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Saturday, 12 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय छह: नई दिशाएँ)

 

अध्याय 6 — नई दिशाएँ

 गुर्जिएफ़ की दुर्घटना जिसमें उनकी मृत्यु लगभग निश्चित हो गई थी, उनके जीवन में एक नए युग की शुरुआत थी। उन्होंने निर्णय लिया कि उनके विचारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए। एक सुबह कॅफ़े द ला पे (Café de la Paix) में उन्होंने ओल्गा द हार्टमैन को बोलकर लिखवाना शुरू किया, “विश्व की रचना के 223वें वर्ष में... समूचे ब्रह्मांड के आर-पार ‘अंतरिक्ष-पार’ संचार का जहाज़ कर्नाक उड़ रहा था।” यही उनके विशाल ग्रंथ ‘बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ‘ (Beelzebub’s Tales to His Grandson) की शुरुआत थी।


यह सभी के लिए गहरे निराशा का समय था। गुर्जिएफ़ की दुर्घटना ने उनके शिष्यों को भीतर तक हिला दिया था। उन्हें लगता था कि गुर्जिएफ़ को कोई नुकसान पहुँच ही नहीं सकता। स्वयं गुर्जिएफ़ भी इस दुर्घटना से गहराई से विचलित हुए। उन्हें लगा कि इस दुर्घटना के कारण उनकी चेतना अपने विकास की किसी पहले की अवस्था में लौट गई है। उनकी शारीरिक स्थिति बुरी तरह टूट चुकी थी और यह स्पष्ट था कि संस्थान पहले की तरह जारी नहीं रह सकता। उन्होंने अपने एकत्रित शिष्यों से घोषणा की कि वे इसे बंद करने का इरादा रखते हैं। अधिकांश रूसी शिष्य अगले ही दिन अपना सामान बाँधकर चले गए। वास्तव में संस्थान चलता रहा। लेकिन गुर्जिएफ़ अब उसे अपने जीवन का कार्य नहीं मानते थे।

इसके बाद और भी समस्याएँ आईं। उनकी माँ, जो उनकी बहन और भाई के साथ प्रीएरे में रह रही थीं, यकृत की बीमारी से पीड़ित थीं। दुर्घटना के कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। गुर्जिएफ़ अपनी माँ से बहुत गहरे जुड़े हुए थे और यह उनके लिए बहुत बड़ा आघात था। यहाँ भी बेनेट ने एक ऐसी घटना बताई है, जो गुर्जिएफ़ के बारे में बहुत कुछ प्रकट करती है। कई वर्षों बाद, 1948 में, बेनेट पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने गए। बेनेट की अपनी माँ का निधन हो चुका था और गुर्जिएफ़ ने उनसे उनकी माँ के बारे में पूछा। फिर गुर्जिएफ़ ने एक विचित्र बात कही, “उन्हें सहायता की आवश्यकता है क्योंकि वे अपने आप अपना रास्ता नहीं खोज सकतीं। मेरी अपनी माँ अब मुक्त हैं और मैं उनकी सहायता कर सकता हूँ। उनके माध्यम से तुम्हारी माँ की भी सहायता की जा सकती है, लेकिन तुम्हें दोनों को एक-दूसरे के संपर्क में लाना होगा।” उन्होंने बेनेट को निर्देश दिया कि वे दो कुर्सियाँ लें और उनके सामने खड़े हों। उन्हें कल्पना करनी थी कि एक कुर्सी पर उनकी अपनी माँ बैठी हैं और दूसरी पर गुर्जिएफ़ की माँ। बेनेट ने कई सप्ताह तक पूरी लगन से यह अभ्यास किया और पाया कि यह अत्यंत कठिन था। एक अवसर पर वे आधे घंटे तक फूट-फूटकर रोते रहे। ऐसा लगता था कि कुछ भी नहीं हो रहा है। फिर एक दिन उन्हें कमरे में कुछ उपस्थितियों का आभास हुआ। अंततः वे उपस्थितियाँ उनकी अपनी माँ और गुर्जिएफ़ की माँ का रूप लेने लगीं। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि दोनों के बीच संपर्क स्थापित हो गया है और उनके भीतर राहत तथा कृतज्ञता की एक विशाल लहर उठी। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा था, “तुम स्वयं उनकी सहायता नहीं कर सकते, लेकिन मेरी माँ के माध्यम से मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ।” ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि गुर्जिएफ़ का विश्वास था कि मृत्यु के बाद भी किसी प्रकार उनका अपनी माँ से संपर्क बना हुआ था।

मोटर दुर्घटना के साथ एक और त्रासदी जुड़ी हुई थी। कुछ समय से गुर्जिएफ़ की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं और उन्हें ठीक करने के लिए गुर्जिएफ़ मध्य एशिया की एक ऐसी तकनीक का प्रयोग करते हुए बहुत बड़े प्रयास कर रहे थे, जिसमें सूक्ष्म या आकाशीय शक्ति (astral power) का उपयोग किया जाता था। मोटर दुर्घटना के कारण यह संभव नहीं रह गया और कुछ ही समय बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया। फिर भी, ओल्गा दे हार्टमैन द्वारा सुनाई गई एक घटना एक बार फिर गुर्जिएफ़ की उन विचित्र शक्तियों को प्रदर्शित करती है। अंत के दिनों में उनकी पत्नी इतनी पीड़ा में थीं कि वे न तो कुछ खा सकती थीं और न ही पानी पी सकती थीं। गुर्जिएफ़ ने आधा गिलास पानी मँगवाया और उसे पाँच मिनट तक अपने हाथों में पकड़े रखा। फिर उन्होंने ओल्गा दे हार्टमैन से वह पानी अपनी पत्नी को देने के लिए कहा। उनकी पत्नी बिना किसी पीड़ा के वह पानी पी सकीं और अचानक वे फिर से तरल भोजन लेने में समर्थ हो गईं।¹

धीरे-धीरे गुर्जिएफ़ अपनी दुर्घटना के प्रभावों से उबरने लगे। उनका झुकाव इस विश्वास की ओर था कि किसी “शत्रुतापूर्ण शक्ति” ने दुर्घटना पैदा की थी और वह सक्रिय रूप से उनके कार्य में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अब उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा लेखन में लगा दी। अब उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता था, जहाँ ओरेज ने अपना गुर्जिएफ़ समूह शुरू कर दिया था। गुर्जिएफ़ ओरेज द्वारा अपने विचारों को शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किए जाने से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन धन के लिए वे उनके आभारी थे।

गुर्जिएफ़ का लेखन विशेषकर बिएलज़ेबब (Beelzebub) हमेशा विवाद का विषय बना रहेगा। उसकी शैली इतनी असाधारण रूप से उलझी हुई है कि पहली नज़र में वह आडंबरपूर्ण निरर्थकता जैसी प्रतीत होती है। उसमें अजीबोगरीब शब्द भी भरे पड़े हैं। कुंडाबफ़र (kundabuffer), गेडोरोपूलो (gaidoropoolo), जेनियोट्रियामाज़िकाम्नियन (geneotriamazikamnian), हार्ह्रिन्ह्रार्ह (harhrinhrarh), ब्लास्टेगोक्लॉर्नियन (blastegoklornian) और ऐसे दर्जनों अन्य शब्द। (अंतिम शब्द का अर्थ केवल हमारे ग्रह के वायुमंडल की परिधि है। इससे यह प्रश्न उठता है कि गुर्जिएफ़ को इसके लिए एक नया शब्द गढ़ने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी।) उनके अनेक अनुयायियों द्वारा दी जाने वाली व्याख्या यह है कि इस शैली को जान-बूझकर कठिन बनाया गया है ताकि पाठक को उसे समझने के लिए मेहनत करनी पड़े। उनके आरंभिक ग्रंथ ‘हेरल्ड ऑफ कमिंग ऐज’ (Herald of Coming Good) का अध्ययन इस दृष्टिकोण को कुछ समर्थन देता है क्योंकि उसमें शैली की कठिनाई मुख्यतः दर्जनों आश्रित उपवाक्यों (subordinate clauses) को एक ही वाक्य में जोड़ देने के कारण पैदा होती है। उदाहरण के लिए:

“यह लंबा खिंच गया और मेरे लिए बिल्कुल अस्वाभाविक जीवन, जो हर दृष्टि से उन स्वभावगत विशेषताओं के भी बिल्कुल विपरीत था, जो मेरी परिपक्वता के समय तक मेरे व्यक्तित्व में गहराई से जम चुकी थीं, मेरे उस निर्णय का सीधा परिणाम था, जो ऐतिहासिक उदाहरणों की एक पूरी शृंखला के मेरे पिछले अध्ययन के परिणामों पर आधारित था और जिसका पहला उद्देश्य यह था कि अपने बाहरी व्यवहार को कुछ हद तक अस्वाभाविक बनाकर, मेरे संबंध में उस ‘किसी चीज़’ के निर्माण को रोका जाए, जिसे प्राचीन काल से जाना जाता था और जिसे यहूदा के महान राजा सोलोमन ने ‘त्ज़वार्नोहार्नो’ (Tzvarnoharno) कहा था। यह वह ‘कुछ’ है जो हमारे पूर्वजों के अनुसार लोगों के सामुदायिक जीवन में एक प्राकृतिक प्रक्रिया द्वारा तथाकथित ‘साधारण लोगों’ के बुरे कार्यों के मेल के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है और उस व्यक्ति तथा उसके द्वारा सामान्य मानव-कल्याण के लिए किए गए समस्त कार्यों, दोनों के विनाश का कारण बनता है, जो ऐसा कुछ करने का प्रयास करता है।”

यहाँ बेनेट की यह व्याख्या कि ‘त्ज़वार्नोहार्नो’ (Tzvarnoharno) संभवतः पहलवी भाषा[1] के “राजसी वैभव” के अर्थ वाले शब्द से निकला है, गुर्जिएफ़ के आशय को समझने में हमारी कोई विशेष सहायता नहीं करती। सौभाग्य से, उनकी अंतिम पुस्तक ‘लाइफ़ इज़ रियल ओनली देन, व्हेन ‘आइ ऐम’ (Life Is Real Only Then, When ‘I Am) का एक अंश इस पर कुछ प्रकाश डालता है। गुर्जिएफ़ वहाँ कहते हैं कि वे अपनी गंभीर मोटर दुर्घटना को उस “कुछ” की अभिव्यक्ति मानते हैं, जो लोगों के सामूहिक जीवन में जमा होता रहता है। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि यह एक प्रकार की शत्रुता है, जो अचेतन रूप से उन लोगों की ओर निर्देशित होती है जिन्होंने अत्यधिक सफलता प्राप्त कर ली हो।

किसी भी स्थिति में यह स्पष्ट है कि उस अंश की अस्पष्टता गुर्जिएफ़ की एक ही वाक्य में एक दर्जन कोष्ठक डाल देने की आदत के कारण और बढ़ जाती है। मुझे संदेह है कि यह पाठक को जान-बूझकर परेशान करने की कोशिश नहीं बल्कि उनकी सोचने की एक आदत थी। गुर्जिएफ़ के मौखिक व्याख्यान हमेशा स्पष्ट और मुद्दे पर केंद्रित होते थे। लेकिन जब वे कलम उठाते थे तो उनका मन स्वाभाविक रूप से एक अधिक विस्तृत और अलंकृत पूर्वी शैली में बहने लगता था।

ओरेज का मत था कि जब अपने विचारों को कागज़ पर व्यक्त करने की बात आती है, तो गुर्जिएफ़ मूलतः अक्षम थे। विलियम सीब्रुक भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचे। वे बताते हैं कि जनवरी 1931 में गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि वे न्यूयॉर्क के कुछ संस्कारी और शिक्षित लोगों को गुर्जिएफ़ के अपार्टमेंट में आमंत्रित करें ताकि वे उनकी नई पुस्तक का पाठ सुन सकें। अद्भुत और अत्यंत विस्तृत पूर्वी भोजन तैयार किया गया था (गुर्जिएफ़ एक प्रसिद्ध रसोइए थे)। उपस्थित लोगों में लेखक लिंकन स्टीफ़न्स और मनोवैज्ञानिक जे. बी. वॉटसन भी थे। जब कुछ समय तक पाठ चलता रहा तो वॉटसन ने बीच में रोककर कहा कि या तो यह कोई बहुत जटिल मज़ाक है या फिर बिल्कुल बकवास है। दोनों ही स्थितियों में शायद बेहतर होगा कि पाठ बंद कर दिया जाए और बातचीत की जाए। लेखक ने इस टिप्पणी को बिना बुरा माने स्वीकार कर लिया। भोजन के दौरान वे इतने मनोरंजक और विनोदी रहे कि मेहमान उनसे यह स्वीकार करने के लिए कहने लगे कि उनकी पुस्तक वास्तव में एक मज़ाक है। सीब्रुक के अनुसार, गुर्जिएफ़ को इससे कोई आपत्ति नहीं हुई। लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि उनकी पुस्तक उनके श्रोताओं की समझ से ऊपर की चीज़ है।

बीएलज़ेबब (Beelzebub) के बारे में और चाहे जो कहा जाए, यह निश्चित रूप से कोई मज़ाक नहीं है। स्वयं गुर्जिएफ़ इसे स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं कि 1927 में, तीन वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, उन्हें यह एहसास हुआ कि वे अंततः अपने विचारों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल नहीं हुए हैं और पुस्तक का बड़े पैमाने पर पुनर्लेखन करना आवश्यक होगा। उनकी थकान और लेखन की कठिनाइयों ने उन्हें आत्महत्या के बारे में सोचने तक के लिए विवश कर दिया। लेकिन पुस्तक को पूरी तरह से फिर से लिखा गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि इतनी अथक मेहनत के बाद भी यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं है जो पहली बार गुर्जिएफ़ के विचारों से परिचित होना चाहते हैं। (मैं एक ऐसे अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति को जानता हूँ जो इस बात पर अडिग विश्वास करता रहा कि गुर्जिएफ़ एक ढोंगी हैं क्योंकि उसने उनके विचारों को बीएलज़ेबब (Beelzebub) के माध्यम से समझने का प्रयास किया था।)

दूसरी ओर, बेनेट, जो गुर्जिएफ़ के मुख्य विचारों से भली-भाँति परिचित थे, ने मुझे बताया कि उन्होंने इसे लगभग बारह बार पढ़ा था और हर बार उन्हें ऐसे नए अर्थ मिले, जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। कुल मिलाकर, शायद यह मानना सुरक्षित है कि यह गुर्जिएफ़ के अत्यंत उत्पादक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण एकल कृति है।

बीएलज़ेबब को लिखने में लगे जबरदस्त परिश्रम ने गुर्जिएफ़ को एक और महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि दी। वे बताते हैं कि वे प्रीएरे में उस बेंच पर बैठे थे, जहाँ वे अपनी पत्नी और माँ के साथ बैठा करते थे और अचानक उन्हें यह बात समझ में आई कि उनकी रचनात्मकता उन कष्टों के कारण बढ़ गई थी, जिन्हें उन्होंने अपनी पत्नी और माँ की मृत्यु के परिणामस्वरूप झेला था। दूसरे शब्दों में, इस पीड़ा ने उनके ‘essence’ यानी ‘सार’ को मजबूत कर दिया था। उन्होंने यह भी अनुभव किया था कि दुर्घटना के बाद जब वे बिस्तर पर पड़े थे, तब उनसे मिलने आने वाले मित्र उनकी ऊर्जा को सोख लेते थे और उन्हें थका हुआ छोड़ जाते थे। वे उस चीज़ को सोख रहे थे जिसे गुर्जिएफ़ हैम्ब्लेज़ॉइन (hanblezoin) कहते थे अर्थात सूक्ष्म शरीर (astral body) की ऊर्जा, जो रचनात्मक कार्य के लिए आवश्यक है। गुर्जिएफ़ को जो अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई, वह यह थी कि हैम्ब्लेज़ॉइन (hanblezoin) को सचेत प्रयास और ‘जानबूझकर स्वीकार की गई पीड़ा’ (intentional suffering) के द्वारा पैदा करना आवश्यक है। वैसी पीड़ा, जैसी संत अपने काँटों या कीलों की शय्या पर लेटकर अनुभव करते हैं।

इसी विचार को ध्यान में रखते हुए गुर्जिएफ़ ने जान-बूझकर अपने अनेक शिष्यों से छुटकारा पाना शुरू कर दिया जैसे, हार्टमैन दंपति। उन्हें लगा कि ये लोग न केवल उन पर बहुत अधिक निर्भर होते जा रहे थे बल्कि उन्हें स्वयं भी बहुत अधिक आरामदायक स्थिति में रख रहे थे। 1929 में कुछ अंग्रेज़ी कीपर्स (kippers) को लेकर हुए विवाद को हार्टमैन दंपति को पेरिस में रहने के लिए भेजने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया गया। कई अन्य शिष्यों से भी वहाँ से चले जाने के लिए कहा गया। फिर भी, जो लोग वहाँ से चले गए, वे सभी गुर्जिएफ़ के प्रति वफ़ादार बने रहे। उन्हें विश्वास था कि यह सब महज़ गुर्जिएफ़ की सनक नहीं थी।

ओरेज को अस्वीकार किए जाने का एक असाधारण रूप से कठिन अनुभव झेलना पड़ा। जब वह इंग्लैंड में थे, गुर्जिएफ़ न्यूयॉर्क गए और ओरेज के समूह से एक ऐसे दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें ओरेज के साथ संबंध तोड़ने की सहमति थी। जब ओरेज को यह दस्तावेज़ दिखाया गया तो उन्होंने इस आघात को शांतिपूर्वक स्वीकार किया और स्वयं उस पर हस्ताक्षर कर दिए।

गुर्जिएफ़ के इस प्रकार के कार्यों के पीछे के उद्देश्यों का आकलन करते समय ओल्गा दे हार्टमैन द्वारा सुनाई गई एक घटना को ध्यान में रखना उपयोगी है। गुर्जिएफ़ ने सुझाव दिया कि ओल्गा अपने माता-पिता से कहें कि वे लेनिनग्राद छोड़कर प्रीएरे आ जाएँ क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियाँ लगातार अधिक खतरनाक होती जा रही थीं। उनकी बहन और माता-पिता आ गए, लेकिन फॉन्टेनब्लो में वे खुश नहीं थे क्योंकि जैसा कि श्रीमती द हार्टमैन कहती हैं, “गुर्जिएफ़ हम सबके साथ अक्सर जिस निर्मम ढंग से बात करते थे, उसके कारण।” एक सुबह गुर्जिएफ़ और ओल्गा के पिता एक बेंच पर बैठे थे। ओल्गा किसी प्रश्न के बारे में पूछने आईं। गुर्जिएफ़ ने उन्हें गुस्से में उत्तर दिया और उनके पिता परेशान तथा दुखी दिखाई दिए। तब गुर्जिएफ़ ने उनके पिता की ओर मुड़कर कहा, “देखिए, पिता जी, आप मुझसे क्या करवाते हैं। आपने अपनी बेटी पर कभी चिल्लाया नहीं, इसलिए उसे इस अनुभव से गुजरना नहीं पड़ा, जबकि लोगों के लिए हर तरह के अनुभव आवश्यक होते हैं। इसलिए अब मुझे आपकी जगह यह करना पड़ रहा है।” लगता है कि उनके पिता समझ गए कि गुर्जिएफ़ का आशय क्या था।

“लोगों के लिए हर तरह के अनुभव आवश्यक होते हैं।” ऐसा लगता है कि यही सिद्धांत गुर्जिएफ़ के कुछ सबसे रहस्यमय कार्यों के पीछे था। पीटर्स स्वयं एक अत्यंत आघातकारी अनुभव के बाद इस बात को समझने लगे। 1934 में पीटर्स को शिकागो जाना पड़ा और गुर्जिएफ़ ने घोषणा की कि वे उनके साथ जाएँगे। यह यात्रा एक दुःस्वप्न जैसी थी। गुर्जिएफ़ रेलवे स्टेशन देर से पहुँचे और उन्होंने पीटर्स से कहा कि वह कोई कहानी गढ़कर ट्रेन को रुकवाने या देर करवाने का प्रयास करे। पीटर्स वास्तव में ऐसा करने में सफल हो गए। गुर्जिएफ़ को उनकी बर्थ तक पहुँचाने में पैंतालीस मिनट लग गए। पूरे रास्ते वे ऊँची आवाज़ में शिकायत करते रहे जबकि कंडक्टर बार-बार उनसे सो रहे यात्रियों की खातिर चुप रहने की विनती करता रहा। फिर गुर्जिएफ़ ने खाने, पीने और सिगरेट पीने का निर्णय लिया, यहाँ तक कि कंडक्टर ने धमकी दी कि अगले स्टेशन पर वह उन्हें ट्रेन से उतार देगा। जब पीटर्स ने अपना आपा खो दिया तो गुर्जिएफ़ ने उदास होकर उनसे पूछा कि पीटर्स उनके साथ इस तरह व्यवहार क्यों कर रहे हैं।

अपनी बर्थ में पहुँचने के बाद गुर्जिएफ़ ने पानी माँगा, जिससे दूसरे यात्री बेहद क्रोधित हो गए। वे सुबह चार बजे ही जाकर सो पाए। अगली सुबह नाश्ते के समय गुर्जिएफ़ ने दही (yogurt) खाने की इच्छा को लेकर अंतहीन हंगामा किया। सबको पागलपन की हद तक परेशान करने के बाद अंततः उन्होंने सामान्य अमेरिकी नाश्ता ही किया। यात्रा के बाकी समय में वे धूम्रपान करके, बहुत अधिक शराब पीकर और तेज़ गंध वाली चीज़ों, विशेषकर चीज़ को साथ रखकर अपने सहयात्रियों को लगातार परेशान करते रहे।

जब वे शिकागो पहुँचे तो पीटर्स ने गुस्से में उनसे कहा कि वह अब उनके साथ नहीं रहेगा। गुर्जिएफ़ ने इतना हंगामा खड़ा कर दिया कि पीटर्स को अंततः उनके और उनके प्रशंसक शिष्यों के समूह के साथ जाने के लिए तैयार होना पड़ा। अंततः पीटर्स ने शिष्यों को चौंकाते हुए गुर्जिएफ़ की निंदा अत्यंत अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा में की और वहाँ से निकल गया। लेकिन कुछ वर्षों बाद जब न्यूयॉर्क में उसने फिर गुर्जिएफ़ को देखा तो उसे अचानक समझ में आया कि पूरी घटना इस तरह बनाई गई थी कि उसके भीतर गुर्जिएफ़ की अंधी पूजा करने वाली मानसिकता टूट जाए। निस्संदेह, यह प्रयोग सफल हुआ था।

पीटर्स की एक और घटना गुर्जिएफ़ की लोगों को ‘सँभालने’ की कुशलता और उनकी हास्य-बुद्धि को दिखाती है। गुर्जिएफ़ ने कुछ ‘महत्वपूर्ण’ लोगों को भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके आने से पहले उन्होंने पीटर्स से कहा कि वह उन्हें अपने ज्ञान में मौजूद हर अश्लील शब्द और वाक्यांश सिखाए। मेहमान आए। उनमें कई पत्रकार भी थे और भोजन के लिए बैठ गए। कुछ संरक्षणवादी और थोड़े उपेक्षापूर्ण अंदाज़ में वे गुर्जिएफ़ से उनके कार्य के बारे में प्रश्न पूछने लगे। तब गुर्जिएफ़ ने समझाना शुरू किया कि अधिकांश लोग वास्तव में सत्य या व्यवस्था की इच्छा से प्रेरित नहीं होते बल्कि उनकी प्रेरणा का मूल उनकी यौन इच्छाएँ होती हैं। उन्होंने एक सुंदर और अच्छे कपड़े पहनी हुई महिला से कहा कि अपने रूप-रंग का इतना ध्यान रखने के पीछे उसकी “संभोग की इच्छा” काम करती है। फिर वे अपनी यौन क्षमता के बारे में बोलने लगे और उसके बाद विभिन्न जातियों के यौन व्यवहारों के बारे में बातें करने लगे। इस दौरान वे जान-बूझकर सबसे अश्लील और भद्दे शब्दों का प्रयोग करते रहे। भोजन समाप्त होने के बाद मेहमान आपस में फ़्लर्ट करने लगे और कुछ ही समय में उनमें से कई लोग आधे-अधूरे कपड़ों में इधर-उधर पड़े हुए थे। जिस महिला की गुर्जिएफ़ ने प्रशंसा की थी, वह स्वयं गुर्जिएफ़ के साथ प्रणय-संबंध स्थापित करने की कोशिश करने लगी। वहीं दूसरी महिला ने रसोई में पीटर्स को घेरने की कोशिश की। जब पीटर्स ने उसे ठुकरा दिया तो उसने उस पर आरोप लगाया कि वह “उस गंदे बूढ़े आदमी का छोटा समलैंगिक” है।

अचानक गुर्जिएफ़ ने अपनी गूँजती हुई, आदेशात्मक आवाज़ में सबको सावधान किया और उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि अब वे जान चुके हैं कि वे वास्तव में किस तरह के लोग हैं। अंत में उन्होंने कहा कि यह पाठ पढ़ाने के लिए उन्हें भुगतान मिलना चाहिए और वे चेक स्वीकार करने में प्रसन्न होंगे। परिणामस्वरूप उन्होंने कई हज़ार डॉलर इकट्ठे कर लिए।

1935 तक गुर्जिएफ़ ने लेखन भी छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी अंतिम पुस्तक ‘लाइफ़ इज़ रियल ओनली देन, व्हेन ‘आइ ऐम’ (Life Is Real Only Then, When ‘I Am’) को आधे से भी कम पूरा होने पर छोड़ दिया। चूँकि उस समय उनकी उम्र साठ वर्ष से कुछ ही अधिक थी या यदि उनके पासपोर्ट की तारीख सही थी तो केवल अट्ठावन वर्ष। इसलिए यह असंभव-सा लगता है कि वे अपने जीवन के कार्य को समाप्त मान चुके थे। लेकिन संस्थान समाप्त हो चुका था और आगे कुछ लिखने की उनकी कोई योजना दिखाई नहीं देती थी। प्रीएरे को 1933 में बेच दिया गया था। जब पीटर्स तीस के दशक के मध्य में न्यूयॉर्क में गुर्जिएफ़ से मिले, तब वे फिर आर्थिक तंगी में थे। वे नशे की लत वाले लोगों और शराबियों का इलाज करके पैसे कमाते थे। (सौभाग्य से यह अवधि बहुत लंबी नहीं रही।) इसलिए गुर्जिएफ़ अमेरिका में व्याख्यान और शिक्षा देते रहे। अपना समय शिकागो और न्यूयॉर्क के समूहों के बीच बाँटते हुए जबकि उस्पेन्स्की लंदन में अपना कार्य जारी रखे हुए थे।

दोनों एक विचित्र विरोधाभासी स्थिति में थे। वे शिक्षण को फैलाना चाहते थे, लेकिन साथ ही यह भी चाहते थे कि वह बहुत तेज़ी से या बिना किसी चयन के न फैले। पीटर्स शिकागो के समूह के बारे में टिप्पणी करते हैं:

“मुझे लगा कि वे उनके शिक्षण की ओर बहुत अच्छे कारणों से नहीं बल्कि अनेक तरह के कारणों से आकर्षित हुए थे। अकेलेपन के कारण या शायद इसलिए कि वे स्वयं को समाज से अलग, अनुपयुक्त या बहिष्कृत समझते थे। उनमें से अधिकांश ने कला, थियोसॉफी और गूढ़ विद्याओं में थोड़ा-बहुत हाथ आज़माया था... जब उनका व्यक्तिगत मार्गदर्शन नहीं होता था और उनका शिक्षण इस तरह चलता रहता था, तब मुझे उसके शिक्षण में एक निश्चित खतरा दिखाई देने लगा।”

उस्पेन्स्की के लंदन के शिष्यों को षड्यंत्रकारियों की तरह व्यवहार करने के लिए कहा जाता था और उन्हें आदेश था कि वे किसी बाहरी व्यक्ति के साथ इस शिक्षण की चर्चा न करें। जब बेनेट ने उस्पेन्स्की के कथनों को उद्धृत करने की अनुमति माँगी तो उन्हें मना कर दिया गया।

शिक्षक के रूप में गुर्जिएफ़ और ओस्पेन्स्की के बीच मुख्य अंतर यह था कि गुरजिएफ़ को मनुष्य हमेशा मनोरंजक और दिलचस्प लगते थे, जबकि ओस्पेन्स्की अपने अनुयायियों को एक वैज्ञानिक जैसे दिखाई देते थे—ऐसे व्यक्ति के रूप में जो ‘नींद के विरुद्ध संघर्ष’ के विचार को फैलाने में पूरी तरह व्यस्त था और व्यक्तियों के रूप में लोगों में उसकी रुचि बहुत कम थी। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ अपने शिष्यों से शांत भाव से काफी मनोरंजन प्राप्त करते थे। पीटर्स एक ऐसी लड़की की कहानी सुनाते हैं, जो नर्तकी थी और उनके किसी समूह में कुछ अधिकार प्राप्त कर चुकी थी, लेकिन वह आक्रामक और कठिन स्वभाव की थी। एक दिन, व्याख्यान के दौरान गुर्जिएफ़ के किसी कथन को उसने खुले तौर पर चुनौती दी। इसके बाद गुर्जिएफ़ ने उसे संदेश भेजा कि वह रात तीन बजे अकेले उनके कमरे में आए। वहाँ वे उसे कुछ अद्भुत चीज़ें दिखाएँगे। पीटर्स ने यह संदेश उस लड़की तक पहुँचा दिया। लड़की बेहद नाराज़ हुई। उसने कहा कि वह प्रस्ताव को पहचानती है जब वह उसे सुनती है और अब उसका गुर्जिएफ़ से कोई लेना-देना नहीं रहेगा। जब पीटर्स ने यह संदेश वापस गुर्जिएफ़ को दिया तो गुर्जिएफ़ संतुष्टि से मुस्कराए और कहा कि यही तो वे चाहते थे। उन्होंने एक दिलचस्प बात और कही। अच्छा ही हुआ कि उसने उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया क्योंकि यदि वह मान जाती तो उसके बाद पैदा होने वाले “प्रतिकंपनों” (reverberations) से निपटने के लिए उनके पास समय नहीं होता। इसका संकेत यही लगता है कि किसी भी प्रकार का ‘सम्बन्ध’ अपने परिणामों के बिना नहीं हो सकता। ‘कैजुअल सेक्स’ (Casual sex) यानी बिना किसी परिणाम या भावनात्मक बंधन के यौन संबंध, इन शब्दों का मेल ही अपने आप में विरोधाभासी है। एक बार फिर ऐसा महसूस होता है कि गुर्जिएफ़ मानव अस्तित्व के कुछ अंतर्निहित नियमों से परिचित थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध से कुछ समय पहले गुर्जिएफ़ पेरिस लौट आए। जब जर्मनों ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो उन्होंने ‘मुक्त फ्रांस’ में भाग जाने के आग्रहों को अनदेखा कर दिया और र्यू दे कोलोनेल रेनार (Rue des Colonels Rénards) स्थित अपने फ्लैट में ही बने रहे। युद्ध के बाद उनसे मिलने वाले शुरुआती अमेरिकी अनुयायियों में से एक फ्रिट्ज़ पीटर्स थे। जैसा कि हमने पहले अध्याय में देखा है, पीटर्स गहरे तंत्रिका-अवसाद की अवस्था में गुर्जिएफ़ के पास आए थे और गुर्जिएफ़ ने किसी प्रकार की जीवनदायी ऊर्जा के संचार से उनका अवसाद तत्काल दूर कर दिया था। गुर्जिएफ़ ने पीटर्स को बताया कि युद्ध के दौरान वे कालीन बेचकर आराम से जीवित रहे थे। उनके पास कृत्रिम पलकों का निर्माण करने वाली एक कंपनी भी थी। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने बहुत-से लोगों, जर्मनों, पुलिसवालों और काला बाज़ार करने वालों के साथ लेन-देन किए थे और इस प्रकार तंबाकू तथा ब्रांडी जैसी आवश्यक चीज़ों की आपूर्ति बनाए रखी थी। वे अब भी शिष्यों से घिरे हुए थे, जो उनकी आय का एक हिस्सा भी उपलब्ध कराते थे। लेकिन पीटर्स ने कुछ ऐसे वृद्ध लोगों को भी फ्लैट में आते देखा जो काफ़ी जर्जर और निर्धन दिखाई देते थे। गुर्जिएफ़ उनके साथ ऐसी दयालुता और कोमलता से पेश आते थे, जो अपने विद्यार्थियों के प्रति उनके व्यवहार से बिल्कुल अलग थी। ऐसा लगता था कि वे इन लोगों को अपने ‘पेंशनर’ मानते थे।

अन्य अमेरिकी विद्यार्थी भी धीरे-धीरे पेरिस लौटने लगे। बेनेट अपनी पत्नी के साथ आए, जो किसी रहस्यमय बीमारी से पीड़ित थीं। उन्हें गुर्जिएफ़ पहले से अधिक वृद्ध और उदास दिखाई दिए, हालाँकि उनका शरीर अब भी पहले की तरह सीधा और तना हुआ था। अब गुर्जिएफ़ सामान्य, अनौपचारिक कपड़े पहनते थे। गले से खुली हुई कमीज़, अस्त-व्यस्त पतलून और लाल फ़ेज़ टोपी। दोपहर के भोजन के दौरान जब लगभग चालीस लोग उस छोटे-से भोजन-कक्ष में ठुँसे हुए थे, उन्होंने देखा कि श्रीमती बेनेट दर्द में हैं। गुर्जिएफ़ दो गोलियाँ लेकर आए और उनसे कहा कि वे उन्हें निगल लें। बाद में उन्होंने उनसे पूछा, “अब तुम्हारा दर्द कहाँ है?” उन्होंने उत्तर दिया, “वह चला गया।” गुर्जिएफ़ ने फिर पूछा, “मैं पूछता हूँ, अब वह कहाँ है?” उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने उत्तर दिया, “आप उसे अपने साथ ले गए हैं।” वास्तव में इसके बाद उनके स्वास्थ्य में अचानक सुधार होने लगा।

केनेथ वॉकर और उनकी पत्नी भी उस फ्लैट में आए। वॉकर कई वर्षों तक उस्पेन्स्की के विद्यार्थी रहे थे और उनका परिचय उस्पेन्स्की से मॉरिस निकोल ने कराया था, जो मूल प्रीएरे समूह के सदस्यों में से एक थे। वॉकर ने उस फ्लैट का वर्णन एक भरे-ठुँसे पुराने सामान की दुकान जैसा किया है। जब वे सभी बीएलज़ेबब (Beelzebub) का पाठ सुन रहे थे, तब गुर्जिएफ़ अंदर आए। वॉकर ने टिप्पणी की कि वे उनकी कल्पना से छोटे कद और अधिक स्थूल थे। उन्होंने उनकी तीखी आँखों पर भी ध्यान दिया। एक बार फिर दोपहर के भोजन पर बहुत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे और सबको आर्मान्याक या वोदका के साथ जाम उठाकर पीने के लिए कहा गया। गुर्जिएफ़ ने एक बार समझाया था कि वे अपने मेहमानों को हमेशा थोड़ा-बहुत नशे में कर देते हैं क्योंकि यह उनके ‘व्यक्तित्व’ को हटाने और उनके भीतर वास्तव में जो कुछ है, उसे प्रकट करने का सबसे तेज़ तरीका है। इसी मुलाक़ात के बाद वॉकर की पत्नी ने गुर्जिएफ़ को एक ‘जादूगर’ के रूप में वर्णित किया।

कई अन्य उस्पेन्स्की-शिष्यों ने भी उस फ्लैट पर आना-जाना शुरू कर दिया। वॉकर टिप्पणी करते हैं कि “बहुत अधिक सिद्धान्त-विमर्श ने उनके लंदन के अनुयायियों के मन को अत्यधिक कठोर बना दिया था और हमारे व्यवहार को बहुत अधिक सोच-समझकर किया जाने वाला और उदास बना दिया था। हमें प्लायमथ ब्रेथ्रेन के चर्च जाने वाले लोगों जैसे चेहरे अपना लेने का खतरा था।” गुर्जिएफ़ के शराब से भरे दोपहर के भोजन और रात्रिभोज (जो हमेशा आधी रात के काफी बाद शुरू होते थे) ठीक वही थे जिनकी उन्हें आवश्यकता थी ताकि वे तनावमुक्त हो सकें और एक-दूसरे के अधिक निकट आ सकें। यह एक बार फिर गुर्जिएफ़ और उस्पेन्स्की के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करता है। वॉकर कहते हैं कि गुर्जिएफ़ ने उन्हें ‘कार्य’ (Work) के प्रति बिल्कुल नया दृष्टिकोण दिया। उस्पेन्स्की अनुशासनप्रिय थे। जब वे कोई काम सौंपते थे तो वॉकर उसे जितनी सावधानी से संभव हो, पूरा करते थे, लेकिन उससे आगे जाने की कभी कोशिश नहीं करते थे:

“गुर्जिएफ़ के साथ मैंने व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना और स्वतंत्रता की एक नई अनुभूति प्राप्त करना शुरू किया। लेकिन साथ ही यह ऐसी स्वतंत्रता थी जिसका बहुत सावधानी से उपयोग करना पड़ता था क्योंकि गलती की सज़ा बहुत बड़ी थी। यह सज़ा थी, अपनी गलती के कारण अपने शिक्षक को गंभीर असुविधा में पड़े हुए देखना और गुर्जिएफ़ के निकट लंबे समय तक रहना कठिन था, बिना उनके प्रति स्नेह विकसित किए।”

उस शरद ऋतु, 1948 में गुर्जिएफ़ एक बार फिर अमेरिका लौट गए। उस्पेन्स्की को विश्वास था कि यूरोप का विनाश निश्चित है। इसलिए उन्होंने युद्ध के वर्षों में न्यूयॉर्क में अपना कार्य जारी रखा था, लेकिन अंततः बीमारी ने उन्हें वापस लंदन जाने के लिए विवश कर दिया। 1948 में उनकी मृत्यु हो गई। वे अपनी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक की पांडुलिपि पीछे छोड़ गए, जिसका नाम था ‘फ्रैगमेंट्स ऑफ़ ऐन अननोन टीचिंग’ (Fragments of an Unknown Teaching) और जिसे बाद में ‘इन सर्च ऑफ़ द मिरैक्युलस ‘ (In Search of the Miraculous) शीर्षक से प्रकाशित किया गया। गुर्जिएफ़ ने न्यूयॉर्क में उस्पेन्स्की के समूह की जिम्मेदारी संभाल ली। उनके प्रभाव का वर्णन इर्मिस बी. पोपोफ़ ने अपनी पुस्तक ‘गुर्जिएफ़’ में किया है। वह लिखती हैं कि गुर्जिएफ़ ने लोगों पर दयालुता और करुणा की एक अत्यन्त गहरी छाप छोड़ी।

न्यूयॉर्क में गुर्जिएफ़ का प्रवास पेरिस के दिनों जितना ही भाग-दौड़ और गतिविधियों से भरा हुआ लगता है। दर्जनों लोगों के लिए विशाल भोज, नृत्य की कक्षाएँ, व्याख्यान और चाइल्ड्स रेस्त्रां (Child’s Restaurant) में चलने वाले अंतहीन सत्र। गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की की पुस्तक की पांडुलिपि भी पढ़ी और अपनी बीएलज़ेबब (Beelzebub) को प्रकाशन के लिए तैयार किया। वह उस्पेन्स्की के काम की प्रशंसा करते थे, लेकिन उनका आग्रह था कि उनके शिक्षण का बेहतर मूल-स्रोत बीएलज़ेबब (Beelzebub) ही है।

चाइल्ड्स रेस्त्रां (Child’s Restaurant) उनकी ‘जादुई’ शक्ति के अंतिम प्रदर्शनों में से एक का स्थल बना। बेनेट उन दिनों न्यूयॉर्क में थे और एक सुबह चाइल्ड्स (Child’s) में गुर्जिएफ़ से मिलने गए। गुर्जिएफ़ ने उनसे कागज़ की एक शीट लेकर लिखने को कहा। बेनेट ने पाया कि उनका हाथ अपने-आप लिख रहा था और लिखावट भी उनकी अपनी नहीं थी। उसमें बीएलज़ेबब (Beelzebub) के आगामी प्रकाशन की घोषणा थी और यह अनुरोध किया गया था कि अधिक-से-अधिक शिष्य इसकी प्रतियाँ खरीदें, प्रति प्रति 100 पाउंड की कीमत पर। उस दिन बाद में गुर्जिएफ़ ने शिष्यों के एक समूह के सामने उस पत्र को ज़ोर से पढ़ा। उनमें से कई ने टिप्पणी की कि इसे गुर्जिएफ़ के अलावा और कोई नहीं लिख सकता था।

अगले वसंत में गुर्जिएफ़ पेरिस लौट आए। केनेथ वॉकर ने देखा कि उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ रहा था और उन्हें सलाह दी कि पेट में जमा तरल पदार्थ को निकालने के लिए उनका ऑपरेशन होना चाहिए। गुर्जिएफ़ ने इस सलाह को, ऐसा लगता है, अनदेखा कर दिया।

बेनेट भी उनसे नियमित रूप से मिलते रहे और उन्होंने पाया कि गुर्जिएफ़ पहले की तरह ही कठोर अपेक्षाएँ रखने वाले थे। असम्भव-सी लगने वाली माँगों को पूरा करने के लिए बेनेट स्वयं को अपनी सीमा तक खींचते रहे। फिर अचानक उन्हें समझ में आया कि यह गुर्जिएफ़ की एक और ‘चाल’ थी। बेनेट की समस्या यह थी कि वे किसी बात के लिए ‘नहीं’ कह पाने में असमर्थ थे और गुर्जिएफ़ उन्हें यही क्षमता विकसित करना सिखा रहे थे। यह समझ में आते ही बेनेट ने अत्यन्त गहरी राहत का अनुभव किया।

एक बार फिर, गुर्जिएफ़ की सहायता से बेनेट को असामान्य अनुभव होने लगे। गुर्जिएफ़ के फ्लैट में शाम के भोजन से पहले जब वे ज़ोर से पढ़ रहे थे तो अचानक उन्हें लगा कि वे अपने शरीर से बाहर निकल गए हैं और कुछ फीट दूर खड़े होकर अपनी ही आवाज़ को पढ़ते हुए सुन रहे हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी भावनात्मक अवस्थाओं को इच्छानुसार नियंत्रित करने की क्षमता फिर से अनुभव की। उन्होंने यह भी पाया कि वे दूसरी जगहों पर घट रही घटनाओं के प्रति सचेत हो सकते थे। एक दिन इसकी पुष्टि करने के लिए उन्होंने लंदन में अपनी पत्नी को फोन किया और यह सत्यापित किया कि वह अपनी कुछ महिला मित्रों के साथ एक निश्चित बैठक में गई थीं। ठीक वही दृश्य उन्होंने अपनी ‘दूरदर्शिता’ (clairvoyance) की अवस्था में देखा था।

अक्टूबर में जब बेनेट पेरिस लौटे, तब यह स्पष्ट था कि गुर्जिएफ़ अब बहुत बीमार हो चुके थे। अठारह महीने पहले वे एक और कार दुर्घटना का शिकार हुए थे, जिसमें उन्हें गंभीर चोट लगी थी। उस समय बेनेट उस जीवन-शक्ति से बहुत प्रभावित हुए थे जिसने उन्हें मरने से बचा लिया था। लेकिन अब ड्रॉप्सी (पेट में पानी जमा होने के कारण होने वाला रोग) के कारण उनके पैर सूज गए थे और ऐसा लगता था कि उनमें जीने की इच्छा ही नहीं बची थी। शनिवार, 22 अक्टूबर 1949 की सुबह बेनेट ने उन्हें एक कैफ़े में बैठे देखा। वे बीमार और थके हुए दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बेनेट से कहा, “अगले पाँच वर्ष निर्णायक होंगे। यह एक नई दुनिया की शुरुआत है या तो पुरानी दुनिया मुझे ‘चिक’ कर देगी” (उन्होंने जूँ को कुचलने जैसी आवाज़ निकाली) “या मैं पुरानी दुनिया को ‘चिक’ कर दूँगा” अर्थात उसे कुचल दूँगा... “चिक। तब नई दुनिया शुरू हो सकती है।” इससे लगता है कि गुर्जिएफ़ को कम-से-कम अगले पाँच वर्षों तक जीवित रहने की उम्मीद थी। बेनेट उन्हें उनकी कार में घर तक लेकर गए। यह अपने आप में काफी साहस का काम था क्योंकि गुर्जिएफ़ हमेशा बहुत खराब ड्राइवर रहे थे और अब उनके पैर इतने सूज चुके थे कि वे ब्रेक तक नहीं दबा सकते थे। एवेन्यू कार्नो (Avenue Carnot) को पार करते समय एक लॉरी तेज़ी से उनकी ओर आई। गुर्जिएफ़ उसी गति से गाड़ी चलाते रहे और वह लॉरी उन्हें बाल-बाल बचाते हुए निकल गई। अपने फ्लैट के बाहर कार रोकने के लिए उन्हें उसे धीरे-धीरे अपने आप नीचे की ओर लुढ़कने देना पड़ा।

चार दिन बाद गुर्जिएफ़ के अमेरिकी डॉक्टर ने उन्हें देखा और उन्हें अमेरिकन अस्पताल ले जाने का आदेश दिया। उनका रक्तचाप इतना अधिक था कि उन्हें सीरम का इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता था। उनके पेट से बहुत बड़ी मात्रा में तरल पदार्थ निकाला गया, लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगले शनिवार, 29 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन इस बात को लेकर भी कुछ संदेह था कि वास्तव में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं। मृत्यु के चार घंटे बाद भी उनका माथा गर्म था। और जब बेनेट अमेरिकन अस्पताल के चैपल में उनके शव के पास अकेले खड़े थे तो उन्हें किसी के साँस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। यहाँ तक कि जब उन्होंने स्वयं साँस रोक ली और अपनी आँखें बंद कर लीं, तब भी। उन्हें संदेह हुआ कि गुर्जिएफ़ ने जाते-जाते भी उनके साथ कोई व्यावहारिक मज़ाक किया है।

जब शव-परीक्षा की गई तो डॉक्टर हैरान रह गए। उनकी आँतें इतनी अधिक नष्ट और सड़ चुकी थीं कि चिकित्सकों के अनुसार उन्हें वर्षों पहले ही मर जाना चाहिए था।



[1] यह मुख्यतः मध्य फ़ारसी (Middle Persian) भाषा/लिपि के लिए प्रयुक्त नाम है।

Friday, 11 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय पाँच: साहस का जागरण)

 

अध्याय 5 - साहस का जागरण

आप सोचते हैं कि आप जानते हैं कि आप कौन हैं और क्या हैं, लेकिन आप यह नहीं जानते कि इस समय आप कितने गुलाम हैं और न ही यह जानते हैं कि आप कितने स्वतंत्र हो सकते हैं। मनुष्य कुछ नहीं कर सकता। वह एक मशीन है, जिसे बाहरी प्रभाव नियंत्रित करते हैं, उसकी अपनी इच्छा नहीं क्योंकि जिसे वह अपनी इच्छा समझता है, वह एक भ्रम है। वह सोया हुआ है। उसके भीतर कोई स्थायी स्व नहीं है, जिसे वह ‘मैं’ कह सके। क्योंकि वह एक नहीं बल्कि अनेक है। उसके मनोभाव, उसकी आवेग-प्रवृत्तियाँ, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व का उसका बोध भी निरंतर बदलता रहने वाला एक प्रवाह मात्र है। आपको मेरी बात पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि आप स्वयं का निरीक्षण करेंगे तो इसकी सच्चाई की पुष्टि कर सकेंगे। स्वयं अपने अस्तित्व को याद रखने का प्रयोग कीजिए और आप पाएँगे कि आप दो मिनट तक भी स्वयं को याद नहीं रख सकते। जो मनुष्य यह तक याद नहीं रख सकता कि वह कौन है और क्या है, जो उन शक्तियों को नहीं जानता जो उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं, वह यह दावा कैसे कर सकता है कि वह कुछ भी कर सकता है? नहीं, सबसे पहली सच्चाई जिसे समझना आवश्यक है, वह यह है कि आप और मैं और सभी मनुष्य केवल मशीनों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। मनुष्य को अपने निजी मामलों को अपने अनुसार संचालित करने की कोई शक्ति नहीं है और अपने सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में भी वह उतना ही असहाय है।


By Fabrizio Cassetta

यही वह सिद्धांत था जिसे 1922 में उस्पेन्स्की लंदन के 38 वारविक गार्डन्स स्थित एक फ्लैट में पढ़ाया करते थे। एक नाराज़ श्रोता, ‘ऑकल्टिस्ट’ ए. ई. वेट, खड़ा हुआ और उसने कहा, ‘श्री उस्पेन्स्की, आपकी प्रणाली में प्रेम नहीं है’ और यह कहकर कमरे से बाहर चला गया। लेकिन वह अपवाद था। उस्पेन्स्की के बाकी श्रोता, जिनमें अनेक पेशेवर डॉक्टर, मनोचिकित्सक और लेखक शामिल थे... उनके सिद्धांतों को चौंकाने वाला, मौलिक और अत्यंत आकर्षक पाते थे।

रूसी निर्वासित होने के नाते उस्पेन्स्की के लिए लंदन में अपने लिए जगह बना पाना सौभाग्य की बात थी।  गुर्जिएफ़ ने भी हैम्पस्टेड में अपना संस्थान स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन आवश्यक वीज़ा प्राप्त नहीं कर सके। इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वे पहले ही तय कर चुके थे कि पेरिस उनके लिए अधिक उपयुक्त रहेगा। (जर्मनी में अपना केंद्र स्थापित करने की उनकी पहले की योजना उस समय छोड़ दी गई, जब उन्हें लगा कि वहाँ की राजनीतिक स्थिति भी रूस या तुर्की जितनी ही अस्थिर है।)

लंदन छोड़ने से पहले गुर्जिएफ़ ने कई असाधारण व्याख्यान दिए। बेनेट इनमें से कुछ में उपस्थित थे और उसने नोट्स लिए, जिन्हें वह अपनी पुस्तक ‘गुर्जिएफ़: मेकिंग ए न्यू वर्ल्ड’ (Gurdjieff, Making a New World) में उद्धृत करते हैं। एक बार फिर ये व्याख्यान गुर्जिएफ़ की अंतर्दृष्टियों की असाधारण वैज्ञानिक सटीकता को सामने लाते हैं। गुर्जिएफ़ अपनी सबसे बुनियादी अवधारणाओं में से एक पर बोल रहे थे, ‘व्यक्तित्व’ (personality) और ‘सार’ (essence) के बीच का अंतर। जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके पास केवल ‘सार’ होता है अर्थात संसार के प्रति उसकी मूलभूत और स्वाभाविक प्रतिक्रिया। लगभग छह या सात वर्ष की आयु में बच्चा ‘व्यक्तित्व’ विकसित करना शुरू करता है अर्थात दूसरे लोगों के बीच अपने आपको एक व्यक्ति के रूप में पहचानना और दूसरों के अनुसार स्वयं को ढालना शुरू करता है। गुर्जिएफ़ के अनुसार, ऐसा होते ही अक्सर ‘सार’ का विकास पूरी तरह रुक जाता है। व्यक्तित्व उसका स्थान ले लेता है। कुछ लोग बाहर से अत्यंत प्रभावशाली और जीवंत व्यक्तित्व वाले दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से वास्तव में खाली होते हैं। बचपन में ही उनका ‘सार’ विकसित होना बंद हो गया था।

‘इन सर्च ओग द मिरैक्युलस’ (In Search of the Miraculous) में उस्पेन्स्की गुर्जिएफ़ द्वारा किए गए एक असाधारण प्रयोग का वर्णन करते हैं, जिसका उद्देश्य अपने विद्यार्थियों को ‘सार’ और ‘व्यक्तित्व’ के बीच का अंतर दिखाना था। इस प्रयोग के लिए दो व्यक्तियों को चुना गया था। एक अधेड़ उम्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति था, जो किसी महत्वपूर्ण पद पर था। दूसरा अपेक्षाकृत बिखरा हुआ और अस्थिर-सा युवक था, जिसकी बातचीत प्रायः बहुत शब्दाडंबरपूर्ण और उलझी हुई होती थी। किसी तरह या तो सम्मोहन द्वारा या किसी औषधि के माध्यम से (उस्पेन्स्की ने जान-बूझकर यह स्पष्ट नहीं किया) दोनों को अर्ध-तंद्रा जैसी अवस्था में पहुँचा दिया गया, जिसमें उनका ‘व्यक्तित्व’ गायब हो गया। बड़ा व्यक्ति पूरी तरह निष्क्रिय हो गया। उससे युद्ध के बारे में पूछा गया, जिसके विषय में कुछ ही क्षण पहले वह अत्यंत उत्तेजित होकर अपने विचार व्यक्त कर रहा था। लेकिन उसने कहा कि युद्ध में उसकी कोई रुचि नहीं है। इसके विपरीत, युवा व्यक्ति गंभीरता और सरलता से बात करने लगा और उसकी बातें पूरी तरह सार्थक थीं। गुर्जिएफ़ ने समझाया कि उस युवक का ‘सार’ अपेक्षाकृत अच्छी तरह विकसित था, लेकिन उसके ऊपर एक अटपटा व्यवहार और दूसरे लोगों की प्रतिक्रियाओं को जरूरत से ज्यादा महत्व देने की प्रवृत्ति चढ़ गई थी। इसी कारण वह एक घबराए हुए मूर्ख जैसा दिखाई देता था। उस अधेड़ व्यक्ति में ‘सार’ बहुत कम बचा था। उसने एक आडंबरपूर्ण और अपने विचारों को ही अंतिम मानने वाला व्यक्तित्व विकसित कर लिया था। लेकिन उसके भीतर उसके नीचे कुछ भी नहीं था।

लंदन के व्याख्यानों के अंत में गुर्जिएफ़ ने ‘सार’ और ‘व्यक्तित्व’ की इस अवधारणा को और विकसित किया, ‘जिसे आप अपने भीतर “इच्छा” कहते हैं, वह केवल व्यक्तित्व से आती है। उसका वास्तविक इच्छा से कोई संबंध नहीं है। कोई चीज़ व्यक्तित्व को छूती है और वह कहता है, “मैं चाहता हूँ” या “मैं नहीं चाहता”... और समझता है कि यही इच्छा है। यह कुछ भी नहीं है। यह निष्क्रिय है। वास्तविक इच्छा केवल सार में हो सकती है।’

गुर्जिएफ़ ने समझाया कि सार में आलोचनात्मक मन (critical mind) नहीं होता:

‘वह विश्वास करने वाला होता है, लेकिन क्योंकि वह नहीं जानता, इसलिए आशंकित भी रहता है। आप तार्किक तर्क देकर सार को प्रभावित नहीं कर सकते और न ही उसे किसी बात के लिए समझा सकते हैं। जब तक सार स्वयं अनुभव करना शुरू नहीं करता, तब तक वह वैसा ही बना रहता है जैसा वह हमेशा से था। कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें व्यक्तित्व प्रतिक्रिया नहीं दे पाता और सार को प्रतिक्रिया करनी पड़ती है। तब यह दिखाई देता है कि किसी व्यक्ति के सार में कितना कुछ मौजूद है। हो सकता है कि वह केवल एक बच्चा हो और उसे पता ही न हो कि कैसे व्यवहार करना चाहिए। उसे अलग ढंग से व्यवहार करने के लिए कहना व्यर्थ है, क्योंकि वह आपकी भाषा को समझेगा ही नहीं।’

सार और व्यक्तित्व पर दिए गए इस व्याख्यान में शायद सबसे महत्त्वपूर्ण कथन यह है, ‘सार और व्यक्तित्व मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में भी स्थित होते हैं।’ जब गुर्जिएफ़ ने यह कथन दिया था, तब उनके श्रोताओं में बैठे डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों के लिए भी इसका शायद बहुत कम अर्थ रहा होगा, जब तक कि उन्हें तंत्रिका-विज्ञानी हगलिंग्स जैक्सन का यह कथन याद न आया हो, ‘अभिव्यक्ति बाईं ओर, पहचान दाईं ओर।’ उनका आशय यह था कि मानव मस्तिष्क दो हिस्सों में बँटा हुआ प्रतीत होता है। मस्तिष्क का बायाँ गोलार्द्ध भाषा और तर्क से संबंधित है, जबकि दायाँ गोलार्द्ध पहचानने की क्षमता (जैसे चेहरों को पहचानना) और अंतर्ज्ञान से संबंधित है। गुर्जिएफ़ की मृत्यु के काफी समय बाद तक इस बात की वैज्ञानिक रूप से जाँच नहीं हुई। फिर अमेरिकी वैज्ञानिक आर. डब्ल्यू. स्पेरी ने मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को जोड़ने वाले तंत्रिका-तंतुओं के पुल को काटने का प्रयोग किया और एक चौंकाने वाली खोज की। हमारे सिर के भीतर सचमुच दो अलग-अलग व्यक्ति मौजूद होते हैं। यदि ‘विभाजित मस्तिष्क’ वाले किसी व्यक्ति को केवल उसकी बाईं आँख से कोई वस्तु दिखाई जाए (जो किसी विचित्र कारण से मस्तिष्क के दाएँ हिस्से से जुड़ी होती है) और उससे पूछा जाए कि उसे क्या दिखाया गया है तो वह उत्तर नहीं दे सकता। लेकिन यदि उससे कहा जाए कि उसने जो देखा है, उसे बाएँ हाथ से लिखे, तो वह बिना किसी कठिनाई के उसका नाम लिख सकता है। यदि उसे बाईं आँख से एक संतरा और दाईं आँख से एक सेब दिखाया जाए और उससे पूछा जाए कि उसने अभी क्या देखा तो वह उत्तर देता है, ‘एक सेब।’ लेकिन जब उससे कहा जाता है कि उसने जो देखा है, उसे बाएँ हाथ से लिखे तो वह लिखता है, ‘एक संतरा।’ फिर उससे पूछा जाए कि उसने अभी क्या लिखा है, तो वह उत्तर देता है,‘एक सेब।’ यदि उसे केवल बाईं आँख से कोई अश्लील चित्र दिखाया जाए तो वह शरमा जाएगा। लेकिन जब उससे पूछा जाएगा कि वह क्यों शरमा रहा है तो वह सचमुच उत्तर देगा, ‘मुझे नहीं पता।’

अर्थात ‘मैं’ मस्तिष्क के बाएँ हिस्से में निवास करता है। उस हिस्से में जो भाषा और तर्क से जुड़ा है। उससे कुछ ही सेंटीमीटर दूर एक और ‘मैं’ मौजूद है। एक ऐसा ‘मैं’ जिसकी कोई आवाज़ नहीं है और जिसके अस्तित्व से बायाँ हिस्सा पूरी तरह अनजान प्रतीत होता है।

मनोवैज्ञानिक अभी भी सम्मोहन की प्रकृति से पूरी तरह अनजान हैं। आखिर ऐसा कैसे होता है कि किसी व्यक्ति को सम्मोहन की तंद्रा में ले जाया जा सकता है और फिर उससे ऐसे काम करवाए जा सकते हैं, जिन्हें वह सामान्य चेतन अवस्था में नहीं कर सकता जैसे, धूम्रपान छोड़ देना, मस्सों को गायब कर देना, यहाँ तक कि दो कुर्सियों के बीच बिल्कुल अकड़कर लेट जाना, जबकि कोई भारी-भरकम आदमी उसके पेट पर खड़ा हो? सम्मोहन की अवस्था में चेतन अहम सो जाता है, जबकि हमारे आंतरिक अस्तित्व का कोई हिस्सा पूरी तरह जागा रहता है। (सम्मोहित व्यक्ति के मस्तिष्क की तरंगें वैसी ही होती हैं जैसी पूरी तरह जाग्रत व्यक्ति की होती हैं।) इससे यह संकेत मिलता है कि सम्मोहन के दौरान मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा सो जाता है, जबकि दायाँ हिस्सा जागा रहता है। और जब आलोचनात्मक, चेतन अहम सोया हुआ होता है, तब हमारी प्राकृतिक शक्तियाँ बिना किसी रोक-टोक के स्वयं को व्यक्त कर सकती हैं। (हम सभी जानते हैं कि अत्यधिक आत्म-सचेतता हमें अनाड़ी और कम प्रभावी बना देती है।)

सामान्य आत्म-निरीक्षण द्वारा कोई भी व्यक्ति इन दो ‘स्व’ के बारे में बहुत कुछ सीख सकता है। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा हमारी सामान्य इच्छा-क्रियाओं का स्रोत है, ‘मैं’ कुछ करने का निर्णय लेता हूँ। लेकिन ऐसा लगता है कि दायाँ मस्तिष्क हमारी ऊर्जा के भंडार के लिए उत्तरदायी है। जब ‘मैं’ थक जाता हूँ और निढाल महसूस करता हूँ, तब यदि मैं अपने अहम को भूल पाऊँ और किसी ऐसी चीज़ में पूरी तरह डूब जाऊँ जो ‘मुझे स्वयं से बाहर ले जाए’ तो मैं बहुत जल्दी अपनी ऊर्जा फिर से प्राप्त कर सकता हूँ। स्पष्टतः यह एक ऐसी युक्ति थी जिसे गुर्जिएफ़ समझते थे और यही बताती है कि थके हुए फ्रिट्ज़ पीटर्स को ‘पुनः ऊर्जित’ करने के बाद वे इतनी जल्दी अपनी ऊर्जा कैसे वापस प्राप्त कर लेते थे।

संक्षेप में, आत्म-निरीक्षण इस बात की पुष्टि करता हुआ प्रतीत होता है कि हम दो अलग-अलग ‘स्व’ से बने हैं और ये दोनों गुर्जिएफ़ के ‘सार’ और ‘व्यक्तित्व’ के अनुरूप हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि गुर्जिएफ़ जानते थे कि इन्हें मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में स्थित किया जा सकता है, जबकि ऐसा लगता है कि उन्हें मस्तिष्क की शरीर-क्रियाविज्ञान (brain physiology) के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।  एक बार फिर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि शायद गुर्जिएफ़ सच कह रहे थे, जब वे दावा करते थे कि उनकी प्रणाली किसी ऐसे प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित थी, जिसे मानव जाति का अधिकांश हिस्सा बहुत पहले भूल चुका था।

फ्रांस में गुर्जिएफ़ को जल्द ही अपना संस्थान स्थापित करने के लिए एक ऐसा घर मिल गया, जो उन्हें आदर्श लगा: फॉन्टेनब्लो के निकट शातो द प्रीएरे (Chateau du Prieuré), जो कभी लुई चौदहवें की दूसरी पत्नी मैडम द मेंतेनॉं का निवास था। इसके विशाल और दूर-दूर तक फैले हुए परिसर थे, जो ‘कार्य’ करने के लिए भरपूर अवसर प्रदान करते थे। गुर्जिएफ़ ने इसे एक वर्ष के लिए किराए पर लिया और बाद में खरीदने का विकल्प भी रखा। लेकिन इस सौदे ने उन्हें लगभग पूरी तरह निर्धन कर दिया। एक बार फिर उन्हें बड़ी मात्रा में धन कमाने के तरीके खोजने पड़े। उन्होंने पेरिस में दो रेस्तराँ शुरू किए और तेल के कारोबार में भी प्रवेश किया। उन्होंने फिर से मनोचिकित्सक के रूप में काम शुरू किया और शराब तथा नशीली दवाओं की लत से लोगों को मुक्त करने की पेशकश की। इस क्षेत्र में उनकी सफलता कथित रूप से असाधारण थी, हालाँकि आज हमारे पास उनकी उपचार-पद्धतियों का कोई प्रकाशित विवरण उपलब्ध नहीं है। इन सब कामों में अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती थी और अपनी जीवन-ऊर्जा को उसकी सीमा तक खींचना पड़ता था। वे बताते हैं कि एक रात प्रीएरे लौटते समय, अत्यधिक थकान की अवस्था में, वे गाड़ी चलाते-चलाते सो गए। लेकिन किसी तरह उन्होंने गाड़ी को सड़क के किनारे रोक दिया। अगली सुबह एक किसान की गाड़ी वहाँ से निकलने की कोशिश कर रही थी, तब उनकी नींद खुली। इसके परिणामस्वरूप उन्हें तेज़ सर्दी लग गई, जिसके प्रभाव लंबे समय तक बने रहे।

उनकी एक शिष्या, ग्लेडिस अलेक्ज़ेंडर, ने लिखा:

‘[प्रीएरे में] जीवन को अत्यंत तीव्र गति दे दी गई थी। उसमें पुराने ढंग की रसोई और बर्तन माँजने के भारी काम से लेकर घर और कपड़े धोने के काम तक, फूलों और सब्ज़ियों के बगीचों की देखभाल से लेकर घोड़ों, गधागाड़ी, भेड़ और बकरियों, गायों और बछड़ों, मुर्गियों, सूअरों और कुत्तों की देखभाल तक, सब कुछ शामिल था। पूरा जीवन ऐसी खौलती हुई गति और तनाव, उत्साह और ऊँची आशाओं के वातावरण में जिया जाता था।’

गुर्जिएफ़ को काम का मूल रहस्य उनके मित्र पोगोसियन ने बताया था। पोगोसियन कभी विश्राम नहीं करते थे। वे हमेशा अपनी बाँहों को लयबद्ध ढंग से चलाते रहते और अपने पैरों से ताल देते रहते थे। उन्होंने समझाया था कि उनका उद्देश्य अपने स्वभाव को काम से प्रेम करने का अभ्यस्त बनाना और उसकी स्वाभाविक आलस्य की प्रवृत्ति पर विजय पाना था। अब गुर्जिएफ़ ने यही शिक्षा अपने शिष्यों पर लागू की।

लेकिन प्रीएरे में किए जाने वाले इस शारीरिक कठोर श्रम का यही एकमात्र उद्देश्य नहीं था। इसके पीछे गुर्जिएफ़ की यह समझ भी थी कि ‘व्यक्तित्व’ आत्म-साक्षात्कार की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। व्यक्तित्व मूर्ख होता है। वह जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया करता है, स्वयं पर विश्वास नहीं करता और निराशा की ओर आसानी से झुक जाता है। हम यह उस युवक के मामले में देख सकते हैं, जिसका ‘सार’ उसके व्यक्तित्व की तुलना में कहीं अधिक विवेकपूर्ण और संयमित था, जबकि उसका व्यक्तित्व एक विदूषक की तरह व्यवहार करता था। यदि जीवन में कोई गंभीर उद्देश्य और लक्ष्य न हो तो समस्या और भी दुगुनी कठिन हो जाती है। कठिन श्रम और गंभीर उद्देश्य बहुत जल्दी व्यक्तित्व को चुप रहना और शांत रहना सिखा देते हैं। गुर्जिएफ़ के बहुत-से शिष्य धनी लोग थे, जिन्होंने जीवन में कभी एक दिन भी कठिन परिश्रम नहीं किया था। इसलिए कठिन श्रम उनके भीतर के संतुलन को फिर से व्यवस्थित करने की दिशा में पहला आवश्यक कदम था। शारीरिक श्रम का एक और बहुत बड़ा लाभ है। जब शरीर थक जाता है तो वह शिथिल हो जाता है। ‘व्यक्तित्व’ भी इससे संकेत लेता है और स्वयं को पीछे कर लेता है। उदाहरण के लिए, यही बताता है कि जब आप शारीरिक रूप से थके हुए होते हैं, तब संगीत या कविता में ‘डूब जाना’ अधिक आसान क्यों होता है। व्यक्तित्व अब कोई बाधा, कोई अवरोध खड़ा नहीं करता। वह लगातार बोलना और बीच में हस्तक्षेप करना बंद कर देता है। इसलिए श्रोता के ‘सार’ और संगीत या कविता के ‘सार’ के बीच संपर्क अधिक तात्कालिक और सीधा हो जाता है। और गुर्जिएफ़ के ‘सार’ तथा उनके शिष्यों के ‘सार’ के बीच का संपर्क भी अधिक सीधा हो जाता।

स्वाभाविक रूप से, इससे बहुत-सी गलतफहमियाँ और आलोचनाएँ पैदा हुईं। रोम लांडाउ अपनी 1935 में प्रकाशित पुस्तक ‘गोल्ड इज़ माय एडवेंचर’ (God Is My Adventure) में लिखते हैं, ‘कुछ शिष्य कभी-कभी शिकायत करते थे कि वे गुर्जिएफ़ के हिंसक क्रोध, पैसे के प्रति उनकी दिखाई देने वाली लालसा या उनके निजी जीवन की विलासिता को अब और सहन नहीं कर सकते।’ अंतिम बात शायद गुर्जिएफ़ की अपनी महिला शिष्यों को बहकाने की प्रसिद्धि की ओर एक परोक्ष संकेत है। (1960 में प्रोविडेंस, रोड आइलैंड में मुझे एक व्यक्ति के बारे में बताया गया कि वह गुर्जिएफ़ की अवैध संतान में से एक था। जिस प्रोफेसर ने मुझे यह बताया, उसने यह भी विश्वासपूर्वक कहा कि गुर्जिएफ़ ने पूरे अमेरिका में बहुत-सी संतानें छोड़ी थीं।) एक रूसी युवती, आइरीन रेवलियोटी, जो क्षय रोग से पीड़ित थी और जिसे उसके प्रेमी ल्यूक डिट्रिख ने ‘कार्य’ से परिचित कराया था, को गुर्जिएफ़ ने रात के भोजन पर बुलाया। उन्होंने उससे (रूसी भाषा में) कहा कि दूसरे मेहमानों के चले जाने के बाद वह वापस आए। उसे विश्वास हो गया कि गुर्जिएफ़ उसे बहकाने का इरादा रखते हैं। इसलिए उसने उन्हें फोन करके कहा कि उसकी माँ घर पर उसकी प्रतीक्षा कर रही है। ‘तब गुर्जिएफ़ ने उसे इस तरह अपमानित किया कि उसके इरादे को लेकर उसके मन में कोई संदेह नहीं रह गया,’ लुई पॉवेल्स गुर्जिएफ़ पर अपनी पुस्तक में लिखते हैं। जब उसने इस घटना के बारे में एक दूसरे शिष्य को बताया तो उसने उसके मुँह पर थप्पड़ मार दिया। कुछ दिनों बाद उसकी (महिला शिष्या) हृदयाघात से मृत्यु हो गई।

लेकिन गुर्जिएफ़ के विरुद्ध सबसे अधिक बार लगाया जाने वाला आरोप यह था कि वे अत्यधिक काम करवाकर अपने शिष्यों को स्वचालित यंत्रों (automata) में बदल देते थे। एक महिला शिष्या ने खून की उल्टी की और डॉक्टर ने पेट में फोड़ा फटने (burst ulcer) का निदान किया। गुर्जिएफ़ ने कहा कि वह खून नहीं था और उन्होंने कोई दूसरा निदान बताया। लेकिन ऑपरेशन से यह साबित हो गया कि डॉक्टर सही था। यह धारणा कि गुर्जिएफ़ अपने विद्यार्थियों के साथ किसी निर्दयी ड्रिल सार्जेंट की तरह व्यवहार करते थे, कैथरीन मैन्सफ़ील्ड की मृत्यु के बाद फैली कहानियों से और मजबूत हुई। न्यूज़ीलैंड की यह लेखिका पहले ही तपेदिक से मृत्यु के निकट थी, जब उसने अक्टूबर 1922 में गुर्जिएफ़ से पूछा कि क्या वह प्रीएरे आ सकती है। पहले छह सप्ताह तक उसे केवल एक पर्यवेक्षक के रूप में वहाँ रहने की अनुमति थी। इसके बाद उससे भी ‘कार्य’ में शामिल होने और रसोई में भोजन तैयार करने की अपेक्षा की गई। गुर्जिएफ़ ने तय किया कि उसके स्वास्थ्य में सुधार के लिए उसे गायों की साँस की आवश्यकता है और उन्होंने वास्तव में अस्तबल में गायों के ऊपर एक सोफ़ा रखवा दिया, जहाँ वह बैठकर उनकी साँसों को अंदर ले सकती थी। लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ और उसके वहाँ आने के दस सप्ताह बाद, जनवरी में, रक्तस्राव के कारण उनकी मृत्यु हो गई। अपने पति मिडलटन मरी को लिखे उनके पत्रों से स्पष्ट है कि उन्हें जरूरत से ज्यादा काम करवाने का कोई प्रयास नहीं किया गया था। फिर भी उनकी मृत्यु ने गुर्जिएफ़ के संस्थान की एक भयावह प्रतिष्ठा बना दी।

फिर भी यह स्पष्ट है कि कठोर श्रम खतरनाक हो सकता था। बेनेट न केवल पेचिश और अत्यधिक काम के हमले से बच गए बल्कि उन्हें उनसे लाभ भी हुआ। जिन लोगों का मानसिक बल कम था या जिनमें दृढ़ता कम थी, वे संभवतः थकावट के कारण पूरी तरह टूट सकते थे। लुई पॉवेल्स लिखते हैं, ‘दो वर्षों के “कार्य” के बाद... मैंने स्वयं को अस्पताल में पाया। बिल्कुल एक कमजोर बिल्ली के बच्चे की तरह, एक आँख लगभग चली गई थी, आत्महत्या के कगार पर था और रात के तीन बजे बेताब होकर सहायता के लिए पुकार रहा था।’ और वे दो अमेरिकी लड़कियों के बारे में बताते हैं, जिन्होंने मैडम द एस. (संभवतः जीन द साल्ज़मन) द्वारा संचालित एक समूह में दो वर्ष बिताए थे, ‘वे अपनी आखिरी साँस पर थीं, मृत्यु में छलाँग लगाने के लिए तैयार, वास्तव में उसके ऊपर झुक चुकी थीं और उससे सम्मोहित थीं।’ उन्होंने उन्हें सलाह दी कि वे इस ‘शिक्षा’ से अलग हो जाएँ और समुद्र-तट के किसी स्वास्थ्य-स्थल पर जाकर विश्राम करें।

और यह सब हमें गुर्जिएफ़ की समस्या के मूल केंद्र तक ले आता है। एक युवा व्यक्ति के रूप में जैसा कि हम देख चुके हैं, गुर्जिएफ़ अपनी ‘भूलने’ की असमर्थता को नियंत्रित न कर पाने की भावना से लगभग पागल हो गए थे। क्योंकि यही मनुष्य की केंद्रीय समस्या है। सामान्य भूलने की आदत जैसे, किसी चीज़ को लेने के लिए कमरे में जाना और वहाँ पहुँचकर यह भूल जाना कि आप वहाँ क्यों आए थे। जब हमें कोई ऐसी चीज़ मिलती है जिसकी हमें बहुत तीव्र इच्छा थी या जब हम किसी दुख या संकट से अचानक बहुत बड़ी राहत का अनुभव करते हैं तो हमें लगता है कि हम इस सुख को कभी नहीं भूलेंगे। लेकिन चौबीस घंटे बाद उस अनुभव की केवल एक धुँधली-सी प्रतिलिपि बची रहती है और हम फिर से पूरी तरह तुच्छ बातों में डूब जाते हैं। यदि हम ‘भूलना नहीं’ सीखने का कोई प्रशिक्षण ले सकें तो स्पष्टतः हमारा जीवन पूरी तरह बदल जाएगा। और आखिरकार, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को कम भुलक्कड़ बनने का प्रशिक्षण दे सकता है। यह बात अविश्वसनीय लगती है कि केवल थोड़ी-सी असावधानी ही हमारे और वर्तमान जीवन से दस गुना अधिक संतोषजनक जीवन के बीच खड़ी है। जो भी व्यक्ति इस बात को समझ लेता है, वह गुर्जिएफ़ की उस जबरदस्त निराशा को महसूस करता है और ‘आर-पार निकल जाने’ (break through) के लिए अत्यंत थका देने वाले प्रयास करने को तैयार हो जाता है।

और यहीं समस्या पैदा होती है क्योंकि थकावट चीज़ों को दस गुना अधिक खराब कर देती है। जब हम स्वस्थ और पूरी तरह जाग्रत होते हैं, तब हमें बार-बार अचानक उस शुद्ध ‘बेतुके आनंद’ (absurd delight) की झलक मिलती रहती है, जो हमारे भीतर अर्थ और उद्देश्य की भावना को फिर से जगा देती है। लेकिन थकावट हर चीज़ को मृत और निर्जीव बना देती है, जिससे कोई भी प्रयास करने योग्य नहीं लगता। दुनिया ‘बासी, सपाट और निरर्थक’ हो जाती है। यदि हम इस दिखाई देने वाली निरर्थकता को सच मान बैठते हैं, तो यह अत्यंत खतरनाक स्थिति है। तब अवसाद और थकान का एक दुष्चक्र बन जाता है। उद्देश्य की भावना के बिना मनुष्य उस नाविक की तरह है, जिसके पास दिशा बताने वाला कोई कम्पास नहीं है।

उस्पेन्स्की और बेनेट जैसे लोगों के लिए यह खतरा मौजूद नहीं था। गुर्जिएफ़ से मिलने से बहुत पहले ही वे किसी-न-किसी प्रकार के ज्ञान की खोज में वर्षों बिता चुके थे। इसलिए थकान की कोई भी मात्रा शायद उन्हें हिम्मत हारने की स्थिति तक नहीं पहुँचा सकती थी अर्थात उन्हें निरर्थकता की भावना के बहकावे में नहीं ला सकती थी। कैथरीन मैन्सफ़ील्ड जैसी व्यक्ति की स्थिति अलग थी। यहाँ तक कि जॉन कार्सवेल की उनके बारे में लिखी सहानुभूतिपूर्ण पुस्तक से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि वह भावनात्मक रूप से एक सतही और अस्थिर व्यक्ति थीं, जिन्हें अहंकार और ऊब के मिले-जुले भाव प्रेरित करते थे। यदि प्रीएरे में उनका स्वास्थ्य ठीक हो गया होता तो बहुत संभव है कि वह वहाँ के पूरे अनुभव पर एक व्यंग्यात्मक लघुकथा लिखकर चली जातीं और गुर्जिएफ़ को एक ढोंगी के रूप में चित्रित करतीं। असंतोषजनक शिष्यों से छुटकारा पाने के गुर्जिएफ़ के तरीके के लिए उनकी बहुत आलोचना हुई जैसे, ज़ाखारोफ़ को, जिसे उन्होंने एस्सेन्टुकी से वापस पेत्रोग्राद भेज दिया था, लेकिन ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस प्रकार की छँटाई करने में उन्होंने पर्याप्त कठोरता नहीं दिखाई।

फॉन्टेनब्लो संस्थान की स्थापना के बारे में गुर्जिएफ़ के अपने विवरण से जो बात स्पष्ट रूप से सामने आती है, वह यह है कि उस समय का अधिकांश हिस्सा वे शारीरिक रूप से अत्यधिक थकान की अवस्था में रहे और धन को लेकर लगातार चिंतित रहे। यदि वे अपने शिष्यों को सहनशक्ति की सीमा तक धकेलते थे तो स्वयं को भी उसी सीमा तक धकेलते थे। और, जैसा कि बेनेट स्वीकार करते हैं, यह काम करता था।

इन तमाम बाधाओं के बावजूद, नवंबर 1922 से दिसंबर 1923 के बीच गुर्जिएफ़ ने ऐसा कुछ कर दिखाया, जैसा यूरोप में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था। उन्होंने ऐसे कार्य-परिस्थितियों का निर्माण किया, जिनसे दर्जनों लोगों को स्वयं यह जाँचने का अवसर मिला कि हर मनुष्य के भीतर परिवर्तन की जो संभावना सुप्त अवस्था में मौजूद है, वह वास्तव में विकसित की जा सकती है। मूल पद्धति सरल थी। शिष्यों को अपने शारीरिक शरीर की काम करने की क्षमता, ध्यान लगाने की क्षमता, विभिन्न कौशल सीखने की क्षमता और मानसिक-आंतरिक ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता को उसकी सीमा तक खींचने का अवसर और साधन दिया जाता था... लेकिन प्रीएरे के बाहरी जीवन का कोई भी वर्णन इस बात का पर्याप्त अनुमान नहीं दे सकता कि लोगों के भीतर क्या घट रहा था। वे स्वयं देख सकते थे कि चमत्कार संभव हैं और उनकी आँखों के सामने घटित हो रहे हैं। वातावरण प्रसन्न और जीवन्त था, उदास या मठ-जैसा नहीं।

लेकिन केवल इस काम पर ज़ोर देना पूरी बात को समझने से चूक जाना होगा। एक बुनियादी अर्थ में, यह काम अपने आप में बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं था। इसे स्पष्ट करने वाली दो घटनाएँ हैं। बेनेट बताते हैं कि एक दिन गुर्जिएफ़ ने घोषणा की कि सामान्य शारीरिक श्रम पर्याप्त नहीं है। अब उन सबको तरह-तरह के हुनर भी सीखने होंगे—जूते बनाना, इंजीनियरिंग, टोकरी बुनना आदि। उन्होंने स्वयंसेवकों को आगे आने के लिए कहा और हर व्यक्ति ने हाथ उठा दिया। लेकिन वास्तव में इन कामों की शिक्षा कभी शुरू ही नहीं हुई। फिर भी बेनेट एक दिलचस्प बात कहते हैं कि इस अतिरिक्त काम की संभावना मात्र ने सबको भीतर से सक्रिय कर दिया और वे अधिक ऊर्जावान हो गए।

फ्रिट्ज़ पीटर्स को हर चार दिन में एक बार घास काटने का काम दिया गया था। जब उसने यह काम पूरा करना सीख लिया तो गुर्जिएफ़ ने उसकी प्रशंसा करने के बजाय उससे कहा कि अब उसे यह पूरा काम एक ही दिन में करना होगा। पीटर्स की निराशा और हताशा देखकर वे उसे पास के एक खेत में ले गए, जहाँ बहुत ऊँची घास थी और कहा कि जब वह एक दिन में लॉन की सारी घास काटना सीख जाएगा, तब उसे इस खेत में भेजा जाएगा, जहाँ उसे एक दिन में दरांती से सारी घास काटनी होगी। (उस समय पीटर्स की उम्र केवल ग्यारह वर्ष थी और उसका कद भी काफी छोटा था।) स्वाभाविक रूप से, इस संभावना से पीटर्स का मन बैठ गया। फिर भी उसने प्रयास जारी रखा और एक ही दिन में सारे लॉन की घास काटने में सफल हो गया। उसने पाया कि काम करते-करते उसका आत्म-दया और रोष गायब हो गया था। अंततः जब उसने गुर्जिएफ़ से पूछा कि उसे उस खेत की घास दरांती से कब काटनी होगी तो गुर्जिएफ़ ने एक विचित्र उत्तर दिया, “ज़रूरत नहीं। तुम वह काम पहले ही कर चुके हो।” अर्थात उससे कहीं अधिक कठिन काम उस खेत की घास को दरांती से काटने की संभावना ने पीटर्स को अपने लॉन काटने की समस्या को एक मामूली काम समझकर करने में सक्षम बना दिया था। गुर्जिएफ़ की दिलचस्पी इसी चीज़ में थी जिसे “साहस का जागरण” कहा जा सकता है।

1924 की शुरुआत में गुर्जिएफ़ की अस्थिर आर्थिक स्थिति ने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए मजबूर किया कि अमेरिका जाकर अपने खाली होते धन-भंडार को फिर से भरने का प्रयास किया जाए। दिसंबर 1923 में थिएत्र दे शाँज़-एलीज़े में उनके नृत्यों का प्रदर्शन काफी सफल रहा था और संभव है कि इसी सफलता से गुर्जिएफ़ को अटलांटिक पार जाकर धन कमाने का विचार आया हो। उस्पेन्स्की ने उनकी सहायता की और उन्हें क्लोद ब्रैग्डन से मिलवाया, जिन्होंने ‘टरटियम ओरगेनम’ (Tertium Organum) का अनुवाद किया था। ए. आर. ओरेज, जिन्होंने ‘न्यू ऐज’ (New Age) का संपादन छोड़कर गुर्जिएफ़ के साथ काम करना शुरू कर दिया था, पहले ही अमेरिका भेज दिए गए ताकि वहाँ की परिस्थितियाँ तैयार कर सकें। (अंततः ओरेज न्यूयॉर्क में ही रह गए।) गुर्जिएफ़ और उनका दल जनवरी 1924 में अमेरिका पहुँचा। कुल चालीस लोग थे और 23 जनवरी को लेस्लीज़ बॉलरूम में प्रदर्शन किया।

शिष्यों ने पूर्वी संगीत और ढोल की ताल के साथ अपने “मूवमेंट्स” प्रस्तुत किए और फिर “चुंबकत्व, दूरदृष्टि और मन-पठन” का प्रदर्शन किया। दर्शकों से कहा गया कि वे अपने पास की कोई व्यक्तिगत वस्तु किसी शिष्य को दिखाएँ। मंच पर मौजूद शिष्य फिर उस वस्तु का सटीक वर्णन करते। दर्शक किसी ओपेरा का नाम सुझाते और दर्शकों के बीच बैठे शिष्य उस सूचना को मंच पर मौजूद थॉमस दे हार्टमैन तक “पहुँचाते”, जो फिर उस ओपेरा का कोई अंश बजाते। इसी तरह दर्शकों में बैठे शिष्य जीवित जानवरों के नाम “प्रेषित” करते और मंच पर मौजूद एक कलाकार उन्हें बड़े सफेद कागज़ों पर बना देता। मन-पठन का यह प्रदर्शन अत्यंत प्रभावशाली था। दर्शकों में कम-से-कम एक व्यक्ति, ए. एस. नॉट, जो बाद में ‘टीचिंग ऑफ गुर्जिएफ़: द जर्नल ऑफ ए प्यूपिल’ (Teachings of Gurdjieff: The Journal of a Pupil) के लेखक बने, इस प्रदर्शन से चकित और गहरे प्रभावित हुए। एक अन्य दर्शक, विलियम सीब्रुक, इसे महज़ हाथ की सफाई या जादू की चाल समझकर खारिज करने के इच्छुक थे। (ओरेज ने दर्शकों से कहा था कि प्रदर्शन में “करतब, आधे-करतब और वास्तविक अलौकिक घटनाएँ” होंगी और दर्शकों को स्वयं अनुमान लगाना होगा कि इनमें से कौन-सी चीज़ क्या है।) सीब्रुक ने लिखा:

“जिस चीज़ ने मुझे सबसे अधिक उत्साहित और आकर्षित किया, वह थी शिष्यों की अद्भुत, चमकदार, स्वचालित-सी, अमानवीय, लगभग अविश्वसनीय आज्ञाकारिता और रोबोट जैसी अनुशासनबद्धता। वे पूरी तरह प्रशिक्षित ज़ॉम्बियों के किसी समूह जैसे थे या सर्कस के जानवरों जैसे...

इस समूह में युवा और कुछ अपेक्षाकृत अधिक उम्र की महिलाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश सुंदर थीं और कुछ अत्यंत खूबसूरत। पुरुषों में से ऐसा लगता था कि वे और शायद अधिकांश वास्तव में, ब्रिटेन तथा यूरोप के श्रेष्ठ परिवारों और विश्वविद्यालयों से आए थे। मैं इनमें से कुछ शिष्यों से मिला और लगभग बिना किसी अपवाद के वे संस्कारी, सुसंस्कृत और बुद्धिमान लोग थे... और चाहे वह प्रदर्शन असाधारण मानसिक शक्तियों का था या नहीं, उसमें कोई बनावट नहीं थी क्योंकि यदि उन्होंने सर्वोच्च स्तर का शारीरिक समन्वय नहीं सीखा होता तो उन करतबों में उनके हाथ-पैर और शायद गर्दन तक टूट सकती थी। लेकिन मुझे लगा कि इन प्रदर्शनों ने उनके अपने ऊपर नियंत्रण से भी अधिक जिस चीज़ को दिखाया, वह थी गुर्जिएफ़, उस गुरु का उन पर भयानक प्रभुत्व। उसके आदेश पर वे मंच के एक छोर से दूसरे छोर तक पूरी गति से दौड़ पड़ते। उसके एक धीमे से आदेश पर उसी दौड़ती हुई अवस्था में ऐसे जम जाते, मानो किसी रेस-ट्रैक कैमरे ने उन्हें उसी क्षण स्थिर कर दिया हो...

गुर्जिएफ़ स्वयं उन दिनों शांत, साँड़ जैसे शरीर वाला व्यक्ति थे, जिसकी मांसपेशियाँ इस्पात की तरह कठोर थीं। वे बेदाग़ डिनर-सूट पहने रहते, उनका सिर प्रशियन अधिकारी की तरह मुंडा हुआ था, काली, घनी, हैंडलबार जैसी मूँछें थीं और वह प्रायः महँगी मिस्री सिगरेट पीते थे। वे दर्शकों के बीच या पियानो के पास एक ओर खड़े रहते... उन्होंने कभी चिल्लाकर आदेश नहीं दिया। वे हमेशा सहज और शांत दिखाई देते। फिर भी हर समय उनका पूर्ण नियंत्रण रहता। ऐसा लगता था मानो वे किसी दासों के मालिक या जंगली जानवरों को वश में करने वाले प्रशिक्षक की तरह हों, जिसके हाथ में अदृश्य कोड़े की फटकार हवा में बिना आवाज़ के चल रही हो। उनके दूसरे गुणों के अलावा, वे एक महान रंगमंचीय कलाकार भी थे। एक रात प्रदर्शन का चरम ऐसा आया कि पहली पंक्ति के दर्शक सचमुच अपनी सीटों से उछल पड़े। दल को मंच के बिल्कुल पीछे, दर्शकों की ओर मुँह करके खड़ा किया गया था। गुर्जिएफ़ के आदेश पर वे पूरी गति से मंच के सामने की ओर दौड़े। हमें लगा कि अब वे अपनी गति को अचानक रोकने का शानदार प्रदर्शन करेंगे। लेकिन इसके बजाय गुर्जिएफ़ ने शांत भाव से अपनी पीठ उनकी ओर कर ली और सिगरेट जलाने लगे। अगले ही क्षण मनुष्यों का एक हवाई हिमस्खलन हवा में उड़ता हुआ ऑर्केस्ट्रा के ऊपर से निकल गया और खाली कुर्सियों के बीच फर्श पर जा गिरा। शरीर एक-दूसरे के ऊपर उलझे हुए पड़े थे। बाँहें और टाँगें अजीब मुद्राओं में बाहर निकली थीं और वे उसी अवस्था में पूरी तरह स्थिर और निःशब्द पड़े रहे।

घटना घट जाने के बाद ही गुर्जिएफ़ ने मुड़कर उनकी ओर देखा, जबकि वे अब भी बिल्कुल स्थिर पड़े थे। कुछ देर बाद जब उसकी अनुमति से वे उठे और यह स्पष्ट हो गया कि किसी की बाँह, टाँग या गर्दन नहीं टूटी थी, किसी को खरोंच या चोट तक नहीं लगी थी तो तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कुछ विरोध की आवाज़ें भी सुनाई दीं। यह लगभग हद से अधिक हो गया था।”

ल्यूवेलिन पॉविस ने ‘द वर्डिक्ट ऑफ़ ब्रिडलगूज़’ (The Verdict of Bridlegoose) में गुर्जिएफ़ के दल का एक संक्षिप्त वर्णन भी दिया है:

“[गुरजिएफ़] का सिर ऊँचा और गंजा था तथा आँखें तीखी और काली थीं। उनका पूरा व्यक्तित्व किसी घुड़सवारी के प्रशिक्षक की याद दिलाता था, हालाँकि उनकी उपस्थिति में कुछ ऐसा था जो व्यक्ति की नसों पर विचित्र प्रभाव डालता था। यह प्रभाव विशेष रूप से तब महसूस होता था जब उसके शिष्य मंच पर आते और किसी जादू के उस्ताद की निगाह के सामने पिंजरे में रखे सम्मोहित खरगोशों के समूह की तरह प्रदर्शन करने लगते।”

बहुत-से अनुकूल प्रचार के बावजूद, न्यूयॉर्क में दर्शकों की संख्या लगातार घटती गई। जैज़ युग के बीच न्यूयॉर्क के लोगों की पूर्वी नृत्यों में विशेष रुचि नहीं थी। ‘दल’ वास्तव में दूसरे काम की तलाश कर रहा था, तभी दियागिलेव बैले के पूर्व सदस्य एडॉल्फ़ बोल्म ने उन्हें शिकागो आने का निमंत्रण दिया। वहाँ उनके प्रदर्शन सफल रहे और कार्नेगी हॉल में हुआ अंतिम प्रदर्शन भी सफल रहा। लेकिन अमेरिका की यात्रा से गुर्जिएफ़ को उतना धन नहीं मिल पाया, जितनी उन्हें आशा थी।

इस दौर के गुर्जिएफ़ से जुड़ी एक विशिष्ट घटना ओल्गा दे हार्टमैन ने बताई है। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि वे अकेली पेरिस लौट जाएँ क्योंकि उनके पति को कुछ समय और न्यूयॉर्क में उनके साथ रहना आवश्यक था। उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। गुर्जिएफ़ नाराज़ हुए, लेकिन वे जानते थे कि ओल्गा अपना निर्णय बदलने वाली नहीं हैं। इसलिए वे और उनके पति गुर्जिएफ़ के बिना पेरिस लौट गए। जब ओल्गा ने जहाज़ के टिकट खरीद लिए, तब उन्हें पता चला कि उनके पास अब कोई पैसा नहीं बचा है। इसलिए उन्होंने अपनी एक अंगूठी गिरवी रख दी। वह अंगूठी उन्हें विशेष रूप से प्रिय थी और उन्होंने अपने भाई के लिए संदेश छोड़ दिया जो न्यूयॉर्क में ही था कि वह उस अंगूठी को छुड़ा ले। लेकिन वास्तव में गुर्जिएफ़ को इस बात का पता चल गया और उन्होंने स्वयं वह अंगूठी छुड़ा ली। जब वे प्रीएरे लौटे तो उन्होंने वह अंगूठी ओल्गा को वापस दे दी। वे पुराने वैर या नाराज़गी को मन में रखने वाले व्यक्ति नहीं थे।

फॉन्टेनब्लो लौटने के बाद काम पहले की तरह चलता रहा। 5 जुलाई 1924 को गुर्जिएफ़ ने पूरा दिन पेरिस में बिताया। उनकी कार के स्टीयरिंग-व्हील में कुछ खराबी थी, इसलिए उन्होंने कार को एक गैराज में छोड़ दिया। उन्होंने ओल्गा दे हार्टमैन से कहा कि वे पेरिस स्थित उनके फ्लैट में कुछ दफ़्तरी काम कर लें और फिर ट्रेन से प्रीएरे लौट जाएँ। ओल्गा को यह बात खली क्योंकि उस दिन बहुत गर्मी थी और सामान्यतः वे गुर्जिएफ़ के साथ कार में वापस लौटती थीं। गुर्जिएफ़ के फ्लैट में काम करते-करते उन्हें नींद आ गई और अचानक उनकी आवाज़ पुकारते हुए सुनाई दी। लेकिन गुर्जिएफ़ वहाँ कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।

वास्तव में गुर्जिएफ़ की कार एक पेड़ से टकरा गई थी। संभवतः ख़राब स्टीयरिंग-व्यवस्था के कारण और जिस समय ओल्गा ने उनकी आवाज़ सुनी, उस समय वे बुरी तरह घायल होकर बेहोश पड़े थे।

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग पाँच: शायद कोई मंशा)

  भाग पाँच: शायद कोई मंशा By Simon Poe पुराने पुल की जगह पत्थर का एक नया पुल बना दिया गया है , लेकिन वह घटना भुलाई नहीं गई है। वह कहावतों ...