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Monday, 3 August 2026

जीवन और परिस्थितियों के बारे में -- पत्र - 105 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारी समझ-बूझ और विवेक कहाँ चले गए? तुम्हारे चरित्र की दृढ़ता का क्या हुआ? क्या तुम इतनी तुच्छ-सी बात से व्याकुल हो रहे हो? तुम्हारे दासों ने देखा कि तुम व्यस्त हो। उन्होंने इसे भाग निकलने का अवसर समझ लिया। यदि तुम्हें धोखा देने वाले तुम्हारे मित्र होते... चलो, प्रचलित किन्तु गलत शब्द का ही प्रयोग कर लें ताकि उनके मित्रोचित व्यवहार न करने का दोष और भी अधिक स्पष्ट हो तो निश्चय ही तुम्हारे सारे कामों की हानि होती। परंतु इस स्थिति में तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ा। तुमने केवल ऐसे लोगों को खोया है जो तुम्हारी अच्छी सेवा नहीं करते थे और जो तुम्हें एक कठिन स्वामी समझते थे। 



    इस घटना में न तो कुछ असाधारण है और न ही अप्रत्याशित। ऐसी बातों पर व्यथित होना उतना ही हास्यास्पद है जितना स्नानागार में पानी के छींटे पड़ने, भीड़ में धक्का लग जाने या कीचड़ भरे मार्ग पर कपड़े मैले हो जाने की शिकायत करना। जीवन भी हम पर वही परिस्थितियाँ लादता है जिनका सामना हम स्नानागार, भीड़ या यात्रा के दौरान करते हैं। कुछ बातें जान-बूझकर किए गए आघात होंगी। कुछ केवल संयोगवश घटित होंगी। जीवन फूलों की सेज नहीं है। तुम एक लंबी यात्रा पर निकले हो। इस मार्ग में तुम्हारा ठोकर खाना, किसी से टकरा जाना, गिर पड़ना, थक जाना और यह कह उठना... “अब मैं मर जाना चाहता हूँ”, अनिवार्य है। हालाँकि यह केवल एक क्षणिक उद्गार होगा। किसी स्थान पर तुम किसी साथी को पीछे छोड़ दोगे, किसी दूसरे स्थान पर किसी का अंतिम संस्कार करोगे और कहीं किसी अन्य के कारण भयभीत हो जाओगे। इसी प्रकार की घटनाओं से भरे इस ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर तुम्हें आगे बढ़ना होगा। 

    यदि कोई सचमुच मरना चाहता है तो उसे अपने को उन सभी बातों के लिए तैयार कर लेना चाहिए जो आगे आने वाली हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि वह उस स्थान पर आ पहुँचा है जहाँ गर्जन सुनाई देता है, जहाँ-,विलाप और प्रतिशोधी चिंताओं ने अपना निवास बना रखा है।  जहाँ भयंकर रोग और कठोर वृद्धावस्था निवास करते हैं।

    इन्हीं लोगों के बीच तुम्हें अपना जीवन बिताना है। तुम इन बातों से बच नहीं सकते, पर उनसे ऊपर अवश्य उठ सकते हो; और यदि तुम बार-बार उन पर विचार करोगे तथा भविष्य में आने वाली बातों का पहले से अनुमान लगाते रहोगे, तो ऐसा करने में सफल हो जाओगे। 

    जिस परिस्थिति के लिए मनुष्य लंबे समय से स्वयं को तैयार करता रहा हो, उसका सामना वह अधिक धैर्य के साथ करता है। जिन कष्टों की पहले से अपेक्षा की गई हो, उन्हें भी सहा जा सकता है। इसके विपरीत, जो लोग तैयार नहीं होते, वे अत्यंत तुच्छ बातों से भी भयभीत हो जाते हैं। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमने किसी भी संभावना की उपेक्षा न की हो। क्योंकि प्रत्येक नई बात अधिक गंभीर प्रतीत होती है। इसलिए निरंतर चिंतन यह सुनिश्चित करेगा कि तुम किसी भी संकट का सामना एक नए सैनिक की तरह न करो। 

    “मेरे दास मुझे छोड़कर भाग गए।” हाँ, और किसी दूसरे व्यक्ति के दासों ने उससे चोरी की है, उस पर अपराध का आरोप लगाया है, उसकी हत्या की है, उसके साथ विश्वासघात किया है, उसे पैरों तले रौंदा है, उसे विष देकर या झूठे अभियोग लगाकर नष्ट करने का प्रयास किया है। जिन बातों को तुम अपने दुखों की सूची मानते हो, उनका अनुभव बहुत-से लोग कर चुके हैं। बहुत-से लोग आगे भी करेंगे। अनेक प्रकार के अस्त्र हमारी ओर लक्षित हैं। उनमें से कुछ पहले ही हमें घायल कर चुके हैं। कुछ हमारी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और शीघ्र ही हम तक पहुँचने वाले हैं। कुछ, जो किसी और के लिए छोड़े गए थे, हमें केवल छूते हुए निकल जाते हैं। जिन बातों का सामना करने के लिए हमारा जन्म हुआ है, उनसे हमें कभी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। किसी को भी उनकी शिकायत नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे सभी मनुष्यों के लिए समान हैं। मेरा आशय यह है कि वे समान हैं क्योंकि जिन कष्टों से कुछ लोग बच जाते हैं, वे भी ऐसे कष्ट हैं जिन्हें वे भोग सकते थे। कोई नियम तभी न्यायसंगत होता है जब वह सब पर समान रूप से लागू होता है, न कि केवल तब जब उसका अनुभव सबको हो। अपने मन को न्यायप्रिय बनाओ। अपनी नश्वरता का जो कर हमें चुकाना है, उसे बिना शिकायत चुकाएँ।

    शीत ऋतु शीत लेकर आती है। हमें ठिठुरना पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु फिर उष्णता लेकर आती है। हमें पसीना बहाना पड़ता है। मौसम की अनियमितता हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हमें बीमार पड़ना पड़ता है। कहीं हमारा सामना हिंसक पशुओं से होगा तो कहीं ऐसे मनुष्यों से, जो किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होते हैं। हमें जल से भी हानि पहुँचेगी और अग्नि से भी। हम इस व्यवस्था को बदल नहीं सकते। हम केवल इतना कर सकते हैं कि एक सज्जन पुरुष के योग्य दृढ़ चरित्र धारण करें ताकि जीवन की आकस्मिक घटनाओं को साहसपूर्वक सह सकें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखें। प्रकृति इस दृश्य जगत का संचालन परिवर्तन के माध्यम से करती है। बादलों से घिरे आकाश के बाद निर्मल आकाश आता है। शांत समुद्र के बाद वह उथल-पुथल से भर उठता है। वायु बारी-बारी से चलती है। रात्रि के बाद दिन आता है। आकाश का एक भाग उदित होता है और दूसरा अस्त हो जाता है। इन्हीं परस्पर विरोधी परिवर्तनों के कारण संसार का अस्तित्व बना रहता है। हमें अपने मन को इसी नियम के अनुरूप ढालना चाहिए। उसका अनुसरण करना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। जो कुछ भी घटित हो, हमें यह समझना चाहिए कि उसका घटित होना आवश्यक था। प्रकृति को दोष देने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। जिसे सुधारा नहीं जा सकता, उसे धैर्यपूर्वक सहना ही सर्वोत्तम है। जो दैवी सत्ता समस्त घटनाओं के क्रम का संचालन करती है, उसके साथ बिना शिकायत चलना चाहिए। जो सैनिक अपने सेनापति के पीछे चलते हुए कुड़कुड़ाता है, वह अच्छा सैनिक नहीं होता।

    अतः आओ, हम अपने भाग में आए आदेशों को निरंतर उत्साह और दृढ़ता के साथ स्वीकार करें। इस अत्यंत सुंदर विश्व द्वारा निर्धारित मार्ग को न छोड़ें क्योंकि हमारे भविष्य के समस्त अनुभव उसी के साथ गुंथे हुए हैं। आओ, इस विराट जगत के संचालक ज्यूपिटर को हमारे अपने क्लेआन्थेस के उन उत्कृष्ट पदों में संबोधित करें, जिन्हें मैं वाग्मिता के आचार्य सिसेरो के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अनुवाद करने का साहस कर रहा हूँ। यदि ये तुम्हें पसंद आएँ तो उनका श्रेय मुझे देना। यदि पसंद न आएँ, तो समझ लेना कि मैंने केवल सिसेरो का अनुकरण किया है—

हे पिता, उच्च आकाश के स्वामी,
जहाँ भी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा मार्गदर्शन करो। 
मैं तत्पर हूँ और शीघ्र ही आज्ञा का पालन करूँगा।

यदि मैं अनिच्छुक होकर भी कराहूँ,
तो भी मुझे जाना ही होगा,
जो कार्य मैं सद्गुणी होता तो अपनी इच्छा से करता,
उसी को अब मुझे विवश होकर दुःख सहते हुए करना पड़ेगा।

भाग्य इच्छुक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है,
और अनिच्छुक को घसीटकर ले जाता है।

    हमें इसी प्रकार जीना और इसी प्रकार बोलना चाहिए कि भाग्य हमें सदैव तैयार और तत्पर पाए। यही वह दृढ़ चरित्र है जिसने स्वयं को भाग्य के प्रति समर्पित कर दिया है। इसके विपरीत वह दुर्बल और पतित मनुष्य है, जो संघर्ष करता रहता है, विश्व-व्यवस्था के प्रति बुरा विचार रखता है और स्वयं को सुधारने के बजाय देवताओं को सुधारना अधिक उचित समझता है।


अभी के लिए विदा 

क्या शुभ है के बारे में -- पत्र - 104 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारे पत्रों का उत्तर देने में मुझे जो कुछ विलंब हुआ है, उसका कारण अत्यधिक व्यस्तता नहीं है। इस बहाने पर विश्वास मत करना। मेरे पास पर्याप्त समय है। जो भी समय चाहता है, उसके पास भी पर्याप्त समय होता है। किसी के पीछे काम नहीं पड़ा रहता बल्कि लोग स्वयं काम के पीछे भागते हैं और व्यस्त रहने को अपनी समृद्धि का प्रमाण समझते हैं। तो फिर ऐसी कौन-सी बात थी जिसने मुझे तुरंत तुम्हें उत्तर लिखने से रोक दिया? इसका कारण यह था कि तुम्हारा प्रश्न मेरे व्यापक कार्य का एक भाग है। जैसा कि तुम जानते हो, मेरा उद्देश्य नीतिशास्त्र पर एक विस्तृत ग्रंथ तैयार करना है, जिसमें उससे संबंधित सभी प्रश्नों का क्रमबद्ध और विस्तारपूर्वक विवेचन हो। इसलिए मैं यह सोच रहा था कि क्या तुम्हें तब तक प्रतीक्षा करने के लिए कहूँ, जब तक उस विषय का क्रम न आ जाए या फिर निर्धारित क्रम को छोड़कर पहले ही तुम्हें अपना निर्णय बता दूँ। किन्तु चूँकि तुम्हारा प्रश्न बहुत दूर से मेरे पास पहुँचा है इसलिए मैंने उचित नहीं समझा कि तुम्हें और अधिक प्रतीक्षा कराऊँ। अतः मैं इस विषय को उसके निर्धारित क्रम से अलग करके प्रस्तुत करूँगा। तुम्हारे माँगे बिना भी उससे संबंधित अन्य आवश्यक बातें तुम्हें लिख भेजूँगा।


 

    क्या तुम सोच रहे हो कि वे कौन-सी बातें होंगी? वे ऐसी बातें हैं जिन्हें जानना उपयोगी होने की अपेक्षा अधिक रुचिकर होता है जैसे तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर, क्या ‘शुभ’ एक भौतिक वस्तु है?

    कोई शुभ वस्तु, जहाँ तक वह हित पहुँचाती है, क्रिया करती है और जो क्रिया करता है, वह भौतिक होता है।शुभ वस्तु मन पर प्रभाव डालती है और एक प्रकार से उसे आकार देती तथा उसका गठन करती है। आकार देना तथा गठन करना भौतिक वस्तु के ही गुण हैं। शरीर के शुभ भौतिक हैं। इसलिए, चूँकि मन भी भौतिक है, मन के शुभ भी भौतिक हैं। चूँकि मनुष्य स्वयं भौतिक है इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो वस्तुएँ मनुष्य का पोषण करती हैं तथा उसके स्वास्थ्य को बनाए रखती या पुनः स्थापित करती हैं, वे भौतिक हैं; अतः मनुष्य का शुभ भी भौतिक है।

    मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस बात में कोई संदेह होगा कि भावनाएँ भी भौतिक होती हैं, जैसे क्रोध, प्रेम और शोक (तुम्हारे प्रश्न से बाहर की एक बात का उल्लेख करूँ तो) क्योंकि निश्चय ही तुम यह स्वीकार करते हो कि वे हमारे चेहरे की अभिव्यक्ति बदल देती हैं, हमारे माथे पर बल डाल देती हैं, हमारे मुख को शिथिल कर देती हैं, लज्जा से चेहरा लाल कर देती हैं या उसे पीला पड़ जाने देती हैं। तो क्या तुम यह समझते हो कि शरीर पर इतने स्पष्ट चिह्न किसी अभौतिक वस्तु द्वारा अंकित किए जा सकते हैं?

यदि भावनाएँ भौतिक हैं, तो मन की दुर्बलताएँ भी, जैसे लोभ, क्रूरता और वे दोष जो गहरे जड़ पकड़ चुके हैं और असाध्य बन गए हैं, भौतिक ही हैं। इसलिए दुर्गुण भी भौतिक है। उसके सभी रूप जैसे, दुष्टता, ईर्ष्या और अहंकार भी भौतिक हैं। अतः सद्गुण भी भौतिक हैं। पहला कारण यह है कि वे इन दुर्गुणों के विपरीत हैं। दूसरा यह कि वे भी तुम्हें उसी प्रकार के संकेत प्रदान करते हैं। तुम किसी मनुष्य की आँखों में साहस से उत्पन्न तेज, विवेक से उत्पन्न एकाग्रता, मर्यादा से उत्पन्न संयम और शांति, प्रसन्नता से उत्पन्न संतुलन, कठोरता से उत्पन्न दृढ़ता तथा कोमल स्वभाव से उत्पन्न सहजता को देख सकते हो। जो वस्तुएँ शरीर के रंग और रूप में परिवर्तन लाती हैं, वे स्वयं भौतिक होती हैं क्योंकि वे शरीरों पर ही अपना प्रभाव डालती हैं। जिन सभी सद्गुणों का मैंने उल्लेख किया है, वे शुभ हैं। उनके आधार पर जो कुछ भी है, वह भी शुभ है।

    निश्चय ही तुम्हें इसमें कोई संदेह नहीं होगा कि जो कुछ स्पर्श कर सकता है या जिसका स्पर्श किया जा सकता है। वह भौतिक है जैसा कि लुक्रेतियस कहता है, “भौतिक वस्तु के अतिरिक्त न तो कोई किसी को स्पर्श कर सकता है और न ही स्वयं स्पर्श किया जा सकता है।”

    जिन बातों का मैंने उल्लेख किया है, उनमें से कोई भी शरीर को स्पर्श किए बिना उसमें परिवर्तन उत्पन्न नहीं कर सकती। इसलिए वे सब भौतिक हैं। 

    इसके अतिरिक्त, जो भी वस्तु आगे बढ़ाने, बाध्य करने, रोकने या संयमित करने की शक्ति रखती है, वह भौतिक होती है। तो फिर क्या भय हमें नहीं रोकता? क्या साहसिकता हमें आगे नहीं बढ़ाती और वीरता हमें प्रेरित नहीं करती? क्या संयम हमें नियंत्रित नहीं करता और हमें वापस नहीं बुलाता? क्या प्रसन्नता हमें ऊँचा नहीं उठाती और शोक हमें नीचे नहीं गिरा देता? 

    संक्षेप में, हम जो कुछ भी करते हैं, वह या तो सद्गुण के आदेश पर करते हैं या दुर्गुण के आदेश पर। जो वस्तु शरीर को आदेश देती है, वह भौतिक होती है जैसे, जो वस्तु शरीर पर बल का प्रयोग करती है, वह भी भौतिक होती है। शरीर का शुभ भौतिक है। मनुष्य का शुभ भी शरीर का ही शुभ है। इसलिए मनुष्य का शुभ भी भौतिक है। 

    अब जबकि मैंने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे दिया है तो अब मुझे उस आपत्ति का पहले ही उत्तर दे देना चाहिए जिसे मैं तुम्हारे मन में उठते हुए देख रहा हूँ, “हम तो यहाँ मानो चौपड़ खेल रहे हैं।” हम अपने मन को तुच्छ बातों में व्यर्थ लगा रहे हैं। ऐसी बातों में जो मनुष्य को अच्छा बनने के बजाय केवल चतुर बनाती हैं। बुद्धिमान बनना इससे कहीं अधिक स्पष्ट बल्कि कहना चाहिए कहीं अधिक सरल बात है। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक पांडित्यपूर्ण अध्ययन की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी हम दर्शन को भी उसी प्रकार तुच्छ बातों में नष्ट कर रहे हैं, जैसे अपनी अन्य संपत्तियों को नष्ट करते हैं। अध्ययन में भी, अन्य सभी बातों की तरह, हम अति के दोष से ग्रस्त हैं। हम जीवन के लिए नहीं बल्कि विद्यालय के लिए सीख रहे हैं।


अभी के लिए विदा 

सुरक्षित जीवन जीने के उपाय के बारे में -- पत्र - 103 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें बताऊँगा कि अधिक सुरक्षित जीवन जीने के लिए तुम्हें किन बातों से सावधान रहना चाहिए। परंतु इन उपदेशों को उसी प्रकार समझना, जैसे मैं तुम्हें आर्देआ (दलदली क्षेत्रों के कारण स्वास्थ्य के लिए चुनौतियों भरा क्षेत्र) प्रदेश में स्वस्थ रहने के उपाय बता रहा हूँ। अपने मन को उन कारणों पर केंद्रित करो जो एक मनुष्य को दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए प्रेरित करते हैं। तुम्हें पाँच कारण मिलेंगे— आशा, ईर्ष्या, घृणा, भय और अनादर। 



    इन सबमें सबसे कम महत्त्वपूर्ण अनादर है, यहाँ तक कि बहुत-से लोग इसे एक प्रकार का उपाय मान लेते हैं। निश्चय ही तिरस्कृत होना पीड़ादायक है। पर उसकी पीड़ा अधिक समय तक नहीं रहती। यह प्रायः बिना सोचे-समझे और आकस्मिक रूप से किया जाता है। युद्ध में भी कोई उस शत्रु पर प्रहार नहीं करता जो पहले ही गिर चुका हो। प्रहार उसी पर किया जाता है जो अब भी खड़ा है। जहाँ तक दुष्ट लोगों की आशाओं का प्रश्न है, उनसे तुम तभी बच सकते हो जब तुम्हारे पास ऐसा कुछ न हो जो उन्हें उस वस्तु की लालसा करने के लिए उकसाए जो उनकी नहीं है। तुम्हारे पास ऐसी कोई वस्तु भी न हो जो सबसे अलग दिखाई देती हो। यदि कोई वस्तु लोगों की दृष्टि में आ जाए और दुर्लभ हो तो वे छोटी-सी वस्तु के लिए भी लालायित हो उठते हैं। ईर्ष्या से तुम तब बचोगे जब स्वयं को लोगों के ध्यान का केंद्र नहीं बनाओगे, अपनी संपत्ति का प्रदर्शन नहीं करोगे और एकांत में संतोषपूर्वक जीवन जीना सीखोगे। घृणा या तो किसी को ठेस पहुँचाने से उत्पन्न होती है, जिससे तुम किसी को उकसाए बिना बच सकते हो या फिर वह बिना किसी कारण के भी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा सौम्य और विनम्र स्वभाव ही तुम्हारी रक्षा करेगा। बहुत-से लोगों ने इस संकट का सामना किया है। यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी रहे हैं जिन्हें कभी कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं मिला, फिर भी उन्हें लोगों की घृणा सहनी पड़ी। 

    यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे भयभीत न हों, तो तुम्हें संयमित जीवन और कोमल स्वभाव अपनाना चाहिए। लोगों को यह ज्ञात होने दो कि वे बिना किसी भय के तुम्हें अप्रसन्न कर सकते हैं। यह भी सुनिश्चित करो कि उनके लिए तुमसे फिर से मेल-मिलाप करना सरल हो। भय का कारण बनना घर में उतना ही कष्टदायक है जितना सार्वजनिक जीवन में, चाहे तुमसे, तुम्हारे दास भय खाते हों या स्वतंत्र व्यक्ति। प्रत्येक मनुष्य में तुम्हें हानि पहुँचाने की पर्याप्त शक्ति होती है। फिर जो लोग दूसरों में भय उत्पन्न करते हैं, वे स्वयं भी भयग्रस्त रहते हैं। कोई भी व्यक्ति दूसरों को भयभीत करके स्वयं चिंता से मुक्त नहीं रह सका है। अब केवल तिरस्कार शेष रह जाता है। उसे सीमित रखना प्रत्येक मनुष्य के अपने अधिकार में है। यदि वह उसे स्वयं अपनी इच्छा से स्वीकार करे, न कि इसलिए कि वह वास्तव में उसका अधिकारी है। विद्या और संस्कृति का अध्ययन उसकी कटुता को कम कर देता है। इसी प्रकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति के निकट रहने वालों से संबंध रखना भी सहायक होता है। ऐसे लोगों से परिचय रखना तुम्हारे लिए उपयोगी होगा। पर उनसे अत्यधिक घनिष्ठता मत बढ़ाना। कहीं ऐसा न हो कि उपचार ही रोग से अधिक कष्टदायक सिद्ध हो।

    सामान्य रूप से तुम्हारे लिए सबसे अधिक लाभदायक यही होगा कि तुम शांत रहो, दूसरों से बहुत कम बात करो। पर अपने आप से बहुत अधिक संवाद करो। बातचीत में एक सूक्ष्म और मोहक आकर्षण होता है। जैसे मदिरापान या यौन-संबंध मनुष्य से उसके रहस्य उगलवा लेते हैं, वैसे ही बातचीत भी उसके गुप्त भेद प्रकट करा देती है। जो कुछ कोई सुन लेता है, उसे अपने तक सीमित नहीं रखता। न वह केवल उतना ही बताता है जितना उसने सुना था। न ही वह किसी घटना का वर्णन उसके स्रोत का उल्लेख किए बिना करता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई-न-कोई ऐसा होता है, जिसे वह वही सब सौंप देता है जो स्वयं उसे सौंपा गया था। यदि वह अपनी वाचालता पर संयम भी रखे तथा केवल एक ही व्यक्ति तक बात सीमित रखे, तब भी वह एक से अनेक श्रोताओं को जन्म दे देता है। इस प्रकार जो बात अभी थोड़ी देर पहले तक एक रहस्य थी, वही शीघ्र ही जन-चर्चा का विषय बन जाती है।

    सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार यह है कि मनुष्य किसी के साथ अन्याय न करे। जिन लोगों में आत्मसंयम का अभाव होता है, उनका जीवन सदा व्याकुल और अशांत रहता है। उनका भय उनके दुष्कर्मों के अनुपात में ही होता है। उन्हें कभी विश्राम नहीं मिलता। दुष्कर्म करने के बाद उनका मन उद्विग्न रहता है और वे किसी दूसरे कार्य में मन नहीं लगा पाते। उनका अंतःकरण उन्हें आगे बढ़ने नहीं देता बल्कि बार-बार उन्हें स्वयं के सामने खड़ा कर देता है। जो व्यक्ति दंड की अपेक्षा करता है, वह वास्तव में दंड भोग ही रहा होता है। जो दंड का अधिकारी है, वह निरंतर उसी की आशंका करता रहता है। दोषपूर्ण अंतःकरण के साथ सुरक्षा तो संभव है पर मानसिक शांति नहीं। अपराधी यह सोचता रहता है कि वह पकड़ा जा सकता है, चाहे वास्तव में वह पकड़ा न भी गया हो। उसकी नींद अशांत रहती है। जब भी वह किसी दूसरे के अपराध की चर्चा करता है, उसका ध्यान अपने ही अपराध की ओर चला जाता है। उसे लगता है कि उसका अपराध न तो पर्याप्त रूप से छिपा है और न ही पूरी तरह ढका हुआ है। अपराधी को कभी-कभी छिपे रहने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इस बात का निश्चिंत विश्वास कभी नहीं मिल सकता कि वह सचमुच छिपा हुआ है।


अभी के लिए विराम 

Sunday, 2 August 2026

जीवन को भविष्य पर आश्रित न रहने देने के बारे में -- पत्र - 99 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


हर दिन और हर क्षण हमें यह दिखा देता है कि हम कितने तुच्छ और क्षणभंगुर हैं। प्रत्येक नया अनुभव किसी न किसी नए प्रमाण के साथ हमें हमारी विस्मृत नश्वरता का स्मरण कराता है। समय का निरंतर प्रवाह हमें मृत्यु के विषय में सोचने के लिए विवश कर देता है, ठीक उसी समय जब हमारा मन अनंतता पर विचार कर रहा होता है। 


 

    आप सोच रहे होंगे कि यह भूमिका किस ओर संकेत कर रही है? यह बात कॉर्नेलियस सेनेसियो के विषय में है। एक प्रतिष्ठित, कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानित रोमन अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन)। आप उन्हें जानते थे। साधारण परिस्थितियों से उठकर उन्होंने अपने परिश्रम और योग्यता के बल पर ऊँचा स्थान प्राप्त किया था। भविष्य में उनकी उन्नति और भी सरल होने वाली थी क्योंकि प्रतिष्ठा प्राप्त करना जितना कठिन होता है, उसे और बढ़ाना उतना कठिन नहीं होता। धन का भी यही स्वभाव है। निर्धनता से धन का संचय बहुत धीरे-धीरे आरंभ होता है। जब तक मनुष्य गरीबी की स्थिति से बाहर नहीं निकलता, तब तक संपत्ति बढ़ती नहीं। परंतु सेनेसियो उस अवस्था तक पहुँच चुके थे जहाँ उनके लिए धन-संपत्ति तीव्र गति से बढ़ने वाली थी। इसमें उनकी दो अत्यंत प्रभावशाली योग्यताओं ने सहायता की थी। वे धन कमाना भी जानते थे और उसे सुरक्षित रखना भी। इन दोनों में से कोई एक गुण भी किसी व्यक्ति को धनी बना सकता था। 

    वे अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे अपनी संपत्ति की जितनी सावधानी से देखभाल करते थे, उतनी ही अपने स्वास्थ्य की भी। उस दिन भी, जैसा कि उनका नियम था, वे प्रातःकाल मुझसे मिलने आए। उसके बाद वे संध्या तक अपने एक गंभीर रूप से बीमार मित्र के शय्यापाश में बैठे उसकी सेवा करते रहे। रात्रि-भोज के समय वे पूरी तरह प्रसन्न और स्वस्थ दिखाई दे रहे थे। पर अचानक उन्हें गले में तीव्र पीड़ा (एंजाइना) का ऐसा दौरा पड़ा कि उनका गला सूज गया और वे ठीक से साँस भी नहीं ले पा रहे थे। भोर होने तक ही उनका जीवन समाप्त हो गया। इस प्रकार, एक पूर्णतः स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति के सभी दैनिक कर्तव्यों का पालन करने के केवल कुछ ही घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। वे देश और विदेश, दोनों स्थानों पर निजी निवेश कर रहे थे और लाभ कमाने के उद्देश्य से हर प्रकार के सार्वजनिक कार्यों में भी लगे हुए थे। ठीक उसी समय, जब प्रत्येक कार्य उनके पक्ष में सफल हो रहा था और धन निरंतर उनके पास आ रहा था, मृत्यु ने उन्हें अपने साथ ले लिया।

"अब अपने नाशपाती के पेड़ लगाने का समय है, हे मेलिबोयस;
अब अपनी अंगूर की बेलों को व्यवस्थित करने का समय है।"

जब मनुष्य कल का भी स्वामी नहीं है, तब पूरे जीवन की योजनाएँ बनाना कितना मूर्खतापूर्ण है! कितना बड़ा भ्रम है कि कोई व्यक्ति लंबे-लंबे कार्यक्रम बनाते हुए कहे, “मैं संपत्ति खरीदूँगा और भवन बनवाऊँगा। मैं ऋण दूँगा और उन्हें वापस वसूल करूँगा। मैं सार्वजनिक पदों पर आसीन होऊँगा और उसके बाद लंबी तथा निश्चिंत वृद्धावस्था का आनंद लेने के लिए सेवानिवृत्त हो जाऊँगा।” विश्वास कीजिए, सब कुछ अनिश्चित है। यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो भाग्यशाली प्रतीत होते हैं। किसी को भी भविष्य के बारे में अपने लिए कोई निश्चित आश्वासन नहीं देना चाहिए। जिस वस्तु को हम इस समय अपने हाथों में थामे हुए हैं, वही हमारे हाथों से फिसल सकती है। जिस क्षण को हम पकड़ लेना चाहते हैं, उसे भी संयोग एक ही पल में समाप्त कर सकता है। समय का प्रवाह तो अपने निश्चित क्रम से चलता रहता है, परंतु हम स्वयं अपने भविष्य के विषय में अज्ञान के अंधकार में रहते हैं। यदि मेरा अपना जीवन ही अनिश्चित है तो प्रकृति की इस निश्चित व्यवस्था से मुझे क्या लाभ? 

    हम दूर-दूर की यात्राओं की योजनाएँ बनाते हैं। विदेशी तटों की यात्रा के बाद बहुत समय बाद घर लौटने की कल्पना करते हैं। हम सैनिक जीवन की योजना बनाते हैं और कठिन युद्ध-अभियानों के बाद मिलने वाले लंबे समय से प्रतीक्षित पुरस्कारों की आशा करते हैं। हम प्रांतों के राज्यपाल बनने और पदोन्नति प्राप्त करने के स्वप्न देखते हैं।इसी बीच मृत्यु हमारे बिल्कुल पास खड़ी रहती है। पर हम उसके बारे में तभी सोचते हैं जब वह किसी और के जीवन में आती है। हम प्रतिदिन मृत्यु के असंख्य उदाहरण देखते हैं, पर वे हमारे मन पर केवल उतनी ही देर प्रभाव डालते हैं, जितनी देर तक वे हमें चकित करते हैं। इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि जिस घटना के किसी भी दिन घटित होने की संभावना थी, उसके किसी विशेष दिन घट जाने पर हम आश्चर्य करें? मानव-जीवन का एक निश्चित अंत है, जिसे हमारे भाग्य की अटल और अपरिहार्य व्यवस्था ने निर्धारित कर रखा है। लेकिन हममें से कोई भी यह नहीं जानता कि वह उस अंतिम क्षण के कितना निकट पहुँच चुका है। इसलिए हमें अपने मन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए मानो हम जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हों। किसी भी कार्य को कल पर न टालें। हमें प्रतिदिन अपने जीवन का हिसाब चुकता कर लेना चाहिए। 

    हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कभी पूर्ण नहीं होता। उसका कोई-न-कोई भाग हमेशा भविष्य के लिए टलता रहता है। जो व्यक्ति प्रत्येक दिन अपने जीवन को अंतिम रूप दे देता है, उसे समय की कभी कमी नहीं होती। समय की इसी अनुभूत कमी से भय उत्पन्न होता है और भविष्य के प्रति निरंतर बनी रहने वाली तृष्णा हमें भीतर-ही-भीतर कचोटती रहती है। इस चिंता से अधिक दुखद और कुछ नहीं कि आगे क्या होगा और घटनाओं का परिणाम क्या निकलेगा। हम निरंतर इस भय में जीते रहते हैं कि हमारे पास कितना समय शेष है और भविष्य हमारे लिए क्या लेकर आएगा। तो फिर इस मानसिक अशांति से मुक्ति कैसे मिले? इसका केवल एक ही उपाय है। अपने जीवन को भविष्य पर आश्रित न रहने देना बल्कि उसे वर्तमान में ही समेट लेना। लोग भविष्य से इसलिए चिपके रहते हैं क्योंकि वे वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। परंतु जब मैं अपने प्रति अपना समस्त दायित्व पूरा कर चुका होता हूँ। मेरा मन दृढ़तापूर्वक यह स्वीकार कर लेता है कि एक दिन और एक समूचे जीवनकाल में कोई वास्तविक अंतर नहीं है, तब वह आने वाले सभी दिनों और भविष्य की समस्त घटनाओं को व्यापक दृष्टि से देख सकता है और समय की संपूर्ण धारा का शांत एवं प्रसन्न भाव से अवलोकन कर सकता है। जब किसी का मन अनिश्चितताओं के प्रति स्थिर और संतुलित हो जाए, तब भाग्य के उतार-चढ़ाव और उसकी चंचलता उसे क्यों विचलित करें?

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जीना शीघ्र आरंभ करो। प्रत्येक दिन को एक संपूर्ण जीवन के समान समझो। जो व्यक्ति इस प्रकार अपने को तैयार करता है और प्रत्येक दिन को ही अपना सम्पूर्ण जीवन मानकर जीता है, वही वास्तव में निश्चिंत और सुरक्षित रहता है। इसके विपरीत, जो लोग केवल भविष्य की आशाओं के सहारे जीते हैं, उनके हाथों से वर्तमान का प्रत्येक क्षण फिसलता चला जाता है। वे लोभ और मृत्यु-भय के वश में हो जाते हैं। यह अत्यंत दयनीय अवस्था है, जो जीवन की हर दूसरी वस्तु को भी दुखमय बना देती है। इसी भावना के कारण मैकेनास ने वह अत्यंत चौंका देने वाली प्रार्थना की थी, जिसमें वह बीमारी, शारीरिक विकृति और अंततः क्रूस पर कीलों से जड़ दिए जाने जैसी भीषण यातना तक सहने को तैयार हो जाता है। बस एक ही शर्त पर कि इन सब कष्टों के बीच उसका जीवन कुछ और लंबा हो जाए।

मेरे हाथ निर्बल कर दो,
मेरे पैरों को शक्तिहीन बना दो,
मेरी पीठ पर कूबड़ उगा दो,
मेरे सारे दाँत गिरा दो,
पर जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मुझे सब स्वीकार है।
मुझे जीने दो, मुझे जीने दो,
चाहे मुझे क्रूस की नोक पर ही क्यों न बैठना पड़े,
बस मुझे जीने दो।

यदि यह प्रार्थना पूरी हो जाती तो वह अत्यंत भयानक होती क्योंकि उसमें जीवन के नाम पर केवल यातना को लंबा करने की याचना की गई है। यदि वह सचमुच क्रूस पर चढ़ाए जाने तक भी जीवित रहने की इच्छा रखता था तो मैं उसे पूर्णतः मामूली व्यक्ति मानता। सुनिए, वह क्या कहता है, “जब तक मेरे टूटे-फूटे और अशक्त शरीर में कुछ जान बची है, तब तक तुम मुझे निर्बल कर सकते हो। जब तक मुझे अपने विकृत और टेढ़े-मेढ़े शरीर में कुछ और समय जीने को मिल जाए, तब तक तुम मुझे विकृत कर सकते हो। तुम मुझे लटका सकते हो और क्रूस पर चढ़ा सकते हो।” क्या अपने ही घाव को ढोते चले जाना इतना मूल्यवान है? क्या उस क्रूस पर फैले हुए लटके रहना उचित है। जबकि इस प्रकार मनुष्य पीड़ा की सबसे बड़ी राहत अर्थात उसके अंत को ही टाल रहा होता है? क्या केवल अंतिम साँस लेने के लिए जीवन को बनाए रखना इतना अधिक मूल्यवान है? ऐसे मनुष्य के लिए तो बस ईश्वर की दया की ही कामना की जा सकती है। वह इस लज्जाजनक और कोमल कविता के द्वारा क्या कहना चाहता है? इस अत्यंत हीन भय के साथ यह सौदेबाज़ी क्यों? जीवन के लिए यह घृणित याचना क्यों? मुझे नहीं लगता कि उसने कभी वर्जिल को यह पंक्ति पढ़ते हुए सुना होगा—

“क्या मृत्यु इतनी दुःखद है?”

मैकेनास सबसे भीषण प्रकार की पीड़ा की कामना करता है। उसे और भी असहनीय बना देता है क्योंकि वह चाहता है कि वह पीड़ा लंबी चले और उसे लंबे समय तक सहना पड़े। इसके बदले उसे क्या प्राप्त होता है? निस्संदेह, कुछ अधिक लंबा जीवन। पर वह कैसा जीवन है, जो केवल लंबी होती हुई मृत्यु है? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो कष्टों के बीच धीरे-धीरे क्षीण होता रहे, जिसके अंग एक-एक करके शिथिल पड़ते जाएँ, जो बार-बार साँस के लिए तड़पता रहे और फिर भी एक ही बार में प्राण त्याग देने के बजाय इस दशा को स्वीकार करे? क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जो पहले से ही दुर्बल, विकृत और अपने कंधों तथा वक्ष पर भद्दी सूजन से फूला हुआ हो, जिसके पास क्रूस पर चढ़ाए जाने के अतिरिक्त भी मर जाने के अनेक कारण हों। फिर भी वह उस भयावह फाँसी के ढाँचे से बँधे रहने तथा ऐसी साँसें लेते रहने की इच्छा रखे जो अपने साथ इतनी सारी यातनाएँ लेकर आती हों? 

    अब तुम्हें स्वीकार करना चाहिए कि प्रकृति हम पर बहुत दयालु है क्योंकि उसने मृत्यु को अपरिहार्य बना दिया है। फिर भी, अनेक लोग मैकेनास से भी कहीं अधिक निकृष्ट समझौते करने को तैयार रहे हैं। केवल जीवन कुछ और लंबा करने के लिए किसी मित्र के साथ विश्वासघात कर देना अथवा अपने ही बच्चों को स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति के लिए सौंप देना ताकि उन्हें उस दिन के प्रकाश को कुछ और समय तक देखने का अवसर मिल सके, जो उनके असंख्य अपराधों का साक्षी है। हमें जीवन के प्रति इस मोह को त्याग देना चाहिए। हमें यह सीखना चाहिए कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि तुम कष्ट कब सहते हो, क्योंकि देर-सवेर तुम्हें कष्ट सहना ही है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि तुम कितने लंबे समय तक जीते हो, बल्कि यह है कि तुम कितना अच्छा जीवन जीते हो। अनेक बार, अच्छा जीवन जीने का अर्थ यही होता है कि मनुष्य बहुत लंबे समय तक जीवित न रहे।


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Friday, 31 July 2026

अपराध और दंड के बारे में -- पत्र - 95 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम भूल कर रहे हो, प्रिय लूसीलियस, यदि तुम्हें लगता है कि केवल हमारा ही युग भोग-विलास में डूबा हुआ है और उच्च नैतिक मानकों की उपेक्षा का दोषी है। लोग अपनी ही पीढ़ी को इन कमियों के लिए दोष देना पसंद करते हैं। पर वास्तव में दोष समय का नहीं, मनुष्यों का होता है। ऐसा कोई युग कभी नहीं रहा जो दोषों से मुक्त रहा हो। बल्कि यदि तुम हर युग की दुष्टताओं का आकलन करना शुरू करो तो मुझे यह कहते हुए लज्जा आती है कि जितना अनैतिक आचरण कैटो के समय और उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति में दिखाई देता है, उतना शायद कभी नहीं हुआ। यह विश्वास करना कठिन है, लेकिन जब पब्लियस क्लोडियस पुल्खर (Publius Clodius Pulcher) पर जूलियस सीज़र (Julius Caesar) की पत्नी के साथ गुप्त व्यभिचार का मुकदमा चल रहा था, तब न्यायाधीशों को रिश्वत दी गई। क्लोडियस ने उस पवित्र धार्मिक अनुष्ठान का अपमान किया था, जो कहा जाता है कि 'जनता के लिए' संपन्न किया जाता है और जिसमें पुरुषों का प्रवेश इतना कठोरता से निषिद्ध था कि वहाँ नर पशुओं के चित्र तक ढँक दिए जाते थे। 



    फिर भी न्यायाधीशों को रिश्वत दी गई और इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए विवाहित स्त्रियों और कुलीन परिवारों के युवकों के साथ यौन संबंध बनाने का अवसर भी दिया गया। अपराध स्वयं उसके बरी किए जाने जितना घोर नहीं था। जिस व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप था, उसी ने अनेक व्यभिचार करवाए और उसने अपनी सुरक्षा केवल इस प्रकार सुनिश्चित की कि न्यायाधीशों को भी अपने समान अपराधी बना दिया। यह सब उसी मुकदमे में हुआ जिसमें कैटो द यंगर (Cato the Younger) ने गवाही दी थी। हालाँकि वे केवल गवाही ही दे सके। मैं इस विषय में सिसरो (Cicero) के शब्द उद्धृत करता हूँ क्योंकि अन्यथा इन घटनाओं पर विश्वास करना कठिन होगा—

"उसने न्यायाधीशों को अपने घर बुलाया, उनसे वादे किए, उनसे विनती की और उन्हें रिश्वत दी। लेकिन, देवताओं की शपथ, इससे भी अधिक बुरा होने वाला था। अंतिम पुरस्कार के रूप में कुछ न्यायाधीशों को विशेष स्त्रियों के साथ रात्रि बिताने का अवसर और कुलीन परिवारों के युवकों के साथ गुप्त मिलन का प्रलोभन दिया गया।"

रिश्वत देना ही पर्याप्त रूप से घृणित था। लेकिन उसके साथ जो अतिरिक्त प्रलोभन दिए गए, वे उससे भी अधिक चौंकाने वाले थे। "वह बड़ा सदाचारी बनने वाला व्यक्ति, क्या तुम उसकी पत्नी चाहते हो? मैं उसे तुम्हारे पास पहुँचा दूँगा। उस धनी व्यक्ति की पत्नी कैसी रहेगी? मैं व्यवस्था कर दूँगा कि वह तुम्हारे साथ रात बिताए। यदि तुम्हें किसी की पत्नी नहीं मिली तो मुझे दोषी ठहराने के पक्ष में मतदान कर देना! जिस सुंदर स्त्री की तुम इच्छा रखते हो, वह तुम्हारे पास आएगी। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें उसके साथ एक रात बिताने का अवसर मिलेगा और मैं यह काम शीघ्र कर दूँगा। अदालत की दो दिन की कार्यवाही-स्थगन अवधि के भीतर मेरा वादा पूरा हो जाएगा।" व्यभिचार की व्यवस्था करना स्वयं व्यभिचार करने से भी अधिक अनैतिक है क्योंकि इसमें सम्मानित विवाहित स्त्रियों पर दबाव डालकर उन्हें इस कृत्य में सम्मिलित किया जाता है। क्लोडियस के न्यायाधीशों ने सीनेट से सुरक्षा की माँग की थी। ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता केवल तभी पड़ती यदि वे उसे दोषी ठहराने वाले होते और उनकी यह माँग स्वीकार भी कर ली गई। इसलिए जब अभियुक्त बरी हो गया तो कैटुलस ने व्यंग्य करते हुए न्यायाधीशों से कहा, "तुमने हमसे सुरक्षा क्यों माँगी थी? क्या इसलिए कि कहीं तुम्हारी रिश्वत जब्त न कर ली जाए?" ऐसे ही उपहास और कटाक्ष के बीच वह व्यक्ति बच निकला, जो मुकदमे से पहले व्यभिचारी था और मुकदमे के दौरान दलाल बन गया। दोषमुक्त होने के लिए उसने जो किया, वह उस अपराध से भी अधिक घृणित था जिसके कारण उस पर मुकदमा चलाया गया था।

    क्या तुम्हें लगता है कि कभी लोगों के नैतिक मानदंड इससे अधिक पतित रहे होंगे। ऐसे लोगों के, जिन्हें न तो धर्म का भय रोक सकता था और न ही न्यायालय का? उन्होंने सीनेट की विशेष न्यायिक कार्यवाही के दौरान उसी अपराध से भी बड़ा अपराध कर डाला जिसकी जाँच की जा रही थी। विवाद का प्रश्न यह था कि क्या व्यभिचार का दोषी व्यक्ति स्वतंत्र रह सकता है। लेकिन जो बात सामने आई, वह यह थी कि ऐसा व्यक्ति व्यभिचार का सहारा लिए बिना निर्दोष घोषित ही नहीं किया जा सकता था। यह सब कुछ पोम्पेई, सीज़र, सिसेरो और कैटो की उपस्थिति में तय किया गया। और ध्यान रहे, यही वही कैटो थे जिनकी उपस्थिति में कहा जाता है कि फ्लोरा के उत्सव के दौरान जनता ने नर्तकियों से नग्न प्रदर्शन की माँग करना भी बंद कर दिया था। यदि तुम इस बात पर विश्वास कर सको तो उस समय के दर्शकों के नैतिक मानदंड न्यायाधीशों की अपेक्षा अधिक ऊँचे थे। 

    ऐसी घटनाएँ पहले भी होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। नागरिक जीवन का नैतिक पतन कभी-कभी भय और दबाव के कारण कुछ समय के लिए थम सकता है। लेकिन वह अपनी इच्छा से कभी समाप्त नहीं होता। इसलिए तुम्हें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा युग किसी भी अन्य युग की तुलना में अधिक वासना का दास हो गया है या कानूनों का कम सम्मान करता है। आज के युवा उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक संयमित हैं। उस समय तो स्थिति यह थी कि व्यभिचार का आरोपी अपने न्यायाधीशों के सामने स्वयं को निर्दोष बताता था, जबकि न्यायाधीश उसके सामने अपने ही व्यभिचार के दोषी होने की स्वीकृति दे चुके होते थे। मुकदमे का निर्णय प्रभावित करने के लिए व्यभिचार और काम-वासना से भरे आयोजन किए जाते थे। क्लोडियस, जिस अपराध का वह स्वयं दोषी था, उसी प्रकार के अनैतिक आचरण से लाभ उठाते हुए मुकदमे की कार्यवाही के दौरान ही गुप्त प्रेम-संबंधों की व्यवस्था कर रहा था। क्या कोई इस बात पर विश्वास करेगा कि एक व्यक्ति, जिस पर केवल एक व्यभिचार का मुकदमा चल रहा था, अनेक व्यभिचारों का सहारा लेकर निर्दोष घोषित हो गया?

    क्लोडियस जैसे लोग हर युग में मिल जाते हैं। लेकिन कैटो जैसे लोग हर युग में नहीं मिलते। हमारा झुकाव सदैव बुराई की ओर रहता है क्योंकि हमेशा कोई न कोई आगे बढ़कर उसका मार्ग दिखाने वाला होता है और कोई न कोई उसका अनुसरण करने वाला। बल्कि उनके बिना भी बुराई का सिलसिला तेज़ी से चलता रहता है। हम केवल दुष्कर्म की ओर झुकते ही नहीं बल्कि उसमें पूरी तरह कूद पड़ते हैं। अन्य कलाओं और व्यवसायों में यदि कोई गलती हो जाए तो वह उस कारीगर के लिए लज्जा का कारण होती है। वह अपनी त्रुटि से दुखी होता है। लेकिन जीवन के मामले में लोग अपने दुष्कर्मों से ही आनंद प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को सुधारना लगभग असंभव हो जाता है। एक नाविक को जहाज़ के डूब जाने में कोई सुख नहीं मिलता। एक डॉक्टर अपने रोगी के अंतिम संस्कार से प्रसन्न नहीं होता और यदि कोई वकील अपने मुवक्किल का मुकदमा हार जाए तो उसे भी उससे आनंद नहीं मिलता। लेकिन मनुष्य अपने स्वयं के अनैतिक आचरण से आनंद लेता है। कोई व्यक्ति व्यभिचार में इसलिए सुख अनुभव करता है कि उसका निषिद्ध और कठिन होना ही उसे रोमांचित करता है। दूसरा जालसाज़ी और चोरी में रोमांच महसूस करता है। वह अपने कर्मों के लिए स्वयं को तभी दोष देता है जब उसका भाग्य उसका साथ छोड़ देता है। हमने बुरे आचरण को अपनी आदत बना लिया है और यही उसकी परिणति है। 

    दूसरी ओर, सभी लोग अपने दुष्कर्मों को छिपाते भी हैं। चाहे वे उन कार्यों से कितना ही लाभ क्यों न उठा लें, वे उनका आनंद तो लेते है। लेकिन उनके तथ्य छिपाए रखते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जो लोग पूरी तरह पतन की राह पर चले गए हैं, उनमें भी सही और गलत का कुछ न कुछ बोध शेष रहता है। वे यह नहीं जानते कि क्या गलत है। ऐसा नहीं है। वे तो बस जान-बूझकर उसकी उपेक्षा करते हैं। लेकिन निर्मल अंतःकरण चाहता है कि वह खुले रूप में सामने आए और सबके सामने दिखाई दे। जबकि दुष्टता अँधेरे से भी डरती है। इसी कारण मुझे लगता है कि एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही थी, “दुष्कर्मी संयोगवश छिपा रह सकता है। लेकिन वह कभी इस बात के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकता कि वह हमेशा छिपा ही रहेगा।” इस विचार को और भी बेहतर ढंग से इस प्रकार कहा जा सकता है, “दुष्कर्म करने वालों को अपने अपराध छिपाने से कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता। क्योंकि यदि सौभाग्य से वे छिप भी जाएँ, तब भी उन्हें कभी यह विश्वास नहीं होता कि वे सदा छिपे रहेंगे।” अर्थात अपराध कभी भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो सकता। मेरे विचार से, यदि इस कथन का यही अर्थ समझा जाए, तो यह हमारे स्टोइक दर्शन के भी विरोध में नहीं है। कैसे? क्योंकि दुष्कर्मी के लिए पहला और सबसे बड़ा दंड यही है कि उसने अपराध किया है। कोई भी अपराध, चाहे भाग्य ने उसे वैभव से सजा दिया हो, चाहे उसी भाग्य ने उसे संरक्षण और सुरक्षा प्रदान कर दी हो, दंड से मुक्त नहीं होता। अपराध का दंड उसी अपराध के भीतर निहित होता है। फिर भी, उस पहले और मूल दंड के तुरंत बाद दूसरे दंड भी उसके पीछे-पीछे चलते हैं। लगातार भय, आतंक और अपनी सुरक्षा के प्रति अविश्वास। तो फिर मैं दुष्टता को इस दंड से क्यों मुक्त कर दूँ? मैं उसे निरंतर आशंका और अस्थिरता की स्थिति में क्यों न रहने दूँ? 

    जब एपिक्यूरस यह कहते हैं कि स्वभावतः कोई भी वस्तु न्यायपूर्ण नहीं होती और यह कि मनुष्य को दुष्कर्मों से केवल इसलिए बचना चाहिए क्योंकि उनसे उत्पन्न होने वाली चिंता से बचा नहीं जा सकता तो इस बात से हमें असहमति रखनी चाहिए। लेकिन हमें उनसे इस बात पर सहमत होना चाहिए कि अपराधी अपने ही अंतःकरण द्वारा सताया जाता है। उसका सबसे बड़ा दंड यह है कि उसे निरंतर चिंता की मार और भय की चाबुक सहनी पड़ती है क्योंकि वह उन लोगों पर भी विश्वास नहीं कर सकता जो उसे सुरक्षा का आश्वासन देते हैं। एपिक्यूरस, यही बात स्वयं इस बात का प्रमाण है कि दुष्कर्मों के प्रति हमारे भीतर स्वाभाविक घृणा होती है। हर अपराधी डरता है, चाहे वह पूरी तरह सुरक्षित स्थान पर ही क्यों न हो। भाग्य बहुत-से लोगों को बाहरी दंड से बचा सकता है। लेकिन चिंता से किसी को नहीं बचा सकता। यदि ऐसा न होता कि प्रकृति ने हमारे भीतर दुष्कर्मों के प्रति जन्मजात घृणा रखी है तो ऐसा क्यों होता? मनुष्य कभी भी इस बात के प्रति निश्चिंत नहीं हो सकता कि उसका अपराध हमेशा छिपा रहेगा क्योंकि उसका अंतःकरण स्वयं उसे दोषी ठहराता है और उसे उसके अपने सामने ही प्रकट कर देता है। अपराधियों की पहचान ही यह है कि वे निरंतर भय से भरे रहते हैं। यदि कानून की सज़ा और निर्धारित दंड से बहुत-से अपराध बच निकलते हैं तो हमारी स्थिति अत्यंत दयनीय होती। यदि प्रकृति ने स्वयं ऐसे अपराधों के लिए तत्काल और कठोर दंड की व्यवस्था न की होती। वह दंड है भय, जो बाहरी सज़ा का स्थान ले लेता है।


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मनुष्य जीवन और शिकायतों के बारे में -- पत्र - 94 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम अभी भी किसी बात से व्यथित हो; तुम अभी भी शिकायत किए जा रहे हो। क्या तुम्हें यह समझ नहीं आता कि इन सबमें वास्तव में बुराई केवल तुम्हारा व्यथित होना और शिकायत करना ही है? यदि तुम मेरी राय पूछो तो मैं कहूँगा कि किसी मनुष्य के लिए कोई भी वस्तु तब तक भयानक नहीं होती, जब तक वह स्वयं प्रकृति की व्यवस्था में किसी बात को भयानक न मान ले। जिस दिन मैं किसी परिस्थिति को सहन करने में असमर्थ हो जाऊँगा, उसी दिन मैं स्वयं को भी सहन करने योग्य नहीं रहूँगा। 'मैं बीमार हूँ, यह तो मेरे जीवन की स्वाभाविक संभावना थी। 'मेरे दास बीमार पड़ गए हैं। मेरी आय घट गई है। मेरा घर जर्जर होकर चरमराने लगा है। मुझे हानि, शारीरिक पीड़ा, कठिन परिश्रम और चिंताओं ने घेर लिया है' , ऐसा होता है बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि ऐसा होना ही था। ये घटनाएँ पूर्वनियत हैं। ये कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटनाएँ नहीं हैं। 



    इस पर विश्वास करो, मैं इस समय अपने हृदय की सबसे गहरी भावना तुम्हारे सामने प्रकट कर रहा हूँ। जो कुछ भी प्रतिकूल और कठिन प्रतीत होता है, उसके संबंध में मैंने अपने मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया है। मैं ईश्वर की केवल आज्ञा का पालन नहीं करता बल्कि उसकी इच्छा से सहमत होता हूँ। मैं उसका अनुसरण अपनी स्वेच्छा से करता हूँ। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा करने के लिए विवश हूँ। मेरे साथ जो कुछ भी घटित होगा, मैं उसे बिना शोक किए और बिना उदासी का मुख बनाए स्वीकार करूँगा। जीवन जो भी कर (देय मूल्य) मुझसे माँगेगा, मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक चुका दूँगा। जिन बातों के कारण हम कराहते हैं और भयभीत हो जाते हैं, वे वास्तव में जीवन के कर (देय मूल्य) मात्र हैं। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, न तो उनसे छूट की आशा करो और न ही उसकी कामना करो।

    तुम मूत्राशय के दर्द से पीड़ित थे, तुम्हें चिंताजनक पत्र मिले और तुम्हारी हानियाँ लगातार बढ़ती रहीं। संक्षेप में कहूँ तो तुम्हें अपने प्राणों का भय सताने लगा। लेकिन क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं था कि जब तुम दीर्घायु होने की प्रार्थना कर रहे थे, तब वास्तव में तुम इन्हीं सब बातों की भी प्रार्थना कर रहे थे? लंबा जीवन इन सबको अपने भीतर समेटे रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक लंबी यात्रा में धूल, कीचड़ और वर्षा, सब कुछ आता है। “मैं तो जीना चाहता था, पर इन सब कष्टों के बिना।” इस प्रकार की कोमल और दुर्बल वाणी एक पुरुष को शोभा नहीं देती। तुम इसे जैसे चाहो वैसे समझो। पर मैं तुम्हारे लिए जो प्रार्थना करता हूँ, वह केवल सद्भावना से ही नहीं बल्कि पूरी गंभीरता से करता हूँ, “ईश्वर और देवियाँ तुम्हें कभी भी विलासिता की गोद में न बैठाए रखें।” अपने आप से पूछो, यदि कोई देवता तुम्हें यह विकल्प दे कि तुम अपना जीवन बाज़ार की सुख-सुविधाओं के बीच बिताना चाहते हो या सैनिक शिविर में तो तुम किसे चुनोगे? 

    प्रिय लूसीलियस, जीवन एक युद्ध-अभियान है। इसी कारण जो लोग कठिनाइयों को सहते हैं, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चढ़ते-उतरते हैं और सबसे जोखिम भरे अभियानों में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, वही सच्चे वीर होते हैं और वही शिविर के नेता बनने योग्य होते हैं। इसके विपरीत, जो लोग आराम और सुविधा में पड़े-पड़े धीरे-धीरे निष्क्रिय होते रहते हैं, जबकि सारा कठिन कार्य दूसरे लोग करते हैं, वे पिंजरे में पाले जाने वाले फाख्तों के समान हैं। वे केवल इसलिए सुरक्षित दिखाई देते हैं क्योंकि कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता।


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Thursday, 23 July 2026

भय दूर करने के बारे में -- पत्र - 80 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मैंने अब तुम्हारी चिंता करना छोड़ दिया है। तुम पूछते हो, “मेरे पक्ष में किस देवता ने आवाज़ उठाई?” वह एकमात्र देवता जिसने कभी छल नहीं किया। वह है... वह मन जो सत्य, न्याय और सद्गुण से प्रेम करता है। तुम्हारा श्रेष्ठतम अंश सुरक्षित है। भाग्य तुम्हें हानि पहुँचा सकता है पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अब मुझे यह भय नहीं रहा कि तुम स्वयं अपने लिए हानिकारक सिद्ध होगे। जिस मार्ग पर तुम चल पड़े हो, उसी पर बने रहो। अपने शांत स्वभाव को स्थायी प्रवृत्ति बना लो— शांत, परंतु कोमल या दुर्बल नहीं। कोमल जीवन की अपेक्षा कठोर जीवन कहीं बेहतर है! अर्थात यदि 'कठोर जीवन' से लोगों का सामान्य आशय लिया जाए, ऐसा जीवन जो परिश्रम, संघर्ष और कठिनाइयों से भरा हो। हम अक्सर लोगों को किसी के जीवन की प्रशंसा करते सुनते हैं क्योंकि वे उससे ईर्ष्या करते हैं। वे कहते हैं, “उसका जीवन बहुत आरामदायक है,” जबकि उनका वास्तविक आशय यह होता है, “वह व्यक्ति स्वयं ही दुर्बल है।” धीरे-धीरे मन भी विलासी और दुर्बल बन जाता है। जब वह आलस्य और आराम में पड़ा रहता है तो उसकी शक्ति शिथिल पड़ जाती है और वह उसी जीवन के समान बन जाता है जिसे वह जी रहा होता है। तुम स्वयं सोचो। यदि कोई सचमुच पुरुषार्थी है तो क्या उसके लिए दृढ़ रहना बेहतर नहीं है, चाहे वह दृढ़ता मृत्यु की कठोरता जैसी ही क्यों न हो? इसके अतिरिक्त, जो लोग अत्यधिक विलासी और दुर्बल हो जाते हैं, वे अंततः अपने जीवन को उसी वस्तु के समान बना लेते हैं जिससे वे सबसे अधिक भय खाते हैं। वास्तविक अवकाश उस अर्थी से सर्वथा भिन्न है जिस पर मृत शरीर ले जाया जाता है।



    तुम पूछते हो, “तुम क्या कहना चाहते हो? क्या उस प्रकार विश्राम करना भी व्यवसायों और भाग-दौड़ के बवंडर में फँसे रहने से बेहतर नहीं है?” निस्संदेह, अत्यधिक परिश्रम कष्टदायक है पर जड़ता भी उतनी ही घातक है। मेरी दृष्टि में सुगंधित तेलों से अभिषिक्त शव भी उतना ही मृत है जितना वह शव जिसे लोहे के काँटे से घसीटकर ले जाया जाता है। अध्ययन के बिना अवकाश मृत्यु के समान है। वह मानो जीवित ही दफना दिए जाने जैसा है। 

    सब कुछ छोड़कर भाग जाने से क्या लाभ? मानो हमारी चिंताएँ समुद्र पार करके हमारा पीछा न करें! ऐसा कौन-सा आश्रय है जहाँ मृत्यु का भय प्रवेश न कर सके? कौन-सा शांत स्थान, चाहे वह पर्वतों के सबसे दुर्गम किले में ही क्यों न हो, पीड़ा के विचार से भयावह नहीं बन जाता? तुम जहाँ कहीं भी छिपो, मानव जीवन के दुःखों का कोलाहल तुम्हें चारों ओर से घेरे रहेगा।

    हमारे चारों ओर बाहरी चिंताएँ फैली हुई हैं, जो हमें छलने और दबाने के लिए तत्पर रहती हैं। उनसे भी कहीं अधिक चिंताएँ हमारे भीतर से ही उभर पड़ती हैं, यहाँ तक कि एकांत के बीच भी। इसलिए हमें अपने चारों ओर दर्शन का ऐसा दुर्ग खड़ा कर लेना चाहिए, जिस पर कभी आक्रमण न किया जा सके और जिसे भाग्य के किसी भी घेराबंदी-यंत्र से भेदा न जा सके। जो मन बाहरी वस्तुओं का त्याग कर देता है और अपने ही आंतरिक दुर्ग में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करता है, वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जिसे कोई जीत नहीं सकता। तब गुलेल के पत्थर और तीर उसके चरणों में आकर निष्फल गिर पड़ते हैं। लोग कहते हैं कि भाग्य का हाथ बहुत लंबा होता है, पर वास्तव में भाग्य का हाथ लंबा नहीं होता। वह केवल उन्हीं को पकड़ पाता है जो स्वयं उससे चिपके रहते हैं।

    अतः जितना संभव हो सके, हमें भाग्य से दूरी बनाए रखनी चाहिए। परंतु ऐसा करने का एकमात्र उपाय है, अपने और प्रकृति के सही ज्ञान के द्वारा। हमें यह जानना चाहिए कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं और कहाँ से आए हैं। हमारे लिए क्या शुभ है और क्या अशुभ, किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, विवेक क्या है, जो वरणीय और त्याज्य वस्तुओं में भेद करता है, हमारी इच्छाओं के उन्माद को शांत करता है और हमारे भय की उग्रता को नियंत्रित करता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि उन्होंने दर्शन के बिना ही इन शक्तियों पर विजय पा ली है। पर जब किसी विपत्ति के द्वारा उनके धैर्य की परीक्षा होती है, तब अंततः वे स्वयं स्वीकार करने को विवश हो जाते हैं। जब यातना देने वाला कहता है, “अपना हाथ आगे बढ़ाओ!”, और मृत्यु सामने आ खड़ी होती है, तब उनके साहसपूर्ण शब्द उनके होंठों पर ही मर जाते हैं। तब उनसे कहा जा सकता है, “जब तक तुम्हें स्वयं कष्ट का सामना नहीं करना पड़ा था, तब तक उसका उपहास करना तुम्हारे लिए बहुत आसान था। लो, अब यह पीड़ा सामने है जिसे तुम सहने योग्य बताया करते थे। यह मृत्यु भी सामने है, जिसके विरुद्ध तुमने इतने लंबे और प्रभावशाली भाषण दिए थे। अब कोड़े बरस रहे हैं। अब तलवार चमक रही है।

अब, हे एनीयस, अपने साहस का परिचय देने का समय है,
अब अपने दृढ़ हृदय को दिखाने का समय है।”

    तुम्हें वह दृढ़ हृदय निरंतर अभ्यास से प्राप्त होगा। अपने भाषणों का नहीं बल्कि अपने मन का अभ्यास करके और स्वयं को मृत्यु के लिए तैयार करके। जो व्यक्ति केवल तर्कों की चालाकियों के सहारे तुम्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न करता है कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है, उसने न तो तुम्हें प्रोत्साहित किया है और न ही तुम्हारे साहस को जागृत किया है। प्रिय लूसीलियस, यूनानियों की इस कुतर्कप्रिय प्रवृत्ति पर हम हँस ही सकते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि मैं अब तक उनसे पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सका हूँ। हमारे मत के प्रवर्तक ज़ेनो यह तर्क प्रस्तुत करते हैं—

कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु बुरी नहीं है।

अब इससे तो मुझे बड़ा लाभ हुआ! अब तुमने मेरे मन से मृत्यु का भय दूर कर दिया है। अब मैं बिना किसी संकोच के अपनी गर्दन तलवार के आगे बढ़ा दूँगा! क्या तुम गंभीरता से बात नहीं कर सकते? क्या जब मैं मृत्यु का सामना करने जा रहा हूँ, तभी तुम मुझे हँसाना चाहते हो?

    वास्तव में, मेरे लिए यह कहना कठिन है कि अधिक कुतर्की कौन था। वह जिसने यह विश्वास किया कि इस तर्क से मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा या वह जिसने इस तर्क का खंडन करने का प्रयास किया, मानो उसमें सचमुच कोई सार हो। उसने हमारे इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए, जिसके अनुसार मृत्यु उदासीन वस्तुओं (जिसे यूनानी भाषा में अडियाफोरा कहते हैं) में से एक है, उसके विरोध में यह तर्क प्रस्तुत किया—

कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु उदासीन वस्तु नहीं है।

    तुम स्वयं देख सकते हो कि यह तर्क किस प्रकार भ्रम उत्पन्न करता है। गौरवपूर्ण मृत्यु नहीं होती बल्कि साहसपूर्वक मरना गौरवपूर्ण होता है। जब तुम कहते हो, “कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती,” तो मैं इस कथन को इस शर्त पर स्वीकार करता हूँ कि कोई भी वस्तु तब तक गौरवपूर्ण नहीं होती जब तक उसमें किसी उदासीन वस्तु का संबंध न हो। उदाहरण के लिए, मैं बीमारी, पीड़ा, निर्धनता, निर्वासन और मृत्यु को उदासीन वस्तुएँ कहता हूँ अर्थात वे अपने आप में न तो अच्छी हैं और न बुरी। इनमें से कोई भी अपने आप में गौरवपूर्ण नहीं है, फिर भी इनके बिना कोई भी गौरवपूर्ण कार्य संभव नहीं है। क्योंकि हम निर्धनता की प्रशंसा नहीं करते बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जो निर्धनता के सामने न तो अपमानित होता है और न ही टूटता है। हम निर्वासन की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिसने निर्वासन को उससे भी अधिक साहस के साथ स्वीकार किया, जितने साहस से वह किसी दूसरे को निर्वासित होने के लिए विदा करता। हम पीड़ा की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस पर पीड़ा अपना वश नहीं चला सकी। कोई मृत्यु की प्रशंसा नहीं करता। हम उस आत्मा की प्रशंसा करते हैं जिसे मृत्यु अपने साथ तो ले जा सकती है पर पराजित नहीं कर सकती। ये सभी वस्तुएँ अपने आप में न तो सम्माननीय हैं और न ही गौरवपूर्ण। परंतु जब सद्गुण उनका सामना करता है और उन्हें अपने अधीन कर लेता है, तब वही उन्हें सम्माननीय और गौरवपूर्ण बना देता है। अपने स्वभाव से वे मध्यवर्ती अर्थात् उदासीन हैं। अंतर केवल इतना है कि उन पर अधिकार दुर्गुण का होता है या सद्गुण का। वही मृत्यु जो कैटो के मामले में गौरवपूर्ण थी। डेसिमस ब्रूटस के मामले में तुरंत ही नीच और लज्जाजनक बन गई। उसने अपने जल्लादों से कुछ क्षण रुकने की प्रार्थना की और शौच के लिए चला गया। फिर जब उन्होंने उसे वापस बुलाकर गर्दन आगे बढ़ाने का आदेश दिया तो उसने कहा, “यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे, तो मैं ऐसा करूँगा।” कैसी मूर्खता है—जहाँ बच निकलने का कोई उपाय ही नहीं, वहाँ भी भागने का प्रयत्न करना! “मैं ऐसा करूँगा, यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे।” उसे तो यह भी जोड़ देना चाहिए था, “चाहे एंटनी के अधीन ही क्यों न जीना पड़े!” वास्तव में ऐसा व्यक्ति जीवित बचाए जाने के योग्य ही था।

    पर जैसा कि मैं कह रहा था, यह स्पष्ट है कि मृत्यु अपने आप में न तो अच्छी है और न ही बुरी। कैटो ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत सम्माननीय था। ब्रूटस ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत लज्जाजनक था। जब सद्गुण किसी वस्तु के साथ जुड़ जाता है तो वह उसे ऐसा गौरव प्रदान कर देता है जो उसका अपना नहीं होता। हम कहते हैं कि कोई कमरा अच्छी तरह प्रकाशित है जबकि वही कमरा रात के समय अंधकारमय रहता है। दिन उसमें प्रकाश भर देता है और रात उससे प्रकाश छीन लेती है। इसी प्रकार जिन वस्तुओं को हमारा दर्शन 'उदासीन' या 'मध्यवर्ती' कहता है जैसे, धन, बल, सौंदर्य, सम्मान और सत्ता। दूसरी ओर मृत्यु, निर्वासन, अस्वस्थता, पीड़ा और वे सभी बातें जिनसे हम कम या अधिक भय करते हैं। उनका अच्छा या बुरा नाम सद्गुण या दुर्गुण ही निर्धारित करता है। लोहे का एक टुकड़ा अपने आप में न तो गरम होता है और न ठंडा। उसे भट्ठी में डाल दो तो वह लाल होकर तपने लगता है। पानी में डुबो दो तो ठंडा हो जाता है। उसी प्रकार मृत्यु भी तभी सम्माननीय बनती है, जब उसमें वास्तव में सम्माननीय वस्तु अर्थात सद्गुण और वह मन जो बाहरी परिस्थितियों की परवाह नहीं करता, समाहित हो।

    परंतु, लूसीलियस, जिन वस्तुओं को हम 'मध्यवर्ती' या 'उदासीन' कहते हैं, उनमें भी एक महत्वपूर्ण भेद है। मृत्यु उसी प्रकार उदासीन नहीं है, जैसे यह बात उदासीन है कि तुम्हारे सिर पर बालों की संख्या सम है या विषम। मृत्यु उन वस्तुओं में से है जो बुरी तो नहीं हैं परंतु उनमें बुराई का आभास अवश्य होता है। हमारे भीतर स्वभावतः अपने प्रति प्रेम होता है। जीवित रहने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने की सहज इच्छा होती है। विघटन या नष्ट हो जाने के प्रति स्वाभाविक भय भी होता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उससे हम अनेक अच्छे साधनों से वंचित हो जाएँगे और उन परिचित परिस्थितियों से अलग हो जाएँगे जिनके हम अभ्यस्त हैं। मृत्यु हमें इसलिए भी पराई और भयावह लगती है कि इस संसार को तो हम जानते हैं पर जिस संसार की ओर हम जा रहे हैं, वह कैसा है, यह नहीं जानते। अज्ञात के प्रति स्वाभाविक भय होता है। इसके अतिरिक्त, अंधकार का भी हमारे भीतर जन्मजात भय होता है और लोग यह मानते हैं कि मृत्यु हमें अंधकार में ले जाएगी। इसलिए, यद्यपि मृत्यु उदासीन है, फिर भी वह ऐसी वस्तु नहीं है जिसकी उपेक्षा सहजता से की जा सके। मन को निरंतर अभ्यास द्वारा इतना दृढ़ बनाना चाहिए कि वह मृत्यु के दर्शन और उसके निकट आने को सहन कर सके। 

    हमें मृत्यु की उतनी चिंता नहीं करनी चाहिए जितनी हम करते हैं। हमने उसके विषय में अनेक भयानक और झूठी कथाओं पर विश्वास कर लिया है। बहुत-से लोगों ने एक-दूसरे से बढ़कर उसके बारे में और भी डरावनी कल्पनाएँ गढ़ी हैं। वे पृथ्वी के नीचे स्थित किसी कारागार और अनंत अंधकार से भरे प्रदेशों का वर्णन करते हैं, जहाँ—

नरक का विशाल प्रहरी
हड्डियों के बिछौने पर पड़ा रहता है और गुर्राता हुआ
रक्तरंजित गुफा में उन्हें कुतरता रहता है
और अपने भय से रक्तहीन समस्त प्रेतात्माओं को आतंकित कर देता है।

    यदि तुम लोगों को यह भी समझा दो कि ये सब केवल मनगढ़ंत कथाएँ हैं और मरने वालों के लिए अब भयभीत होने जैसा कुछ भी शेष नहीं रहता, तब भी एक दूसरा भय सामने आ खड़ा होता है। हेडीज़(मृतकों का लोक) का जितना भय उन्हें होता है, उतना ही भय उन्हें इस बात का भी होता है कि मृत्यु के बाद वे कहीं भी नहीं रह जाएँगे, उनका कोई अस्तित्व ही शेष नहीं रहेगा।

    फिर साहसपूर्वक मृत्यु का सामना करना गौरवपूर्ण क्यों न माना जाए जबकि उसमें मनुष्य उन भय और चिंताओं से संघर्ष करता है जो लंबे समय से उसके मन में जड़ जमाए हुए हैं? यह मानव-मन की सबसे महान उपलब्धियों में से एक क्यों न हो? यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि मृत्यु एक बुराई है तो वह कभी सद्गुण की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच सकता पर यदि वह उसे उदासीन समझता है, तभी वह वहाँ पहुँच सकता है। प्रकृति किसी भी व्यक्ति को उस वस्तु की ओर साहसपूर्वक बढ़ने की अनुमति नहीं देती जिसे वह बुरा समझता हो। वह उसकी ओर केवल धीमे-धीमे और अनिच्छा से ही बढ़ेगा। पर जो कार्य कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध, कायरतापूर्वक करता है, वह गौरवपूर्ण नहीं हो सकता। सद्गुणपूर्ण कर्म कभी भी दबाव या विवशता में नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त, कोई भी कर्म तब तक सम्माननीय नहीं हो सकता जब तक मन पूर्णतः उसी उद्देश्य के प्रति समर्पित न हो और उसके किसी भी भाग में कोई अनिच्छा न हो। जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी वस्तु को अपनाता है जिसे वह बुरा समझता है या तो इसलिए कि वह उससे भी बड़ी किसी बुराई से बचना चाहता है अथवा इसलिए कि उसके सामने कुछ ऐसे लाभ हैं जिनके लिए वह उस एक बुराई को सहने योग्य मानता है, तब उसके निर्णय परस्पर विरोधी हो जाते हैं। एक ओर उसका निर्णय उसे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर वही निर्णय उसे पीछे खींचता है और उस वस्तु से बचने के लिए कहता है जिसे वह हानिकारक समझता है। इस प्रकार वह विपरीत दिशाओं में खिंचने लगता है और ऐसी स्थिति में उसके कर्म का गौरव नष्ट हो जाता है। सद्गुण अपने निर्णयों पर मन की पूर्ण एकता और सामंजस्य के साथ कार्य करता है। वह अपने किए जाने वाले कर्म से भयभीत नहीं होता।

    और जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, “विपत्तियों के सामने कभी समर्पण मत करो। अपने भाग्य जितनी कठिनाइयाँ तुम्हारे सामने रखे, उनसे भी अधिक साहस के साथ उनका सामना करो।”

    यदि तुम यह मानते रहोगे कि वे सचमुच बुराइयाँ हैं तो तुम उनका सामना अधिक साहस से नहीं कर सकोगे। इस विश्वास को अपने हृदय से निकाल फेंकना होगा। अन्यथा चिंता तुम्हें कर्म करने में संकोची बना देगी। जहाँ तुम्हें स्वयं आगे बढ़कर आक्रमण करना चाहिए, वहाँ तुम्हें दूसरों के धक्के की आवश्यकता पड़ेगी।

    निस्संदेह, हमारा दर्शन चाहेगा कि ज़ेनो का तर्क सही सिद्ध हो और उसके विरोध में दिया गया तर्क मिथ्या तथा दोषपूर्ण माना जाए। पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं इन विषयों को तर्कशास्त्र के नियमों और पेशेवर तर्कविदों की उन घिसी-पिटी पहेलियों तक सीमित नहीं करता। मेरा मत है कि इस प्रकार की सारी बातों को एक ओर फेंक देना चाहिए। उनका परिणाम केवल इतना होता है कि सामने वाले को यह अनुभव होता है कि उसके साथ चालाकी की गई है। वह मानने के लिए विवश तो हो सकता है पर जो वह स्वीकार करता है, वास्तव में उसके मन का विश्वास वह नहीं होता। सत्य के पक्ष में दिए जाने वाले भाषण अधिक सरल होने चाहिए और भय के विरुद्ध दिए जाने वाले भाषण अधिक साहसपूर्ण।

    मेरी इच्छा तो यह होगी कि उनके इन उलझे हुए तर्कों को सीधा और सरल करके प्रस्तुत करूँ ताकि लोगों को छलकर नहीं बल्कि उन्हें विश्वास दिलाकर समझा सकूँ। जब कोई सेनापति अपनी सेना को युद्ध में ले जाने वाला होता है, जहाँ उन्हें अपनी पत्नियों और बच्चों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने हैं, तब वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता है? वह फैबियस कुल का स्मरण कराता है, जिसके एक ही परिवार ने अपने देश के समस्त युद्ध का भार अपने ऊपर उठा लिया था। वह थर्मोपाइली की संकरी घाटी में डटे स्पार्टनों का स्मरण कराता है। वे न विजय की आशा रखते थे, न घर लौटने की। वे जानते थे कि वही स्थान उनकी समाधि बनेगा। ऐसे वीरों को तुम किस प्रकार प्रेरित करोगे कि वे पूरे राष्ट्र के विनाश को रोकने के लिए अपने शरीरों को ढाल बना दें और अपना स्थान छोड़े बिना अपने प्राण दे दें? क्या तुम उनसे यह कहोगे, “कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती। पर मृत्यु गौरवपूर्ण है। इसलिए मृत्यु बुरी नहीं है”? कितना प्रभावशाली भाषण होगा यह! इसे सुनकर भला कौन बिना हिचकिचाए स्वयं को भालों के सामने फेंक देगा और खड़े-खड़े मर जाना स्वीकार कर लेगा? इसके विपरीत, लियोनिदास ने अपने सैनिकों को कितने साहस के साथ संबोधित किया। उसने कहा, “सैनिकों, अपना नाश्ता कर लो। रात का भोजन हेडीज़ में होगा।” यह सुनकर उन्हें भोजन निगलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। न भोजन उनके गले में अटका, न हाथों से गिरा। वे उत्साहपूर्वक अपना नाश्ता करने बैठे और अपने अंतिम भोजन की ओर भी उसी उत्साह से चले। उस रोमन सेनापति का क्या कहना, जिसने अपने सैनिकों को शत्रुओं की विशाल सेना द्वारा संरक्षित एक स्थान पर अधिकार करने के लिए भेजते समय कहा, “सैनिकों, वहाँ जाना आवश्यक है। लौटकर आना आवश्यक नहीं।” देखो, सद्गुण कितना सरल, कितना स्पष्ट और कितना आदेशात्मक होता है।

    पर तुम्हारी इन तर्क-कपटपूर्ण युक्तियों से भला कौन अधिक दृढ़ या अधिक साहसी बन सकता है? वे तो मनोबल को ही कुचल देती हैं। जबकि यदि कोई ऐसा समय है जब मन को संकीर्ण और उलझे हुए तर्कों की काँटेदार गलियों में नहीं ठूँसा जाना चाहिए तो वह वही समय है जब मनुष्य किसी महान कार्य के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो। हमारा कार्य केवल तीन सौ सैनिकों के मन से मृत्यु का भय दूर करना नहीं है बल्कि उन सभी मनुष्यों के मन से उसे दूर करना है जो नश्वर हैं। तुम उन्हें कैसे सिखाओगे कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है? बचपन से ही मन में बैठी हुई धारणाओं को तुम कैसे मिटाओगे? मानवीय दुर्बलता के लिए तुम्हारे पास कौन-सी सहायता है? तुम्हारे कौन-से शब्द लोगों के हृदय में ऐसा उत्साह भर देंगे कि वे स्वयं संकट के बीच कूद पड़ें? तुम्हारा कौन-सा भाषण भय के साथ किए गए उस मौन समझौते को तोड़ देगा? तुम्हारी कौन-सी वाणी समस्त मानव जाति के उन विश्वासों को उलट देगी, जो तुम्हारे विरुद्ध खड़े हैं? तुम मुझे इन पहेलीनुमा शब्दों और चालाकी से गढ़े गए छोटे-छोटे प्रश्नों के जाल प्रस्तुत करते हो! इतने बड़े शत्रु के विरुद्ध यही तुम्हारे महान अस्त्र हैं!

    अफ्रीका का वह भयानक सर्प रोमन सेनाओं के लिए स्वयं युद्ध से भी अधिक भयावह था। उन्होंने उस पर गुलेलों और तीरों की वर्षा की, पर सब व्यर्थ गया। यदि पाइथन का वध करने वाला अपोलो भी वहाँ होता तो शायद वह भी उसे घायल न कर पाता। उसके विशाल शरीर और अभेद्य चमड़े ने लोहे और मनुष्य द्वारा चलाए जा सकने वाले हर अस्त्र का सामना कर लिया। अंततः चक्की के विशाल पाटों ने उसे कुचलकर मार डाला। तो क्या तुम मृत्यु जैसे शत्रु के सामने ऐसे छोटे-छोटे बाण चलाओगे? क्या तुम सिंह का सामना एक पिन से करोगे? तुम्हारे तर्क भले ही बहुत पैने हों पर भूसे का तिनका भी नुकीला होता है। कभी-कभी कोई वस्तु अपनी अत्यधिक बारीकी के कारण ही निष्प्रभावी और निरर्थक हो जाती है।


अभी के लिए विदा 

Wednesday, 22 July 2026

उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना चाहिए या अपने स्वयं के प्रयासों का। किन्तु यदि तुम इस अनुभव के कारण दूसरों पर उपकार करना छोड़ देना चाहते हो तो तुम्हारा यह प्रयास तुम्हें केवल कठोर और अनुदार ही बनाएगा। क्योंकि यदि तुम वर्तमान परिस्थिति का जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगे तो तुम किसी पर भी उपकार नहीं कर पाओगे। तब परिणाम यह होगा कि उपकार केवल कृतघ्न व्यक्ति के साथ ही नष्ट नहीं होगा बल्कि तुम्हारे साथ भी समाप्त हो जाएगा। इससे तो यह कहीं बेहतर है कि कुछ उपकारों का प्रत्युत्तर न मिले, बजाय इसके कि उपकार करना ही छोड़ दिया जाए। खराब फसल होने के बाद भी किसान बीज बोना नहीं छोड़ता। अनेक वर्षों तक बंजर भूमि में जो हानि होती रही हो, वह कभी-कभी केवल एक ही वर्ष में उपजाऊ भूमि के कारण पूरी हो जाती है। इसी प्रकार, एक कृतज्ञ व्यक्ति को पाने के लिए कुछ कृतघ्न लोगों का सामना करना भी सार्थक है। कोई भी इतना अचूक नहीं होता कि उपकार करते समय कभी भूल न करे। कुछ उपकार व्यर्थ चले जाएँ ताकि कुछ अपने सही लक्ष्य तक पहुँच सकें। जहाज़ डूब जाने के बाद भी लोग फिर समुद्र की यात्रा पर निकलते हैं। एक बुरे ऋण के कारण साहूकार बाज़ार में धन उधार देना बंद नहीं कर देता। यदि हर उस कार्य को छोड़ दिया जाए जिसमें बाधाएँ आती हैं तो जीवन का सारा प्रवाह ही रुक जाएगा। इसलिए तुम्हारे साथ जो हुआ है, वह तुम्हें और भी अधिक उदार बनाए। क्योंकि जिन कार्यों का परिणाम निश्चित नहीं होता, उन्हें बार-बार करना चाहिए ताकि कभी-न-कभी सफलता अवश्य प्राप्त हो सके।



    लेकिन इस विषय पर मैं अपनी कार्य (संभवतः पुस्तक) उपकार (De Beneficiis) में पर्याप्त चर्चा कर चुका हूँ।इस समय मेरे विचार में एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अब तक संतोषजनक ढंग से विचार नहीं किया गया है। मान लो, किसी व्यक्ति ने पहले हमारा कोई उपकार किया, किन्तु बाद में उसी ने हमारा अहित भी किया। तो क्या यह माना जाए कि उसने अपने पहले किए गए उपकार और बाद में पहुँचाई गई हानि को बराबर कर दिया। इस प्रकार हमारे ऊपर उसका जो कृतज्ञता का ऋण था, वह समाप्त हो गया? यदि चाहो तो इस प्रश्न को और भी कठिन बना सकते हो। मान लो कि बाद में उसने जो हानि पहुँचाई, वह पहले किए गए उपकार से कहीं अधिक बड़ी थी। तब क्या हमें उसके पहले किए गए उपकार को स्मरण रखना चाहिए या उसकी बाद की हानि को अधिक महत्त्व देना चाहिए?

    यदि तुम उस कठोर और अडिग न्यायाधीश का मत पूछो, जो लोकोक्ति के अनुसार अत्यंत सख्त निर्णय देता है तो वह कहेगा कि एक कर्म दूसरे को निरस्त कर देता है। वह कहेगा, “यद्यपि हानि का पलड़ा भारी है, फिर भी जो अंतर बचता है, उसे उपकार के पक्ष में मान लो।” बाद में हुई हानि अधिक बड़ी थी, किन्तु उपकार पहले किया गया था। इसलिए निर्णय करते समय समय के क्रम का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त कुछ और बातें भी विचारणीय हैं, जो इतनी स्पष्ट हैं कि उन्हें अलग से याद दिलाने की आवश्यकता नहीं। जैसे—उपकार करते समय उसकी इच्छा कितनी सच्ची थी और हानि पहुँचाते समय उसकी अनिच्छा कितनी थी। क्योंकि उपकार और अपकार, दोनों का वास्तविक मूल्य मनुष्य की भावना और उद्देश्य पर निर्भर करता है।कोई कह सकता है, “मैं उपकार करना नहीं चाहता था। मुझे लज्जा के कारण ऐसा करना पड़ा या लोगों के बार-बार आग्रह ने मुझे विवश कर दिया अथवा मैंने यह सोचकर उपकार किया कि इससे मुझे कोई लाभ होगा।” किसी उपकार के प्रति कृतज्ञता भी उतनी ही होनी चाहिए जितनी सच्ची भावना से वह उपकार किया गया था। इसलिए हम केवल उपकार के आकार या मात्रा को नहीं तौलते बल्कि उसे देने वाले की सद्भावना और इच्छा को भी तौलते हैं। अब यदि सभी अनुमान और संदेहों को एक ओर रख दें और यह मान लें कि पहला कार्य वास्तव में उपकार था तथा बाद का कार्य वास्तव में उससे अधिक बड़ा अपकार था, तब भी एक सज्जन मनुष्य अपना हिसाब इस प्रकार करेगा कि उसका झुकाव अपने ही विरुद्ध होगा। वह उपकार के मूल्य को बढ़ाकर आँकेगा और अपकार के मूल्य को घटाकर देखेगा।

    दूसरा न्यायाधीश, जो अधिक उदार है और जिसकी राय को मैं स्वयं अधिक पसंद करता हूँ, तुमसे कहेगा कि अपकार को भूल जाओ किन्तु उपकार को स्मरण रखो। तुम कह सकते हो, “न्याय तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित प्रतिफल दिया जाए, उपकार के बदले कृतज्ञता और अपकार के बदले प्रतिशोध या कम-से-कम मन में रोष।” यह बात तब तक सही है, जब उपकार करने वाला और अपकार करने वाला दो अलग-अलग व्यक्ति हों। किन्तु यदि उपकार और अपकार, दोनों एक ही व्यक्ति ने किए हों तो उसके पहले किए गए उपकार का प्रभाव उसके बाद के अपकार को बहुत सीमा तक निष्प्रभावी कर देता है। यदि कोई व्यक्ति बिना पहले कोई उपकार किए भी क्षमा का पात्र हो सकता है तो जिसने पहले हमारे साथ भलाई की हो और बाद में कोई गलती कर बैठे, वह तो केवल क्षमा ही नहीं, उससे भी अधिक उदार व्यवहार का अधिकारी है। मैं उपकार और अपकार इन दोनों का मूल्य समान नहीं मानता। मेरे विचार में, एक उपकार का मूल्य एक अपकार से कहीं अधिक होता है।

    हर व्यक्ति यह नहीं जानता कि कृतज्ञ कैसे होना चाहिए। कोई विचारहीन, अशिक्षित या सामान्य जन भी यह समझ सकता है कि उस पर किसी का उपकार है, विशेषकर तब जब उसे वह उपकार हाल ही में प्राप्त हुआ हो। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उस उपकार का वास्तविक मूल्य कितना है और उसके प्रति उसका दायित्व किस सीमा तक है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही जानता है कि प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक उपकार का उचित मूल्य क्या है। जिस व्यक्ति का मैंने अभी उल्लेख किया जो सद्भावना रखने पर भी विवेकहीन है, वह उपकार का प्रतिदान या तो जितना करना चाहिए उससे कम करता है या फिर अनुचित समय पर, अनुचित स्थान पर अथवा अनुचित ढंग से करता है। इस प्रकार, जो प्रतिदान उचित रीति से किया जाना चाहिए था, वह व्यर्थ चला जाता है और मानो यूँ ही नष्ट हो जाता है।

    यह आश्चर्य की बात है कि कुछ अवसरों पर हमारी भाषा कितनी उपयुक्त सिद्ध होती है। हमारी प्राचीन भाषिक परंपरा ने कुछ बातों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो न केवल अत्यंत सटीक हैं बल्कि हमारे कर्तव्य का भी संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, हम सामान्यतः कहते हैं, “इस व्यक्ति ने उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की” (gratiam rettulit)। यहाँ 'व्यक्त की' या 'लौटाई' का अर्थ है जो तुम्हारा ऋण है, उसे अपनी स्वेच्छा से उसके वास्तविक अधिकारी के पास पहुँचा देना। हम यह नहीं कहते कि 'उसने कृतज्ञता वापस दे दी' (gratiam reddidit)। कोई वस्तु तो मनुष्य अनिच्छा से भी लौटा सकता है, अनुचित समय पर भी लौटा सकता है या किसी दूसरे के माध्यम से भी लौटा सकता है। इसी प्रकार हम यह भी नहीं कहते कि 'उसने उपकार का भुगतान कर दिया' (reposuit beneficium) या 'उसने उसका ऋण चुका दिया' (resolvit)। ये शब्द धन या ऋण चुकाने के लिए तो उपयुक्त हो सकते हैं किन्तु उपकार के प्रतिदान के लिए हमें उचित नहीं लगते। 'लौटाना' (render) का वास्तविक अर्थ है जिससे कोई वस्तु प्राप्त हुई हो, उसे स्वेच्छा से उसी के पास वापस पहुँचाना। इस शब्द में यह भाव निहित है कि कार्य किसी बाहरी दबाव से नहीं बल्कि अपनी ही प्रेरणा से किया गया है।

    बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह विचार करता है कि उसने कितना उपकार प्राप्त किया है, किससे प्राप्त किया है, कब, कहाँ, किस कारण और किस प्रकार प्राप्त किया है। इसीलिए हम कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही सही अर्थों में कृतज्ञता प्रकट करना जानता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल वही वास्तविक अर्थों में उपकार करना भी जानता है। स्वाभाविक ही है कि वही बुद्धिमान व्यक्ति उपकार करने में उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक आनंद अनुभव करता है, जितना अन्य लोग उपकार प्राप्त करने में करते हैं।

    कुछ लोग इसे हमारे दर्शनशास्त्र के उन कथनों में से एक मानते हैं जो सामान्य लोगों की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं। यूनानी ऐसे कथनों को पैराडॉक्सा (paradoxa) कहते हैं। वे कहते हैं, “क्या केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है? क्या कोई और व्यक्ति यह नहीं जानता कि लेनदार का ऋण कैसे चुकाया जाता है या किसी वस्तु का मूल्य कैसे अदा किया जाता है?” यदि हमारे दर्शन के प्रति इस कारण किसी के मन में रोष उत्पन्न हो तो यह जान लेना चाहिए कि एपिक्यूरस भी यही मत रखता है। कम-से-कम मेट्रोडोरस तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है। फिर यही मेट्रोडोरस आश्चर्य व्यक्त करते हैं जब हम कहते हैं, “केवल ज्ञानी ही प्रेम करना जानता है। केवल ज्ञानी ही सच्चा मित्र होता है।” किन्तु कृतज्ञता तो प्रेम और मित्रता, दोनों का ही एक अंग है। वास्तव में, कृतज्ञता का व्यवहार सच्ची मित्रता की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है और अधिक लोगों पर लागू होता है। फिर वही मेट्रोडोरस इस बात पर भी आश्चर्य करते हैं कि हम कहते हैं,“सच्ची निष्ठा केवल ज्ञानी में ही होती है।” मानो वे स्वयं ऐसा नहीं कहते हों! क्या तुम सचमुच यह मानते हो कि जो व्यक्ति कृतज्ञ होना ही नहीं जानता, वह निष्ठावान हो सकता है? अतः लोगों को यह आरोप लगाना छोड़ देना चाहिए कि हम ऐसी बातें कहते हैं जिन पर कोई विश्वास नहीं कर सकता।

    उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज्ञानी के भीतर जो दिखाई देता है, वह स्वयं सदाचार होता है जबकि सामान्य मनुष्य में केवल सदाचार की छाया या उसका आभास दिखाई देता है। ज्ञानी के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक अर्थ में कृतज्ञ होना नहीं जानता। यह अवश्य है कि मूर्ख व्यक्ति भी अपनी समझ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार कृतज्ञता प्रकट करता है। उसमें कमी उसकी सद्भावना की नहीं बल्कि उसके ज्ञान की होती है क्योंकि सद्भावना ऐसी वस्तु नहीं है जिसे सिखाया जाना पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति के सभी पक्षों का परस्पर संबंध देखकर उनका मूल्यांकन करता है। क्योंकि एक ही कार्य का महत्व समय, स्थान और उसके पीछे के उद्देश्य के अनुसार बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है। उचित समय पर दिए गए एक हजार डेनारियस किसी परिवार के लिए कभी-कभी उससे कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, जितना कि अनुचित समय पर उस पर पूरा धन-भंडार लुटा देना। इससे भी बहुत अंतर पड़ता है कि तुम केवल कोई उपहार दे रहे हो या वास्तव में किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता कर रहे हो। तुम्हारी उदारता किसी को विनाश से बचा रही है या केवल उसके लिए कोई उपयोगी वस्तु उपलब्ध करा रही है। अनेक बार उपहार आकार में छोटा होता है किन्तु उसके परिणाम अत्यंत महान होते हैं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इसमें भी बहुत बड़ा अंतर है कि दिया गया उपहार तुम्हारी अपनी कमाई और संपत्ति से दिया गया है या वह केवल किसी और से प्राप्त उपकार को आगे बढ़ाकर दिया गया है?

    किन्तु जिन बातों पर हम पहले ही पर्याप्त चर्चा कर चुके हैं, उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। जब उपकार और अपकार की तुलना की जाएगी, तब सज्जन व्यक्ति निश्चय ही यह विचार करेगा कि सबसे न्यायसंगत उत्तर क्या होना चाहिए। फिर भी उसका झुकाव उपकार की ओर ही रहेगा; वह उसी पक्ष को अधिक महत्व देगा। ऐसे मामलों में सामाजिक संबंधों और भूमिकाओं का भी बहुत महत्व होता है। कोई कह सकता है, “तुमने मेरे दास पर उपकार किया किन्तु मेरे पिता का अहित किया। तुमने मेरे पुत्र का जीवन बचाया पर मेरे पिता को मुझसे छीन लिया।” ऐसी प्रत्येक तुलना में इन और इसी प्रकार की अन्य परिस्थितियों का भी विचार किया जाएगा। यदि उपकार और अपकार के बीच का अंतर बहुत कम हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे अनदेखा कर देगा। बल्कि यदि अंतर काफी बड़ा भी हो किन्तु उसे स्वीकार करने से निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को कोई हानि न पहुँचती हो अर्थात यदि वह अपकार केवल उसी के व्यक्तिगत हित से संबंधित हो तो भी वह उसे क्षमा कर देगा। संक्षेप में, वह ऐसा व्यक्ति होगा जिससे समझौता करना सरल होगा। वह अपने ऊपर हुए उपकार को स्वीकार करने में उदार होगा और किसी अपकार के कारण पहले किए गए उपकार को निरर्थक मान लेने में अत्यन्त अनिच्छुक होगा। उसकी समस्त प्रवृत्ति और उसकी सभी इच्छाएँ कृतज्ञता और आभार की ओर ही उन्मुख रहेंगी।

    उपकार लौटाने की अपेक्षा उसे प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होना एक भूल है। जिस प्रकार ऋण चुकाने वाला व्यक्ति ऋण लेने वाले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होता है, उसी प्रकार हमें भी प्राप्त उपकार के महान ऋण से स्वयं को मुक्त करते समय उससे कहीं अधिक आनंद अनुभव करना चाहिए जितना उपकार प्राप्त करते समय हुआ था। कृतघ्न लोग इस विषय में भी भूल करते हैं। वे अपने धन के लेनदारों का ऋण तो ब्याज सहित चुका देते हैं किन्तु यह समझते हैं कि उपकारों को बिना किसी प्रतिदान के सदा अपने ऊपर रखा जा सकता है।वास्तव में, उपकार का ऋण भी समय बीतने के साथ बढ़ता जाता है। जितनी अधिक देर प्रतिदान करने में होती है, उतना ही अधिक लौटाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना किसी 'ब्याज' के उपकार का प्रतिदान करता है, वह कृतघ्न है। अर्थात उसे केवल उपकार के बराबर ही नहीं बल्कि उससे अधिक उत्साह, सम्मान और सद्भावना के साथ उसका प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए जब हम अपने प्राप्त उपकारों और उनके प्रतिदान का हिसाब लगाएँ, तब इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

    हमें यथासंभव अपनी पूरी कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इसका सबसे बड़ा लाभ अंततः हमारा अपना ही होता है। आखिर कृतज्ञता केवल न्याय नहीं है, जैसा कि सामान्यतः लोग समझते हैं। न्याय का संबंध मुख्यतः दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य से होता है जबकि कृतज्ञता का अधिकांश कल्याण स्वयं हमारे ही भीतर लौटकर आता है। जो व्यक्ति किसी दूसरे का उपकार करता है, वह वास्तव में अपना ही उपकार करता है। मेरा यह अर्थ नहीं है कि जिसे सहायता मिली है, वह आगे किसी और की सहायता करेगा या जिसकी रक्षा की गई है, वह दूसरों की रक्षा करेगा। न ही मेरा आशय यह है कि एक अच्छा कार्य केवल उदाहरण बनकर फिर उसी व्यक्ति के पास लौट आता है। बुरे उदाहरण भी अपने कर्ता के पास लौटते हैं। जिसने दूसरों को अन्याय करना सिखाया हो, जब वही अन्याय उसके साथ होता है तो उसे किसी की सहानुभूति नहीं मिलती। मेरा आशय यह है कि प्रत्येक सद्गुण स्वयं अपना पुरस्कार है। मनुष्य सद्गुणों का पालन किसी पुरस्कार को पाने के लिए नहीं करता। सही कर्म का सबसे बड़ा प्रतिफल यही है कि उसने सही कर्म किया। मैं कृतज्ञता इसलिए नहीं प्रकट करता कि मेरे उदाहरण से कोई दूसरा भी मेरे प्रति अधिक कृतज्ञ हो जाए। मैं कृतज्ञता इसलिए प्रकट करता हूँ क्योंकि ऐसा करना अपने-आप में अत्यंत सुखद और सुंदर कर्म है। मैं कृतज्ञ इसलिए नहीं होता कि यह लाभदायक है बल्कि इसलिए कि यह मेरे लिए प्रिय और आनंददायक है। यदि इसे सिद्ध करने के लिए ऐसी स्थिति आ जाए कि मैं केवल कृतघ्न दिखाई देकर ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकता हूँ, यदि किसी उपकार का प्रतिदान करने का एकमात्र उपाय यह हो कि लोग मुझे किसी का अहित करने वाला समझें तो भी मैं निःसंकोच बदनामी के बीच अपने सम्मानपूर्ण उद्देश्य को पूरा करूँगा। मेरे विचार में, सद्गुण का मूल्य उससे अधिक कोई नहीं समझता और उसके प्रति उससे अधिक निष्ठावान कोई नहीं होता, जिसने अपनी अंतरात्मा को निर्मल बनाए रखने के लिए अपनी अच्छी प्रतिष्ठा तक का बलिदान दे दिया हो।

    इसलिए, जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारी कृतज्ञता दूसरे व्यक्ति के हित से अधिक तुम्हारे अपने हित के लिए होती है। दूसरे व्यक्ति को तो केवल एक साधारण-सी वस्तु प्राप्त होती है, उसे वही वापस मिल जाता है जो उसने पहले दिया था। परन्तु तुम्हें उससे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तु प्राप्त होती है। ऐसी वस्तु, जो मन की सर्वोत्तम अवस्था से उत्पन्न होती है: कृतज्ञता। यदि दुर्गुण मनुष्य को दुःखी बनाता है और सद्गुण उसे सुखी करता है तथा यदि कृतज्ञता एक सद्गुण है तो तुमने भले ही साधारण-सी वस्तु लौटाई हो। किन्तु बदले में तुमने वह अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली है जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, एक कृतज्ञ हृदय। ऐसा हृदय केवल दिव्य और धन्य आत्मा ही प्राप्त कर सकती है। 

    इसके विपरीत अवस्था में रहने वाला व्यक्ति भीतर से गहरे असंतोष का अनुभव करता है। जो दूसरों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, वह कभी अपने ही मन की दृष्टि में सम्मानित नहीं हो सकता। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह कह रहा हूँ कि कृतघ्न व्यक्ति भविष्य में कभी दुखी होगा? नहीं, मैं उसे इतना भी समय नहीं देता। वह तो इसी क्षण दुखी है। इसलिए हमें कृतघ्नता से दूसरों के हित के लिए नहीं बल्कि अपने ही हित के लिए बचना चाहिए। मनुष्य की दुष्टता का केवल सबसे छोटा और हल्का भाग ही दूसरों तक पहुँचता है। उसका सबसे घना और सबसे विषैला भाग तो उसी के भीतर रह जाता है और उसी का जीवन दूषित करता रहता है। जैसा कि हमारे मित्र अटालुस कहा करते थे—

“दुर्गुण अपना अधिकांश विष स्वयं ही पी जाता है।”

यह विष उस विष के समान नहीं है जिसे साँप दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए बनाते हैं जबकि स्वयं उससे अप्रभावित रहते हैं। यह तो ऐसा विष है जो सबसे अधिक उसी व्यक्ति को नष्ट करता है जिसके भीतर वह रहता है। कृतघ्न व्यक्ति स्वयं अपने को यातना देता है, स्वयं अपने लिए कष्ट का कारण बनता है। वह अपने ऊपर किए गए उपकारों से घृणा करने लगता है क्योंकि उन्हें लौटाने का दायित्व उसे बोझ प्रतीत होता है। इसलिए वह उन उपकारों के महत्व को कम करके आँकता है, जबकि अपने साथ हुए अपकारों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है।इससे अधिक दुखद स्थिति और क्या हो सकती है कि मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सभी उपकारों को भुला दे जबकि केवल अपने साथ हुए अपकारों को ही स्मरण रखे?

    इसके विपरीत, बुद्धिमत्ता प्रत्येक उपकार के मूल्य को और अधिक बढ़ा देती है। वह उन्हें अपने मन में आदरपूर्वक संजोकर रखती है और उनके निरंतर स्मरण में आनंद का अनुभव करती है। दुष्ट व्यक्ति को उपकार से केवल एक ही सुख मिलता है, और वह भी थोड़े समय के लिए जब वह उपकार प्राप्त कर रहा होता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद स्थायी और चिरस्थायी होता है। उसका सुख उपकार प्राप्त करने में नहीं बल्कि इस बात में होता है कि उसे कभी उपकार प्राप्त हुआ था। यही स्मृति उसके लिए सदा बनी रहती है और कभी नष्ट नहीं होती। वह अपने साथ हुए अपकारों को महत्व नहीं देता। वह उन्हें लापरवाही के कारण नहीं बल्कि अपनी इच्छा से भुला देता है। वह हर बात का सबसे बुरा अर्थ नहीं निकालता और न ही अपने दुर्भाग्य के लिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की तलाश करता है। बल्कि दूसरों के अनुचित व्यवहार का कारण भी वह प्रायः भाग्य को ही मान लेता है। वह लोगों के शब्दों या उनके चेहरे के भावों में दोष नहीं खोजता। जो कुछ भी घटित होता है, उसकी वह यथासंभव सद्भावनापूर्ण व्याख्या करता है, और इसी कारण जीवन की कठिनाइयाँ उसके लिए अधिक सहनीय हो जाती हैं। वह उपकारों की अपेक्षा अपकारों को अधिक याद रखने वाला व्यक्ति नहीं होता। जहाँ तक संभव हो, वह लोगों के साथ जुड़े पुराने और अच्छे प्रसंगों को ही स्मरण करता है। जो लोग कभी उसके प्रति उपकारी रहे हों, उनके प्रति वह अपना दृष्टिकोण तब तक नहीं बदलता, जब तक कि उनके अपराध इतने अधिक और इतने स्पष्ट न हो जाएँ कि उन्हें अनदेखा करना असंभव हो। तब भी वह केवल उतना ही बदलता है जितना उस व्यक्ति के पहले उपकार से पूर्व उसका संबंध था। क्योंकि जब अपकार का परिमाण उपकार के बराबर भी हो जाए, तब भी उसके मन में कुछ सद्भावना शेष रहती है। जिस प्रकार किसी न्यायालय में मत बराबर हो जाने पर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया जाता है। प्रत्येक संदिग्ध मामले में उदारता बेहतर पक्ष का समर्थन करती है, उसी प्रकार जब किसी व्यक्ति के अच्छे और बुरे कार्य समान हो जाते हैं, तब बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह मानना छोड़ देता है कि वह उसका ऋणी है। किन्तु वह कृतज्ञ बने रहने की इच्छा नहीं छोड़ता। वह उन लोगों के समान होता है जो ऋण माफ़ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से अपना ऋण चुका देते हैं।

    कोई भी व्यक्ति तब तक सच्चे अर्थों में कृतज्ञ नहीं हो सकता, जब तक वह उन वस्तुओं को अधिक महत्व देना न छोड़ दे जिनके पीछे सामान्य लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। यदि तुम किसी उपकार का वास्तविक प्रतिदान करना चाहते हो तो तुम्हें आवश्यकता पड़ने पर निर्वासन सहने के लिए तैयार रहना होगा। अपना रक्त बहाने के लिए भी तैयार रहना होगा। निर्धनता का सामना करना होगा और कई बार तो अपनी प्रतिष्ठा तक को दाँव पर लगाना होगा तथा ऐसे अपवादों और बदनामी को भी सहना होगा जिसके तुम अधिकारी नहीं हो। कृतज्ञता का मूल्य बहुत बड़ा होता है। वह बिना किसी त्याग के प्राप्त नहीं होती। जब तक हम किसी उपकार की आशा करते रहते हैं, तब तक हमें उससे बढ़कर कोई वस्तु मूल्यवान नहीं लगती। किन्तु जैसे ही वह उपकार हमें प्राप्त हो जाता है, हम उसी का सबसे कम मूल्य आँकने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हम प्राप्त उपकारों को भूल जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमें और अधिक पाने की लालसा लगी रहती है। हमारा ध्यान इस बात पर नहीं रहता कि हमें अब तक क्या-क्या मिल चुका है। हम केवल अगली माँग और अगली प्राप्ति के बारे में सोचते रहते हैं। धन, सम्मान, सत्ता और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ जो हमारी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उनका मूल्य बहुत कम है। हमें सत्य और सदाचार के मार्ग से भटका देती हैं। हम वस्तुओं का वास्तविक मूल्यांकन करना ही नहीं जानते। इसलिए हमें अपने निर्णयों का आधार लोकमत को नहीं बनाना चाहिए। हमें वस्तुओं के वास्तविक स्वभाव को देखना चाहिए। इन बाहरी वस्तुओं में अपने-आप में ऐसा कुछ भी अद्भुत नहीं है जो हमारे मन को आकर्षित करे। उन्हें आकर्षक बनाने वाली केवल हमारी वह आदत है जिसके कारण हम उनका आदर और प्रशंसा करते आए हैं। वे इसलिए मूल्यवान नहीं मानी जातीं कि वे वास्तव में वांछनीय हैं; बल्कि वे इसलिए वांछनीय प्रतीत होती हैं क्योंकि लोग उन्हें मूल्यवान मानते हैं। इस प्रकार, पहले व्यक्तियों की भूल से समाज में एक भ्रम उत्पन्न होता है, और फिर वही सामाजिक भ्रम आगे चलकर प्रत्येक व्यक्ति को फिर से भ्रमित करता रहता है।

    किन्तु चूँकि हम सामान्यतः लोकमत पर विश्वास करते हैं तो इस विषय में भी हमें उसी पर विश्वास करना चाहिए कि कृतज्ञता से बढ़कर कोई सद्गुण और कोई सम्माननीय गुण नहीं है। सभी राष्ट्र, यहाँ तक कि सबसे असभ्य माने जाने वाले लोग भी इस बात पर एकमत हैं। इस विषय में सज्जन और दुष्ट, दोनों समान रूप से सहमत हैं। कुछ लोग सुख को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं जबकि कुछ कठिन परिश्रम और तपस्या को श्रेष्ठ समझते हैं। कुछ कहते हैं कि दुख सबसे बड़ी बुराई है, तो कुछ का मत है कि दुख बुराई ही नहीं है। कोई धन को सबसे बड़ा शुभ मानता है तो कोई कहता है कि धन मानव जीवन के लिए अभिशाप है। सबसे बड़ा धन वही है जहाँ भाग्य के पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी शेष न हो। इन सब मतभेदों के बावजूद एक बात ऐसी है, जिस पर सभी एक स्वर से सहमत हैं, जब किसी ने हमारा उपकार किया हो तो हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इतने विविध विचारों वाले लोग भी इस एक विषय पर एकमत हैं। फिर भी विडंबना यह है कि अनेक बार हम उपकार के बदले अपकार कर बैठते हैं। लोगों के कृतघ्न होने का पहला कारण यह है कि वे उतने कृतज्ञ हो ही नहीं पाते, जितना उन्हें होना चाहिए।

    यह पागलपन अब इतनी चरम सीमा तक पहुँच गया है कि किसी पर बहुत बड़ा उपकार करना भी अत्यंत जोखिम भरा हो गया है। क्योंकि जिसे उपकार प्राप्त होता है, वह उसका प्रतिदान न कर पाने की लज्जा से इतना व्याकुल हो उठता है कि वह यही चाहता है कि वह व्यक्ति ही न रहे, जिसके प्रति उसे अपना ऋण चुकाना है।जो कुछ तुम्हें दिया गया है, उसे अपने पास ही रहने दो। मैं उसे वापस नहीं माँगता। न मैं उस पर कोई आग्रह करता हूँ। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी सहायता बिना किसी भय और दंड के कर सकूँ। उस घृणा से अधिक घातक कोई घृणा नहीं होती, जो इस लज्जा से उत्पन्न होती है कि मनुष्य किसी के उपकार का उचित प्रतिदान नहीं कर सका और इस प्रकार उस उपकार को व्यर्थ जाने दिया।


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थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर)

भाग दो : मार्केसा दे मोंतेमायोर आज किसी भी स्पेनी स्कूली बच्चे से अपेक्षा की जाती है कि वह डोना मारिया , मार्केसा दे मोंतेमायोर के बारे ...