प्रिय लूसीलियस
क्या उसने तुम्हें पहले ही यह विश्वास दिला दिया है कि वह एक अच्छा मनुष्य है? वास्तव में किसी मनुष्य का अच्छा होना या उसे अच्छे मनुष्य के रूप में पहचाना जाना इतनी कम अवधि में संभव नहीं है।
तुम समझते हो कि वर्तमान संदर्भ में मैं किस प्रकार के अच्छे मनुष्य की बात कर रहा हूँ। उस दूसरे दर्जे के अच्छे मनुष्य की। क्योंकि वह सर्वोच्च प्रकार का मनुष्य तो शायद पाँच सौ वर्षों में एक बार ही जन्म लेता है, ठीक वैसे ही जैसे फीनिक्स पक्षी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो वास्तव में महान है, वह बहुत लंबे अंतराल पर ही उत्पन्न होता है। साधारण लोगों को तो संयोग और प्रकृति बड़ी संख्या में पैदा कर देते हैं। वे भीड़ का हिस्सा होते हैं। परन्तु जो असाधारण होता है, वह दुर्लभ होता है। उसका दुर्लभ होना ही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है।
लेकिन जिस व्यक्ति का तुम उल्लेख कर रहे हो, वह अभी उस आदर्श से बहुत दूर है जिसका वह दावा करता है। यदि वह सचमुच जानता कि एक अच्छा मनुष्य क्या होता है तो वह स्वयं को अभी अच्छा मनुष्य नहीं मानता। बल्कि सम्भव है कि वह कभी ऐसा बन पाने की आशा ही छोड़ बैठता।
“लेकिन वह दुष्ट लोगों से घृणा करता है!” हाँ, और दुष्ट लोग भी स्वयं दुष्टता से घृणा करते हैं। दुष्कर्म का इससे कठोर दंड और कोई नहीं कि मनुष्य स्वयं अपने प्रति अपराध करता है। साथ ही अपने परिवार तथा मित्रों के प्रति भी।
“लेकिन वह उन सभी लोगों से घृणा करता है जो स्वयं पर नियंत्रण न होने के कारण अपनी महान शक्ति का मनमाना उपयोग करते हैं।” हाँ, पर जब उसके पास स्वयं वह शक्ति होगी तो वह भी वही करेगा। बहुत-से लोगों के दोष केवल इसलिए दिखाई नहीं देते क्योंकि वे उन्हें कार्यरूप देने में असमर्थ होते हैं। जैसे ही उन्हें अपनी शक्ति पर भरोसा हो जाता है। वे उतनी ही निर्भीकता से व्यवहार करते हैं जितना वे लोग, जिन्हें भाग्य पहले ही अवसर और सामर्थ्य दे चुका है। उनकी दुष्टता की पूरी सीमा प्रकट होने से केवल साधनों की कमी रोकती है। यह उसी प्रकार है जैसे विषैला साँप ठंडे मौसम में सुरक्षित प्रतीत होता है। क्योंकि वह सुस्त पड़ा रहता है। उसका विष तो तब भी मौजूद रहता है, बस निष्क्रिय होता है। इसी प्रकार अनेक लोगों की क्रूरता, महत्वाकांक्षा या भोग-विलास की प्रवृत्ति केवल भाग्य के कारण उन सबसे बुरे उदाहरणों जैसी नहीं दिखती। उन्हें बस वह शक्ति नहीं मिली होती जिसकी उन्हें इच्छा है। उन्हें केवल इतना सामर्थ्य दे दो कि वे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर सकें, तब तुम देखोगे कि उनकी इच्छाएँ भी वही हैं जो दूसरों की हैं।
क्या तुम्हें याद है, जब तुमने मुझे बताया था कि एक व्यक्ति तुम्हारे वश में है और मैंने कहा था कि वह चंचल स्वभाव का है। भाग जाने की प्रवृत्ति रखता है। तुमने उसे उसके पैर से नहीं बल्कि उसके पंख से पकड़ रखा है? मैं गलत था। तुमने उसे पंख से भी नहीं, केवल एक पर (पंख के रेशे) से पकड़ रखा था। अब वह उसे पीछे छोड़कर उड़ चुका है। तुम जानते हो कि बाद में उसने तुम्हारे साथ कैसी चालें चलीं, कितने घुमावदार और छलपूर्ण उपाय अपनाए। अंततः उसने किसी और को नहीं, केवल स्वयं को धोखा दिया। वह यह नहीं समझ सका कि वह दूसरों के संकटों से गुजरता हुआ बड़ी तेजी से अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा था। उसे यह भी समझ में नहीं आया कि जिन वस्तुओं के पीछे वह भाग रहा था, वे अनावश्यक थीं। यदि वे अनावश्यक न भी होतीं, तब भी वे उसके लिए बोझ ही बनतीं।
यही वह बात है जिसे हमें सदैव ध्यान में रखना चाहिए। जिन वस्तुओं के लिए हम प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिन पर हम इतना परिश्रम और ऊर्जा लगाते हैं, वे या तो हमें कोई लाभ नहीं देतीं या फिर लाभ से अधिक हानि पहुँचाती हैं। कुछ वस्तुएँ पूरी तरह अनावश्यक हैं। कुछ ऐसी हैं जो उन्हें प्राप्त करने में होने वाले कष्ट के योग्य ही नहीं हैं। लेकिन हम यह बात समझ नहीं पाते। हम सोचते हैं कि ये चीज़ें हमें बिना किसी कीमत के मिल रही हैं जबकि वास्तव में उनकी कीमत बहुत भारी होती है। यहीं हमारी मूर्खता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है। हम यह मानते हैं कि केवल वही वस्तुएँ मूल्य चुकाकर प्राप्त की जाती हैं जिनके लिए हम धन खर्च करते हैं। जिन चीज़ों को हम 'मुफ़्त' समझते हैं, उनके लिए हम वास्तव में अपना सम्पूर्ण अस्तित्व खर्च कर रहे होते हैं। जिन वस्तुओं के लिए हम अपना घर, कोई सुखद संपत्ति या उपजाऊ ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं होते, उन्हें पाने के लिए हम चिंता, संकट, स्वतंत्रता की हानि, चरित्र की क्षति और अपने बहुमूल्य समय का बलिदान देने को तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार, सच तो यह है कि हम स्वयं को संसार की किसी भी वस्तु से कम मूल्यवान समझते हैं।
इसलिए हमें हर परिस्थिति में और अपने प्रत्येक निर्णय में वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम बाज़ार में करते हैं। जब किसी विक्रेता के पास कोई ऐसी वस्तु हो जिसे हम बहुत चाहें, हमें पूछना चाहिए कि इसकी कीमत क्या है? अक्सर किसी वस्तु की कीमत बहुत अधिक होती है, भले ही वह हमें बिना धन दिए मिल जाए। मैं तुम्हें ऐसी अनेक चीज़ें दिखा सकता हूँ जिनकी प्राप्ति के क्षण ही हमने अपनी स्वतंत्रता खो दी। यदि वे वस्तुएँ हमारी न होतीं, तो हम स्वयं अपने स्वामी होते। दूसरे शब्दों में, जिन चीज़ों को हम अपना समझकर पकड़ लेते हैं, कई बार वही हमें अपना बंधक बना लेती हैं। यदि हम उनके स्वामी न बनते तो अपने आप पर हमारा अधिकार बना रहता।
इसलिए इस बात पर विचार करो। केवल तब नहीं जब तुम कोई वस्तु प्राप्त करो बल्कि तब भी जब तुम कोई वस्तु खो दो।
“तुम उसे फिर कभी नहीं देखोगे।” नहीं, लेकिन वह तुम्हें संयोगवश ही मिली थी। तुम उसके बिना उतनी ही आसानी से जीवन बिताओगे जितनी आसानी से उसके मिलने से पहले बिताते थे। यदि वह लंबे समय तक तुम्हारे पास रही है तो तुम उसे पर्याप्त रूप से भोग लेने के बाद खो रहे हो। यदि वह अधिक समय तक तुम्हारे पास नहीं रही तो तुम उसे उसके अभ्यस्त होने से पहले ही खो रहे हो।
“तुम्हारे पास अब उतना धन नहीं रहेगा।” नहीं, लेकिन तुम्हारे पास उतनी परेशानियाँ भी नहीं रहेंगी। “तुम्हारा प्रभाव और प्रतिष्ठा अब उतनी नहीं रहेगी।” और न ही तुम्हें उतनी शत्रुता और द्वेष का सामना करना पड़ेगा।
उन सभी चीज़ों पर विचार करो जिनके कारण हम व्याकुल हो उठते हैं। जिनके खो जाने पर हम सबसे अधिक विलाप करते हैं। तुम देखोगे कि हमें वास्तव में वंचित होना नहीं सताता बल्कि वंचित होने का विचार सताता है। मनुष्य सोचता है कि उसे कोई हानि हुई है पर वास्तव में वह उस हानि को अनुभव नहीं करता।
जब कोई व्यक्ति स्वयं का स्वामी बन जाता है, तब उससे कभी कुछ नहीं खोता। लेकिन ऐसे लोग जिन्होंने स्वयं पर यह अधिकार प्राप्त कर लिया हो, बहुत ही दुर्लभ हैं।
अभी के लिए विदा
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