Wednesday, 9 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय एक: जादूगर)

 

नींद के विरुद्ध युद्ध

गुर्जिएफ़ का दर्शन

द्वारा
कॉलिन विल्सन

 


 

1—जादूगर

1917 की एक उजली गर्मियों की सुबह लगभग तीस वर्ष की एक आकर्षक रूसी महिला सेंट पीटर्सबर्ग के नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट स्थित फिलिपोव कैफ़े में अपने मित्र पीटर डेमियानोविच उस्पेन्स्की के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। असामान्य रूप से उस दिन उस्पेन्स्की देर से आ रहे थे। जब वे अंततः जल्दी-जल्दी वहाँ पहुँचे तो वे असाधारण रूप से उत्तेजित दिखाई दे रहे थे। उनके मुँह से निकले पहले शब्द थे, मुझे लगता है, इस बार हमें सचमुच वह चीज़ मिल गई है जिसकी हमें तलाश थी।” फिर उन्होंने उसे याद दिलाया कि 1915 में मॉस्को में उनकी मुलाकात एक असाधारण शिक्षक से हुई थी, जो मानव अस्तित्व की मूलभूत समस्याओं के बारे में ऐसे ढंग से बात करता था, मानो उसे उनके बारे में गहरा ज्ञान और अधिकार प्राप्त हो। उसका नाम था जॉर्ज इवानोविच गुर्जिएफ़। अब उस्पेन्स्की ने बताया, गुर्जिएफ़ सेंट पीटर्सबर्ग आ चुके थे और ठीक उसी समय सड़क के उस पार स्थित फिलिपोव कैफ़े की दूसरी शाखा में उनका इंतज़ार कर रहे थे। उस महिला, अन्ना बुत्कोव्स्की, का कहना है:

“जब मैं दूसरे फिलिपोव कैफ़े में दाखिल हुई तो मैंने देखा कि एक व्यक्ति दूर कोने में मेज़ पर बैठा हुआ था। उसने साधारण काला कोट पहन रखा था और सिर पर वह ऊँची अस्त्राखान टोपी[1] थी, जो रूसी पुरुष सर्दियों में पहनते हैं। उसके सुडौल और पुरुषोचित चेहरे के नैन-नक्श तथा उसकी ऐसी दृष्टि में, जो मानो सीधे आपके भीतर तक उतर जाती थी (हालाँकि वह किसी भी तरह अप्रिय नहीं थी), यूनानी वंश की झलक दिखाई देती थी। उसका सिर अंडाकार था, आँखें काली थीं और रंग जैतूनी था। उसने काली मूँछ रखी हुई थी। उसका व्यवहार बहुत शांत और सहज था और वह बिना किसी हाव-भाव के बोलता था। उसके साथ केवल बैठना भी बहुत सुखद लगता था। यद्यपि रूसी उसकी मातृभाषा नहीं थी, फिर भी वह रूसी बहुत धाराप्रवाह बोलता था। लेकिन उसका बोलने का ढंग हमारे ढंग से कुछ अलग था। अधिक सटीक और अधिक चित्रात्मक। कभी-कभी वह कुछ ‘आलसी’ आवाज़ में बोलता था और आपको लगता था कि वह प्रत्येक वाक्य को उसी विशेष अवसर के लिए बहुत सावधानी से गढ़ रहा है। वह उन बने-बनाए वाक्यों की तरह बिल्कुल नहीं बोलता था, जिनका हम सामान्य बातचीत में इस्तेमाल करते हैं और जिनमें सृजनात्मक शक्ति या वैयक्तिकता नहीं होती। बहुत जल्दी आपको समझ में आ जाता था कि उसमें शब्दों को प्रभावशाली ढंग से संयोजित करने की अद्भुत क्षमता थी। मैं वहाँ बैठी थी और मुझे महसूस हो रहा था कि आखिरकार मैं एक गुरु की उपस्थिति में हूँ।”

गुर्जिएफ़ से मिलने वाले लगभग हर व्यक्ति पर उन्होंने इसी प्रकार का प्रभाव डाला। हमारे पास उनके शिष्यों द्वारा अपनी पहली मुलाकात के बारे में लिखे हुए शायद एक दर्जन विवरण हैं। लगभग बिना किसी अपवाद के उनमें उस “दृष्टि, जो सीधे आपके भीतर तक उतर जाती थी” का उल्लेख मिलता है। लगभग उसी समय थॉमस डी हार्टमैन नाम का एक युवा सेना अधिकारी भी गुर्जिएफ़ से मिला। जब काले कोट और काली मूँछों वाले दो व्यक्ति कैफ़े में उसकी ओर आते दिखाई दिए तो वह सोचने लगा कि इनमें से गुर्जिएफ़ कौन है। लेकिन उनमें से एक व्यक्ति की आँखों ने बहुत जल्दी मेरी यह अनिश्चितता दूर कर दी।” जे. जी. बेनेट, जिन्होंने 1920 में कॉन्स्टेंटिनोपल में गुर्जिएफ़ से मुलाकात की थी, ने लिखा, मैंने ऐसी आँखों की जोड़ी पहले कभी नहीं देखी थी। दोनों आँखें इतनी अलग थीं कि मुझे लगा, शायद प्रकाश ने मेरी आँखों के साथ कोई चाल चली है।” इन सभी अलग-अलग अनुभवों को 1948 में पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने के बाद चिकित्सक केनेथ वॉकर की पत्नी द्वारा कही गई बात संक्षेप में व्यक्त करती है, उन्होंने मुझ पर जो सबसे प्रमुख प्रभाव डाला, वह था अपार जीवन-शक्ति और संकेंद्रित सामर्थ्य का। मुझे ऐसा लगा कि वह वास्तव में मनुष्य नहीं बल्कि कोई जादूगर है।”

वास्तव में गुर्जिएफ़ एक प्रकार के जादूगर ही थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनमें कुछ जादुई अथवा मानसिक शक्तियाँ थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि वे स्वयं इन शक्तियों को अप्रासंगिक या महत्वहीन मानते थे। गुर्जिएफ़ की केंद्रीय चिंता मनुष्य की संभावनाओं को लेकर थी या अधिक सटीक रूप से कहें तो मानव चेतना की संभावनाओं को लेकर। उस्पेन्स्की ने इसे अपनी एक छोटी-सी पुस्तक द साइकोलॉजी ऑफ़ मैन्स पॉसिबल इवोल्यूशन” (The Psychology of Man’s Possible Evolution) में बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि सामान्य मनोविज्ञान मनुष्य का अध्ययन उस रूप में करता है, जैसा वह वास्तव में है। लेकिन मनोविज्ञान का एक दूसरा प्रकार भी है, जो मनुष्य का अध्ययन “इस दृष्टि से नहीं करता कि वह क्या है या जैसा दिखाई देता है बल्कि इस दृष्टि से करता है कि वह क्या बन सकता है अर्थात उसकी संभावित विकास-यात्रा के दृष्टिकोण से।”

इस तरह व्यक्त करने पर यह विचार कुछ अस्पष्ट और सामान्य-सा लगता है। लेकिन गुर्जिएफ़ का दृष्टिकोण अत्यंत सटीक और विशिष्ट था।  उनके शिष्यों के लेखन में उनकी अपनी असाधारण शक्तियों के कार्य करने के अनेक विवरण मिलते हैं। फ्रिट्ज़ पीटर्स, जो बचपन से गुर्जिएफ़ को जानते थे, बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरंत बाद जब वे पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने गए तो क्या हुआ। युद्ध के अनुभवों ने पीटर्स को लगभग मानसिक तंत्रिका-विघटन की स्थिति तक पहुँचा दिया था। जिस क्षण गुर्जिएफ़ ने उन्हें देखा, उन्हें समझ में आ गया कि पीटर्स बीमार हैं।

“जब हम उनके अपार्टमेंट पहुँचे तो वे मुझे एक लंबे गलियारे से होते हुए एक अँधेरे शयनकक्ष में ले गए। उन्होंने बिस्तर की ओर संकेत किया, मुझे लेटने को कहा और बोले, जब तक तुम्हें आवश्यकता हो, यह तुम्हारा कमरा है।” मैं बिस्तर पर लेट गया और वे कमरे से बाहर चले गए। लेकिन दरवाज़ा बंद नहीं किया। उन्हें देखकर मुझे इतनी जबरदस्त राहत और इतनी उत्तेजना महसूस हुई कि मैं बेकाबू होकर रोने लगा। फिर मेरे सिर में भयंकर दर्द होने लगा। मैं आराम नहीं कर पा रहा था। उठकर रसोई में गया, जहाँ मैंने उन्हें मेज़ पर बैठे पाया। मुझे देखते ही वे चिंतित हो गए और पूछा कि क्या हुआ है। मैंने कहा कि मुझे अपने सिरदर्द के लिए एस्पिरिन या कोई और दवा चाहिए। लेकिन उन्होंने सिर हिला दिया, खड़े हुए और रसोई की मेज़ के पास रखी दूसरी कुर्सी की ओर इशारा किया। उन्होंने दृढ़ता से कहा, दवा नहीं। मैं तुम्हें कॉफ़ी देता हूँ। जितनी गरम हो सके, उतनी गरम पीना।” मैं मेज़ पर बैठ गया। उन्होंने कॉफ़ी गरम की और फिर मुझे लाकर दी। इसके बाद वे कमरे के उस पार जाकर फ्रिज के सामने खड़े हो गए और मुझे देखने लगे। मैं अपनी आँखें उनसे हटा ही नहीं पा रहा था और मैंने महसूस किया कि वे बेहद थके हुए दिखाई दे रहे थे। इतने थके हुए व्यक्ति को मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मुझे याद है, मैं मेज़ पर झुका हुआ कॉफ़ी की चुस्कियाँ ले रहा था कि तभी मुझे अपने भीतर ऊर्जा का एक अजीब-सा उभार महसूस हुआ। मैंने उन्हें देखा, अपने-आप सीधा होकर बैठ गया और ऐसा लगा मानो उनके शरीर से एक तीव्र विद्युत-नीली रोशनी निकलकर मेरे भीतर प्रवेश कर रही हो। जैसे ही ऐसा हुआ, मुझे महसूस हुआ कि मेरी सारी थकान बाहर निकल रही है। लेकिन उसी क्षण उनका शरीर झुक गया और उनका चेहरा धूसर पड़ गया, मानो उनके शरीर से जीवन-शक्ति ही खींच ली गई हो। मैंने उन्हें आश्चर्य से देखा। जब उन्होंने मुझे सीधा बैठा हुआ, मुस्कराता और ऊर्जा से भरा देखा, तो उन्होंने जल्दी से कहा, अब तुम ठीक हो। चूल्हे पर रखे खाने का ध्यान रखना। मुझे जाना होगा।” उनकी आवाज़ में कुछ अत्यंत तत्क्षण और जरूरी-सा था। मैं उनकी मदद करने के लिए झट से खड़ा हो गया। लेकिन उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया और धीरे-धीरे लँगड़ाते हुए कमरे से बाहर चले गए।

ऐसा प्रतीत होता था कि गुर्जिएफ़ ने किसी मानसिक अनुशासन के माध्यम से किसी तरह अपनी जीवन-ऊर्जा पीटर्स में प्रवाहित कर दी थी या फिर किसी प्रकार पीटर्स के भीतर स्थित जीवन-शक्ति के स्रोत को स्पर्श कर दिया था। जो भी हुआ हो, उसका परिणाम यह हुआ कि गुर्जिएफ़ स्वयं की ऊर्जा से खाली हो गए। पीटर्स कहते हैं, मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि वह अपने भीतर से दूसरों तक ऊर्जा पहुँचाना जानते थे और मुझे यह भी विश्वास हो गया था कि ऐसा करना उनके लिए बहुत बड़ी कीमत पर ही संभव था।” इसके बाद जो हुआ, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अगले कुछ ही मिनटों में यह भी स्पष्ट हो गया कि वे अपनी ऊर्जा को बहुत तेजी से फिर से प्राप्त करना जानते थे। जब वे दोबारा रसोई में आए तो उन्हें देखकर मैं हैरान रह गया। वे फिर से एक युवा व्यक्ति जैसे दिखाई दे रहे थे... सतर्क, मुस्कराते हुए, कुछ शरारती और प्रसन्नचित्त। उन्होंने कहा कि यह मुलाकात बहुत सौभाग्यपूर्ण रही और यह कि मैंने उन्हें लगभग असंभव प्रयास करने के लिए विवश कर दिया था। लेकिन जैसा कि मैंने स्वयं देखा था यह हम दोनों के लिए बहुत अच्छी बात साबित हुई थी।

गुर्जिएफ़ की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब पीटर्स पहली बार उनके अपार्टमेंट में आया था, तब वह थके हुए दिखाई दे रहे थे, “मैंने कभी किसी को इतना थका हुआ नहीं देखा था।” उन्होंने पीटर्स को अपनी जीवन-शक्ति प्रदान करने का प्रयास किया, जिससे वे स्वयं और भी अधिक थक गए। और फिर, पंद्रह मिनट के भीतर ही वे पूरी तरह तरोताज़ा और ऊर्जावान हो गए। इसका संकेत बिल्कुल स्पष्ट है। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ स्वयं यह भूल चुके थे कि उनमें अपनी ऊर्जा को फिर से जागृत करने की शक्ति है और फ्रिट्ज़ पीटर्स की अत्यधिक थकान ने उन्हें एक बहुत बड़ा प्रयास करने के लिए विवश कर दिया। पीटर्स के आने से पहले गुर्जिएफ़ अपनी थकान को एक स्वाभाविक और अपरिहार्य चीज़ मानकर स्वीकार कर रहे थे। लेकिन पीटर्स में ऊर्जा प्रवाहित करने से उन्हें यह याद आया कि वे किसी तरह जीवन-शक्ति के स्रोत तक पहुँच सकते हैं और अपनी ऊर्जा को फिर से जगा सकते हैं। इसीलिए उन्होंने पीटर्स से कहा था कि यह मुलाकात उन दोनों के लिए सौभाग्यपूर्ण थी।

यह कहानी हमें ठीक-ठीक समझने में मदद करती है कि केनेथ वॉकर की पत्नी ने गुर्जिएफ़ को जादूगर क्यों समझा था। साथ ही, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी “जादुई” शक्तियाँ उस प्रकार की नहीं थीं, जैसी हम कुख्यात तांत्रिकों या जादूगरों जैसे, मैडम ब्लावात्स्की या एलीस्टर क्रॉली से जोड़ते हैं। मैडम ब्लावात्स्की के बारे में ऐसी कहानियाँ मिलती हैं कि वे पूरे कमरे में अलग-अलग जगहों से खटखटाने जैसी आवाज़ें उत्पन्न कर देती थीं। क्रॉली के बारे में कहा गया है कि वे किसी तरह लोगों को चारों हाथ-पैरों पर चलने और कुत्तों की तरह हुआँ-हुआँ करने के लिए विवश कर देते थे। लेकिन उनके बारे में ऐसी कोई घटना नहीं मिलती जिसमें उन्होंने किसी व्यक्ति पर गुर्जिएफ़ जैसा पूर्णतः स्फूर्तिदायक प्रभाव डाला हो। यह मान लेना भी आवश्यक नहीं है कि गुर्जिएफ़ ने किसी प्रकार के टेलीपैथिक ऊर्जा-हस्तांतरण द्वारा पीटर्स को पुनर्जीवित किया था। कोई मनोवैज्ञानिक शायद यह तर्क देगा कि उन्होंने यह काम किसी प्रकार के सुझाव (suggestion) द्वारा किया था।

जहाँ तक गुर्जिएफ़ की अपनी ऊर्जा को पुनः प्राप्त करने की क्षमता का प्रश्न है, उसके मूल तत्व को उन्नीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक समझ चुके थे। फ्रायड और युंग के युग से भी कई दशक पहले। विलियम जेम्स ने अपने एक महत्वपूर्ण निबंध ‘दि एनर्जीज ऑफ मैन’ (The Energies of Man) में इस विषय पर चर्चा की है।

हर व्यक्ति इस अनुभव से परिचित है कि अलग-अलग दिनों में हम स्वयं को कम या अधिक जीवंत महसूस करते हैं। हर व्यक्ति जानता है कि किसी भी दिन हमारे भीतर कुछ ऐसी ऊर्जाएँ सुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं, जिन्हें उस दिन की परिस्थितियाँ जागृत नहीं कर पातीं। लेकिन यदि परिस्थितियाँ अधिक प्रेरक हों तो हम उन ऊर्जाओं को प्रकट कर सकते हैं। हममें से अधिकांश को ऐसा लगता है, मानो हमारे ऊपर किसी प्रकार का बादल छाया हुआ है, जो हमें स्पष्ट समझ, तर्क में दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता के अपने उच्चतम स्तर तक पहुँचने से रोक रहा है। हमें जितना होना चाहिए, उसकी तुलना में हम केवल आधे जागे हुए होते हैं। हमारी आंतरिक अग्नि धीमी पड़ गई है, हमारी ऊर्जा का प्रवाह रुक गया है। हम अपनी संभावित मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के केवल एक छोटे-से हिस्से का उपयोग कर रहे हैं। कुछ लोगों में अपनी वास्तविक क्षमताओं से कटे होने की यह अनुभूति इतनी तीव्र होती है कि तब वे उन गंभीर न्यूरैस्थेनिक (neurasthenic) और साइकेस्थेनिक (psychasthenic) अवस्थाओं से ग्रस्त हो जाते हैं, जिनका वर्णन अनेक चिकित्सा-पुस्तकों में मिलता है। ऐसी अवस्थाएँ जिनमें पूरा जीवन ही असंभवताओं का एक जाल बन जाता है।  

व्यापक रूप से कहें तो मनुष्य अपनी वास्तविक सीमाओं से बहुत नीचे रहकर जीवन जीता है। उसके भीतर विभिन्न प्रकार की ऐसी शक्तियाँ होती हैं, जिनका वह आदतन उपयोग नहीं करता। वह अपनी अधिकतम क्षमता से कम ऊर्जा लगाता है और अपनी सर्वोत्तम क्षमता से कम स्तर पर व्यवहार करता है। बुनियादी क्षमताओं में, उनके समन्वय में, अपनी प्रतिक्रियाओं को रोकने और नियंत्रित करने की शक्ति में हर संभव अर्थ में उसका जीवन सिकुड़ जाता है, ठीक वैसे जैसे हिस्टीरिया से पीड़ित व्यक्ति का दृष्टिक्षेत्र सिकुड़ जाता है। लेकिन हमारे मामले में इसका बहाना भी कम है क्योंकि वह बेचारा हिस्टीरिया-ग्रस्त व्यक्ति तो रोग से पीड़ित है। जबकि हममें से बाकी लोगों में समस्या केवल एक जड़ जमाई हुई आदत है। अपने पूर्ण स्वरूप की तुलना में स्वयं को कमतर मानने और उसी स्तर पर जीने की आदत।

जेम्स इस शक्ति का उदाहरण ‘सेकंड विंड’ (‘second wind’) की प्रसिद्ध घटना से देते हैं। जब हम कोई काम पूरा कर रहे होते हैं तो जैसे ही हमें थकान महसूस होती है अर्थात जैसे ही हम थकान की पहली परत से टकराते हैं, हम सामान्यतः रुक जाने के आदी होते हैं। लेकिन यदि हम स्वयं को आगे बढ़ने के लिए मजबूर करें तो एक आश्चर्यजनक घटना घटती है। एक सीमा तक थकान बढ़ती जाती है, फिर अचानक गायब हो जाती है और हम पहले से बेहतर महसूस करने लगते हैं। वे यह भी बताते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में न्यूरैस्थेनिया के रोगियों के उपचार की एक सामान्य विधि यह थी कि रोगियों को सामान्य से अधिक प्रयास करने के लिए लगभग डाँटकर या दबाव डालकर तैयार किया जाता था। पहले अत्यधिक कष्ट आता है, फिर अप्रत्याशित राहत मिलती है।” और वे आगे कहते हैं, हम थकान की उन अवस्थाओं के कारण रुक जाते हैं, जिनका पालन करना हमने केवल आदत के कारण सीख लिया है।”

इस वाक्य में जेम्स ने गुरजिएफ़ के जीवन-कार्य के सार को परिभाषित कर दिया है।  यह सच है कि गुर्जिएफ़ के विचार मनोविज्ञान, दर्शन, ब्रह्मांड-विज्ञान और यहाँ तक कि रसायनविद्या तक के एक विशाल क्षेत्र को समेटते हैं। लेकिन उनके पूरे कार्य के केंद्र में यह विचार है कि हमारे भीतर हमारी कल्पना से कहीं अधिक शक्तियाँ मौजूद हैं और हमारी दिखाई देने वाली सीमाएँ एक विशेष प्रकार की आलस्यपूर्ण प्रवृत्ति के कारण हैं। यह आलस्य इतना आदतन हो गया है कि अंततः वह एक यांत्रिक व्यवस्था (mechanism) में बदल गया है।

तो इस व्यवस्था को नियंत्रित या निष्क्रिय कैसे किया जाए? विलियम जेम्स अपने जीवन-शक्ति के भंडार पर लिखे निबंध में बताते हैं कि हम अपनी गहरी शक्तियों का उपयोग तब करते हैं जब हमें किसी संकट से या किसी गहरे तात्कालिक उद्देश्य-बोध से प्रेरणा मिलती है। वे कर्नल बेयर्ड-स्मिथ का उदाहरण देते हैं, जो 1857 में भारतीय विद्रोहियों द्वारा दिल्ली की छह सप्ताह की घेराबंदी के दौरान उसकी रक्षा के प्रभारी थे। उनका मुँह घावों से भरा हुआ था और उनका पूरा शरीर भी घावों से ढका था। उनका घायल टखना काला पड़ चुका था और उसमें सड़न पैदा हो गई थी। दस्त ने उन्हें लगभग हड्डियों का ढाँचा बना दिया था। वे भोजन नहीं कर सकते थे और लगभग पूरी तरह ब्रांडी के सहारे जीवित थे। फिर भी ऐसा लगता था कि इन सबका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। संकट अर्थात महिलाओं और बच्चों के जीवन की रक्षा करने की आवश्यकता ने उन्हें इतनी संकेंद्रित दृढ़ता की अवस्था में रखा कि वे पूरी घेराबंदी के दौरान सतर्क और ऊर्जावान बने रहे। स्पष्टतः उन्होंने वही किया जो गुर्जिएफ़ ने फ्रिट्ज़ पीटर्स को रसोई में छोड़ते समय किया था, अपने भीतर गहराई में जाकर अपनी जीवन-शक्ति के भंडार को जागृत कर लिया।

वास्तव में, जान-बूझकर प्रेरणा, उत्तेजना, यहाँ तक कि संकट की तलाश करना उस “हम पर कोई बादल छाया हुआ है” वाली अनुभूति से बाहर निकलने के हमारे पसंदीदा मानवीय उपायों में से एक है। एक उदास गृहिणी अपने लिए नई टोपी खरीदने चली जाती है। एक ऊबा हुआ आदमी शराब पीकर नशे में हो जाता है। एक असंतुष्ट किशोर कार चुरा लेता है या फुटबॉल मैच में पीतल के मुक्के (knuckledusters) लेकर पहुँच जाता है। सामान्यतः किसी व्यक्ति में उपलब्धियों की जितनी अधिक संभावनाएँ होती हैं, उतना ही अधिक वह उस अनुभूति का विरोध करता है कि वह अपनी वास्तविक क्षमताओं से “कट गया” है। शॉ के नाटक में कैप्टन शोटोवर ऐली डन को कहते हैं, तुम्हारी उम्र में मैं कठिनाइयों, खतरे, भय और मृत्यु की तलाश करता था ताकि अपने भीतर के जीवन को अधिक तीव्रता से महसूस कर सकूँ।” यही प्रेरणा, उदाहरण के लिए, अर्नेस्ट हेमिंग्वे को बड़े शिकार करने, बुलफाइटिंग में जाने और युद्ध संवाददाता के रूप में काम करने के लिए इतना समय बिताने के लिए प्रेरित करती थी।

अपनी ही आलस्यपूर्ण जड़ता के बंधनों को तोड़ने की यह इच्छा कभी-कभी मनुष्यों को ऐसे व्यवहार की ओर भी ले जाती है, जो स्पष्टतः उनके अपने हितों के विरुद्ध होता है। वान गॉग ने कला-विक्रेता की आरामदायक नौकरी छोड़ दी और बेल्जियम के खदान-मज़दूरों के बीच एक सामान्य धर्म-प्रचारक बन गया। लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया ने सरकार की आरामदायक नौकरियाँ ठुकराकर आर.ए.एफ. में एक साधारण विमानकर्मी बनना स्वीकार किया। दार्शनिक विट्गेंश्टाइन ने विरासत में मिली अपनी संपत्ति बाँट दी और कम वेतन वाले स्कूल-शिक्षक बन गए। इन “बाहरी लोगों” को अपने भीतर की जड़ता और ठहराव से बाहर निकलने की आवश्यकता प्रेरित कर रही थी। उनका उद्देश्य था उस आदतन तंत्रिका-विकार” (habit neurosis) अर्थात “अपने पूर्ण स्वरूप की तुलना में स्वयं को कमतर मानने की आदत,” से छुटकारा पाना।

लेकिन जान-बूझकर खतरे या असुविधा की तलाश करने में स्पष्ट रूप से कुछ बेतुकापन भी है क्योंकि हम अपने जीवन का इतना बड़ा हिस्सा इनसे बचने में ही लगा देते हैं। निश्चित ही हमारी जीवन-शक्ति के भंडार तक पहुँचने के दूसरे रास्ते भी होने चाहिए। ऐसा नहीं कि हमें हर बार अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े या कीलों से भरे बिस्तर पर सोना पड़े। मसलन, यह स्पष्ट है कि स्वयं संकट जीवन-शक्ति का प्रवाह पैदा नहीं करता। बल्कि संकट के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ऐसा करती है। ऐसा लगता है मानो हमारे भीतर की कोई आवाज़ आदेश देती है और हमारे अंदर कोई चीज़ अचानक सावधान होकर सक्रिय हो जाती है। कर्नल बेयर्ड-स्मिथ की विद्रोह के प्रति प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने स्वयं को आदेश दिया कि वे आगे बढ़ते रहें, दर्द और भूख को अनदेखा करें और तब तक टिके रहें जब तक संकट नियंत्रण में न आ जाए। विद्रोह ने केवल उनमें परिस्थिति की गंभीरता का बोध पैदा किया था और उसी गंभीरता के प्रति उनकी “जीवन-शक्ति के भंडार” ने प्रतिक्रिया की। यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपने भीतर परिस्थिति की गंभीरता तथा प्रयास की आवश्यकता का ऐसा बोध पैदा कर सके तो उसे अपनी ऊर्जा जगाने के लिए किसी भारतीय विद्रोह की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

यह कैसे किया जाए? गुर्जिएफ़ के अनुसार इसका उत्तर दो भागों में है। पहला, मनुष्य को अपनी सामान्य सीमाओं से बाहर निकलने के कार्य के प्रति पूरी तरह और संपूर्ण रूप से स्वयं को समर्पित करना होगा। इसके लिए उसी प्रकार की प्रतिबद्धता चाहिए, जिसने संतों को खंभों के ऊपर बैठने तक के लिए प्रेरित किया था। दूसरा, उसे उस जटिल कंप्यूटर” की कार्यप्रणाली को कुछ हद तक समझना होगा, जिसमें मानव आत्मा निवास करती है। गुर्जिएफ़ की मृत्यु कंप्यूटर के युग से पहले हो गई थी, इसलिए वे इसके लिए मशीन (machine) शब्द का इस्तेमाल करते थे। लेकिन निस्संदेह उन्हें “computer” शब्द अधिक सुविधाजनक और सटीक लगता। मशीन को समझो।” यह शरीर एक कंप्यूटर है। यह मस्तिष्क भी एक कंप्यूटर है। सभी कंप्यूटरों की तरह इनमें भी हमारी माँग से कहीं अधिक व्यापक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ देने की क्षमता है। लेकिन व्यापक प्रतिक्रियाएँ तभी प्राप्त की जा सकती हैं जब हम उनकी कार्यप्रणाली को अच्छी तरह समझें।

इन दो उद्देश्यों में से पहले को प्राप्त करने के लिए गुर्जिएफ़ की विधि सरल थी। वे अपने शिष्यों से असाधारण स्तर की प्रतिबद्धता की माँग करते थे। जब ग्यारह वर्षीय फ्रिट्ज़ पीटर्स ने उनसे कहा कि वह “मनुष्य के बारे में सब कुछ” जानना चाहता है तो गुर्जिएफ़ ने बड़ी तीव्रता से पूछा, क्या तुम मेरे लिए एक काम करने का वादा कर सकते हो?” पीटर्स के हाँ कहने पर गुर्जिएफ़ ने शातो दु प्रीएरे के विशाल लॉन की ओर इशारा किया और उससे कहा कि उसे सप्ताह में एक बार उन सभी लॉनों की घास काटनी होगी।

उन्होंने दूसरी बार अपनी मुट्ठी मेज़ पर मारी। तुम्हें अपने ईश्वर की शपथ लेकर वादा करना होगा।” उनकी आवाज़ बेहद गंभीर थी। तुम्हें मुझसे वादा करना होगा कि चाहे कुछ भी हो जाए... तुम यह काम करोगे। चाहे कोई तुम्हें रोकने की कोशिश करे, फिर भी तुम्हें इसे करना होगा।” पीटर्स आगे कहते हैं, यदि आवश्यक होता तो मैं लॉन काटते-काटते मर जाता।” वास्तव में, गुर्जिएफ़ ने इसके बाद उसे लगातार अधिक-से-अधिक कठिन काम कराया। यहाँ तक कि वह चार दिनों में सारे लॉन की घास काटने लगा।

यह सिद्धांत कुछ-कुछ कमांडो प्रशिक्षण जैसा है। प्रशिक्षु को लगातार अधिक कठिन बाधाओं का सामना करने के लिए तैयार किया जाता है, यहाँ तक कि वह पीठ के बल चट्टानों से नीचे उतर सके और नाश्ते में काँटेदार तार खा सके। यही गुर्जिएफ़ की विधि का आधार था। लेकिन इसका उद्देश्य केवल शक्ति और सतर्कता विकसित करना नहीं था। गुर्जिएफ़ अपने शिष्यों को यह भी सिखाना चाहते थे कि वे आदतों को विकसित न करें। आदत तब पैदा होती है जब हम किसी काम को यांत्रिक ढंग से करते हैं और हमारा मन कहीं और होता है। गुर्जिएफ़ के शिष्यों को कठिन परिश्रम कराया जाता था। लेकिन यह अत्यंत महत्वपूर्ण था कि वे माइंडफुलनेस (mindfulness) यानी सजगता और तीव्र जागरूकता बनाए रखें।

अपने जीवन के अपेक्षाकृत शुरुआती दौर में जिस पर हम अगले अध्याय में विस्तार से विचार करेंगे, गुर्जिएफ़ का परिचय पूर्वी प्रकार के कुछ ऐसे नृत्यों से हुआ, जिनमें असाधारण रूप से जटिल शारीरिक गतियाँ करनी पड़ती थीं। जो व्यक्ति एक हाथ से सिर थपथपाने और दूसरे हाथ से पेट रगड़ने की कोशिश करता है, वह जानता है कि यह कितना कठिन है। गुर्जिएफ़ ने ऐसे नृत्य तैयार किए जिनमें विद्यार्थी को दोनों हाथों के साथ-साथ दोनों पैरों और सिर से भी अलग-अलग क्रियाएँ करनी पड़ती थीं। बाद में ये नृत्य “कार्य” अर्थात द वर्क (the Work) के प्रशिक्षण का एक मूलभूत हिस्सा बन गए। इनका उद्देश्य शरीर की संभावनाओं की सीमा को विस्तृत करना था जिसे गुर्जिएफ़ मूविंग सेंटर (moving centre - गतिशील केंद्र) कहते थे। यह सच है कि ये नृत्य या “movements” स्वयं भी आदत में बदल सकते थे। लेकिन कुछ परिस्थितियों में वे चेतना की नई अवस्थाएँ उत्पन्न करने में आश्चर्यजनक रूप से प्रभावशाली हो सकते थे।  इसका एक अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण जे. जी. बेनेट की आत्मकथा विटनेस (Witness) में मिलता है, जिसमें 1923 में फॉन्टेनब्लो (प्रीएरे) में गुर्जिएफ़ के साथ बेनेट के अनुभव का वर्णन है।

बेनेट पूर्व में रहते हुए हुई पेचिश से पीड़ित थे। वे लिखते हैं:

हर सुबह बिस्तर से उठना और अधिक कठिन होता जा रहा था और धूप की गर्मी में भारी काम करने से मेरा शरीर पीछे हटने लगा था। लगातार दस्त ने मुझे बहुत कमजोर कर दिया था, लेकिन किसी तरह मैं काम करता रहा।

अंततः एक दिन ऐसा आया जब मैं बिल्कुल खड़ा नहीं हो सकता था। बुखार से मैं काँप रहा था और स्वयं को बहुत दयनीय महसूस कर रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं असफल हो गया हूँ। ठीक उसी समय जब मैं अपने आप से कह रहा था, “आज मैं बिस्तर पर ही रहूँगा,” मुझे लगा कि मेरा शरीर स्वयं उठ रहा है। मैंने कपड़े पहने और हमेशा की तरह काम पर चला गया, लेकिन इस बार मुझे एक विचित्र अनुभूति हो रही थी, मानो मुझे किसी ऐसी श्रेष्ठ इच्छा-शक्ति ने संभाल रखा हो, जो मेरी अपनी नहीं थी। हमने पूरी सुबह हमेशा की तरह काम किया। उस दिन मैं दोपहर का भोजन नहीं कर सका, लेकिन जमीन पर लेट गया और सोचने लगा कि कहीं मैं मर तो नहीं जाऊँगा। गुर्जिएफ़ ने अभी-अभी दोपहर के समय लिंडन वृक्षों के झुरमुट के नीचे खुले में व्यायाम करने की प्रथाएँ शुरू की थीं। जब विद्यार्थी उन पेड़ों के नीचे इकट्ठा होने लगे, तो मैं भी उनके साथ जा मिला।

हमने एक नए और अविश्वसनीय रूप से जटिल व्यायाम से शुरुआत की, जिसे सबसे अनुभवी रूसी विद्यार्थी भी ठीक से नहीं कर पा रहे थे। व्यायाम की संरचना को बोर्ड पर प्रतीकों के माध्यम से बनाया गया था और सिर, पैर, हाथ तथा धड़ को स्वतंत्र क्रमों का पालन करना था। यह हम सभी के लिए एक यातना थी।

शीघ्र ही मुझे संगीत और अपनी कमजोरी के अलावा किसी और चीज़ का बोध होना बंद हो गया। मैं बार-बार अपने आप से कह रहा था, अगले बदलाव पर मैं रुक जाऊँगा।” एक-एक करके सभी अंग्रेज़ विद्यार्थी अभ्यास से बाहर होते गए और अधिकांश रूसी महिलाएँ भी।

गुर्जिएफ़ गंभीरता से खड़े होकर देख रहे थे। समय ने पहले और बाद का अपना अर्थ खो दिया था। न अतीत था, न भविष्य। केवल वर्तमान की वह पीड़ा थी जिसमें मुझे अपने शरीर को चलाना पड़ रहा था। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि गुर्जिएफ़ अपना पूरा ध्यान मुझ पर केंद्रित किए हुए हैं। उनकी ओर से एक मौन माँग थी, जो उसी समय प्रोत्साहन भी थी और एक वचन भी, मुझे हार नहीं माननी है चाहे यह यह मुझे मार ही क्यों न डाले।

अचानक मैं एक अपार शक्ति के प्रवाह से भर गया। मेरा शरीर मानो प्रकाश में बदल गया था। सामान्य ढंग से मुझे अपने शरीर की उपस्थिति का एहसास ही नहीं हो रहा था। न कोई प्रयास था, न पीड़ा, न थकान, यहाँ तक कि भार का भी कोई एहसास नहीं था। मेरी अवस्था ऐसी आनंदमय थी, जैसी मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की थी।

यह यौन मिलन की परमानंद-अवस्था से बिल्कुल अलग थी क्योंकि यह पूरी तरह शरीर से मुक्त और उससे निरपेक्ष थी। यह उस विश्वास की उल्लासपूर्ण अनुभूति थी, जो पर्वतों को भी हिला सकता है। सभी लोग चाय पीने के लिए घर के भीतर चले गए, लेकिन मैं विपरीत दिशा में रसोई के बगीचे की ओर चला गया। वहाँ मैंने एक फावड़ा उठाया और खुदाई शुरू कर दी। धरती खोदना हमारी शारीरिक प्रयास-क्षमता की एक कठोर परीक्षा है। एक मजबूत व्यक्ति थोड़े समय के लिए बहुत तेज़ी से खोद सकता है या लंबे समय तक धीरे-धीरे खोद सकता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति चाहे उसने कितना भी असाधारण प्रशिक्षण क्यों न लिया हो लंबे समय तक तेज़ गति से खुदाई करने के लिए अपने शरीर को विवश नहीं कर सकता। मुझे अपने भीतर आई उस शक्ति की परीक्षा लेने की आवश्यकता महसूस हुई और मैंने दोपहर की भीषण गर्मी में एक घंटे से अधिक समय तक ऐसी गति से खुदाई की, जिसे मैं सामान्यतः दो मिनट तक भी बनाए नहीं रख सकता था। मेरा कमजोर, विद्रोह करता और पीड़ा से भरा शरीर अब मजबूत और आज्ञाकारी हो गया था। दस्त बंद हो गए थे और कई दिनों से मेरे पेट में जो लगातार कुतरता हुआ दर्द था, वह भी समाप्त हो गया था। इसके अलावा, मुझे विचारों की ऐसी स्पष्टता का अनुभव हुआ, जो मैंने इससे पहले केवल अनायास और कभी-कभार ही जानी थी। मेरी मानसिक आँखों के सामने” इस वाक्यांश का मेरे लिए एक नया अर्थ हो गया था। मैं जिन चीज़ों को देख रहा था, पेड़, नहर में बहता पानी और यहाँ तक कि फावड़ा, उनमें से प्रत्येक की शाश्वत संरचना को मैं मानो “देख” पा रहा था। और अंत में अपने शरीर को भी। मुझे याद है कि मैंने ऊँची आवाज़ में कहा था, अब मैं समझता हूँ कि ईश्वर स्वयं को हमसे क्यों छिपाता है।” लेकिन आज भी मुझे उस विस्मयकारी कथन के पीछे की अंतर्दृष्टि याद नहीं है।

बेनेट जंगल में टहलने चले गए और उनकी मुलाकात गुर्जिएफ़ से हुई। गुर्जिएफ़ ने मनुष्य के लिए स्वयं को बदलने हेतु आवश्यक उच्चतर भावनात्मक ऊर्जा” (higher emotional energy) की आवश्यकता के बारे में बात करना शुरू किया। उन्होंने आगे कहा, दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं, लेकिन वे बहुत दुर्लभ हैं, जो इस ऊर्जा के किसी महान भंडार या संचयक (Great Reservoir or Accumulator) से जुड़े हुए हैं... जो लोग इस ऊर्जा को प्राप्त कर सकते हैं, वे दूसरों की सहायता करने का माध्यम बन सकते हैं।” संकेत स्पष्ट था कि गुर्जिएफ़ स्वयं ऐसे व्यक्ति थे और उन्होंने बेनेट को उसके रहस्यमय अनुभव के लिए आवश्यक ऊर्जा “प्रदान” की थी। उन्होंने आगे कहा, आज तुम्हें जो मिला है, वह तुम्हारे लिए संभव चीज़ों की केवल एक झलक है। अब तक तुम इन चीज़ों के बारे में केवल सैद्धांतिक रूप से जानते थे, लेकिन अब तुम्हारे पास इनका प्रत्यक्ष अनुभव है।”

     बेनेट जंगल में आगे बढ़ गए, लेकिन उनके अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी था।

उस्पेन्स्की का एक व्याख्यान मेरे मन में आया। उन्होंने उन बहुत संकीर्ण सीमाओं के बारे में बात की थी, जिनके भीतर हम अपने कार्यों को नियंत्रित कर सकते हैं। फिर उन्होंने कहा था, यह आसानी से सत्यापित किया जा सकता है कि अपनी भावनाओं पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। कुछ लोग सोचते हैं कि वे जब चाहें क्रोधित या प्रसन्न हो सकते हैं, लेकिन कोई भी व्यक्ति यह सत्यापित कर सकता है कि वह अपनी इच्छा से ‘आश्चर्यचकित’ नहीं हो सकता।” उन शब्दों को याद करते हुए मैंने अपने आप से कहा, मैं आश्चर्यचकित होऊँगा।” और उसी क्षण मैं विस्मय से अभिभूत हो गया. न केवल अपनी अवस्था को लेकर, बल्कि जिस चीज़ को भी मैं देख रहा था या जिसके बारे में सोच रहा था, हर चीज़ को लेकर। हर पेड़ अपने आप में इतना विशिष्ट था कि मुझे लगा मैं हमेशा के लिए जंगल में घूमता रह सकता हूँ और फिर भी आश्चर्य करना कभी समाप्त नहीं होगा। फिर मेरे मन में भय” का विचार आया। तुरंत मैं आतंक से काँपने लगा। अनाम भयावहताएँ मुझे चारों ओर से धमकाने लगीं। मैंने आनंद” के बारे में सोचा और महसूस किया कि मेरा हृदय उल्लास से फट जाएगा। फिर प्रेम” शब्द मेरे मन में आया और मैं कोमलता तथा करुणा की इतनी सूक्ष्म अनुभूतियों से भर गया कि मुझे समझ में आया कि प्रेम की गहराई और विस्तार का मुझे दूर-दूर तक कोई अंदाज़ा नहीं था। प्रेम हर जगह था और हर चीज़ में था। वह आवश्यकता की प्रत्येक सूक्ष्म छाया के अनुरूप स्वयं को अनंत रूप से ढाल सकता था। कुछ समय बाद यह मेरे लिए बहुत अधिक हो गया। मुझे लगा कि यदि मैं प्रेम के रहस्य में इससे अधिक गहराई तक उतर गया तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। मैं इस शक्ति से मुक्त होना चाहता था। उस शक्ति से, जिसके द्वारा मैं अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी भावना अनुभव कर सकता था। और उसी क्षण वह शक्ति मुझसे चली गई।

बेनेट ने स्पष्टतः “Great Reservoir or Accumulator” अर्थात् महान ऊर्जा-भंडार या ऊर्जा-संचयक” के बारे में गुर्जिएफ़ की बात को बहुत महत्व दिया। लेकिन जो व्यक्ति गुर्जिएफ़ के विचारों के सार को समझने का प्रयास कर रहा हो, उसके लिए इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बेनेट ने अपनी भावनाओं पर इतना पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था। क्योंकि यही हमारी केंद्रीय मानवीय समस्या है, हम लगभग लगातार अपनी भावनाओं के शिकार बने रहते हैं। हम भीतर की एक ऐसी उतार-चढ़ाव भरी सवारी पर लगातार ऊपर-नीचे होते रहते हैं। भावनाओं पर हमारा कुछ नियंत्रण अवश्य है। हम अपने विचारों या भावनाओं को इस तरह निर्देशित कर सकते हैं कि उन्हें और अधिक तीव्र बना दें। यही निस्संदेह मनुष्य की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है— कल्पना। जानवरों को अपनी अनुभूति उत्पन्न करने के लिए वास्तविक भौतिक उद्दीपन की आवश्यकता होती है। लेकिन मनुष्य किसी पुस्तक में या दिवास्वप्न में पीछे हट सकता है और भौतिक संसार से स्वतंत्र होकर कुछ अनुभवों को जी सकता है। उदाहरण के लिए, वह किसी यौन अनुभव की केवल कल्पना कर सकता है और न केवल उससे संबंधित सभी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को महसूस कर सकता है बल्कि यहाँ तक कि यौन चरमोत्कर्ष का अनुभव भी कर सकता है। ऐसी विचित्र क्षमता किसी भी जानवर की क्षमता से बहुत आगे की बात है।

फिर भी कल्पना के हमारे अनुभव से हमें यह विश्वास होता है कि अपने स्वभाव के कारण वह “वास्तविक” अनुभव की केवल एक धुँधली-सी नकल भर हो सकती है। और इस अचेतन धारणा के परिणाम हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक हैं। इसका अर्थ यह है कि हम यह मान लेते हैं कि भौतिक वास्तविकता की दुनिया की तुलना में मन की दुनिया बहुत घटिया या द्वितीय श्रेणी की चीज़ है... एक तरह का छलावा, एक काल्पनिक दुनिया। इसलिए जब हमारा सामना किसी पीड़ादायक भावना या किसी शारीरिक समस्या से होता है तो हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति पीछे हट जाने और हार मान लेने की होती है। हम केवल थकान की उन अवस्थाओं के सामने ही नहीं रुक जाते, जिनका पालन करना हमने आदत के कारण सीख लिया है बल्कि आत्म-दया और ऊब की कुछ निश्चित अवस्थाएँ भी हमें रोक देती हैं। बेनेट का अनुभव संकेत देता है कि यदि हम केवल पर्याप्त प्रयास करें तो हम अपनी भावनाओं पर ऐसी मात्रा में नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं, जो वर्तमान समय में हमें चमत्कारी प्रतीत होगी। उपन्यासकार प्रूस्त ने कुछ सेकंड के लिए अपने अतीत की वास्तविकता के प्रति अत्यंत तीव्र चेतना का अनुभव किया था। उन्होंने इसका वर्णन स्वानस वे (Swann’s Way) में किया है और अपने शेष जीवन को उस विचित्र शक्ति को फिर से खोजने की कोशिश में लगा दिया। लेकिन ऐसी झलक तो उस प्रकार के नियंत्रण का केवल एक गौण परिणाम होती, जैसा नियंत्रण बेनेट ने अनुभव किया था। यदि हम इस बात को सचेत रूप से जान लें, यदि हमें यह एहसास हो जाए कि हमें इतनी जल्दी और इतनी आसानी से अपनी सीमा तक पहुँचकर टूट जाने के लिए बनाया ही नहीं गया है तो इससे मनुष्य का अपने जीवन और उसकी समस्याओं के प्रति पूरा दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से बदल जाएगा।

मानव चेतना में ऐसा परिवर्तन उत्पन्न करना ही गुर्जिएफ़ का केंद्रीय उद्देश्य था।



[1] एक खास तरह की गोल, ऊँची और कुछ कड़ी टोपी से है, जो आम तौर पर घने घुँघराले ऊन/फर से बनी होती है। “Astrakhan” नाम रूस के Astrakhan क्षेत्र से जुड़ा है।  इसमें प्रायः कराकुल (Karakul) भेड़ के मेमने की घुँघराली खाल/फर का इस्तेमाल होता है। दक्षिण एशिया में इसी प्रकार की टोपी को कभी-कभी कराकुल टोपी या अस्त्रखान टोपी कहा जाता है।

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