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Saturday, 18 July 2026

मितव्ययिता, आत्मसंयम और साहस के मार्ग के बारे में -- पत्र - 72 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मेरे विचार में लोग यह मानने में भूल करते हैं कि जो लोग दर्शन के प्रति पूर्णतः समर्पित होते हैं, वे हठी, असहयोगी और शासकों, राजाओं अथवा राज्य का संचालन करने वाले किसी भी व्यक्ति का बहुत कम सम्मान करते हैं। वस्तुतः स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। उनसे अधिक कृतज्ञ कोई नहीं होता और इसका उचित कारण भी है क्योंकि शांतिपूर्ण अवकाश में जीवन बिताने का जो अवसर उन्हें राज्य-व्यवस्था से प्राप्त होता है, उसका लाभ उनसे अधिक किसी को नहीं मिलता।


By Paul Klee 

    इसलिए जिन लोगों के उत्तम जीवन जीने का उद्देश्य राज्य की सुरक्षा और स्थिरता से अत्यधिक सुदृढ़ हुआ है, वे इस महान उपकार के लिए उत्तरदायी शासक का सम्मान माता-पिता के समान करते हैं। वे उन चंचल स्वभाव के लोगों से कहीं अधिक कृतज्ञ होते हैं, जो व्यापार, राजनीति और सार्वजनिक कार्यों में निरन्तर लगे रहते हैं। यद्यपि ऐसे लोग भी अपने शासकों के बहुत ऋणी होते हैं, फिर भी उनकी अपेक्षाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। उन पर कितनी ही उदारता क्यों न की जाए, उनकी इच्छाएँ तृप्त नहीं होतीं। उन्हें जितना अधिक मिलता है, वे उतना ही अधिक चाहते हैं। जिसका मन केवल और अधिक पाने में लगा रहता है, वह यह भूल जाता है कि उसे पहले से कितना कुछ मिल चुका है। लोभ के सभी दोषों में सबसे बड़ा दोष कृतघ्नता है। इसके अतिरिक्त, जो लोग सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय रहते हैं, वे कभी यह नहीं सोचते कि उन्होंने कितने लोगों को पीछे छोड़ दिया है। उनका ध्यान केवल उन लोगों पर रहता है जो अभी भी उनसे आगे हैं। अपने पीछे छूटे हुए अनेक लोगों को देखकर उन्हें जितना आनंद नहीं मिलता, उससे कहीं अधिक पीड़ा उन्हें इस बात से होती है कि कोई एक व्यक्ति भी उनसे आगे है। यही सभी प्रकार की महत्त्वाकांक्षा का दोष है। वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती। केवल महत्त्वाकांक्षा ही नहीं, प्रत्येक प्रकार की इच्छा का यही स्वभाव है कि वह कभी विश्राम नहीं करती क्योंकि इच्छा की पूर्ति होते ही वह किसी नई इच्छा का आरम्भ कर देती है।

    किन्तु जो मनुष्य निष्कलंक और निर्मल चरित्र वाला है, जिसने सीनेट और न्यायालय के कार्यों को छोड़कर जीवन के व्यापक और उच्चतर उद्देश्यों को अपनाया है, वह उन लोगों के प्रति प्रेम और कृतज्ञता रखता है जिनके प्रयासों के कारण वह सुरक्षित वातावरण में ऐसा जीवन जी सकता है। वही एक ऐसा व्यक्ति है जो बिना किसी स्वार्थ के उनका समर्थन करता है क्योंकि वह उनके प्रति एक महान ऋण अनुभव करता है, यद्यपि वे स्वयं इस बात से अनभिज्ञ रहते हैं। जिस प्रकार वह अपने उन आचार्यों का सम्मान और आदर करता है, जिनके मार्गदर्शन ने उसे भटकाव और अज्ञान के निर्जन मार्ग से बाहर निकाला, उसी प्रकार वह उन शासकों और संरक्षकों का भी आदर करता है, जिनकी सुरक्षा और संरक्षण में रहकर वह ज्ञान, संस्कृति और दर्शन के अध्ययन तथा साधना में अपना जीवन समर्पित कर पाता है।

    "किन्तु राजा तो अपनी शक्ति से अन्य लोगों की भी रक्षा करता है।" इस बात से कौन इनकार करता है? किन्तु जैसे अनुकूल मौसम का लाभ समुद्र में यात्रा करने वाले सभी लोगों को मिलता है, फिर भी जिसका जहाज़ अधिक मूल्यवान और अधिक बहुमूल्य माल से भरा होता है, वह समुद्र-देवता नेप्च्यून के प्रति अधिक कृतज्ञता अनुभव करता है। व्यापारी अपनी मनौती साधारण माल ढोने वाले जहाज़ के स्वामी की अपेक्षा अधिक श्रद्धा से पूरी करता है। व्यापारियों में भी जो व्यक्ति सोना देकर खरीदे जाने वाले मसाले और विलासिता की बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर जा रहा होता है, वह उस व्यापारी की अपेक्षा कहीं अधिक कृतज्ञ होता है, जिसका जहाज़ केवल सस्ते सामान से भरा होता है, जिसे मुख्यतः जहाज़ का संतुलन बनाए रखने के लिए रखा गया हो। ठीक इसी प्रकार, जिस शान्ति का लाभ हम सबको समान रूप से मिलता है, उसका वास्तविक मूल्य वे लोग अधिक गहराई से अनुभव करते हैं, जो उसका सदुपयोग करते हैं। आज के समय में भी अनेक ऐसे लोग हैं जो शान्तिकाल में युद्धकाल की अपेक्षा अधिक अनुचित कार्यों में लगे रहते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि जो लोग शान्ति को मद्यपान, वासना और अन्य दुर्व्यसनों में नष्ट कर देते हैं? ऐसे दुर्व्यसन जिन्हें रोकने के लिए यदि युद्ध भी करना पड़े तो वह उचित हो, वे भी शान्ति के प्रति उतनी ही कृतज्ञता अनुभव करते हैं, जितनी वे लोग जो उसका श्रेष्ठ उपयोग करते हैं?

    निश्चय ही तुम यह नहीं सोचते कि बुद्धिमान व्यक्ति इतना अन्यायी होगा कि उन उपकारों के लिए स्वयं को कृतज्ञ न माने, जिनका लाभ सबको समान रूप से प्राप्त होता है। मैं सूर्य और चन्द्रमा का बहुत ऋणी हूँ, यद्यपि वे केवल मेरे लिए उदित नहीं होते। मैं ऋतुओं का भी अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऋणी हूँ और उस ईश्वर का भी, जो उनका संचालन करता है, यद्यपि इन सबकी व्यवस्था केवल मेरे सम्मान के लिए नहीं की गई है। मनुष्यों का मूर्खतापूर्ण लोभ ही स्वामित्व और अधिकार के बीच भेद करता है। वह यह मानता है कि जो वस्तु सबकी है, वह किसी एक व्यक्ति की अपनी नहीं हो सकती। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति यह समझता है कि उससे अधिक उसकी अपनी कोई वस्तु नहीं है, जो केवल उसी को नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति को समान रूप से प्राप्त हुई है। क्योंकि यदि कोई वस्तु सबकी साझी है, तो उसका एक अंश प्रत्येक व्यक्ति का भी है। इस प्रकार वह उन सभी वस्तुओं में अपना अधिकार अनुभव करता है, जो सामान्य रूप से सबकी साझा संपत्ति हैं, चाहे उसका हिस्सा कितना ही छोटा क्यों न हो।

    इसके अतिरिक्त, जो वस्तुएँ वास्तव में महान कल्याण हैं, वे इस अर्थ में साझा नहीं होतीं कि उनका थोड़ा-थोड़ा भाग प्रत्येक व्यक्ति को बाँट दिया जाए बल्कि वे प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त होती हैं। धन के वितरण में प्रत्येक व्यक्ति केवल उतनी ही राशि प्राप्त करता है, जितनी उसके लिए निर्धारित होती है। अन्न, मांस और अन्य भौतिक दान भी बाँटकर प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से के रूप में घर ले जाता है। किन्तु शान्ति और स्वतंत्रता जैसे अविभाज्य कल्याण ऐसे नहीं हैं। वे सभी को भी पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति को भी पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं।

    इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति यह विचार करता है कि वह कौन है, जिसके कारण उसे इन सब वस्तुओं का उपयोग और उनका आनंद लेने का अवसर प्राप्त होता है? कौन है जो उसे सार्वजनिक आवश्यकताओं के कारण युद्ध में बुलाए जाने, पहरेदारी करने, नगर की प्राचीरों की रक्षा करने और युद्ध से जुड़ी अनेक अन्य जिम्मेदारियों से मुक्त रखता है? इस उपकार के लिए वह अपने शासक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण उपदेश यही है कि उपकार का ऋण किस प्रकार स्वीकार किया जाए और उसे किस प्रकार चुकाया जाए। किन्तु कई बार केवल कृतज्ञतापूर्वक उस ऋण को स्वीकार कर लेना ही उसका पर्याप्त प्रतिदान होता है। इस प्रकार वह स्वीकार करेगा कि वह उस शासक का बहुत बड़ा ऋणी है, जिसकी बुद्धिमत्तापूर्ण शासन-व्यवस्था ने उसे अवकाश के फलदायी क्षण, अपने समय पर अधिकार और सार्वजनिक दायित्वों से मुक्त शांत जीवन का वरदान दिया है।

"हे मेलिबोयस, हमारे लिए इस शान्ति की व्यवस्था किसी देवता ने की है। 
मेरे लिए तो वह पुरुष सदैव देवता के समान रहेगा।"

शासक का उपकार केवल शान्तिकाल के लिए ही नहीं बल्कि उस शान्ति के उन अमूल्य उपहारों के लिए भी है, जिनका वर्णन इन पंक्तियों में किया गया है—

"उसी ने मेरी गायों को आज की भाँति निश्चिन्त होकर चरने दिया
और उसी ने मुझे यह स्वतंत्रता दी कि मैं अपनी ग्रामीण बाँसुरी पर अपनी इच्छानुसार धुनें बजा सकूँ।"

तो फिर उस शान्ति का मूल्य हम कितना आँक सकते हैं, जो हमें देवताओं के समान शांत जीवन जीने का अवसर देती है और जो एक अर्थ में हमें स्वयं भी देवतुल्य बना देती है?

    हाँ, लूसीलियस, देवताओं तक! मैं तुम्हें स्वर्ग की ओर और वह भी सबसे सीधे मार्ग से बुला रहा हूँ। सेक्स्टियस कहा करते थे कि एक सद्गुणी मनुष्य की शक्ति जुपिटर के समान होती है। निस्संदेह, जुपिटर मनुष्यों को देने के लिए अधिक सामर्थ्य रखता है। किन्तु जब दो व्यक्ति समान रूप से बुद्धिमान हों, तब उनमें से एक के अधिक धनी होने से वह दूसरे से श्रेष्ठ नहीं हो जाता। ठीक वैसे ही जैसे तुम किसी कुशल नाविक को केवल इसलिए दूसरे से अधिक योग्य नहीं मानोगे कि उसका जहाज़ अधिक बड़ा और अधिक भव्य है। तो फिर जुपिटर किस अर्थ में सद्गुणी मनुष्य से श्रेष्ठ है? केवल इस अर्थ में कि उसका अस्तित्व अधिक समय तक बना रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को इसलिए कम मूल्यवान नहीं मानता कि उसके सद्गुणों का अभ्यास सीमित समय तक ही रहता है।जिस प्रकार दो बुद्धिमान व्यक्तियों में से वह अधिक धन्य नहीं कहा जा सकता जो अधिक आयु तक जीवित रहा और न ही वह कम धन्य है जिसकी सद्गुणपूर्ण जीवन-यात्रा अपेक्षाकृत कम वर्षों तक चली। उसी प्रकार ईश्वर भी केवल अपने अधिक काल तक बने रहने के कारण बुद्धिमान मनुष्य से अधिक धन्य नहीं हो जाता। सद्गुण की महानता उसकी अवधि से नहीं मापी जाती। वह अधिक समय तक टिकने मात्र से अधिक महान नहीं हो जाता।

    जुपिटर के पास सब कुछ है, फिर भी वह उन सब वस्तुओं को दूसरों के उपयोग के लिए प्रदान करता है। उन वस्तुओं पर उसका अधिकार केवल इस अर्थ में है कि वही दूसरों को उनका उपयोग करने का अवसर देता है।बुद्धिमान व्यक्ति भी दूसरों की संपत्तियों को उसी शान्त भाव से देखता है और उनसे अनासक्त रहता है, जैसे जुपिटर रहता है। बल्कि वह स्वयं को जुपिटर से भी अधिक सम्मान के योग्य समझता है क्योंकि जुपिटर उन वस्तुओं का उपयोग नहीं कर सकता, जबकि बुद्धिमान मनुष्य उनका उपयोग करना ही नहीं चाहता। 

    इसलिए आओ, हम सेक्स्टियस की बात पर विश्वास करें, जब वह हमें यह अत्यन्त सुंदर मार्ग दिखाते हुए पुकारते हैं, "यही वह मार्ग है जिससे मनुष्य तारों तक पहुँचता है। मितव्ययिता का मार्ग, आत्मसंयम का मार्ग और साहस का मार्ग।" देवता घमंडी नहीं होते और न ही वे अपने समान किसी अन्य के होने से ईर्ष्या करते हैं। वे स्वागत करते हैं और उन लोगों की सहायता करते हैं जो ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। क्या तुम्हें यह आश्चर्य होता है कि कोई मनुष्य देवताओं तक पहुँच सकता है? वास्तव में ईश्वर स्वयं मनुष्यों के पास आता है। बल्कि इससे भी अधिक निकटता की बात यह है कि ईश्वर मनुष्य के भीतर निवास करता है। क्योंकि मन की उत्कृष्टता कभी भी ईश्वर से रहित नहीं होती। मनुष्य के भीतर दिव्यता के बीज बिखरे हुए हैं। यदि किसी कुशल माली की तरह उनका उचित पालन-पोषण किया जाए, तो वे उसी स्रोत के समान विकसित होते हैं जिससे वे उत्पन्न हुए हैं और अंततः अपने मूल के तुल्य बन जाते हैं। किन्तु यदि उनका पालन-पोषण ठीक प्रकार से न हो, जैसे बंजर या दलदली भूमि में बोया गया बीज नष्ट हो जाता है तो वहाँ उत्तम पौधों के स्थान पर केवल खरपतवार ही उगती है।


अभी के लिए विदा 

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