Tuesday, 7 July 2026

सुखी व्यक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 45 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि जहाँ तुम रहते हो वहाँ पुस्तकों की कमी है। लेकिन महत्त्व इस बात का नहीं है कि तुम्हारे पास कितनी पुस्तकें हैं बल्कि इस बात का है कि वे कितनी अच्छी हैं। विविध प्रकार का पढ़ना आनंद देता है। परंतु चुनिंदा और विचारपूर्वक किया गया अध्ययन वास्तविक लाभ पहुँचाता है। यदि किसी व्यक्ति को अपने गंतव्य तक पहुँचना है तो उसे एक ही मार्ग पर चलना चाहिए, अनेक रास्तों पर भटकते नहीं फिरना चाहिए। तुम जो कर रहे हो, वह यात्रा नहीं है। वह तो इधर-उधर भटकना मात्र है।



    “तुम्हारी सलाहों को छोड़ो,” तुम कहते हो, “और बस पुस्तकें भेजो!” मैं उन्हें भेज दूँगा, जितनी भी मेरे पास हैं। बल्कि तुम्हारे लिए तो मैं अपना पूरा पुस्तक-संग्रह ही खाली कर देने को तैयार हूँ। यदि संभव होता तो मैं स्वयं भी तुम्हारे पास आ जाता। यदि मुझे यह आशा न होती कि तुम शीघ्र ही वहाँ के अपने दायित्वों से मुक्त हो जाओगे तो मैं अपनी वृद्धावस्था की परवाह किए बिना यात्रा करने का निश्चय कर लेता। यहाँ तक कि स्किला और कैरीब्डिस जैसे पौराणिक और भयावह जलडमरूमध्य भी मुझे रोक नहीं पाते। मैं केवल उन्हें पार ही न करता बल्कि तैरकर भी पार कर जाता, यदि इससे मुझे तुम्हें फिर से गले लगाने और अपनी आँखों से यह देखने का अवसर मिलता कि तुम्हारा मन और बुद्धि कितनी विकसित हो गई है।

    लेकिन जहाँ तक तुम्हारे इस अनुरोध का प्रश्न है कि मैं तुम्हें अपनी पुस्तकें भेजूँ तो मैं इस कारण स्वयं को विद्वान नहीं समझता। ठीक वैसे ही जैसे यदि तुम मेरा चित्र माँगो तो मैं स्वयं को सुंदर नहीं मान लूँगा। मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारा निर्णय नहीं बल्कि स्नेह का परिणाम है या यदि इसमें कोई निर्णय निहित भी है तो वह स्नेह से प्रभावित निर्णय है। फिर भी, वे जैसी भी हैं, उन्हें ऐसे व्यक्ति की पुस्तकें समझकर पढ़ना जो सत्य को अभी तक नहीं जानता बल्कि उसकी खोज में लगा हुआ है। उस खोज में अटल बना हुआ है। क्योंकि मैं किसी का अनुचर नहीं हूँ। मैं अपने अतिरिक्त किसी और का नाम धारण नहीं करता। महान व्यक्तियों के विचारों पर मुझे बहुत विश्वास है परंतु मैं अपने विचारों के लिए भी कुछ स्थान का दावा करता हूँ। क्योंकि उन महान लोगों ने भी हमारे लिए अंतिम उत्तर नहीं छोड़े। उन्होंने तो हमारे सामने प्रश्न छोड़े हैं, जिनकी खोज हमें स्वयं करनी है।

    शायद वे उन उत्तरों तक पहुँच जाते जिनकी वास्तव में आवश्यकता थी, यदि उन्होंने अनावश्यक बातों की खोज में भी स्वयं को न उलझाया होता। उनका बहुत-सा समय शब्दों की बाज़ीगरी और पहेलीनुमा विवादों में व्यतीत हुआ, जो बुद्धि को तो व्यस्त रखते हैं पर किसी वास्तविक लाभ तक नहीं पहुँचाते। हम गाँठें बाँधते हैं। अपने शब्दों में जान-बूझकर अस्पष्ट अर्थ पिरो देते हैं और फिर उन्हीं गाँठों को खोलने में लग जाते हैं। क्या सचमुच हमारे पास इतना समय है? क्या हम पहले से ही यह जान चुके हैं कि कैसे जीना चाहिए और कैसे मरना चाहिए? हमें अपने पूरे मनोयोग के साथ उस लक्ष्य की ओर शीघ्रता से बढ़ना चाहिए, जहाँ उन भ्रमों और छलों का पर्दाफाश हो जाता है जो हमें सत्य से दूर रखते हैं।

    तुम मेरे लिए ऐसे शब्दों के बीच भेद क्यों कर रहे हो जिनके अनेक अर्थ होते हैं जबकि उन्हें कोई भी व्यक्ति वास्तव में भ्रमित नहीं करता सिवाय वाद-विवाद के समय? भ्रम तो हमारे जीवन में है। भेद वहीं स्पष्ट करो! हम अच्छाइयों के बजाय बुराइयों को अपनाते हैं। एक चीज़ चुनते हैं और फिर उसके विपरीत का अनुसरण करने लगते हैं। हमारे लक्ष्य और हमारी इच्छाएँ आपस में टकराती रहती हैं। चापलूसी मित्रता से बहुत मिलती-जुलती है बल्कि केवल मिलती-जुलती ही नहीं अक्सर उसी पर भारी पड़ जाती है। मनुष्य उसे उत्सुक कानों से सुनता है, उसे अपने हृदय में गहराई तक उतार लेता है। उन्हीं गुणों से प्रसन्न होता है जो उसे सबसे अधिक खतरनाक बनाते हैं। मुझे वहाँ भेद करना सिखाओ! एक मनोहर शत्रु मित्र बनकर मेरे पास आता है। दोष स्वयं को सद्गुण कहकर भीतर प्रवेश कर जाते हैं। उतावलापन साहस का नाम ओढ़ लेता है। कायरता को संयम कहा जाता है। डरपोकपन स्वयं को सावधानी के रूप में प्रस्तुत करता है। ये वे खतरे हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। हमें इन्हीं के विषय में कुछ मार्गदर्शन दो!

    लेकिन जिस व्यक्ति से तुम पूछ रहे हो, “क्या तुम्हारे सींग हैं?”, वह इतना मूर्ख नहीं है कि उन्हें टटोलने के लिए अपने माथे पर हाथ फेरने लगे! न ही वह इतना बुद्धिहीन है कि जब तक तुम अपने चतुर तर्कों और कुतर्कों से उसे विश्वास न दिलाओ, तब तक उसे यह पता ही न चले कि उसके सींग हैं। ये सब केवल निर्दोष चालबाज़ियाँ हैं। वे जादूगर के उन खेलों की तरह हैं जिनमें वह प्यालों और कंकड़ों से भ्रम पैदा करता है। मुझे वे केवल इसलिए मनोरंजक लगते हैं क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं धोखा खा रहा हूँ। इन्हीं तथाकथित “पहेलियों” के बारे में भी यही कहा जा सकता है— कुतर्कों (सोफ़िज़्म) के लिए इससे बेहतर शब्द और क्या हो सकता है? जो लोग उन्हें नहीं समझते, उन्हें वे कोई हानि नहीं पहुँचातीं। जो उन्हें समझ लेते हैं, उन्हें भी उनसे कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता।

यदि तुम वास्तव में शब्दों के बीच भेद करना चाहते हो तो हमें यह समझाओ कि सुखी व्यक्ति वह नहीं है जिसे सामान्य लोग सुखी कहते हैं। वह नहीं जिस पर धन की वर्षा हुई हो बल्कि वह है जिसकी सारी अच्छाइयाँ उसके मन में निवास करती हैं। वही व्यक्ति सीधा, दृढ़ और महान होता है। वह उन वस्तुओं को अपने पैरों तले रौंद देता है जिन पर लोग आश्चर्य और श्रद्धा करते हैं। वह अपने जीवन को किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन से बदलना नहीं चाहेगा। वह मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसी आधार पर करता है जो उसे वास्तव में मनुष्य बनाता है। वह प्रकृति को अपना शिक्षक मानता है। अपने जीवन को प्रकृति के नियमों के अनुसार संचालित करता है। वैसे ही जीता है जैसा प्रकृति ने निर्देश दिया है। उसकी संपत्ति ऐसी होती है जिसे कोई शक्ति उससे छीन नहीं सकती। जो कुछ बुरा होता है, उसे भी वह अच्छाई में बदल देता है। उसका निर्णय दृढ़ होता है। वह न डगमगाता है, न भयभीत होता है और न ही विचलित। ऐसी शक्तियाँ अवश्य हैं जो उसे प्रभावित करती हैं पर ऐसी कोई नहीं जो उसे आतंकित कर सके। भाग्य के सबसे तीखे और घातक प्रहार भी उसे घायल नहीं कर पाते। वे उसे केवल हल्की-सी चुभन का अनुभव कराते हैं और वह भी बहुत कम। जहाँ तक उन अन्य बाणों का प्रश्न है जो सामान्यतः मानव जाति पर आक्रमण करते हैं, वे उससे वैसे ही टकराकर लौट जाते हैं जैसे छत पर पड़ने वाली ओलों की मार— जो कुछ देर खड़खड़ाहट करती है और फिर पिघल जाती है बिना भीतर रहने वाले को कोई क्षति पहुँचाए।

    तुम मेरा समय उस चीज़ में क्यों नष्ट करते हो जिसे तुम स्वयं भी 'झूठे की पहेली' कहते हो। जिसके विषय में इतनी सारी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं? यह देखो, मेरा पूरा जीवन ही एक झूठ है। यदि तुम इतने चतुर हो, तो इसका खंडन करो! इसके असत्य को सत्य में बदल दो। यह जीवन उन वस्तुओं को आवश्यक समझता है जो वास्तव में केवल विलासिता या अनावश्यक चीज़ें हैं। जो वस्तुएँ वास्तव में अनावश्यक नहीं भी हैं, उनका भी एक धन्य और सुखी जीवन के संदर्भ में कोई स्वाभाविक या मौलिक महत्व नहीं है।

    किसी वस्तु का आवश्यक होना उसे तुरंत अच्छा (वास्तविक शुभ) नहीं बना देता। अन्यथा हम अच्छाई के मूल्य को ही घटा देंगे, यदि हम रोटी, दलिया और उन अन्य वस्तुओं को भी ‘अच्छा’ कहने लगें जिनके बिना जीवन का निर्वाह संभव नहीं है। जो वास्तव में अच्छा है, वह आवश्यक भी होता है पर जो आवश्यक है, वह इसी कारण अच्छा नहीं हो जाता। वास्तव में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जो आवश्यक तो हैं किन्तु मूल्य की दृष्टि से बहुत निम्न स्तर की हैं। कोई भी व्यक्ति मूल्य के प्रति इतना अंधा नहीं होता कि जो वस्तु वास्तव में अच्छी है, उसे केवल दैनिक उपयोगिता की वस्तु के स्तर तक गिरा दे।

    तो फिर! क्या तुम अपने प्रयासों की दिशा नहीं बदलोगे? हमें यह दिखाओ कि किस प्रकार अनावश्यक चीज़ों के पीछे भागते हुए बहुत-सा समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है। कितने लोग जीवन की आवश्यकताओं को जुटाने के चक्कर में स्वयं जीवन से ही वंचित रह जाते हैं। लोगों को देखो, और सामान्य रूप से मानव-समाज का अध्ययन करो। तुम पाओगे कि हममें से हर कोई आने वाले कल के लिए जी रहा है।

    “क्या इसमें कोई हानि है?” तुम कहते हो। हाँ, अनंत हानि है। क्योंकि वे वास्तव में जी नहीं रहे हैं, वे केवल जीने की तैयारी कर रहे हैं। हर चीज़ को टाल दिया जाता है। यदि हम सचेत होकर भी जीवन पर ध्यान देते, तब भी जीवन हमारे हाथों से फिसल जाता लेकिन हम तो जीने को ही टालते रहते हैं। हमारा जीवन ऐसे तेज़ी से हमारे पास से निकल जाता है मानो वह किसी और का हो। अंतिम दिन पर समाप्त हो जाता है फिर भी हर दिन हमसे खोता रहता है। 

    लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस पत्र की उचित लंबाई से अधिक बढ़ जाऊँ, जिसे पाठक के बाएँ हाथ का पूरा भाग भी नहीं भरना चाहिए। इसलिए अत्यधिक सूक्ष्म तर्क-वितर्क करने वाले दार्शनिकों के साथ मेरा जो विवाद है, उसे किसी और दिन के लिए स्थगित करता हूँ। तर्कशास्त्र में रुचि रखना एक बात है लेकिन जब वे तर्कशास्त्र को ही अपना एकमात्र विषय बना लेते हैं तो बात बिल्कुल अलग हो जाती है।


अभी के लिए विदा 

No comments:

Post a Comment

दासों के संदर्भ में -- पत्र 47

 प्रिय लूसीलियस  मुझे उन लोगों से यह जानकर प्रसन्नता हुई जो आपके साथ रह चुके हैं। आप अपने दासों के साथ आत्मीय और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते ह...