प्रिय लूसीलियस
तुम पूछते हो, मुझे यह कैसे पता चला? तुम्हारी योजनाओं के बारे में मुझे किसने बताया जबकि तुमने स्वयं किसी को कुछ नहीं बताया था? उसने, जो अधिकांश बातों को जानता है गॉसिप द्वारा।
तुम कहते हो, “मैं कब से इतना महत्वपूर्ण हो गया कि मेरे बारे में गॉसिप फैलने लगीं?” अपने महत्व का आकलन इस स्थान के आधार पर मत करो बल्कि उस स्थान के संदर्भ में करो जहाँ तुम रहते हो। जो भी वस्तु अपने परिवेश में सबसे अलग और प्रमुख दिखाई देती है, उसी स्थान पर वह महत्वपूर्ण मानी जाती है। महानता का कोई एक निश्चित आकार नहीं होता। तुलना ही किसी वस्तु को बड़ा या छोटा बनाती है। नदी में बड़ा दिखाई देने वाला जहाज़ समुद्र में बहुत छोटा लग सकता है। वही पतवार एक नाव के लिए बड़ी होती है तो दूसरी के लिए छोटी। इसलिए, अब जब तुम अपने प्रांत में हो तो तुम एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हो, चाहे तुम स्वयं को कितना ही साधारण क्यों न समझो। तुम्हारे कार्यकलाप, तुम्हारी भोजन-व्यवस्था, यहाँ तक कि तुम्हारे सोने-जागने की आदतें भी लोगों की रुचि और चर्चा का विषय हैं। वास्तव में सबको उनकी जानकारी है।
इसलिए तुम्हें अपने जीवन-व्यवहार के प्रति और भी अधिक सावधान रहना चाहिए। अपने आपको भाग्यशाली समझो यदि तुम ऐसा जीवन जी सकते हो जो सबके सामने खुला हो। जहाँ दीवारें तुम्हारी रक्षा के लिए हों, छिपाने के लिए नहीं। क्योंकि सामान्यतः हम यह मानते हैं कि हमारे चारों ओर दीवारें हमें सुरक्षित रखने के लिए नहीं बल्कि हमारे दुष्कर्मों को अधिक गोपनीयता देने के लिए हैं। मैं तुम्हें हमारे नैतिक पतन का एक मापदंड बताता हूँ। तुम्हें शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो अपना दरवाज़ा खुला रखकर जी सके। द्वार पर चौकीदार दिखावे के लिए नहीं बैठाया जाता। उसका कारण अपराधबोध होता है। हम जिस प्रकार जीवन जीते हैं, उसमें किसी का बिना सूचना के आ जाना मानो रंगे हाथों पकड़े जाने के समान है।
लेकिन अपने आपको लोगों की नज़रों और कानों से छिपाने का क्या लाभ? एक अच्छा अंतःकरण भीड़ का स्वागत करता है जबकि बुरा अंतःकरण एकांत में भी चिंता और व्याकुलता से ग्रस्त रहता है। यदि तुम्हारे कर्म सम्मानजनक हैं तो उन्हें सबके सामने आने दो। यदि वे लज्जाजनक हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि कोई और उन्हें जानता है या नहीं? तुम स्वयं तो जानते ही हो। हाय तुम्हारी दशा पर, यदि तुम्हें इस साक्षी की कोई परवाह ही नहीं है!
No comments:
Post a Comment