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Monday, 27 July 2026

लिबरल आर्ट्स एवं दर्शन के बारे में -- पत्र - 86 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम पूछते हो कि लिबरल आर्ट्स के विषय में मेरा क्या विचार है। मुझे उनमें से किसी के प्रति कोई विशेष सम्मान नहीं है और न ही मैं उस अध्ययन को अच्छा मानता हूँ जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना हो। ये तो केवल ऐसी कलाएँ हैं जिन्हें बाज़ार में उपयोग में लाया जा सकता है। उनका महत्त्व केवल इतना है कि वे मन को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करती हैं, न कि इसलिए कि उन्हें जीवनभर का व्यवसाय बना लिया जाए। इनका अध्ययन केवल तब तक करना चाहिए, जब तक मन किसी अधिक महत्त्वपूर्ण विषय को ग्रहण करने योग्य न हो जाए। ये हमारी प्रारम्भिक शिक्षा हैं, हमारा वास्तविक कार्य नहीं। यह स्पष्ट है कि इन्हें 'लिबरल' स्टडीज़ क्यों कहा जाता है क्योंकि वे एक स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य हैं। किन्तु वास्तव में केवल एक ही अध्ययन ऐसा है जो सच्चे अर्थों में उदार है और वह है वह अध्ययन जो मनुष्य को मुक्त करता है अर्थात् दर्शन का अध्ययन। केवल दर्शन ही उदात्त है, सामर्थ्यवान है और महान आत्मा वाला है। अन्य सभी विद्याएँ तुच्छ और बालसुलभ हैं। या क्या तुम यह सोचते हो कि किसी ऐसी विद्या में वास्तव में कोई मूल्य हो सकता है, जिसके शिक्षक या उसे अपना व्यवसाय बनाने वाले लोग स्वयं अत्यन्त भ्रष्ट और तिरस्करणीय हों? हमारा उद्देश्य इन विद्याओं को सीखते रहना नहीं होना चाहिए बल्कि इन्हें सीखकर आगे बढ़ जाना होना चाहिए।


By Caravaggio 


    कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या लिबरल आर्ट्स मनुष्य को अच्छा बनाती हैं। परन्तु स्वयं वे विद्याएँ भी ऐसा दावा नहीं करतीं  क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह नहीं है। साहित्य का अध्ययन भाषा की शुद्धता से संबंधित है। यदि उसे आगे बढ़ाया जाए तो वह कथाओं तथा आख्यानों के अध्ययन तक पहुँचता है। अधिक से अधिक वह कविता के अध्ययन तक विस्तृत होता है। किन्तु इनमें से कौन-सा विषय सद्गुण की ओर जाने वाला मार्ग प्रशस्त करता है? अक्षरों और वर्णों की पहचान, शब्दों और वाक्यांशों का सूक्ष्म विश्लेषण, कथाओं का कंठस्थ करना, छंद-रचना के नियम, या छंदों के परिवर्तन, इनमें से कौन-सी बात हमारे भय को शांत करती है, हमारे लोभ को दूर करती है या हमारी इच्छाओं पर संयम स्थापित करती है? अब ज्यामिति और संगीत की ओर चलो। वहाँ भी ऐसी कोई शिक्षा नहीं मिलती जो हमें भय और वासना से मुक्त होने का उपदेश दे। यदि हमें यह नहीं आता कि भय और इच्छा पर कैसे विजय प्राप्त की जाए तो अन्य किसी भी ज्ञान का होना व्यर्थ है। 

    प्रश्न यह है कि क्या ये लोग सद्गुण की शिक्षा देते हैं। यदि नहीं तो वे अपने विद्यार्थियों को सद्गुण नहीं सिखा रहे हैं। और यदि हाँ तो वे दार्शनिक हैं। क्या तुम जानना चाहते हो कि वे इस उद्देश्य से कितने दूर हैं? बस यह देखो कि उनकी सभी विद्याएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं। यदि वे सभी एक ही सत्य की शिक्षा दे रही होतीं तो उनमें किसी न किसी प्रकार की समानता अवश्य दिखाई देती। 

    जब तक कि वे तुम्हें यह विश्वास न दिला दें कि होमर एक दार्शनिक था! किन्तु ऐसा करते हुए वे स्वयं अपने तर्कों का खंडन कर बैठते हैं। कभी वे उसे स्टोइक सिद्ध करते हैं, जो केवल सद्गुण को ही श्रेष्ठ मानता है और अमर जीवन प्राप्त करने के लिए भी सम्माननीय आचरण का त्याग नहीं करता, कभी वे उसे एपिक्यूरियन बताते हैं, जो गीत-संगीत और उत्सवों के बीच रहते हुए शांत नागरिक जीवन की प्रशंसा करता है, कभी वे उसे पेरिपैटेटिक कहते हैं, जो तीन प्रकार के शुभों का प्रतिपादन करता है और कभी उसे अकादमिक घोषित करते हैं, जो यह मानता है कि किसी भी विषय में पूर्ण निश्चितता संभव नहीं है। इससे तो केवल यही सिद्ध होता है कि इनमें से कोई भी दर्शन वास्तव में उसका नहीं है क्योंकि यदि वे सभी उसके होते तो वे एक-दूसरे के साथ असंगत न होते। किन्तु मान लो कि होमर वास्तव में एक दार्शनिक था। तब भी वह दार्शनिक तो अपनी कविताएँ सीखने या रचने से पहले ही बन चुका होगा। इसलिए हमें उन बातों का अध्ययन करना चाहिए जिन्होंने होमर को बुद्धिमान बनाया, न कि केवल उसकी कविताओं का। 

    मेरे लिए यह जाँच करना कि होमर पहले हुए या हेसिओड, उतना ही निरर्थक है जितना यह जानना कि हेकुबा समय से पहले वृद्ध कैसे हो गई, जबकि वास्तव में वह हेलेन से छोटी थी। मैं तुमसे पूछता हूँ, पैट्रोक्लस और अकिलीस की आयु में कौन बड़ा था और कौन छोटा, यह जानने का क्या महत्व है? क्या तुम यह जानना चाहते हो कि यूलिसीस (ओडीसियस) अपनी भटकनों के दौरान कहाँ-कहाँ गया था या यह सीखना चाहते हो कि हमें अपनी निरंतर भटकन से कैसे मुक्त होना चाहिए? हमारे पास यह सुनने का समय नहीं है कि वह इटली और सिसिली के बीच के समुद्र में तूफ़ान का शिकार हुआ था या ज्ञात संसार की सीमाओं से बाहर क्योंकि इतना लंबा समय वह इतने संकरे जलडमरूमध्य में भटक ही नहीं सकता था। सच्चाई यह है कि हम स्वयं अपने जीवन के प्रत्येक दिन मन के तूफ़ानों से घिरे रहते हैं, और हमारे अपने दुर्गुण हमें वही सब कष्ट देते हैं जिनका सामना यूलिसीस ने किया था। वे सब हमारे जीवन में उपस्थित हैं, ऐसा सौंदर्य जो आँखों को मोहित कर ले, शत्रु, मानव-रक्त के प्यासे भयंकर राक्षस, एक ओर सायरनों का मोहक गीत और दूसरी ओर जहाज़-डूबने तथा हर प्रकार के संकट। मुझे यह सिखाओ कि अपने देश से कैसे प्रेम करूँ, अपनी पत्नी से कैसे प्रेम करूँ, अपने पिता से कैसे प्रेम करूँ। मुझे यह सिखाओ कि यदि मार्ग में मेरा जहाज़ भी डूब जाए, तब भी मैं उस सम्मानपूर्ण लक्ष्य तक कैसे पहुँचूँ। तुम यह जानने का प्रयास क्यों करते हो कि पेनेलोपे पवित्र थी या नहीं? क्या उसने अपने आस-पास के सभी लोगों को धोखा दिया था? और क्या उसने यह पहचान लिया था कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति यूलिसीस ही है, उससे पहले कि किसी ने उसे यह बताया? मुझे यह सिखाओ कि पवित्रता क्या है, उसका वास्तविक मूल्य क्या है और वह शरीर में निवास करती है या मन में।

    अब मैं संगीत की ओर आता हूँ। तुम मुझे सिखाते हो कि ऊँचे और नीचे स्वरों में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित होता है। भिन्न-भिन्न सुरों वाले तार किस प्रकार मधुर संगति उत्पन्न करते हैं। इसके स्थान पर मुझे यह सिखाओ कि मेरे अपने मन में सामंजस्य कैसे स्थापित हो और मेरे संकल्प एक-दूसरे के विरोधी न हों। तुम मुझे बताते हो कि कौन-से राग या संगीत-रूप विषाद व्यक्त करते हैं। इसके बजाय मुझे यह सिखाओ कि विपत्तियों के बीच भी मैं शोक से कैसे बचा रहूँ। 

    ज्यामिति का ज्ञाता मुझे यह सिखाता है कि किसी खेत का क्षेत्रफल कैसे निकाला जाए, किन्तु वह यह नहीं सिखाता कि मनुष्य के लिए कितनी संपत्ति पर्याप्त है। वह मुझे गणना करना सिखाता है और मेरी उँगलियों को लोभ की सेवा में लगा देता है। परन्तु वह यह नहीं सिखाता कि ऐसी गणनाएँ वास्तव में निरर्थक हैं और यह कि अपनी आय-व्यय का हिसाब रखने वालों को थका देने से कोई अधिक सुखी नहीं हो जाता। बल्कि सच्चाई तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति का हिसाब स्वयं करने को ही दुर्भाग्य समझता है, उसके पास आवश्यकता से अधिक और अनावश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि मैं अपने भाई के साथ खेत का उचित बँटवारा करना ही नहीं जानता तो किसी भूमि का सही-सही विभाजन करना सीखने से मुझे क्या लाभ? यदि पड़ोसी मेरी भूमि की सीमा से थोड़ा-सा भाग काट ले जाने पर मैं व्याकुल हो उठता हूँ तो एक बगीचे के टुकड़े का क्षेत्रफल एक फुट के दसवें भाग तक की शुद्धता से निकालना मेरे किस काम का? वह मुझे सिखाता है कि अपनी भूमि की सीमा पर स्थित उस छोटे-से हिस्से को खोने से कैसे बचूँ। किन्तु मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि अपनी सारी संपत्ति खोकर भी प्रसन्नचित्त कैसे रहा जाए। “मुझसे वह भूमि छीनी जा रही है जो मेरे पिता और दादा की थी!” तो इससे क्या हुआ? तुम्हारे दादा से पहले उसका स्वामी कौन था? क्या तुम यह भी बता सकते हो कि वह किस जाति या राष्ट्र की थी, किसी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ो? तुम उस भूमि पर स्वामी बनकर नहीं बल्कि एक अत्याचारी शासक की तरह अधिकार जमाकर बैठे हो। 

    तुम किसके किरायेदार हो? यदि तुम्हारा सौभाग्य है तो उसी व्यक्ति के किरायेदार हो जो तुम्हारे बाद उसका उत्तराधिकारी बनेगा। विधिवेत्ता कहते हैं कि सार्वजनिक भूमि पर कोई भी व्यक्ति स्थायी स्वामित्व स्थापित नहीं कर सकता। जिस भूमि पर तुम रहते हो और जिसे अपनी कहते हो, वह वास्तव में सार्वजनिक है बल्कि उससे भी बढ़कर, वह समस्त मानव-जाति की है। क्या अद्भुत कौशल है! तुम वक्र आकृतियों का माप जानते हो। तुम्हें जो भी आकृति दी जाए, उसे वर्ग में परिवर्तित कर सकते हो। तुम तारों के बीच की दूरी बता सकते हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे तुम माप न सको। यदि तुम इतने ही कुशल मापक हो तो मनुष्य के मन को मापो। बताओ कि वह कितना महान है और कितना तुच्छ भी हो सकता है। तुम जानते हो कि कौन-सी रेखा समकोण बनाती है। किन्तु यदि तुम्हें यह नहीं मालूम कि जीवन में क्या सही है, तो उस ज्ञान का तुम्हारे लिए क्या उपयोग है?

    अब मैं उस विद्या की ओर आता हूँ जो स्वयं को आकाश और नक्षत्रों के ज्ञान पर गर्व करती है—

जहाँ शीतल ज्योति वाला शनि अपना मार्ग बनाता है,
और चंचल बुध का अग्निमय तारा किन-किन कक्षाओं में विचरण करता है।

    इन बातों को जानकर मुझे क्या लाभ होगा? क्या केवल इसलिए कि जब शनि और मंगल आमने-सामने हों या जब बुध संध्या समय शनि की दृष्टि में अस्त हो, तब मैं चिंता करता रहूँ? इसके बजाय मुझे यह सीखना चाहिए कि ग्रह जहाँ कहीं भी हों, वे मेरे लिए अनुकूल ही हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। उनकी गतियाँ भाग्य के निरंतर और अटल विधान द्वारा निर्धारित हैं। वे निश्चित मार्गों पर चलते हैं और या तो संसार की सभी घटनाओं का निर्धारण करते हैं अथवा उनका संकेत देते हैं। किन्तु यदि वे सब कुछ घटित कराते हैं तो ऐसी बातों को जानने से क्या लाभ जिन्हें बदला ही नहीं जा सकता? और यदि वे केवल भविष्य की घटनाओं का संकेत देते हैं तो उन बातों को पहले से जान लेने का क्या लाभ जिनसे बचा ही नहीं जा सकता? वे घटनाएँ तो तुम्हें पता हों या न हों, घटित होकर ही रहेंगी।

यदि तुम सूर्य की तीव्र गति पर और उसके पीछे क्रम से चलने वाले तारों पर दृष्टि रखो,
तो आने वाला कल तुम्हें कभी अचानक नहीं चौंकाएगा,
और निर्मल रात्रि भी तुम्हें किसी छिपे हुए आक्रमण से भयभीत नहीं करेगी।

किन्तु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैंने ऐसे किसी भी आकस्मिक आघात से बचने के लिए पहले ही पर्याप्त तैयारी कर रखी है। 

    “क्या सचमुच यह सत्य है कि आने वाला कल मुझे कभी आश्चर्यचकित नहीं करेगा? जो घटना किसी व्यक्ति के ज्ञान के बिना घटती है, क्या वह उसे आश्चर्यचकित नहीं करती?” मैं यह नहीं जानता कि कल क्या होगा। किन्तु मैं यह अवश्य जानता हूँ कि क्या-क्या हो सकता है। ऐसी किसी भी संभावना को मैं अपनी अपेक्षा से बाहर नहीं रखता। मैं हर संभावित घटना की अपेक्षा करता हूँ और यदि उनमें से किसी से मेरा बचाव हो जाए, तो मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। आने वाला कल मुझे तभी चकित करता है जब वह मुझे किसी विपत्ति से बचा लेता है। परन्तु तब भी वह मुझे वास्तव में आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि जिस प्रकार मैं जानता हूँ कि ऐसी कोई भी घटना नहीं है जो मेरे साथ घटित न हो सके, उसी प्रकार मैं यह भी जानता हूँ कि उनमें से कोई भी घटना निश्चित रूप से घटित होगी, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए मैं सर्वोत्तम की आशा करता हूँ, किन्तु सबसे बुरे के लिए भी स्वयं को तैयार रखता हूँ। 

    यदि मैं नियमित क्रम का पालन न करूँ तो इसे सहन करना। मैं चित्रकारों को उदार कलाओं के साधकों में नहीं गिन सकता। उसी प्रकार मूर्तिकारों, संगमरमर तराशने वालों और विलासिता की सेवा करने वाले अन्य सभी कारीगरों को भी नहीं। इसी प्रकार मैं पहलवानों तथा उन सभी विद्याओं को भी अस्वीकार करता हूँ जिनका संबंध केवल तेल और धूल-मिट्टी से है। अन्यथा मुझे मालिश करने वालों, रसोइयों और उन सभी लोगों को भी उदार कलाओं में गिनना पड़ेगा जो अपनी कला को केवल हमारे भोग-विलास की पूर्ति में लगाते हैं। ज़रा बताओ तो सही, उन भूखे-से दिखने वाले लोगों की कला को कैसे उदार कला कहा जा सकता है, जो शरीर को तो भोजन की नाँद के सामने पालते-पोसते हैं। जबकि उनका मन पोषण के अभाव में दुर्बल होता जाता है? क्या हमें आज के युवकों की इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि यही उदार शिक्षा है? हमारे पूर्वज अपने युवकों को सीधा और दृढ़ खड़ा होना सिखाते थे, भाला फेंकना, बरछी चलाना, घुड़सवारी करना तथा तलवार और ढाल का उपयोग करना सिखाते थे। वे अपने बच्चों को ऐसी कोई शिक्षा नहीं देते थे जिसे लेटकर सीखा जाए। किन्तु न तो ये प्राचीन कलाएँ और न ही आज की नई कलाएँ सद्गुण की शिक्षा देती हैं या उसका विकास करती हैं। क्योंकि घोड़े को नियंत्रित करना, लगाम से उसकी चाल को रोकना और दिशा देना सीख लेने से क्या लाभ, यदि स्वयं सवार ही अपनी अनियंत्रित और बेलगाम वासनाओं के वश में हो? कुश्ती या मुक्केबाज़ी में अनेक प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर लेने से क्या लाभ, यदि विजेता स्वयं अपने क्रोध का पराजित बंदी बना हुआ हो?

    “तो क्या उदार विद्याओं का हमें कोई लाभ ही नहीं है?” है, पर केवल कुछ सीमित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। सद्गुण की प्राप्ति के लिए नहीं। क्योंकि वे कलाएँ भी, जो अपने निम्न स्तर को खुले रूप में स्वीकार करती हैं और जिनका आधार हाथ का कौशल है, जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। फिर भी उनका सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। “तो फिर हम अपने बच्चों को उदार विद्याओं की शिक्षा क्यों देते हैं?” इसलिए नहीं कि वे उन्हें सद्गुण सिखा सकती हैं बल्कि इसलिए कि वे उनके मन को सद्गुण ग्रहण करने योग्य बनाती हैं। जैसे प्रारंभिक शिक्षा, जिसे पहले ‘अक्षर-ज्ञान’ कहा जाता था, बच्चों को शिक्षा की मूल बातें सिखाती है। पर स्वयं उदार विद्याओं की शिक्षा नहीं देती। वह केवल उनके लिए आधार तैयार करती है। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी मन को सीधे सद्गुण तक नहीं पहुँचातीं बल्कि उस यात्रा के लिए उसे तैयार करती हैं। 

    पॉसिडोनियस के अनुसार कलाएँ चार प्रकार की होती हैं— साधारण और निम्न कलाएँ, मनोरंजन की कलाएँ, बाल्यावस्था की कलाएँ और उदार कलाएँ। साधारण कलाएँ वे हैं जिनका अभ्यास कारीगर करते हैं। उनका आधार हाथ का कौशल है और उनका उद्देश्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इनमें न तो कोई विशेष आकर्षण है और न ही सम्माननीयता का कोई आभास। मनोरंजन की कलाएँ वे हैं जिनका संबंध आँखों और कानों के सुख से है। इनमें उन अभियंताओं की कला भी आती है जो रंगमंच पर ऐसे यंत्र बनाते हैं जिनसे मंच बिना किसी सहारे के ऊपर उठता हुआ दिखाई देता है या मंच के भाग बिना किसी आवाज़ के आकाश की ओर उठ जाते हैं। इसी प्रकार वे अनेक विचित्र युक्तियाँ बनाते हैं, जहाँ समतल भूमि थी वहाँ अचानक दरारें खुल जाती हैं, फिर अपने-आप बंद हो जाती हैं या ऊँचे उठे हुए मंच धीरे-धीरे नीचे आ जाते हैं। जो लोग इन युक्तियों से परिचित नहीं होते, उनकी आँखों को ये सब अत्यंत अद्भुत लगते हैं। वे प्रत्येक अप्रत्याशित दृश्य पर आश्चर्य करते हैं क्योंकि वे उसके कारण को नहीं जानते। बाल्यावस्था की कलाएँ उदार विद्याओं से कुछ समानता रखती हैं। यूनानी इन्हें ‘एन्साइक्लिकल’ (encyclical) कहते हैं। हमारी भाषा में इन्हें ‘उदार विद्याएँ’ कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल वही विद्याएँ उदार हैं और सच कहूँ तो केवल वही वास्तव में स्वतंत्र मनुष्य के योग्य हैं जिनका संबंध सद्गुण से है। 

    कोई इस प्रकार आपत्ति कर सकता है। “दर्शन के कई विभाग हैं। एक प्राकृतिक जगत का अध्ययन है, दूसरा नीतिशास्त्र और तीसरा तर्कशास्त्र। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी दर्शन के भीतर अपना स्थान चाहती हैं। जब हम प्रकृति से संबंधित प्रश्नों की जाँच करते हैं, तब हम ज्यामिति के प्रमाणों का सहारा लेते हैं। इसलिए, यदि ज्यामिति दर्शन की सहायता करती है तो वह दर्शन का एक भाग भी होनी चाहिए।” किन्तु अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो हमारी सहायता तो करती हैं पर हमारा अंग नहीं होतीं। बल्कि यदि वे स्वयं हमारा अंग होतीं तो वे हमारी सहायता करने वाली वस्तुएँ न कहलातीं। भोजन शरीर की सहायता करता है, फिर भी वह शरीर का अंग नहीं है। उसी प्रकार ज्यामिति दर्शन के लिए उपयोगी है जैसे, ज्यामिति के लिए उपकरण बनाने वाला कारीगर आवश्यक होता है। परंतु जैसे वह कारीगर स्वयं ज्यामिति का भाग नहीं है, वैसे ही ज्यामिति भी दर्शन का भाग नहीं है। इसके अतिरिक्त, दोनों का अपना-अपना निश्चित विषय है। दार्शनिक प्राकृतिक घटनाओं की जाँच करता है और उनका ज्ञान प्राप्त करता है। जबकि ज्यामितिज्ञ आकृतियों और मापों का अध्ययन करता है तथा उनके आधार पर गणनाएँ करता है। आकाशीय पिंडों की गति का कारण, उनका प्रभाव और उनका स्वभाव—ये सब दार्शनिक के अध्ययन के विषय हैं। किन्तु उनकी कक्षाएँ, उपवृत्त (एपिसाइकिल), और वे प्रत्यक्ष गतियाँ जिनमें वे कभी ऊपर उठते, कभी नीचे आते या कभी स्थिर प्रतीत होते हैं। जबकि वास्तव में कोई भी आकाशीय पिंड स्थिर नहीं रहता, ये सब गणितीय खगोलशास्त्री के विषय हैं। दार्शनिक यह जानता है कि दर्पण में प्रतिबिंब क्यों दिखाई देता है। जबकि ज्यामितिज्ञ तुम्हें बता सकता है कि वस्तु अपने प्रतिबिंब से कितनी दूरी पर होनी चाहिए और किस प्रकार का दर्पण किस प्रकार का प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। दार्शनिक यह सिद्ध करेगा कि सूर्य विशाल है। जबकि खगोलशास्त्री अनुभव और निरीक्षण के आधार पर यह ज्ञात करेगा कि वह वास्तव में कितना बड़ा है। परंतु इस प्रकार निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उसे कुछ मूल सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। कोई भी विद्या अपने बल पर पूर्ण नहीं हो सकती यदि उसके मूल सिद्धांत किसी दूसरी विद्या से प्राप्त होते हों। दर्शन किसी अन्य विद्या से कुछ नहीं माँगता। वह अपनी पूरी इमारत की नींव स्वयं रखता है। गणितीय खगोलशास्त्र मानो उस इमारत की ऊपरी मंज़िल है, जो किसी दूसरी नींव पर खड़ी की गई है। वह अपने मूल सिद्धांत कहीं और से ग्रहण करता है और उन्हीं के सहारे आगे बढ़ता है। यदि वह अपने बल पर सत्य तक पहुँच सकता, यदि वह स्वयं सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति को समझ पाने में समर्थ होता, तो मैं स्वीकार कर लेता कि उसके पास हमें देने के लिए बहुत कुछ है। क्योंकि आकाशीय घटनाओं का अध्ययन करते हुए हमारा मन भी अधिक व्यापक और अधिक ऊँचा बनता है। 

    मनुष्य का मन अपनी पूर्ण ऊँचाई केवल एक ही मार्ग से प्राप्त करता है जब उसे इस बात का अटल ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। और इस विषय में किसी अन्य विद्या के पास सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। अब आओ, हम एक-एक करके सद्गुणों का विचार करें। साहस वह सद्गुण है जो भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु का तिरस्कार करता है। जो कुछ भी हमें भयभीत करता है और हमारी स्वतंत्रता को दासता के जुए के नीचे झुका देता है, उसका साहस तिरस्कार करता है, उसका सामना करता है और उस पर विजय प्राप्त करता है। क्या उदार विद्याएँ इस साहस को दृढ़ बनाने में कोई सहायता करती हैं? निष्ठा मनुष्य के हृदय का सबसे पवित्र गुण है। कोई भी कष्ट उसे छल करने के लिए विवश नहीं कर सकता और कोई भी पुरस्कार उसे विश्वासघात के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। निष्ठा कहती है, “मुझे जला दो, मेरे अंग काट दो, मुझे मार डालो, फिर भी मैं अपने विश्वास के साथ विश्वासघात नहीं करूँगी। जितना अधिक पीड़ा मुझसे मेरे रहस्य उगलवाने का प्रयास करेगी, उतना ही अधिक मैं उन्हें अपने भीतर छिपाकर रखूँगी।” क्या उदार विद्याएँ ऐसा चरित्र गढ़ सकती हैं? आत्मसंयम हमारी इच्छाओं और भोगों पर शासन करता है। कुछ इच्छाओं का वह तिरस्कार करके उन्हें पूरी तरह त्याग देता है और कुछ को सीमित कर स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखता है। वह कभी भी सुखों को केवल उनके अपने लिए नहीं चाहता क्योंकि वह जानता है कि इच्छाओं की सबसे उत्तम सीमा यही है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही ग्रहण किया जाए, न कि जितनी इच्छा हो उतना। सद्भाव या दयालुता मनुष्य को अपने साथियों के प्रति घमंडी या दोष-दृष्टि रखने वाला बनने से रोकती है। वह वाणी, व्यवहार और भावना, तीनों में सबके प्रति कोमल और सहज रहती है। वह दूसरों के प्रत्येक दुःख को अपना दुःख समझती है और प्रत्येक शुभ अवसर का स्वागत मुख्यतः इसलिए करती है कि उसका लाभ दूसरों के साथ बाँट सके। क्या उदार विद्याएँ ऐसा आचरण सिखाती हैं? नहीं। वे हमें ईमानदारी, आत्मसंयम, मर्यादा, सादगी और मितव्ययिता भी नहीं सिखातीं। उसी प्रकार वे हमें क्षमा और करुणा भी नहीं सिखातीं। वह करुणा जो दूसरे के रक्त के प्रति उतनी ही सावधान रहती है जितनी अपने रक्त के प्रति क्योंकि वह जानती है कि किसी भी मनुष्य को कभी भी दूसरे मनुष्य के जीवन का मूल्य नहीं भूलना चाहिए।

    “तुम लोग कहते हो कि उदार विद्याओं के बिना सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर तुम यह कैसे कहते हो कि उनका सद्गुण में कोई योगदान नहीं है?” इसका उत्तर यह है, जिस प्रकार भोजन के बिना भी सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी भोजन का सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। उसी प्रकार लकड़ी जहाज़ के निर्माण में कोई योगदान नहीं देती, यद्यपि जहाज़ लकड़ी के बिना बनाया नहीं जा सकता। मेरा आशय यह है कि केवल इसलिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि एक वस्तु दूसरी में योगदान देती है क्योंकि दूसरी वस्तु उसके बिना अस्तित्व में नहीं आ सकती। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में उदार विद्याओं के बिना भी बुद्धिमत्ता प्राप्त की जा सकती है। क्योंकि यद्यपि सद्गुण को सीखना आवश्यक है, पर उसे इन विद्याओं के माध्यम से नहीं सीखा जाता। मेरे पास यह मानने का क्या कारण है कि जो व्यक्ति अक्षर-ज्ञान से वंचित है, वह बुद्धिमान नहीं बन सकता? बुद्धिमत्ता अक्षरों में नहीं रहती। अक्षर केवल तथ्य सिखाते हैं, शब्द नहीं और संभव है कि जब स्मृति को अपने अतिरिक्त किसी दूसरे सहारे पर निर्भर न रहना पड़े, तब वह और भी अधिक दृढ़ हो जाती है। 

    बुद्धिमत्ता विशाल और व्यापक होती है। उसे पर्याप्त स्थान चाहिए। मनुष्य को मानव-संबंधी और दैवी विषयों का अध्ययन करना चाहिए। भूतकाल और भविष्य का, नश्वर और शाश्वत का भी। समय के विषय में भी उसे विचार करना चाहिए और देखो, केवल इसी एक विषय पर कितने प्रश्न उठते हैं! पहला, क्या समय स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता है? दूसरा, क्या समय से पहले भी कुछ था, क्या कोई ऐसी सत्ता है जो समय से परे है? क्या समय का आरंभ संसार के साथ ही हुआ या चूँकि संसार से पहले भी कुछ अस्तित्व में था, इसलिए समय भी तब से विद्यमान था? केवल आत्मा के विषय में ही असंख्य प्रश्न पूछे जा सकते हैं। वह कहाँ से आती है? उसका स्वरूप क्या है? उसका अस्तित्व कब प्रारंभ होता है। वह कितने समय तक रहती है? क्या वह एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, एक जीवित प्राणी से दूसरे में अपना निवास बदलती रहती है? या क्या वह केवल एक बार ही इस देह-बंधन को सहती है और मुक्त होकर समस्त ब्रह्मांड में विचरण करती है? क्या वह साकार है या निराकार? जब वह हमारे माध्यम से कार्य करना बंद कर देती है, तब वह क्या करती है? इस कारागार से मुक्त होने के बाद वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करती है? या क्या वह अपने पूर्व जीवन को भूल जाती है और शरीर से अलग होकर उच्च लोकों में पहुँचते ही पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को जानती है? मानव और दैवी विषयों में से तुम किसी भी एक को चुन लो, तुम्हें इतने अधिक प्रश्न मिलेंगे कि उनके अध्ययन और विचार में पूरा जीवन लग सकता है। जब हमारे मन को व्यस्त रखने के लिए इतने महान विषय उपस्थित हैं, तब हमें उनके लिए स्थान बनाना चाहिए और उन सब बातों को निकाल देना चाहिए जो अनावश्यक हैं। सद्गुण इतने संकुचित स्थान में निवास नहीं करता। इतना महान अतिथि विस्तृत स्थान चाहता है। इसलिए सब अनावश्यक बातों को हृदय से बाहर कर दो और अपने पूरे हृदय को सद्गुण के लिए खुला रहने दो। 

    “फिर भी अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान होना आनंददायक है।” यदि ऐसा है तो हमें उनमें से केवल उतना ही रखना चाहिए जितनी वास्तव में आवश्यकता हो। या क्या तुम्हें यह उचित लगता है कि जो व्यक्ति अपने घर के लिए अनुपयोगी सामान खरीदता है और महँगी वस्तुओं का प्रदर्शन करता है, उसकी तो आलोचना की जाए, पर जो व्यक्ति अनावश्यक साहित्यिक ज्ञान का विशाल भंडार इकट्ठा करने में लगा रहता है, उसकी नहीं? आवश्यकता से अधिक जानने की इच्छा भी असंयम का ही एक रूप है। वास्तव में उदार विद्याओं का ऐसा अध्ययन मनुष्यों को अप्रिय, वाचाल, आडंबरपूर्ण और आत्मसंतुष्ट बना देता है। क्योंकि वे उन बातों को सीखते रहते हैं जिन्हें जानने की उन्हें आवश्यकता नहीं होती, और परिणामस्वरूप वे उन बातों को सीख ही नहीं पाते जिन्हें वास्तव में जानना चाहिए। साहित्य के विद्वान डिडिमस ने चार हज़ार ग्रंथ लिखे थे। यदि उसने केवल उतनी ही निरर्थक पुस्तकों का अध्ययन किया होता तो भी मुझे उस पर दया आती। कुछ ग्रंथों में वह यह खोजता है कि होमर का जन्मस्थान कहाँ था। कुछ में यह कि ऐनियस की वास्तविक माता कौन थी। कुछ में यह कि अनाक्रेयोन अधिक कामुक था या अधिक मद्यपान का अभ्यासी। कुछ में यह कि क्या सैफो वास्तव में वेश्या थी और ऐसे ही अनेक अन्य विषयों पर भी उसने लिखा। यदि तुम्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर मालूम भी हों तो तुम्हें उन्हें भूलने का प्रयत्न करना चाहिए। फिर भी तुम कहते हो कि जीवन बहुत छोटा है! किन्तु हमारे अपने देशवासियों में भी ऐसी अनेक अतिशयताएँ हैं जिन्हें कुल्हाड़ी से काटकर हटाने की आवश्यकता है। कितना समय नष्ट करके और दूसरों के कानों को कितना कष्ट पहुँचाकर हम केवल यह प्रशंसा सुनने के लिए प्रयत्न करते हैं—“क्या विद्वान व्यक्ति है!” इससे कहीं अच्छा है कि हम एक कम आडंबरपूर्ण उपाधि से ही संतुष्ट रहें—“क्या अच्छा मनुष्य है!”

    तो क्या मुझे सभी राष्ट्रों के इतिहास खँगालने चाहिए ताकि यह पता लगा सकूँ कि कविता सबसे पहले किसने लिखी? क्या मुझे यह गणना करनी चाहिए कि ऑर्फ़ियस और होमर के बीच कितने वर्ष बीते। जबकि इस संबंध में कोई लिखित प्रमाण ही उपलब्ध नहीं हैं? क्या मुझे उन संपादकीय चिह्नों का अध्ययन करना चाहिए जिनसे अरिस्टार्कस ने दूसरे कवियों की रचनाओं पर अपनी टिप्पणियाँ अंकित की थीं और अपना जीवन मात्र अक्षरों और मात्राओं के विश्लेषण में बिता देना चाहिए? क्या मुझे ज्यामिति की धूल में ही उलझे रहना चाहिए? क्या मैं वह हितकारी उपदेश भूल गया हूँ, “अपने समय का सदुपयोग करो”? यदि मैं इन सब बातों को सीखने में लगा रहूँ तो फिर किन बातों को छोड़ दूँ? गायस सीज़र के शासनकाल में एपियोन नामक एक साहित्य-विद्वान यूनान की यात्रा पर गया। वहाँ के नगरों ने उसे होमर के नाम पर अपना नागरिक बना लिया। वह कहा करता था कि होमर ने ओडिसी और इलियड की रचना पूरी करने के बाद अपनी कृति के आरंभ में एक प्रस्तावना भी जोड़ दी थी, जिसमें पूरे ट्रॉय-युद्ध का सार समाहित था। इसके प्रमाण के रूप में वह यह तर्क देता था कि इलियड की पहली पंक्ति के पहले दो अक्षर जान-बूझकर इस उद्देश्य से रखे गए थे कि वे उस कृति के खंडों (पुस्तकों) की संख्या का संकेत दें। यही वे बातें हैं जिन्हें तथाकथित बहुश्रुत विद्वान के लिए जानना आवश्यक माना जाता है! ज़रा सोचो, तुम्हारे जीवन का कितना समय रोगों में बीत जाता है। कितना सार्वजनिक और निजी कार्यों में। कितना दैनिक आवश्यकताओं में और कितना नींद में। अपने जीवन का ठीक-ठीक हिसाब लगाओ। उसमें इतनी सारी निरर्थक बातों के लिए स्थान ही नहीं है। 

    मैं अब तक उदार विद्याओं की चर्चा कर रहा था। किन्तु दार्शनिकों के पास भी समय नष्ट करने के अपने तरीके हैं और उनके भी अपने निरर्थक विषय हैं। वे भी अक्षरों की मात्राएँ गिनने, तथा अव्ययों और संबंधबोधक शब्दों के सही अर्थ निर्धारित करने में लग जाते हैं। साहित्य-विदों और ज्यामितिज्ञों से ईर्ष्या करके उन्होंने उनकी सारी अनावश्यक सूक्ष्मताओं को अपना लिया है। परिणाम यह हुआ कि वे सही ढंग से बोलने की कला तो अधिक जानते हैं। पर सही ढंग से जीना नहीं। मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसी अतिसूक्ष्म तर्कबाज़ी कितनी हानिकारक हो सकती है और वह सत्य से कितनी दूर ले जाती है। प्रोटागोरस का दावा था कि वह किसी भी प्रश्न के दोनों पक्षों का समान शक्ति से समर्थन कर सकता है, यहाँ तक कि इस प्रश्न का भी कि क्या वास्तव में हर प्रश्न के दोनों पक्षों का समर्थन किया जा सकता है। नाउसिफ़ानेस का कहना था कि जो वस्तुएँ हमें वास्तविक प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में अवास्तविक वस्तुओं से अधिक वास्तविक नहीं हैं। पार्मेनिदेस का मत था कि जो कुछ हमें अनेक और भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, वह वास्तव में उस एकमात्र सत्ता से अलग नहीं है। एलेआ के ज़ेनो ने तो पूरा विवाद ही समाप्त कर दिया। उसका कहना था कि वास्तव में कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। पाइर्रोनवादी, मेगारावादी, एरेट्रियावादी और अकादमिक, ये सब भी कमोबेश इसी दिशा में चले गए। उन्होंने एक ऐसी नई प्रकार की विद्या प्रस्तुत की, जो यह दावा करती है कि वह कुछ भी नहीं जानती। इन सबको भी लिबरल आर्ट्स की उसी निरर्थक भीड़ में डाल दो। पहली श्रेणी के लोग मुझे कोई उपयोगी ज्ञान नहीं देते। दूसरी श्रेणी तो मुझसे ज्ञान प्राप्त करने की आशा भी छीन लेती है। निरर्थक बातें सीख लेना, कुछ भी न सीखने से फिर भी बेहतर है। एक वर्ग मेरे सामने सत्य का मार्ग दिखाने के लिए कोई दीपक नहीं जलाता। दूसरा तो मेरी आँखें ही निकाल देता है। 

    यदि मैं प्रोटागोरस पर विश्वास करूँ तो संसार में कोई भी बात निश्चित नहीं रह जाती। सब कुछ विवादास्पद हो जाता है। यदि मैं नाउसिफ़ानेस पर विश्वास करूँ, तो केवल एक बात निश्चित है कि कुछ भी निश्चित नहीं है। यदि मैं पार्मेनिदेस पर विश्वास करूँ तो उस एकमात्र सत्ता के अतिरिक्त कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। और यदि मैं ज़ेनो पर विश्वास करूँ तो वह एकमात्र सत्ता भी नहीं है। तो फिर हम क्या हैं? और ये सब वस्तुएँ क्या हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं, हमारा पालन-पोषण करती हैं और हमें जीवित रखती हैं? क्या यह समूचा संसार केवल एक छाया है या तो पूर्णतः शून्य या फिर छल से भरी हुई? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि मुझे किस पर अधिक क्रोध आता है, उन पर, जिन्होंने चाहा कि हम कुछ भी न जानें या उन पर, जिन्होंने हमसे इतना भी छीन लिया कि हम यह भी न जान सकें कि हम कुछ नहीं जानते।


अभी के लिए विराम 

Wednesday, 8 July 2026

मन के विकार को दूर करने के संदर्भ में -- पत्र - 50 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


चूँकि तुम्हारा पत्र मुझे उसके भेजे जाने के कई महीनों बाद प्राप्त हुआ इसलिए मैंने पत्रवाहक से यह पूछना उचित नहीं समझा कि तुम कैसे हो। इतनी लंबी अवधि के बाद वह यदि कुछ बता भी पाता तो उसके लिए असाधारण स्मरण-शक्ति की आवश्यकता होती! किन्तु मुझे आशा है कि अब तुम इस प्रकार जीवन जी रहे हो कि तुम जहाँ कहीं भी हो, मुझे यह ज्ञात रहे कि तुम कैसे हो। आख़िर तुम्हारा और कौन-सा प्रयत्न होना चाहिए, सिवाय इसके कि तुम प्रतिदिन स्वयं को पहले से बेहतर मनुष्य बनाओ। प्रतिदिन किसी-न-किसी दोष का परित्याग करो। यह समझो कि जिन बातों को तुम अपनी परिस्थितियों की कमियाँ समझते हो, वे वास्तव में तुम्हारे अपने ही दोष हैं।


Ethiopian Art  

    क्योंकि हम प्रायः उन दोषों के लिए समय और स्थान को दोषी ठहराते हैं जो वास्तव में जहाँ भी हम जाएँ, हमारे साथ ही चलते रहते हैं। तुम जानते हो कि मेरी पत्नी के पास हारपास्टे नाम की एक विदूषी स्त्री है, जो बहुत समय से हमारे घर में पैतृक आश्रिता के रूप में रह रही है। (मुझे ऐसे लोगों से, जिन्हें केवल मनोरंजन के लिए रखा जाता है, अत्यन्त अरुचि है। यदि मुझे कभी किसी मूर्ख पर हँसने की इच्छा होती है तो मुझे दूर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैं स्वयं पर ही हँस लेता हूँ।) तो हुआ यह कि वह विदूषी स्त्री अचानक अपनी दृष्टि खो बैठी। जो बात मैं कह रहा हूँ, उस पर विश्वास करना कठिन है। किन्तु यह बिल्कुल सत्य है। उसे यह तक मालूम नहीं कि वह अंधी हो चुकी है। वह बार-बार अपनी परिचारिका से कमरा बदलने के लिए कहती रहती है और शिकायत करती है कि उसका कमरा पर्याप्त प्रकाशयुक्त नहीं है।

    तुम भली-भाँति समझ सकते हो कि जिस बात पर हम उसके प्रसंग में हँसते हैं, वही बात हम सबके साथ भी घटती है। कोई भी यह नहीं समझता कि वह लोभी है या धनलोलुप। कम-से-कम अंधे लोग तो किसी मार्गदर्शक की माँग करते हैं। पर हम बिना किसी मार्गदर्शक के भटकते रहते हैं और कहते हैं,“मैं महत्वाकांक्षी नहीं हूँ। रोम में रहने का यही ढंग है।” “मैं फिजूलखर्च नहीं हूँ। बड़े नगर में रहने के लिए कुछ विशेष खर्च तो करने ही पड़ते हैं।” “यह मेरी गलती नहीं कि मुझे शीघ्र क्रोध आ जाता है या अभी तक मैंने जीवन की कोई स्थिर दिशा नहीं बनाई। यह तो युवावस्था का स्वाभाविक व्यवहार है।” हम स्वयं को क्यों धोखा देते हैं? हमारा रोग हमारे बाहर नहीं है। वह हमारे भीतर, हमारे प्राणों की गहराई तक समाया हुआ है। हमारे स्वस्थ होने में इतनी कठिनाई इसलिए आती है कि हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम रोगग्रस्त हैं। हमारे रोग असंख्य हैं और अत्यन्त गंभीर भी। यदि हम उनका उपचार प्रारम्भ भी कर दें, तब भी उनसे पूरी तरह मुक्त होने में कितना समय लग सकता है! परन्तु अभी तो स्थिति यह है कि हमने डॉक्टर की खोज भी आरम्भ नहीं की है।

    और हमारा यह रोग अभी-अभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यदि ऐसा होता तो इसका उपचार अपेक्षाकृत सरल होता। डॉक्टर हमें सही मार्ग दिखा देता। हमारे मन, जो अभी युवा और ग्रहणशील होते, उसका अनुसरण कर लेते। यदि आज हमें अपने स्वाभाविक मार्ग पर लौटाना कठिन हो गया है तो उसका कारण केवल यह है कि हम स्वयं उस मार्ग को छोड़ चुके हैं। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए शिक्षा ग्रहण करने में हमें लज्जा आती है। परन्तु, ईश्वर के लिए बताओ, इतने महान गुण की प्राप्ति के लिए शिक्षा लेना भला कैसी लज्जा की बात है? क्योंकि यह आशा करना व्यर्थ है कि ऐसा गुण संयोगवश स्वयं हमारे भीतर उत्पन्न हो जाएगा। इसके लिए परिश्रम करना ही पड़ता है। किन्तु यह परिश्रम कठिन नहीं होता, बशर्ते कि हम समय रहते आरम्भ कर दें। जैसा कि मैंने कहा है, अपने मन को उसके विकार गहरे जड़ पकड़ने से पहले ही गढ़ना और सीधा करना शुरू कर दें।

    फिर भी, जब ये विकार गहराई तक जड़ जमा चुके हों, तब भी मैं निराश नहीं होता। निरंतर और एकाग्र प्रयास किसी भी प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। बलूत की लकड़ियों को चाहे वे कितनी ही टेढ़ी-मेढ़ी क्यों न हो गई हों, सीधा किया जा सकता है। टेढ़े वृक्ष-तनों को गर्मी देकर मोड़ा जाता है और उनके स्वाभाविक आकार को बदलकर उन्हें वैसा रूप दिया जाता है जैसा हम चाहते हैं। तो फिर मन के लिए अपने को नया रूप देना कितना अधिक सरल है! मन तो किसी भी द्रव से अधिक लचीला और अधिक सहजता से ढलने वाला है। आख़िर मन है ही क्या? वह तो एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित प्राणवायु (श्वास) मात्र है। तुम देखते ही हो कि वायु, अन्य किसी भी पदार्थ से अधिक हल्की होने के कारण, उसी अनुपात में सबसे अधिक परिवर्तनशील और अनुकूलनशील भी होती है।

    यह सत्य है कि इस समय हमारे भीतर दोषों का निवास है। वे बहुत लंबे समय से हमारे भीतर बसे हुए हैं। फिर भी, प्रिय लूसीलियस, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम्हें आशा छोड़ देनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति पहले दोषपूर्ण हुए बिना उत्कृष्ट चरित्र का स्वामी नहीं बनता। हम सब पहले ही दोषों के वश में आ चुके हैं और सद्गुण सीखने का अर्थ है— अपने दोषों को भूलना और उनसे मुक्त होना। फिर भी, जब हम अपने आत्म-संशोधन के कार्य में लगते हैं तो हमें उत्साह बनाए रखना चाहिए। क्योंकि एक बार जब सद्गुण वास्तव में हमारे अधिकार में आ जाता है तब वह सदा के लिए हमारा हो जाता है। सद्गुण को फिर भुलाया नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जो गुण किसी वस्तु के स्वभाव के अनुरूप नहीं होते, वे वहाँ स्थिर नहीं रह पाते। इसलिए उन्हें हटाया और त्यागा जा सकता है। परन्तु जो वस्तु अपने स्वाभाविक स्थान पर आ जाती है, वह वहीं दृढ़तापूर्वक स्थिर रहती है। सद्गुण हमारे स्वभाव के अनुरूप है जबकि दोष हमारे स्वभाव के प्रतिकूल हैं।

    किन्तु जैसे एक बार प्राप्त हो जाने पर सद्गुण हमें छोड़कर नहीं जाते और उन्हें बनाए रखना सरल हो जाता है, वैसे ही उन्हें प्राप्त करने की शुरुआत करना कठिन होता है। क्योंकि दुर्बल और रोगग्रस्त मन की यह विशेषता होती है कि वह उस वस्तु से भयभीत रहता है जिसका उसने अभी तक अनुभव नहीं किया है। इसलिए उसे प्रारम्भ करने के लिए मानो बाध्य करना पड़ता है। परन्तु एक बार आरम्भ हो जाने पर यह औषधि कड़वी नहीं लगती बल्कि जैसे-जैसे वह रोग का उपचार करती है, वैसे-वैसे आनंद भी प्रदान करती है। अन्य प्रकार की चिकित्सा में सुख उपचार के बाद प्राप्त होता है। किन्तु दर्शन का उपचार एक साथ ही औषधि भी है और आनंद भी।


अभी के लिए विदा 

Monday, 6 July 2026

स्वयं ही महत्वपूर्ण पंक्तियों के रचनाकार बनने के संदर्भ में -- पत्र - 33 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम चाहते हो कि मैं इन पत्रों का समापन भी पहले के पत्रों की तरह उद्धरणों के साथ करूँ। वे उद्धरण हमारे अपने दर्शन-मत के आचार्यों से लूँ। लेकिन उन्होंने वाक्चातुर्य के आकर्षक टुकड़ों में स्वयं को व्यस्त नहीं रखा। उनकी समस्त रचना गंभीर, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण है। जहाँ कोई विशेष बात शेष भागों से अलग उभरकर दिखाई देती है, वहाँ तुम निश्चय ही समझ सकते हो कि पूरी रचना का स्तर एक-सा नहीं है। एक अकेला वृक्ष किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता, जब पूरा वन ही समान ऊँचाई तक उठा हुआ हो।


From Sartel 

    कविताएँ ऐसे कथनों से भरी पड़ी हैं और इतिहास-ग्रंथ भी। इसलिए तुम यह मत समझो कि ऐसे विचार केवल एपिक्यूरस के हैं। वे तो सबकी साझी संपत्ति हैं और विशेष रूप से हमारी भी। लेकिन उसके यहाँ वे अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि वे बहुत कम दिखाई देते हैं। वे अप्रत्याशित होते हैं और क्योंकि यह आश्चर्यजनक लगता है कि ऐसा व्यक्ति, जो कोमलता और विलासिता का उपदेशक माना जाता है, इतनी साहसपूर्ण बातें कह सकता है। कम-से-कम अधिकांश लोग उसके बारे में यही सोचते हैं। किन्तु मेरी दृष्टि में एपिक्यूरस वास्तव में साहसी था, भले ही वह लंबी बाँहों वाले वस्त्र पहनता रहा हो। साहस, परिश्रम और युद्ध के योग्य मन केवल कठोर जीवन जीने वालों में ही नहीं पाए जाते। वे उतनी ही अच्छी तरह फ़ारसियों में भी मिल सकते हैं जितनी उन लोगों में जो कमर पर तलवार की पेटी बाँधते हैं।

    इसलिए तुम्हारे पास उद्धरणों और चुने हुए अंशों की माँग करने का कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार की बातें दूसरे लेखकों के यहाँ चुनकर उद्धृत की जाती हैं, वे हमारे दर्शन-मत के ग्रंथों में निरंतर मिलती रहती हैं। इस कारण हमारे यहाँ वैसे आकर्षक वाक्य नहीं हैं जिनकी तुम्हें अपेक्षा है। हमारे यहाँ खरीदार दुकान में प्रवेश करके निराश नहीं होते कि बाहर जो दिखाया गया था, भीतर उससे अधिक कुछ नहीं है। हम उन्हें यह स्वतंत्रता देते हैं कि वे ग्रंथ के जिस भाग को चाहें, उसी को प्रदर्शनीय नमूना मान लें। मान लो कि हम कुछ कथनों को भीड़ से अलग निकालना चाहें तो उन्हें किसके नाम से जोड़ेंगे? क्या ज़ीनो (Zeno) के? क्या क्लीन्थीस (Cleanthes) के? क्या क्रिसिपस  (Chrysippus) के? क्या पोसिडोनियस (Posidonius) के? या पैनैटियस (Panaetius) के? हम किसी एक सम्राट के अधीन नहीं हैं। हममें से प्रत्येक अपनी स्वतंत्रता का दावा करता है। एपिक्यूरस के अनुयायियों में हर्मार्खुस (Hermarchus) या मेट्रोडोरस (Metrodorus) जो कुछ भी कहते हैं, उसका श्रेय अंततः एक ही व्यक्ति को दिया जाता है। उस परंपरा में हर व्यक्ति मानो एक ही गुरु के निर्देशन और संरक्षण में बोलता है। किन्तु हमारे पास तो इतनी अधिक और समान रूप से उत्कृष्ट संपदा है कि हम चाहकर भी किसी एक को अलग नहीं कर सकते। मैं फिर कहता हूँ, हम ऐसा नहीं कर सकते कि केवल निर्धन व्यक्ति ही अपने पशुधन की गिनती करता रहता है।

    तुम अपनी दृष्टि जहाँ भी डालोगे, वहाँ तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा जो अपने आप में उत्कृष्ट माना जाता, यदि शेष रचना भी उतनी ही उत्कृष्ट न हो तो भी। इसी कारण तुम्हें यह आशा छोड़ देनी चाहिए कि तुम कभी महान विचारकों की रचनाओं का केवल थोड़ा-सा नमूना लेकर उन्हें समझ सकोगे। तुम्हें उन्हें संपूर्णता में पढ़ना होगा और संपूर्णता में ही समझना होगा। विषय का विवेचन उसके अनुरूप क्रम में किया जाता है, और एक ऐसी बौद्धिक रचना निर्मित की जाती है जिसमें से यदि कोई भाग हटा दिया जाए, तो पूरी संरचना ही ढह जाए। फिर भी, मुझे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि तुम उसके अलग-अलग अंगों का अध्ययन करो, बशर्ते कि तुम्हारी दृष्टि संपूर्ण व्यक्तित्व पर बनी रहे। सुंदर स्त्री वह नहीं होती जिसकी केवल एड़ी या कंधे की प्रशंसा की जाए बल्कि वह होती है जिसकी समग्र छवि हमारे मन को इस प्रकार आकर्षित कर ले कि हम उसके अलग-अलग अंगों पर ध्यान ही न दें।

    लेकिन यदि तुम फिर भी आग्रह करोगे तो मैं तुम्हारे प्रति कंजूसी नहीं करूँगा बल्कि उन्हें मुट्ठी भर-भरकर बाँटूँगा। ऐसे कथनों के ढेर लगे हुए हैं। उन्हें केवल उठा लेने की आवश्यकता है, उन्हें इकट्ठा करने का कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। वे बूँद-बूँद करके नहीं आते बल्कि एक सतत प्रवाह के रूप में आते हैं। वे सब एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं।

    मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे कथन आरंभिक विद्यार्थियों और दर्शन-मत के बाहर के श्रोताओं के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। अलग-अलग कथन अधिक आसानी से मन पर प्रभाव डालते हैं क्योंकि वे पद्य की पंक्तियों की तरह स्वतंत्र और पूर्ण होते हैं। इसी कारण हम बच्चों को कहावतें कंठस्थ कराते हैं। वे बातें भी जिन्हें यूनानी लोग ‘ख्रेयाइ’ कहते हैं क्योंकि बालक का मन अभी उतनी ही बातों को ग्रहण कर सकता है। उसमें इससे बड़ी चीज़ों के लिए अभी पर्याप्त स्थान नहीं होता। किन्तु यह लज्जाजनक है कि जो व्यक्ति वास्तव में प्रगति कर रहा हो, वह केवल सुन्दर वाक्यांशों को पकड़कर बैठे या याद किए हुए कुछ सामान्य कथनों के सहारे स्वयं को टिकाए रखे। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए! उसे ये बातें स्वयं कहनी चाहिए, केवल याद की हुई बातें दोहरानी नहीं चाहिए। यह शर्म की बात है कि कोई वृद्ध व्यक्ति या लगभग वृद्ध हो चुका व्यक्ति, अपनी बुद्धि किसी पाठ्य-पुस्तक से प्राप्त करे। “यह ज़ीनो ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? “यह क्लीन्थीस ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? तुम कब तक किसी दूसरे के आदेश के अधीन चलते रहोगे? स्वयं नेतृत्व संभालो। अपने बल पर कुछ ऐसा कहो जो स्मरणीय हो। अपनी ही निधि से कुछ बाहर लाओ।

    इसलिए मुझे लगता है कि वे सभी लोग जो कभी स्वयं रचनाकार नहीं बनते बल्कि हमेशा केवल व्याख्याकार बने रहते हैं और जो किसी दूसरे की छाया में स्वयं को छिपाए रखते हैं, उनमें कुछ भी महान नहीं होता। क्योंकि उन्होंने कभी उस ज्ञान को व्यवहार में लाने का साहस नहीं किया जिसे सीखने में उन्होंने इतना लंबा समय बिताया है। उन्होंने अपनी स्मृति को दूसरों के शब्दों से भर लिया है। लेकिन स्मरण रखना एक बात है और जानना दूसरी। स्मरण रखने का अर्थ है किसी बात को याद करके सुरक्षित रखना जबकि जानने का अर्थ है उन बातों को वास्तव में अपना बना लेना। इस प्रकार कि किसी आदर्श का सहारा न लेना पड़े और हर समय अपने गुरु की ओर निर्देशों के लिए न देखना पड़े। “ज़ीनो ने यह कहा था और क्लीन्थीस ने वह कहा था।” तुम और पुस्तक के बीच कुछ दूरी तो होनी चाहिए! तुम कब तक विद्यार्थी बने रहोगे? अब स्वयं शिक्षक भी बनो। मैं ऐसी बातें क्यों सुनूँ जिन्हें मैं स्वयं पढ़ सकता हूँ? “जब बातें बोलकर कही जाती हैं तो बहुत अंतर पड़ता है,” कोई कह सकता है। हाँ, लेकिन तब नहीं, जब बोलने वाला केवल किसी दूसरे के शब्द उधार लेकर दोहरा रहा हो, जैसे कोई नकलनवीस करता है।

    उन लोगों के संबंध में जो कभी अपने जीवन का नेतृत्व स्वयं नहीं संभालते, एक और समस्या भी है। वे पहले तो उन विषयों में अपने आचार्यों का अनुसरण करते हैं जिनमें बाकी सभी लोग अपनी स्वतंत्र राय बना चुके हैं। फिर वे उन विषयों में भी उनका अनुसरण करते हैं जो अभी भी अनुसंधान और विचार-विमर्श के अधीन हैं। यदि हम केवल अब तक खोजी गई बातों से ही संतुष्ट हो जाएँ तो कभी कोई नई खोज नहीं हो सकेगी। और फिर, जो लोग केवल अनुयायी बने रहते हैं, वे कभी कुछ नया नहीं खोजते बल्कि वे तो खोजने का प्रयास भी नहीं करते।

    तो फिर क्या मैं अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर नहीं चलूँगा? निश्चय ही चलूँगा। मैं प्राचीन मार्ग का उपयोग करूँगा।लेकिन यदि मुझे कोई दूसरा मार्ग मिल जाए जो अधिक सीधा हो और जिसमें उतार-चढ़ाव कम हों तो मैं उसी मार्ग को अपनाऊँगा। जिन लोगों ने हमसे पहले इन सिद्धांतों को विकसित किया, वे हमारे स्वामी नहीं हैं बल्कि हमारे मार्गदर्शक हैं। सत्य सबके लिए खुला हुआ है। उस पर अभी किसी का एकाधिकार नहीं हुआ है। उसमें से बहुत कुछ अभी भी उन लोगों के लिए शेष है जो भविष्य में आएँगे।


अभी के लिए विदा 

जीवन की पूर्णता के संदर्भ में -- पत्र - 32 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

मैं तुम्हारे बारे में जानकारी लेता रहा हूँ। जब भी तुम्हारे इलाके से कोई व्यक्ति यहाँ से होकर आता है, मैं उससे पूछता हूँ कि तुम क्या कर रहे हो। अपना समय कहाँ बिताते हो और किन लोगों के साथ रहते हो। तुम मुझे धोखा नहीं दे सकते! मैं मानो हर समय तुम्हारे साथ ही हूँ। ऐसे जियो मानो मुझे तुम्हारे हर कार्य के बारे में सुनने को मिलने वाला हो... नहीं, मानो उसे अपनी आँखों से देखने वाला हूँ!


By Monet  

    क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारे बारे में जो कुछ मैं सुनता हूँ, उसमें मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता किस बात से होती है? यह कि मुझे तुम्हारे बारे में कुछ भी सुनने को नहीं मिलता। जिन अधिकांश लोगों से मैं पूछताछ करता हूँ, वे यह नहीं जानते कि तुम कैसे हो। यह तुम्हारे लिए लाभदायक है कि तुम्हारा उन लोगों से कोई संबंध नहीं है जो तुमसे भिन्न हैं और जिनकी इच्छाएँ तुम्हारी इच्छाओं से अलग हैं। वास्तव में, मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हें तुम्हारे मार्ग से विचलित नहीं किया जा सकता और तुम अपने संकल्प पर दृढ़ रहोगे, चाहे तुम्हारे चारों ओर परेशान करने वाले लोगों की कितनी ही भीड़ क्यों न जमा हो जाए।

    तो फिर समस्या क्या है? मुझे यह भय नहीं है कि वे तुम्हें बदल देंगे बल्कि यह भय है कि वे तुम्हारी प्रगति में बाधा डालेंगे। जो व्यक्ति तुम्हें केवल विलंबित ही कर देता है, वह भी बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाता है, विशेषकर इसलिए कि जीवन इतना छोटा है। हम अपनी अस्थिरता के कारण इसे और भी छोटा बना देते हैं, जब हम बार-बार नई शुरुआत करते रहते हैं। हम अपने जीवन को टुकड़ों में बाँट देते हैं। उसके चिथड़े-चिथड़े कर डालते हैं।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस! शीघ्रता करो और सोचो कि यदि कोई शत्रु तुम्हारा पीछा कर रहा होता तो तुम कितनी अधिक गति से आगे बढ़ते। यदि तुम देखते कि घुड़सवार तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहे हैं और तुम्हारे पीछे हटने के मार्ग को बाधित कर रहे हैं तो तुम कितनी तेजी दिखाते। वास्तव में, यही हो रहा है। तुम्हारा पीछा किया जा रहा है। अपनी गति बढ़ाओ! निकल भागो। स्वयं को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा लो। बार-बार अपने आप को स्मरण दिलाओ कि मरने से पहले जीवन की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच जाना कितना अद्भुत है और फिर शेष समय को शांति से बिताना केवल अपने ऊपर निर्भर रहते हुए। क्योंकि जब कोई सच्चा सुख प्राप्त कर लेता है तो समय की अधिक अवधि उसे और अधिक सुखी नहीं बना सकती। आह! वह दिन कब आएगा जब तुम्हें यह अनुभव होगा कि समय का तुम्हारे लिए कोई महत्त्व नहीं रह गया है और तुम पूर्ण शांति में रहोगे। भविष्य की कोई चिंता किए बिना जो कुछ तुम हो और जो कुछ तुम्हारे पास है, उसी में पूरी तरह संतुष्ट? क्या तुम जानना चाहते हो कि लोगों को भविष्य के प्रति इतना लालची क्या बनाता है? यह कि उनमें से कोई भी अभी तक वास्तव में स्वयं का स्वामी नहीं बना है।

    तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारे लिए और भी बहुत-सी चीज़ों की कामना की थी। लेकिन मेरी कामना यह है कि तुम उनकी उन सभी उदार इच्छाओं को तुच्छ समझो। उनकी प्रार्थनाओं में, तुम्हें समृद्ध बनाने के लिए बहुत-से लोगों से कुछ न कुछ छीन लिया जाता है। जो कुछ वे तुम्हें दिलाना चाहते हैं, वह किसी और से लेकर ही तुम्हें दिया जा सकता है। मेरी कामना यह है कि तुम स्वयं अपने स्वामी बनो। तुम्हारा मन, जो अभी अपनी चिंताओं के कारण इधर-उधर भटकता फिरता है, अंततः ठहर जाए और अपने भीतर ही निश्चिंत तथा संतुष्ट हो जाए। तुम उन सच्ची अच्छाइयों को पहचानो जो वास्तव में तुम्हारी अपनी हैं। उन्हें समझते ही अपना बना लो ताकि फिर तुम्हें अतिरिक्त वर्षों की कोई आवश्यकता न महसूस हो। आवश्यकताओं से ऊपर उठने, मुक्ति पाने और वास्तव में स्वतंत्र होने के लिए मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जो पहले से ही पूर्ण हो।

मन एवं परिश्रम के संदर्भ में -- पत्र - 31 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

मैं अपने लूसीलियस को पहचानता हूँ! वह अब अपने वचनों को सच करना शुरू कर रहा है। इसी तरह लगे रहो!क्योंकि तुम्हारे भीतर वह चरित्रबल था कि तुम हर प्रकार की उत्कृष्टता प्राप्त करने का प्रयास करो और उन वस्तुओं को पैरों तले रौंद दो जिन्हें लोग सामान्यतः बहुत मूल्यवान समझते हैं। मैं तुम्हें जितना महान और सद्गुणी देखना चाहता हूँ, वह उससे अधिक नहीं है जिसकी ओर तुम स्वयं पहले से प्रयत्नरत थे। तुमने जो नींव रखी है, वह बहुत विस्तृत है। अब उसके परिणाम को भी अपने प्रयास जितना ही भव्य बनाओ। अपने इस निर्माण-कार्य को उसकी पूर्णता तक पहुँचाओ!

By Monet 

    संक्षेप में कहूँ तो तुम्हारे लिए अपने कान बंद कर लेना ही बुद्धिमानी होगी। लेकिन उन्हें बंद करने के लिए केवल मोम पर्याप्त नहीं होगा। तुम्हें उससे कहीं अधिक मज़बूत अवरोध की आवश्यकता है जितना कि कहा जाता है कि यूलिसिस ने अपने साथियों के कानों में लगाया था। जिस स्वर से वे डरते थे, वह मोहक था। पर वह जनता की आवाज़ नहीं थी। जिस आवाज़ से तुम्हें डरना चाहिए, वह किसी एक चट्टान से नहीं आती। वह तुम्हारे चारों ओर, हर दिशा और हर देश से गूँजती रहती है। इसलिए अपनी यात्रा ऐसे करो कि केवल किसी एक स्थान को न पार करो जहाँ कपटी सुख तुम्हें लुभाने के लिए खड़े हों बल्कि संसार के सभी नगरों को पार कर जाओ। जो लोग तुमसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं, उनकी बातों पर भी ध्यान मत दो। उनकी मंशा भले ही अच्छी हो पर वे तुम्हारे लिए जिन चीज़ों की कामना करते हैं, वे वास्तव में अच्छी नहीं हैं। यदि तुम सचमुच समृद्ध होना चाहते हो तो देवताओं से प्रार्थना करो कि जिन बातों की वे लोग तुम्हारे लिए कामना करते हैं, उनमें से कोई भी पूरी न हो। क्योंकि वे जिन वस्तुओं का ढेर तुम्हारे ऊपर लगा हुआ देखना चाहते हैं, वे वास्तविक अर्थ में 'भलाई' नहीं हैं। सच्ची भलाई केवल एक ही है और वही सुख का कारण भी है तथा उसका आधार भी है। अपने ऊपर विश्वास और अपने चरित्र पर भरोसा।

    लेकिन यदि तुम कभी उस अवस्था को प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें कठिन परिश्रम को कोई विशेष महत्त्व नहीं देना चाहिए और उसे उन चीज़ों में समझना चाहिए जो न अच्छी हैं, न बुरी।क्योंकि यह संभव नहीं कि एक ही वस्तु कभी बुरी हो और कभी अच्छी, कभी हल्की और सहज सहन करने योग्य हो तथा कभी भयावह और असहनीय। परिश्रम स्वयं में कोई अच्छाई नहीं है। तो फिर अच्छाई क्या है? परिश्रम की परवाह न करना। इसी कारण मैं उन लोगों की निंदा करने को प्रवृत्त होता हूँ जो तुच्छ और मूल्यहीन वस्तुओं के लिए बहुत अधिक श्रम करते हैं। दूसरी ओर, जब लोग सम्माननीय और श्रेष्ठ लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं तो मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ। उससे भी अधिक तब, जब वे पूरे उत्साह और दृढ़ता के साथ लगे रहते हैं तथा स्वयं को पराजित या निराश नहीं होने देते। तब मैं कहता हूँ, “यही उचित है! आगे बढ़ो! चुनौती का सामना करो! गहरी साँस लो और उस पहाड़ी पर चढ़ जाओ, यदि कर सको, तो एक ही छलाँग में!”

    महान आत्माएँ कठिन परिश्रम से ही पुष्ट और पोषित होती हैं। इसलिए तुम्हें अपनी इच्छा और अपना लक्ष्य उन वस्तुओं में से नहीं चुनना चाहिए जिनकी प्राप्ति के लिए तुम्हारे माता-पिता ने कभी देवताओं से प्रार्थना की थी। सामान्य रूप से भी, जिसने बड़े कार्य कर दिखाए हों, उसके लिए यह लज्जाजनक है कि वह अभी भी देवताओं को परेशान करता फिरे। तुम्हें प्रार्थनाओं की क्या आवश्यकता है? अपनी समृद्धि स्वयं निर्मित करो! तुम ऐसा कर सकोगे, यदि तुमने भली-भाँति समझ लिया है कि जो कुछ सद्गुण के साथ मिला हुआ है, वही अच्छा है। जो कुछ बुरे आचरण के साथ जुड़ा हुआ है, वही लज्जाजनक है। कोई वस्तु तब तक प्रकाशमान नहीं होती जब तक उसमें प्रकाश का कुछ अंश न मिला हो। कोई वस्तु तब तक काली नहीं होती जब तक उसमें कुछ अंधकार न हो या उसने किसी प्रकार का कालापन ग्रहण न किया हो। कोई वस्तु अग्नि की सहायता के बिना गर्म नहीं होती और न ही वायु के प्रभाव के बिना ठंडी होती है। ठीक इसी प्रकार, किसी वस्तु को सम्माननीय या लज्जाजनक बनाने वाली चीज़ उसका सद्गुण या दुर्गुण के साथ संबंध होना है।

    तो फिर अच्छाई क्या है? वास्तविक तथ्यों का ज्ञान। बुराई क्या है? वास्तविक तथ्यों का अज्ञान। जो मनुष्य वास्तव में बुद्धिमान और कुशल है, वह परिस्थितियों के अनुसार किसी वस्तु को स्वीकार करेगा या उससे बचेगा। लेकिन जिन चीज़ों से वह बचता है उनसे वह भयभीत नहीं होता और जिन चीज़ों को वह चुनता है उनकी वह अंधी प्रशंसा भी नहीं करता, यदि उसका मन महान और अजेय है। 

    मैं तुम्हें स्वयं को नीचा दिखाने से रोकता हूँ। मैं तुम्हें निराश और हताश होने से भी रोकता हूँ। केवल परिश्रम से मुँह न मोड़ना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसका स्वागत करो। “लेकिन यदि वह काम अपमानजनक हो तो?” तुम कहते हो। “यदि वह अनावश्यक हो या तुच्छ कारणों से कराया जा रहा हो? क्या ऐसा परिश्रम बुरा नहीं है?” नहीं, वह उससे अधिक बुरा नहीं है जितना आकर्षक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए किया गया परिश्रम। तुम्हारी सहनशीलता स्वयं तुम्हारे साहस और आत्मबल का प्रमाण है। जब तुम कठिन कार्यों की ओर स्वयं को प्रेरित करते हुए कहते हो, “देर किस बात की? एक सच्चा पुरुष पसीने से नहीं डरता।”

    इसके अतिरिक्त, पूर्ण सद्गुण उस जीवन की समता और स्थिरता में निहित है जो सभी परिस्थितियों में स्वयं के साथ सामंजस्य बनाए रखता है। यह तब तक संभव नहीं जब तक मनुष्य को मानवीय तथा दैवीय विषयों का ज्ञान न हो और उनमें भेद करने की क्षमता न हो। यही सर्वोच्च कल्याण है। यदि तुम इसे प्राप्त कर लो तो तुम देवताओं के याचक नहीं बल्कि उनके सहचर बनने लगते हो।

    तुम पूछते हो, “मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?” तुम्हें न तो आल्प्स पर्वत को पार करना होगा, चाहे पेनाइन दर्रे से या ग्रेयन दर्रे से, न सिर्टियन उथले जलों में नौकायन करना होगा, न इलिरिया के दुर्गम पर्वतीय प्रदेशों को पार करना होगा और न ही उन जलडमरूमध्यों के निकट जाना होगा जहाँ स्किल्ला और कैरिब्डिस स्थित हैं। फिर भी तुम इन सब कठिनाइयों से केवल अपने उस तुच्छ प्रांतीय पद के लिए गुज़र चुके हो। नहीं, यह मार्ग सुरक्षित भी है और सुखद भी और ऐसा मार्ग है जिसके लिए प्रकृति ने तुम्हें पहले से ही सक्षम बनाया है। प्रकृति ने तुम्हें कुछ उपहार दिए हैं और यदि तुम उन्हें त्याग न दो तो तुम ऊपर उठकर देवता के समान हो जाओगे।

धन तुम्हें देवताओं के समान नहीं बना सकता क्योंकि ईश्वर के पास कोई संपत्ति नहीं होती। बैंगनी किनारी वाला वस्त्र भी तुम्हें ऐसा नहीं बना सकता क्योंकि ईश्वर वस्त्रहीन है। यश भी यह कार्य नहीं कर सकता न ही आत्म-प्रदर्शन और अपने नाम को दूर-दूर तक फैलाना क्योंकि किसी का भी ईश्वर से व्यक्तिगत परिचय नहीं है। बहुत-से लोग बिना किसी दंड के उसके बारे में बुरा सोचते हैं। न ही दासों का वह समूह जो नगर में और नगर के बाहर तुम्हारी पालकी उठाकर चलता है, तुम्हें धन्य बना सकता है क्योंकि सबसे महान और सबसे शक्तिशाली ईश्वर स्वयं ही सब कुछ वहन करता है। सौंदर्य और शारीरिक बल भी तुम्हें धन्यता प्रदान नहीं कर सकते क्योंकि इनमें से कोई भी वृद्धावस्था के आक्रमण को सहन नहीं कर पाता। इसलिए तुम्हें अपने प्रयास उस वस्तु के लिए करने चाहिए जो समय के साथ नष्ट नहीं होती और जिसे कोई बाधा रोक नहीं सकती। वह क्या है? वह है मन। परंतु ऐसा मन जो सीधा, महान और सद्गुणी हो। उसे तुम और क्या कहोगे, सिवाय इसके कि वह मानव शरीर में निवास करने वाला ईश्वर है?

    लेकिन तुम उस देवतुल्य स्वरूप को सोने या चाँदी से नहीं गढ़ सकते क्योंकि ऐसी सामग्रियों से ऐसी कोई प्रतिमा नहीं बनाई जा सकती जो वास्तव में ईश्वर के समान हो। यह बात याद रखो कि जब देवता मनुष्यों पर प्रसन्न और अनुकूल थे, तब उनकी प्रतिमाएँ मिट्टी की हुआ करती थीं।


अभी के लिए विदा 

ऐसा मन किसी मुक्त दास या साधारण दास में भी उतना ही पाया जा सकता है जितना कि रोमन अश्वारोही वर्ग के किसी व्यक्ति में।

आख़िर रोमन अश्वारोही, मुक्त दास या दास क्या हैं?

ये तो केवल महत्वाकांक्षा या अन्याय से उत्पन्न नाम मात्र हैं।

मनुष्य चूल्हे के एक छोटे-से कोने से भी स्वर्ग तक पहुँच सकता है।

अतः उठो, और स्वयं को भी ऐसा रूप दो जो देवत्व के योग्य हो।

Saturday, 4 July 2026

आत्मावलोकन के संदर्भ में -- पत्र 29 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

"तुम हमारे मित्र मार्सेलिनस के बारे में पूछते हो और जानना चाहते हो कि वह कैसा है। वह अब कम ही मिलने आता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उसे सत्य सुनने का भय है। लेकिन इस समय उसे उससे कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सत्य केवल उसी व्यक्ति से कहना चाहिए जो उसे सुनने के लिए तैयार हो।"


Rembrandt van Rjin

    इसी कारण लोग अक्सर डायोजनीज़ और अन्य सिनिक दार्शनिकों के बारे में संदेह व्यक्त करते हैं, जो वाणी की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग करते थे। वे जिस किसी से भी मिलते, उसे उपदेश देते थे। क्या वे ऐसा करने में सही थे? यदि वे लोग, जिन्हें डाँटा-फटकारा जा रहा था, बहरे और गूँगे होते—चाहे जन्म से या किसी रोग के कारण—तो क्या होता? तुम कहते हो, “शब्दों में कंजूसी क्यों की जाए? उनका कोई मूल्य तो नहीं है। मैं यह नहीं जान सकता कि जिसे मैं समझा रहा हूँ, उसकी सहायता कर पाऊँगा या नहीं। लेकिन यदि मैं बहुतों को समझाऊँ तो निश्चित ही किसी-न-किसी की सहायता कर दूँगा। मुझे तो बीज को व्यापक रूप से बिखेर देना चाहिए। यदि बहुत-से प्रयास किए जाएँ तो उनमें से कुछ न कुछ अवश्य सफल होंगे।” लेकिन, प्रिय ल्यूसीलियस, मुझे नहीं लगता कि किसी महान व्यक्ति को ऐसा करना चाहिए। इससे उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव कम हो जाता है। यदि वह अपने शब्दों को बहुत अधिक सामान्य बना दे तो उन्हीं लोगों के बीच उनका पर्याप्त महत्व नहीं रह जाता जिन्हें वह वास्तव में सुधार सकता था। एक धनुर्धर को कभी लक्ष्य भेदना और कभी चूकना नहीं चाहिए। जो कुछ संयोगवश परिणाम देता है, वह कोई कला नहीं है। बुद्धिमत्ता एक कला है। उसे निश्चित सफलता की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो उससे लाभ उठा सकें और उन लोगों से दूर रहना चाहिए जिनके लिए अब कोई आशा नहीं बची है। फिर भी, उन्हें बहुत जल्दी नहीं छोड़ देना चाहिए। निराशाजनक परिस्थितियाँ असाधारण उपायों की माँग करती हैं।

    लेकिन मैं अभी तक अपने मार्सेलिनस के विषय में निराश नहीं हुआ हूँ। उसे अभी भी बचाया जा सकता है, परंतु केवल तभी जब तुरंत उसकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाया जाए। वास्तव में यह भी खतरा है कि वह अपने उद्धारक को ही अपने साथ नीचे खींच ले क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत प्रबल है। पर इस समय उसका झुकाव बुराई की ओर है। फिर भी, मैं इस जोखिम का सामना करने जाऊँगा। मैं उसे उसकी त्रुटियाँ दिखाने का साहस करूँगा। वह वही करेगा जो वह प्रायः करता है। वह हर बात को ऐसे मज़ाक में उड़ा देगा कि शोकग्रस्त व्यक्ति भी हँस पड़े। पहले वह स्वयं का उपहास करेगा और फिर मेरा। मैं जो कुछ कहने वाला हूँ, वह उसकी हर बात को टालने का प्रयत्न करेगा। वह हमारे दर्शन-सम्प्रदाय की छानबीन करेगा और हमारे दार्शनिकों पर आरोप लगाने के लिए आपत्तियाँ खोज निकालेगा—कहीं धन-लाभ, कहीं प्रेमिकाएँ, कहीं पेटूपन। वह मुझे एक दार्शनिक दिखाएगा जो व्यभिचार में पकड़ा गया हो, दूसरे को किसी भोजनालय में और तीसरे को राजमहल में।

    वह मुझे मार्कस लेपिडस के दार्शनिक सलाहकार एरिस्टो का उदाहरण देगा, जो अपनी पालकी में यात्रा करते हुए ही व्याख्यान दिया करते थे, क्योंकि वे उस समय का उपयोग अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए तैयार करने में करते थे। जब किसी ने पूछा कि वह किस दार्शनिक विद्यालय से संबंधित हैं तो स्कौरस ने मज़ाक में कहा, “निश्चित रूप से वह पेरिपैटेटिक नहीं हैं!” जब उस प्रतिष्ठित पुरुष जूलियस ग्रेकिनुस से उनके बारे में राय पूछी गई तो उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता। मुझे तो यह भी नहीं पता कि वह पैदल चलकर क्या करते हैं।” मानो उनसे किसी रथ-चालक के बारे में पूछा गया हो!

    वे सभी ढोंगी लोग, जो दर्शन का व्यापार करते हैं और जिनके लिए दर्शन को हाथ न लगाना ही अधिक सम्मानजनक होता, मार्सेलिनस मेरे विरुद्ध उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगा। लेकिन मैंने उसके उपहास को सहने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे मुझे हँसी में उड़ाने का प्रयास करे। संभव है कि मैं उसे रुला दूँ। और यदि वह हँसता ही रहे तो भी मैं अपने दुःखों के बीच यह सोचकर प्रसन्न होऊँगा कि उस पर पागलपन का कम-से-कम एक प्रसन्नचित्त रूप तो आया है। किन्तु ऐसी प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं टिकती। ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो लोग अभी उन्मत्त होकर हँस रहे होते हैं, थोड़ी ही देर बाद वही लोग उन्मत्त होकर विलाप भी कर रहे होते हैं।

    मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं उसके पास जाऊँगा और उसे दिखाऊँगा कि जब बहुत-से लोग उसे कम मूल्य का समझते थे, तब भी वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान था। भले ही मैं उसके दोषों को पूरी तरह काट न सकूँ, कम-से-कम उनके बढ़ने को रोक दूँगा। वे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, लेकिन कुछ समय के लिए शांत अवश्य हो जाएँगे। और संभव है कि वे सचमुच समाप्त ही हो जाएँ, यदि यह विराम एक आदत बन जाए। इसे तुच्छ नहीं समझना चाहिए। वास्तव में, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो तो रोग का अच्छा विराम भी स्वास्थ्य के समान ही माना जाता है।

    जब तक मैं उसके लिए तैयारी कर रहा हूँ, तब तक तुम्हारे लिए ये मेरे निर्देश हैं। तुममें क्षमता है। तुम समझते हो कि तुम कहाँ रहे हो और अब कहाँ हो और इससे यह भी अनुमान लगा सकते हो कि तुम किस दिशा में जा रहे हो। अपने आचरण को व्यवस्थित करो। अपने मनोबल को ऊँचा उठाओ। भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु के सामने दृढ़ता से खड़े रहो। उन लोगों की परवाह मत करो जो तुम्हें डराने का प्रयास करते हैं। यदि कोई व्यक्ति उस स्थान पर भीड़ से डरता हो जहाँ एक समय में केवल एक ही व्यक्ति निकल सकता है तो वह कितना मूर्ख दिखाई देगा, है न? तुम्हारी मृत्यु के विषय में भी यही बात लागू होती है। यद्यपि बहुत-से लोग तुम्हें मृत्यु की धमकी दे सकते हैं पर वे सब एक साथ तुम्हारे पास नहीं पहुँच सकते। प्रकृति ने इस व्यवस्था को इसी प्रकार बनाया है। एक ही व्यक्ति तुमसे प्राण छीन लेगा, ठीक वैसे ही जैसे एक ही व्यक्ति ने तुम्हें प्राण दिए थे।

    यदि तुममें कुछ भी लज्जा होती तो तुम मुझे इस अंतिम भुगतान से मुक्त कर देते। लेकिन चूँकि मेरा ऋण अब लगभग समाप्त होने को है, इसलिए मैं कंजूसी नहीं करूँगा—नहीं, मैं भी नहीं! जो कुछ तुम पर मेरा बकाया है, उसे चुका दूँगा। मैंने कभी भी जनसाधारण को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं की क्योंकि वे मेरे ज्ञान को स्वीकार नहीं करते और मुझे उस बात का कोई ज्ञान नहीं है जिसे वे स्वीकार करते हैं।

    “यह किसने कहा?” तुम पूछते हो, मानो तुम्हें यह न मालूम हो कि मैं अपनी पूँजी कहाँ से लाता हूँ। यह एपिक्यूरस ने कहा था। लेकिन पेरिपैटेटिक, अकादमिक, स्टोइक और सिनिक—सभी दार्शनिक सम्प्रदायों के लोग एक स्वर में तुम्हें यही बात कहेंगे। आख़िर ऐसा कौन-सा व्यक्ति है जो सद्गुण को प्रिय मानता हो और साथ ही जनसाधारण का प्रिय भी हो? लोक-प्रशंसा तो दुष्कर्मों में निपुणता के द्वारा प्राप्त की जाती है। तुम्हें स्वयं को उनके जैसा बनाना पड़ता है। जब तक वे तुम्हें अपने जैसा न पहचान लें, वे तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे। किन्तु महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम दूसरों को कैसे दिखाई देते हो बल्कि यह है कि तुम स्वयं को कैसे देखते हो। जब लोग निकृष्ट हों, तब उनकी प्रेम-प्राप्ति किसी ऐसे उपाय से नहीं की जा सकती जो स्वयं निकृष्ट न हो।

    तो फिर दर्शन से तुम्हें क्या लाभ मिलेगा जबकि उसका इतना सम्मान किया जाता है और वह सभी कलाओं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों से कहीं श्रेष्ठ है? बस यही कि तुम लोगों को प्रसन्न करने की अपेक्षा स्वयं को प्रसन्न करना अधिक पसंद करोगे, कि तुम अपने बारे में किए जाने वाले निर्णयों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता की चिंता करोगे, कि तुम देवताओं और मनुष्यों—दोनों के भय से मुक्त होकर जीवन बिताओगे और यह कि तुम या तो अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करोगे अथवा उनका अंत कर दोगे। इसके विपरीत, यदि मैं तुम्हें सामान्य भीड़ द्वारा अत्यधिक सराहा जाता देखूँ, यदि तुम्हारे आने पर वैसे ही शोर और तालियाँ गूँजें जैसी मूकाभिनय के प्रदर्शनों में गूँजती हैं, यदि नगर भर में स्त्रियाँ और बालक तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते फिरें तो मुझे तुम पर दया आएगी। और क्यों न आए? क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए तुमने कौन-सा मार्ग अपनाया है।

अभी के लिए विदा 

अपने दोषों को पहचानकर उपचार करने के संदर्भ में -- पत्र - 28 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा केवल तुम्हारे साथ ही हुआ है? क्या तुम्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि इतने व्यापक भ्रमण के बाद, इतने विविध स्थानों पर जाने के बाद भी, तुम अपने मन की उदासी और बोझिलता को दूर नहीं कर पाए? मानो यह कोई नई बात हो! तुम्हें स्थान नहीं, अपने मन को बदलना चाहिए। चाहे तुम समुद्र पार कर लो, चाहे — जैसा हमारे कवि वर्जिल ने कहा है, “भूमियाँ और नगर पीछे छूटते चले जाएँ”, फिर भी तुम्हारे दोष और कमज़ोरियाँ तुम्हारे साथ-साथ चलती रहेंगी, जहाँ कहीं भी तुम जाओगे।


By Adolph Tidemand 

    तुम्हारी ही तरह शिकायत करने वाले एक व्यक्ति से सुकरात (Socrates) ने कहा था, “तुम्हें यह देखकर आश्चर्य क्यों होता है कि यात्रा से तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ जबकि तुम स्वयं अपनी ही संगति में यात्रा कर रहे हो? जो चीज़ तुम्हारे मन पर बोझ बनी हुई है, वही तुम्हें घर से बाहर भी ले गई थी।” नए देशों से तुम्हें क्या लाभ होगा? नगरों और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किस काम आएगा? अंततः तुम्हारी यह सारी भागदौड़ व्यर्थ सिद्ध होगी। क्या तुम पूछते हो कि तुम्हारा यह पलायन क्यों निष्फल है? इसका कारण यह है कि तुम स्वयं को अपने साथ लिए फिरते हो।

    तुम्हें अपने मन पर पड़े हुए बोझ को उतार फेंकना होगा। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे तब तक कोई भी स्थान तुम्हें सुखद नहीं लगेगा। समझो कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति वैसी ही है जैसी वर्जिल (Virgil) ने सिबिल (भविष्यवक्ता स्त्री) के बारे में वर्णित की है। उस समय जब वह व्याकुल और उन्मत्त हो उठती है क्योंकि उसके भीतर एक विशाल शक्ति निवास कर रही होती है जो उसकी अपनी नहीं है, “वह भविष्यवक्ता उछलती है, तड़पती है और अपने हृदय से उस देवता को बाहर झटक देने का प्रयास करती है।” तुम भी उसी प्रकार भीतर से अशांत हो। तुम्हारा मन अनेक चिंताओं, इच्छाओं और व्याकुलताओं से भरा हुआ है। उनसे मुक्त हुए बिना न तो तुम्हें शांति मिलेगी न किसी स्थान में संतोष।

    तुम इधर-उधर भटकते फिरते हो, अपने ऊपर पड़े बोझ को झटककर उतार फेंकने की कोशिश में। परंतु जितना अधिक तुम भागते-दौड़ते हो, वह बोझ उतना ही अधिक भारी और कष्टदायक हो जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी जहाज़ का माल। यदि वह ठीक प्रकार से रखा गया हो तो जहाज़ पर उसका बहुत कम प्रभाव पड़ता है। लेकिन यदि वह इधर-उधर खिसकने लगे तो शीघ्र ही जहाज़ का एक भाग नीचे झुकने लगता है और वह संकट में पड़ जाता है। इसी प्रकार, तुम जो कुछ भी करते हो, वह अंततः तुम्हारे ही विरुद्ध काम करता है। तुम्हारी हर गतिविधि तुम्हें ही हानि पहुँचाती है क्योंकि तुम एक ऐसे व्यक्ति को झकझोर रहे हो जो पहले से ही बीमार है।

    लेकिन जब तुम्हारे भीतर जो कुछ विकृत और अशांत है, वह दूर हो जाएगा, तब हर स्थान-परिवर्तन तुम्हें सुखद लगने लगेगा। यदि तुम्हें पृथ्वी के सबसे दूरस्थ कोनों में भी निर्वासित कर दिया जाए तब भी तुम जिस किसी बर्बर या अपरिचित प्रदेश में पहुँचोगे, उसे अपने लिए एक आतिथ्यपूर्ण आश्रय के रूप में पाओगे। तुम कहाँ जाते हो, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि जाते समय तुम स्वयं कैसे व्यक्ति हो। इसी कारण हमें अपने मन को किसी एक स्थान से बाँधकर नहीं रखना चाहिए। हमें इस विश्वास के साथ जीना चाहिए, “मेरा जन्म केवल किसी एक स्थान के लिए नहीं हुआ है। यह समस्त संसार ही मेरी मातृभूमि है।” यदि यह बात तुम्हारे लिए स्पष्ट होती तो तुम्हें यह देखकर आश्चर्य न होता कि हर बार किसी स्थान से ऊब जाने पर दूसरे प्रदेश में जाने से भी तुम्हें कोई लाभ नहीं मिलता। यदि तुम सचमुच यह मानते कि प्रत्येक प्रदेश तुम्हारा अपना है तो जिस पहले स्थान पर तुम थे, उसी में संतुष्ट हो गए होते।

    वास्तव में, तुम यात्रा कम और भटकाव अधिक कर रहे हो। तुम एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जा रहे हो। फिर उसे छोड़कर किसी और स्थान पर पहुँच जाते हो। लेकिन जिस वस्तु की तुम खोज कर रहे हो अर्थात् अच्छा जीवन जीने की कला, वह तो हर स्थान पर प्राप्त की जा सकती है। क्या किसी नगर का बाज़ार (फोरम) जितना शोरगुल वाला कोई और स्थान हो सकता है? फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वहाँ भी शांतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है। फिर भी, यदि मुझे अपनी इच्छा से रहने का स्थान चुनने की स्वतंत्रता हो तो मैं उस मोहल्ले से भी दूर रहना पसंद करूँगा जहाँ से बाज़ार दिखाई देता हो। क्योंकि जिस प्रकार कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो सबसे सुदृढ़ और स्वस्थ शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, उसी प्रकार कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जो उस मन के लिए अनुकूल नहीं होते जो अच्छा तो है पर अभी शक्ति प्राप्त कर रहा है और पूर्णता तक नहीं पहुँचा है। अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि अच्छा जीवन केवल स्थान बदलने से नहीं मिलता। फिर भी वह ऐसे वातावरण का चयन करता है जो उसके चरित्र, आत्मसंयम और आंतरिक विकास के लिए सहायक हो। जो मन अभी साधना के मार्ग पर है, उसे अनावश्यक विकर्षणों और प्रलोभनों से बचाना भी आवश्यक है।

    मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो स्वयं को लहरों के बीच झोंक देते हैं, जो कोलाहल और हलचल भरे जीवन को उचित मानते हैं और प्रतिदिन कठिन परिस्थितियों से जूझने को ही आदर्श समझते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों को सहन तो कर लेगा पर उन्हें स्वयं नहीं चुनेगा। वह संघर्ष और युद्ध जैसी जीवन-स्थिति के बजाय शांत और स्थिर जीवन को प्राथमिकता देगा। यदि तुमने अपने स्वयं के दोषों से छुटकारा पा लिया है तो फिर दूसरों के दोषों से लगातार लड़ते रहने में बहुत लाभ नहीं है। कोई कह सकता है, “तीस अत्याचारियों ने सुकरात (Socrates) को गिरफ्तार कर लिया था। फिर भी वे उसके मनोबल को तोड़ नहीं सके।” तो इससे क्या अंतर पड़ता है कि मालिक या उत्पीड़क कितने हैं? दासता तो अंततः एक ही चीज़ है। जो व्यक्ति उस एक चीज़, दासता को तुच्छ समझना सीख लेता है, वह स्वतंत्र है, चाहे उसके चारों ओर अत्याचार करने वालों की कितनी ही बड़ी भीड़ क्यों न खड़ी हो।

    अब विदा लेने का समय आ गया है। लेकिन पहले मुझे अपना बंदरगाह-कर चुका देना चाहिए, “अपने दोषों की पहचान ही उपचार का प्रारंभ है।” मुझे लगता है कि यहाँ एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही है। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह गलत कर रहा है, वह स्वयं को सुधारने की इच्छा भी नहीं रखता। अपने को सुधारने से पहले तुम्हें अपनी गलती का एहसास होना चाहिए। कुछ लोग तो अपने दोषों पर गर्व करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोगों के मन में उपचार का कोई विचार होगा? निश्चय ही नहीं क्योंकि वे अपनी बुरी आदतों को ही गुण समझते हैं।

    अपने विरुद्ध यथासंभव कठोर आरोप लगाओ। फिर जाँच-पड़ताल करो। पहले अभियोग लगाने वाले की भूमिका निभाओ, फिर न्यायाधीश की, और अंत में पक्ष-वकील की। कभी-कभी स्वयं को दोषी ठहराओ!

अभी के लिए विदा 

मन की उत्कृष्टता के संदर्भ में -- पत्र - 27 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

“तुम कहते हो, ‘तुम मुझे उपदेश कैसे दे सकते हो? क्या तुमने पहले स्वयं को उपदेश दे लिया है? क्या तुमने अपने जीवन को पूरी तरह व्यवस्थित कर लिया है? क्या इसी कारण तुम्हारे पास दूसरों को सुधारने का समय है?’ मैं इतना पाखंडी नहीं हूँ कि स्वयं बीमार रहते हुए दूसरों को उपचार बताऊँ। नहीं, मैं भी मानो उसी रोगियों के वार्ड में पड़ा हूँ, जहाँ तुम हो। मैं तुमसे हमारी साझा बीमारी के बारे में बात कर रहा हूँ और उन उपायों को बाँट रहा हूँ जो हम दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए मेरी बात ऐसे सुनो जैसे मैं स्वयं से बात कर रहा हूँ। मैं तुम्हें अपने निजी कक्ष में आने दे रहा हूँ और तुम्हारे सामने खड़े रहते हुए स्वयं को ही निर्देश दे रहा हूँ।”


Art by Suza 

    मैं स्वयं से स्पष्ट और ऊँचे स्वर में कहता हूँ, “अपने बीते वर्षों की गिनती करो और तब तुम्हें लज्जा होगी कि आज भी तुम्हारी इच्छाएँ और संकल्प वही हैं जो बचपन में थे। अपने जीवन के अंतिम दिन के निकट आते समय स्वयं को यह उपहार दो कि तुम्हारे दोष तुमसे पहले ही मर जाएँ। उन उथल-पुथल मचाने वाली इच्छाओं को त्याग दो, जिन्होंने तुम्हें इतनी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया है। वे न केवल पहले से हानि पहुँचाती हैं बल्कि बाद में भी कष्ट देती हैं। जिस प्रकार अपराध किए जाने के बाद, भले ही वे पकड़े न जाएँ, उनका भय और चिंता मन से नहीं जाती, उसी प्रकार अनुचित इच्छाओं के समाप्त हो जाने पर भी उनका पश्चाताप बना रहता है। वे न तो स्थायी हैं, न विश्वसनीय। यदि वे कोई प्रत्यक्ष हानि न भी पहुँचाएँ तब भी वे क्षणभंगुर हैं।

    इसके बजाय चारों ओर देखो और ऐसे कल्याण की खोज करो जो बना रहे। ऐसा कोई कल्याण नहीं है, सिवाय उसके जिसे मन स्वयं अपने भीतर से खोज निकालता है। केवल सद्गुण ही स्थायी और निर्विघ्न आनंद प्रदान करता है। यदि कभी उस आनंद के मार्ग में कोई बाधा आ भी जाए तो वह केवल उतनी ही देर के लिए होती है जितनी देर बादल दिन के प्रकाश को ढँकते हैं, वे उसके नीचे से गुजर जाते हैं पर कभी उसे पराजित नहीं कर पाते।” तुम्हें वह आनंद कब प्राप्त होगा? अब तक तुम निष्क्रिय नहीं रहे हो पर अब अपनी गति बढ़ाओ। अभी बहुत काम शेष है। यदि तुम परिणाम चाहते हो तो आवश्यक ध्यान और परिश्रम तुम्हें स्वयं ही करना होगा। यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे किसी दूसरे को सौंपा जा सके।

    साहित्यिक कार्य का एक ऐसा प्रकार भी है जिसमें दूसरों की सहायता ली जा सकती है। मेरी स्मृति में एक व्यक्ति था जिसका नाम कैल्विसियस सबिनुस था। वह अत्यंत धनवान था पर उसका स्वभाव किसी मुक्तदास (पूर्व दास) जैसा था। मैंने कभी इतना अशिष्ट और भद्दे आचरण वाला व्यक्ति इतनी बड़ी संपत्ति का स्वामी नहीं देखा।

    उसकी स्मरणशक्ति इतनी कमजोर थी कि कभी वह यूलिसीस का नाम भूल जाता, कभी अकिलीस का तो कभी प्रियम का। इन व्यक्तियों को वह उतना ही जानता था जितना हम अपने बचपन से साथ रहे सेवकों को जानते हैं। वृद्ध नाम-घोषक (नॉमेनक्लेटर) जब किसी का नाम याद नहीं रख पाता तो वह कोई नाम गढ़ लेता है। पर जितने गलत नामों से कैल्विसियस ट्रोजनों और आखैयनों को पुकारता था, उतनी गलतियाँ शायद ही किसी ने की हों। फिर भी वह विद्वान दिखाई देना चाहता था। इसलिए उसने एक उपाय निकाला। उसने बहुत धन खर्च करके दास खरीद लिए। उनमें से एक को होमर का संपूर्ण काव्य कंठस्थ था, दूसरे को हेसियड का और नौ अन्य दासों को अलग-अलग गीतिकवियों की रचनाएँ याद कराई गई थीं। इस पर भारी खर्च होना स्वाभाविक था क्योंकि जो दास इस योग्य नहीं मिलते थे, उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित करवाया जाता था।

    जब उसने यह पूरा दल एकत्र कर लिया तो वह अपने भोज-मेहमानों को परेशान करने लगा। वे दास उसके पैरों के पास खड़े रहते थे। वह उनसे उद्धृत करने के लिए पंक्तियाँ पूछता रहता था। फिर भी, जबकि वे हर समय उसकी सहायता के लिए मौजूद रहते थे, वह अक्सर किसी वाक्य के बीच में ही रुक जाता और आगे नहीं बढ़ पाता।

    सैटेलियस क्वाड्राटुस नाम का एक व्यक्ति था। वह धनी और मूर्ख लोगों का लाभ उठाया करता था। वह उनकी खुशामद भी करता था। जैसा कि अक्सर ऐसे लोगों के साथ होता है, उनका उपहास भी उड़ाता था। उसी ने सबिनुस को यह विश्वास दिला दिया कि उसके भोजन परोसने वाले सेवक भी साहित्य के विद्वान होने चाहिए। जब सबिनुस ने कहा कि ऐसे दासों पर उसे प्रति व्यक्ति एक लाख सेस्टर्सेस खर्च करने पड़े हैं तो सैटेलियस ने उत्तर दिया, “इतने धन में तो तुम कई पुस्तकालय खरीद सकते थे।” लेकिन सबिनुस का मानना था कि उसके घर के किसी भी सदस्य के पास जो ज्ञान है, वह मानो उसका अपना ही ज्ञान है। फिर उसी सैटेलियस ने उसे कुश्ती सीखने के लिए भी प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जबकि सबिनुस शारीरिक रूप से दुर्बल, पीला और रोगग्रस्त था। जब सबिनुस ने कहा, “मैं यह कैसे कर सकता हूँ? मैं तो मुश्किल से जीवित हूँ।” सैटेलियस ने उत्तर दिया, “अरे, ऐसी बात मत कहो! क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि तुम्हारे पास कितने स्वस्थ और बलवान दास हैं?” मन की उत्कृष्टता न तो उधार ली जा सकती है और न खरीदी जा सकती है। मुझे तो लगता है कि यदि वह बिक्री के लिए उपलब्ध भी होती तब भी उसका कोई खरीदार न मिलता। लेकिन दुष्टता ऐसी चीज़ है जिसे लोग प्रतिदिन खरीदते रहते हैं।

    लेकिन पहले वह देन ले लो जो मैं तुम्हारा ऋणी हूँ और फिर विदा लो, “जो निर्धनता प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं के अनुसार स्वयं को ढाल लेती है, वही वास्तविक संपत्ति है।” एपिक्यूरस इस बात को अपने अनेक स्थानों पर बार-बार कहता है। परंतु किसी बात को तब तक बार-बार कहना अधिक नहीं कहलाता, जब तक वह भली-भाँति सीखी और आत्मसात न कर ली जाए। कुछ लोगों को केवल उपचार दिखा देना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके लिए उन उपचारों को बार-बार और दृढ़ता से मन में बैठाना पड़ता है।

Friday, 3 July 2026

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका हूँ। अब मेरी आयु और निश्चित रूप से मेरा शरीर, किसी दूसरे नाम के योग्य हैं। क्योंकि 'वृद्ध' शब्द उस आयु के लिए है जो बहुत आगे बढ़ चुकी हो न कि उस अवस्था के लिए जिसमें शरीर टूटने-बिखरने लगे। इसलिए मुझे उन जर्जर लोगों में गिनो जो जीवन के अंतिम छोर के बहुत निकट पहुँच चुके हैं।

जैक्स लुईस डेविड द्वारा 

    फिर भी, मैं तुम्हारी उपस्थिति में स्वयं को धन्यवाद देता हूँ कि जहाँ मुझे अपने शरीर में दुर्बलता का अनुभव होता है वहीं अपने मन में मुझे किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता। केवल मेरे दोष ही बूढ़े हुए हैं। मेरे वे हिस्से जो उन दोषों की सेवा करते हैं। मेरा मन अब भी स्फूर्तिवान है और इस बात से प्रसन्न है कि उसे मेरे शरीर के साथ बहुत कम काम करना पड़ता है। उसने अपने बोझ का बड़ा भाग उतार फेंका है। वह मानो उछल-कूद कर रहा है और बुढ़ापे के विषय में मुझसे वाद-विवाद करता है। उसका कहना है कि यही उसका उत्कर्षकाल है। आओ, उसकी बात पर विश्वास करें और उसे उसके स्वाभाविक एवं उचित लाभों का पूरा उपयोग करने दें।

    मेरा मन मुझसे कहता है कि मैं इस विषय पर विचार करूँ और यह समझूँ कि मेरी शांति तथा संयमित जीवन-शैली में कितना योगदान बुद्धि का है और कितना मेरी आयु का। साथ ही, मुझे सावधानी से यह भेद करना चाहिए कि कौन-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं कर नहीं सकता और कौन-सी ऐसी हैं जिन्हें मैं करना ही नहीं चाहता। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ऐसी बात हो जिसे न कर पाने पर मुझे प्रसन्नता होती है तो मैं उसे ऐसी चीज़ मानूँ जिसे मैं करना ही नहीं चाहता। शिकायत करने की आखिर क्या बात है? यदि वह सब, जिसका समाप्त होना आवश्यक था, वास्तव में समाप्त हो गया है तो इसमें समस्या ही क्या है?

    “यह तो बहुत बड़ी समस्या है,” तुम कहते हो, “कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे मुरझाए और नष्ट हो जाए और यदि ठीक-ठीक कहूँ तो पिघलता चला जाए। क्योंकि हम एक ही झटके में धराशायी नहीं होते; बल्कि हम थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हैं, क्योंकि हर दिन हमारी शक्ति का कुछ अंश छीन लेता है।” तो यदि हमारा स्वभाव इसी प्रकार धीरे-धीरे अपने अंत की ओर ढल रहा है तो क्या इससे बेहतर कोई मार्ग हो सकता है? ऐसा नहीं कि अचानक आघात से या जीवन से तत्काल विदा हो जाना कोई बुरी बात है किन्तु यह तो सबसे सहज मार्ग है, बस चुपचाप फिसलते हुए चले जाना।

    जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं स्वयं को ऐसे परखता हूँ मानो परीक्षा की घड़ी निकट आ रही हो, मानो वह दिन सामने खड़ा हो जो मेरे समस्त वर्षों का निर्णय करने वाला है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “अब तक मेरे शब्द और कर्म कुछ भी सिद्ध नहीं करते। वे तो साहस के केवल छोटे और भ्रामक प्रमाण हैं, जो बहुत-सी डींगों और खोखली बातों में लिपटे हुए हैं। मृत्यु ही मुझे बताएगी कि मैंने वास्तव में कितनी प्रगति की है।” इसीलिए मैं निडर होकर उस दिन की तैयारी करता हूँ जब सारे छल और सारे मुखौटे उतर जाएँगे और मैं स्वयं अपना न्याय करूँगा। क्या यह केवल साहसपूर्ण बातें हैं या मैं वास्तव में वही कहता हूँ जो सोचता हूँ? भाग्य के विरुद्ध जो चुनौतीपूर्ण शब्द मैंने कहे थे, क्या वे सचमुच वास्तविक थे या वे केवल रंगमंच का अभिनय थे—सिर्फ़ एक भूमिका निभाना?

    “दूसरों के आकलनों को दूर फेंक दो। वे हमेशा अविश्वसनीय और परस्पर विरोधी होते हैं। जीवनभर चलने वाले अध्ययन-कार्यक्रमों को भी छोड़ दो क्योंकि शीघ्र ही, अब किसी भी क्षण, मृत्यु तुम्हारा निर्णय करने वाली है। मेरा आशय यही है। व्याख्यान, विद्वत्-गोष्ठियाँ, दार्शनिकों की शिक्षाओं से चुने गए कथन और शिक्षित लोगों की बातचीत—ये सब मन की वास्तविक शक्ति को प्रकट नहीं करते। क्योंकि वाणी तो वहाँ भी निर्भीक होती है जहाँ बोलने वाला व्यक्ति अत्यन्त भयभीत होता है। तुमने वास्तव में क्या प्राप्त किया है, यह तभी प्रकट होगा जब तुम अपनी अंतिम साँस लोगे। मैं इस निर्णय को स्वीकार करता हूँ, उसके न्याय से मैं तनिक भी नहीं डरता।”

    ये बातें मैं अपने आप से कहता हूँ लेकिन मान लो कि मैंने इन्हें तुमसे भी कही हैं। तुम मुझसे युवा हो पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है? वर्षों का वितरण किसी निश्चित हिस्से या कोटे के अनुसार नहीं किया जाता। यह जानने का कोई उपाय नहीं कि मृत्यु किस मोड़ पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए तुम्हें हर मोड़ पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

    अच्छा, मैं यहीं रुकना चाहता था। मेरा हाथ पत्र समाप्त करने के लिए हस्ताक्षर करने ही वाला था। लेकिन मुझे हिसाब चुकता करना है और इस पत्र को उसकी यात्रा-व्यय राशि भी देनी है। मान लो कि मैं यह न बताऊँ कि मैं अपना ऋण कहाँ से ले रहा हूँ। तुम जानते ही हो कि मैं किसकी धन-पेटी का उपयोग करता हूँ। मुझे थोड़ा समय दो। भुगतान घर से आ जाएगा तब तक के लिए यह उधार एपिक्यूरियस देगा। वह कहता है, “मृत्यु का अभ्यास करो।” यदि इस विचार को अधिक पूर्ण रूप में बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए, “मृत्यु को भली-भाँति समझना और सीख लेना एक उत्कृष्ट बात है।”

    शायद तुम सोचते हो कि ऐसी चीज़ सीखना समय की बर्बादी है जिसका उपयोग तुम्हें केवल एक ही बार करना होगा। लेकिन यही तो कारण है कि हमें उसका अभ्यास करना चाहिए। यदि हम यह परख ही नहीं सकते कि हमने उसे सीखा है या नहीं, तो हमें उसे निरंतर सीखते रहना चाहिए। “मृत्यु का अभ्यास करो”, जो यह कहता है, वह वास्तव में हमें स्वतंत्रता का अभ्यास करने को कहता है। जिसने मृत्यु को सीख लिया, उसने दासता को भुला दिया। क्योंकि मृत्यु सभी शक्तियों से ऊपर है और निस्संदेह उन सबकी पहुँच से बाहर है। मृत्यु को कारागार, बेड़ियों या कैदखाने से क्या लेना-देना? उसका द्वार तो सदा खुला रहता है। केवल एक ही जंजीर है जो हमें बाँधे रखती है—जीवन के प्रति हमारा मोह। यह सच है कि हम उसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते। फिर भी हमें उसे कम अवश्य करना चाहिए ताकि जब परिस्थितियाँ हमसे कुछ माँगें तो कोई चीज़ हमें रोक न सके और न ही हमें उस कार्य को तुरंत करने के लिए तैयार होने से वंचित करे जिसे किसी न किसी दिन करना ही है।

Thursday, 2 July 2026

प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा काम उन लोगों से है जिनके बारे में तुमने लिखा है? तुम्हारा सबसे बड़ा काम तो स्वयं अपने साथ है। समस्या वास्तव में तुम ही हो। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। तुम सम्मानजनक और सदाचारी आचरण की प्रशंसा तो करते हो पर उसका अनुसरण कम करते हो। तुम यह देख लेते हो कि सुख कहाँ है लेकिन उसे पाने का साहस नहीं जुटा पाते। इसलिए, क्योंकि तुम्हें यह स्पष्ट समझ नहीं है कि तुम्हें आगे बढ़ने से क्या रोक रहा है, मैं तुम्हें बतलाऊँगा।

By Giulio Vittini 

    तुम यह मानते हो कि जिन चीज़ों को तुम पीछे छोड़ने वाले हो, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। और जब तुम उस शांति की ओर नज़रें टिकाते हो जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। तब भी तुम उस जीवन की चमक पर ठहर जाते हो जिसे तुम पीछे छोड़ रहे हो ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति कीचड़ और अँधेरे में उतरने वाला हो। तुम भूल कर रहे हो, लूसीलियस! इस जीवन से उस जीवन की ओर जाना नीचे उतरना नहीं बल्कि ऊपर उठना है। तुम जानते हो कि आभा (glow) और झलकती चमक (gleam) में क्या अंतर है। एक अपने स्वयं के निश्चित स्रोत से प्रकाश देती है जबकि दूसरी किसी और से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करती है। इसी प्रकार इस जीवन और उस जीवन में भी अंतर है। यह जीवन ऐसी चमक से प्रकाशित है जो इसके बाहर से आती है। इसलिए जो भी उसके और प्रकाश के बीच आ जाए, वह इसे गहरे अँधेरे में डुबो सकता है। परन्तु वह जीवन अपने ही प्रकाश और तेज से आलोकित है। उसकी ज्योति उसकी अपनी है।

    तुम्हारा अध्ययन तुम्हें प्रसिद्ध बनाएगा। इस विषय में मैं एपिक्यूरस का एक उदाहरण प्रस्तुत करूँगा। जब वह इडोमिनीअस (Idomeneus) को पत्र लिख रहा था और उसे बाहरी आडंबर तथा दिखावटी जीवन से हटाकर विश्वसनीय और स्थायी यश की ओर लौटने के लिए बुला रहा था (यद्यपि उस समय इडोमेनेउस एक शक्तिशाली राजा का सहायक था और बड़े-बड़े कार्यों का भार संभाल रहा था), तब उसने कहा,  “यदि यश तुम्हारे लिए महत्त्व रखता है तो मेरे पत्र तुम्हें उन सभी बातों से अधिक प्रसिद्ध बनाएँगे जिनमें तुम इस समय लगे हुए हो और जिनके कारण दूसरे लोग तुम्हारी ओर आकर्षित होते हैं।”

    क्या वह सत्य नहीं कह रहा था? यदि एपिक्यूरस ने इडोमिनीअस को पत्र न लिखे होते तो उसके बारे में कौन जानता? वे सभी शक्तिशाली शासक और क्षत्रप, यहाँ तक कि वह राजा भी जिसने इडोमिनीअस को उसका पद प्रदान किया था, आज गुमनामी की गहराइयों में दफन हो चुके हैं। सिसरो के पत्र ही हैं जो एटिकस के नाम को नष्ट होने से बचाए हुए हैं। उससे उसे कोई लाभ न होता कि एग्रीप्पा ने उसकी पुत्री से विवाह किया था और टाइबेरियस ने उसकी पौत्री से या कि ड्रूसस सीज़र उसका प्रपौत्र था। इतने महान नामों के बीच उसका अपना नाम अब नहीं लिया जाता, यदि सिसरो ने उसे अपने पत्रों का प्राप्तकर्ता न बनाया होता। समय की वह खाई जो हम सबको अपने भीतर समेट लेगी, अत्यन्त गहरी है। कुछ ही प्रतिभाशाली मस्तिष्क उसके ऊपर अपना सिर उठा पाते हैं और यद्यपि अंततः उन्हें भी मौन में विलीन होना पड़ता है। फिर भी वे लंबे समय तक विस्मृति का प्रतिरोध करते हैं और अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करते रहते हैं।

    जो वचन एपिक्यूरस अपने मित्र को दे सका था, वही वचन मैं तुम्हें देता हूँ, लूसीलियस। मैं आने वाली पीढ़ियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करूँगा और अपने साथ दूसरों के नाम भी ले जा सकूँगा ताकि वे भी स्थायी रूप से बने रहें। हमारे कवि वर्जिल ने दो व्यक्तियों को चिरस्थायी स्मरण का वचन दिया था और वास्तव में उन्हें प्रदान भी किया:

“हे सौभाग्यशाली युगल! यदि मेरी कविताओं में कुछ सामर्थ्य है... 
तो कोई भी आने वाला दिन तुम्हें युगों की स्मृति से कभी मिटा नहीं सकेगा। 
जब तक एनीअस की संतति अटल कैपिटोल की चट्टान पर निवास करती रहेगी, 
और जब तक रोमन जाति का अधिपति शासन करता रहेगा,
तब तक तुम्हारा स्मरण भी बना रहेगा।”

    जिन लोगों को भाग्य ने घटनाओं और सत्ता के केंद्र में पहुँचा दिया है, जो दूसरों की शक्ति के सहभागी और भागीदार रहे हैं, उन्हें बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उनके यहाँ आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती है। परन्तु यह सब तब तक ही रहता है जब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। जैसे ही वे चले जाते हैं, उनका स्मरण भी समाप्त हो जाता है। किन्तु प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व का सम्मान समय के साथ बढ़ता जाता है। और यह सम्मान केवल स्वयं उन रचनाकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उन सभी बातों तक फैल जाता है जो उनकी स्मृति से जुड़ी होती हैं।
    
    अब मैं इडोमिनीअस को अपने पत्र में यूँ ही निःशुल्क स्थान नहीं दूँगा! उसे इसका मूल्य स्वयं चुकाना होगा। उसी को एपिक्यूरस ने वह सुंदर वचन लिखकर भेजा था जिसमें उसने उसे पायथोक्लीज़ को एक असाधारण और निस्संदिग्ध ढंग से समृद्ध बनाने की प्रेरणा दी थी। वह कहता है:

“यदि तुम पायथोक्लीज़ को धनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके धन में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए।”

    यह कथन इतना स्पष्ट है कि उसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं और इतना सुंदर ढंग से कहा गया है कि उसमें किसी सुधार की भी आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि इसे केवल धन-संपत्ति के संदर्भ में मत समझो। जहाँ कहीं भी इसे लागू किया जाएगा, इसका अर्थ वही रहेगा। यदि तुम पायथोक्लीज़ को सम्माननीय बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके सम्मान और पुरस्कारों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ निरंतर आनंद का अनुभव करे तो तुम्हें उसके सुखों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ एक लंबा और पूर्ण जीवन जिए तो तुम्हें उसके वर्षों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। तुम्हें इन कथनों को केवल एपिक्यूरस की संपत्ति नहीं समझना चाहिए; ये तो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। मेरा विचार है कि दार्शनिकों को सीनेट की प्रथा अपनानी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा मत प्रस्तुत करता है जिसका कुछ भाग मुझे पसंद आता है तो मैं उससे उसके मत को विभाजित करने के लिए कहता हूँ। फिर मैं उस भाग का अनुसरण करता हूँ जिसे मैं स्वीकार करता हूँ।

    एपिक्यूरस के ये उत्कृष्ट कथन एक और उद्देश्य भी पूरा करते हैं। यही कारण है कि मैं उनका उल्लेख करने के लिए और भी अधिक इच्छुक हूँ। वे उन लोगों को भी प्रमाणित करते हैं, जो निकृष्ट उद्देश्यों से उसकी शरण लेते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ उन्हें अपने दोषों के लिए आड़ मिल जाएगी कि वे जहाँ कहीं भी जाएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक और सदाचारपूर्ण जीवन ही जीना चाहिए। जब तुम एपिक्यूरस के उद्यानों में पहुँचोगे और वहाँ यह लिखित वचन देखोगे:

    “हे अतिथि, यहाँ तुम्हारा उत्तम सत्कार होगा; यहाँ सुख को सर्वोच्च कल्याण माना जाता है।”

    तब उस गृह का संरक्षक तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार मिलेगा। वह आतिथ्य और सद्भाव के साथ तुम्हें दलिये की एक थाली और पानी का एक भरपूर पात्र परोसेगा और कहेगा, “क्या यह उत्तम आतिथ्य नहीं है?” वह कहेगा, “ये उद्यान भूख को भड़काते नहीं बल्कि उसे शांत करते हैं। ये ऐसे पेय नहीं देते जो पीने वाले को और अधिक प्यासा बना दें बल्कि प्यास को उसके स्वाभाविक उपचार से बुझाते हैं, जो बिना किसी मूल्य के उपलब्ध है। यही वह सुख है जिसमें मैंने अपना जीवन बिताया है और इसी में वृद्धावस्था तक पहुँचा हूँ।”

    मैं अभी तुमसे उन इच्छाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें केवल समझाने-बुझाने से शांत नहीं किया जा सकता बल्कि जिन्हें समाप्त करने के लिए कुछ वास्तविक वस्तु देनी पड़ती है। जहाँ तक उन अनावश्यक इच्छाओं का संबंध है जिन्हें टाला जा सकता है, डाँटकर रोका जा सकता है या दबाया जा सकता है। मैं तुम्हें केवल इतना स्मरण दिलाता हूँ कि ऐसा सुख प्राकृतिक तो है पर आवश्यक नहीं। तुम उस पर किसी प्रकार के ऋणी नहीं हो जो कुछ भी तुम उसे देते हो, वह स्वेच्छा से देते हो। पेट उपदेश नहीं सुनता। वह केवल अपनी माँग करता है और आग्रह करता है। फिर भी वह कोई कठिन लेनदार नहीं है। उसे बहुत थोड़े में टाला जा सकता है। यदि तुम उसे उतना ही दो जितना उसका अधिकार है न कि उतना जितना तुम दे सकते हो।

अभी के लिए विदा 




थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग तीन: एस्तेबान)

  भाग तीन : एस्तेबान एक सुबह सान्ता मारिया रोज़ा दे लास रोज़ास के कॉन्वेंट के दरवाज़े के सामने अनाथ बच्चों के लिए रखी टोकरी में दो जुड़वा...