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Wednesday, 5 August 2026

भाषा के बारे में -- पत्र - 112

 प्रिय लूसीलियस 


“आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ युगों में भाषण कौशल की शैली पतित हो जाती है? क्यों किसी समय लेखकों में एक प्रकार का दोष प्रचलित हो जाता है। कभी सब कुछ अत्यधिक शब्दाडंबरपूर्ण और लंबा-चौड़ा हो जाता है तो कभी कोमल, बनावटी और गान जैसी कृत्रिम शैली का बोलबाला होता है? कभी ऐसी प्रबल अभिव्यक्तियाँ फैशन बन जाती हैं जो अपने विषय की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र होती हैं। कभी अधूरे वाक्यों तथा संकेतों की, जिनमें कही हुई बात से अधिक अनकहा निहित रहता है। कभी किसी युग में रूपकों का प्रयोग बिना किसी संकोच के अत्यधिक किया जाता है। इसका कारण वही है जिसे यूनानियों में एक प्रसिद्ध कहावत के रूप में कहा जाता है, ‘जैसा हमारा जीवन होता है, वैसी ही हमारी वाणी होती है।’ 

    जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके बोलने के ढंग से मेल खाते हैं, उसी प्रकार किसी युग की वाणी की शैली भी उसके नागरिकों के आचरण के अनुरूप होती है। जब अनुशासन शिथिल पड़ जाता है और उसके स्थान पर विलासिता आ जाती है। यदि भाषा का पतन केवल एक-दो व्यक्तियों तक सीमित न रहकर सामान्य स्वीकृति प्राप्त कर ले तो वह व्यापक आत्म-विलास का निश्चित संकेत होता है। 

    प्रतिभा की अवस्था मन की अवस्था से भिन्न नहीं हो सकती। यदि मन स्वस्थ, संतुलित, गंभीर और संयमी है तो प्रतिभा भी पूर्णतः संयत रहती है। यदि मन दोषपूर्ण है तो प्रतिभा भी उसी प्रकार उग्र और असंयमित हो जाती है। क्या आप नहीं देखते कि जब मन अपनी शक्ति खो देता है तो अंग शिथिल पड़ जाते हैं और पैर घसीटकर चलते हैं? यदि मन कोमल और दुर्बल हो जाए तो उसकी मृदुता चाल में भी दिखाई देती है। यदि वह ऊर्जावान और प्रचंड हो तो कदम तेज़ पड़ते हैं। यदि वह विक्षिप्त हो या क्रोध से उन्मत्त (जो विक्षिप्तता के समान ही अवस्था है) तो शरीर की गति भी अस्त-व्यस्त हो जाती है और वह चलने के बजाय मानो दौड़ता हुआ आगे बढ़ता है। जब यह बात शरीर के संबंध में सत्य है तो प्रतिभा के संबंध में तो और भी अधिक सत्य होगी क्योंकि प्रतिभा पूरी तरह मन से मिली हुई है और उसी से अपना स्वरूप, अपनी दिशा और अपना मूल सिद्धांत प्राप्त करती है।

    मेसेनास (Maecenas, रोम के बड़े राजनेता एवं कूटनीतिज्ञ) के जीवन-व्यवहार के विषय में इतनी प्रसिद्ध बातें हैं कि मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह कैसे चलता था, कितना विलासी था, लोगों की दृष्टि अपनी ओर आकर्षित करना उसे कितना प्रिय था। वह अपने दोषों को छिपाने का कोई प्रयास नहीं करता था। फिर हम क्या कहें? क्या उसकी गद्य-शैली भी उसके ढीले-ढाले, बिना कसे हुए वस्त्र की तरह शिथिल नहीं है? क्या उसकी भाषा भी उसके वस्त्रों, उसके सेवकों, उसके भवन और उसकी पत्नी की भाँति उतनी ही आडंबरपूर्ण नहीं है? यदि वह सीधे मार्ग पर बना रहता, यदि समझे जाने से बचने का जान-बूझकर प्रयास न करता। यदि अपनी भाषा में भी उच्छृंखल न होता तो वह अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति सिद्ध हो सकता था। उसके लेखन में आपको यही दिखाई देगा, एक शराबी व्यक्ति की शैली, उलझी हुई, भटकती हुई और स्वच्छंदताओं से परिपूर्ण।



“छोटी जलधारा के किनारे, तट पर, पत्तों से आच्छादित वन।”

यह भी देखिए—

“वे अपनी छोटी नौकाओं से गहरे जल को चीरते हैं और पीछे लहरों की घुमावदार रेखा में मानो उद्यान छोड़ जाते हैं।”

और यह फिर क्या है? अथवा ये पंक्तियाँ—

“वह अपनी प्रेयसी के केशों को घुँघराला करता है और अपने होंठों से कबूतरों-सा स्पर्श करता हुआ आह भरते हुए बोलना आरंभ करता है, उन वन-स्वामियों की भाँति जो झुकी हुई गर्दनों के साथ स्वयं को मुकुट धारण कराते हैं।”

“वे सुधरने से रहित लोग हैं। वे दावतों में मनुष्यों की परीक्षा लेते हैं। मदिरा-पात्र के सहारे घरों को जोत डालते हैं और मृत्यु की ओर प्रलोभन बिछाते हैं।”

“ऐसी प्रतिभा, जो अपने ही उत्सव-दिवस की भी शायद ही साक्षी देती है।”

“पीली मोमबत्ती के रेशे और शोर मचाती चक्की।”

“माता या पत्नी द्वारा ढका हुआ अग्निकुंड।”

    जब आप इन उदाहरणों को पढ़ते हैं तो क्या आपके मन में तुरंत यह विचार नहीं आता कि यह उसी व्यक्ति की रचना है जो नगर में सदैव ढीला-ढाला अंगरखा पहनकर घूमता था? क्योंकि जब सीज़र की अनुपस्थिति में उसे शासन का दायित्व सौंपा गया था, तब भी वह सैनिकों को दैनिक संकेत-शब्द (पासवर्ड) देते समय कमरबंद नहीं बाँधता था। यही वह व्यक्ति था जो न्यायासन पर, वक्ताओं के मंच पर और प्रत्येक सार्वजनिक सभा में सिर पर शॉल डाले उपस्थित होता था, जिसके दोनों ओर उसके कान बाहर निकले रहते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी हास्य-नाटक में किसी धनी व्यक्ति के भागे हुए दास का रूप दिखाया जाता है। यही वह व्यक्ति था जो गृहयुद्धों के चरम समय में, जब पूरा नगर शस्त्रों से सुसज्जित और अशांत था, जनता के बीच केवल दो हिजड़ों को साथ लेकर निकलता था, जो उससे भी अधिक पुरुषोचित प्रतीत होते थे। यही वह व्यक्ति था जिसने अपनी एक ही पत्नी से मानो हज़ार बार विवाह किया।

    उसके ये वाक्य इतने स्वच्छंद ढंग से जोड़े गए, इतनी लापरवाही से बिखेरे गए और अपने शब्द-विन्यास में सामान्य प्रयोग से इतने भिन्न, यह स्पष्ट कर देते हैं कि उसका चरित्र भी उतना ही विचित्र, उतना ही भ्रष्ट और उतना ही विकृत था। उसकी दयालुता की बहुत प्रशंसा की जाती है क्योंकि उसने तलवार का कम प्रयोग किया, रक्तपात से परहेज़ किया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन केवल अपने उच्छृंखल आचरण में किया। किन्तु वह अपनी इस प्रशंसा को भी अपनी कृत्रिम और टेढ़ी-मेढ़ी गद्य-शैली से स्वयं नष्ट कर देता है क्योंकि उससे स्पष्ट हो जाता है कि वह उदार या सौम्य नहीं बल्कि केवल कोमल और दुर्बल था। कोई भी व्यक्ति उसके घुमावदार वाक्य-विन्यास, असामान्य शब्द-प्रयोग और विचित्र विचारों से यह बात समझ सकता है। उसके विचार प्रायः महान होते हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति में दृढ़ता का अभाव है। यह उस व्यक्ति का मन है जिसे अत्यधिक समृद्धि ने पथभ्रष्ट कर दिया था।

    कुछ मामलों में दोष व्यक्ति का होता है। कुछ में युग का। जब समृद्धि व्यापक आत्म-विलास को जन्म देती है तो सबसे पहले वस्त्रों और श्रृंगार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है। उसके बाद गृह-सज्जा को लेकर अत्यधिक चिंता होने लगती है। फिर ध्यान स्वयं भवनों की ओर मुड़ता है। एक नया भाग जोड़कर साधारण घर को विशाल प्रासाद बना दिया जाता है। भीतर की दीवारें विदेशों से लाए गए संगमरमर से चमक उठती हैं। छत की टाइलें स्वर्ण से अलंकृत कर दी जाती हैं और खाँचेदार छतों की छवि चमकदार फर्श की टाइलों में प्रतिबिंबित होने लगती है। इसके बाद वैभव भोजन की मेज़ तक पहुँच जाता है। नवीनता और प्रचलित व्यवस्था में परिवर्तन ही फैशन बन जाते हैं, जो कभी भोजन के अंत में परोसा जाता था, वही अब आरंभ में परोसा जाने लगता है। जो व्यंजन पहले अतिथियों के आगमन पर प्रस्तुत किया जाता था, वही अब उनके विदा होते समय परोसा जाता है। 

    जब मन सामान्य और परंपरागत बातों को अस्वीकार करने तथा स्थापित रीति-रिवाजों को तुच्छ समझने का अभ्यस्त हो जाता है, तब वह भाषा में भी नवीनता खोजने लगता है। कभी वह प्राचीन और अप्रचलित शब्दों को फिर से प्रचलन में लाता है। कभी सामान्य प्रयोग को विकृत कर देता है, यहाँ तक कि ऐसे नए शब्द भी गढ़ लेता है जिन्हें पहले कभी किसी ने नहीं सुना। और कभी, जैसा कि इस समय विशेष रूप से प्रचलित है, चमत्कारपूर्ण रूपकों की भरमार को ही उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श मान लिया जाता है। कुछ वक्ता अपने विचार को जान-बूझकर अधूरा छोड़ देते हैं। उनका विश्वास होता है कि यदि वाक्य केवल संकेत देकर समाप्त कर दिया जाए और उसका आशय श्रोता स्वयं समझ ले तो उनकी अधिक प्रशंसा होगी। कुछ अन्य किसी विचार को छोड़ ही नहीं पाते। वे उसे निरंतर खींचते और विस्तार देते चले जाते हैं। कुछ लोग किसी शैलीगत विशेषता को इतनी दूर तक ले जाते हैं कि वह दोष बन जाती है। यद्यपि किसी महान प्रयत्न में कभी-कभी ऐसा करना उचित हो सकता है, पर वे वहीं नहीं रुकते; बल्कि उस दोष से ही प्रेम करने लगते हैं। 

    अतः जहाँ कहीं भी आप पतित वक्तृत्व-शैली को प्रचलन में आते देखें, वहाँ यह निश्चय समझिए कि आचरण के अन्य रूप भी मार्ग से भटक चुके हैं। जैसे वस्त्रों और भोजों में विलासिता समाज के भीतर व्याप्त रोग का लक्षण होती है, उसी प्रकार जब असंयमित वक्तृत्व सामान्य व्यवहार बन जाता है तो वह इस बात का प्रमाण होता है कि जिन मनों से वे शब्द निकलते हैं, उनका भी पतन हो चुका है। 

    पतित भाषिक प्रयोगों को केवल सामान्य या निम्न स्तर के श्रोता ही नहीं अपनाते बल्कि अधिक शिक्षित लोग भी उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। इस पर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उनके टोगा (रोमी परिधान) भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी रुचि एक जैसी होती है। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि प्रशंसा केवल दोषयुक्त रचना की ही नहीं होती बल्कि स्वयं उन दोषों की भी की जाती है। ऐसा सदा से होता आया है। कोई भी प्रतिभा कभी लोकप्रिय नहीं हुई जिसके कुछ दोषों को लोगों ने क्षमा न किया हो। आप किसी भी महान व्यक्ति का नाम ले लीजिए। मैं बता सकता हूँ कि उसके समकालीनों ने उसके कौन-से दोषों की उपेक्षा की और किन्हें जान-बूझकर अनदेखा किया। मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों के उदाहरण दे सकता हूँ जिनके दोषों को दोष नहीं माना गया और कुछ ऐसे भी जिनके दोष ही उनके लिए गुण बन गए। इसी प्रकार मैं ऐसे अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्तियों के उदाहरण भी दे सकता हूँ, जिन्हें आदर्श माना जाता है। किन्तु यदि उनके दोषों को सुधार दिया जाए तो उनकी समस्त विशिष्टता ही नष्ट हो जाए क्योंकि उनके दोष उनकी उत्कृष्टताओं के साथ इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं कि एक को हटाने पर दूसरा भी समाप्त हो जाता है। 

    इसके अतिरिक्त, वक्तृत्व-शैली के लिए कोई स्थायी नियम नहीं होता। वह समाज की प्रचलित परंपरा के अनुसार बदलती रहती है और समाज की वह परंपरा भी अधिक समय तक एक-सी नहीं रहती। आज के हमारे अनेक वक्ता प्राचीन काल के शब्दों को खोज-खोजकर अपनाते हैं ताकि उनकी भाषा बारह पट्टिकाओं (प्राचीन रोम की सबसे पहली लिखित विधि-संहिता) के विधि-संग्रह जैसी प्रतीत हो। उनके लिए ग्रैकस, क्रासुस और कुरियो भी अत्यधिक नवीन और परिष्कृत हैं। इसलिए वे अपियस और कोरुंकानियस के युग तक लौट जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग इसके बिल्कुल विपरीत मार्ग अपनाते हैं। वे ऐसा कोई शब्द प्रयोग नहीं करना चाहते जो केवल वर्तमान प्रचलन से बाहर हो। परिणामस्वरूप उनकी भाषा साधारण, फीकी और नीरस हो जाती है। 

    ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ समान रूप से दोषपूर्ण हैं। उसी प्रकार यह भी भूल है कि केवल ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाए जो असाधारण हों या जिनमें काव्यात्मक आभा हो और सामान्य तथा प्रचलित शब्दों से पूरी तरह बचा जाए। मेरी दृष्टि में दोनों समान रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। एक व्यक्ति आवश्यकता से अधिक अपने श्रृंगार में लगा रहता है। जबकि दूसरा आवश्यकता से भी कम। एक अपने पैरों के बाल तक उखाड़ डालता है। दूसरा अपनी बगल के बालों तक की उपेक्षा करता है।

    अब शब्द-विन्यास के प्रश्न पर आइए। वहाँ मैं आपको कितने प्रकार के दोष गिना सकता हूँ! कुछ लोग कठोर और झटकेदार शैली को पसंद करते हैं। यदि कोई वाक्य स्वाभाविक रूप से बहुत सहज और प्रवाहपूर्ण बन जाए तो वे जान-बूझकर उसके शब्दों का क्रम बदल देते हैं क्योंकि उनकी इच्छा होती है कि प्रत्येक शब्द-संयोजन अचानक और असंगत प्रतीत हो। उन्हें लगता है कि जो कुछ कानों को असमतल और खुरदरा लगे, उसी में पुरुषोचित दृढ़ता निहित है। 

दूसरी ओर, कुछ लोग इतनी कोमलता और मधुरता के साथ लिखते हैं कि उनकी रचना वक्तृत्व-कला की अपेक्षा संगीत-रचना जैसी प्रतीत होने लगती है। क्या मुझे उन लोगों का भी उल्लेख करना चाहिए जो कुछ शब्दों को जान-बूझकर बहुत देर तक रोककर रखते हैं और श्रोता को उनकी प्रतीक्षा कराते हुए अंततः उन्हें वाक्य के अंत में लाकर रखते हैं? उस सुगढ़ सिसेरोनियन वाक्य-विन्यास का क्या कहें, जो अपने सुंदर गठन के कारण श्रोता को मधुर प्रतीक्षा में बाँधे रखता है, जब तक कि वह अंत में पूर्ण न हो जाए और जो अपनी निश्चित लय से कभी विचलित नहीं होता? दोष केवल वाक्यों के गठन में ही नहीं होता। दोष तब भी होता है जब विचार निर्बल और बालसुलभ हों या उनमें ऐसा असंयम हो कि वे शालीनता की सीमा से आगे बढ़ जाएँ अथवा वे अत्यधिक अलंकृत और आवश्यकता से अधिक मधुर हों या केवल सुनने में प्रभावशाली लगें, परंतु उनके भीतर कोई वास्तविक सार या अर्थ न हो।

    ऐसे दोषों को प्रायः एक ही ऐसा वक्ता लोकप्रिय बना देता है, जो अपने समय की वक्तृत्व-कला पर प्रभुत्व रखता है। फिर अन्य लोग उसका अनुकरण करते हैं और एक-दूसरे को भी उसी दिशा में प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, जब सालुस्त लिख रहे थे, तब अधूरे विचार, वाक्यांशों का अचानक समाप्त हो जाना और रहस्यपूर्ण संक्षिप्तता को उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श माना जाता था। लूशियस अर्रुन्तियस, जो अत्यंत संयमी व्यक्ति था और प्यूनिक युद्ध का इतिहासकार भी, सालुस्त का अनुयायी था और उसी प्रकार की शैली में लिखने में विशेष दक्ष था। सालुस्त ने एक स्थान पर लिखा है, “उसने चाँदी के बल पर एक सेना प्राप्त कर ली”; अर्थात उसने धन देकर सेना खरीद ली। अर्रुन्तियस को यह प्रयोग इतना प्रिय लगा कि उसने लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर उसका उपयोग किया। एक स्थान पर वह लिखता है, “उन्होंने हमारे सैनिकों की पराजय करवा दी।” दूसरे स्थान पर, “सिराक्यूज़ के राजा हीएरो ने युद्ध खड़ा कर दिया।” और एक अन्य स्थान पर, “इस समाचार ने पानहोर्मस को रोमनों के सामने आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया।” 

    ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं। उसका पूरा ग्रंथ ऐसे प्रयोगों से भरा हुआ है। जो अभिव्यक्तियाँ सालुस्त के यहाँ कभी-कभार मिलती हैं, वही अर्रुन्तियस के यहाँ बार-बार बल्कि लगभग हर जगह दिखाई देती हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है। सालुस्त के यहाँ वे स्वाभाविक रूप से आ गई थीं। जबकि अर्रुन्तियस उन्हें जान-बूझकर खोजकर लाता था। तुम देख सकते हो कि जब कोई व्यक्ति किसी दोष को ही अनुकरण का आदर्श बना लेता है, तब क्या होता है। सालुस्त ने एक स्थान पर 'शीतकालीन जल' जैसा प्रयोग किया। अर्रुन्तियस ने प्यूनिक युद्ध के प्रथम ग्रंथ में लिखा, 'ऋतु अचानक शीतकाल बन गई।' दूसरे स्थान पर, यह बताने के लिए कि वर्ष अत्यंत ठंडा था। उसने लिखा, 'पूरा वर्ष शीतकाल बना रहा।' और एक अन्य स्थान पर, 'तब उसने साठ मालवाहक जहाज़ भेजे, जिनमें सैनिकों और आवश्यक नाविकों के अतिरिक्त कोई भार नहीं था क्योंकि उत्तर की हवा शीतकाल की तरह चल रही थी।' वह जहाँ भी अवसर मिलता, उस शब्द को ठूँस देता था। 

    सालुस्त ने एक स्थान पर कहा, 'गृहयुद्ध के बीच भी वह सदाचार और न्यायप्रियता की प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।' अर्रुन्तियस स्वयं को रोक नहीं सका और अपने प्रथम ग्रंथ में तुरंत लिख बैठा कि रेगुलस की 'प्रतिष्ठा' अत्यंत महान थी। इस प्रकार के दोष और ऐसे अन्य दोष जो केवल अनुकरण से प्राप्त होते हैं। आत्म-विलास या पतित मन के लक्षण नहीं हैं। किसी व्यक्ति के स्वभाव का अनुमान केवल उसके अपने दोषों से लगाया जा सकता है। उन दोषों से जो उसके अपने व्यक्तित्व से उत्पन्न होते हैं। जब वह क्रोधित होता है तो उसकी भाषा भी क्रोधपूर्ण हो जाती है। जब वह व्याकुल होता है तो उसकी भाषा भी अत्यधिक उग्र हो जाती है; और जब वह आडंबरप्रिय तथा बनावटी होता है तो उसकी भाषा भी शिथिल, ढीली और निर्बल हो जाती है।

    उन लोगों पर ध्यान दीजिए जिन्हें आप देखते हैं। जो अपनी दाढ़ी के सारे या अधिकांश बाल उखाड़ डालते हैं या केवल होंठों के चारों ओर का थोड़ा-सा भाग साफ़ रखते हैं और शेष बाल बढ़ने देते हैं। जो अत्यंत भड़कीले रंगों के चोगे पहनते हैं या बहुत ढीले बुने हुए टोगा धारण करते हैं। वे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते जो लोगों की दृष्टि से ओझल रह जाए। उनकी इच्छा केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने और सबकी निगाहें अपनी ओर खींचने की होती है। लोग उनकी निंदा करें, इसकी उन्हें परवाह नहीं। उनके लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे चर्चा का विषय बने रहें। मेसेनास और उन सभी लेखकों की गद्य-शैली भी ऐसी ही है, जो भूलवश नहीं बल्कि जान-बूझकर और सोच-समझकर त्रुटियाँ करते हैं। यह किसी गहरे मानसिक दोष का परिणाम है। जिस प्रकार शराब पीने पर वाणी तब तक लड़खड़ाने नहीं लगती जब तक कि उसका भार मन पर हावी होकर उसे डगमगा न दे या परास्त न कर दे, उसी प्रकार उसकी गद्य-शैली का यह उन्माद, इसे और क्या कहा जाए? किसी व्यक्ति को तब तक प्रभावित नहीं करता, जब तक उसका मन पहले ही विचलित न हो चुका हो। इसलिए हमें सबसे अधिक अपने मन की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि अर्थ, वाणी, आचरण, मुखमुद्रा और चाल, सब उसी से उत्पन्न होते हैं। यदि मन स्वस्थ और संतुलित है तो उसकी भाषा भी दृढ़, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण होगी। पर यदि मन ही डगमगा जाए, तो उसके साथ शेष सब कुछ भी बिखर जाता है। जब तक उनके राजा की रक्षा होती है, तब तक सब एकचित्त रहते हैं। परंतु यदि वह नष्ट हो जाए तो वे अपनी निष्ठा भी त्याग देते हैं।

    मन हमारा राजा है। जब तक वह सुरक्षित और अक्षुण्ण रहता है, तब तक हमारे अन्य सभी अंग अपना-अपना कार्य भली-भाँति करते हैं तथा उसके प्रति आज्ञाकारी और अधीन बने रहते हैं। परंतु यदि वही डगमगाने लगे तो वे भी अस्थिर हो जाते हैं। यदि वह सुख-भोग के आगे समर्पण कर दे तो उसकी समस्त योग्यताएँ और क्रियाशीलता मुरझा जाती हैं। उसका प्रत्येक प्रयत्न शिथिलता और आलस्य का परिचायक बन जाता है।

    चूँकि मैंने यह उपमा दी है। इसलिए इसे आगे भी बढ़ाता हूँ। हमारा मन कभी राजा होता है और कभी अत्याचारी। जब वह सम्माननीय और सदाचारी आचरण की ओर उन्मुख रहता है, अपने संरक्षण में दिए गए शरीर के कल्याण की चिंता करता है और किसी भी निकृष्ट या लज्जाजनक कार्य का आदेश नहीं देता, तब वह राजा होता है। परंतु जब वह असंयमी, लोभी और कामुक हो जाता है, तब वह अपने श्रेष्ठ नाम को छोड़कर उस भयानक और घृणित नाम को धारण कर लेता है और अत्याचारी बन जाता है। 

    तब उच्छृंखल भावनाएँ उस पर अधिकार कर लेती हैं और उसे अपने भार से दबा देती हैं। आरंभ में वह निश्चय ही प्रसन्न होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे जनता तब प्रसन्न होती है जब उसे ऐसा दान या अनुग्रह मिलता है जो अंततः उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होता है और वह बिना किसी वास्तविक लाभ के पेट भरकर खाती है, लालच में ऐसी वस्तुओं पर भी टूट पड़ती है जिन्हें वह वास्तव में उपभोग नहीं कर सकती। किन्तु जब इस अत्याचारी की बीमारी धीरे-धीरे उसकी शक्ति को क्षीण कर देती है और भोग-विलास का विष उसकी हड्डियों और स्नायुओं तक पहुँच जाता है, तब वह उन लोगों को देखकर आनंद लेने लगता है जिन्हें उसने अपनी ही असीम लालसा के कारण अपने समान निष्प्रयोज्य बना दिया है। वह स्वयं भोग करने में असमर्थ होकर दूसरों के भोग-विलास को देखकर परोक्ष सुख प्राप्त करता है और उनकी वासनाओं का सहभागी तथा साक्षी बन जाता है, क्योंकि अतिभोग ने उससे स्वयं भोग करने की क्षमता ही छीन ली होती है। 

    यद्यपि उसके सामने सुख-सुविधाओं और भोग की वस्तुओं की कोई कमी नहीं होती, फिर भी उनसे उसे संतोष की अपेक्षा अधिक पीड़ा मिलती है क्योंकि वह उन सबका पूरा उपभोग नहीं कर सकता। वह उन सभी भोग-विलासों को अपने कंठ और उदर से नहीं गुज़ार सकता। न ही वह सुंदर युवकों और स्त्रियों की पूरी भीड़ के साथ अपनी वासनाओं की तृप्ति कर सकता है। वस्तुतः उसे इस बात का दुख होता है कि शरीर की सीमित क्षमता के कारण उसके सुख का बड़ा भाग उसकी पहुँच से बाहर रह जाता है।

    प्रिय लूसीलियस, क्या यह पागलपन नहीं है? हममें से कोई भी स्वयं को नश्वर नहीं समझता। कोई भी स्वयं को दुर्बल नहीं मानता बल्कि हममें से कोई यह भी नहीं सोचता कि वह केवल एक ही व्यक्ति है। हमारे रसोईघरों को देखिए, जहाँ कितने ही चूल्हे जल रहे हैं और रसोइए इधर-उधर दौड़ते हुए भोजन बनाने में लगे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि यह सारा कोलाहल केवल एक ही पेट के लिए भोजन तैयार कर रहा है? हमारे मदिरा-भंडारों को देखिए, जहाँ अनेक पीढ़ियों की पुरानी मदिराओं से भरे हुए भंडारगृह हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि इतने वर्षों और इतने प्रदेशों की मदिराएँ केवल एक ही पेट के उपभोग के लिए संचित की गई हैं? देखिए, कितने विशाल क्षेत्रों में भूमि जोती जा रही है, कितने हजारों किसान हल चला रहे हैं और कुदाल चला रहे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि सिसिली और उत्तर अफ्रीका, दोनों स्थानों के खेत केवल एक ही पेट के लिए बोए जा रहे हैं? हम पूर्णतः स्वस्थ और संतुलित कब होंगे? हम अपनी इच्छाओं को संयमित कब करेंगे? तब, जब हममें से प्रत्येक स्वयं का सही आकलन करेगा, अपने शरीर की सीमाओं को समझेगा।  यह जान लेगा कि वह वास्तव में कितना कम धारण कर सकता है और कितने थोड़े समय के लिए।किन्तु प्रत्येक प्रकार के आत्मसंयम की दिशा में आपको जितनी सहायता इस विचार से मिलेगी कि जीवन अल्प है और उसका जो थोड़ा-सा भाग हमारे पास है, वह भी अनिश्चित है, उतनी किसी अन्य बात से नहीं मिलेगी।अपने प्रत्येक कर्म में मृत्यु को अपनी दृष्टि के सामने रखिए।


अभी के लिए विदा 

Tuesday, 4 August 2026

न्याय के बारे में -- पत्र - 111

प्रिय लूसीलियस 


तुम चाहते हो कि मैं उस प्रश्न पर अपना मत तुमको भेजूँ जिस पर हमारे विद्यालय में बहस चलती रही है कि क्या न्याय, साहस, विवेक और अन्य सद्गुण सजीव प्राणी हैं। प्रिय लूसीलियस, इस प्रकार की सूक्ष्म चर्चाओं ने लोगों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि हम अपने मन को तुच्छ विषयों में उलझाते हैं और अपना अवकाश ऐसे वाद-विवादों में नष्ट करते हैं जिनसे कोई लाभ नहीं होता। मैं तुम्हारे अनुरोध का पालन करूँगा और हमारे मत-पंथ का सिद्धांत प्रस्तुत करूँगा। लेकिन पहले ही बता दूँ कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। मेरा विचार है कि कुछ विषय केवल उन्हीं लोगों के लिए उपयुक्त हैं जो यूनानी जूते और चोगे पहनने का शौक रखते हैं। अतः मैं तुमको बताऊँगा कि हमारे पूर्ववर्तियों को किन तर्कों ने प्रेरित किया था या यों कहें कि वे स्वयं कौन-से तर्क प्रस्तुत करते थे। मन एक सजीव सत्ता है। इसमें कोई विवाद नहीं है क्योंकि मन ही हमें सजीव प्राणी बनाता है और 'सजीव प्राणी' (animalia) शब्द भी उसी से व्युत्पन्न है। परन्तु सद्गुण तो केवल एक निश्चित प्रकार से व्यवस्थित मन है। अतः सद्गुण एक सजीव प्राणी है।



    फिर एक और तर्क प्रस्तुत किया जाता है।  सद्गुण कोई कार्य करता है। परन्तु किसी भी कार्य का संपादन प्रेरणा के बिना नहीं हो सकता। अतः, क्योंकि सद्गुण में प्रेरणा है और प्रेरणा केवल किसी सजीव प्राणी में ही होती है। इसलिए सद्गुण एक सजीव प्राणी है। कोई यह आपत्ति कर सकता है, “यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है, तो क्या स्वयं सद्गुण में भी सद्गुण होगा?” क्यों नहीं होगा? जिस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक कार्य सद्गुण के माध्यम से करता है, उसी प्रकार सद्गुण भी अपने कार्य स्वयं अपने ही माध्यम से करता है।

    “यदि ऐसा है, तो सभी कलाएँ भी सजीव प्राणी होंगी। इसी प्रकार वे सभी बातें भी जिन्हें हम अपने मन में विचारते और धारण करते हैं। तब तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि हमारे वक्ष की संकीर्ण सीमा के भीतर हजारों सजीव प्राणी निवास कर रहे हैं और हममें से प्रत्येक व्यक्ति या तो असंख्य सजीव प्राणियों का समूह है अथवा अपने भीतर ऐसे असंख्य सजीव प्राणियों को धारण किए हुए है।” क्या आपको आश्चर्य है कि इस आपत्ति का उत्तर कैसे दिया जाए? यद्यपि इनमें से प्रत्येक एक सजीव प्राणी होगा, फिर भी वे सजीव प्राणियों की बहुलता नहीं होंगे। यह कैसे? यदि तुम पूरे ध्यान और एकाग्रता से सुनोगे तो मैं बताता हूँ। 

    प्रत्येक सजीव प्राणी का अपना पृथक् द्रव्य या अस्तित्व होना चाहिए। परन्तु जिन सजीव प्राणियों की तुम बात कर रहे हो, उनमें प्रत्येक का केवल एक ही मन है। इसलिए उनमें से प्रत्येक केवल एक ही सजीव प्राणी हो सकता है, अनेक सजीव प्राणी नहीं। मैं स्वयं भी एक सजीव प्राणी हूँ और एक मनुष्य भी हूँ। फिर भी तुम यह नहीं कहोगे कि हम दो हैं। ऐसा क्यों नहीं? क्योंकि दो होने के लिए दोनों का एक-दूसरे से पृथक् होना आवश्यक है। मेरा आशय यह है कि एक का दूसरे से अलग अस्तित्व होना चाहिए। तभी वे दो कहलाएँगे। जो कुछ एक ही सत्ता में अनेक रूपों में विद्यमान होता है, वह एक ही प्रकृति के अधीन होता है। इसलिए वह एक ही माना जाता है। मेरा मन एक सजीव प्राणी है और मैं भी एक सजीव प्राणी हूँ। फिर भी हम दो नहीं हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि मेरा मन मेरा ही एक अंग है। कोई वस्तु तभी अपने आप में पृथक् गिनी जाती है जब उसका स्वतंत्र अस्तित्व हो। जब तक वह किसी अन्य वस्तु का एक घटक बनी रहती है, तब तक उसे एक भिन्न वस्तु नहीं माना जा सकता। ऐसा क्यों? क्योंकि जो वस्तु वास्तव में भिन्न है, उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होना चाहिए। उसका अपना विशिष्ट गुण होना चाहिए। वह अपने आप में पूर्ण होनी चाहिए।

    मैंने पहले ही तुमको सावधान कर दिया था कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। यदि इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो केवल सद्गुण ही नहीं बल्कि उनके विपरीत दोष भी सजीव प्राणी माने जाएँगे। साथ ही क्रोध, भय, शोक तथा अविश्वास जैसे मनोवेग भी। बात यहीं नहीं रुकेगी। प्रत्येक मत और प्रत्येक विचार भी सजीव प्राणी ठहराया जाएगा। यह बात किसी भी प्रकार स्वीकार करने योग्य नहीं है। मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य स्वयं मनुष्य नहीं होता। कोई पूछ सकता है, “न्याय क्या है?” उत्तर है, एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन। “तो यदि मन एक सजीव प्राणी है क्या न्याय भी सजीव प्राणी होगा?” बिल्कुल नहीं। 

    न्याय मन की एक अवस्था है। उसकी एक विशिष्ट क्षमता है। एक ही मन अनेक प्रकार की अवस्थाओं और रूपों को धारण करता है। किन्तु जब-जब वह कोई भिन्न कार्य करता है, तब-तब वह कोई नया सजीव प्राणी नहीं बन जाता। इसी प्रकार, मन द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य भी सजीव प्राणी नहीं होता। यदि न्याय एक सजीव प्राणी है। इसी प्रकार साहस तथा अन्य सभी सद्गुण भी तो क्या वे कभी सजीव प्राणी होना छोड़ देते हैं और फिर से बन जाते हैं अथवा वे सदा ही ऐसे बने रहते हैं? सद्गुणों का तो अंत नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो इस एक ही मन के भीतर अनेक बल्कि असंख्य सजीव प्राणी निरंतर विचरण कर रहे होंगे।

    कोई यह कह सकता है, “वे अनेक नहीं हैं क्योंकि वे एक ही सत्ता से जुड़े हुए हैं। वे उसी एक सत्ता के अंग और उसके घटक हैं।” तो क्या हम अपने मन की कल्पना उसी प्रकार कर रहे हैं जैसी हाइड्रा (बहुत से सिरों वाला यूनानी पौराणिक राक्षस) की होती है जिसके प्रत्येक सिर अपने-आप लड़ता है और अपने-आप ही हानि पहुँचाता है? फिर भी उन सिरों में से कोई भी स्वयं एक सजीव प्राणी नहीं है। वे केवल एक सजीव प्राणी के सिर हैं। जबकि स्वयं हाइड्रा एक ही सजीव प्राणी है। इसी प्रकार, किसी ने भी यह नहीं कहा कि काइमेरा (यूनानी पौराणिक राक्षस जिसके सिर कई पशुओं से मिलकर बने हैं) के भीतर का सिंह या अजगर स्वयं एक-एक सजीव प्राणी हैं। वे तो उसके अंग हैं और अंग स्वयं सजीव प्राणी नहीं होते। 



    फिर आप किस आधार पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि न्याय एक सजीव प्राणी है? “क्योंकि वह कार्य करता है अर्थात वह उपकार करता है। जो कुछ कार्य करता है और उपकार करता है, उसमें प्रेरणा होती है जिसमें प्रेरणा होती है, वह सजीव प्राणी होता है।” यह तर्क तभी सही है जब वह प्रेरणा उसकी अपनी हो। किन्तु न्याय के मामले में प्रेरणा न्याय की अपनी नहीं बल्कि मन की होती है।


    प्रत्येक सजीव प्राणी अपनी मृत्यु तक अपनी मूल पहचान बनाए रखता है। मनुष्य, जब तक वह जीवित रहता है, मनुष्य ही रहता है। घोड़ा घोड़ा ही रहता है और कुत्ता कुत्ता ही रहता है। वे किसी दूसरी वस्तु में परिवर्तित नहीं हो सकते। मान लीजिए कि न्याय अर्थात एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन एक सजीव प्राणी है। यदि हम इसे स्वीकार कर लें तो साहस भी एक सजीव प्राणी होगा क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन है।परन्तु यह किसका मन है? क्या वही मन, जो अभी कुछ क्षण पहले न्याय था? यदि ऐसा है तो वह मन तो पहले से ही उस पूर्ववर्ती सजीव प्राणी में स्थित है। वह किसी दूसरे सजीव प्राणी में स्थानांतरित नहीं हो सकता। उसे उसी सजीव प्राणी में बने रहना होगा, जिसमें उसने अपना अस्तित्व प्रारम्भ किया था।

    इसके अतिरिक्त, एक ही मन दो सजीव प्राणियों का नहीं हो सकता, अनेक का तो और भी नहीं। यदि न्याय, साहस, आत्मसंयम और अन्य सभी सद्गुण सजीव प्राणी हैं तो वे एक ही मन के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? उनमें से प्रत्येक का अपना-अपना मन होना चाहिए। अन्यथा वे सजीव प्राणी नहीं होंगे। अनेक सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। इस बात को हमारे प्रतिपक्षी भी स्वीकार करते हैं। न्याय का शरीर क्या है? “मन।” साहस का शरीर क्या है? “वही मन।” किन्तु दो सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। वे कहते हैं, “वही एक मन कभी न्याय का रूप धारण करता है, कभी साहस का और कभी आत्मसंयम का।” ऐसा तभी संभव होता, यदि मन न्याय होने के समय साहस न होता। साहस होने के समय आत्मसंयम न होता। किन्तु वास्तव में सभी सद्गुण एक ही समय में विद्यमान रहते हैं। फिर प्रत्येक सद्गुण अलग-अलग सजीव प्राणी कैसे हो सकता है। जबकि मन एक ही है और वह एक से अधिक सजीव प्राणियों की रचना नहीं कर सकता? 

    अंत में, कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरे सजीव प्राणी का अंग नहीं होता। किन्तु न्याय मन का एक अंग है। अतः न्याय सजीव प्राणी नहीं है।

    मुझे लगता है कि मैं ऐसी बात पर परिश्रम व्यर्थ कर रहा हूँ जो स्वयं स्पष्ट है। ऐसी बात जिस पर वाद-विवाद करने के बजाय खीझ प्रकट करनी चाहिए। कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरी वस्तु का अंग नहीं होता। अपने चारों ओर समस्त प्राणियों के शरीरों को देखिए। उनमें से कोई भी अपने विशिष्ट रंग, आकार और परिमाण के बिना नहीं है। दैवी सृष्टिकर्ता की बुद्धि पर आश्चर्य करने के अनेक कारण हैं। उनमें से एक, मेरे विचार से, यह भी है कि इस विशाल सृष्टि में कोई भी वस्तु दूसरी के बिल्कुल समान नहीं बनती। जो वस्तुएँ देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं, वे भी सावधानी से तुलना करने पर भिन्न निकलती हैं। सृष्टिकर्ता ने असंख्य प्रकार की पत्तियाँ बनाई हैं। प्रत्येक की अपनी अलग विशेषता है। उसने असंख्य सजीव प्राणी भी बनाए हैं। किन्तु उनमें से कोई भी दूसरे के ठीक समान आकार का नहीं है। न ही ऐसा है जिसमें कम-से-कम कुछ भिन्नता न हो। सृष्टिकर्ता ने मानो अपने लिए यह नियम निर्धारित किया कि जो वस्तुएँ भिन्न हों, वे रूप और परिमाण में भी एक-दूसरे से भिन्न और असमान हों। परन्तु, जैसा कि तुम स्टोइक कहते हो, सभी सद्गुण समान हैं। अतः वे सजीव प्राणी नहीं हैं। 

    कोई भी सजीव प्राणी ऐसा नहीं होता जो अपने कार्य स्वयं न करता हो। किन्तु सद्गुण अपने-आप कुछ नहीं करता बल्कि वह केवल मनुष्य के साथ मिलकर ही कार्य करता है। सभी सजीव प्राणी या तो विवेकयुक्त होते हैं जैसे, मनुष्य अथवा अविवेकी होते हैं जैसे, जंगली पशु और पालतू मवेशी। सद्गुण निश्चय ही विवेकयुक्त है। किन्तु वह न मनुष्य है और न देवता। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है।

    विवेकयुक्त कोई भी सजीव प्राणी तब तक कोई कार्य नहीं करता, जब तक पहले किसी विशेष वस्तु की छाप उसके मन पर न पड़े; फिर उसके भीतर प्रेरणा उत्पन्न न हो; और अंत में उसकी स्वीकृति उस प्रेरणा की पुष्टि न कर दे।

    मैं आपको बताता हूँ कि स्वीकृति क्या है। “मेरे लिए चलना उचित है।” मैं तभी चलता हूँ जब पहले मैं अपने आप से यह कहता हूँ और इस निर्णय को स्वीकार कर लेता हूँ। “मेरे लिए बैठना उचित है।” तभी मैं बैठता हूँ।किन्तु इस प्रकार की स्वीकृति सद्गुण में नहीं पाई जाती। मान लीजिए कि वह सद्गुण विवेक है। तब विवेक इस निर्णय को कैसे स्वीकार करेगा कि “मेरे लिए चलना उचित है”? यह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। विवेक अपना ध्यान उस वस्तु के हित पर रखता है जिससे वह संबद्ध है, अपने स्वयं के हित पर नहीं क्योंकि वह स्वयं न चल सकता है और न बैठ सकता है। अतः विवेक में स्वीकृति नहीं होती और जिसमें स्वीकृति नहीं होती, वह विवेकयुक्त सजीव प्राणी नहीं हो सकता। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है तो वह विवेकयुक्त सत्ता होगी। किन्तु वह ऐसी विवेकयुक्त सत्ता नहीं है। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है और प्रत्येक शुभ सद्गुण है तो प्रत्येक शुभ भी एक सजीव प्राणी होगा। हमारा मत-पंथ इस बात को स्वीकार करता है। 

    अपने पिता की रक्षा करना एक शुभ कर्म है। सीनेट में विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी एक शुभ कर्म है और न्यायपूर्वक निर्णय देना भी एक शुभ कर्म है। अतः अपने पिता की रक्षा करना भी एक सजीव प्राणी होगा और विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी। यह तर्क इतनी दूर तक पहुँच जाएगा कि आप हँसे बिना नहीं रह सकेंगे। विवेकपूर्वक मौन रहना भी एक शुभ कर्म है और उत्तम प्रकार से भोजन करना भी। अतः मौन रहना और भोजन करना भी सजीव प्राणी ठहरेंगे। निस्संदेह, मैं इन पांडित्यपूर्ण असंगतियों के साथ परिहास करना और उनका उपहास उड़ाना बंद नहीं करूँगा। यदि न्याय और साहस सजीव प्राणी हैं, तो वे निश्चय ही पृथ्वी पर रहने वाले सजीव प्राणी होंगे। प्रत्येक पृथ्वीवासी सजीव प्राणी बीमार पड़ता है, भूखा होता है और प्यासा भी होता है। अतः न्याय भी बीमार पड़ेगा, साहस भी भूखा होगा और दया भी प्यासी होगी।

    मुझे आगे उनसे यह भी पूछना चाहिए कि इन सजीव प्राणियों का आकार कैसा है। क्या उनका रूप मनुष्य जैसा है या घोड़े जैसा अथवा किसी जंगली पशु जैसा? यदि वे उन्हें देवताओं के समान गोलाकार बताएँ तो मैं पूछूँगा कि क्या लोभ, विलासिता और उन्माद भी उसी प्रकार गोलाकार हैं? क्योंकि उनके अनुसार वे भी सजीव प्राणी हैं। यदि वे उन्हें भी गोलाकार मान लें तो मैं यह भी पूछूँगा कि क्या विवेकपूर्वक चलना भी एक सजीव प्राणी है। उन्हें इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। फिर यह भी कहना पड़ेगा कि चलना एक सजीव प्राणी है और वह भी गोलाकार। 

    तुमको यह नहीं समझना चाहिए कि मैं हमारे मत-पंथ का पहला व्यक्ति हूँ जो तत्काल अपने विचार प्रस्तुत कर रहा है और अपना स्वतंत्र मत रखता है। क्लीन्थीस और क्राइसिपस भी इस बात पर सहमत नहीं थे कि ‘चलना’ वास्तव में क्या है। क्लीन्थीस का कहना है कि यह वह प्राणवायु है जो प्रधान नियामक शक्ति (directive faculty) से पैरों तक फैलती है। जबकि क्राइसिपस का मत है कि चलना स्वयं वही प्रधान नियामक शक्ति है। तो फिर, क्राइसिपस के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, प्रत्येक व्यक्ति अपनी विचार-स्वतंत्रता का प्रयोग क्यों न करे और इन सजीव प्राणियों का उपहास क्यों न उड़ाए, जिनकी संख्या इतनी अधिक है कि स्वयं यह संसार भी उन्हें समाहित नहीं कर सकता?

    प्रतिपक्षी कहता है, “सद्गुण अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं हालाँकि वे सजीव प्राणी हैं। जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक ही समय में कवि भी हो सकता है और वक्ता भी, फिर भी वह एक ही व्यक्ति रहता है, उसी प्रकार ये सद्गुण सजीव प्राणी तो हैं। परन्तु अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं। एक ही मन, प्रत्येक सद्गुण के संबंध में एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित होने के कारण, न्यायशील भी होता है, विवेकशील भी और साहसी भी।” विवाद यहीं समाप्त हो जाता है। अब हम सहमत हैं। क्योंकि मैं भी फिलहाल यह स्वीकार कर लेता हूँ कि मन एक सजीव प्राणी है। इस विषय में अपना अंतिम निर्णय मैं बाद के लिए स्थगित रखता हूँ। किन्तु मैं यह स्वीकार नहीं करता कि मन के कार्य स्वयं सजीव प्राणी हैं। यदि ऐसा मान लिया जाए तो प्रत्येक शब्द भी सजीव प्राणी होगा और कविता की प्रत्येक पंक्ति भी। यदि विवेकपूर्ण वाणी एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो वाणी भी एक सजीव प्राणी होगी। इसी प्रकार, यदि विवेकपूर्ण काव्य-पंक्ति एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो कविता की एक पंक्ति भी सजीव प्राणी होगी। तब तो 'मैं शस्त्रों और उस पुरुष का गान करता हूँ' भी एक सजीव प्राणी ठहरेगा। किन्तु वे उसे गोलाकार सजीव प्राणी नहीं कह सकते क्योंकि उसके छह चरण हैं।

    “भगवान के लिए!” तुम कहोगे, “इस समय मैं कैसी उलझी हुई जाल-बुनाई कर रहा हूँ!” मैं तो यह कल्पना करके ही हँस पड़ता हूँ कि भाषिक अशुद्धियाँ (solecisms), अपभ्रष्ट शब्द (barbarisms) और न्याय-तर्क (syllogisms) भी सजीव प्राणी हैं। किसी चित्रकार की भाँति मैं उन्हें उपयुक्त मुखाकृतियाँ भी दे देता हूँ। क्या वास्तव में हम भौंहें चढ़ाकर और माथे पर बल डालकर इसी प्रकार की बातों पर विचार कर रहे हैं? क्या मैं कैसिलियस के शब्दों में यह नहीं कह सकता, “क्या ही गंभीर मूर्खता है!” यह सब नितांत हास्यास्पद है। अतः आओ, इसके स्थान पर ऐसी बातों की ओर ध्यान दें जो हमारे लिए उपयोगी और कल्याणकारी हों। आओ यह विचार करें कि हम सद्गुणों तक कैसे पहुँच सकते हैं और कौन-सा मार्ग हमें वहाँ ले जाएगा। 

    मुझे यह मत सिखाओ कि साहस एक सजीव प्राणी है या नहीं बल्कि यह सिखाओ कि साहस के बिना कोई भी सजीव प्राणी सुखी नहीं हो सकता। अर्थात जब तक वह आकस्मिक घटनाओं का सामना करने की शक्ति प्राप्त नहीं कर लेता और प्रत्येक संभावित परिस्थिति पर पहले से विचार करके उनके घटित होने से पहले ही उन पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता। साहस क्या है? यह मानव की दुर्बलता का अभेद्य दुर्ग है। जो व्यक्ति अपने को इससे सुरक्षित कर लेता है, वह जीवनरूपी घेराबंदी को शांतचित्त होकर सहन कर सकता है क्योंकि वह अपनी ही शक्ति और अपने ही शस्त्रों का उपयोग करता है। इस प्रसंग में मैं तुमको हमारे स्टोइक दार्शनिक पोसिडोनियस का मत बताना चाहता हूँ—

“यह कभी मत समझो कि भाग्य के दिए हुए शस्त्र तुम्हें सुरक्षित रखेंगे। भाग्य का सामना अपने ही शस्त्रों से करो। भाग्य मनुष्य को भाग्य के विरुद्ध लड़ने के लिए शस्त्र नहीं देता। इसलिए जो लोग शत्रु का सामना करने के लिए सुसज्जित होते हैं, वे प्रायः भाग्य का सामना करने के लिए निःशस्त्र रह जाते हैं।”

    यह सत्य है कि सिकन्दर ने फ़ारसियों, हाइरकेनियों, भारतीयों तथा पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई अनेक जातियों को पराजित कर उनके राज्यों का विनाश कर दिया था। किन्तु स्वयं वह एक मित्र की हत्या करने के बाद और दूसरे मित्र को खो देने के बाद अंधकारमय निराशा में पड़ा रहा, कभी अपने अपराध पर शोक करता और कभी अपने वियोग पर। इतने अधिक राजाओं और राष्ट्रों का विजेता भी क्रोध और विषाद से पराजित हो गया। उसने अपनी वासनाओं को छोड़कर शेष सब पर अधिकार करने का प्रयास किया। 

    जो लोग समुद्रों के पार तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने की लालसा रखते हैं और अपने को तभी अत्यन्त भाग्यशाली समझते हैं जब उनकी सेनाएँ अनेक प्रान्तों पर अधिकार कर लें तथा पुराने राज्यों में नए प्रदेश जोड़ दें, वे कितनी बड़ी भूल करते हैं! वे उस राज्य से अनभिज्ञ रहते हैं जो देवत्व के समान महान है। अपने ऊपर शासन करना और यही सभी प्रकार के शासन में सबसे महान शासन है। मुझे उस न्याय की पवित्रता का उपदेश दो जो दूसरों के हित का ध्यान रखता है और अपने लिए केवल इतना ही चाहता है कि उसे कार्य करने का अवसर मिलता रहे। उसका स्वार्थ और यश-लिप्सा से कोई संबंध न हो। वह अपने-आप में ही संतुष्ट रहे। 

    सबसे बढ़कर, प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन में इस सिद्धांत को दृढ़तापूर्वक स्थापित कर लेना चाहिए। “मुझे किसी पुरस्कार की अपेक्षा किए बिना न्यायशील होना चाहिए।” नहीं, केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसे अपने-आप को इस बात के लिए भी तैयार करना चाहिए कि वह इस परम सुंदर सद्गुण के लिए उदारतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पित करने में आनंद अनुभव करे। उसके सभी विचार यथासंभव व्यक्तिगत लाभ से दूर रहने चाहिए। तुम्हें किसी न्यायपूर्ण कर्म के प्रतिफल की ओर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि न्यायपूर्ण कर्म करने का सबसे बड़ा पुरस्कार स्वयं न्यायपूर्ण कर्म करना ही है।

    मैंने थोड़ी देर पहले जो बात तुम्हें बताई थी, उसी पर निरंतर ध्यान लगाए रखो। तुम्हारी निष्पक्षता और न्यायप्रियता से कितने लोग परिचित हैं, इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग चाहते हैं कि उनके सद्गुणों का प्रचार हो, वे वास्तव में सद्गुण के लिए नहीं बल्कि यश के लिए प्रयत्न करते हैं। क्या तुम बिना प्रसिद्धि पाए भी न्यायशील रहने को तैयार नहीं हो? वास्तव में, अनेक अवसर ऐसे आएँगे जब तुम्हें न्यायशील होने के साथ-साथ अपयश भी सहना पड़ेगा। यदि तुम बुद्धिमान हो तो अपने उत्तम आचरण के कारण प्राप्त हुई उस बदनामी में भी प्रसन्नता का अनुभव करोगे।


अभी के लिए विदा 

एक दुर्बल स्वभाव के व्यक्ति के बारे में -- पत्र - 110 ( (Hindi Translation of Seneca's Letters) )

 प्रिय लूसीलियस 


मैं सचमुच चाहता हूँ कि तुम्हारा मित्र वैसा ही बने जैसा तुम चाहते हो। मैंने उसके सुधार का कार्य आरम्भ भी कर दिया है। किन्तु वह अत्यन्त कठिन स्वभाव का सिद्ध हो रहा है बल्कि बात इससे भी अधिक गंभीर है। वह कठोर नहीं बल्कि अत्यन्त दुर्बल स्वभाव का व्यक्ति है, जिसे बहुत पुराने और गहरे जमे हुए दुर्व्यसनों ने भ्रष्ट कर दिया है।


By Asakusa-born Hayami

    मेरे एक प्रिय शौक से एक उदाहरण लेने दो। हर बेल पर कलम नहीं चढ़ाई जा सकती। यदि बेल बहुत पुरानी और गाँठदार हो गई हो अथवा दुर्बल और पतली हो तो वह या तो नई शाखा को स्वीकार ही नहीं करती या यदि स्वीकार भी कर ले तो उसका पोषण नहीं कर पाती। फलतः वह उससे ठीक प्रकार जुड़ नहीं पाती और न ही उसके गुण और स्वभाव को अपनाती है। इसी कारण हम प्रायः पहला चीरा भूमि के ऊपर लगाते हैं ताकि यदि बेल अनुकूल प्रतिक्रिया न दे तो हम दूसरी बार भूमि के नीचे कलम लगाकर पुनः प्रयास कर सकें। 

    जिस व्यक्ति के विषय में तुम मुझे इतने निर्देशों के साथ लिख रहे हो, उसमें आन्तरिक शक्ति का अभाव है। उसने अपने दोषों को खुली छूट दे रखी है। वह एक ही समय में निर्बल भी है और जड़ भी। इसलिए वह न तो तर्क को ग्रहण कर सकता है और न ही उसका पोषण कर सकता है। “किन्तु वह स्वयं भी तो यही चाहता है।” इस बात पर विश्वास मत करो। मेरा यह अर्थ नहीं कि वह तुमसे असत्य कह रहा है बल्कि वह स्वयं यह समझता है कि वह ऐसा चाहता है। अभी वह भोग-विलास से ऊब गया है। पर शीघ्र ही उससे फिर मेल-मिलाप कर लेगा। 

    “लेकिन वह कहता है कि वह अपने जीवन-ढंग से ऊब चुका है।” इसमें कोई संदेह नहीं। पर ऐसा कौन है जो कभी अपने जीवन-ढंग से ऊबा न हो? लोग अपने दोषों से प्रेम भी करते हैं और उनसे घृणा भी करते हैं। इसलिए उसके विषय में अभी कोई निर्णय सुरक्षित रखो, जब तक वह अपने आचरण से यह प्रमाणित न कर दे कि वह और भोग-विलास वास्तव में एक-दूसरे के शत्रु बन चुके हैं। इस समय तो केवल इतना ही है कि दोनों के बीच अस्थायी अनबन चल रही है।


अभी के लिए विराम 

दर्शन को अपनाने वाले व्यक्ति के बारे में -- पत्र - 109

 प्रिय लूसीलियस 


तुमने मुझसे पूछा था कि यूनानी शब्द सोफिस्मैटा (sophismata) के लिए लैटिन में क्या शब्द है। इसके लिए अनेक शब्द गढ़ने के प्रयास किए गए हैं किन्तु कोई एक शब्द सर्वमान्य नहीं हो पाया। न तो हमें वास्तव में ऐसे कुतर्क प्रिय हैं और न ही हम उनका उपयोग करते हैं। इसलिए उनके लिए प्रयुक्त शब्द भी हमें विशेष पसंद नहीं है। मेरे विचार से सिसेरो द्वारा प्रयुक्त शब्द 'कुतर्क' (cavillationes) सबसे उपयुक्त है। जो लोग इन कुतर्कों में उलझे रहते हैं, वे सचमुच ऐसे प्रश्न गढ़ लेते हैं जो लोगों को उलझन में डाल दें किन्तु इससे उनका जीवन तनिक भी बेहतर नहीं बनता। न वे अधिक साहसी बनते हैं, न अधिक संयमी और न ही उनका चरित्र अधिक उदात्त होता है।



    इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति स्वयं के उपचार के लिए दर्शन को अपनाता है, तब उसका मन विशाल हो जाता है और उसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकने लगता है। उसके जितना निकट जाओ, उसकी श्रेष्ठता उतनी ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे ऊँचे पर्वतों के साथ होता है। दूर से उनकी ऊँचाई उतनी स्पष्ट नहीं दिखाई देती। परन्तु निकट पहुँचने पर उनका वास्तविक विराट स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाता है। प्रिय लूसीलियस, वास्तविक दार्शनिक भी ऐसा ही होता है। वह जो सचमुच दर्शन का जीवन जीता है, न कि छल-कपट या शब्द-कौशल के सहारे। वह एक ऊँचे शिखर पर स्थित होता है, अद्भुत, उन्नत और वास्तव में महान। वह कृत्रिम उपायों से अपनी ऊँचाई नहीं बढ़ाता, न ही पंजों के बल खड़े होकर स्वयं को वास्तविकता से अधिक ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है। वह अपने वास्तविक कद से ही संतुष्ट रहता है। वह संतुष्ट क्यों न हो? वह उस ऊँचाई तक पहुँच चुका है जहाँ तक भाग्य का हाथ भी नहीं पहुँच सकता। इसलिए वह सामान्य मानवीय परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है और हर स्थिति में स्वयं के प्रति समान बना रहता है, चाहे उसका जीवन सहज रूप से आगे बढ़े या बाधाओं और कठिनाइयों से जूझता हुआ आगे बढ़े। ऐसी अटल स्थिरता उन कुतर्कों से प्राप्त नहीं हो सकती जिनकी चर्चा मैं कुछ समय पहले कर रहा था। मन उनसे खेलता अवश्य है किन्तु उससे कोई लाभ नहीं होता बल्कि वे दर्शन को उसकी ऊँची प्रतिष्ठा से गिराकर साधारण धरातल पर ले आते हैं। 

    मैं तुम्हें कभी-कभी ऐसे अभ्यास में लगे रहने से नहीं रोकूँगा। पर केवल तब, जब तुम्हारे पास करने के लिए कोई अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य न हो। किन्तु उनमें एक बड़ी बुराई यह है कि वे अपनी दिखावटी सूक्ष्मता से हमें आकर्षित कर लेते हैं, हमारा ध्यान बाँधे रखते हैं और हमें विलम्ब में डाल देते हैं। जबकि उसी समय हमें कहीं अधिक गंभीर और महत्त्वपूर्ण विषय बुला रहे होते हैं। वास्तव में, पूरे जीवन की अवधि भी केवल यह एक बात सीखने के लिए पर्याप्त नहीं पड़ती कि जीवन को स्वयं कोई अत्यधिक महत्त्व की वस्तु न समझा जाए। “तो क्या जीवन का संचालन अपने हाथ में ले लेना चाहिए?” तुम पूछते हो। हाँ, पर वह दूसरा कार्य है। अपने जीवन पर पूर्ण अधिकार किसी ने भी तब तक प्राप्त नहीं किया, जब तक उसने पहले स्वयं जीवन से अत्यधिक आसक्ति करना छोड़ नहीं दिया।


अभी के लिए विदा 

ज्ञान का पुनरावलोकन करने एवं सीमित आवश्यकता के बारे में -- पत्र - 108

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें नोमेन्टम स्थित अपने ग्रामीण निवास से शुभकामनाएँ भेजता हूँ। मेरी कामना है कि तुम्हारा मन उत्कृष्ट बने। यह कामना वास्तव में देवताओं की कृपा की कामना भी है क्योंकि जो व्यक्ति सचमुच स्वयं पर उपकार करता है, उसे सभी देवताओं की सद्भावना और सहायता भी प्राप्त होती है। फिलहाल उन लोगों की इस धारणा को एक ओर रख दो कि हममें से प्रत्येक को एक संरक्षक देवता प्रदान किया गया है। ऐसा देवता नहीं जो उच्च श्रेणी का हो बल्कि निम्न श्रेणी का, जिन्हें ओविड (एक रोमन कवि) ने 'साधारण देवता' कहा है। फिर भी, इस विचार को अभी के लिए अलग रखते हुए यह स्मरण रखना कि हमारे पूर्वज, जो इस विश्वास को मानते थे, निश्चय ही स्टोइक विचारधारा के निकट रहे होंगे क्योंकि वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक व्यक्तिगत जीनियस (संरक्षक आत्मा) अथवा स्त्रियों के लिए, एक व्यक्तिगत जूनो (एक शक्तिशाली देवी) को नियुक्त मानते थे। किसी अन्य अवसर पर हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि क्या देवताओं के पास इतना अवकाश है कि वे सामान्य मनुष्यों के दैनिक कार्यों की भी देखभाल कर सकें। अभी के लिए इतना निश्चित जान लो कि चाहे हमें ऐसे संरक्षक मिले हों या हमें भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया हो, किसी व्यक्ति के लिए सबसे भयंकर अभिशाप यही है कि तुम प्रार्थना करो। वह स्वयं अपना ही शत्रु बन जाए।



    परन्तु तुम्हें यह प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं कि देवता किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाएँ जो दण्ड का अधिकारी प्रतीत होता है। मैं तो कहता हूँ कि वे उसके प्रति पहले से ही प्रतिकूल हैं, चाहे देखने में ऐसा लगे कि वह उनकी कृपा का आनंद ले रहा है। यदि तुम मानव जीवन की परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन उन्हें जैसी वे वास्तव में हैं, वैसा करो न कि जैसा उनका वर्णन किया जाता है तो तुम्हें ज्ञात होगा कि अधिकांश अवसरों पर हमारी विपत्तियाँ हमें कोई वास्तविक हानि नहीं पहुँचातीं। कितनी ही बार तथाकथित विपत्ति ही सुख का कारण और आरम्भ सिद्ध हुई है! कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि कोई व्यक्ति भारी प्रशंसा और सम्मान के बीच पदोन्नत होता गया, ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँचता गया। जबकि वास्तव में वह किसी खड़ी चट्टान के किनारे की ओर बढ़ रहा था। यहाँ तक कि उसका पहले का स्थान भी इतना ऊँचा था कि वहाँ से गिरने का जोखिम बना हुआ था। 

    किन्तु यदि तुम उस अंतिम सीमा को ध्यान में रखो जिसके आगे प्रकृति किसी को नहीं गिराती तो स्वयं पतन में भी स्वभावतः कुछ भी बुरा नहीं है। हमारे समस्त कार्यों का अंत निकट ही है। मैं फिर कहता हूँ, भाग्यशाली व्यक्ति का पतन भी निकट है और दुर्भाग्यग्रस्त व्यक्ति की मुक्ति भी निकट है। इन्हें लंबा तो हम स्वयं ही बनाते हैं। अपनी आशाओं और भय के कारण हम उन्हें खींचते चले जाते हैं। बुद्धिमानी इसी में है कि प्रत्येक बात का मूल्यांकन अपनी मरणशीलता को ध्यान में रखकर किया जाए। तुम्हें अपने आनंद को भी सीमित रखना चाहिए और अपने भय को भी। किसी भी वस्तु का बहुत लंबे समय तक आनंद न लेना ही उचित है ताकि किसी वस्तु से बहुत लंबे समय तक भयभीत भी न रहना पड़े।

    पर मैं इस दोष को केवल इसी सीमा तक क्यों सीमित करूँ? वास्तव में ऐसा कोई कारण नहीं है कि तुम किसी भी वस्तु को भयावह समझो। जो बातें हमें आतंकित और भयभीत करती हैं, वे केवल भ्रममात्र हैं। हममें से किसी ने भी सत्य का अन्वेषण नहीं किया। हम तो केवल अपने भय एक-दूसरे को सौंपते चले आते हैं। कोई भी इतना साहस नहीं करता कि उन बातों के निकट जाकर, जो लोगों को विचलित करती हैं, स्वयं भय के वास्तविक स्वरूप और उसके वास्तविक महत्व को समझे। भय की असत्यता और आधारहीनता आज भी इसलिए स्वीकार की जाती है क्योंकि किसी ने उसका खण्डन नहीं किया है। इसलिए हमें चाहिए कि तथ्यों की गहराई से जाँच करने के महत्व को समझें। तब हमें ज्ञात होगा कि जिन बातों से लोग डरते हैं, वे अल्पकालिक, अनिश्चित और वास्तव में हानिरहित होती हैं। हमारे मन का भ्रम ठीक वैसा ही है जैसा लुक्रेतियस ने कहा है—

“जैसे बच्चे अँधेरे में उन वस्तुओं से काँपते और डरते हैं जिन्हें वे देख नहीं पाते, वैसे ही हम भी दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं।”

    तो फिर क्या? क्या हम, जो दिन के उजाले में भयभीत रहते हैं, किसी भी बच्चे से अधिक मूर्ख नहीं हैं? किन्तु, लुक्रेतियस, इस विषय में तुम भूल करते हो। ऐसा नहीं है कि हम दिन के उजाले में भयभीत होते हैं बल्कि हमने अपने जीवन से सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु को अन्धकारमय बना लिया है। हमें कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता न यह कि वास्तव में हमारे लिए क्या हानिकारक है और न यह कि क्या हितकर है। हम जीवन भर बिना सोचे-समझे हर ओर भागते रहते हैं। परन्तु इससे न तो हम रुकते हैं और न ही अधिक सावधानी से कदम बढ़ाना सीखते हैं। तुम स्वयं देख सकते हो कि अँधेरे में उतावलेपन से दौड़ना कितना पागलपन है। हमारे व्यवहार का परिणाम यह होता है कि जब लौटना पड़ता है तो हमें अधिक समय लगता है। किन्तु यह जाने बिना कि हम कहाँ जा रहे हैं, हम उसी दिशा में और अधिक वेग से बढ़ते चले जाते हैं, जिस ओर हमारा अंधा आग्रह हमें ले जा रहा होता है।

    यदि हम चाहें, तो प्रकाश प्राप्त हो सकता है। किन्तु यह केवल एक ही प्रकार से संभव है। मानवीय और दैवीय विषयों का ऐसा ज्ञान प्राप्त करके जो केवल सतही न हो बल्कि मन पर स्थायी रूप से अंकित हो। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य बार-बार अपने ज्ञान का पुनरावलोकन करे, उसे अपने जीवन में लागू करे और निरन्तर यह जाँचता रहे कि वास्तव में कौन-सी वस्तुएँ अच्छी हैं, कौन-सी बुरी हैं, किन वस्तुओं को भूलवश अच्छा या बुरा कहा जाता है, क्या सम्माननीय है और क्या लज्जाजनक तथा दैवीय विधान (प्रोविडेन्स) का वास्तविक स्वरूप क्या है। मानव बुद्धि को भी इन्हीं सीमाओं तक बँधे रहने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो यह स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह स्वर्ग-मण्डल की सीमा से भी परे दृष्टि डाले और विचार करे कि यह जगत किस ओर अग्रसर है, इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है और इतनी तीव्र गति से यह किस अंतिम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। 

    किन्तु इस दिव्य चिंतन से अपने मन को हटाकर हमने उसे तुच्छ और निम्न विषयों में लगा दिया है तथा उसे लोभ का दास बना दिया है। हमने आकाश-मण्डल, उसकी सीमाओं और समस्त जगत का संचालन करने वाले उसके अधिपतियों की उपेक्षा कर दी, ताकि पृथ्वी को खोदकर यह खोज सकें कि उसमें से कौन-सी हानिकारक वस्तुएँ निकाली जा सकती हैं; मानो जो कुछ प्रकृति ने हमें सहज रूप से दिया था, उससे हम संतुष्ट ही न हों। हमारे दिव्य जनक ने जो कुछ हमारे लिए हितकारी था, उसे बिना हमारे खोजे ही सहज उपलब्ध करा दिया था। उन्होंने उसकी प्राप्ति के लिए हमें प्रतीक्षा नहीं कराई बल्कि उसे उदारतापूर्वक प्रदान किया। जो कुछ हमारे लिए हानिकारक था, उसे उन्होंने पृथ्वी की गहराइयों में छिपा दिया। इसलिए यदि किसी के विरुद्ध शिकायत की जा सकती है तो वह केवल हम स्वयं हैं। प्रकृति की इच्छा के विरुद्ध, जिसने उन विनाशकारी वस्तुओं को छिपाकर रखा था, हमने ही उन्हें खोजकर अपने विनाश के साधन बाहर निकाल लिए। हमने अपने मन को भोग-विलास के हवाले कर दिया। जबकि भोग-विलास ही सभी विपत्तियों का प्रारम्भ है और स्वयं को महत्त्वाकांक्षा, यश-लालसा तथा अन्य उतनी ही व्यर्थ और निरर्थक वस्तुओं के अधीन कर दिया।

    तो फिर मैं तुम्हें क्या करने की सलाह देता हूँ? यह नहीं कि तुम कोई नई बात करो क्योंकि जिन रोगों का हम उपचार करना चाहते हैं वे नए नहीं हैं। सबसे पहले स्वयं विचार करो कि वास्तव में क्या आवश्यक है और क्या अनावश्यक। जो आवश्यक है, वह हर स्थान पर मिल सकता है। लेकिन अनावश्यक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए ही मनुष्य को अपना सारा समय और परिश्रम लगाना पड़ता है। मैं यह नहीं कहता कि यदि तुम स्वर्णजटित शय्याओं और रत्नजड़ित पात्रों को तुच्छ समझो तो स्वयं पर गर्व करो। अनावश्यक वस्तुओं का तिरस्कार करने में कौन-सा विशेष सद्गुण है? अपने ऊपर तब गर्व करना, जब तुम आवश्यक वस्तुओं की भी अपेक्षा न रखो।राजसी वैभव का त्याग कर देना, विशालकाय जंगली सूअरों के मांस, राजहंसों की जिह्वाओं तथा विलासी भोजन की उन सब अति की इच्छा न करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। विलासिता की प्रवृत्ति तो इतनी विकृत हो जाती है कि वह अब किसी पूरे प्राणी को खाने में भी संतुष्ट नहीं होती बल्कि विभिन्न प्राणियों के केवल चुने हुए अंगों का स्वाद लेना चाहती है। 

    मैं तुम्हारी प्रशंसा तब करूँगा जब तुम साधारण रोटी की भी परवाह न करोगे और अपने मन को यह विश्वास दिला दोगे कि घास केवल पशुओं के चरने के लिए ही नहीं उगती बल्कि आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य के लिए भी भोजन बन सकती है। जब तुम यह समझ जाओगे कि हमारा पेट जिसे हम मानो किसी सुरक्षित भंडार की तरह महँगे व्यंजनों से भरते रहते हैं, वह वृक्षों की पत्तियों से भी भरा जा सकता है। हमें केवल अपनी भूख शांत करनी चाहिए। भोजन के प्रकार को लेकर आग्रह नहीं करना चाहिए। इससे क्या अंतर पड़ता है कि पेट में क्या गया? वह वहाँ अधिक समय तक रहने वाला तो नहीं है। तुम्हें ऐसी भोजन-मेज़ प्रिय लगती है जिस पर स्थल और समुद्र, दोनों से प्राप्त व्यंजन सजे हों। कुछ इसलिए अधिक प्रिय होते हैं कि वे बिल्कुल ताज़े लाए गए हैं। कुछ इसलिए कि उन्हें कृत्रिम रूप से खिलाकर-पिलाकर इतना मोटा कर दिया गया है कि वे अपने ही भार से फटने को हों और अपना आकार तक संभाल न पा रहे हों। तुम्हें ये सब व्यंजन उनके कलात्मक और आकर्षक विन्यास के कारण प्रिय लगते हैं। पर वास्तव में, चाहे उन्हें कितनी ही कठिनाई से प्राप्त किया गया हो और कितनी ही कुशलता से पकाया और मसालेदार बनाया गया हो, पेट में पहुँचने के बाद वे सब एक ही प्रकार की गंदगी में परिवर्तित हो जाते हैं। यदि तुम भोजन के सुखों का तिरस्कार करना चाहते हो तो यह सोचो कि अंततः तुम्हारा भोजन कहाँ पहुँचता है।

    मुझे स्मरण है कि जब अत्तालस ने ये बातें कही थीं, तब सब लोग उनकी कितनी प्रशंसा करते थे, “लंबे समय तक मैं धन-संपत्ति के मोह में पड़ा रहा। जहाँ-जहाँ भी मैं उसे चमकते हुए देखता, उसे देखकर चकित रह जाता और यह समझता था कि भीतर से भी वह वैसी ही होगी जैसी बाहर से दिखाई देती है। फिर एक अवसर पर मैंने किसी नगर की सम्पूर्ण समृद्धि का सार्वजनिक प्रदर्शन देखा। वहाँ चाँदी और सोने पर उकेरे गए पात्र थे। उनसे भी अधिक मूल्यवान पदार्थों से बनी वस्तुएँ थीं। ऐसे वस्त्र थे जो केवल हमारे राज्य की सीमाओं के बाहर से ही नहीं बल्कि हमारे शत्रुओं की सीमाओं के पार से मँगाए गए दुर्लभ रंगों से रँगे हुए थे। दोनों ओर असाधारण रूप और सौन्दर्य वाले दास और दासियाँ खड़े थे। संक्षेप में, साम्राज्य की अपार संपत्ति अपने वैभव के जो भी साधन प्रस्तुत कर सकती थी, वे सब वहाँ प्रदर्शित थे। मैंने मन ही मन कहा, ‘यह सब तो केवल उन इच्छाओं को और भड़काने का उपाय है, जो पहले ही पर्याप्त प्रबल हैं। धन का यह प्रदर्शन आखिर किसलिए है? क्या हम यहाँ केवल लोभ का पाठ सीखने के लिए एकत्र हुए हैं?’ वास्तव में, वहाँ से लौटते समय मेरे भीतर धन पाने की लालसा उतनी भी नहीं रही जितनी वहाँ जाते समय थी। मैंने धन की उपेक्षा इसलिए नहीं की कि वह अनावश्यक है बल्कि इसलिए कि वह तुच्छ है। क्या तुमने नहीं देखा कि इतनी सावधानी से व्यवस्थित और धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला वह सारा जुलूस कुछ ही घंटों में समाप्त हो गया? जो वस्तु पूरे एक दिन तक भी टिक नहीं सकती, क्या वही हमारे पूरे जीवन पर अधिकार कर ले? मेरे मन में यह विचार भी आया कि वह समस्त वैभव अपने स्वामियों के लिए भी उतना ही अनावश्यक था, जितना उसे देखने वाले दर्शकों के लिए।”

    “इसी कारण, जब भी मेरी आँखें इस प्रकार के वैभव पर ठहरती हैं या जब मैं किसी भव्य भवन, उत्तम प्रशिक्षण पाए हुए दासों की पूरी पंक्ति अथवा सुन्दर कहारों के कंधों पर उठाई जा रही पालकी को देखता हूँ तो मैं अपने आप से कहता हूँ, ‘तुम क्यों इतने प्रभावित और विस्मित हो रहे हो? यह तो केवल एक प्रदर्शन है।’ लोग इन वस्तुओं के वास्तविक स्वामी नहीं होते। वे केवल उनका प्रदर्शन करते हैं। जिस क्षण ये वस्तुएँ हमें आकर्षित करती हैं, उसी क्षण वे नष्ट होने की दिशा में भी बढ़ रही होती हैं। इसके बजाय अपना ध्यान वास्तविक धन-संपदा की ओर लगाओ। थोड़े में संतुष्ट रहना सीखो। पूरे उत्साह तथा निर्भीकता के साथ यह घोषणा करो—

‘हमारे पास जल है। हमारे पास साधारण दलिया है। आओ, हम सुख के लिए स्वयं ज्यूपिटर से भी स्पर्धा करें।’

मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि हम इन वस्तुओं के बिना भी यही चुनौती दें। अपने सुखी जीवन का आधार सोने और चाँदी को बनाना जितना लज्जाजनक है, उतना ही लज्जाजनक उसे केवल जल और साधारण दलिया पर आधारित करना भी है।

    “यदि ये वस्तुएँ भी उपलब्ध न हों तो मैं क्या करूँ?” क्या तुम यह पूछ रहे हो कि घोर निर्धनता की औषधि क्या है? भूख की अंतिम सीमा स्वयं उपवास और मृत्यु है। यदि ऐसा न मानो तो फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम अपार धन-संपत्ति के दास हो या अत्यन्त अल्प साधनों के? यदि भाग्य किसी वस्तु को तुमसे छीन ही सकता है, तो यह क्या महत्त्व रखता है कि वह वस्तु बहुत बड़ी थी या बहुत छोटी? यह जल और यह साधारण दलिया भी किसी दूसरे के अधिकार में हो सकते हैं। वास्तव में स्वतंत्र वह नहीं है, जिस पर भाग्य का प्रभाव कम पड़ता हो। स्वतंत्र तो वह है, जिस पर भाग्य का कोई भी प्रभाव न पड़ सके। यही सत्य है। यदि तुम ज्यूपिटर को, जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, चुनौती देना चाहते हो तो तुम्हें भी किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं रखनी चाहिए।”

अत्तालस हमें यही शिक्षा दिया करते थे। यही शिक्षा प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को दी है। यदि तुम बार-बार इन बातों पर मनन करने का प्रयास करोगे तो तुम्हारा लक्ष्य वास्तव में सुखी बनना होगा, केवल सुखी दिखाई देना नहीं अर्थात तुम अपने लिए सुखी बनना चाहोगे, दूसरों की दृष्टि में नहीं।

Sunday, 2 August 2026

दार्शनिक जीवन के प्रदर्शन के बारे में -- पत्र - 101 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम उन बातों की टोह क्यों लगाए रहते हो जो शायद तुम्हारे साथ घटें। परंतु यह भी संभव है कि कभी घटें ही नहीं? मेरा आशय आग लगने, भवनों के ढह जाने और ऐसी ही अन्य घटनाओं से है, जो कभी-कभी हमारे साथ घट तो जाती हैं पर उनका उद्देश्य हमें हानि पहुँचाना नहीं होता। इसके बजाय, उन बातों पर दृष्टि रखो जो वास्तव में तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए तत्पर हैं, जो तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र रचती हैं, और उनसे बचने का प्रयास करो। यद्यपि जहाज़ का डूब जाना या रथ से गिर पड़ना जैसी दुर्घटनाएँ निश्चय ही गंभीर होती हैं, फिर भी वे विरले ही घटती हैं। परंतु एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को जो खतरा होता है, वह तो प्रतिदिन उपस्थित रहने वाली बात है।



    इनसे बचने के लिए स्वयं को तैयार करो और अपना ध्यान इन्हीं पर केंद्रित करो। इससे अधिक सामान्य, अधिक निरंतर और अधिक कपटपूर्ण कोई विपत्ति नहीं है। तूफ़ान आने से पहले उसके लक्षण दिखाई देते हैं। भवन गिरने से पहले चरमराने लगते हैं। धुआँ आग लगने का संकेत दे देता है। किंतु मनुष्यों द्वारा पहुँचाई जाने वाली हानि तत्काल आती है। वह जितनी निकट होती है, उतनी ही अधिक सावधानी से छिपाई जाती है। जिन लोगों से तुम मिलते हो, उनके चेहरे पर विश्वास करना भूल है। उनका रूप तो मनुष्य का होता है, किंतु स्वभाव जंगली पशुओं का। अंतर केवल इतना है कि पशुओं का पहला आक्रमण ही सबसे अधिक खतरनाक होता है। वे किसी को छोड़कर फिर लौटकर उसका पीछा नहीं करते। वे केवल तभी आक्रमण करते हैं जब भूख या भय उन्हें विवश कर देता है। इसके विपरीत, मनुष्य तो प्रायः दूसरे मनुष्य का विनाश करने में ही आनंद अनुभव करता है। 

    फिर भी, जब तुम यह विचार करो कि अन्य मनुष्यों से तुम्हें किस प्रकार के खतरे हो सकते हैं, तब तुम्हें मनुष्यों के एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों का भी स्मरण रखना चाहिए। एक व्यक्ति पर इसलिए दृष्टि रखो कि उससे तुम्हें हानि न पहुँचे। दूसरे के प्रति इसलिए सावधान रहो कि तुम्हारे कारण उसे कोई हानि न हो। दूसरों की सफलता में प्रसन्नता प्रकट करो, उनके दुख और विपत्ति में सहानुभूति रखो। यह स्मरण रखो कि कब तुम्हें सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहिए और कब सावधानी से काम लेना चाहिए।

    यदि तुम इस प्रकार जीवन व्यतीत करोगे तो तुम्हें क्या प्राप्त होगा? यह आवश्यक नहीं कि तुम हर प्रकार की हानि से बच जाओगे लेकिन कम-से-कम तुम उस हानि का शिकार अनजाने में नहीं बनोगे। जहाँ तक संभव हो, अपने को दर्शन की शरण में ले जाओ। दर्शन तुम्हारी रक्षा करेगा। उसके आश्रय में तुम सुरक्षित रहोगे या कम-से-कम पहले से अधिक सुरक्षित अवश्य रहोगे। लोग तभी एक-दूसरे से टकराते हैं जब वे एक ही मार्ग पर चल रहे होते हैं। 

    पर तुम्हें अपने दर्शन का प्रदर्शन या उसका घमंड नहीं करना चाहिए। अनेक लोग केवल इसलिए संकट में पड़ गए हैं कि उन्होंने अपने दार्शनिक जीवन का भद्दे ढंग से प्रदर्शन किया। तुम दर्शन का उपयोग अपने दोषों को दूर करने के लिए करो, न कि दूसरों की आलोचना करने के लिए। दर्शन को सामान्य जीवन-पद्धति से अलग मत करो, और न ही ऐसा प्रतीत होने दो कि वह केवल इसलिए संसार की हर बात की निंदा करता है क्योंकि वह स्वयं उन कार्यों से विरत रहता है। बिना किसी प्रदर्शन के और बिना लोगों में विरोध या वैमनस्य उत्पन्न किए भी, बुद्धिमानी और दर्शन का आचरण किया जा सकता है।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति के बारे में -- पत्र - 100 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


यह अत्यंत खीझ उत्पन्न करने वाली बात होती है कि किसी सुखद सपने से अचानक जगा दिया जाए क्योंकि जो सुख उससे छिन जाता है, वह चाहे काल्पनिक ही क्यों न हो, उसका प्रभाव वास्तविक होता है। तुम्हारे पत्र ने भी मेरे साथ कुछ ऐसा ही किया। उसने मुझे उस समय बाधित कर दिया, जब मैं ऐसे चिंतन में पूर्णतः तल्लीन था, जो मुझे अत्यंत प्रिय है और अवसर मिलता तो मैं उसे और भी देर तक जारी रखता। मैं आत्मा की अमरता के विषय में विचार करने का आनंद ले रहा था। इतना ही नहीं, मैं उस पर विश्वास करने के लिए भी तैयार हो गया था। मैं उन महान पुरुषों के मतों के प्रति सहानुभूति अनुभव कर रहा था, जो इस अत्यंत मनोहर संभावना का समर्थन करते हैं।  हालाँकि वे उसे पूरी तरह सिद्ध नहीं कर पाते। मैंने स्वयं को इस महान आशा के हवाले कर दिया था। मैं अपने वर्तमान जीवन से पहले ही विरक्त होने लगा था। अपने दुर्बल जीवन के शेष बचे हुए अंशों से भी मेरा मन ऊब चुका था। मेरे सामने उस असीम काल में प्रवेश करने और शाश्वतता का अधिकारी बनने की संभावना थी। पर तभी तुम्हारा पत्र आ पहुँचा और मैं जैसे नींद से जगा दिया गया। इस प्रकार मेरा वह मनोहर स्वप्न टूट गया। फिर भी, यदि मैं तुमसे कुछ समय के लिए छुटकारा पा सका तो मैं उसे फिर खोज निकालूँगा और पुनः प्राप्त कर लूँगा।


    तुम्हारे पत्र का आरंभ इस बात पर ज़ोर देता है कि मैं उस विवेचना को पूरा नहीं कर पाया, जिसमें मैं स्टोइक मत के इस सिद्धांत को सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था कि मृत्यु के बाद मिलने वाली कीर्ति भी एक प्रकार का शुभ है। तुम्हारा कहना है कि मैं हमारे विरोधियों की इस आपत्ति का समाधान नहीं कर सका, “कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु यह तो ऐसी ही पृथक वस्तुओं से मिलकर बना है।” प्रिय लूसीलियस, तुम्हारी यह कठिनाई उसी विवेचना के अंतर्गत आने वाले एक दूसरे विषय से संबंधित है। इसलिए मैंने न केवल उसका उत्तर देना स्थगित रखा बल्कि उससे संबंधित अन्य प्रश्नों की चर्चा भी नहीं की क्योंकि, जैसा कि तुम जानते हो, नीतिशास्त्र में कुछ ऐसे विषय भी सम्मिलित होते हैं जो तर्कशास्त्र के क्षेत्र में आते हैं। 

    इसी कारण अब तक मैंने केवल उन्हीं विषयों पर विचार किया है जो सीधे-सीधे नीतिशास्त्र से संबंधित हैं जैसे कि क्या अपने अंतिम दिन के बाद तक अपनी चिंता का विस्तार करना मूर्खता और निरर्थकता है अथवा क्या हमारे सभी शुभ हमारे साथ ही समाप्त हो जाते हैं और हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद कुछ भी हमारा नहीं रहता? क्या उस वस्तु से, जो हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाने के बाद घटित होगी और जिसका अनुभव हम कभी नहीं कर सकेंगे, पहले से ही किसी लाभ की आशा की जा सकती है या उसका कोई लाभ अनुभव किया जा सकता है? ये सभी प्रश्न नीतिशास्त्र से संबंधित हैं। इसलिए मैंने उन्हें उनके उचित स्थान पर ही रखा है। लेकिन इस स्टोइक सिद्धांत के विरुद्ध तर्कशास्त्रियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को अलग रखना आवश्यक था। इसलिए मैंने उन्हें एक ओर रख दिया। अब, चूँकि तुम पूरे विषय का निरूपण चाहते हो। इसलिए मैं उन सभी आपत्तियों का क्रमशः उल्लेख करूँगा और फिर एक-एक करके उनका खंडन करूँगा।

    मेरे प्रतिवादों को समझने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि मैं पहले कुछ प्रारंभिक बातें कहूँ। मेरा आशय क्या है? कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो अखंड होती हैं जैसे, एक मनुष्य। कुछ अन्य संयुक्त होती हैं जैसे, एक जहाज़, एक घर, अथवा वे सभी वस्तुएँ जो विभिन्न भागों के परस्पर जुड़ने से एक इकाई बनती हैं। कुछ ऐसी होती हैं जो पृथक-पृथक भागों से मिलकर बनी होती हैं, जिनका प्रत्येक भाग अपनी अलग सत्ता बनाए रखता है जैसे, एक सेना, एक जनसमुदाय या एक सीनेट। इन अंतिम प्रकार की संस्थाओं के जिन घटकों से उनका निर्माण होता है। वे विधि या कार्य के आधार पर एक साथ जुड़े रहते हैं पर स्वभावतः वे अलग-अलग व्यक्ति ही होते हैं। अब मुझे और कौन-सी प्रारंभिक बातें कहनी चाहिए? हम स्टोइकों का सिद्धांत है कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। इसका कारण यह है कि कोई भी एक शुभ वस्तु एक ही आत्मा के नियंत्रण और संचालन में होनी चाहिए अर्थात किसी एक शुभ वस्तु का संचालन करने वाली शक्ति भी एक ही होनी चाहिए। यदि कभी तुम इसका प्रमाण चाहो तो यह बात स्वयं अपने स्वरूप से सिद्ध की जा सकती है। फिलहाल मुझे इसे एक आधारभूत मान्यता के रूप में स्वीकार करना पड़ा है क्योंकि हमारे ही सिद्धांतों का उपयोग हमारे विरुद्ध किया जा रहा है।

    इस प्रकार हमारा प्रतिपक्षी कहता है, “तुम यह दावा करते हो कि कोई भी शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकता जो एक-दूसरे से पृथक हों। किंतु जिस यश की तुम बात कर रहे हो, वह तो सज्जनों की अनुकूल धारणा है। प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति के कथन का नाम नहीं है। न ही अपयश किसी एक व्यक्ति के प्रतिकूल निर्णय का परिणाम है। उसी प्रकार यश भी केवल किसी एक सद्गुणी व्यक्ति को प्रसन्न करने का विषय नहीं है। यश तभी अस्तित्व में आता है, जब अनेक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति एक ही मत पर सहमत होते हैं। अतः यश अनेक व्यक्तियों के निर्णयों का परिणाम है। ऐसे व्यक्तियों के निर्णयों का, जो एक-दूसरे से पृथक हैं। इसलिए यश कोई शुभ नहीं हो सकता।”

    इसके अतिरिक्त वह कहता है, “यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं। लेकिन प्रशंसा तो वाणी है। एक अर्थपूर्ण कथन। परंतु वाणी, चाहे वह सज्जनों की ही क्यों न हो, स्वयं कोई शुभ वस्तु नहीं है। यद्यपि एक सज्जन व्यक्ति की प्रत्येक विशेषता प्रशंसनीय और सराहनीय होती है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य शुभ ही हो। वह ताली भी बजाता है और हूट भी करता है। पर कोई भी न तो उसकी ताली को शुभ कहता है और न ही उसके हूट करने को जैसे, कोई उसकी छींक या उसकी खाँसी को शुभ नहीं कहता। इसलिए यश कोई शुभ वस्तु नहीं है। 

    अंत में हमें यह बताओ कि यह शुभ किसका है, प्रशंसा करने वाले का या प्रशंसा पाने वाले का? यदि तुम कहते हो कि यह प्रशंसा पाने वाले का शुभ है तो यह उतना ही हास्यास्पद होगा, जितना यह कहना कि किसी दूसरे व्यक्ति का उत्तम स्वास्थ्य मेरा स्वास्थ्य है। पर जो व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, उसकी प्रशंसा करना एक श्रेष्ठ कर्म है। इसलिए शुभ तो उसी का है जो प्रशंसा करता है क्योंकि वही उसका कर्म है। हमारा नहीं, जिनकी प्रशंसा की जा रही है। यही तो विवाद का विषय था।” 

    अब मैं इन प्रत्येक बिंदुओं पर क्रमशः विचार करूँगा। सबसे पहले, यह प्रश्न कि क्या कोई शुभ ऐसी वस्तुओं से मिलकर बन सकता है जो एक-दूसरे से पृथक हों। यह विषय अभी भी विचाराधीन है और दोनों पक्षों के समर्थक विद्यमान हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि क्या यश के लिए अनेक व्यक्तियों की स्वीकृति आवश्यक है? नहीं। वह तो एक ही सज्जन व्यक्ति के निर्णय से भी पूर्ण हो सकता है क्योंकि यह वही सज्जन व्यक्ति है जो यह निर्णय करता है कि हम भी सज्जन हैं।

    “यह कैसे संभव है?” हमारा प्रतिपक्षी कहता है। “क्या प्रतिष्ठा केवल एक व्यक्ति के सम्मान का नाम होगी? क्या अपयश केवल एक व्यक्ति की निंदा से उत्पन्न हो जाएगा? मैं तो यह मानता हूँ कि यश का क्षेत्र कहीं अधिक व्यापक होता है और उसके लिए अनेक लोगों की सहमति आवश्यक है।” परंतु प्रतिष्ठा और अपयश का विषय यश से भिन्न है। क्यों? इसलिए कि यदि किसी सज्जन व्यक्ति की मेरे बारे में अच्छी राय है तो मेरी स्थिति वही है मानो सभी सज्जन व्यक्तियों की मेरे बारे में वही राय हो। वास्तव में, यदि वे सब मुझे जानते होते तो उनकी भी वही राय होती। उनका निर्णय एक ही होता है और वह समान रूप से सत्य पर आधारित होता है। वे एक-दूसरे से असहमत नहीं हो सकते। इसलिए यह मानना उचित है कि उन सबका निर्णय एक ही है क्योंकि उनके लिए कोई भिन्न निर्णय लेना संभव ही नहीं है। 

पर जहाँ यश अर्थात व्यापक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, वहाँ एक व्यक्ति की राय पर्याप्त नहीं होती। पहले प्रसंग में एक व्यक्ति का निर्णय सभी का प्रतिनिधित्व कर सकता है क्योंकि यदि सभी सज्जन व्यक्तियों से पूछा जाए तो उनका निर्णय सर्वसम्मत होगा। दूसरे प्रसंग में, विभिन्न लोग भिन्न-भिन्न निर्णय करते हैं। ऐसी स्थिति में सहमति प्राप्त होना कठिन होता है, और पूरा विषय संदेह, अनिश्चितता तथा शंका से भरा रहता है। क्या तुम यह समझते हो कि सभी लोग एक ही मत के हो सकते हैं? ऐसा तो एक ही व्यक्ति के भीतर भी नहीं होता। सज्जन व्यक्ति के मामले में निर्णय का आधार सत्य होता है। सत्य की शक्ति भी एक ही होती है तथा उसका स्वरूप भी एक ही होता है। लेकिन अन्य लोगों के मामले में वे असत्य बातों को स्वीकार करते हैं। असत्य कभी स्थिर नहीं रहता। वह सदा परिवर्तनशील होता है तथा मतभेद और असहमति को जन्म देता है।

    “पर प्रशंसा तो केवल एक कथन है और कथन कोई शुभ वस्तु नहीं है।” जब स्टोइक यह कहते हैं कि यश वह प्रशंसा है जो सज्जन लोग किसी सज्जन व्यक्ति को प्रदान करते हैं, तब उनका आशय किसी कथन से नहीं बल्कि एक धारणा या निर्णय से होता है। वास्तव में, कोई सज्जन व्यक्ति कुछ कहे बिना भी यदि यह निर्णय कर ले कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है तो वह व्यक्ति प्रशंसित हो चुका है। इसके अतिरिक्त, प्रशंसा और स्तुतिगान एक ही बात नहीं हैं। स्तुतिगान के लिए वाणी आवश्यक है। इसी कारण कोई 'अंत्येष्टि-प्रशंसा' नहीं कहता बल्कि 'अंत्येष्टि-प्रशस्ति' कहता है क्योंकि प्रशस्ति का कार्य उसे सार्वजनिक रूप से बोलकर व्यक्त करना है। जब हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है, तब हमारा आशय यह नहीं होता कि लोग उसके विषय में मधुर शब्द बोलेंगे बल्कि यह होता है कि वे उसके बारे में अनुकूल निर्णय करेंगे। इसलिए प्रशंसा तब भी होती है, जब कोई व्यक्ति बिना कुछ कहे किसी सज्जन के विषय में अच्छा विचार रखता है और केवल अपने मन में ही उसकी प्रशंसा करता है। 

    इसके अतिरिक्त, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, प्रशंसा का संबंध मन की वृत्ति से है, न कि उन शब्दों से जो उस प्रशंसा को व्यक्त करके सार्वजनिक रूप से प्रकट करते हैं। किसी की प्रशंसा करना अर्थात यह निर्णय करना कि वह प्रशंसा का पात्र है। जब हमारा त्रासदी-कवि कहता है कि “उस व्यक्ति द्वारा प्रशंसित होना, जो स्वयं प्रशंसित है, अत्यंत गौरव की बात है,” तो उसका अभिप्राय यह है कि “उस व्यक्ति द्वारा, जो स्वयं प्रशंसा के योग्य है।” जब एक अन्य प्राचीन कवि कहता है कि “प्रशंसा कलाओं का पोषण करती है,” तो उसका आशय स्तुतिगान से नहीं है क्योंकि वास्तव में स्तुतिगान ही कलाओं को नष्ट कर देता है। वस्तुतः, जनसाधारण की प्रशंसा ने जितना वक्तृत्व-कला और उन सभी कलाओं को भ्रष्ट किया है जो केवल श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए विकसित की जाती हैं, उतना किसी और चीज़ ने नहीं किया। निश्चय ही, प्रतिष्ठा के लिए उसका उच्चारित होना आवश्यक है। लेकिन यश बिना बोले भी विद्यमान हो सकता है। उसके लिए केवल एक अनुकूल निर्णय पर्याप्त है। यश केवल मौन रहने वालों के बीच ही पूर्ण नहीं होता बल्कि उन लोगों के बीच भी पूर्ण रहता है जो उसका विरोध करते हैं और उसे दबाने का प्रयास करते हैं। मैं तुम्हें यश और प्रसिद्धि के बीच का अंतर बताता हूँ। प्रसिद्धि का आधार जनसाधारण का निर्णय होता है। जबकि यश का आधार सज्जन व्यक्तियों का निर्णय होता है।

    “यश अर्थात किसी सज्जन व्यक्ति को सज्जनों द्वारा दी गई प्रशंसा, किसका शुभ है? क्या वह उस व्यक्ति का शुभ है जिसकी प्रशंसा की जाती है, या उसका जो प्रशंसा करता है?” वह दोनों का शुभ है। जब मेरी प्रशंसा की जाती है, तब वह मेरा शुभ है क्योंकि स्वभावतः मेरे मन में सभी मनुष्यों के प्रति स्नेह है। मुझे इस बात का आनंद होता है कि मैंने अच्छा आचरण किया है तथा ऐसे लोगों से मिला हूँ जो मेरे सद्गुणों के प्रति कृतज्ञ हैं। उनकी कृतज्ञता इस शुभ को अनेक लोगों से संबंधित बना देती है। फिर भी वह मेरा भी शुभ है क्योंकि मेरी मनोवृत्ति ऐसी है कि मैं दूसरों के शुभ को भी अपना शुभ मानता हूँ, विशेषकर उन लोगों का, जिनके लिए मैं स्वयं किसी शुभ का कारण बना हूँ। वही शुभ उन लोगों का भी है जो प्रशंसा करते हैं क्योंकि वे यह कार्य सद्गुणपूर्वक करते हैं। प्रत्येक सद्गुणपूर्ण कर्म स्वयं एक शुभ है। यदि मैं स्वयं सद्गुणी न होता तो उन्हें भी यह शुभ प्राप्त न होता। इस प्रकार, उचित और योग्य प्रशंसा दोनों पक्षों के लिए शुभ है। ठीक उसी प्रकार जैसे उचित निर्णय, निर्णय देने वाले के लिए भी शुभ होता है और उस व्यक्ति के लिए भी, जिसे उस निर्णय का लाभ प्राप्त होता है। निस्संदेह, तुम यह स्वीकार करोगे कि न्याय उस व्यक्ति के लिए भी शुभ है जिसके भीतर वह गुण है। उस व्यक्ति के लिए भी जिसे उसका उचित अधिकार प्राप्त होता है। उसी प्रकार, किसी योग्य व्यक्ति की प्रशंसा करना न्याय है। इसलिए यह शुभ दोनों पक्षों का होता है।

    इन कुतर्क करने वालों के उत्तर में इतना ही पर्याप्त है। हमें अपना उद्देश्य इन सूक्ष्म और तुच्छ विवादों में उलझना नहीं बनाना चाहिए और न ही दर्शन को उसकी गरिमा से गिराकर ऐसी क्षुद्र बातों तक ले आना चाहिए।सीधे और खुले मार्ग पर चलना कितना अधिक संतोषजनक है बजाय इसके कि मनुष्य स्वयं ही घुमावदार रास्ते बनाए और फिर बड़े कष्ट से उन्हीं पर लौटने को विवश हो। इस प्रकार के तर्क-वितर्क वास्तव में चतुर वाद-विवाद करने वालों के बौद्धिक विनोद मात्र हैं।

    मुझे तो इसके बजाय यह बताओ कि अपने मन को अनंत तक विस्तृत करना कितना स्वाभाविक है। मानव-मन एक महान और उदात्त वस्तु है। वह अपने लिए कोई सीमा स्वीकार नहीं करता, सिवाय उन सीमाओं के जिन्हें वह स्वयं देवत्व के साथ साझा करता है। सबसे पहले, वह किसी संकीर्ण मातृभूमि को स्वीकार नहीं करता। चाहे वह इफिसस हो, अलेक्ज़ान्द्रिया हो अथवा कोई और अधिक जनसंख्या वाला और अधिक भव्य नगर ही क्यों न हो। उसकी वास्तविक मातृभूमि वह है जो समस्त विश्व की ऊँचाइयों और सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए है, स्वयं आकाश का विशाल मंडल। उसी के भीतर समुद्र और पृथ्वी दोनों स्थित हैं। उसी के भीतर वायु का निम्न प्रदेश मनुष्यों और देवताओं के बीच भेद भी स्थापित करता है और उन्हें जोड़ता भी है। उसी में असंख्य दैवी शक्तियाँ अपने-अपने निश्चित स्थानों पर स्थित रहकर निरंतर अपने-अपने कार्यों की सावधानीपूर्वक देखरेख करती हैं। दूसरे, मन अपने लिए सीमित जीवनकाल को भी स्वीकार नहीं करता। वह कहता है, “समस्त वर्ष मेरे हैं। कोई भी युग महान बुद्धियों के लिए बंद नहीं है। कोई भी काल चिंतन के लिए अनुपलब्ध नहीं है। जब वह दिन आएगा जो इस दैवी और मानवीय तत्वों के मिश्रण को अलग कर देगा, तब मैं इस शरीर को वहीं छोड़ दूँगा जहाँ मैंने उसे पाया था। स्वयं को देवताओं को समर्पित कर दूँगा। अभी भी मैं उनसे पृथक नहीं हूँ। केवल इस पृथ्वी-निर्मित शरीर का भार ही मुझे उनसे अलग रखे हुए है।”

    हमारा समूचा नश्वर जीवन केवल प्रतीक्षा का एक काल है। उस श्रेष्ठ और अधिक दीर्घ जीवन की एक भूमिका मात्र। जिस प्रकार हमारी माताओं का गर्भ हमें दस महीनों तक अपने भीतर रखता है। हमें अपने लिए नहीं बल्कि उस संसार के लिए तैयार करता है जहाँ हम पहली बार श्वास लेने और खुले वातावरण में जीवित रहने योग्य होकर प्रकट होते हैं; उसी प्रकार शैशव से लेकर वृद्धावस्था तक का यह समस्त जीवन भी हमें एक दूसरे जन्म के लिए तैयार करता है। हमारी प्रतीक्षा में एक नया आरंभ है, एक भिन्न अवस्था हमारा इंतज़ार कर रही है। अभी हम स्वर्गलोक को केवल दूर से ही सहन कर सकते हैं। इसलिए उस निर्णायक क्षण की निडर होकर प्रतीक्षा करो। वह तुम्हारे मन का अंतिम क्षण नहीं है। केवल शरीर का अंतिम क्षण है। अपने चारों ओर की प्रत्येक वस्तु को किसी सराय में रखे हुए सामान के समान समझो। तुम्हें आगे बढ़ जाना है। जैसे तुम प्रकृति की आज्ञा से इस संसार में आए थे, वैसे ही उसी मार्ग से लौट भी जाओगे। तुम्हें अपने साथ उससे अधिक कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं है जितना तुम लेकर आए थे बल्कि सत्य तो यह है कि जो कुछ तुम अपने साथ जीवन में लाए थे, उसका भी अधिकांश यहीं छोड़ना पड़ेगा। तुम्हारे शरीर का यह त्वचा-रूपी आवरण, जो तुम्हारा सबसे निकट का वस्त्र है, तुमसे अलग कर दिया जाएगा। तुम अपने मांस से, अपने पूरे शरीर में प्रवाहित रक्त से तथा उन हड्डियों और स्नायुओं से भी अलग कर दिए जाओगे, जो तुम्हारे कोमल और तरल अंगों को सहारा देते हैं।

    जिस दिन से तुम अपने जीवन का अंतिम दिन समझकर भयभीत होते हो, वही तुम्हारी अनंतता का जन्मदिन है।अपना बोझ उतार दो। तुम विलंब क्यों कर रहे हो? क्या तुमने इससे पहले भी उस शरीर को नहीं छोड़ा था, जिसमें तुम छिपे हुए थे। बाहर नहीं आए थे? तुम ठहरना चाहते हो, तुम विरोध करते हो। किंतु उस समय भी तुम्हें तुम्हारी माता के प्रबल प्रयासों से बाहर निकाल दिया गया था। तुम रोते और विलाप करते हो। वास्तव में जन्म लेते समय भी मनुष्य यही करता है। पर तब तुम्हें क्षमा किया जा सकता था क्योंकि तुम बिल्कुल अनभिज्ञ और अनुभवहीन होकर संसार में आए थे। जब तुम्हें अपनी माता के गर्भ के उस गर्म और कोमल आश्रय से बाहर भेजा गया, तब पहली बार स्वतंत्र वायु ने तुम्हें स्पर्श किया। फिर तुमने किसी कठोर हाथ का स्पर्श अनुभव किया। उस समय तुम अत्यंत कोमल थे और संसार के विषय में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिए इस अपरिचित वातावरण से भयभीत और विस्मित हो गए थे। किन्तु अब तुम्हारे लिए यह कोई नई बात नहीं है कि तुम उस वस्तु से अलग हो जाओ, जिसका कभी तुम एक भाग थे। अतः अब शांति के साथ उन अंगों को छोड़ दो जिनकी तुम्हें अब आवश्यकता नहीं रही। उस शरीर का त्याग कर दो जिसमें तुम इतने लंबे समय तक निवास करते रहे हो। वह तो वैसे भी फट जाएगा, चूर-चूर हो जाएगा और नष्ट हो जाएगा। तुम शोक क्यों करते हो? यही तो प्रकृति का नियम है। जिस प्रकार प्रसव के बाद गर्भ की झिल्ली नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार यह शरीर भी नष्ट होने के लिए ही है। तुम उससे ऐसा प्रेम क्यों करते हो मानो वह वास्तव में तुम्हारा अपना हो? वह तो केवल तुम्हारा आवरण था। वह दिन अवश्य आएगा जो तुम्हें इस मलिन और दुर्गंधयुक्त उदर के संबंध से अलग करके बाहर ले जाएगा।

    जहाँ तक संभव हो, अभी से अपने को इस शरीर से अलग करो। उन सुखों से भी दूर हो जाओ, सिवाय उनके जो शरीरधारी जीवन की आवश्यकताओं से जुड़े हुए हैं। अभी से अपने शरीर से विरक्ति उत्पन्न करो और किसी अधिक ऊँची तथा अधिक उदात्त वस्तु का चिंतन करो। समय आने पर प्रकृति के रहस्य तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएँगे। वर्तमान का यह कुहासा हट जाएगा और चारों ओर से निर्मल प्रकाश तुम्हें आलोकित करेगा। अपने मन में उस प्रकाश की महानता की कल्पना करो, जहाँ असंख्य तारों का तेज एक साथ मिल जाता है। वहाँ इस शांति को भंग करने वाली कोई छाया नहीं होगी। आकाश का प्रत्येक भाग समान रूप से प्रकाशित होगा। दिन और रात का क्रम तो केवल इस निम्न वायुमंडल का नियम है। 

    जब तुम अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ उस पूर्ण प्रकाश का दर्शन करोगे, तब स्वीकार करोगे कि अब तक तुम अंधकार में ही जीते रहे थे। अभी तुम उसे केवल अपनी आँखों की इन संकीर्ण खिड़कियों के माध्यम से धुंधले रूप में देखते हो, फिर भी दूर से ही उस पर विस्मित हो उठते हो। तब वह दिव्य प्रकाश तुम्हें कैसा प्रतीत होगा, जब तुम उसे उसके अपने ही लोक में प्रत्यक्ष देखोगे? ऐसे विचार मन में किसी भी तुच्छ, क्षुद्र या पतित भावना को स्थान नहीं लेने देते। वे बताते हैं कि देवता प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं। वे हमें प्रेरित करते हैं कि हम उनकी स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयास करें, आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार रखें, और अपनी दृष्टि अमरत्व पर स्थिर करें। जिस व्यक्ति के मन में यह विचार दृढ़ हो जाता है, वह किसी भी सेना से नहीं डरता, रणभेरी की ध्वनि से विचलित नहीं होता और किसी भी प्रकार की धमकी से भयभीत नहीं होता। वह भयभीत हो भी क्यों? क्योंकि वह तो मृत्यु की प्रतीक्षा भी आशा और उत्सुकता के साथ करता है।

    किन्तु वह व्यक्ति भी, जो यह मानता है कि मन केवल उतनी ही देर तक बना रहता है, जितनी देर वह शरीर के बंधन में रहता है और उससे मुक्त होते ही तुरंत विलीन हो जाता है, फिर भी मृत्यु के बाद भी अपने को उपयोगी बनाने का प्रयत्न करता है। हालाँकि वह हमारी आँखों से ओझल हो जाता है, फिर भी—

“उसका पराक्रम और उसके कुल की महिमा
बार-बार हमारे मन में आती रहती है।”

यह विचार करो कि महान व्यक्तियों के उत्तम उदाहरणों से हमें कितना लाभ होता है। तब तुम समझोगे कि महान पुरुषों की स्मृति उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति से किसी प्रकार कम उपयोगी नहीं होती।


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