इलायची
मुझे
अपने स्कूल के दिन याद आ रहे हैं. सर्दियों वाले. सुबह-सुबह जगा दिया जाता था. रज़ाई में से ही पाँच मिनट और... पाँच मिनट और... बस उठ ही रही हूँ, वाली पंक्ति
आज सोचकर अपने पर हंसी ही आती है. हम तीन बहनों में सर्दियों का मौसम मुझे ही
बेकार लगता था. कई बार तो मैंने भगवान से शिकायत भी की कि इस मौसम को बनाने की
क्या जरूरत थी! तुम्हें भी सर्दियों में स्कूल जाना पड़ता तो पता चलता! सभी के
जगाने पर भी मेरी पाँच मिनट वाली मांग बनी रहती थी. लेकिन जैसी ही दादी की दहाड़
कानों में पड़ती वैसी ही मैं बिच्छू के डंक लगे जख्मी लड़की की तरह उछल पड़ती थी.
मैंने कई बार इस बात की भी शिकायत की थी कि ऐसी दादी मुझे ही क्यों दी गई है? ख़ुद
की ऐसी दादी होती तो भगवान को भी अच्छी तरह पता चल जाता. सर्दियों में रविवार का
दिन और इलायची वाली चाय, ये दोनों ही मेरी पसंद के दायरे में आते थे.
रविवार को मुझे एक घंटे अधिक सोने की इजाजत प्राप्त थी क्योंकि उस दिन पिताजी घर
में रहते थे और किसी भी प्रकार की दहाड़ घर में सुनने को नहीं मिलती थी. इसके
अलावा सतुआ, मेरी बड़ी बहन जो घर के काम रविवार को संभाल
लिया करती थी, भी रहती थी. शनिवार के दिन क्लास में बैठे-बैठे
मैं उन लोगों को कोटी-कोटी प्रणाम करती थी जिसने रविवार को छुट्टी का दिन बनाया था.
पिता
जी का इलायची का छोटा-सा धंधा था जो घर में घुसते ही महक से हर किसी को पता चल
जाता था. मुझे भी इलायची को देखकर ही बहुत खुशी होती थी. हल्का हरा रंग और उसमें
महकते काले दाने मानो एक नई दुनिया ही दिखलाते थे. मैं इन दानों को इलायची के
बच्चे कहकर पुकारा करती थी. घर में इलायची का भरपूर इस्तेमाल होता था. पिताजी को
मुनाफा कमाने का शौक था या लालच नहीं पता, लेकिन
उन्होंने इलायची के साथ-साथ कुछ ही दिनों में अन्य मसालों का धंधा भी छोटे धंधे
में जोड़ लिया था. इसलिए बहुत से साबुत मसालों का उस समय तक नाम और विवरण कुछ हद तक
मुझे पता था. खाने में भी भरपूर मसाले झोंकें जाते थे. मसालों के मामले में हमारी
आँख भले ही धोखा दे जाए पर घर के पूरे परिवार की नाकें धोखा नहीं देती थीं. या यूं
कहूँ कि सूंघने के मामले में घर का प्रत्येक व्यक्ति हुनरमंद था. यही हुनर जन्म के
साथ-साथ मुझमें भी आ गया. और सूंघने का प्रतिशत मुझमें अधिक था क्योंकि स्कूल के
बाद मेरा सारा समय मसालों के हिसाब किताब में गुजरता था. मुझे एक तरह से मुनीम बना
दिया गया था. आसपास के घरों में किसी को मेरा असली नाम तक नहीं मालूम था. वे लोग
भी मुझे मुनीम जी कहकर ही पुकारते थे.
इसके
अलावा दादी को भी अदरक और इलायची वाली चाय भाती थी. अगर बिना इनके चाय बन भी जाए
तो वे पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं. उनका खयाल था कि इन सब चीजों के असर पड़ते हैं.
शरीर ठीक रहता है. सो मुझे भी यह बात खूब जम गई. बिना अदरक और इलायची के चाय नहीं
पीती थी.
हमारा
परिवार छोटा था. हम तीन बहनें घर में दृश्य होते हुए भी अदृश्य ही मानी जाती थीं.
घर में रहते हुए भी हमारे हिस्से बहुत कुछ ऐसा नहीं था जिससे पता चल जाए कि इस घर
में तीन लड़कियां सांस लेती हैं. बड़ी बहन का नाम सतुआ था. दादी ने ही रखा था.
सतुआ को अपना नाम बेहद 'ओल्ड फेशन्ड' लगता था. बाक़ी
बची हम दोनों बहनों के नाम नए जमाने से मैच करते थे. हम तीनों पर एक जोड़ी बूढ़ी
आँखें जब तब पीछा किया करती थीं. यह सब बहुत गुस्सा दिलाने वाला भी होता था.
कुर्ता भी सिलवाया जाता तब कॉलर लगवा दी जाती और आगे से बंद गला. 'तहजीब बंद कपड़ों में होती है', दादी का यही कहना था.
कभी ऐसा लगता था कि हम तीनों की कन्डीशनिंग हो रही हो. ज़बान भी उतनी खोलने की
इजाजत थी जितने की जरूरत होती. ‘लड़कियां चुप रहते हुए ही
अच्छी लगती हैं’, यह पंक्ति हमेशा कान से टकराया करती थी.
लेकिन दादी औरत होते हुए भी बहुत बोलती थीं. उनकी आवाज़ का वॉल्यूम भी सामान्य से
अधिक रहता था. सतुआ को इन सब से सबसे ज़्यादा चिढ़ होती थी. क्योंकि उसके कॉलेज का
वक़्त भी दादी नोट किया करती थीं. एक मिनट इधर-उधर हुआ तो घर में हाहाकार मच जाता
था. सतुआ का हर खयाल बहुत ज़्यादा बड़ा होता था. उसका मानना था कि हम आसमानी उल्का
पिंड थे. गलती से इस धरती पर ‘टपक’ गए
हैं. जिस दिन बड़ी वाली आसमानी चुंबक हमें खींचेगी हम तुरंत उड़ते हुए अपनी-अपनी
जगह चले जाएंगे.
इस
कथा में मेरी दूसरी बहन छाया का उत्सुकता में पूछा गया सवाल सतुआ की आँख में
किरकिरी जैसा ही होता था. “सतुआ, आसमान में पहुँचने के
बाद क्या करेंगे? उल्कापिंड होना भी कोई ज़िंदगी है!”
सतुआ इसके बाद नाक बनाती हुई जाती और कहती, “यहाँ
सपनों की कोई कद्र ही कहाँ है!” इसके बाद मैं जाती हुई सतुआ
को देखती और फिर बाद में छाया पर नज़र ले जाती. छाया का भी हाल सतुआ जैसा ही था.
विद्रोही टाइप का. मेरा कुछ भी नहीं था. मैं बोलती ही नहीं थी. मुझे बोलना ही नहीं
आता था. मुझे स्कूल जाना और घर में रहना आता था. हिसाब-किताब करना आता था. सूंघना
आता था. मेरी इस तरह की आदत दादी को पसंद थी. मुझे अपने घर में अपने ही लोग अजनबी
लगते थे. इस अजनबियत को मैंने अपने अंदर समेट लिया था. जो कहा जाए वैसे करती थी.
जो नहीं कहा जाता था वो नहीं करती थी. मैं पूरी तरह से आदर्श के खाके में फिट होने
के लिए मुनासिब चरित्र बन ही चुकी थी. पर भला हो एक अजनबी औरत का जिसके चलते यह
अनहोनी घटना होते-होते रह गई.
इन्हीं
दिनों हमारे सामने वाले घर में एक औरत किराए पर रहने आई. उस घर के मकान मालिक
दूसरी जगह रहते थे सो उस औरत ने वह पूरा घर ही किराए पर ले लिया. लंबा क़द था. रंग
गेहुआँ था. काले बाल. एक दम सीधे. बड़ी-बड़ी आँखों में मोटा काजल लगाती थी. नाक
में मोती का लॉन्ग हुआ करता था. कट बाजू वाले सूट पहना करती थी. बिंदी लगाती थी लेकिन
सिंदूर नहीं. इस बात पर गली में एकाद बहस भी हुई कि वह शादीशुदा है या नहीं. लेकिन
किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे से सीधे पूछने की. मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी. इतना
ही नहीं सतुआ भी उससे प्रेरित हुई तो काजल लगाने लगी. इस पर दादी ने कहा कि बड़ी
लड़की के लक्षण ठीक नहीं लग रहे. तब पिताजी ने कहा कि काजल लगाने में क्या गड़बड़
है! दादी चुप तो हो गईं पर हम तीनों पर निगरानी और बढ़ गई. दादी का खयाल था कि हम
उस नई 'बदचलन औरत' से ज़्यादा ही
इंस्पायर्ड हो गए हैं. सब ऐसे ही चल रहा था.
एक
दिन घर में किसी के न रहने पर मुझे अखबार की जरूरत आन पड़ी. मैंने अपने घर के
छज्जे से ही उनसे पूछा, “आपके पास आज का अखबार होगा?” वह मुस्कुरा कर बोलीं, “हाँ है. उसे लेने आपको मेरे
घर में आना होगा.” अगले दस मिनट में मैं चुपके से उनके घर
में थी. घर में प्रवेश करते ही पीले रंग से मुलाक़ात हुई. मुझे पेंट की महक आई.
बहुत ताज़ा-ताज़ा ही पेंट हुआ था. सीढ़ियों की दिवारों पर सुंदर-सुंदर पैंटिंग्स टंगी
थीं. सीढ़ियां एक बैठक के गुलाबी पेंट वाले कमरे में ले जाती थीं. वहाँ लकड़ी का एक
चरमराया हुआ सोफा रखा था. लेकिन उसकी सजावट मिट्टी रंग के कुशन से ऐसे की गई थी जैसे
कोई संगीत महफिल लगने की तैयारी चल रही हो. मैंने सीढ़ियों के पास ही खड़े होकर
अखबार मांगा. उन्होने मुस्कुराते हुए कहा, “जानती हूँ मुनीम
लोग बहुत बिज़ी लोग होते हैं. पर उन्हें चाय पीने का वक़्त निकाल लेना चाहिए.”
मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा, “आपको भी पता चल गया...
मैं फिर कभी आ जाऊँगी. अभी तो बस अखबार दे दीजिए.” उन्होंने
जिद्द की. मुझे चाय के लिए बैठाकर कर वह बैठक के दाई ओर बनी रसोई में प्रवेश कर
गईं. रसोई की दिवारों का रंग सफ़ेद था.
दो
कप चाय लाते हुए वे मेरा नाम पूछने लगीं. मुझे खुद दो मिनट इस बात को सोचते हुए लग
गए कि मेरा नाम मसाला है, मुनीम है या फिर रोल नंबर 33.
उन्होंने दुबारा पूछा, “नाम क्या है आपका?” मैंने अपने पैरों पर बल देते हुए और सिर नीचे किए ही तारा कहा. वो तुरंत
मज़ाक में बोलीं, “अरे वाह! तुम धरती पर क्या कर रही हो?
तुम तो आसमान की रहने वाली हो.” मैंने कुछ
कहने की बजाय मुस्कुराना ठीक समझा. मेरे पास कहने को कुछ था ही नहीं. मैंने धीरे
से अपने हाथ कप की तरफ बढ़ाए. चाय में से इलायची की महक आ रही थी. मैंने सूंघते
हुए कहा, “आप भी इलायची वाली चाय पसंद करते हो?” वो फिर अखबार खोजते हुए बोलीं, “हाँ. मुझे पसंद है.
मुझे इसकी महक अच्छी लगती है.” महक का नाम आते ही मैंने अपने
कपड़ों में से मसालों की महक को एक बदबू की तरह पाया और मन ही मन शर्मिंदा हुई.
मैंने अपने कपड़ों को सूंघा. मुझे उबकाई आई. मैंने उनसे और ज़्यादा बात नहीं की.
वापस लौट आई.
इसके
बाद अगली बार उनके यहाँ किस कारण जाना हुआ यह याद नहीं. लेकिन जो बात याद रही वह
यह थी कि उनके निजी कमरे का रंग आसमानी था. मैंने कुछ देर के लिए अपनी आँख बंद की
तब मुझे उल्कापिंड अपने चारों तरफ घूमते हुए दिखाई दिए. गुब्बारों से भी हल्के. जब
उन्होंने मेरा नाम पुकारा तब मेरा ध्यान टूटा और मैं अपने चारों तरफ हैरानी से
देखने लगी. खुद में सवाल किया उल्कापिंड कहाँ गए!
पहली
बार आसमान को किसी कमरे में पाया. मैं वह कमरा कभी भूल नहीं सकती. मुझे आज भी उस
कमरे की रोशनी का शीतल अहसास है. वहाँ खूबसूरत चित्र थे. मैं हैरान थी. मैंने पूछा,
“आप क्या करती हैं?' इस सवाल
पर वह मेरा हाथ पकड़ कर एक ऐसे कमरे में ले गईं जहां सभी रंगों को मिक्स करके
दीवारों में पुताई हुई थी. वहाँ एक अधूरी पेंटिंग को पूरा करने की तैयारी चल रही
थी. और पूरे कमरे में बने हुए तरह-तरह के चित्र रखे हुए थे. मुझे कुछ पल को हैरानी
हुई.
मैंने
चित्रों पर नज़र फिराते हुए पूछा, “आप
इतने रंगों में कैसे रहती हैं? आपके सिर दर्द नहीं होता?”
वो
अपनी आदत की तरह मुस्कुराते हुए बोलीं, “जब
आपका जिसमें मन रम जाता है तो आप वही हो जाते हो. जो न लगा तो वही बनते हो जो बाकी
लोग हैं. मशीन!”
मैंने
मुंह में कड़वा-सा कुछ महसूस किया और दूसरा छोटा सवाल पूछा, “कैसे?”
रसोई
में जाते हुए वह बोलीं, “दुनिया रंगती हूँ... इलायची वाली चलेगी?” मैंने कहा, “हाँ, बिलकुल!”
वो
आगे बोलीं, “मशीनों को देखा है... कैसे एक जगह बैठी रहती हैं.
जो बटन दबाया जाता है वैसे ही वे काम करती हैं. उन्हें देखकर मुझे ऊब आती है. बात
तो यही है कि आज़ादी की महक को आजमाना चाहिए. हमें यह तय करना चाहिए कि हम मशीन
बनेंगे या फिर वो जो हम बनना चाहते हैं. मैंने पेंटर बनने का इसलिए नहीं सोचा कि
यह मेरा पेशा है. बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ किसी की रोक टोक नहीं होती. जो मन आए
वो करने की आज़ादी मिल जाती है जो बाहर की दुनिया में नहीं मिलती.” मुझे उनकी बात समझ नहीं आई. मैंने अगली बार उनसे फिर मिलने का वादा किया
और लौट आई. मुझे उनसे मिलना और बात करना अच्छा लगने लगा था. मुझे नहीं पता उनके
रंगों का सम्मोहन था या फिर कुछ और था. यह तय था कि वह कमाल की औरत थीं जो किचन के
लिए नहीं बनी थीं. वो अकेली ही रहती थीं. उनके यहाँ कुछ चित्रों के संबंध में आते
थे. कुछ लोग तो मेरे सामने भी आते थे जो एफ. एन. सुज़ा से लेकर विंसेंट वॉन गोग
जैसे नाम लेते थे. उस वक़्त ये नाम मुझे अजीब लगते थे. जब इनके बारे में सतुआ से
पूछा तो उसने बताया कि ये नामी चित्रकार हैं.
सतुआ
और छाया को जब इनके बारे में बताया तो उन दोनों में भी उस औरत से मिलने की ललक जग
गई. इसी बीच सतुआ अपने कॉलेज के किताबघर से एक किताब लाई थी. उस किताब का नाम ‘एकांत के सौ वर्ष’ था. उसकी पढ़ने की आदत से हम
दोनों बहनों को बहुत फायदा होता था. उसे लगभग हमारे हर सवाल का जवाब मालूम होता था.
और वह न मालूम होने पर भी हमारे सवालों के जवाब खोज खोजकर बताया करती थी. उस दिन
मैंने ‘एकांत के सौ वर्ष’ जैसा नाम के
पीछे के कारण को जानना चाहा तब उसने किताब की कहानी टूटी-फूटी तरह से हम दोनों के
आगे परोस दी. उसने बहुत सारे किरदारों के नाम लिए और उनमें से एक रेमेदियोस के
बारे में बताया जो बहुत सुंदर थी और एक दिन अचानक आसमान में चली जाती है...उड़कर.
मैंने इस किरदार को कुछ इस तरह से समझा जैसे सतुआ की हमारे उल्का पिंड होने की
कहानी. मुझे अब उसकी बात पर यकीन हुआ कि हम तीनों इस धरती के नहीं हैं. यहाँ ढेर
सारे दरवाजे हैं जहां हर वक़्त ताला ही लगा रहता है. तालों के पीछे का कारण चोरी
नहीं हैं बल्कि कोई लड़की घर से न बाहर चली जाए, यही इकलौती
वजह थी.
कुछ
दिनों बाद एक दिन आया. जाने क्यों? सुबह-सुबह
भयानक शोर घर में दस्तक दे रहा था. कहीं बहुत झगड़ा हो रहा था. छज्जे से झाँका तो
वही औरत बीच में बहुत गुस्से में खड़ी थी और आसपास बहुत लोग खड़े थे. इतने में
उसके मकान मालिक भी आ गए. मैंने बहुत कोशिश की कि मुख्य मुद्दे को सुना और समझा जाए.
पर पीछे से दादी ने एक तेज़ आवाज़ हम तीनों पर धमाके के साथ फेंक दी. हम डर गए. पापा
ने जो खबर हमें दी वह यह थी कि गली के कुछ लोगों को उसके अकेले रहने से परेशानी थी.
इसके अलावा उसके काम के बारे में किसी को मालूम नहीं था. सबका खयाल था कि वह कोई
गलत काम में शामिल है. ऐसी औरत का गलत प्रभाव पड़ सकता है. इसलिए उसे घर खाली करने
को कहा गया है. मैंने इस बीच यह कहा कि वह तो एक पेंटर है. चित्रकारी करती है.
इतना ही कहना था कि दादी टूट पड़ीं. उस दिन वो न जाने क्या क्या बोलती रहीं. मुझे
सिर्फ एक पंक्ति ही याद है. यह लड़की तो भाग जाएगी एक दिन. मैंने इसे सुनकर मन में
कहा, “हम्म... रेमेदियोस की तरह. मैं आपके यहाँ नहीं रहूँगी.
मुझे घुटन होती है. बहुत!” इसके बाद मैंने इलायची के रखे
पैकटों को गिनने काम शुरू किया और कई घंटें लगातार करती रही. इलायची की महक मेरे
अंदर घुसती रही. सतुआ के जबरन उठाने पर ही खाने के लिए उठी. कुछ दिनों बाद एक बड़ा
ट्रक आया जिसमें उस औरत का सामान रखा गया. जाते-जाते उन्होंने हल्की गर्दन ऊंची की
और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दीं. वो चली गईं. अंदर दादी ने हुकुम दिया कि चाय
बनाओ, इलायची वाली. रसोई में मैं दो तीन इलायची कूटने लगी.
एक बहुत तेज़ महक उठी और साँसों के सहारे मेरे अंदर फिर घुस गई... दिमाग तक पहुँच
गई. मुझे भयानक चक्कर आए. पर जल्दी ही ठीक हो गई.
दिन
ऐसे ही बीत रहे थे. इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिससे मैं और सतुआ खुश हुए पर पिताजी
और दादी को बड़ा सदमा लगा. छाया किसी के साथ घर छोड़ कर जा चुकी थी. ये बात पूरे
मौहल्ले में दादी के लाख छुपाने के बाद भी लीक हो चुकी थी. छाया की बात हम दोनों
से होती रहती थी पर इस बात का पता घर के बाकी दो लोगों को नहीं मालूम था. कुछ दिन
पिताजी के सीने में दर्द की शिकायत रही और अंत में उनका दर्द यह कहकर गया कि आज से
वो हमारे लिए मर चुकी है.
अब
हम दोनों ही अपनी बातों का बंटवारा करते. सतुआ का सपना बड़ा अजीब था. उसका कहना था
कि वह सपने बेचने का काम करेगी. जो बच्चा या औरत-आदमी जिस तरह के सपने देखना
चाहेंगे वह वही उनको बेचा करेगी. मसालों से कितनी गंदी महक आती है. इसलिए वह इन सब
से दूर महकदार सपने बेचा करेगी जिसमें भीनी-भीनी महकें आया करेंगी. उसकी इस बात पर
मैं बहुत देर तक हँसा करती थी. तब तक जब तक आँखों में पानी न आ जाए. इसके बाद पलट
कर वह अपनी बड़ी आँखों में शरारत लाते हुए पूछती, “तारा, तू बता... तू क्या बनेगी?”... मैं बिना सोचे समझे झट कहती, “इलायची!” इस पर वह हँस कर कहती, “तब तो दादी तुझे कूट-कूट कर
चाय में घोल-घोल कर गट कर जाएंगी.” ऐसे ही बात कर के हम आधी
रात करते और सुबह फिर उठ जाते मशीन बनने की तैयारी में. ये हमारे अच्छे दिन थे. और
हम दोनों ने चाहा कि ये दिन रुके रहें पर ऐसा नहीं होता.
सतुआ
की शादी आनन-फानन में तय हुई. कुछ दिनों बाद ही दादी के कहे अनुसार सतुआ को निपटा
दिया गया. उसकी पसंद को पूछे बिना या फिर जाने बिना. सतुआ में मौजूद विद्रोही
स्वभाव को पिताजी ने अपने दो आंसुओं से लगभग समाप्त कर दिया था जिसका पता मुझे
सतुआ के बताने पर चला कि पिताजी ने उसे अपना वास्ता देकर शादी के लिए मनाया है.
उनको इस बात का डर था कि कहीं सतुआ भी छाया की तरह घर से न चली जाए. सतुआ की शादी
के बाद फोन पर होने वाली बातचीत में वह जरा भी खुश नहीं मालूम होती थी. कई बार वह
मेरी बीमारी का बहाना बनाकर हमारे पास कई दिनों तक रहती थी. मुझे उसके लिए बीमार
होना पसंद भी था. इस पर भी दादी की नज़र पड़ी और उसने आना लगभग बंद कर दिया.
बहुत
दिनों तक उसका हाल नहीं पता चला. उसने मुझसे भी बात करना लगभग बंद कर दिया. एक
रोज़ फोन की घंटी बजी और पता चला कि सतुआ के साथ दुर्घटना घटी है. वह लगभग पूरी
तरह से जली अवस्था में अस्पताल में मेरी आँखों के सामने पड़ी हुई थी. उसने कुछ
बोलने की कोशिश भी की पर हम जान ही नहीं पाए कि आखिर क्या कहना चाह रही है. वह मर
गई. मेरे सामने. मैंने रोते हुए आँखें बंद कीं. मुझे दिखा कि वो उल्कापिंड बनी हुई
धीरे-धीरे धरती से ऊपर उठ रही है. उसे कोई चुंबक खींच रही है. जाते हुए उसने कहा, “देख, मैं न कहती थी कि हम इस धरती के नहीं हैं.”
कई
दिन बीत गए. सर्दियाँ आईं. मुझे चाय बनाने का हुक्म हुआ. मैंने इलायची कूटना शुरू
किया और न जाने एक जहरीली महक मेरे दिमाग पर चढ़ी और उल्टी होने लगी. बहुत उल्टी
हुई. इसके बाद मुझे याद नहीं कि क्या हुआ. मुझे जब होश आया तब सिर दर्द से फट रहा
था. दादी को लगा कि मुझ पर किसी हवा का साया है. सो एक ताबीज़ बनवाकर गले में डाल
दिया. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. रात के समय में मेरे कमरे में रोशनी उतर आती. खूब
सारे उल्का पिंड और इनके साथ ही सतुआ, छाया
और वह औरत धीरे-धीरे आसमान से उतरतीं. फिर जो बातों का सिलसिला चलता तो सुबह होने
पर ही समाप्त होता. वह औरत पेंटिंग बनाती. सतुआ अपने साथ हमारे फर्माइशी सपने लाती.
छाया और मैं दर्शक बनते. कुछ दिनों बाद यह खबर फैली कि तारा पागल हो गई है. मैंने
इस बात पर ध्यान नहीं दिया. हालांकि मुझे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था. फिर
भी मैंने अपने पागल होने पर कभी यकीन नहीं किया.
फ़ोटो गूगल से साभार
कश्मीर
“हलो!”
अचानक पीछे की तरफ से आई आवाज़ से कश्मीर एकाएक घबरा गई। उसने पलट कर तुरंत पीछे देखा। एक लंबी, गोरी और सेहतमंद लड़की उसे देखकर मुस्कुरा रही थी। उसने जींस पर गुलाबी कमीज़ पहनी थी। बाल कंधे तक ही कटाए गए थे। बाएँ हाथ में घड़ी थी और दायें हाथ में काला धागा बंधा हुआ था। कश्मीर को वह अजीब-सी लगी।
कश्मीर पहचान नहीं पाई और बोली, “माफी चाहूँगी, मैंने आपको पहचाना नहीं।”
वह लड़की ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास से भरपूर लग रही थी। उसने अपना पर्स सोफ़े पर एक कोने में लगभग फेंक दिया। खुद को एक कोने में कूद कर धंसाने के बाद वह आराम की साँसे लेने लगी। कुछ पलों बाद मुस्कुराकर बोली, “अरे मैं प्रिया शर्मा हूँ, जिसे नई किताब की एडिटिंग के लिए रखा गया है। एक महीने तक यहीं आऊँगी। आपको बताया नहीं किसी ने? आप ही का नाम कश्मीर है न? आपके बारे में मुझे बताया गया था... कहा गया है कि अगर किसी भी तरह की मदद लेनी होगी तो आपसे मिल जाएगी।”
कश्मीर जब तक कुछ समझ पाती उससे पहले ही उसने नए सवाल कश्मीर के आगे रखने की कोशिश की। पर कश्मीर ने पहले ही कहा, “जी हाँ! मैं ही कश्मीर हूँ। आज दूसरा शनिवार है। इसलिए काफी कम लोग आएँगे। मुझे रिपोर्ट पर काम करना है इसलिए आई हूँ। अगर आपको कोई भी ज़रूरत हो तो बताइएगा। मैं आपकी मदद करने की पूरी कोशिश करूँगी।” इतना कहकर कश्मीर चुप हो गई और अपने काम की फाइलों को मेज़ के पास खड़ी होकर खोजने लगी।
वह लड़की अब तक कुछ थकावट उतार चुकी थी और कश्मीर को भरपूर निगाहों से देखे जा रही थी। उसने फिर से पूछा, “आपका पूरा नाम क्या है? आपका नाम भी बड़ा दिलचस्प है। आपका यही असली नाम है?”
कश्मीर को ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी। उसने फाइलों को खोजने के दौरान एक विराम लिया और सवालिया आँखों के साथ का कहा, “जी? जी पूरा नाम क्या है आपका?” उस लड़की ने अपना सवाल दोहराया।
कश्मीर ने कहा, “कश्मीर, मेरा पूरा नाम कश्मीर ही है।”
उस चंट लड़की ने जैसे सरनेम की पूंछ पकड़ ली हो। वो बोली, “जैसे मेरा नाम प्रिया शर्मा है। ठीक ऐसे ही आपका कोई सरनेम-वरनेम होगा। आजकल सिंगल नाम कौन रखता है! कास्ट क्या है आपकी?”
कश्मीर को इस बात पर अंदर ही अंदर गुस्सा आ गया था पर उसने ज़ाहिर न करते हुए और अपने काम में लगे हुए कहा, “जी, मेरा नाम कश्मीर ही है। न आगे कुछ है न पीछे कुछ! कास्ट का क्या करना! इंसान होना काफी है..!”
इस बात पर दफ्तर में आई नई लड़की ने कश्मीर के बारे में जो पहली राय बनाई वह थी, “घमंडी लग रही है!”
कश्मीर जब फाइलों को लेकर अपनी मेज़ के पास आई और कंप्यूटर की स्क्रीन पर नज़र टिकाई तो वह न जाने कहाँ पहुँच गई। स्क्रीन पर कुछ तस्वीरें घूमने लगीं। फिर वह अतीत में कुछ उलट-पलट करने लगी। वह चाहकर भी मन के सफर को नहीं रोक पाई।
उसे याद आया कि उसके इस नाम का स्कूल के शुरुआती दिनों में बहुत मज़ाक बनाया जाता था। आगे की पढ़ाई के दौरान और बाद में भी जब-तब बनता रहा है। कश्मीर का चेहरा सादा और सिंपल था। रंग गहरा था। बाल जरूरत से ज़्यादा काले और आँखें सामान्य से बड़ी थीं। दिलचस्प यह था कि जब भी कोई उसका चेहरा मुकम्मल देखने की कोशिश करता तब आँखें अपने अलावा कुछ देखने ही नहीं देती थीं। उसे अपने चेहरे से कोई खास परेशानी भी नहीं थी। पर लोग अक्सर यह कह देते थे, “कश्मीर की वादियाँ तो उजली होती हैं। धरती की जन्नत कहीं है तो वह कश्मीर ही है। झील है तो कश्मीर है। इश्क़ है तो कश्मीर में है...और एक इन्हें देखो... इनका रंग देखो... काला से कश्मीर का क्या मेल !...हाहाहा..!”
इन बातों को सुनकर बचपन से ही कश्मीर के मन में घाव होना शुरू हो गए थे। उसे रंग से जुड़े भेदभाव का हमला सहना पड़ता था। आसपड़ोस में भी उसने रंग के मामले में कलूटी, कल्लन, कल्लो, कल्ली भैंस, काली माता जैसे कितने ही मज़ाक के शब्दों को सिने में तीर की तरह महसूस किया था। हालांकि अब ये शब्द उतने इस्तेमाल नहीं किए जाते। पर बचपन में सुने इन शब्दों के घाव भर नहीं पाते। बचपन में लगे घाव बहुत कम भर पाते हैं। भर भी जाएँ तो ताउम्र निशान बनकर साथ रहते हैं।
कश्मीर ने कुर्सी में और गहराई से धंसते हुए आँखें बंद कर लीं। उसने सोचना जारी रखा। उसे सब याद आ रहा था। सोचने का क्रम अब दिमाग में तस्वीरों के साथ आ रहा था। उसे याद आया। कक्षा पाँच का एक हादसा। हाँ, वह उसे खुद के बचपन का हादसा ही मानती है। ज़रूरी नहीं कि हादसा होने पर चोट लगे और खून निकल आए। बहुत से हादसे मन पर इस तरह का वार करते हैं कि उनका इलाज वक़्त भी नहीं कर पाता।
एक बहुत सुंदर लड़की का कक्षा पाँच में दाखिला हुआ था। उसका नाम नेहा था। वह बहुत सुंदर थी। उसका रंग उजला था। वह सभी बच्चों में जल्दी ही आकर्षण का विषय बन गई। अजीब यह भी था कि जब तक टीचर क्लास में रहती थी तब तक माहौल ठीक रहता था। पर उनके जाने के बाद नेहा से सभी छिटक जाते थे। नेहा का तपाक से जवाब देना भी बच्चों को खास पसंद नहीं था। एक कारण टीचर का उस पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देना था जिससे बच्चों में उसे लेकर जलन भी हो रही थी। बच्चों को लगता था कि टीचर का प्यार उनके लिए कम हो गया है।
टीचर ने नेहा को कश्मीर के साथ बिठाया। कश्मीर का कम बोलना नेहा को पसंद था। एक बार क्लास में हुए झगड़े में कश्मीर ने नेहा का पक्ष ले लिया था जिससे नेहा के मन में कश्मीर के लिए दोस्ती की पहली भावना जाग चुकी थी। कुछ दिनों बाद नेहा से कश्मीर की अच्छी बनने लगी थी। एक बार नेहा की माँ कुछ कागज़ात जमा करने स्कूल आईं। उस दिन नेहा ने उत्साह में कश्मीर से अपनी माँ को मिलवाते हुए कहा, “मम्मा...यही मेरी दोस्त है। कश्मीर!... बताया था न आपको!”
कश्मीर को उसकी माँ से मिलते हुए थोड़ी घबराहट महसूस हुई। कारण, उसकी माँ का कश्मीर को अजीब नज़रों से घूरना और कुछ न कहना था।
नेहा और कश्मीर के बीच धीरे-धीरे बेहतर बन रही थी। नेहा कई बार कश्मीर से कॉपी या फिर ऐसे ही मिलने घर भी आ जाती थी। कश्मीर की माँ उसे बहुत प्यार करती थीं और नेहा को कुछ खास भी बना कर खिलाती थीं। नेहा को बहुत अच्छा लगता था। वह आती तो कई घंटे बैठ जाती और अगले दिन बताती कि उसकी माँ बहुत डांट रही थीं। नेहा में बातों के प्रति इतना लगाव था कि वह बिना कुछ छिपाए और दबाए बातें करती थी।
गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ गई थीं। दोनों ने इस बार मिलकर तय किया था कि अपने-अपने नए खेल ईजाद करेंगी और स्कूल में दिया काम साथ-साथ करेंगी। इसी तरह से दिन बीत रहे थे। नेहा जब भी कश्मीर को अपने घर आने को कहती तब कश्मीर को नेहा की मम्मी को लेकर एक खौफ आ जाता। लेकिन वह कभी भी इस डर के बारे में नेहा को नहीं बताती थी। न जाने क्यों कश्मीर को उनसे एक कटाव-सा महसूस होता था।
कुछ दिनों बाद जब नेहा के घर में मरम्मत का काम हो गया तब उसने बला की ज़िद्द करके एक दोपहर अपने घर कश्मीर को खेलने के लिए बुलाया। कश्मीर उस गर्म दोपहर उसके घर पहुँची। कश्मीर ने अपनी माँ का सिला हुआ गुलाबी ड्रेस पहना था। बाल छोटे थे सो क्लिप की मदद से माथे पर न आए, टिका लिए थे। माँ को नजर लगने का डर था सो उसके बीच माथे पर एक काला टीका भी था। कश्मीर बहुर सुंदर दिख रही थी।
सब ठीक था। दोनों ने उसके घर की बहुत बड़ी छत पर कुछ खेल खेले। नेहा ने उस रोज़ उससे उसके नाम का कारण पूछा। तब कश्मीर ने हँसते हुए कहा, “पापा ने कोई फिल्म देखी थी। फिल्म का नाम कश्मीर की कली है... शायद... मुझे ठीक से पता नहीं। उन्हें फिल्म और गाना दोनों पसंद थे। उन्होंने सोचा था कि पूरे परिवार में कोई लड़की हुई तो उसका नाम कश्मीर रखेंगे... जब मेरा जन्म हुआ तो पापा ने रख दिया!...वैसे मुझे अपना नाम पसंद है।" इतना कहकर वह नेहा की तरफ देखने लगी। आगे बोली, “सबको मेरा नाम अजीब ही लगता है। पता नहीं क्यों? तुम्हें भी लगता है?”
नेहा ने जोड़ते हुए कहा, “नहीं तो! मुझे तो बहुत अच्छा लगता है... पापा बताते हैं कश्मीर एक बहुत खूबसूरत जगह है। वहाँ सबकुछ बहुत सुंदर है। बर्फ पड़ती है। मैंने नहीं देखा। हम साथ चलेंगे जब बड़े हो जाएँगे। मज़ा आएगा! मेरे पापा को भी तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगता है। रात को काम से लौटकर आने पर पूछते भी हैं कि तुम्हारी दोस्त कश्मीर कैसी है...”
इन बातों में दोनों मगन ही थे तभी नीचे से उसकी मम्मी की तेज़ आवाज़ आई। नेहा फुर्ती से कश्मीर का हाथ पकड़कर सीढ़ियों पर भागी। सीढ़ियों से ही कहा, “मम्मा देखो कौन आया है?... देखो देखो... कश्मीर है..! बहुत ज़िद्द की तब आई है। वह आगे बोलती गई, “आप तो मना करते हो न कश्मीर से बात करने के लिए... आप ही कहते हो न उसका रंग कितना गहरा है... गंदी-सी लगती है... बात मत करना... लेकिन मम्मा कश्मीर मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। मेरी कितनी मदद करती है। जब झगड़ा होता है तब मेरे साथ रहती है..!”
नेहा को उसकी मम्मी ने जल्दी से दुरुस्त करते हुए कहा, “मैं कहाँ कहती हूँ ऐसा! आओ बेटा बैठो... बैठो! ...नेहा ने कुछ खिलाया तुम्हें?” नेहा की इन बातों से उसकी मम्मी कुछ हड़बड़ा गईं। उन्हें उस वक़्त कश्मीर से नज़रें मिलाने में भी दिक्कत हो रही थी। कश्मीर उन्हें एकटक घूरे जा रही थी।
कश्मीर ने जो कुछ सुना वह अब तक उसे अंदर तक भेद गया था। उसे लगा कि वह उसकी माँ के कान के पास अपना मुंह ले जाकर चिल्लाए। इतना चिल्लाए कि उसकी मम्मी बहरी हो जाए। लेकिन वह कुछ न बोली... आँखों में पानी लिए हुए सीढ़ियों से फटाफट उतर आई। पीछे नेहा की आवाज़ उसे पुकारती रही। लेकिन कश्मीर नेहा को, उसकी आवाज़ को, उसकी दोस्ती को, उसके बेदाग मन को और उसकी मम्मी को पीछे छोड़ती हुई चलती गई। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह अपना अपमान उस रोज़ नेहा के घर छोड़ आई। पर एक घाव साथ चला आया। लोगों के अंदर छुपा हुआ दोहरापन समझ आया उस उम्र में।
घर लौट आने पर उसने मम्मी के मेकअप के डिब्बे में गोरा बनाने वाली क्रीम की खोज की लेकिन उसे ऐसी किसी भी तरह की क्रीम नहीं मिली। माँ जब घर में लौटीं तब अपनी बच्ची को बेहाल और परेशान देखकर घबरा गईं। उन्हें देखते ही कश्मीर ने पूछा, “तुम गोरा बनाने वाली क्रीम नहीं रखती मम्मी?”
माँ कुछ न बोलीं। काफी समय तक अपनी रोती हुई बच्ची को गोद में लिए बैठी रहीं। जितना समझा सकती थीं समझाया। बताया कि कृष्ण, राम और उनके शिव काले हैं। जिन लोगों का रंग गहरा होता है वे ईश्वर के सबसे करीब होते हैं।... कुछ इसी तरह की बातों से उस दिन कश्मीर चुप हो गई। पर सामने की दीवार पर टीके शिव-पार्वती के जोड़े को देखती रही। पार्वती तो गोरी हैं, यही सोच उसके दिमाग में उस पल आई।
स्कूल के बाद कॉलेज में इस तरह की छोटी-मोटी घटनाएँ होती रहीं। किसी ने तरह तरह क्रीम लगाने की सलाह दी तो किसी ने घरेलू फ़ेस पैक लगाने को कहा। निखार बहुत जरूरी है, उसे यह समझाया जाता रहा। बहुत समय तक उसने यह माना भी।
ऐसी बात नहीं है कि कश्मीर ने तरह तरह के उपायों को आज़माया न हो। उसने आज़माया और उन्हें बाद में इस्तेमाल में लाना बंद भी कर दिया। इसके पीछे कॉलेज में मिली एक टीचर का हाथ रहा। उस टीचर ने उसके अंदर के साफ रंग के भूसे वाले फितूर को निकाल कर कुछ ऐसा कीमती कुछ भरा कि कश्मीर में अच्छे बदलाव हुए।
कश्मीर ने अपना सिर कुर्सी के पीछे टिकाया और उस रोज़ को याद किया जब टीचर से उसकी वास्तविक मुलाकात हुई। वह सोचने लगी। कॉलेज में परीक्षा के दिन चल रहे थे। पहली परीक्षा के बाद टीचर क्लास में पेपर के नंबर दिखा रहे थे। अभी तक दिखाए गए सभी विषय में कश्मीर के उम्मीद से बेहतर नंबर आए थे। बस इतिहास की टीचर जो, बीमार थीं, तो पेपर चेक नहीं कर पाई थीं। जब वह उस रोज़ अचानक क्लास में आईं तब पहले से बहुत बेहतर दिख रही थीं। चूंकि वह इतिहास की नई टीचर थीं इसलिए बच्चों के चेहरों से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं थीं। आते ही क्लास में बोलीं, “कश्मीर कौन है? लगभग तीस से पैंतीस विद्यार्थियों की क्लास में कश्मीर का नाम आने से बड़बड़ाहट शुरू हो गई। कुछ लोग नाम सुनकर फिर से हँसने लगे। कुछ अजीब चेहरे बनाने लगे। कश्मीर घबराहट के साथ अपनी सीट से उठ खड़ी हुई और कहा, “मेरा नाम है।”
टीचर ने उसका इतिहास का पेपर निकालते हुए कहा, “मैंने अपने पच्चीस साल के करियर में इतिहास का ऐसा पेपर चेक नहीं किया। बच्चे इतिहास को बोरिंग समझकर उसकी तारीखों का रट्टा लगाकर गलत जवाब लिख आते हैं। लेकिन तुम्हारा पेपर चेक किया तो पाया कि समझ के साथ तारीखों का मतलब भी पता है। तुम्हारे छियासी नंबर आए हैं। मैंने बहुत कोशिश की टफ मार्किंग की लेकिन मुझे लगा कि तुमने ऐसे गैप छोड़े ही नहीं हैं।”... उन्होंने खुद से पेपर के पन्ने पलटे और पूछा, “घर में कोई पढ़ाता है तुम्हें?”
कश्मीर ने बस न में सिर हिलाया। कश्मीर के दिमाग में छियासी का नंबर घूमने लगा था। वह इतनी खुश थी कि मुंह से शब्द निकले ही नहीं।
टीचर ने पास में बुलाया और उसका पेपर उसके हाथ में देते हुए कहा, “आगे भी यही उम्मीद है। बहुत प्यारी हो।... नाम और सूरत भी। दिमाग का तो पता ही चल गया।” इस दृश्य ने क्लास में एकाएक कश्मीर के लिए तालियाँ बजवा दीं। जब क्लास पूरी हुई तब कश्मीर को अपने साथ चलने को कहा। उन्हों ने उससे पूछा, “नाम किसने रखा है?”
कश्मीर ने बताया, “पापा ने। बहुत खूबसूरत है तुम्हारा नाम। तुम पर मैच करता है। अगले पेपर में भी ऐसे ही नंबर आने चाहिए। कश्मीर ने अपना सिर ऊपर नीचे हिलाया। बाद के दिनों में उस टीचर ने कश्मीर के अंदर बहुत से अच्छे बदलाव लाने में मदद की। आज भी कश्मीर उनसे मिलने जाती है। बैठकर बात कर आती है। उसे उनके पास हल्का महसूस होता है। अब नौकरी लग चुकी है तो मिलना नियमित नहीं होता। कभी-कभी खुद से हमारी मुलाकात कोई बाहर का शख्स करवाता है। टीचर ने यही मुलाकात कारवाई थी।
कश्मीर अपनी कुर्सी पर बैठे हुए इन सब यादों में घूम रही थी। तभी पीछे से प्रिया शर्मा चाय का कप उसकी मेज पर रखते हुए बोली, “कश्मीर जी... कश्मीर जी... चाय पीजिए। नींद भाग जाएगी। खुद के लिए बना रही थी तो सोचा आपके लिए भी एक कप बना लूँ।” इतना कहकर वह लड़की अपना मोबाइल ले आई और कश्मीर के पास बैठकर एक गाना बजाना शुरू किया। ...काश्मीर की कली हूँ मैं... मुझसे न रूठो..! वह बोली, "अभी-अभी डाउनलोड किया है, आपके लिए।" कश्मीर उसकी इस अदा पर मुस्कुराए बिना न रह सकी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “चाय के लिए शुक्रिया!” प्रिया शर्मा अब शायद फिर से उसके नाम के पीछे के कारण के बारे में पूछना चाह रही थी। पर कश्मीर समझ गई थी। वह गीत सुनने में मगन हो गई और चाय की चुस्कियाँ लेने लगी।
एकालाप
"उमस...! सच कहूँ, मौसम का यह मिज़ाज़ मुझे कभी पसंद नहीं आया। सारा दिन मैं गर्मी में घुटकर पड़ी रह जाती हूँ। यह कमरा भी तो देखो, यहाँ एक रोशनदान तक नहीं है जहाँ से हवा, रोशनी या कुछ भी अंदर आ सके। इतनी भी गर्मी कहीं पड़ती है भला! बिजली के क्या कहने! आती है, जाती है। बस यही लगा रहता है। हाथ का पंखा एक पल भी हाथ से छूटता नहीं। छोड़ो तो मक्खियाँ मुझे खा जाने को आ जाती हैं। हिकारत-सी होती है मुझे कभी-कभी। ज़िंदगी में बहुत गड़बड़ है। आजकल तो मुझे लगता है, ज़्यादा ही झोल-मोल रहती है। तुम भी तो जब देखो पेट में इधर-उधर चैन से नहीं बैठती। कभी यहाँ घूम जाती हो तो कभी वहाँ। मुझे ऐसा लगता है कि मध्यम आकार की कोई मछली मस्ती कर रही हो। ओह! मुझे ऐसे ख़याल नहीं लाने चाहिए। तुम पर खराब असर हो सकता है। पर मैं क्या करूँ? मेरे आस-पास का माहौल मुझे अच्छा सोचने भी नहीं देता।
इसी बीच बिजली आने से पंखा धीमे-धीमे चलता हुआ तेज़ी से चलने लगा।
ओह! अब मैं राहत की सांस ले सकती हूँ। अब पलंग पर जाकर लेट सकती हूँ। मेरा रंग कॉफी की तरह हो रहा है। चेहरे पर पसीने की बूंदें इस समय सो रही हैं। चेहरे पर एक अजीब-सा खिंचाव, हताशा, चिड़चिड़ाहट और असंतोष रहने लगा है। कमरे ने भी मेरे इस भाव के मुताबिक अपनी ऐसी ही रंगत बना ली है।
मैंने पीले रंग की ढीली-ढाली मैक्सी पहन रखी है। सोने का बिस्तर महकदार है। इस पर मैली और फटी हुई गहरे हरे रंग की चादर बिछी है। मैं अपनी इस दशा में काम नहीं कर पा रही हूँ। पलंग की वजह से कमरे में अधिक जगह नहीं बच पाती। बची हुई जगह में एक बर्नर वाला गैस स्टोव और छोटा सिलेन्डर दुबका पड़ा हुआ है, देखो तो! पास ही दीवार में ईंटों की एक रद्दी छोड़ी हुई अलमारी थी जिसमें रोते हुए दो कप दिख रहे हैं, उधर देखो! कुछ तश्तरियाँ और गिलास हैं। एक प्लास्टिक की मैली बाल्टी है। इसी में कपड़े धुलते हैं और नहाना भी इसी से होता है। मुझे याद है, जब यह बाल्टी खरीदकर लाई गई थी तब इसका रंग लाल था... चमकदार लाल !
कितना अच्छा हो चीज़ें बदले ही न। मैं ज़्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं पर कभी-कभी बहुत अजीब तरह से सोचने लगती हूँ। जैसे कोई दार्शनिक सोचता होगा। जब करने-धरने के लिए कुछ न हो तब दिमाग को करने के लिए बहुत कुछ मिल जाता है। सारा झोल दिमाग का ही है। दिल तो सिर्फ एक मांस का लाल लोथड़ा है। फिल्म वालों ने दिल को इस तरह पेश कर दिया है कि कल का पैदा हुआ बच्चा भी आशिक़ी के नगमें दिल से शुरू करता दिख रहा है। मुझे तो लगता है कि जीवन में सब कुछ, हमारा शरीर भी अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं। बाहर के माहौल से टकराहट ही जीवन है।और अंतरंग मन का क्या? हमारे अंदर भी कितनी टकराहटें होती हैं हर पल!
सुनो, तुम पेट में मचलो मत। तुम्हारे ऐसा करने से मेरे ख़याल बिखर जाते हैं। ऐसा लगता है पेट में कुछ घुमड़-घुमड़कर हवा चल रही है।
मैं भी कितनी पागल हुई जा रही हूँ। तुम मेरे पेट में से कैसे देख सकती हो यह दशा? लेकिन तुम्हें पता है, तुम और मैं अलग नहीं हैं। तुम मेरे शरीर से जुड़ी हो। यह बहुत अद्भुत बात है कि मुझे हूबहू अपने जैसे इंसान बनाने की कला आती है। सभी औरतें ऐसा कर सकती हैं। और जो नहीं कर सकते वे कला के ज़रिए अपने को पेश कर लेते हैं। इसलिए तुम मेरी कला हो। कला के पास वह दिव्य शक्ति होती है जो सबकुछ देख सकती है और जीवन में बहा करती है। तुम कहोगी मैं फिर अजीब-सी दार्शनिक बातें कर रही हूँ। अच्छा है न, तुम सुनती भी तो हो! तुम मेरे लिए सुनने वाले दो कान हो।
अभी सोने का समय नहीं हुआ है तुम्हारा। तुम सुनती हो तो लगता है कि मेरे साथ कोई है। तुम पेट में तैरती हो तो लगता मैं ज़िंदा हूँ। मैं मर नहीं सकती, क्योंकि तुम मेरे अंदर हो।
अच्छा एक बात कहूँ? मैं दार्शनिक नहीं हूँ। मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं है, शायद है भी! मैं एकालाप बहुत करती हूँ।
महिला लंबी सांसें ले रही थी। ऐसी जो शायद वे कभी भूल गई हो। उसका पेट उभरा हुआ था। गर्भ के चलते ही वह सिकुड़कर और छोटी दिख रही थी। बाल बेढब थे। कंघी किए शायद काफी समय हुआ था। दयनीय स्थिति की उस समय मालकिन थी। अगर कोई भी व्यक्ति उसे देखता तो शायद उसे अच्छा खाना बनाकर तुरंत खिलाता। कमरे की एक दीवार पर दो कमीज़ें भी थीं जिससे पता चलता है कि उस महिला के साथ कोई रहता भी है। घर की स्वामिनी तो वह नहीं ही लग रही थी। पर कमीज़ें चिल्ला-चिल्लाकर बता रही थीं कि वे ही इस घर की मालिक हैं। शाम होते ही वे कमीज़ें बता देंगी कि वे सही हैं। सौ फीसदी सही। उसने पलंग पर बाईं ओर करवट बदलते हुए फिर कहना शुरू किया।
उस रात मैंने अजीब-सा सपना देखा। मैं भी कितनी मूर्ख हूँ। सपने तो अजीब होते ही हैं। तुम बहस कर रही थी मुझसे। बहस से मेरा रक्तचाप बहुत बढ़ गया था। मैंने कहा, देखो ज़रा, अभी खुद तो नाल से टिकी है और मुझसे ज़ुबान चला रही है! मैं सांस न लूँ न, तो मर जाओगी तुम! बेमौत...!
लेकिन तुम कुछ न बोली। तुम्हारी तो सूरत भी अभी विकसित नहीं हुई होगी। अजीब-सी पीली और भूरी शक्ल थी तुम्हारी। शरीर के नाम पर पिलपिला मांस। तुम बहुत ही दयनीय लग रही थी। मुझसे भी अधिक दया करने लायक प्राणी। मुझे किसी शक्ति से यह बात पता थी कि तुम लड़की हो... एक लड़की! मैंने आँखें बंद कीं तो एक तरह के रंग के छींटें दिखाई देने लगे। शायद यह सब मेरे ज़्यादा सोचने का नतीजा है।
तुम चूंकि जन्मी नहीं हो इसलिए मैं तुमसे अच्छे से और मुनासिब बातें कह पाती हूँ। मैं अधिक पढ़ी-लिखी तो नहीं। पर लिखना जानती हूँ। मैं डायरी लिखती पर इस तरह का खर्च और रचना करना भी हम गरीबों के लिए भारी है। इसलिए मैं तुमसे ही बात कर लेती हूँ और सोचती हूँ कि मेरी बातें ही मेरी रचना है। और तुम, जिसने अभी जन्म नहीं लिया उस रचना की क़द्रदान। तुम मेरी डायरी ही हो। तुम्हें मैं एक तरह से रच ही तो रही हूँ।
अभी मेरी उम्र बत्तीस के पड़ाव पर है। जब मैं बाईस या तेईस की रही होउँगी, तब मैं कुछ-कुछ अंतराल में एक सपना देखा करती थी। बाईं ओर सीने की जगह पर कुछ चलता रहता था। बाद के बरसों में पता चला इस मांस के अंदरूनी लोथड़े को ही दिल कहते हैं। कुछ लोग मन भी कहते हैं। लेकिन एक बात कहूँ, जब दिल कहती हूँ तो ठोस चीज़ का अहसास होता है और जब मन कहती हूँ, तब अदृश्यता ही समझ आती है। मुझे दोनों से ही प्रभावित होने की मनाही थी। मैंने सपने में देखा, मैंने दिल को एक क़ैदखाने में ले जाकर रख दिया है। तुम कहोगी मैं पागल हूँ। पर मैं कहूँगी, नहीं! यह सपना है। सपने अजीब ही होते हैं।
जब मैंने उसे एक ऐसी जगह रखा जहाँ उसके मरने की अधिक संभावना थी तब मुझे डर भी लगा कि इसके बिना मैं जी भी पाऊँगी या नहीं। मुझे समझाया गया, खूब समझाया। इसके बिना लड़कियों की उम्र ज़्यादा होती है। मैं मान भी गई। कुछ दिनों बाद दिमाग भी निकालकर मैंने उसी तय क़ैदखाने में जा रख छोड़ा। इस बार मैं बहुत डर गई। घर आकर मैं बेहद परेशान रहने लगी। हालांकि मुझे यह बताया जाता रहा कि तुम ऐसी ही रहती आई हो सदियों से। लेकिन मेरी बेचैनी ने मुझे चैन न लेने दिया। मुझे लगा मैं मर रही हूँ। मुझे खुद को मरने से रोकना था। कैसे भी करके दोनों को वापस अपनी जगह सेट करने का खयाल था।
क़ैदखाने के गेट पर अजीबोगरीब जल्लाद बैठा करता था। अजीब इसलिए कि वह पूरा सामान्य-सा इंसान था। बिल्कुल सामान्य। मुझे हैरत हुई।
...तुम सुन तो रही हो न? बोर हो जाओ तो बताना!
मैंने एक हफ्ते तक उस जगह के बारे में जानकारी जुटाई। इस काम में जोखिम था। लेकिन जोखिम ही ज़िंदगी की सच्चाई और सिंचाई है। मैं यह जोखिम नहीं उठाती तो मर सकती थी। फिर मुझे आगे आने वाली पीढ़ियों का भी खयाल आया।
मैंने घड़ी के समय के मुताबिक रात एक बजे का समय चुना। मैं गई। जल्लाद से बोली कि एक झलक लेनी है दोनों की। बाहर से ही देखकर वापस आ जाऊँगी। उसे बहुत मनाना पड़ा। तब जाकर वह माना। जहाँ दोनों क़ैद थे, उस कमरे में एक आदमक़द खिड़की थी। मैंने बाहर से देखा। तुम यकीन नहीं करोगी। एक अजब रोशनी से वह जगह गुलज़ार थी। हरी लताएँ, ढेरों ताज़ा पत्तियाँ, फल, सबकुछ!
ऐसा लगा कि ज़िंदगी यहीं गुलज़ार है। मैंने नज़रें घुमाई तो देखती हूँ कि ढेरों किताबें, डायरियाँ और कलम वहाँ पड़ी थीं। मुझे बहुत हैरत हुई।
मुझे ऐसा अद्भुत दृश्य कभी नहीं दिखा था। एक पल को लगा कि दीवार टूट जाए और मैं वहाँ घुसकर इस नज़ारे को पास से निहार लूँ। इस खूबसूरती को देखने के दौरान अपने दिल और दिमाग की खबर के लिए नज़रें घुमाईं तो वे नहीं दिखे। मुझे फिर हैरत हुई। बाहर जल्लाद से पूछा कि कमरे में किताबें, लताएँ, पेन आदि के क्या कारण है? तब वह घूरते हुए बोला इनसे दूर रहो। हिम्मत भी नहीं करना इनको देखने या छूने की। मैं घर आई। कई दिन सोई नहीं। इसी दौरान अपने कॉलेज के किताबघर गई। मैं अब भी सांस लेने की कमज़ोरी से गुज़र रही थी। पर जैसे ही किताब घर गई और उन्हें छूआ तब मेरा दर्द और रोग जाता रहा। मैं ठीक महसूस कर रही थी। अब मुझे यह डर था कि अगर मैं इस जगह से निकलूंगी तब फिर सांस कम होगी और शायद मैं मर जाऊँगी। इसलिए काफी देर बैठी रही।
किताबघर बंद करने का समय हुआ तब मेरा डर और बढ़ा कि अब क्या होगा। मैंने आनन-फानन में जितनी किताबें जारी की जा सकती थीं, उतनी करवाकर अपने बैग में रख लीं। अपने संग ले आई। रात भर बैग अपने पास ही रखा। नज़रों से ओझल नहीं होने दिया। उनके पास होने से मुझे क़ैदखाने का वही दृश्य दिखा। अच्छा लगा।
अब यह सपना नहीं आता। कुछ दिन बाद मेरी शादी हुई और मेरा नाता किताबों से कम हो चला। चोरी-चुपके से सिरहाने कुछ अखबार की कतरने रखती हूँ या फिर कोई दो रुपए का पतला पैन जिनसे मुझे ऊर्जा मिलती रहती है। तुम जब आओगी तब तुम मेरी जैसी गलती मत करना। हमारी सारी शक्ति इन्हीं किताबों में है। इसलिए तुम इनको अपने से चिपका कर रखना! सुन रही हो न? मैंने क्या कहा? कहीं तुम सो तो नहीं गई? तुम कभी भी अपना दिल और दिमाग अपने से जुदा मत करना। वरना तुम्हें भी सांस लेने की परेशानी होगी और हो सकता है कि तुम्हारी जान पर भी बन आए।...!"
इतना कहकर वह औरत अपनी करवट बदल लेती है।
मरजीना
वह आज चुपचाप बैठी है। बेहद! उसकी बेटी डरपोक कब से हो गई? उसके लिए यह सवाल आज बहुत बड़ा बन चुका है। उसने पहले ध्यान क्यों नहीं दिया? कब से उसने घर के काम काज के चलते अपनी बेटी का चेहरा देखना और समझना बंद कर दिया है? उसने दिमाग पर ज़ोर डाला। पर वह ज़्यादा सोच नहीं पाई। उसे लगा अगर वह सोचेगी तो हो सकता है दिमाग में कोई धमाका हो जाए। शायद उसकी मौत भी हो सकती है। उसने न सोचने के लिए कुर्सी पर अपनी पीठ टिकाकर कुछ राहत की साँस अंदर लेने की कोशिश की। उसने आँखें बंद कीं। बेटी की छुटपन से अब तक की तस्वीरें उसके दिमाग में एकाएक उभर आईं। उसके चेहरे पर अब राहत थी।
वो देर तक कुर्सी पर ऐसे ही पड़ी रही। वह सोई नहीं थी बल्कि अपनी ज़िंदगी के सैलाब में तैर रही थी। उसने कभी इस वक़्त के बारे में नहीं सोचा था। वक़्त ने उसे जो भी दिखाया उसने समझदारी से सबका सामना किया। उसने हमेशा अपने सोए हुए मन में दिलेरी को छुपाए रखा और वक़्त आने पर उसका इस्तेमाल भी किया। उसने कभी अपने अकेले होने को लोगों के लिए फ़ायदा उठाने की वजह नहीं बनने दिया। उसे पता है कि अकेली औरत पर हमले ज़्यादा होते हैं। और अकेली औरत इन हमलों से बच भी सकती है।
उसका मन हुआ कि उठकर कमरे में रोशनी कर ले। बल्ब की रौशनी उसे अतीत में जाने से रोक सकती थी। रोशनी की आदत होती है, न सोचने देने की। रौशनी का हमला जब भी उसकी आँखों पर होता है तब वह तुरंत किसी सांप की तरह चौकन्नी हो जाया करती है। वह अकेली माँ है। उसे पता है चौकन्नेपन का मतलब। रोशनी और चौकन्नापन मिलकर उसे इस दुनिया में जीने लायक बना देते हैं। लेकिन इस वक़्त तो वह अपने अतीत में झाँक रही थी। वह जानती है कि अतीत से वह कुछ ताक़त बटोर कर वापस वर्तमान में ला सकती है ताकि भविष्य को संभाल सके। वह रोशनी के लिए नहीं उठी। उसने बैठकर सोचना जारी रखा।
उसने अपनी ज़िंदगी का एक वक़्त अकेलेपन में गुज़ारा है। उसकी उम्र क़रीब पंद्रह बरस रही होगी जब उसने अपने पिता को एक भयानक दुर्घटना में खो दिया। उसके एक महीने बाद उसकी माँ ने भी पिता के ग़म में इस दुनिया को छोड़ दिया। इसके बाद उसे लगा कि वह भी मर जाए। यहाँ जीने लायक कुछ बचा नहीं है। उसने अपने को घर में कैद कर लिया। उसे आज भी याद है कि कुछ दुःख दुनिया के भारी दुखों में से एक हैं। दुःख व्यक्ति को घिसकर रख देते हैं। पर फिर भी वह जीने लायक अनुभव तो दे ही देते हैं। उसे पता है, अनुभवों के चरागों की ज़रुरत पड़ती है।
उसने अपने पुराने दिनों पर सोचना जारी रखा। वह बेचैन रहने लगी थी। अभी दुःख गया भी नहीं था कि एक हादसा उसका इंतज़ार कर रहा था। उस हादसे ने उसे हमेशा के लिए फौलादी इंसान में तब्दील कर दिया। आज जब वह उस घटना को सोचती है तो वह सहम जाती है। उसके लिए अब बड़े से बड़े धक्के कुछ भी नहीं है। पर आज उसकी बेटी का यूँ डर कर घर लौट आना उसे अखर रहा है। वह ऐसे कैसे होने दे सकती है? उसने ही बाप और माँ बनकर उसे पाला है। उसे प्यार किया है। उसे अब तक सबसे ज़्यादा चाहा है। उसने कुर्सी पर बैठे-बैठे कुछ करने का सोचा। पर क्या, वह नहीं जानती थी।
उसे याद है जिसे उसने चाहा था वह भी उसे छोड़ कर चला गया था। उसने उसे समंदर के किनारे अपने जाने की बात कही थी। उसके चले जाने के बाद वह कब तक वहीं बैठी रही थी। वह चला गया। वह जो सपने टूटे थे, उन्हें समेटते रही। पर वह इतने बिखर गए थे कि वह देर तक कोशिश करती रही, पर उन्हें वह समेट नहीं पाई। कुछ तो समंदर के पानी में खारे हो गए। कुछ भाप बनकर उड़ गए। कुछ उसी समय हुई बारिश में बह गए। कुछ समंदर के ऊपर से गुज़रते हुए हाई वे पर सवार होकर कहीं चले गए। पर कुछ ऐसे भी थे जो उसे छोड़ने के लिए राज़ी नहीं थे। सो, उसके सीने के रास्ते दिल में घुसपैठ कर के कहीं बैठ गए। कभी-कभी रात के अँधेरे में वे उन्हें जगाती है पर रेवा की आहट सुनकर उन्हें तुरंत किसी चीज़ से ढक देती है। रेवा को नहीं पता चलना चाहिए कि उसकी माँ के दिल में कहीं कुछ ओस की बूँदें दबी हुई है। पर रेवा को यह बात क्यों नहीं पता चलनी चाहिए, वह यह भी नहीं जानती।
वह जब गया तब वह फिर से अकेले हो गई। जैसे उसके माँ-पापा के जाने के बाद हो गई थी। धीरे-धीरे उसकी उम्र इक्कीस हो चुकी थी। उसके चाचा ने आनन-फानन में उससे पूछे बिना उसी के घर में पत्नी और बच्चों सहित ढेरा जमा लिया था। वह मना करना चाहती थी पर रिश्ते के लिहाज़ से चुप लगा बैठी। वह कहना चाहती थी कि वह ख़ुद अकेले जी सकती है और अपना ख़याल रख सकती है। पर उसकी ये बातें उसके मन में ही रहीं। वह चाहकर भी इन बातों को उगल नहीं पाई। उसने पढ़ाई छोड़ कर पार्ट टाइम काम तलाशा और क़िस्मत से मिल भी गया। उसकी दोस्ती खुशमिजाज लड़की सलोनी से हुई। सलोनी ने अपने घर वालों के खिलाफ़ जाकर अमर से शादी की थी। कई बार बातों-बातों में सलोनी अपना दुःख भी जता देती थी। फिर भी उसे सलोनी में कुछ ख़ास दीखता था जो ख़ुशी के साथ झलकता था।
उसे हमेशा सलोनी में बहादुरी दिखाई देती थी। उसे अमर भी ख़ास लगता था। शांत-सा रहना वाला लड़का। लेकिन एक सुबह जब उसका फोन बजा तब बुरी ख़बर ने उसके कान से खून ही निकाल दिया जब वह सलोनी और अमर के घर पहुँची तब पुलिस ने शुरूआती पूछताछ की और यह बताया कि दोनों का देर रात खून हुआ है। बच्ची जब सुबह उठी तब से रो रही है। शक होने पर पड़ोसियों ने पुलिस बुलाई। दोनों की हत्या बेरहम तरीके से हुई। उसे लगा उसकी दुनिया एक बार फिर उजड़ गई। रेवा, सलोनी और अमर की आख़िरी निशानी थी। रेवा को यह बात आज भी मालूम नहीं कि वह उसकी बेटी नहीं है। रेवा को पालना उसके ज़िंदगी के सबसे महान सुखों में से एक सुख था। लेकिन रेवा के चलते उसके चाचा और चाची में न दिखने वाली जलन महसूस होती थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके ख़ुद के रिश्तेदार उस पर क्या करना है और क्या नहीं करना है का दबाव डालेंगे।
जब वह रेवा को क़िताबी कहानियाँ पढ़कर सुनाती तब कभी-कभी वह बीच में रुक जाती। उसे अपने ही घर में यह महसूस होता था कि उसके शरीर को कोई दो आँखें घूरे जा रही हैं। ऐसा लगता था कि उसके नहाने से लेकर सोने तक की प्रक्रिया कोई अपनी निगरानी में रखता है। एक दिन उसने अपने चाचा को गौर से देखा और पाया उन्हीं की दो नज़रें ऐसी हैं जो शिकारी की तरह उसके पीठ पर चिपकी रहती हैं। उसे घर में घुटन-सी होती थी। उसे अपनी और रेवा की फ़िक्र भी होती थी। उसने अपनी चाची से कई बार चाचा के बर्ताव पर बात करने की कोशिश की पर चाची बात सुनना नहीं चाहती थीं।
एक रोज़ रेवा को चाइल्ड केयर में छोड़कर वह घर लौटी। घर में अजीब-सा एक सन्नाटा था। उसने चाची को कई आवाज़ लगाईं पर वह कुछ न बोलीं। थोड़ी देर बाद चाचा अपने कमरे से निकल कर आए और कहा, “कई औरतें मंदिर गई हैं। वो भी उनके साथ चली गई है।” उन्होंने शरीर पर एक तौलिया ही लपेटा हुआ था। एक अजीब-सी दहशत उसके मन में घुस गई। उसने नज़रें नीचे कर लीं। वह रसोई की तरफ़ बढ़ चली। पीछे से उसके चाचा ने कहा, “अगर चाय बनाने जा रही हो तो मेरे लिए भी एक कप बना लेना। तुम्हारे हाथों की चाय की बात ही अलग है।” वह सहम गई। उसने एक शब्द भी मुँह से न बोला। उसके मन में हुआ कि चाची जल्दी से आ जाए।
दूध डालने के बाद वह अपने ही डर में खड़ी हुई बेसुध हो चुकी थी। उसके मन में डरावने ख़याल आ रहे थे। तभी उसने अपनी कमर पर किसी के हाथों को महसूस किया और चौंकते हुए पीछे मुड़ी। उसके डर ने उसके चाचा का लिबास पहन लिया था। उसने अपने को छुड़ाने की कोशिश की। पर उसकी कोशिशें मरती जा रही थीं। उसने चाय का बर्तन उठाकर चाचा के सिर पर दे मारा और चिल्लाना शुरू कर दिया। लेकिन बंद दरवाजे से आवाज़ बाहर कम जा रही थी। उसने अपनी शक्ति बटोरकर हैवान को रसोई से बाहर किया और कुण्डी लगा कर अपने को रसोई में ही बंद किया।
सिर की चोट और गर्म चाय गिरने के कारण चाचा की बौखलाहट बढ़ गई थी। उसने उसे गंदी-गंदी गालियाँ देकर दरवाज़ा खोलने के लिए कहा। पर वह एक कोने में दुबक चुकी थी। फोन बाहर था। उसने अपने आप को असहाय महसूस किया। डर ने उसे बर्फ की तरह जमा दिया था। दरवाजे पर लगातार प्रहार हो रहे थे। उसे लगा कि अब वह नहीं बचेगी। उसने आँखें बंद कीं। उसे रेवा का चेहरा दिखा। वह बोलती हुई दिखी, “माँ उठो...माँ उठो!” उसने आँखें खोलीं। अपने आप को संयमित करने की कोशिश की। उसने उसी चाय के बरतन में आनन-फानन में सरसों का तेल गैस पर तेज आँच पर गर्म करना शुरू किया।
उधर दरवाज़ा टूटने की कगार पर था। इधर तेल गर्म होना शुरू हुआ। उसके मन में कोई ख़याल नहीं था। उसे बस यह महसूस हुआ कि उसे अपने को बचाना है। अपनी रेवा को बचाना है। जैसे ही दरवाज़ा टूटा उसने खौलता हुआ तेल हैवान बन चुके आदमी पर फेंक दिया। वह आदमी चीख़ उठा। उसने उसी बरतन से उसके सिर पर कई वार किए। वह बुरी तरह घायल था और चीखे जा रहा था। तभी दरवाजे पर घंटी बज गई। उसे घंटी की आवाज़ सुनकर थोड़ा होश आया। उसने जल्दी से दरवाज़ा खोला और चाची को सामने खड़ा पाया।
वह इस दिन को कभी नहीं भूलती न भूल सकती है। दो ही दिन में उसने अपने कथित रिश्तेदारों का बोरिया बिस्तर समेट दिया। चाची ने ढेरों मिन्नतें कीं। लेकिन उसने एक भी न सुनी। वह कुछ सुनना और कहना नहीं चाहती थी। उसे याद रहा तो वही बचपन वाली कहानी जिसमें मरजीना ने अपने दिमाग के चलते चोरों को गर्म तेल से ढेर कर दिया था। बल्कि उसने मरजीना के दिमागी हिस्से को अपने अंदर बसा लिया था। उसने कुर्सी पर बैठे-बैठे सोचा कि उसे यह कहानी रेवा को भी सुनानी चाहिए। उसने कुर्सी में देर से धंसे हुए शरीर को शक्ति लगाकर उठाया और किताबों के बीच मरजीना वाली कहानी खोजने लगी। वह उस किताब को रेवा के आने से पहले खोज लेना चाहती थी। वह रेवा को उन सभी बहादुर औरतों के बारे में बताने के बारे में सोच रही थी, जिन्होंने अपने दम पर ख़ुद को बनाया था। रेवा को यह सीखना और जानना ज़रूरी था।
रेमन की कमीज
आज सुबह अपने भाई की दफ़्तरी की तैयारी देख रही थी। कभी कोई
क़मीज़ निकाल रहे थे तो कहीं कुछ जुराबों की जोड़ी देख रहे थे। इस बीच भाभी की क्लास
भी लग रही थी। तुम न जाने कहाँ सामान रख देती हो... खाना तो लगा दो... लंच रख
दिया...शाम को गोभी मत बना देना...कुछ अच्छा सा पका देना... जया कुछ दिन ही यहाँ
है। फिर तो ये चली ही जाएगी, गाँव में। भाभी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं
था। कभी देखा भी नहीं है। जो भैया बोल रहे थे उसे करने की खामोश हामी देती जा रही
थीं। मैं होती तो शायद हंगामा ही कर बैठती। मैं सुबह से उनके कमरे में ही लेटी हुई
थी। इसलिए इस नज़ारे को पास से देखने में अजीब सा लग रहा था।
आज भैया ने पीले रंग की
क़मीज़ पहनी थी। अच्छे लग रहे थे। अचानक मेरी तरफ़ देख कर बोले- 'आज जाना
नहीं है कहीं, कुछ दिन से देख रहा हूँ,
अज़ीब सी रहती हो… जैसे गुम हो कहीं…
ठीक हो? तुम्हें भी न जाने क्या सुझा है कि गाँव में पड़ी हुई
हो। शहर में अच्छा नहीं लगता क्या? यहीं रह जाओ!’ वाक्यों में आये सवाल मुझे क़मीज़ के ख़याल से जगा गये। मैंने अपनी गरम शाल
को अच्छे से बदन पर लपेटते हुए कहा- ‘हाँ, कुछ थकावट सी लग रही है। जानते ही हो सर्दी और शहर में तबीयत कैसे बिगड़
जाती है और आलस बहुत आ जाता है...।' वो बस ‘हम्म’ बोले और जल्दबाज़ी में निकल गए। उनके पास समय
कहाँ था, नौकरी जो बजानी थी।
मेरे मन में बार बार
क़मीज़ का ख़याल रह रहकर आ रहा था। जिस क़मीज़ का ख़याल आ रहा था उसका रंग गाढ़ा लाल था।
क्यों अटका है दिमाग, आज क़मीज़ पर? शायद कोई कहानी आने को हो रही है मेरे
मन में। भाभी मुझे चाय देने आई तब ध्यान टूटा और मैंने अपने हाथ में गरम गिलास ले
लिया। मुझे लगा वो कुछ देर मेरे पास बैठेंगी और कुछ बात होगी। पर वो तो तुरंत ही
चली गईं। मैंने सोचते सोचते चाय पी। आख़िरी घूट जो अंदर गया तो लगा- 'हाय इतनी जल्दी ख़त्म हो गई!' चाय पीने के थोड़ी देर
बाद मुझे नींद आ गई। जब ऐसी नींद का अहसास हो तब मुझे अंदाज़ लग जाता है कि मैं देर
तक इस दुनिया में नहीं रहूँगी। कोई दरवाज़ा खुलता है और में भीतर चली जाती हूँ।
जिसे लोग सपना या ख़्वाब कहकर पुकारा करते हैं मैं उस दुनिया को अपने सबसे क़रीब
पाती हूँ। अपनी असली जगह। ख़ैर, मैं पहुँच चुकी थी।
इस बार मेरी उम्र लगभग
दस बरस के आसपास है। रविवार का दिन है सो माँ ने हम सभी पर मेहनत कर के हमें तैयार
कर दिया है। हम कुछ ही समय के लिए गाँव में रहने आए हैं। मैंने अपना वही नीला रंग
पहना है। मेरे लिए ख़ास तौर से माँ ने सिला है। नीला सूती का टॉप और निकर। पापा को
मैं ऐसे ही कपड़े में अच्छी लगती हूँ। बालों को ज़िद्द कर के पापा ने कटवा दिया है।
माँ का कहना है कि लड़कियों के बाल बड़े होने चाहिए। पर दिल्ली जाने से पहले वो बाल
कटवा गए। सर्दी जाती हुई दिनों में थोड़ी बहुत ही रह गई है।... लो टीवी के एंटीना
पर कौआ बोल रहा है। मैं गणित की कॉपी में कुछ सवाल हल कर रही हूँ। शायद गुणा के
हैं। मैंने उस पक्षी को घूरा। काले कागा का बोलने का मतलब घर में किसी
मेहमान का आना। मैंने कागा को घूरते हुए सोचा अब कौन आ सकता है। मामाजी तो कुछ दिन
पहले ही गए हैं। अभी इसी तरह के खयाल चले रहे थे दिमाग में, तभी
किसी ने मेरे नाम को उत्साह से पुकारा। देख जया! जल्दी नीचे आ!... फूफाजी आए हैं
और देख कितना सामान लाये हैं। हम दोनों भाई बहन की निगाह सबसे पहले उनके हाथ में
पड़े खाने के सामान पर गई।
मेरे फूफाजी एकदम
वज़नदार आदमी थे। रंग ख़ूब गोरा था इसलिए बुआ की जगह, दादी को पसंद आ गए थे।
यह नहीं मालूम कि बुआ को वो उस समय पसंद थे भी या नहीं। बस दादी ने ही सभी फैसले
ले लिए थे। बुआ की शक्ल से ऐसा मालूम होता है कि वो बहुत जल्दी 'अडजस्टमेंट का शिकार' हो गई थीं। माँ के बारे में
ऐसा नहीं लगा। शायद हो भी सकता है। माँ अच्छी अभिनेत्री है। जब देखो खुश ही नज़र
आती है। ख़ैर, मेरे आस पड़ोस में सभी शादीशुदा औरतें खुश ही
दिखती हैं। ...वापस फूफा जी पर आते हैं। फूफा जी दिल के बेहद बुरे इंसान हैं। वो
लोगों पर बहुत खर्च करते हैं इसके अलावा लड़कियों को बहुत छूट भी देते हैं। इतनी
छूट दी है कि लड़कियों की ज़ुबान कैंची जैसी चलती है। ऐसा मेरी दादी और फूफाजी की
माँ का कहना है। पर हमारे घर जब भी आते हैं, मुझे तो बहुत
अच्छा लगता है।
माँ के साथ तरकारी
कटवाने के साथ साथ कई गाँव की बातें भी बताते हैं। मुझे बैठने का मौका भी मिल जाता
है। हालांकि माँ की शिकायत है कि बड़ों की बैठकी में 'तुम
बच्चे' नहीं जमने चाहिए। पर फूफा जी अलग हैं। कहते हैं- 'जाने दो, इन्हें भी तो कल दुनियादारी में उतरना ही
है। अभी से सीख लेने दो।'
बातें निकलती हैं तो
कितने क़िरदार भी निकल आते हैं उनके साथ। ऐसा ही एक क़िरदार हलधर भईया निकल आए।
फूफाजी के सबसे बड़े लड़के। गाँव से शहर तक उन्हीं के चर्चे गूँजते हैं। सो इस बार
फिर उनकी शादी का ज़िक्र छिड़ गया। फूफाजी तो अब हलधर भईया के इस नए रूप को अपना
चुके हैं पर बुआ हैं कि आज भी उन पर शादी का दबाव डाल रही हैं।
'हलधर भईया कुँवारा बाप हैं।'
कुछ बरस पहले वो दिल्ली
में हमारे ही साथ रहते थे कोई तकनीक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उन्हें भी कपड़ों का बेहद
शौक़ था और फूफाजी से वह बेहिसाब रुपया लेकर अपने पर खर्च करते थे। माँ ने कई बार
कहा भी कि इतनी खर्चीली अच्छी नहीं है। तब वह कहते - 'मामी,
तुम न जानो कि क्लास में कितने बड़े लोग आते हैं। बराबर का न दिखूँ
तो किताब के शबद (शब्द) भागने लगते हैं। आँख टिकती है नहीं।' इसी दौरान उन्हें किसी पहाड़ी लड़की से इश्क़ हो गया। उस लड़की को लाल रंग
बहुत पसंद था। सो हलधर भईया लाल रंग की क़मीज़ बहुत पहना करते थे। हालांकि हम सब
उनका मज़ाक उड़ाते थे। पर वह कहते थे- 'इश्क़ होगा तब जानोगे!'
उन्हें अपनी एक ख़ास कपड़े की क़मीज़ से न जाने क्यों इतना लगाव था कि
वह खुद उसे धोया करते। बड़े जतन से रखते थे। माँ ने कहा भी- 'मुझे
दे दिया करो धोने के लिए। पढ़ाई में मन लगाओ। घर के काम तुम न किया करो। दीदी
सुनेंगी तो कहेंगी कि मेरे लड़के की एक क़मीज़ भी नहीं धोई जा रही।'
लेकिन हलधर भईया ने
कहा- 'मामी आप चिंता न करो। रेमंड की क़मीज़ है। इसकी धुलाई मैं ही करूँ तो अच्छा
है।' इस बात से इतना तय था कि यह क़मीज़ उनकी जान बन गई थी। एक
दाग भी नहीं लगने देते थे। मैंने पूछा भी था एक बार। 'भईया,
ऐसा क्या है इस क़मीज़ में जो जान से अधिक समझते हो?' वो बस मुस्कुरा कर बोले- 'बच्ची है तू! चल जा पढ़ाई
लिखाई कर।'
पढ़ाई के बीच में उन्हें
गाँव से बुलावा आ गया कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है। सो दो या चार दिन ख़ातिर आ जाओ।
वो जो गए वापस दिल्ली लौटे ही नहीं। गाँव के ही होकर रह गए।
आइये, उनकी
आगे की कहानी लोगों की कही- सुनी बातों से आप लोगों को बताती हूँ।
अक्तूबर की हल्की
सर्दियों के महीने में वे गाँव गए। बुआ की हालत बहुत ही अधिक खराब थी। फूफा जी का
दिल बैठ गया था कि उन्हें कुछ हो गया तो बेटियों और बेटे को कौन देखेगा। इस हालात
में हलधर भईया ने बुआ जी की ख़ूब सेवा की और अच्छे से अच्छे अस्पताल में ले गए। उनकी
दशा में सुधार आ रहा था। दिसंबर के अंत में बुआ जी बिलकुल चंगी हो गई थीं। सो हलधर
भईया पर दबाव डाला गया कि शहर आकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लें। वो शुरू में राज़ी नहीं
थे। पर फूफाजी की बातों से मान गए।
हमारे गाँव से रेलवे
स्टेशन लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर है। इसलिए ट्रेन चाहे कितने भी समय कि हो लोग कई घंटे
पहले ही पहुँच जाते हैं। कारण कोई साधन नहीं है। जो हैं वे भी बहुत नाममात्र के।
इसलिए जनवरी के सर्द दिनों में कोई भी वाहन ही नहीं मिल रहा था जो रात को स्टेशन
पहुंचा दे,
ताकि सुबह की ट्रेन पकड़ी जा सके। ट्रेन का टिकट तो रात के समय वाला
भी मिल सकता था। ताकि सुबह स्टेशन के लिए रवाना हुआ जाए। पर हलधर भईया रात को सफर
कर के (गाँव से स्टेशन का) परंपरा और डर ख़त्म करना चाहते थे। गाँव के लोगों में
भूत-पिशाच, चुड़ैल, डाकू, चोर लूटेरों आदि का गजब भय था। इसलिए वे रात को ही सफर पर जाकर यह बतलाना
चाहते थे कि इन सब वहम को ख़त्म करना होगा। इसलिए जानबूझकर ऐसी टाइमिंग वाली ट्रेन
का टिकट ले आए थे।
फूफाजी भी कोई कच्चे
खिलाड़ी नहीं थे। उन्हों ने रात के अंधेरे को ख़त्म करने के लिए जाने कौन सी कुलदेवी
की पूजा का आयोजन कर लिया और सभी गाँव वालों को रातभर उसमें शामिल होने का न्योता
दे डाला। इससे दो काम हुए। गाँव में जनरेटर से लाइट आ गई। गाँव रोशनमान हो गया
दूसरा गाँव के सभी बड़े-बूढ़े, लड़के लड़कियां, बच्चे,
आदमी औरतें एक जगह इकट्ठा हो गए। तय किया गया कि देवी का विसर्जन
स्टेशन के पास पढ़ने वाली नहर में कर देंगे। नहर है तो क्या हुआ, सुना है गंगा जी से ही निकली है।
लोग बताते हैं कि उस
रात गाँव में बहुत हलचल थी। गीत संगीत, बातें, दुख,
किस्से, खुशी, हंसी,
किलकारी सब कुछ इकट्ठा हो गया था। फूफाजी के नाम को लेकर आशीष गीत
गाये जा रहे थे। छ या सात जीपों का इंतजाम किया गया था। देवी के विसर्जन में यह
सभी जीपें जाने वाली थीं। आठवीं जीप में हलधर भईया और गाँव के पाँच छ लड़के स्टेशन
तक उन्हें छोड़ आयेंगे, ऐसी योजना बनाई जा चुकी थी।
औरतों ने गीत मंगल गाया
और विदा किया। सभी जीपें आगे जा रही थीं अच्छी गति के साथ। सबसे पीछे हलधर भईया की
जीप थी। भईया ने पहले ही चालक को जीप धीमें धीमें चलाने का हुक्म दिया था। सो ये
सभी दोस्त यार ख़ूब शहर और उसके मिजाज की बात करते हुए मज़े में जा रहे थे। कोई
भोजपुरी गीत भी बजाया जा रहा था।
भईया को अचानक क्या
सुनाई दिया और गाना बंद करवा कर सभी को श...कर के चुप करवाया। बोले- 'कोई
बच्चा रो रहा है शायद!' गाड़ी में बैठे लोगों में से एक बोला-
'अरे चलो। किसी डायन या चुड़ैल का काम है। ऐसे ही रास्ता रोका
जाता है।' भईया नहीं माने और गाड़ी से उतर गए। टॉर्च को जलाते
हुए वह उस जगह पहुँच गए जहां से बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही थी। टॉर्च की रोशनी
में उन्हे वह बच्चा दिखा तो झट उठा कर सीने से चिपटा लिया। जैकेट के अंदर और रेमंड
क़मीज़ से चिपटा हुआ बच्चा कुछ पल में सर्दी से राहत पा कर चुप हो गया। भईया ने कई
आवाज़ें लगाईं। गुस्से में आठ दस भयंकर गाली भी दी। कहा- 'साला,
पालना नहीं होता तो पैदा क्यो करते हो? सर्दी
में इतने से बच्चे को कोई छोड़ता है क्या? साले इंसान हो या
जनावर'(जानवर)...!' थोड़ी सी दूर कोई
सफ़ेद साया सा दिखा। लेकिन भईया जैसे ही टॉर्च उस ओर ले गए, हिलती
हुई झाड़ियों के अलावा कुछ न दिखा। बच्चा रेमंड क़मीज़ से चिपकाए वे वापस जीप में आए
और घर वापस चलने को कह दिया।
उधर फूफाजी स्टेशन पर हलधर भईया को न पाकर ख़ूब परेशान हुए और
देवी को विसर्जित किए बिना ही वापस घर आ गए। ...घर पहुंचे तो बेटे को तो नहीं पाया
पर कंबल में एक बच्चे को गोद में लिया हुआ कुँवारा बाप ज़रूर उन्हें दिखा। उस रात
गुस्सा और ख़ामोशी फूफाजी के घर में ख़ूब रही। शायद यह सिलसिला ज़्यादा चला भी। किसी
ने भईया को 'किरांतिकारी' तो 'पागल'
भी कह दिया था।
बच्ची अब थोड़ी बड़ी हो
गई है। भईया ने उसका नाम बुलबुल रखा है। कहते हैं यही अच्छा नाम है। शुरू में उनके
इस फैसले से बहुत झगड़े हुए पर अब घर सामान्य हो गया है। भईया 'हलधर
मैया' में तब्दील हो चुके हैं। शहर के प्रेम को यह कहानी
सूचित कर चुके हैं। उन्हें दुख है पर बुलबुल को देखकर भूल जाते हैं।
रुकिए...रेमंड की क़मीज़
को क्यों भूल गए?
बुआ एक रोज़ उस क़मीज़ को
धोने जा रही थीं। भईया ने न जाने क्या सोचकर कहा कि इसका पौंछा वगैरह बना लो। मैं
नहीं पहनूंगा। इस बात पर बुआ हैरान होकर बोल उठीं- 'तू ही तो कहता था रेमन की
क़मीज़ है रेमन की क़मीज़ है...और आज इसे कह रहा है पौंछा बना लो। तुझे क्या हो गया
है...इस बच्ची के पीछे तू पगला गया है।' भईया कुछ न बोले बस
बच्ची की ओर देखा। वह बड़े इत्मीनान से सो रही थी।
लगभग एक महीने बाद
दूसरे किसी गाँव से खबर आई कि किसी लड़की ने आत्महत्या कर ली है। पुलिस जांच में
कुछ और मालूम चल रहा है। कहा जा रहा है कि एक लड़की का उसी के घर किसी रिश्तेदार ने
जबरन अत्याचार किया था। लड़की ने राज़ खोलने की धमकी दी तो मार दिया गया। पुलिस की तहक़ीक़ात
जारी है। लोग बोलते हैं बुलबुल उसी की लड़की है।
...मेरी आँखें खुली हैं
तो ऐसा लग रहा है कि मैं कई महीनों से सोई हूँ। सपने देखना अपने को थका भी देता
है। कितने बरस पीछे चली गई थी। माँ ने जया-जया कर मुझे उठाया तो मालूम चला बुलबुल
आई है फूफाजी के साथ घूमकर। मैं फौरन उठकर उससे मिलने चल दी। ट्रेन
की टिकट भी बुक करनी है। हलधर भैया बुलबुल को देखने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं।
मैंने उन्हें विश्वास दिलाया था कि मैं इसका अच्छे से खयाल रखूंगी और समय पर साथ
लेकर फूफाजी और माँ के साथ लौट आऊँगी।
कृष्ण की मृत्यु
अपने कपड़ों में लगे रक्त की गंध से वह भागने का प्रयास कर रहे
थे। इसी प्रयत्न में वे बहुत देर से चले जा रहे थे। उन्हें स्वयं भी नहीं पता था
कि उनके पग किस डगर और पथ पर हैं। जहां मस्तिष्क कहता वे वहीं पग बढ़ा देते।
वातावरण में तेज़ धूप थी
और गरम लू सौगात के रूप में हर जगह फैली हुई थी। गर्मी अपने चरम पर थी। सूर्य
मानों कुपित होकर आग उगल रहे थे। आसपास की सुखी हुई और बेजान घास एक चिंगारी की
प्रतीक्षा में बैठी हुई थी। आकाश का सूनापन अपने में विशाल हो चला था। दृष्टि आसमान
की ओर देख नहीं सकती थी। और तो और कहीं भी बादल का एक छींटा तक नहीं था।
खगों का भी न तो अता था
और न ही पता। कदापि किन्हीं तरूओं की शीतल छाया में किन्हीं ओट में वे अपने जीवन
की इस भीषण गर्मी से रक्षा कर रहे थे।
कुछ क्षणों के लिए
उन्होंने इस माहौल में अपने दायें हाथ की ओट माथे पर बनाई और चारों ओर देखा।
निर्जल और निर्जन भूमि दूर प्रदेश तक फैली हुई थी। वे भली प्रकार से परिचित थे कि
ये युद्ध का परिणाम है। इसी के चलते आवरण में इस प्रकार की स्थिति बन पड़ी है। पर
वे तो घर की ओर लौट रहे हैं। वे इन सब के बारे में पुनः नहीं सोचना चाहते। उनके
ईश्वर मन ने कहा, “यह आप किस प्रकार के स्मृति चित्र में उलझ गए? यह आपका कार्य नहीं। आप ईश्वर हैं। अतः ईश्वर के समान ही व्यवहार करें।”
मानव मन कुछ न बोल सका।
वे क्षत विक्षत था। युद्ध के कारण उसकी मानवता पर गहरा आघात पहुंचा था। वह विषाद
की खाई के गुप्प अंधेरे में घुट रहा था।
पर इतना तय था कि ये ‘अवतार’ मन की अकुलाहट के कारण अस्थिर था। वह सूर्य को आदेश देना चाहते थे कि
अपना सूर्यताप कम करे ताकि सभी को आराम मिले। पर न जाने क्या सोचकर आदेश नहीं
दिया। तीन चार लंबी लंबी सांसें लेने के पश्चात आगे बढ़ गए। उनका गला प्यास के कारण
सुख रहा था।
उनकी पीली और चमकदार
पवित्र धोती पर रक्त के धब्बे अब तक सूर्य ताप के कारण सुखकर काले बन गए थे और एक
तीव्र गंध लेकर उनके साथ-साथ चल रहे थे। बहुमूल्य आभूषण और मोतियों की मालायें
उनको अब सहन नहीं हो रही थीं। माथे के ऊपर रखा स्वर्ण मुकुट जिसमें कि मोहक मोर पंख
लगा था, वह भी कदापि युद्ध भूमि में कहीं गिर चुका था। इस बात की उनको खबर भी
नहीं थी।
नमकीन बहते स्वेद से
उनकी श्याम वर्ण पर, चमकीली देह छिल गई थी। उनके चलने पर हिलते डुलते आभूषण त्वचा की छिलन पर
भयंकर पीड़ा छोड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद वे उकता गए और मालाओं को तीव्रता से खींच कर
नीचे फेंक दिया। जहां-जहां वे मालाएँ गिरीं तहां तहां हरी घास उग आई और जहां मुकुट
गिरा वहाँ हरा भरा किसी प्रकार का पेड़ यकायक उग आया। विचित्र बात थी कि ईश्वर के
इस अवतार ने अपनी दिव्यता के प्रमाण को धीरे धीरे अपने से अलग कर दिया था। कदापि
वे अवतार की वेषभूषा से अलग होना चाह रहे थे। यह चमत्कार था। पर दिव्यता अलग की जा
रही थी।
पर उद्विग्न मन ने
उन्हें पस्त कर दिया था। थोड़ी देर जब उन्होंने कानों को टिका कर रखा तो एक संवाद
की भिनभिनाहट सुनाई पड़ी। कानों को दायें और बाएँ घुमाया। पर उन्हें आवाज़ का पता
नहीं चला। ध्यान लगाया। नेत्रों को बंद किया तो पता चला कि उनके अंतर में ही संवाद
गूंज रहे थे।
मनुष्य मन और दिव्य मन
के मध्य। देव मन ने कहा,
“आप ऐसा बिलकुल नहीं कर सकते। लोग क्या कहेंगे कि उनके ईश्वर को
क्या हो गया है! आप ईश्वर हैं। सर्वशक्तिमान। सर्वज्ञ। सर्वव्यापी। समस्त सृष्टि
के पालनकर्ता होने के पश्चात भी आप इस व्यवहार में जकड़ गए हैं। अपनी बनाई सृष्टि
की चिंता करना ठीक नहीं। मत सोचिए कुछ भी। युद्ध तो होना निश्चित था ही। याद रखिये, आप एक ईश्वर हैं। लोगों की कामना पूरी करने वाले। एक देवता अवतार।”
मनुष्य मन के नेत्र
अधखुले थे। वह देव मन की बातों को सुनकर कुछ न बोल सका। क्या कहता? ईश्वर
मन तो महान होता है। उसे कौन काट सकता है! पर इतना निश्चित
था कि जो भीषण युद्ध अभी कुछ समय पहले हुआ उसके विषाद के दल दल में वे धँसे चले जा
रहे थे।
इस क्षण के बाद
उन्होंने पग फिर आगे बढ़ा दिये। इस बार उनकी चेष्टा में बहुत ऊर्जा थी। युद्ध के
शस्त्रों के प्रयोग का परिणाम मानव और पृथ्वी पर समान रूप से पड़ा था। पृथ्वी ने
मानों अपने पिता के मरने पर मुंडन करवा लिया है। इस मुंडन में उसने अपने समस्त
संसाधनों को खो दिया। कुछ भी नहीं बचा उसके पास। उसके नेत्र भी सुख गए थे।
बहुत देर से चलने के
कारण उन्हें सिर चकराने और मितली की स्थिति को देखना पड़ा। आँखें चौंधियाँ गईं। दो
पल अनुभव हुआ कि वे गिर जाएंगे।
...और ऐसा हुआ भी।
देवता भूमि पर गिरे या
वह मनुष्य। ये पता नहीं चला। पर उनमें से कोई एक गिर गया था। निर्जीव और मूर्छित
होकर। अब तक अंधेरा होना आरंभ हो गया था। समय की बेल जब आगे बढ़ी तब सांझ के
मुस्काते अंधेरे तले दोनों में से किसी एक को होश आया। नेत्र खोल कर देखा तो
उन्होंने अपने आप को हरी हरी पत्तियों से लदे एक वृक्ष के नीचे पाया।
थोड़ा कमर पर बल लगाकर
धड़ को उठाया और पीछे पड़े काले पत्थर पर टेक लगा ली। सिर को हौले हौले इधर से उधर
घुमाया। कुछ न देख, सुन, सूंघ और अनुभव कर पाने पर नेत्रों को बंद कर
लिया।
इस अंतराल को बीतते हुए
देरी न लगी और उषा ने दिन के द्वार पर दस्तक दे दी।
आँखें खुली तो उनकी
थकान हल्की कम हो गई थी। पल को सोचा कि दाऊ भईया को यह संदेश भेज दूँ कि मैं तनिक
भी उचित अनुभव नहीं कर रहा। कोई रथ भिजवा दें तो मैं द्वारका आ जाऊँ। पर इस बीहड़
स्थान से कैसे और किससे संदेश भिजवाया जाये, जैसे ही वे इतना सोचने बैठे ही
थे कि सिर फिर चकरा उठा। कई तीव्र और भयानक प्रहार उनके मस्तिष्क पर होने लगे। वो
तड़प उठे। चक्करों के साथ उनको उल्टी भी होने लगी।
उन्हें इस क्षण यशोदा
मैया की स्मृतियों ने घेर लिया। जब वे बाल रूप में थे तभी से लोगों ने उन्हें
भगवान कहना शुरू कर दिया था। वो कहाँ कहलाना चाहते थे। मैया उन्हें कतई ईश्वर नहीं
मानती थीं। वे तो केवल उन्हें अपना कन्हैया मानती थीं। किसी भी प्रकार विकट समय में
घंटों उनके पास बैठी रहती थीं। माँ अपने बच्चों को कभी भी अकेला नहीं रहने देती।
दुख या विपत्ति के समय में तो सबसे पहले आगे खड़ी रहती है। यदि आज यहाँ यशोदा मैया
होती तो नजाने उनकी कन्हैया को देख कर क्या दशा होती!
उन्होंने स्वयं अपने को
किसी प्रकार संभाला और ये निर्णय किया कि वे मैया के पास जरूर जाएंगे। वहीं उनका
आराम है। वहीं उनका चैन है। वे द्वारकाधीश नहीं बनेंगे। वापस नंदगांव जाएंगे।
इसी सोच में कुछ क्षणों
के लिए उन्होंने अपने सृष्टि नयनों को बंद किया। इस मन की चंचलता में वे फंस गए
थे। फिर सोचने लगे कि यहाँ उनको कौन लाया या वो किस प्रकार यहाँ आ पहुंचे? क्योंकि
वे तो मूर्छित हो गए थे। इधर उधर आवाज़ें सुनने का प्रयास किया। किन्तु महीन आवाज़ों
में भी किसी मनुष्य और जन्तु की उन्हें बू तक न मिली।
उन्हें हल्की हवा में
बहुत आराम मिल रहा था। निकट ही बहते हुए झरने की ध्वनि को अभी तक उनके चंचल मन ने
सुनने नहीं दिया था। वे हर्षित हो कर अपनी जग मुस्कान फैलाने लगे। अपने दर्द को
सहते हुए उठे और झरने की ओर चल दिये।
हाथों की कटोरी से
उन्होंने कई बार अपने मुख को धोया। उन्हें इस अवस्था में देखकर कौन कहेगा कि ये
महान अवतार हैं। वे बिलकुल मनुष्य बन बैठे थे। वे सोच रहे थे। वे भटक गए थे। वे
स्मृति मोह में फंस गए थे। लाखों लोगों की मृत्यु को अपने कंधे पर लेकर चल रहे थे।
आत्मग्लानि से पूर्ण थे। वे गीता उपदेशक नहीं थे। वे तो मनुष्य थे।
हाथों की अंजुली से ही
उन्होंने जलपान किया। उनका मन शांत हुआ। गीले हाथों से ही सिर को कई बार धोया।
स्वेद से छलनी हो चुकी त्वचा पर शीतल जल डालने पर संतुष्टि मिली। नजाने इन दोनों
में से किसको आराम मिल रहा था। ईश्वर को या मनुष्य को। ईश्वर तो इन सब से ऊपर है।
ईश्वर, वह
क्या है, कैसा है, किस स्वाद का है, उसकी भूख क्या है, उसकी जिह्वा क्या है,.. कोई नहीं जानता। किसने उसकी रचना की अथवा उसने अपनी रचना कैसे की ये भी
कहानियों में तो लिखा है पर उन कहानियों में कितनी कल्पना है और कितना यर्थाथ है, किसे पता?
पर यहाँ इस व्यक्ति पर
भगवान के अवतार होने का आरोप है। उसे तो लोग ईश्वर ही मानते हैं। इनके कई नाम हैं।
ये ज्ञान की राशि है। पर उनके इस अवतार में एक मनुष्य भी बसता है। शायद इसलिए वह
इस दशा में यहाँ उपस्थित हैं। शरीर के कष्ट यर्थाथ के समान हैं। उसका दर्द मन का
बहका देता है।
जल की शीतलता का प्रभाव
इस गर्मी में अधिक समय नहीं रह सका। ताप की तीव्रता से वे फिर मूर्छित दशा की तरफ
जाने लगे। उन्हें अपने सिर में कई चलचित्र चलते हुए दिखाई देने लगे। चित्र में
रक्त रंजीत शव दिखे। वह भय युक्त हो गए। इतने अधिक शव। किसी का धड़ है तो मुंडी नहीं, किसी
का हस्त नहीं है, किसी का पैर नहीं। हृदय भेदी क्रंदन मानो
ध्वनियों का गुच्छा बनाकर उनसे टकरा रहा था। इस प्रकार के चित्र से वे भागने
लगे। उन सब में एक समानता थी कि वे सब एक मामूली मानव थे। इनका युद्ध में संहार
हुआ था।
अब वे संभलकर उन
चित्रों को ध्यानपूर्वक देखने लगे। सदैव आभामंडित रहने वाला मुख इन चित्रों को
देखने के कारण स्वेदयुक्त हो चला। हर शव को यह पीतवस्त्रधारी व्यक्ति सूक्ष्म
दृष्टि से देखने लगा। कौन पांडव सैनिक हैं और कौन कौरव सैनिक हैं इसका बिलकुल पता
नहीं चला। उनका धर्म वध हुआ था अथवा उनकी अधर्म हत्या की गई थी, इस
प्रश्न ने उनके आगे आकर अंधेरा आच्छादित कर दिया।
ये तो निर्जीव शव थे।
फिर भी इन चित्रों में वे शव उनसे उठ कर सवाल कर रहे थे।
ये शव व्यर्थ में भगवान
के मस्तिष्क को अपने प्रहार से घायल कर रहे थे। उसी चित्र में एक भुने हुए गेंहू
के रंग का व्यक्ति अपने दायें हाथ में एक कटा हुआ लहूलुहान शीश लेकर उनके आगे आकर
खड़ा हो गया। उसने सफ़ेद मैली धोती पहनी थी। रक्त के कुछ धब्बे उसकी धोती पर पड़ गए
थे। वे गर्मी से तो व्याकुल नहीं था पर उस शीश को देखकर अपने अश्रुओं को बहा रहा
था।
शीश उनके पास लाते हुए बोला, “आप
ही माधव हैं?”
उनके उत्तर से पूर्व वह
पुनः शीश की ओर देखते हुए बोला, “हाँ। मुझे विदित है
कि आप ही माधव हैं। आपके कभी दर्शन नहीं हुए। पर आपकी इतनी ख्याति है कि आपको कौन
नहीं पहचान लेगा। आज आप से मिलने का अवसर मिला है। इससे पूर्व आपके कभी दर्शन नहीं
हुए थे। पर आज मुझे आपके दर्शन का दिव्य अवसर मिल गया।”
वे अभी तक उसे सुन रहे
थे। सुनकर बोले,
“मैं माधव नहीं हूँ। देखो! मेरी दशा। मैं तो तुम्हारे समान ही एक
साधारण मानुष हूँ।”
व्यक्ति सिर हिलाते हुए
बोला, “नहीं कृष्ण, ऐसे न कहिए। आप मोरपंख मुकुट धारी हो।
आप पीताम्बर हो। सुदर्शनधारी हो। देखिये मेरे हस्त में ये जो शीश है, ये मेरा छोटा भाई था। इसकी पांडव कौरव युद्ध में मृत्यु हो गई। ये अधर्मी
नहीं था। ये तो केवल अपने राजा की आज्ञा का पालन कर रहा था। न करता तो कहाँ जाता।
आपकी सेना में शामिल नहीं किया गया। इस छोटे से सैनिक को धर्मराज युधिष्ठिर से
मिलने ही नहीं दिया गया। अब इसके परिवार को देखने वाला कोई नहीं। इसे जीवित कर
दीजिये प्रभु। जीवित कर दीजिये।”
वे बोले, “मैं
कैसे जीवित कर सकता हूँ? और वैसे भी ये विधि का विधान है कि
जो जीवित है वह तो मरेगा ही। यही सृष्टि का नियम है।”
वह व्यक्ति बिलख पड़ा।
बोला, “क्या मेरा भाई अभिमन्यु और उत्तरा के गर्भ पुत्र
परीक्षित से भिन्न है? उसे भी तो आपने जीवित किया था। वह
जीवित हुआ, तो मेरा भाई भी क्यों नहीं हो सकता? दया कीजिये प्रभु।” वह ऐसा कह अपने घुटनों के बल
गिर कर बैठ गया। वे चुप हो गए। माधव ने अपनी आंखे बंद कर ली।... फिर लंबी सांसें
और कुछ भी नहीं। पर...वे चिल्ला उठे। चलते हुए चलचित्र तुरंत अदृश्य हो गए। उनके
पैर के तले पर एक विषैला बाण लगा। वे बिलख गए।
इस बाण के चालक ने जब
उनके सम्मुख आकर देखा तब वह द्रवित हो उनके चरणों में गिर पड़ा। अपने इस कृत्य की
क्षमा मांगते हुए बोला, “मुझे क्षमा कीजिये प्रभु। अपनी त्रुटिवश आप पर बाण
चला बैठा।”
वे व्यथित पीढ़ा से
कहराते हुए बिना देखे ही बोले, “क्षमा मत मांगो। तुमने तो मेरा उद्धार किया
है। मुझे जीवन से मुक्ति दिला दी। मैं अपने मनुष्य अंतर मन में चल रहे विचित्र
संवादों से त्रस्त था। प्रश्नों का उत्तर भी नहीं दे पा रहा था। जीवन के कृत्यों
के फलों को भुगत रहा था। मैं भी एक साधारण व्यक्ति था। मेरी भी एक माँ थी, एक प्रेमिका, सखा थे, भाई थे।
मैं द्रवित हूँ। मनुष्य योनि में हूँ। पश्चाताप में हूँ। मैं वैसा ही था जैसे सब
थे।...
परंतु लोगों ने भगवान
बना दिया। और यहाँ तक पहुंचा दिया।”
इतना कहने के बाद वे हल्का मुस्कुराए और अपने प्राण त्याग
दिये।
गुमशुदा
की तलाश पूरी हुई
एक लंबी सुबह वाली
उबासी लेते हुए... टाइम तो देखूँ! ...हे भगवान! दस
बज गए। छुट्टी के दिन टाइम बहुत भागता है। कमबख़्त कहीं का! एक दिन तो मिलता है कमर
सीधी करने का...आराम करने का...तय समय से थोड़ा आधिक सोने का...अपने हाथ की एक गरम
चाय बनाकर एक प्याली सुरूर से पीने का...! शर्मिला के मन में यही वाक्य आ जा रहे
थे।
सुबह
के दस बज चुके थे। शर्मिला अब पूरी तरह से जाग चुकी थी। बिस्तर में बगल पर कोई
नहीं था। इसका साफ मतलब था कि मानव अपने काम पर जा चुका था। उसकी रविवार को छुट्टी
नहीं होती। उसने बिस्तर पर बैठे बैठे बगल में हाथ फेरा। उसने शायद मानव को महसूस
करने की कोशिश की। उसने एक लंबी सांस भरी। तभी दरवाजे पर घंटी बजी।
उसने
अपनी अस्त व्यस्त मैक्सी को दुरुस्त किया। बालों को दोनों हाथों से संभालते हुए
जुड़ा कसा। लेकिन उनमें तैल न लगा होने के कारण जुड़ा ढीला बंधा। इस बात पर ध्यान
दिये बिना वह उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दरवाजे पर दो कुंडियाँ लगी थीं। उसने अपना
दम लगाते हुए जैसे तैसे उन्हें खोला और अपने सामने अक्षर को पाया। वह शर्मिला को
देखते ही बोला- “शर्मिला दीदी... मैं कितनी बार आ चुका हूँ। और आप हैं कि दरवाजा
खोल ही नहीं रही हैं। ...लाइये जल्दी से कूड़ा दीजिये...नीचे बड़ा भाई खड़ा रिक्शा
लेकर..!” शर्मिला जो थकावट महसूस कर रही थी, ने अनमना
चेहरा बनाते हुए कहा- “अक्षर अब तू भी डाँटेगा क्या? पता
नहीं सनडे है। थकावट से नींद आ जाती है। सर्दियों में तो और। ...आजा(पीछे हटते
हुए) घर में बैठ कुछ देर। चाय पिएगा। तू भी कितना मेहनती है। जब नया नया आया था तब
कितना छुटकू सा था। आज तेरी लंबाई मेरी लंबाई से भी ऊपर जा रही है।” पीछे मुड़कर
देखते हुए शर्मिला ने थोड़ा ज़िद्द करते हुए कहा- “आ भी जा। कार्ड भेजूँ!”
अक्षर
ने बड़ा सा थैला बाहर रखते हुए रसोई की ओर रुख किया और फटाफट कूड़े की पोलिथीन उठाकर
दरवाज़े की ओर लपका। शर्मिला ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। अक्षर बाहर जाते हुए
बोला- “दीदी मार्च में पेपर शुरू होंगे। इसलिए जल्दी जल्दी काम कर के मुझे पढ़ाई करनी
होती है। जब आपकी लगातार छुट्टी होगी तब आऊँगा। आप चाय अच्छा बनाते हो।” ऐसा कहते
हुए वह फटाफट सीढ़ियाँ उतरने लगा। शर्मिला दरवाज़े तक आई और अक्षर के कदमों की आवाज
को सुनती रही। जब आवाज़ गायब हो गई तब वह दरवाजे की सिर्फ एक कुंडी लगाकर वापस अपने
घर के बीच वाले हिस्से में खड़ी हो गई। उसने चारों तरफ नज़रें दौड़ाई। उसे लगा कि यह
किसी अजनबी का घर है। फिर वह अपने सोने के कमरे में गई। बिस्तर की मुड़ी-तुड़ी
बेतरतीब चादर और कंबल को देखकर उसे अजीब लगा। उसने सिर्फ कंबल ठीक किया और धड़ाम से
सर्दी को महसूस करते हुए कंबल में घुस गई। बालों का ढीला जुड़ा खुल गया और वह आँखें
बंद कर लेट गई। उसे याद आया कि इतनी अधिक सर्दी में वह मैक्सी में कैसे अभी तक रह
गई थी। उसे अपने पर खिन्न आई। उसने अपनी करवट बदली और मानव के हिस्से पर अपना हाथ
कंबल से निकालकर उसे सहलाने लगी। उसने अपनी करवट को फिर सीधा किया और आँखें बंद ही
करे रही। चार साल पहले का एक दृश्य दिखा जिसमें वह मानव के साथ कोर्ट में शादी कर
रही है। घर वालों में कोई नहीं है। महज कुछ दोस्त हैं। वह रजिस्टर पर दस्तख़त कर
रही है। उसने नीली साड़ी पहनी है। मानव ने सफ़ेद कमीज़। दोनों गंभीर दिख रहे हैं।
उसके चेहरे पर इस दृश्य को देखकर भी कोई भाव नहीं आया।
सिरहाने
के पास पड़ी छोटी मेज पर अपनी और मानव की शादी का फोटो फ्रेम रखा हुआ था। उसने
चुपके से उस फोटो को निहारा। चार साल हो गए। वह हैरान हो गई। वह धप से अचानक उठकर
बैठ गई। उसके बाल फिर से चेहरे के ऊपर आ गए। उसने गुस्से से उन्हें पीछे किया। वह
बड़बड़ाई। अजीब मुसीबत हैं ये बाल। इनसे तो आज छुटकारा पाकर ही रहूँगी चाहे मानव कुछ
भी कहता रहे। मैंने क्या उसकी पसंद की चीजों को ढोने का ठेका लिया हुआ है। वह
लड़खड़ाती हुई कंबल से फुर्र से उठ खड़ी हुई। गुसलखाने की तरफ लपकी। न जाने उसे क्या
याद आया और अलमारी की ओर मुड़ी। चर्र की आवाज़ हुई और हाथ में उसके एक कैंची नज़र आई।
वह घुसी तो कैंची से कुछ खर्र खर्र काटने की आवाज़ आई और उसके बाद नल से गिरते हुए
पानी का बाल्टी में अपना आयतन बनाना ही समझ आया।
शर्मिला
नहाकर जब बाहर निकली तब वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी। वह सीधे आईने
के सामने गई। उसने तौलिये से फिर से बालों का टपकता हुआ पानी पोंछा। वह पहली बार
आज मुसकुराई। वह बहुत खुश हुई। उसने खुशी से एक उछाल लगाई और बोली- येएएए..! उसे
सर्दी का अहसास हुआ। उसने अलमारी के चरमराते हुए दरवाजे को फिर खोला और मरून शाल
निकाल कर जल्दी से अपने चारों ओर लपेट ली। इसके बाद गुसलखाने की तरफ जल्दी जल्दी
गई। लंबे लबे कटे हुए बेजान बालों को रसोई में रखे कूड़े के बड़े डिब्बे में ऐसा पटका
जैसे कोई बेहद घिन्न की वस्तु हो। उसे इस काम से फिर राहत महसूस हुई।
वह
सोने के कमरे में वापस लौटी। कंबल तय कर बिस्तर ठीक किया। वह कमरे से बाहर निकल ही
रही थी तभी उसने शादी की फोटो को औंधे मुंह रख दिया। वह बड़बड़ाई- “चौबीस घंटे एक ही
फ्रेम को देखकर कितनी अजब सा अनुभव होता है। ज़िंदगी भी बड़ी चिपचिपी हो जाती है।
मानव को आने दो। रात को कहूँगी कोई नई फोटो फ्रेम करवा ले। बदलाव भी तो जरूरी है।”
फिर कमरे की दीवारों पर नज़र फेरते हुए बोली- “इसका रंग भी बदलवा लेंगे। थोड़ी सर्दी
कम हो जाये। बिस्तर के सामने वाली दीवार पर वॉन गॉग की सूरजमुखी वाली पेंटिंग
लगाएंगे... बड़ी सी। क्या शानदार लगेगा कमरा फिर।” वह थोड़ा उत्साहित हो गई थी। उसे
सर्दी महसूस हुई और उसने दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाई। अब तक बारह बजने में दस मिनट शेष
थे। वह जल्दी जल्दी कमरे निकल कर रसोई की तरफ बढ़ी। अपने लिए चाय का पानी गैस जलाकर
रखा। सब्ज़ी की छोटी से प्लास्टिक की टोकरी में से अदरक खोजकर बेलन से कपड़े पर रख
कूट-कूट कर चाय के बरतन में डाल दी। उसने इसके बाद चीनी और चायपत्ती डाली। चाय
थोड़ी देर में खोलने लगी। शर्मिला ने चाय के निखार को देखा। भूरी भूरी। दमकती। उसे
खाना पकाना नहीं सुहाता पर चाय की तो उसे नशेबाजी है। उसने बड़ा सा चाय का मग लिया।
उसमें सारी चाय उड़ेलकर वह सोने के कमरे के बाहर वाले बैठक में पहुँच गई। वहाँ सोफ़े
पर वह आहिस्ता से बैठी। चाय को सामने ही रखी छोटी टेबल पर रखकर उसने दोनों पैर ऊपर
कर पालथी बनाई। बाल अभी भी नम थे। शाल को कसकर ठीक से लपेटा। फिर मग उठाकर चाय की
एक घूंट को अपने अंदर लिया। उसे बेहद अच्छा लगा। उसे लगा कि उसे कितने बरस हो गए
हैं कहीं लौटे हुए। वह कहाँ से लौट रही है उसे मालूम नहीं चला।
उसे
हफ्ते के छ दिन तो गुम रहने का अहसास होता है। दिन दफ्तर में कट जाता है। कंप्यूटर
की स्क्रीन कितनी उकताहट दे देती है। लेकिन जब महीने में बैंक में सैलरी का मैसेज
आता है तब उसे अपनी मेहनत के ऊपर नाज होता है। ख़र्चे का दोनों बंटवारा करते हैं।
ताकि दोनों एक दूसरे पर बोझ जैसे अहसास न छोड़ें। उसे अहसास हुआ कि घुटने मोड़े हुए
उसे काफी देर हो गई है और दर्द हो रहा है। उसने पैर पसार दिये। चाय पीने के बाद
उसे क़रार मिला। उसे कुछ खयाल आया कि वह कुछ करे। उसे लगा कि वह चिट्ठियाँ लिखना
चाहती है। पर किसे? वह यह नहीं जानती। वह फटाफट उठी
और अलमारी के नीचे दराज़ में खोजबीन करने लगी।
नीचे
के दराज़ में इस खोजबीन के दौरान उसने सोचा- “मैंने अपनी रचनात्मकता को कितनी तहों
में दबा दिया है। भूल गई हूँ कितना कुछ! उसके हाथ में
धूल चढ़ीं कुछ किताबें आ गईं। कुछ उपन्यास। कुछ कहानियों की किताबें। उसके चेहरे पर
दूसरी बार ख़ालिस मुस्कान उतर आई। उसे फिर से बेहद अच्छा लगा। बहुत अच्छा। शाल के
एक किनारे से ही उसने उन किताबों की धूल हटाई। उसकी पसंद की सारी किताबें थीं।
उसने कई पढ़ी भी थीं। पर उससे कोई गर कोई पूछे की कौन सी किताब में लिखा हुआ है तो
उसकी ज़ुबान लड़खड़ा जाएगी। सुबह से दूसरी बार था जो उसने अपने आप को खोजा था। पहली
दफा बाल काटने में दूसरी दफा धूल से सनी किताबों में।
उसे
तलब हुई कि वह फिर कुछ लिखे। पर किसे? उसे इस बार भी
अहसास नहीं हुआ। उसने सारी किताबों को ठीक से साफ किया और सोने के कमरे में रखी कपड़ों
की अलमारी में ऐसी जगह सजा आई कि जब भी वह अलमारी खोले उसे कपड़ों से पहले ये
किताबें पहले दिखें। उसे खयाल आया कि मानव गुस्सा करेगा। उसने इस बात पर ध्यान
नहीं दिया। सोचा- “जाने दो, वह कब मेरी बातों पर खुश होता
है! जब देखो उसे कुछ कुछ न परेशानी सालती रहती है। वह हमेशा बाहर खुशी को खोजता
है। खुशी को मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट में खोजता है। महंगे कपड़ों पर टिकी दूसरों की
भौंचक नज़रों में वह अपने को तलाशता है। कभी कभी मानव मुझे मेरा हमसाया नहीं लगता।
बल्कि वह, वह साया बन रहा है जिससे कि पीछा छूटे।” उसने कमरे
को फिर से चारों तरफ से देखा और मायूस होकर वापस सोफ़े के पास लौट आई। वह धड़ाम से
सोफ़े पर बैठी न हो जैसे गिर पड़ी हो। थोड़ी देर बाद वह सोफ़े पर ही लेट गई।
लेटे-लेटे
उसने छत के पंखें को कुछ मिनट तक घूरा। इस बीच वह कुछ सोच नहीं पाई। उसने पंखे की
पंखुड़ियों पर नज़र दौड़ाई। कितनी धूल जमा थी। उसे घिन्न आई। उसे लगा कि वह अपने घर
को कभी ठीक से जान समझ नहीं पाई। जिस बिल्डिंग में उनका यह फ्लैट है उसका नाम चाँद
बिल्डिंग है। उसे तुरंत बिल्डिंग का नाम सोचकर हंसी आई। उसका यह फ्लैट उर्फ घर
पांचवें माले पर है। शादी के अगले साल वह यहाँ रहने आई थी। तब वह काम नहीं करती
थी। तब मानव पर ही सारी ज़िम्मेदारी थी। किस्तों को भरने के लिए और बेहतर ज़िंदगी के
लिए उसने काम करना शुरू किया।
वह उस
समय ऐसी नहीं थी। वह गाती थी। झूमती थी। घूमने की लालच लिए वह अपने कुँवारेपन में
कहाँ कहाँ नहीं भटक आई थी। उसे बाहर जाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं पड़ती
थी। लोगों के बीच उसका दम घुट जाता था। उसे यह मालूम था कि खुद को कैसे चाहा जाता
है। वह जानती थी कि वह किस क़िस्म की इंसान है।
उसे
मानव से प्यार था क्योंकि मानव भी उसे चाहता था। उसे लगा मानव भी एक इंसान ही है।
सो उसने शादी के लिए हाँ कर दी। पर कहीं दिल में एक धुकधुकी बाक़ी रह गई कि क्या
मानव सच में मुझे भी मानव समझेगा। पता नहीं शहर में रहने का श्राप है या फिर
कर्मों का दोष कि वह चार साल के अंदर गुम हो चुकी है। वह धीरे-धीरे गुमशुदा हो रही
है। उसे लेटे लेटे याद आया कि उसे खुद को खोजने की एक रिपोर्ट दर्ज़ करनी होगी, वह भी खुद के अन्तर्मन में। यही अलख उसे मानव के अन्तर्मन में भी जगानी
होगी।
उसे
तीव्र तलब हुई कि वह एक चिट्ठी लिखे। इस बार उसे पता है कि उसे चिट्ठी किसे लिखनी
होगी। वह तपाक से उठी और अलमारी के दराज से कॉपी निकाल लाई। उसने लिखा- “मैं भी
कमबख़्त हूँ। कितना सोती हूँ! ज़िंदगी की नींद अब खुली है। लग रहा था कि मैं कितना
सो गई हूँ कि अब उठना नामुमकिन है। पर नहीं कुछ मानसिक धक्के लगने ज़रूरी होते हैं।
हमारा मन, हमारा तन और हमारी इंद्रिया कितना जगाती हैं पर हम... कान होते हुए भी
बहरे हो चुके हैं। मुझे मानव के कंधे पर सिर रख आँखें बंद कर बैठे हुए कितना समय
गुज़र गया है। न उसे होश रहता है और न मैं उसे तलाशती हूँ। मुझे होश ही नहीं होता कि उस ‘आदिम’ के तन मन में झांक आने का मौका खोजूँ। उसकी तरल कल्पना तक में मैं अब
गायब हो चुकी हूँ। ...एक दूसरे में दिलचस्पियों का मर जाना ज़िंदगी में ऊब मन की
पैदाइश करना होता है। एक ही जगह गर्दन टिकाये बैठे हैं। दफ़्तर की मुश्किलों को हम
दोनों ख़ूबी के साथ हल कर लेते हैं पर अपनी ज़िंदगियों को हम कठिन सवाल में तब्दील
कर रहे हैं।...।”
शर्मिला
अपने लिए लिखने वाली चिट्ठी को तीन घंटे तक लगातार लिखती रही। बदहवाश सी वह पेन को
कागज पर चलाती रही। जब उसने दीवार पर टंगी घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो वक़्त शाम के पाँच
बजने की ओर जा रहा था। उसे ज़ोरों की भूख लगी। उसे याद आया कि उसने सुबह से सिर्फ
एक प्याला चाय को ही गले से नीचे उतारा है। वह कॉपी और पेन को टेबल पर आराम से
रखकर उठी और रसोई की तरफ बढ़ी। उसे पहली बार रसोई में बिखरे हुए सामान से और गंदगी
से तेज़ बदबू का अहसास हुआ। उसने जल्दी से उस सर्दी वाले दिन में खिड़की खोली और साफ
सफाई में तल्लीन हो गई। उसे लगभग 2 घंटे लगे इस काम में। उसे अपनी छोटी सी रसोई को
साफ करके फिर से बहुत खुशी का अहसास हुआ। सुबह से तीसरी बार। अब उसने अपने लिए एक
प्याली चावल लेकर ज़ायकेदार खिचड़ी बनाने की तैयारी की। इस दौरान उसने मोबाइल में
आशिक़ी फिल्म के गाने डाउनलोड किए। उसने ‘बस एक सनम
चाहिए आशिक़ी के लिए’ गाने को बार बार सुना। खिचड़ी के पक जाने
पर उसे एक प्लेट में रखकर वह वापस पेन और कॉपी के पास आ गई। उसने जब चम्मच से पहला
खिचड़ी का कौर मुंह में लिया तब उसे अपने पर हैरानी हुई कि वह भी अच्छा खाना पका
लेती है। वह फिर से बेहद खुश हुई। उसे लगा कि छुट्टी के दिन उसने अपने को पा लिया
है। वह अपने को प्रेम करना फिर से जान गई है।
इसी
बीच पलंग के सिरहाने के पास छोटी मेज पर रखी अलार्म खड़ी तेज़ी से बज उठी। शर्मिला
को अपने कंधे पर किसी के हाथ रखे जाने का अहसास हुआ। जाना पहचाना स्पर्श। “शर्मिला
उठो...जाना नहीं है क्या...पाँच बज रहे हैं...फिर कहोगी देरी हो गई। मानव तुमने
उठाया नहीं..!” वह झटके से उठ बैठी। मानव को लगा कोई डरावना सपना देखा है उसने।
उसने शर्मिला को गले से लगाते हुए कहा- “कुछ नहीं हुआ। सपना देख रही थीं तुम शायद।”
उसके माथे को चूमा। उसके माथे पर आए बालों को ठीक करते हुए बोला- “तुम्हारे बाल
बेजान से हो गए हैं। कटवा क्यों नहीं लेतीं। ढोती रहती हो।” ...मानव कुछ बोलता जा
रहा था। इधर शर्मिला अपने सपने के बारे में सोच सोच कर अपने पर हैरान हो रही थी।
उसने मानव को और कसते हुए कहा- “हाँ अब बोझ नहीं ढोऊँगी!” वह कुछ देर मानव में खोई रही। उसे लगा जैसे उस के अंदर सीने में एक रोशनी
का गोला फूट रहा है। वह गुमशुदा होते होते बच गई।
द मर्चेन्ट ऑफ जर्मनी – प्रेमकथा
वह
फिर से टेबल पर औंधें मुंह गिरकर मछली के शीशे वाली पिटारी को घूर रही थी। एक
संतरी और दूसरी भूरी रंग की मछली थी। कभी कभी वह मछलियों की चाल को इतने देर तक
निहारती थी कि अपना होश तक उसे नहीं रहता था। माँ ने अपनी चिंता और गुस्सा उसे कई
बार दिखा दिया था। पर उस पर कुछ अधिक असर नहीं था। माँ ने कहा भी कि यह सब
तुम्हारा खुद का फैसला था। इसलिए अब इसे स्वीकार करो। हम तुम्हारी मदद नहीं कर
सकते। उसने मछलियों को घूरना बंद नहीं किया और फिर अतीत की सिलाई खोलने बैठ गई।
उसे लगा कल की ही तो बात है।
आकर्षण
एक तरह का टॉनिक होता है। एक बार लग जाये तो चिपक ही जाता है और चले जाने के बाद
भी मन में उसकी बस्ती बस जाती है। सबेश्चियन को गए पूरे दो साल हो रहे हैं पर
अपर्णा अभी भी उसी की याद में बहती है। जब वह पुरानी दिल्ली से घर आते हुए एक बस
में अपर्णा से मिला था तब समय रात के नौ बजा था। बस काफी खाली थी। सबेश्चियन को
दक्षिणी दिल्ली के एक होटल की तरफ आना था। संयोग से अपर्णा का भी वही रास्ता था।
बातचीत से मालूम चला कि अपर्णा के घर से थोड़ी ही दूर पर एम पॉकेट में सबेश्चियन
किराए पर रह रहा था और भारत में वह कुछ महीनों के लिए घूमने आया था। अपर्णा का घर
एल पॉकेट में था।
सबेश्चियन
से अपर्णा ने बस में इस रात को सफर करने का सबब पूछा तो उसने वजह को दिलचस्प तरीके
से और हिन्दी के कुछ शब्दों को मिलाकर बताया। अपर्णा को जो समझ आया वह यह था कि वह
पहाड़गंज की तरफ अपने एक स्वदेशी दोस्त से मिलने आया था और बातचीत के चलते उसे देर
हो गई। इसलिए वह पूछते-पूछते बस से जा रहा है। एक वजह यह भी है कि इस रात में उससे
से ऑटो वाले तय रुपये से अधिक मांग रहे थे। उसकी बातों से यह भी लगा कि वह दिल्ली
की जगहों को अच्छी तरह से जानता था।
एक
घंटे के सफर में अपर्णा को सबेश्चियन गंभीर इंसान लगा। उसकी उम्र लगभग सत्ताईस से
अट्ठाईस के बीच मालूम पड़ रही थी। वह एक परिपक्व आदमी दिख रहा था। उसका चेहरा ऐसा
नहीं था कि किसी को मदहोश कर दे। पर इतना भी खराब नहीं था कि दुबारा न देखा जा
सके। चेहरे पर नाक एक सीध के साथ लंबाई में अपनी जगह घेरे हुए थी। आँखें छोटी पर
नीले रंग की थी। ध्यान से देखने पर उनमें एक ही वक़्त पर कई भाव पता चल जाते थे।
कभी ताजगी तो कभी दुनिया के आश्चर्यों को जानने की उसकी ललक आँखों में तैरती हुई
पता चल रही थी। उसके गाल फुले नहीं थे इसी के कारण वह अपनी उम्र से कम ही दिख रहा
था। बाल अंग्रेज़ियत लिए हुए थे, भूरे
और घुँघराले। उनके चलते उसका छोटा सा चेहरा बड़ा दिखता था। ऐसा लगता था कि किसी
चिड़िया के घौंसले में चिकना सफ़ेद अंडा रखा हुआ है।
अपर्णा
के साथ बातचीत में उसे भी काफी बेहतर लगा। बस के अंतिम स्टॉप पर उतर कर दोनों घर
तक पैदल ही गए। दोनों ने एक बिन्दु पर आकर एक दूसरे को औपचारिक पंक्ति पकड़ाई -
“बातचीत कर के अच्छा लगा।”
इसके
बाद कम से कम अपर्णा का यही खयाल था कि यह उसकी पहली और आखिरी मुलाकात है। वह
सबेश्चियन के साथ हुई बातचीत से बहुत संतुष्ट दिख रही थी और उसे वास्तव में बात कर
के अच्छा लगा था। उसे लगा आज बहुत दिनों बाद उसने कुछ अच्छी बात सुनी और की है।
अगली
सुबह जब अपर्णा फिर से तैयार होकर घर से निकली तब सबेश्चियन टकरा गया और हँसते हुए
बोला -
“क्या संयोग है ! आप से फिर मुलाकात हो गई !”
अपर्णा
ने इस संयोग को मीठा पाया और मुस्कुराते हुए हामी में सिर हिलाया। कुछ दिनों बाद
फिर उसी समय पर जब सबेश्चियन बस में उसकी सीट के बगल में आकर बैठा तब तक उसने
ध्यान नहीं दिया। लेकिन जैसे
ही उसने ‘हाय’ कहा वह हैरान हो गई। उसने हैरानी से ही पूछा -
“आज कैसे ?”
वह
कुछ पल सोचकर बोला -
"ऐसे ही। करीम में खाना खाने आया था। कुछ और दोस्त आए थे तो
उनके साथ ही आ गया। मैं इस शहर के सारे मज़े लेना चाहता हूँ।"
दोनों
की यह मुलाक़ात अहम थी। इस मुलाकात में एक दूसरे के नंबर बदले गए और बातचीत का
सिलसिला शुरू हो गया।
एक
दिन छोटी - सी मुलाकात में सबेश्चियन ने अपने काम के सिलसिले में कुछ इशारा किया।
इसके साथ ही उसने हिन्दी भाषा सीखने की भी इच्छा जताई। पर अपर्णा ने अधिक ध्यान
नहीं दिया। वह ऐसी लड़की थी जो अपने अंदर ही घुली रहती थी। बाहर के लोगों से मिलने
पर उसे हमेशा एक घबराहट हुआ करती थी। काम न होने पर वह घर से बाहर भी नहीं निकला
करती थी। फिर से उसका काम छूट गया था और शायद आगे मुलाकातें न हो इसलिए सबेश्चियन
ने हिन्दी सीखने की उसके आगे इच्छा जताई थी। एक दूसरे को पसंद करने वालों में हर
पल कुछ मीठा सा घटता है। बहुत जीवंत। समय भी उन लोगों के मुताबिक ढल जाता है।
अपर्णा ने हाँ कर दी थी। हालांकि उसकी खुद की हिन्दी में मलयाली जब - तब घुस जाती
थी।
जब
अपर्णा ने सबेश्चियन की बात घर पर बताई तब उसका छोटा भाई और माँ बिना जतलाये खुश
हुए कि शुक्र है उसकी ज़िंदगी में कुछ अच्छा होने की शुरुआत हो रही थी। पिता के
जाने के बाद अपर्णा ने अपना बहुत कुछ खोया था और सबेश्चियन के आने के बाद उसकी
जीवन शैली में अच्छे बदलाव दिखने लगे थे। यह अच्छी बात थी।
सबेश्चियन
के साथ चलने पर शुरू शुरू में अपर्णा को झिझक हुआ करती थी। उसे लगता कि आने जाने
वाले लोग अपनी आँखें उन दोनों पर ही चिपका कर छोड़े जा रहे हैं। वह अपना पूरा ध्यान
सबेश्चियन की बातों पर नहीं टिका पाती थी। उसे कभी कभी सांस लेने में भी दिक्कत
होती थी। ऐसे लगता जैसे उसके अंदर एक लड़ाई छिड़ी हुई है। ज़माने से, खुद से, आसपास
से। लेकिन धीरे - धीरे सबेश्चियन ने अपर्णा को खुद को समझने और पाने में बहुत मदद
की। अगर वह दस बातें करता तो वह सिर्फ सिर ऊपर - नीचे हिलाकर अपना जवाब दे देती।
लेकिन इन सब हालात के बावजूद कुछ था दोनों के बीच जो अच्छा था। बहुत अच्छा।
कुछ
रोज़ ऐसे ही बीते तब सबेश्चियन ने म्यूज़ियम देखने की इच्छा जताई और अपर्णा को साथ
चलने के लिए कहा। उसने कहा कि तुम साथ रहोगी तो मुझे बेहतर समझा पाओगी। पहले उसने
कहा कि उसे इतिहास की कोई अच्छी जानकारी नहीं हैं। लेकिन सबेश्चियन के बार बार
कहने पर वह मान गई। म्यूज़ियम में दोनों के चरित्रों में अजब का बदलाव दिखा। जितना
सबेश्चियन को वहाँ रखी मूर्तियों और चित्रों की जानकारी थी उतनी ही अपर्णा को भी।
कुछ मूर्तियों पर दोनों की बहस हो गई कि वे किस सदी की हैं। खैर, इस तरह से उनके दिन इस शहर में बीत रहे थे।
अहसासों
के धरातल पर दोनों एक तरह से खड़े थे। दोनों में एक भीनी - भीनी खुशबू घूमती थी।
दोनों में कुछ था जो उनमें परिवर्तन ला रहा था। सुबह उठने पर ही उन दोनों में अपने
दिन को कैसे बिताया जाये पर लंबी बात होती थी। लेकिन दिन ऐसे कब तक बीतेंगे, इस बात पर अपर्णा को दहशत होने लगी थी। उसे सबेश्चियन के
अपने वतन वापस लौट जाने की बात पर ही आँसू आ जाते थे। सबेश्चियन का कहना था कि उसे
इटली में बसने की इच्छा है और वहाँ एक छोटा सा रेस्तरां खोलकर जीवन बिताएगा। शाम
को प्यारा संगीत और एक मीठी नींद, जिंदगी
की यही कल्पना थी उसकी।
अपर्णा
के लिए अभी तक ज़िंदगी एक खिंचाव युक्त रबड़ थी। जब जो उसे समझ आता वह उस ओर खिंच
जाती थी। उसे नहीं मालूम था कि उसे करना क्या है ? अपने बारे में उसका कोई खयाल नहीं था। वह कुछ न सोचती थी न
ही उसने कभी कोशिश की थी। लेकिन जब उस रोज़ सबेश्चियन के खयाल सुने तब वह देर रात
तक अपने को लेकर सोचती रही थी। उसने खुद से ढेरों सवाल किए। आखिर उसे क्या करना है
अपनी ज़िंदगी के साथ ? ऐसे नहीं
जी जा सकती ज़िंदगी ! उस दिन सबेश्चियन जब अचानक ही उसे ‘प्यार करता हूँ तुमसे’
अल्फ़ाज़ कहे तब वह न खुश हुई और न दुखी। हालांकि उसे इस बात का कब से इंतज़ार था।
सबेश्चियन उसके लिए बहुत कुछ बन चुका था। पर आज जब वह अपने मन की बात उसे कह रहा
था तब वह खुश क्यों नहीं हुई ? वह
खुशी से पागल क्यों नहीं हुई ? घर
आकर वह देर तक अपनी इस दशा पर रोती रही।
सबेश्चियन
को अपर्णा का ये व्यवहार समझ नहीं आ रहा था। उस दिन उसने कॉफी हाउस में बुलाकर
उससे काफी बातें कीं और अपने साथ ही चलने को भी कहा। उसने कहा -
"इटली में हमारी ज़िंदगी लाजवाब होगी। हमारे पास सब कुछ
होगा। काम और चैन भी। हम दोनों एक दूसरे के साथ होंगे। जीवन जीने के लिए और चाहिए
ही क्या ?
हम शादी करके बेहद खुश रहेंगे। बेहद !"
लेकिन
अपर्णा ने कुछ न कहा और वहाँ से उठकर भाग आने की बात सोचती रही। कुछ दिन बाद उसने
अपने को संभाला और एक मैसेज कर सबेश्चियन को मिलने के लिए पुरानी दिल्ली के ही
किसी रेस्तरा में बुलाया। उसने सबेश्चियन का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा -
“मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। इतना कि तुम सोच भी नहीं
सकते। तुमने हर वो चीज दी जिसके बारे में मुझे पता नहीं था। तुमने बताया कि हंसने
के क्या मायने होते हैं! तुमने समझाया कि लोगों के जाने के बाद भी आपको जीना होता
है और यह चुनौती है। ज़िंदगी आपको हमेशा उठने के मौके देती है। ज़िंदगी अपने साथ
कुछ बेहतर सोचने और करने के अवसर के साथ होती है। इसलिए मैंने भी अपने को इस जीवन
में एक मुकाम देने का सोचा है। मैं तुमसे शादी कर इटली नहीं जा सकती। मुझे यहीं
रहना है और अपने लिए बेहतर सोचना है। तुम्हें प्यार करते हुए मैं ये काम कर
लूँगी।"
ये
सब बातें सुनकर वह हल्का - सा दर्द के साथ मुस्कुराया। थोड़ा उठाते हुए अपर्णा के
माथे को चूमा और बोला -
“मुझे यकीन है, तुम कर लोगी !"
कुछ
अरसा हुआ सबेश्चियन से कोई संपर्क नहीं है। लेकिन रात में हिचकी आती है तो अपर्णा
कोे अजीब - सा संतोष होता है। वह आज भी उस मर्चेन्ट ऑफ वेनिस के बारे में बार -
बार सोचती है। जब शीशे वाली बड़ी पिटारी में मछली के मुंह से निकले बुलबुले फूटे
तो वह यकायक जागी। घड़ी पर नज़र दौड़ाई। उसे काम पर जाने की देरी हो रही थी।
हमारा रेडियो
बात
तब की है जब घरों में ब्लैक-एन-व्हाइट टीवी होना भी बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।
मनोरंजन के साधनों में रेडियो की एक ख़ास जगह हुआ करती थी। घर में एक शख़्स थे
जिन्हें टीवी देखने का शौक तो नहीं था पर रेडियो सुनने का उत्तम चस्का जरूर था।
उम्र यही कोई पचास या उसके आसपास रही होगी। पिता जी दिल्ली में अस्सी के दशक के
अंतिम सालों में आए और आते ही थोड़ी खोजाई के बाद एक कंपनी में काम पर लग गए। उनकी
उस समय तनख्वाह एक सौ पिछत्तर रुपये तय हुई। ओवरटाइम मिला कर दो सौ से दो सौ पचास
तक मिल जाया करते थे।
उस
वक़्त तक शहर में ठिकाने की जद्दोजहद जारी रही। कुछ ही समय में कंपनी के पास ही एक
कमरा किराए पर मिल गया। धीरे धीरे पिताजी ने खुद से पकाकर खाने के लिए कुछ बर्तनों
और स्टोव का इंतजाम किया। बाद में बाकी सामानों का। पिता जी को फिल्मों का बहुत
शौक तो नहीं था पर हाँ खबरों को जानने की दिलचस्पी लगातार रहती थी। सो कुछ ही
महीनों की बचत से सौ रुपये या आसपास की क़ीमत का एक मर्फी रेडियो ले आए। इसके बाद
के समय में परदेस में यही एक उनका सच्चा साथी था। काम से लौटने के बाद जब बदन टूट
रहा होता तब भी रेडियो चला लेने के बाद वे उसे सुनने में पूरी तरह तल्लीन हो जाते
और उसी धुन में काम भी पूरे कर लेते। इस रेडियो से ही वह अपने को अपडेट भी कर लेते
थे।
कुछ
ही बरसों में कलकत्ता में रहने वाले बड़े पापा दिल्ली पिताजी के पास आए और यहाँ की
आबोहवा के शिकार हो गए। उनको यहाँ का माहौल इतना पसंद आया कि वे वापस कलकत्ता नहीं
गए। कुछ ही समय बाद मैं और माँ भी इसी शहर में बसने आ गए। अब दिल्ली सपरिवार के
रहने की जगह बन गई। बड़े पापा को अचानक एक बीमारी ने आ घेरा सो वह ज़्यादातर अपना
समय घर में ही बिताने लगे। इसलिए पिताजी ने अपना प्रिय रेडियो बड़े पापा को ध्यान
बांटने के लिए तोहफे की शक्ल में पेश कर दिया। पहले-पहल तो उन्हें रेडियो अपने
एकांत का ज़ोरदार उल्लंघन लगा पर जब उसे एक बार चालू किया तो कुछ नहीं बोले और
हमेशा के लिए उसे अपने पास रख लिया।
बड़े
पापा को देखो तो लगता था कोई सूफी दरवेश हैं। ज़्यादा बोलते नहीं थे। कभी उन्हें
किसी बात पर बहस करते हुए नहीं देखा। जो रुपया कमाया उसे घर के लोगों पर ही भरपूर
खर्च किया। किसी से उम्मीद रखना भी वे नहीं जानते थे। किसी भी चीज पर वे न तो कभी
उत्तेजित होते थे न किसी ने कभी उन्हें बहस और गुस्सा करते देखा था। इस दुनिया के
वे बिलकुल नहीं लगते थे। जब वह बीमार पड़े तब भी उनके चेहरे पर किसी भी तरह की कोई
शिकन दिखाई नहीं दी। उनकी मृत्यु भी बड़ी शांति से दस्तक दे गई थी। किसी तरह का शोर
उनके अंदर महसूस नहीं किया गया। उन्हों ने अपने लिए एक अलग कमरे की मांग की सो
उन्हें हरे पर्दे वाला कमरा दिया गया जो छत पर अपने आप में अकेला रहता था। अब उस
कमरे के साथी बड़े पापा बन गए। हालांकि पिताजी को इसके चलते बहुत मेहनत करनी पड़ी
फिर भी वे खुश थे कि वे बड़े भाई साथ हैं।
उनके
इंतकाल से पहले के दिन हमेशा की तरह साधारण ही बिता करते थे। उनके रूटीन में अक्सर
कुछ किताबें शामिल हुआ करती थीं। पर थोड़े वक़्त में ही उन्हों ने किताबों से
रिटायरमेंट ले ली और रेडियो से और लगाव बढ़ा लिया। गीत, नाटक, खबरें
और हर तरह के कार्यक्रम वे रेडियो पर सुनते थे। रेडियो का रंग पीला था और उसके
खटके या बटन बड़े बड़े, गोल व
काले रंग में थे। उसके दाहिने तरफ एक एंटीना था जिसे अगर उठा दिया जाता तो चैनल
जल्दी पकड़ में आते थे। उसमें नीले रंग वाले बड़े बड़े निप्पो कंपनी के सेल डाले जाते
थे। इतना ही नहीं उसमें एक हेंगर भी था जिसे पकड़ कर उसे आसानी से कहीं भी लाया ले
जाया सकता था। वे रेडियो खास खास समय पर सुनते थे जैसे सुबह 11 बजे से 12 बजे
तक। इसके बाद 3 से 4 बजे तक और रात के 9 से 10 बजे तक।
रेडियो की वॉल्यूम बहुत तेज़ तो नहीं होती थी पर उसकी आवाज़ नीचे के कमरों तक आ जाती
थी। हल्की मद्धम।
रेडियो
हमारे भी रूटीन का दिलचस्प हिस्सा था। इसलिए हमें भी उसकी आदत हो गई थी। कुछ
कार्यक्रम हमें भी अच्छे लगते थे। लगता था कानों का अभ्यास हो रहा हो। रेडियो जब
चलता था तब सभी लोग खामोश होकर सुनते थे। इसलिए बातों की बहुत ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
सभी इशारे से अपनी जरूरत की बात सम्पन्न कर लेते थे। ऐसा लगता था कि सच में
दीवारों के भी कान होते हैं। वह भी मानो साथ साथ रेडियो सुन रही हों। बड़े पापा को
इस बात की बखूबी खबर रहती थी कि वे ही नहीं सभी रेडियो सुन रहे हैं इसलिए वे
मुस्कुरा दिया करते थे। बार बार चैनल नहीं बदलते थे। जब वे रेडियो सुनते तो लगता
था कि कोई दरवेश अपनी प्रार्थना में लीन है। मेरी उम्र उस समय तेरह बरस रही होगी।
इसलिए यादें अभी तक दिमाग और दिल में टिकी हुई हैं।
उनकी
मृत्यु सुबह सूरज उग आने के बाद हुई। परिवार में सभी को बहुत दुख हुआ। एक जन कम हो
गया। या यूं कहें कि वह साधू अब हमारे साथ नहीं रहा था। उनके बाद उनके कमरे में एक
भी तब्दीली नहीं की गई। जो चीज जहां रहती थी वह चीज वैसे ही राखी जाती रही जब तक
हम वहाँ किराए पर रहे। उनके कमरे को बाद में मैंने पढ़ने लिखने के कमरे में तब्दील
कर लिया था। जब वहाँ बैठकर मैं अपना काम करती तब ऐसा लगता कि कोई आसपास ही बैठा
है। या कमरे में किसी और की भी मौजूदगी है।
उनके
बाद भी ऐसा लगता था कि वह रेडियो सुन रहे हैं। घर में एक खालीपन सा ज़रूर आ गया था।
कोई रेडियो भी नहीं सुनता था। सुनने का रस खत्म हो गया था। रेडियो से भी बहुत लगाव
नहीं रह गया। उसके प्रति बना आकर्षण घर के लोगों में धीरे धीरे ही सही पर मिट रहा
था। पर जब मैं पढ़कर थक जाती तब रेडियो को चालू कर अपनी पसंद का कुछ सुनने लग जाती
थी।
लगभग
दो या तीन महीने बाद अचानक रात नौ बजे मुझे रेडियो चलने की आवाज़ सुनाई दी। लगा कोई
ऊपर के कमरे में रेडियो सुन रहा है। मैं भागी हुई ऊपर के कमरे में दाखिल हुई। मुझे
लगा कि शायद मैं रेडियो बंद करना ही भूल गई हूँ। लेकिन कमाल था कि कुछ भी हलचल
नहीं थी। पर ऐसा अहसास आया कि कोई अभी अभी यहाँ आया था। पापा मेरे पीछे पीछे भागे
हुए आए और बोले- 'क्या हुआ?' मैंने कहा- 'कुछ नहीं। ऐसा लगा रेडियो बज रहा था!' पिता थोड़े अचरज में बोले –“हमने तो नहीं सुना!” मैंने कुछ
नहीं कहा और कमरे को चारों तरफ से निहार कर हम दोनों नीचे के कमरे में वापस आ गए।
उस
दिन मम्मी-पापा को किसी रिश्तेदार की शादी के समारोह में जाना हुआ। घर में मुझे
अकेले रहना पड़ा क्योंकि मुझे अपनी परीक्षाओं की तैयारी करनी थी। हालांकि माँ मुझे
साथ ले जाने की ज़िद्द पर थीं पर पिता की बात के आगे वे अधिक बोल नहीं पाईं। भारी
मन से जल्दी आ जाने की बात कह वे गईं। उस रोज़ की घटना से मुझे थोड़ी बहुत घबराहट
होती थी पर इतनी नहीं कि डर का खौफ आ जाए।
जब
घर में कोई न हो तब अपना घर भी चेहरा बदल लेता है। अचानक से लगता है कि कई
खिड़कियाँ दीवारों पर लगीं हैं और खूब हवा घर में घुसी आ रही है। मैंने मन पसंद
खाना बनाया और उसके बाद नहाने धोने का काम किया। कपड़े धो लेने के बाद जब धुले बाल
खोलकर शीशे में खुद को निहार रही थी तभी कुछ सुनाई पड़ा। एक बार को यह मेरा भ्रम
लगा। मैं कंघी बालों में चलाने लगी। तभी मैंने फिर सुना। मैंने न चाहते हुए भी छत
के कमरे की तरफ जाने का मन बनाया। छत की तरफ जाने वाली सीढ़ी पर चढ़ते हुए आवाज
साफ सुनाई देने लगी। कोई गाना ही चल रहा था। जब कमरे की खिड़की से अंदर झाँका तब
देखा कि रेडियो कोने में टेबल पर पड़ा चल रहा है। मैं काफी डर गई। तभी मैंने यह
जानने की तसल्ली करनी चाही कि कोई है या नहीं। खिड़की से सिर्फ एक तरमैंने फैसला
किया कि मुझे चाभी ला कर दरवाजा खोलना चाहिए। हालांकि मैं इतना डरी हुई थी कि
नहाने के बाद भी पसीने से तर थी। हाथ पाँव काँप रहे थे। जैसे तैसे बदहवाशी में
नीचे उतरकर चाभी खोजी। चाभी के मिलने में काफी समय चला गया। आवाज़ अभी भी मेरे
कानों तक आ रही थी। मैंने चाभी का छल्ला लिए फिर सीढ़ी के सीध में डर से देखा। जाने
क्या हुआ कि चक्कर आए और मैं धड़ाम से गिर गई। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। जब होश
आया तब रात के ग्यारह बज रहे थे। माँ के दबाव में पिताजी ने घर बदलने की सहमति जता
दी थी। पिता बोल रहे थे कि जल्दी ही कोई और घर देख लेंगे। इसके बाद मैंने आँखें
बंद कीं और करवट बदलकरकुछ रोज़ के बाद एक अजीब हादसा हुआ। रविवार का दिन था। हम
सुबह के नाश्ते के लिए बैठे थे। लेकिन इसी बीच छत के कमरे से कुछ गिरकर टूट जाने
की आवाज़ आई। धड़ाम! हम जल्दी से चाभी के साथ ऊपर गए और कमरा खोला। आनन फानन में जब
कोने पर नज़र गई तो देखा रेडियो नीचे गिरा शहीद हो चुका था। उसके अंजर-पंजर निकल कर
बिखर गए थे। हमें लगा शायद कोई बिल्ली होगी पर हम यह जानते थे कि इस मौहल्ले में
अभी तक ऐसी कोई बिल्ली नहीं थी जो इस तरह बंद कमरे में घुस जाये। माँ ने कहा कि
शायद हवा से गिरा होगा। पर हम यह बात भी जानते थे कि हवा इतनी तेज़ नहीं चल रही थी
कि रेडियो गिर जाये। हम तीनों ने अपनी अपनी तसल्ली के लिए बहाने खोजे पर हम तीनों
ही के मन में कुछ ऐसा था जिसे हम हर हाल में साझा भी नहीं करना चाह रहे थे।
बहुत
गहरी नींद में सो गई।
लड़कियों-सा लड़का
उसे
अस्पताल में बेड पर लेटे-लेटे लगा, अगर उसने एक और साँस ली तो वह मर जाएगा। वह तन मन से पूरी
तरह टूटा हुआ था। उसे लग रहा था कि वह एक शरीर नहीं हैं। वह टुकड़ों में बिखरा पड़ा
था। उसे इतना पीटा गया था कि होश आने पर वह शरीर के हर घाव को और भीतर तैरते दर्द
को गहराई से अनुभव कर सकता था। कमरे में मद्धिम रौशनी थी। वह कुछ ही देर पहले जागा
था। उसके हाथ में सुई लगी हुई थी जो बूँद-बूँद पानी को उसके अंदर पहुँचा रही थी.
उसने
लेटे-लेटे पिछली रात की घटना को दुबारा सोचने की कोशिश शुरू की। उसके तीन भाइयों
वाले मकान में उसकी ज़िंदगी पता नहीं कब से उससे अलग हो चली थी। वह तीन भाइयों में
से एक था। मझला बेटा। पिता उसके शरीर को देखकर माथे पर हाथ मार लिया करते थे। उन्हें
लगता था कि उनका मझला बेटा ‘मर्द’ नहीं है। शरीर में लड़कियों सी कोमलता है। अक्सर
अपनी नेतागिरी के काम से बाहर जाते हुए पत्नी से कहते जाते- “इसका कुछ करो।”
भाइयों का भी यही ख़याल था, जो पिता
के बॉडी गार्ड की भूमिका में रहते और मुछों को ताव देते थे।
उसने
एक रोज़ माँ से पूछा भी- “माँ तुम्हें ग़ुस्सा नहीं आता मुझपर? मैं भाइयों की तरह नहीं हूँ। वो दोनों कितना कुछ कर लेते
हैं। पापा के साथ रहते हैं। उनकी मदद करते हैं। लेकिन मुझे तो पापा अपने साथ
बर्दाश्त भी नहीं कर पाते.” वह इन बातों को एक रौ में कह गया और भीतर कहीं उदास हो
गया। माँ जो एक पौधा छोटे से गमले में लगा रही थीं, उन्होंने उसे पुकार कर कहा- “जरा पानी तो डालना.” उन्होंने
उसे प्यार से देखकर कहा- “ज़रूरी नहीं कि हम सब एक जैसे ही हों। हम सब अलग हैं। हमारी
पसंद भी अलग-अलग होती है। हम और हमारी आदतें भी। इसलिए मुझे तुम उतने ही प्यारे हो
जैसे तुम्हारे दो भाई। तुम्हें किसी मुक़ाबला नहीं करना है। बस ज़िंदगी को जीना है। तुम
जैसे हो,
वैसे ही रहो.” इतना कहकर, अचानक उन्होंने अपने हाथों में लगी गीली मिट्टी उसके गालों
में लगा दी। दोनों इस बात पर हँस पड़े।
शायद
रात होने को थी क्योंकि कमरे में बल्ब की रौशनी बढ़ रही थी। उसने करवट बदलने की
सोची पर उससे हुआ नहीं। उसके अंदर दर्द का नशा बढ़ रहा था। उसने सोने की कोशिश की
पर वह सोच से बाहर नहीं आ पा रहा था। उसने दरवाज़े की ओर देखा। उसे लगा माँ देख रही
है। पर वहाँ कोई नहीं था। उसने अपनी स्कूल की ज़िंदगी को दोहराया। आँखें बंद की। उसे
दृश्य दिखाई देने लगे। उसे क्लास का वह दृश्य दिखाई दिया जब वह लड़कियों के ग्रुप
में बैठा हुआ उनकी बातों को दिलचस्पी से सुन रहा था। लेकिन क्लास के किसी कोने से
एक ज़ोरदार ठहाका सुनाई दिया। जब उसने उन ठहाका लगाने वाले लड़कों को देखा तो उनमें
एक ने उसकी ओर इशारा करते हुए ताली बजाई। वह एक समुदाय को इंगित करने वाली ताली थी।
उसने अचानक आँखें खोल लीं। उन तालियों की गूँज उसके कानों में गूंज रही थी। उसे
लगा कि उसे किसी कुएं में धक्का देकर गिराया जा रहा है। वे सभी ठहाके उसके साथ-साथ
कुएं में गिर रहे हैं।
कुछ
ही देर में नर्स आई। उसने उसे देखते हुए कहा- “कब होश आया?”
वह
बोलना चाह रहा था लेकिन उसने ख़ुद को असमर्थ पाया। वह माँ के बारे में पूछना चाहता
था लेकिन वह बोल ही नहीं पा रहा था। नर्स ने बिना कुछ कहे ग्लूकोज की बोतल बदली। इंजेक्शन
से उसमें दवा डाली और चली गई। उसे अकेलापन महसूस हुआ। बेहद अकेलापन। उसने दीवारों
पर नज़र डाली। उसे लगा की दीवारें उससे टकराने के लिए उसकी ओर सिमटी आ रही हैं। उसे
घबराहट हुई। उसे लगा उसका गला सूख गया है। उसने कुहनियों पर शारीरिक और मानसिक ज़ोर
दिया। वह अपनी छाती हल्के से ही उठा पाया। पर वह उतनी शक्ति नहीं बटोर पाया कि
थोड़ा सा पानी पीकर गला तर कर सके। उसने फिर कोशिश की और उठकर बैठने में सफल हो गया।
उसने राहत के लिए कुछ साँसें अंदर से बाहर बदलीं। इस बीच हाथ में लगी सुई ने उसे
दर्द की एक टीस दी।
उसे
उसी क्लास में वह लड़का याद आया जिसने एक दिन क्लास के बोर्ड पर एक ऐसा चित्र बनाया
जिसे देखकर सब लोग हँस पड़े थे। यहाँ तक कि उसके ड्राइंग के टीचर भी। उसे हमेशा यह
लगता था कि ये टीचर कुछ अच्छे अभ्यास करवाते थे। वह समझते थे। पर उस दिन वह भी उस
पर हँस दिए। उन्होंने क्लास में टास्क दिया था कि सब अपनी मर्ज़ी से कोई चित्र बनाए।
जब उस लड़के की बारी आई तब उसने बोर्ड पर एक लड़के का चित्र बनाया। उसके पैरों में
पेंट और बूट को ड्रॉ किया। पर धड़ वाले हिस्से को औरत की छाती के रूप में बनाया। छाती
पर बाल बनाए। बालों को ठीक ‘उसके’ अनुसार बनाया। चॉक से होंठो वाले इससे को गहरा
किया। कानों में झुमकों का डिजाइन बनाया। दोनों हाथों को पेंट में डाले हुए दिखाया।
चेहरा हँसता हुआ बनाया। और ठीक ऊपर लिखा- “न यहाँ का, न वहाँ कह!” सब उसकी तरफ़ देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे थे। उसके
बाद उसे कुछ याद नहीं रहा। वह और अकेला होता जा रहा था।
स्कूल
के बाद उसने आगे फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन पिता की
आवाज़ जैसे बिजली की तरह उसके आगे गिरी- “क्या लड़कियों का कोर्स पढ़ने जा रहे हो! अब
ये सब बकवास नहीं चलेगा। कुछ और पढ़ाई का सोचो। कुछ सीखो अपने भाइयों से। वो मर्द
की तरह अपनी-अपनी फिल्ड में बेहतर कर रहे हैं। और एक तुम हो...जब से पैदा हुए मेरे
सिर को शर्म से झुकाने में लगे हो.”
माँ
वहीं खड़ी थीं और चाहती थीं कि ये सब रोक दें। लेकिन वह ऐसा करने की शक्ति नहीं
बटोर पाईं। वह चुपचाप खड़ा रहा। पर इस बार
उसके मन में अपने लिए खड़े होने की बुनाई चल रही थी। उसने अपने पिता से कहा- “माफ़
करें पापा, पर इस बार मैं वही
करूँगा जो मेरा मन है। मेरी वजह से अपना सिर न झुकाया करें। मैं तो कहता हूँ मेरी
फ़िक्र ही छोड़ दीजिए। मैं ऐसे ही ठीक हूँ.” वहाँ मौज़ूद उसकी माँ और भाइयों की आँखें
हैरानी से फ़ैल गईं और दोनों भाइयों ने उसे आगे न बोलने की धमकी दी। पिता ने आगे बढ़
उसे सीने पर धक्का दिया और उसकी एक हाथ से कालर पकड़ते हुए दूसरे से थप्पड़ मारने ही
वाले थे इतने में माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया.
पिता
माँ को लाल आँखों से देखने लगे। उन्हें यकीन नहीं हुआ कि खूंटे से बंधी बकरी इतनी
बड़ी हरक़त कर सकती है। माँ ने आँखों में आँसू लेते हुए पर एक शक्ति को अपने भीतर
समेटते हुए कहा- “बस कीजिए। ये आपके मुताबिक़ जीने के लिए नहीं बना। ये ख़ुद के
मुताबिक़ जिएगा। इसका जैसा मन होगा वैसा जिएगा। आप अब इसकी ज़िंदगी में दख़ल न दें तो
बेहतर होगा.”
पिता
इतने ग़ुस्से में थे कि अपनी पत्नी को ज़ोरदार चांटा कुछ इस तरह मारा जैसे वे इस
चांटे से पत्नी की जान निकाल लेना चाहते हों। वहीं खड़े दोनों भाइयों ने पिता की इस
हरक़त का विरोध नहीं किया। बल्कि माँ को अपनी हद में रहने का फरमान सुनाया। पर माँ
फिर उठकर खड़ी हुईं और अपने मझले बेटे का हाथ पकड़कर उससे कहा- “अपना सामान बांधों। बस
पहनने के कपड़े रख लो और इस घर का एक सामान भी मत रखना। हम यहाँ नहीं रहेंगे। हमारा
वक़्त बस इतना ही था.” जैसे ही वह अपने कमरे की ओर बढ़ने लगा उस पर दोनों भाई ग़ुस्से
से टूट पड़े। उन्हें यह ख़याल ही नहीं रहा कि वह उनका ख़ुद का भाई है। उसे इतना मारा
गया कि जब उससे होश आया तब उसने ख़ुद अस्पताल में पाया.
रात
गहरी हो रही थी। क़रीब नौ बजे होंगे जब उसकी आँखें खुली तब उसकी माँ उसका सिर सहला
रही थीं। उसकी आँखें खुलते ही वह तुरंत पूछ बैठी- “कैसा है अभी?” उनकी आँखों में पानी था। उसने पूछा- “अस्पताल कौन लाया?” माँ ने बताया कि उन्होंने ख़ुद को मार देने की धमकी दी तब
जाकर उनका मारना रुका। दौड़कर किचन से चाकू लाईं और अपनी गर्दन पर रखते हुए धमकी दी
कि एम्बुलेंस को फोन करो वरना अपना गला काट लेंगी।वे शून्य में देखते हुए बता रही
थीं- “जब तुझे एम्बुलेंस में ले जाया गया तब मुझे तेरे पिता ने वापस इस घर में न
आने के लिए कहा। मुझे उस वक़्त एक आज़ादी का एहसास हुआ। मुझे तेरी हिम्मत देखकर अपनी
हिम्मत का एहसास हुआ। ज़िंदगी भर डर के साए में रहना और उसे क़ुबूल करते जाना हमें
कायर बना देता है। इतना कि हम सिर्फ़ हाड़ मांस बनकर रह जाते हैं। लेकिन एक चिंगारी
भी हमारी उस डर की चादर को जलाने में क़ामयाब हो सकती है। हम अब जिएंगे। जी भरकर
जिएंगे। पसंद का खाएंगे। पसंद का पहनेंगे। पसंद का काम करेंगे...” वह किसी अहम
अंदरूनी खोज को हासिल कर चुकी थीं। उसे एक पल को लगा कि माँ नहीं कोई दूसरी ही औरत
है.
उसने
कहा- “पर हम जाएंगे कहाँ?”
माँ
ने उसके बालों को माथे से हटाते हुए कहा- “कहीं भी। लेकीन इस शहर में नहीं रहेंगे।
खोजेंगे तो सब मिलेगा। तू ठीक हो जा जल्दी से.”
दोनों
कुछ देर मिलकर रोए। माँ देर रात कैंटीन से दो कप कॉफ़ी लाईं। उसे सहारा देकर बैठाया।
उसे कॉफ़ी हाथ में पकड़ाते हुए बताया कि डॉक्टर ने कहा है कि दो दिन में उसे अस्पताल
से छुट्टी मिल जाएगी। वह ख़ुश थीं.
वह
बोलीं,
“अतीत तो ठीक नहीं कर सकती पर आज बेहतर
कर सकती हूँ। तुम जैसे हो और जो हो मेरे हो। इतना काफी है। तुम्हारे अंदर ख़ुद को
क़ुबूल करने की क्षमता है जो मुझमें नहीं थी। अगर अपने मन की सुनी होती तो शायद कुछ
और ही होती। इसलिए आज सुनने की कोशिश कर रही हूँ...हम लड़की या लड़के
जैसा ही क्यों महसूस करें? हमें, हम
जैसे हैं वैसा महसूस करना आना चाहिए। बाहर वालों को यह हक़ नहीं कि वो हमें बताएं
कि हम क्या पहने और कैसा बर्ताव करें...” वो बोलती जा रही थीं।
उनके
बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा- “मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि मेरी माँ फिलॉसफर हैं।”
इसके बाद वे दोनों हँसे और कॉफ़ी के स्वाद पर चर्चा करने लगे।माँ ने कहा- “इससे
अच्छी कॉफ़ी तो मैं बना सकती हूँ। क्यों न मैं एक छोटा कॉफ़ी हाउस खोल लूं?” उसने कहा, हम्म!
ख़याल काफी अच्छा है माँ!”

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