प्रिय लूसीलियस
तुम फिर स्वयं को कम आँक रहे हो। तुम कहते हो कि जन्म से ही तुम्हें बहुत कम मिला है। भाग्य ने भी तुम्हें थोड़ी ही संपत्ति दी जबकि वास्तव में तुम साधारण भीड़ से अपने को अलग कर सकते हो और मानवीय समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई तक पहुँच सकते हो।
यदि दर्शन में कोई विशेष अच्छाई है तो यह है कि वह वंशावली का कोई महत्व नहीं मानता। यदि हम अपनी वंश-परंपरा को उसके आदि स्रोत तक ले जाएँ तो समस्त मानवजाति दिव्य उत्पत्ति की है। तुम रोमन अश्वारोही वर्ग (Equestrian Order) के सदस्य हो। अपने परिश्रम के बल पर तुमने यह पद प्राप्त किया है। लेकिन, देवताओं की कसम, ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सम्मानित आसनों में बैठने का अधिकार नहीं मिलता। कुछ तो सीनेट भवन में प्रवेश भी नहीं पा सकते। यहाँ तक कि सेना भी कठिन परिश्रम और जोखिम भरे कार्यों के लिए लोगों का चयन बड़ी सावधानी से करती है। परंतु मन की उत्कृष्टता सबके लिए उपलब्ध है। इस दृष्टि से हम सभी उच्च कुल में जन्मे हुए हैं।
दर्शन न किसी को अस्वीकार करता है और न किसी को चुनकर विशेषाधिकार देता है। वह सबके लिए समान रूप से प्रकाश फैलाता है। सुकरात किसी कुलीन (पैट्रिशियन) परिवार से नहीं थे। क्लीन्थीस पानी ढोते थे और लोगों के बाग़ों में सिंचाई करने के लिए मजदूरी करते थे। प्लेटो दर्शन के पास कुलीन बनकर नहीं आए थे बल्कि दर्शन ने ही उन्हें वास्तव में महान और कुलीन बनाया। तो फिर तुम क्यों आशा न करो कि शायद तुम भी उनके समान बन सको? यदि तुम स्वयं को उनके योग्य सिद्ध कर दो तो वे सभी तुम्हारे पूर्वज हैं। और तुम ऐसा कर सकोगे, यदि अभी इसी क्षण अपने मन को यह विश्वास दिला दो कि केवल उच्च कुल में जन्म लेने के कारण कोई भी व्यक्ति तुमसे श्रेष्ठ नहीं हो जाता।
सबके पूर्वजों की संख्या समान है। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्पत्ति विस्मृति (अज्ञात अतीत) के अतिरिक्त कहीं और से हुई हो। प्लेटो कहते हैं कि प्रत्येक राजा की उत्पत्ति किसी न किसी दास से हुई है। प्रत्येक दास की उत्पत्ति किसी न किसी राजा से। समय के उतार-चढ़ाव और भाग्य के खेल ने सभी चीज़ों को उलट-पुलट कर मिला दिया है। अच्छे कुल का व्यक्ति कौन है? वह, जिसे प्रकृति ने सद्गुण की ओर एक उत्तम प्रवृत्ति प्रदान की है। हमें केवल इसी बात को देखना चाहिए। अन्यथा, यदि तुम अपने विचारों को प्राचीनतम काल तक ले जाओ तो हर व्यक्ति की उत्पत्ति उस क्षण से है जिसके पहले कुछ भी नहीं था। सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक हमारा इतिहास वैभव और दरिद्रता, गौरव और पतन, इन दोनों की निरंतर चलती हुई श्रृंखला रहा है।
धुएँ से काली पड़ चुकी पूर्वजों की तस्वीरों से भरा हुआ आँगन किसी व्यक्ति को कुलीन नहीं बना देता। किसी ने अपना जीवन इसलिए नहीं जिया था कि हम बाद में उसका नाम लेकर अपनी शान बघारें। जो कुछ हमारे जन्म से पहले घटित हुआ, वह हमारा नहीं है। मन ही वह चीज़ है जो वास्तविक कुलीनता प्रदान करता है क्योंकि मन को यह स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह अपनी सामाजिक स्थिति चाहे जो हो, भाग्य के उतार-चढ़ावों से ऊपर उठ सके। कल्पना करो कि तुम रोमन अश्वारोही वर्ग के सदस्य नहीं बल्कि एक मुक्त दास (फ्रीडमैन) हो। तब भी तुम ऐसी अवस्था प्राप्त कर सकते हो जिसमें केवल तुम ही वास्तव में स्वतंत्र हो, भले ही तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हारी दासवत उत्पत्ति को साझा न करते हों।
“कैसे?” तुम पूछते हो। यदि तुम अच्छे और बुरे का निर्णय स्वयं करो, जनसाधारण की धारणाओं के आधार पर नहीं। तुम्हें यह नहीं देखना चाहिए कि कोई वस्तु कहाँ से आई है बल्कि यह देखना चाहिए कि वह किस दिशा में ले जा रही है। यदि किसी वस्तु में तुम्हारे जीवन को सुखी बनाने की क्षमता है, तो वह अपने आप में एक अच्छाई (सद्गुण) है। क्योंकि जो वस्तु वास्तव में अच्छी है, उसे किसी भी प्रकार बुरी वस्तु में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
तो फिर लोगों की भूल क्या है जबकि हर व्यक्ति सुखी जीवन चाहता है? वे उन साधनों को, जिनका उपयोग सुख प्राप्त करने के लिए किया जाता है, स्वयं सुख ही समझ बैठते हैं। इस प्रकार जिस वस्तु की वे खोज कर रहे होते हैं, उसी को छोड़ देते हैं। क्योंकि सुखी जीवन का मुख्य आधार है— दृढ़ सुरक्षा की भावना और उस अवस्था के प्रति अटल आत्मविश्वास। लेकिन लोग इसके विपरीत चिंता के कारणों को इकट्ठा करते रहते हैं। जीवन की धोखों से भरी यात्रा में उन बोझों को अपने पीछे ढोते नहीं बल्कि घसीटते चलते हैं। इसी कारण वे जिस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उससे निरंतर दूर होते जाते हैं। उनका प्रयास जितना अधिक बढ़ता है, वे अपने लिए उतनी ही अधिक बाधाएँ उत्पन्न कर लेते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति किसी भूलभुलैया में जल्दी-जल्दी निकलने का प्रयास करे। उसकी वही जल्दबाज़ी उसके मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।
अभी के लिए विदा
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