश दे रहा हूँ।”


Art by Suza 

    मैं स्वयं से स्पष्ट और ऊँचे स्वर में कहता हूँ, “अपने बीते वर्षों की गिनती करो और तब तुम्हें लज्जा होगी कि आज भी तुम्हारी इच्छाएँ और संकल्प वही हैं जो बचपन में थे। अपने जीवन के अंतिम दिन के निकट आते समय स्वयं को यह उपहार दो कि तुम्हारे दोष तुमसे पहले ही मर जाएँ। उन उथल-पुथल मचाने वाली इच्छाओं को त्याग दो, जिन्होंने तुम्हें इतनी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया है। वे न केवल पहले से हानि पहुँचाती हैं बल्कि बाद में भी कष्ट देती हैं। जिस प्रकार अपराध किए जाने के बाद, भले ही वे पकड़े न जाएँ, उनका भय और चिंता मन से नहीं जाती, उसी प्रकार अनुचित इच्छाओं के समाप्त हो जाने पर भी उनका पश्चाताप बना रहता है। वे न तो स्थायी हैं, न विश्वसनीय। यदि वे कोई प्रत्यक्ष हानि न भी पहुँचाएँ तब भी वे क्षणभंगुर हैं।

    इसके बजाय चारों ओर देखो और ऐसे कल्याण की खोज करो जो बना रहे। ऐसा कोई कल्याण नहीं है, सिवाय उसके जिसे मन स्वयं अपने भीतर से खोज निकालता है। केवल सद्गुण ही स्थायी और निर्विघ्न आनंद प्रदान करता है। यदि कभी उस आनंद के मार्ग में कोई बाधा आ भी जाए तो वह केवल उतनी ही देर के लिए होती है जितनी देर बादल दिन के प्रकाश को ढँकते हैं, वे उसके नीचे से गुजर जाते हैं पर कभी उसे पराजित नहीं कर पाते।” तुम्हें वह आनंद कब प्राप्त होगा? अब तक तुम निष्क्रिय नहीं रहे हो पर अब अपनी गति बढ़ाओ। अभी बहुत काम शेष है। यदि तुम परिणाम चाहते हो तो आवश्यक ध्यान और परिश्रम तुम्हें स्वयं ही करना होगा। यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे किसी दूसरे को सौंपा जा सके।

    साहित्यिक कार्य का एक ऐसा प्रकार भी है जिसमें दूसरों की सहायता ली जा सकती है। मेरी स्मृति में एक व्यक्ति था जिसका नाम कैल्विसियस सबिनुस था। वह अत्यंत धनवान था पर उसका स्वभाव किसी मुक्तदास (पूर्व दास) जैसा था। मैंने कभी इतना अशिष्ट और भद्दे आचरण वाला व्यक्ति इतनी बड़ी संपत्ति का स्वामी नहीं देखा।

    उसकी स्मरणशक्ति इतनी कमजोर थी कि कभी वह यूलिसीस का नाम भूल जाता, कभी अकिलीस का तो कभी प्रियम का। इन व्यक्तियों को वह उतना ही जानता था जितना हम अपने बचपन से साथ रहे सेवकों को जानते हैं। वृद्ध नाम-घोषक (नॉमेनक्लेटर) जब किसी का नाम याद नहीं रख पाता तो वह कोई नाम गढ़ लेता है। पर जितने गलत नामों से कैल्विसियस ट्रोजनों और आखैयनों को पुकारता था, उतनी गलतियाँ शायद ही किसी ने की हों। फिर भी वह विद्वान दिखाई देना चाहता था। इसलिए उसने एक उपाय निकाला। उसने बहुत धन खर्च करके दास खरीद लिए। उनमें से एक को होमर का संपूर्ण काव्य कंठस्थ था, दूसरे को हेसियड का और नौ अन्य दासों को अलग-अलग गीतिकवियों की रचनाएँ याद कराई गई थीं। इस पर भारी खर्च होना स्वाभाविक था क्योंकि जो दास इस योग्य नहीं मिलते थे, उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित करवाया जाता था।

    जब उसने यह पूरा दल एकत्र कर लिया तो वह अपने भोज-मेहमानों को परेशान करने लगा। वे दास उसके पैरों के पास खड़े रहते थे। वह उनसे उद्धृत करने के लिए पंक्तियाँ पूछता रहता था। फिर भी, जबकि वे हर समय उसकी सहायता के लिए मौजूद रहते थे, वह अक्सर किसी वाक्य के बीच में ही रुक जाता और आगे नहीं बढ़ पाता।

    सैटेलियस क्वाड्राटुस नाम का एक व्यक्ति था। वह धनी और मूर्ख लोगों का लाभ उठाया करता था। वह उनकी खुशामद भी करता था। जैसा कि अक्सर ऐसे लोगों के साथ होता है, उनका उपहास भी उड़ाता था। उसी ने सबिनुस को यह विश्वास दिला दिया कि उसके भोजन परोसने वाले सेवक भी साहित्य के विद्वान होने चाहिए। जब सबिनुस ने कहा कि ऐसे दासों पर उसे प्रति व्यक्ति एक लाख सेस्टर्सेस खर्च करने पड़े हैं तो सैटेलियस ने उत्तर दिया, “इतने धन में तो तुम कई पुस्तकालय खरीद सकते थे।” लेकिन सबिनुस का मानना था कि उसके घर के किसी भी सदस्य के पास जो ज्ञान है, वह मानो उसका अपना ही ज्ञान है। फिर उसी सैटेलियस ने उसे कुश्ती सीखने के लिए भी प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जबकि सबिनुस शारीरिक रूप से दुर्बल, पीला और रोगग्रस्त था। जब सबिनुस ने कहा, “मैं यह कैसे कर सकता हूँ? मैं तो मुश्किल से जीवित हूँ।” सैटेलियस ने उत्तर दिया, “अरे, ऐसी बात मत कहो! क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि तुम्हारे पास कितने स्वस्थ और बलवान दास हैं?” मन की उत्कृष्टता न तो उधार ली जा सकती है और न खरीदी जा सकती है। मुझे तो लगता है कि यदि वह बिक्री के लिए उपलब्ध भी होती तब भी उसका कोई खरीदार न मिलता। लेकिन दुष्टता ऐसी चीज़ है जिसे लोग प्रतिदिन खरीदते रहते हैं।

    लेकिन पहले वह देन ले लो जो मैं तुम्हारा ऋणी हूँ और फिर विदा लो, “जो निर्धनता प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं के अनुसार स्वयं को ढाल लेती है, वही वास्तविक संपत्ति है।” एपिक्यूरस इस बात को अपने अनेक स्थानों पर बार-बार कहता है। परंतु किसी बात को तब तक बार-बार कहना अधिक नहीं कहलाता, जब तक वह भली-भाँति सीखी और आत्मसात न कर ली जाए। कुछ लोगों को केवल उपचार दिखा देना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके लिए उन उपचारों को बार-बार और दृढ़ता से मन में बैठाना पड़ता है।

Friday, 3 July 2026

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका हूँ। अब मेरी आयु और निश्चित रूप से मेरा शरीर, किसी दूसरे नाम के योग्य हैं। क्योंकि 'वृद्ध' शब्द उस आयु के लिए है जो बहुत आगे बढ़ चुकी हो न कि उस अवस्था के लिए जिसमें शरीर टूटने-बिखरने लगे। इसलिए मुझे उन जर्जर लोगों में गिनो जो जीवन के अंतिम छोर के बहुत निकट पहुँच चुके हैं।

जैक्स लुईस डेविड द्वारा 

    फिर भी, मैं तुम्हारी उपस्थिति में स्वयं को धन्यवाद देता हूँ कि जहाँ मुझे अपने शरीर में दुर्बलता का अनुभव होता है वहीं अपने मन में मुझे किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता। केवल मेरे दोष ही बूढ़े हुए हैं। मेरे वे हिस्से जो उन दोषों की सेवा करते हैं। मेरा मन अब भी स्फूर्तिवान है और इस बात से प्रसन्न है कि उसे मेरे शरीर के साथ बहुत कम काम करना पड़ता है। उसने अपने बोझ का बड़ा भाग उतार फेंका है। वह मानो उछल-कूद कर रहा है और बुढ़ापे के विषय में मुझसे वाद-विवाद करता है। उसका कहना है कि यही उसका उत्कर्षकाल है। आओ, उसकी बात पर विश्वास करें और उसे उसके स्वाभाविक एवं उचित लाभों का पूरा उपयोग करने दें।

    मेरा मन मुझसे कहता है कि मैं इस विषय पर विचार करूँ और यह समझूँ कि मेरी शांति तथा संयमित जीवन-शैली में कितना योगदान बुद्धि का है और कितना मेरी आयु का। साथ ही, मुझे सावधानी से यह भेद करना चाहिए कि कौन-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं कर नहीं सकता और कौन-सी ऐसी हैं जिन्हें मैं करना ही नहीं चाहता। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ऐसी बात हो जिसे न कर पाने पर मुझे प्रसन्नता होती है तो मैं उसे ऐसी चीज़ मानूँ जिसे मैं करना ही नहीं चाहता। शिकायत करने की आखिर क्या बात है? यदि वह सब, जिसका समाप्त होना आवश्यक था, वास्तव में समाप्त हो गया है तो इसमें समस्या ही क्या है?

    “यह तो बहुत बड़ी समस्या है,” तुम कहते हो, “कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे मुरझाए और नष्ट हो जाए और यदि ठीक-ठीक कहूँ तो पिघलता चला जाए। क्योंकि हम एक ही झटके में धराशायी नहीं होते; बल्कि हम थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हैं, क्योंकि हर दिन हमारी शक्ति का कुछ अंश छीन लेता है।” तो यदि हमारा स्वभाव इसी प्रकार धीरे-धीरे अपने अंत की ओर ढल रहा है तो क्या इससे बेहतर कोई मार्ग हो सकता है? ऐसा नहीं कि अचानक आघात से या जीवन से तत्काल विदा हो जाना कोई बुरी बात है किन्तु यह तो सबसे सहज मार्ग है, बस चुपचाप फिसलते हुए चले जाना।

    जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं स्वयं को ऐसे परखता हूँ मानो परीक्षा की घड़ी निकट आ रही हो, मानो वह दिन सामने खड़ा हो जो मेरे समस्त वर्षों का निर्णय करने वाला है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “अब तक मेरे शब्द और कर्म कुछ भी सिद्ध नहीं करते। वे तो साहस के केवल छोटे और भ्रामक प्रमाण हैं, जो बहुत-सी डींगों और खोखली बातों में लिपटे हुए हैं। मृत्यु ही मुझे बताएगी कि मैंने वास्तव में कितनी प्रगति की है।” इसीलिए मैं निडर होकर उस दिन की तैयारी करता हूँ जब सारे छल और सारे मुखौटे उतर जाएँगे और मैं स्वयं अपना न्याय करूँगा। क्या यह केवल साहसपूर्ण बातें हैं या मैं वास्तव में वही कहता हूँ जो सोचता हूँ? भाग्य के विरुद्ध जो चुनौतीपूर्ण शब्द मैंने कहे थे, क्या वे सचमुच वास्तविक थे या वे केवल रंगमंच का अभिनय थे—सिर्फ़ एक भूमिका निभाना?

    “दूसरों के आकलनों को दूर फेंक दो। वे हमेशा अविश्वसनीय और परस्पर विरोधी होते हैं। जीवनभर चलने वाले अध्ययन-कार्यक्रमों को भी छोड़ दो क्योंकि शीघ्र ही, अब किसी भी क्षण, मृत्यु तुम्हारा निर्णय करने वाली है। मेरा आशय यही है। व्याख्यान, विद्वत्-गोष्ठियाँ, दार्शनिकों की शिक्षाओं से चुने गए कथन और शिक्षित लोगों की बातचीत—ये सब मन की वास्तविक शक्ति को प्रकट नहीं करते। क्योंकि वाणी तो वहाँ भी निर्भीक होती है जहाँ बोलने वाला व्यक्ति अत्यन्त भयभीत होता है। तुमने वास्तव में क्या प्राप्त किया है, यह तभी प्रकट होगा जब तुम अपनी अंतिम साँस लोगे। मैं इस निर्णय को स्वीकार करता हूँ, उसके न्याय से मैं तनिक भी नहीं डरता।”

    ये बातें मैं अपने आप से कहता हूँ लेकिन मान लो कि मैंने इन्हें तुमसे भी कही हैं। तुम मुझसे युवा हो पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है? वर्षों का वितरण किसी निश्चित हिस्से या कोटे के अनुसार नहीं किया जाता। यह जानने का कोई उपाय नहीं कि मृत्यु किस मोड़ पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए तुम्हें हर मोड़ पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

    अच्छा, मैं यहीं रुकना चाहता था। मेरा हाथ पत्र समाप्त करने के लिए हस्ताक्षर करने ही वाला था। लेकिन मुझे हिसाब चुकता करना है और इस पत्र को उसकी यात्रा-व्यय राशि भी देनी है। मान लो कि मैं यह न बताऊँ कि मैं अपना ऋण कहाँ से ले रहा हूँ। तुम जानते ही हो कि मैं किसकी धन-पेटी का उपयोग करता हूँ। मुझे थोड़ा समय दो। भुगतान घर से आ जाएगा तब तक के लिए यह उधार एपिक्यूरियस देगा। वह कहता है, “मृत्यु का अभ्यास करो।” यदि इस विचार को अधिक पूर्ण रूप में बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए, “मृत्यु को भली-भाँति समझना और सीख लेना एक उत्कृष्ट बात है।”

    शायद तुम सोचते हो कि ऐसी चीज़ सीखना समय की बर्बादी है जिसका उपयोग तुम्हें केवल एक ही बार करना होगा। लेकिन यही तो कारण है कि हमें उसका अभ्यास करना चाहिए। यदि हम यह परख ही नहीं सकते कि हमने उसे सीखा है या नहीं, तो हमें उसे निरंतर सीखते रहना चाहिए। “मृत्यु का अभ्यास करो”, जो यह कहता है, वह वास्तव में हमें स्वतंत्रता का अभ्यास करने को कहता है। जिसने मृत्यु को सीख लिया, उसने दासता को भुला दिया। क्योंकि मृत्यु सभी शक्तियों से ऊपर है और निस्संदेह उन सबकी पहुँच से बाहर है। मृत्यु को कारागार, बेड़ियों या कैदखाने से क्या लेना-देना? उसका द्वार तो सदा खुला रहता है। केवल एक ही जंजीर है जो हमें बाँधे रखती है—जीवन के प्रति हमारा मोह। यह सच है कि हम उसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते। फिर भी हमें उसे कम अवश्य करना चाहिए ताकि जब परिस्थितियाँ हमसे कुछ माँगें तो कोई चीज़ हमें रोक न सके और न ही हमें उस कार्य को तुरंत करने के लिए तैयार होने से वंचित करे जिसे किसी न किसी दिन करना ही है।

Thursday, 2 July 2026

प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा काम उन लोगों से है जिनके बारे में तुमने लिखा है? तुम्हारा सबसे बड़ा काम तो स्वयं अपने साथ है। समस्या वास्तव में तुम ही हो। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। तुम सम्मानजनक और सदाचारी आचरण की प्रशंसा तो करते हो पर उसका अनुसरण कम करते हो। तुम यह देख लेते हो कि सुख कहाँ है लेकिन उसे पाने का साहस नहीं जुटा पाते। इसलिए, क्योंकि तुम्हें यह स्पष्ट समझ नहीं है कि तुम्हें आगे बढ़ने से क्या रोक रहा है, मैं तुम्हें बतलाऊँगा।

By Giulio Vittini 

    तुम यह मानते हो कि जिन चीज़ों को तुम पीछे छोड़ने वाले हो, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। और जब तुम उस शांति की ओर नज़रें टिकाते हो जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। तब भी तुम उस जीवन की चमक पर ठहर जाते हो जिसे तुम पीछे छोड़ रहे हो ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति कीचड़ और अँधेरे में उतरने वाला हो। तुम भूल कर रहे हो, लूसीलियस! इस जीवन से उस जीवन की ओर जाना नीचे उतरना नहीं बल्कि ऊपर उठना है। तुम जानते हो कि आभा (glow) और झलकती चमक (gleam) में क्या अंतर है। एक अपने स्वयं के निश्चित स्रोत से प्रकाश देती है जबकि दूसरी किसी और से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करती है। इसी प्रकार इस जीवन और उस जीवन में भी अंतर है। यह जीवन ऐसी चमक से प्रकाशित है जो इसके बाहर से आती है। इसलिए जो भी उसके और प्रकाश के बीच आ जाए, वह इसे गहरे अँधेरे में डुबो सकता है। परन्तु वह जीवन अपने ही प्रकाश और तेज से आलोकित है। उसकी ज्योति उसकी अपनी है।

    तुम्हारा अध्ययन तुम्हें प्रसिद्ध बनाएगा। इस विषय में मैं एपिक्यूरस का एक उदाहरण प्रस्तुत करूँगा। जब वह इडोमिनीअस (Idomeneus) को पत्र लिख रहा था और उसे बाहरी आडंबर तथा दिखावटी जीवन से हटाकर विश्वसनीय और स्थायी यश की ओर लौटने के लिए बुला रहा था (यद्यपि उस समय इडोमेनेउस एक शक्तिशाली राजा का सहायक था और बड़े-बड़े कार्यों का भार संभाल रहा था), तब उसने कहा,  “यदि यश तुम्हारे लिए महत्त्व रखता है तो मेरे पत्र तुम्हें उन सभी बातों से अधिक प्रसिद्ध बनाएँगे जिनमें तुम इस समय लगे हुए हो और जिनके कारण दूसरे लोग तुम्हारी ओर आकर्षित होते हैं।”

    क्या वह सत्य नहीं कह रहा था? यदि एपिक्यूरस ने इडोमिनीअस को पत्र न लिखे होते तो उसके बारे में कौन जानता? वे सभी शक्तिशाली शासक और क्षत्रप, यहाँ तक कि वह राजा भी जिसने इडोमिनीअस को उसका पद प्रदान किया था, आज गुमनामी की गहराइयों में दफन हो चुके हैं। सिसरो के पत्र ही हैं जो एटिकस के नाम को नष्ट होने से बचाए हुए हैं। उससे उसे कोई लाभ न होता कि एग्रीप्पा ने उसकी पुत्री से विवाह किया था और टाइबेरियस ने उसकी पौत्री से या कि ड्रूसस सीज़र उसका प्रपौत्र था। इतने महान नामों के बीच उसका अपना नाम अब नहीं लिया जाता, यदि सिसरो ने उसे अपने पत्रों का प्राप्तकर्ता न बनाया होता। समय की वह खाई जो हम सबको अपने भीतर समेट लेगी, अत्यन्त गहरी है। कुछ ही प्रतिभाशाली मस्तिष्क उसके ऊपर अपना सिर उठा पाते हैं और यद्यपि अंततः उन्हें भी मौन में विलीन होना पड़ता है। फिर भी वे लंबे समय तक विस्मृति का प्रतिरोध करते हैं और अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करते रहते हैं।

    जो वचन एपिक्यूरस अपने मित्र को दे सका था, वही वचन मैं तुम्हें देता हूँ, लूसीलियस। मैं आने वाली पीढ़ियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करूँगा और अपने साथ दूसरों के नाम भी ले जा सकूँगा ताकि वे भी स्थायी रूप से बने रहें। हमारे कवि वर्जिल ने दो व्यक्तियों को चिरस्थायी स्मरण का वचन दिया था और वास्तव में उन्हें प्रदान भी किया:

“हे सौभाग्यशाली युगल! यदि मेरी कविताओं में कुछ सामर्थ्य है... 
तो कोई भी आने वाला दिन तुम्हें युगों की स्मृति से कभी मिटा नहीं सकेगा। 
जब तक एनीअस की संतति अटल कैपिटोल की चट्टान पर निवास करती रहेगी, 
और जब तक रोमन जाति का अधिपति शासन करता रहेगा,
तब तक तुम्हारा स्मरण भी बना रहेगा।”

    जिन लोगों को भाग्य ने घटनाओं और सत्ता के केंद्र में पहुँचा दिया है, जो दूसरों की शक्ति के सहभागी और भागीदार रहे हैं, उन्हें बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उनके यहाँ आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती है। परन्तु यह सब तब तक ही रहता है जब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। जैसे ही वे चले जाते हैं, उनका स्मरण भी समाप्त हो जाता है। किन्तु प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व का सम्मान समय के साथ बढ़ता जाता है। और यह सम्मान केवल स्वयं उन रचनाकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उन सभी बातों तक फैल जाता है जो उनकी स्मृति से जुड़ी होती हैं।
    
    अब मैं इडोमिनीअस को अपने पत्र में यूँ ही निःशुल्क स्थान नहीं दूँगा! उसे इसका मूल्य स्वयं चुकाना होगा। उसी को एपिक्यूरस ने वह सुंदर वचन लिखकर भेजा था जिसमें उसने उसे पायथोक्लीज़ को एक असाधारण और निस्संदिग्ध ढंग से समृद्ध बनाने की प्रेरणा दी थी। वह कहता है:

“यदि तुम पायथोक्लीज़ को धनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके धन में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए।”

    यह कथन इतना स्पष्ट है कि उसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं और इतना सुंदर ढंग से कहा गया है कि उसमें किसी सुधार की भी आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि इसे केवल धन-संपत्ति के संदर्भ में मत समझो। जहाँ कहीं भी इसे लागू किया जाएगा, इसका अर्थ वही रहेगा। यदि तुम पायथोक्लीज़ को सम्माननीय बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके सम्मान और पुरस्कारों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ निरंतर आनंद का अनुभव करे तो तुम्हें उसके सुखों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ एक लंबा और पूर्ण जीवन जिए तो तुम्हें उसके वर्षों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। तुम्हें इन कथनों को केवल एपिक्यूरस की संपत्ति नहीं समझना चाहिए; ये तो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। मेरा विचार है कि दार्शनिकों को सीनेट की प्रथा अपनानी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा मत प्रस्तुत करता है जिसका कुछ भाग मुझे पसंद आता है तो मैं उससे उसके मत को विभाजित करने के लिए कहता हूँ। फिर मैं उस भाग का अनुसरण करता हूँ जिसे मैं स्वीकार करता हूँ।

    एपिक्यूरस के ये उत्कृष्ट कथन एक और उद्देश्य भी पूरा करते हैं। यही कारण है कि मैं उनका उल्लेख करने के लिए और भी अधिक इच्छुक हूँ। वे उन लोगों को भी प्रमाणित करते हैं, जो निकृष्ट उद्देश्यों से उसकी शरण लेते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ उन्हें अपने दोषों के लिए आड़ मिल जाएगी कि वे जहाँ कहीं भी जाएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक और सदाचारपूर्ण जीवन ही जीना चाहिए। जब तुम एपिक्यूरस के उद्यानों में पहुँचोगे और वहाँ यह लिखित वचन देखोगे:

    “हे अतिथि, यहाँ तुम्हारा उत्तम सत्कार होगा; यहाँ सुख को सर्वोच्च कल्याण माना जाता है।”

    तब उस गृह का संरक्षक तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार मिलेगा। वह आतिथ्य और सद्भाव के साथ तुम्हें दलिये की एक थाली और पानी का एक भरपूर पात्र परोसेगा और कहेगा, “क्या यह उत्तम आतिथ्य नहीं है?” वह कहेगा, “ये उद्यान भूख को भड़काते नहीं बल्कि उसे शांत करते हैं। ये ऐसे पेय नहीं देते जो पीने वाले को और अधिक प्यासा बना दें बल्कि प्यास को उसके स्वाभाविक उपचार से बुझाते हैं, जो बिना किसी मूल्य के उपलब्ध है। यही वह सुख है जिसमें मैंने अपना जीवन बिताया है और इसी में वृद्धावस्था तक पहुँचा हूँ।”

    मैं अभी तुमसे उन इच्छाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें केवल समझाने-बुझाने से शांत नहीं किया जा सकता बल्कि जिन्हें समाप्त करने के लिए कुछ वास्तविक वस्तु देनी पड़ती है। जहाँ तक उन अनावश्यक इच्छाओं का संबंध है जिन्हें टाला जा सकता है, डाँटकर रोका जा सकता है या दबाया जा सकता है। मैं तुम्हें केवल इतना स्मरण दिलाता हूँ कि ऐसा सुख प्राकृतिक तो है पर आवश्यक नहीं। तुम उस पर किसी प्रकार के ऋणी नहीं हो जो कुछ भी तुम उसे देते हो, वह स्वेच्छा से देते हो। पेट उपदेश नहीं सुनता। वह केवल अपनी माँग करता है और आग्रह करता है। फिर भी वह कोई कठिन लेनदार नहीं है। उसे बहुत थोड़े में टाला जा सकता है। यदि तुम उसे उतना ही दो जितना उसका अधिकार है न कि उतना जितना तुम दे सकते हो।

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Wednesday, 1 July 2026

दर्शन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 20 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस

यदि तुम अच्छी प्रगति कर रहे हो और स्वयं को इस योग्य समझते हो कि एक दिन अपने ही स्वामी बन सको तो मुझे प्रसन्नता है। क्योंकि यदि मैं तुम्हें उस स्थिति से बाहर निकाल सकूँ, जहाँ तुम इस समय बिना किसी आशा के निकलने का मार्ग खोजते हुए भटक रहे हो तो यह मेरे लिए भी गौरव की बात होगी। लेकिन मैं तुमसे यह चाहता हूँ, प्रिय लूसीलियस... और इसी के लिए तुम्हें प्रेरित करता हूँ। दर्शन को अपने हृदय की गहराइयों तक उतरने दो और अपनी प्रगति की परीक्षा अपने भाषणों या लेखन से नहीं बल्कि अपने मन की दृढ़ता और अपनी इच्छाओं में आई कमी से करो। अपने कर्मों द्वारा अपने शब्दों को सत्य सिद्ध करो।




    जो लोग श्रोताओं की सहमति प्राप्त करना चाहते हैं, उनका उद्देश्य कुछ और होता है। आज के वे वक्ता जो केवल ऐसे युवकों के मनोरंजन के लिए लंबे और विविध प्रकार के प्रलाप प्रस्तुत करते हैं जिनके पास करने के लिए कोई सार्थक काम नहीं है, उनका उद्देश्य भी कुछ और होता है। दर्शन हमें बोलना नहीं बल्कि कर्म करना सिखाता है। उसकी अपेक्षा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति उसी आदर्श के अनुसार जीवन जिए जिसे उसने स्वयं अपने लिए निर्धारित किया है। उसका जीवन न तो स्वयं अपने भीतर विरोध में हो और न ही उसके कथनों से भिन्न हो। उसके सभी कार्यों में एक ही स्वर और एक ही संगति हो। यही बुद्धिमत्ता का मुख्य कार्य है। यही उसका सर्वोत्तम प्रमाण भी है कि कर्म शब्दों के अनुरूप हों। व्यक्ति हर स्थान पर एक-सा बना रहे। वह स्वयं के अनुरूप हो। "क्या ऐसा कोई व्यक्ति है?" बहुत अधिक नहीं लेकिन कुछ अवश्य हैं। यह वास्तव में कठिन है। मेरा यह आशय भी नहीं है कि बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा एक जैसे कदम उठाता है बल्कि केवल इतना है कि वह एक ही मार्ग पर चलता है।

    इसलिए स्वयं का परीक्षण करो। क्या तुम्हारा पहनावा तुम्हारे घर-परिवार की स्थिति से मेल नहीं खाता? क्या तुम अपने ऊपर तो उदारतापूर्वक खर्च करते हो लेकिन अपने परिवार के प्रति कंजूसी बरतते हो? क्या तुम भोजन में सादगी दिखाते हो लेकिन भवन-निर्माण और निर्माण-कार्य पर अत्यधिक खर्च करते हो? एक बार और हमेशा के लिए जीवन जीने का कोई एक नियम अपनाओ और अपने पूरे जीवन को उसके अनुरूप बना लो। कुछ लोग घर में तो अत्यधिक मितव्ययिता दिखाते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं और ठाठ-बाट से रहते हैं। यह असंगति एक दोष है। यह इस बात का संकेत है कि मन अभी भी डगमगा रहा है और उसने अभी तक अपने वास्तविक स्वभाव को दृढ़ता से नहीं अपनाया है।

    इसके अतिरिक्त, मैं तुम्हें बताऊँगा कि यह असंगति, यह कर्म और अभिप्राय के बीच का अंतर, कहाँ से उत्पन्न होता है। कोई भी व्यक्ति इस बात पर स्थिर होकर विचार नहीं करता कि वह वास्तव में क्या चाहता है. यदि करता भी है तो उस पर दृढ़ नहीं रहता। बल्कि उससे हट जाता है। वह केवल अपने आचरण में परिवर्तन ही नहीं करता बल्कि पीछे की ओर लौट जाता है और फिर वही व्यवहार अपनाने लगता है, जिसे वह त्याग देने की शपथ ले चुका था। इसलिए मैं बुद्धिमत्ता की पुरानी परिभाषाओं को एक ओर रखकर तुम्हें ऐसी परिभाषा दूँगा जो सम्पूर्ण मानवीय जीवन-पद्धति को समेट ले। यह परिभाषा मुझे संतोषजनक लगती है। बुद्धिमत्ता क्या है? सदैव एक ही चीज़ की इच्छा करना और सदैव एक ही चीज़ को अस्वीकार करना। इसमें यह शर्त जोड़ने की भी आवश्यकता नहीं कि जिसकी इच्छा की जाए वह उचित हो क्योंकि केवल उचित और सही वस्तु के प्रति ही मनुष्य की इच्छा निरंतर और एकरूप बनी रह सकती है।

    इसी कारण लोग यह नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, सिवाय उस क्षण के जब उनकी इच्छा जागृत होती है। किसी ने भी अपने जीवन के लिए समग्र रूप से यह निर्णय नहीं किया है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए। उनका निर्णय प्रतिदिन बदलता रहता है और अक्सर अपने ही विपरीत रूप में परिवर्तित हो जाता है। बहुत से लोग जीवन ऐसे जीते हैं मानो वह कोई खेल हो। इसलिए जिस मार्ग पर तुम चलना प्रारम्भ कर चुके हो, उसी पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहो। सम्भव है कि वह तुम्हें शिखर तक पहुँचा दे। यदि वहाँ तक न भी पहुँचा सके तो कम-से-कम तुम्हें ऐसे स्थान तक अवश्य ले जाएगा जहाँ तुम स्वयं जान सकोगे कि यह अभी शिखर नहीं है।

    तुम कहते हो, “यदि परिवार की आय समाप्त हो गई, तो मेरे आश्रितों और अनुयायियों के उस समूह का क्या होगा?” जब तुम उस समूह का पालन-पोषण करना बंद कर दोगे तो वह स्वयं अपना पालन करने लगेगा। और यदि ऐसा न हुआ तो निर्धनता तुम्हें वह बात सिखा देगी जिसे तुम स्वयं को नहीं सिखा पा रहे हो। तुम्हारे सच्चे और वास्तविक मित्र तब भी तुम्हारे साथ बने रहेंगे, जबकि जो लोग तुमसे नहीं बल्कि किसी और लाभ से जुड़े हुए थे, वे तुम्हें छोड़कर चले जाएँगे। यदि किसी और कारण से नहीं तो क्या केवल इसी कारण निर्धनता से प्रेम नहीं किया जाना चाहिए? वह तुम्हें दिखा देगी कि तुम्हारे मित्र वास्तव में कौन हैं। आह! वह दिन कब आएगा जब कोई व्यक्ति तुम्हारे पद, अधिकार या प्रतिष्ठा के कारण तुमसे झूठ नहीं बोलेगा!

    इसलिए अपनी अन्य सभी प्रार्थनाएँ ईश्वर के हाथों में छोड़ दो और अपने विचारों, अपनी चिंताओं तथा अपनी इच्छाओं को केवल इसी एक बात पर केंद्रित करो। अपने आप से संतुष्ट रहने पर और उन शुभ वस्तुओं से संतुष्ट रहने पर जो तुम्हारे अपने भीतर से उत्पन्न होती हैं। इससे अधिक निकट और कौन-सी समृद्धि हो सकती है? स्वयं को उस छोटी-सी संपदा तक सीमित कर लो जिसे भाग्य या संयोग तुमसे छीन नहीं सकता।

    और ताकि तुम्हारे लिए ऐसा करना अधिक सरल हो जाए। इस पत्र के साथ भेजी जाने वाली भेंट भी उसी विषय का उल्लेख करेगी। मैं उसे तुरंत प्रस्तुत करता हूँ। यद्यपि तुम शिकायत कर सकते हो फिर भी मैं अपनी यह देनदारी प्रसन्नतापूर्वक चुकाऊँगा और वह भी एपिक्यूरस के माध्यम से:

“मुझ पर विश्वास करो, तुम्हारी वाणी एक साधारण बिछौने पर और जर्जर वस्त्रों में कहीं अधिक प्रभावशाली होगी। तब तुम केवल बोल ही नहीं रहे होगे। तुम अपने कथनों का प्रमाण भी दे रहे होगे।”

    हमारे मित्र दिमित्रीयस (Demetrius) के शब्दों को मैं निश्चित ही एक भिन्न ढंग से सुनता हूँ, जब मैंने यह देखा कि वह किस प्रकार सोते थे। न केवल गद्दे के बिना बल्कि कंबल के बिना भी। वह केवल सत्य का उपदेश नहीं देते, वे उसके साक्षी भी बनते हैं।

    “यह क्या? क्या कोई व्यक्ति धन को अपनी जेब में रखते हुए भी उसका तिरस्कार नहीं कर सकता?” क्यों नहीं? उस व्यक्ति में भी महान आत्मबल होता है जो अपने चारों ओर धन का अंबार लगा हुआ देखता है और इस आश्चर्य पर खुलकर हँस पड़ता है कि यह सब उसके पास कैसे आ गया। दूसरे लोग उसे बताते हैं कि यह धन उसका है। स्वयं उसे तो मानो इसका पूरा एहसास भी नहीं होता। वैभव के बीच रहते हुए भी उससे भ्रष्ट न होना एक महान बात है। वह व्यक्ति महान है जो अपनी संपत्ति के बीच रहते हुए भी मन से निर्धन बना रहता है।

    तुम कहते हो, “मैं नहीं जानता कि ऐसा व्यक्ति यदि निर्धनता में आ जाए तो उसे किस प्रकार सहन करेगा।” मैं भी नहीं जानता, एपिक्यूरस, कि तुम्हारा वह निर्धनता का गर्व करने वाला व्यक्ति यदि धन-संपत्ति प्राप्त कर ले तो क्या वह तब भी धन का उसी प्रकार उपहास करेगा। इसलिए हमें दोनों के मन का परीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या एक व्यक्ति अपनी निर्धनता में प्रसन्न है। क्या दूसरा अपनी संपन्नता में आसक्त हुए बिना रह सकता है। अन्यथा केवल खाट पर सोना और फटे-पुराने वस्त्र पहनना अच्छे चरित्र का बहुत बड़ा प्रमाण नहीं है। यदि यह स्पष्ट न हो कि व्यक्ति उन्हें विवशता से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से स्वीकार कर रहा है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि कोई व्यक्ति उन साधारण वस्तुओं से ऐसे नहीं भागता मानो उनसे बेहतर कुछ और हो बल्कि स्वयं को पहले से ही उनके लिए तैयार रखता है और उन्हें सहन करना सरल समझता है। वास्तव में, लूसीलियस, यह सरल ही नहीं है जब कोई पहले से इसका अभ्यास कर लेता है तो यह सुखद भी हो जाता है क्योंकि ऐसे जीवन में एक ऐसी वस्तु होती है जिसके बिना कोई भी दूसरी वस्तु आनंददायक नहीं हो सकती और वह है मन की शांति।

    इसलिए मुझे लगता है कि वह करना सचमुच आवश्यक है जिसकी मैंने तुम्हें अपने पत्र में सलाह दी थी और जिसे महान व्यक्तियों ने अनेक बार किया है। कुछ दिन ऐसे निर्धारित करो जिनमें हम जान-बूझकर निर्धनता का अभ्यास करें और स्वयं को वास्तविक विपत्ति के लिए तैयार करें। हमें यह और भी अधिक करना चाहिए क्योंकि हम विलासिताओं में डूबे हुए हैं और हर चीज़ को कठोर तथा कठिन समझने लगे हैं। बेहतर है कि मन को उसकी नींद से जगाया जाए। उसे झकझोरा जाए और उसे याद दिलाया जाए कि हमारी प्रकृति को वास्तव में कितनी कम चीज़ों की आवश्यकता होती है। कोई भी मनुष्य धनी पैदा नहीं होता। जो भी इस संसार में जन्म लेता है, उसे केवल दूध और थोड़े-से वस्त्र में संतुष्ट रहने का आदेश मिलता है। हम ऐसी ही शुरुआत से आते हैं और फिर भी अब हमारे लिए पूरे-के-पूरे राज्य भी पर्याप्त नहीं रह गए हैं!

अभी के लिए विदा 

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर)

भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर आज किसी भी स्पेनी स्कूली बच्चे से अपेक्षा की जाती है कि वह डोना मारिया , मार्केसा दे मोंतेमायोर के बारे ...