द प्रोफेट
जहाज़ का आगमन
अलमुस्तफ़ा,
चुना हुआ और प्रिय, जो अपने ही युग के लिए प्रभात के समान था, बारह वर्षों से नगर में उस जहाज़ की प्रतीक्षा कर रहा था,
जो लौटकर उसे उसकी जन्मभूमि के द्वीप पर वापस ले जाने वाला था।
और बारहवें वर्ष में, इएलूल महीने की सातवीं तारीख को जो फसल काटने का महीना था, वह नगर की चारदीवारी के बाहर स्थित पहाड़ी पर चढ़ गया और समुद्र की ओर
देखने लगा। तभी उसने धुंध के बीच अपने जहाज़ को आते हुए देखा।
तब उसके हृदय के द्वार पूरी तरह खुल गए और उसका आनंद दूर
समुद्र के पार तक उड़ गया। फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपनी आत्मा के मौन में
प्रार्थना की।
लेकिन जब वह पहाड़ी से नीचे उतरने लगा तो एक उदासी उस पर छा
गई और उसने अपने मन में सोचा, “मैं
शांति के साथ और बिना किसी दुख के कैसे जा सकूँगा? नहीं,
इस नगर को छोड़े बिना आत्मा में कोई घाव लिए जाना मेरे लिए संभव
नहीं होगा।”
लंबे थे वे दिन, जो मैंने इसकी दीवारों के भीतर पीड़ा में बिताए और लंबी थीं वे रातें,
जो मैंने अकेलेपन में काटीं और कौन अपने दुख और अपने अकेलेपन से
बिना किसी पछतावे के विदा हो सकता है?
इन गलियों में मैंने अपनी आत्मा के बहुत-से टुकड़े बिखेर
दिए हैं और इन पहाड़ियों के बीच मेरे बहुत-से आकांक्षाओं के बच्चे नंगे पाँव घूम
रहे हैं और मैं उन्हें अपने पीछे छोड़कर बिना किसी बोझ और टीस के नहीं जा सकता।
आज मैं कोई वस्त्र नहीं उतार रहा हूँ बल्कि अपनी ही त्वचा
को अपने हाथों से नोचकर अलग कर रहा हूँ।
और न ही मैं अपने पीछे कोई विचार छोड़ रहा हूँ बल्कि एक ऐसा
हृदय छोड़ रहा हूँ, जो भूख और
प्यास से मधुर हो गया है।
फिर भी, मैं
अब और ठहर नहीं सकता।
जो समुद्र सब वस्तुओं को अपनी ओर बुलाता है, वही मुझे भी बुला रहा है और मुझे उस पर
सवार होना ही होगा।
क्योंकि ठहर जाना, भले ही रात में घंटे जलते रहें, जम जाना, स्फटिक बन जाना और किसी साँचे में बँध जाना
है।
काश, जो कुछ
यहाँ है वह सब मैं अपने साथ ले जा सकता! लेकिन मैं ऐसा कैसे करूँ?
कोई आवाज़ उस जिह्वा और उन होंठों को अपने साथ नहीं ले जा
सकती जिन्होंने उसे पंख दिए थे। उसे अकेले ही आकाश में अपना मार्ग खोजना होगा।
और अकेला, अपने
घोंसले से विहीन, बाज़ सूर्य के आर-पार उड़ान भरेगा।
अब जब वह पहाड़ी की तलहटी तक पहुँच गया तो उसने फिर समुद्र
की ओर देखा और अपने जहाज़ को बंदरगाह की ओर आते हुए देखा। उसके अग्रभाग पर नाविक
खड़े थे। उसकी अपनी जन्मभूमि के लोग।
तब उसकी आत्मा उन्हें पुकार उठी और उसने कहा, “मेरी प्राचीन माता की संतानों, ज्वारों पर सवार होकर चलने वाले यात्रियो, कितनी ही
बार तुम मेरे स्वप्नों में समुद्र पार करते हुए आए हो। और अब तुम मेरे जागरण में
आए हो, जो कि मेरा और भी गहरा स्वप्न है।
मैं जाने के लिए तैयार हूँ और मेरी उत्कंठा पूर्णतः तने हुए
पालों के साथ हवा की प्रतीक्षा कर रही है।
इस शांत वायु में मैं केवल एक और साँस लूँगा, केवल एक बार और प्रेमभरी दृष्टि पीछे की ओर
डालूँगा, और फिर मैं तुम्हारे बीच खड़ा हो जाऊँगा... एक
नाविक, नाविकों के बीच।” और तुम, अथाह
समुद्र, निद्राहीन माता, जो अकेले ही
नदी और धारा के लिए शांति और स्वतंत्रता हो, यह धारा अभी
केवल एक और मोड़ लेगी,
इस उपवन में केवल एक और बार कल-कल ध्वनि करेगी और फिर मैं तुम्हारे
पास आ जाऊँगा। एक असीम महासागर में विलीन होने वाली असीम बूँद की तरह।
और चलते-चलते उसने दूर से देखा कि स्त्री-पुरुष अपने खेतों
और अंगूर की बाड़ियों को छोड़कर नगर के फाटकों की ओर जल्दी-जल्दी चले आ रहे हैं।
और उसने उनकी आवाज़ें सुनीं,
जो उसका नाम पुकार रही थीं। वे खेत-से-खेत एक-दूसरे को उसके जहाज़
के आने की खबर दे रहे थे।
और उसने अपने आप से कहा, “क्या बिछड़ने का दिन ही मिलन का दिन होगा?
और क्या यह कहा जाएगा कि मेरी शाम वास्तव में मेरी सुबह थी?
और मैं उसे क्या दूँ, जिसने अपनी हल की रेखा के बीचोंबीच अपना हल छोड़ दिया है या उसे क्या दूँ,
जिसने अपनी मदिरा-दबाने की चक्की को बीच में ही रोक दिया है?”
क्या मेरा हृदय फलों से लदे हुए ऐसे वृक्ष में बदल जाएगा कि
मैं उन फलों को तोड़कर उन्हें दे सकूँ?
और क्या मेरी इच्छाएँ किसी झरने की तरह बहेंगी कि मैं उनके
प्याले भर सकूँ?
क्या मैं एक वीणा हूँ, जिसे कोई शक्तिशाली हाथ छेड़ सकता है या एक बाँसुरी, जिसके भीतर से उसकी सांसें होकर गुजर सकती हैं?
मैं तो मौन का खोजी हूँ और मौन में मुझे ऐसा कौन-सा खज़ाना
मिला है, जिसे मैं विश्वासपूर्वक बाँट सकूँ?
यदि यह सचमुच मेरी फसल काटने का दिन है, तो मैंने बीज किन खेतों में बोए थे और किन
भूली-बिसरी ऋतुओं में?
यदि सचमुच यह वही घड़ी है,
जिसमें मैं अपनी लालटेन ऊपर उठाता हूँ, तो
उसमें जलने वाली लौ मेरी अपनी नहीं होगी।
मैं अपनी लालटेन को खाली और अँधेरी ही ऊपर उठाऊँगा और रात
का प्रहरी उसे तेल से भर देगा और वही उसमें प्रकाश भी जलाएगा।
उसने ये बातें शब्दों में कहीं। लेकिन उसके हृदय में बहुत
कुछ अनकहा रह गया क्योंकि वह स्वयं अपने गहरे रहस्य को शब्द नहीं दे सकता था।
और जब वह नगर में प्रवेश कर गया, तो सभी लोग उससे मिलने के लिए उमड़ पड़े और
मानो एक ही स्वर में उसे पुकारते हुए उसका स्वागत करने लगे।
और नगर के बुज़ुर्ग आगे आए और कहने लगे, “अभी हमें छोड़कर मत जाओ।
हमारे
धुंधलके जीवन में तुम दोपहर के सूर्य की तरह रहे हो और तुम्हारे यौवन ने हमें ऐसे
सपने दिए हैं, जिन्हें देखने का हमने
सपना सँजोया था।
तुम हमारे बीच कोई अजनबी नहीं हो न ही कोई अतिथि। तुम हमारे
पुत्र हो और हमारे अत्यंत प्रिय हो।
अभी हमारी आँखों को अपने चेहरे के लिए तरसने मत दो।”
और पुरोहितों और महिला पुरोहितों ने उससे कहा, “समुद्र की लहरों को अभी हमें तुमसे अलग न
करने दो और हमारे बीच बिताए हुए ये वर्ष केवल एक स्मृति बनकर न रह जाएँ।
तुम हमारे बीच एक आत्मा की तरह चलते रहे हो और तुम्हारी
छाया हमारे चेहरों पर प्रकाश बनकर पड़ी है।
हमने तुमसे बहुत प्रेम किया है। लेकिन हमारा प्रेम मूक था और
परदों से ढका हुआ था।
किन्तु अब वह तुम्हारे सामने ऊँचे स्वर में पुकार रहा है और
अपने को तुम्हारे सामने प्रकट करना चाहता है।
और सदा से ऐसा ही होता आया है कि प्रेम को अपनी गहराई का
पता तब तक नहीं चलता, जब तक
बिछड़ने की घड़ी नहीं आ जाती।”
और भी बहुत-से लोग आए और उससे रुकने की विनती करने लगे।
लेकिन उसने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। उसने केवल अपना सिर झुका लिया और जो लोग
उसके निकट खड़े थे, उन्होंने
देखा कि उसके आँसू उसके वक्ष पर गिर रहे थे।
और वह तथा नगर के लोग मंदिर के सामने स्थित विशाल चौक की ओर
बढ़ चले।
तभी मंदिर के गर्भगृह से एक स्त्री बाहर आई, जिसका नाम अलमित्रा था। वह एक द्रष्टा थी।
और उसने अत्यंत स्नेह और कोमलता से उसकी ओर देखा क्योंकि जब
वह इस नगर में केवल एक दिन रहा था, तभी सबसे पहले उसी ने उसे खोजा था और उस पर विश्वास किया था।
और उसने उसका अभिवादन करते हुए कहा, “हे ईश्वर के पैग़म्बर, परम सत्य की खोज में, तुमने बहुत लंबे समय तक
दूर-दूर तक अपने जहाज़ की प्रतीक्षा में दृष्टि दौड़ाई है।
और अब तुम्हारा जहाज़ आ गया है और तुम्हें जाना ही होगा।
तुम्हारी लालसा उस भूमि के लिए गहरी है, जहाँ तुम्हारी स्मृतियाँ बसी हैं और उस
निवास-स्थल के लिए भी, जहाँ तुम्हारी महान आकांक्षाएँ निवास
करती हैं और हमारा प्रेम तुम्हें बाँधना नहीं चाहेगा न हमारी आवश्यकताएँ तुम्हें
रोक पाएँगी।
फिर भी, हमारे
पास से जाने से पहले हम तुमसे केवल इतना चाहते हैं कि तुम हमसे कुछ कहो और हमें
अपने सत्य में से कुछ दो।
और हम उसे अपने बच्चों को देंगे और वे अपने बच्चों को और इस
तरह वह कभी नष्ट नहीं होगा।
अपने अकेलेपन में तुमने हमारे दिनों को हमारे साथ रहते हुए
देखा है और अपनी जाग्रत अवस्था में तुमने हमारी नींद के रोने और हँसने को सुना है।
अब इसलिए हमें स्वयं हमारे सामने प्रकट करो और हमें वह सब
बताओ, जो तुम्हें उस रहस्य के विषय में दिखाया
गया है, जो जन्म और मृत्यु के बीच स्थित है।”
और उसने उत्तर दिया, “हे ओरफलीज़ के लोगो, मैं उस चीज़ के सिवा और किसके
विषय में बोल सकता हूँ, जो अभी इसी क्षण तुम्हारी आत्माओं के
भीतर गतिमान है?”
****
प्रेम पर
तब अलमित्रा ने कहा, हमसे प्रेम के विषय में कहो।
और उसने अपना सिर उठाया और लोगों की ओर देखा और उन सब पर एक
गहरी निस्तब्धता छा गई। तब उसने गंभीर और ऊँचे स्वर में कहा, “जब प्रेम तुम्हें पुकारे तो उसका अनुसरण करो।
भले ही उसके मार्ग कठिन और खड़े चढ़ाव वाले हों।
और जब उसके पंख तुम्हें अपने भीतर समेट लें तो अपने को उसके
हवाले कर दो, भले ही उसके पंखों के
बीच छिपी तलवार तुम्हें घायल कर दे।
और जब वह तुमसे बोले तो उस पर विश्वास करो, भले ही उसकी आवाज़ तुम्हारे स्वप्नों को
उसी तरह चकनाचूर कर दे जैसे, उत्तर की हवा बाग़ को उजाड़ देती है।
क्योंकि जिस प्रकार प्रेम तुम्हारे सिर पर मुकुट रखता है, उसी प्रकार वह तुम्हें सूली पर भी चढ़ाएगा।
जिस प्रकार वह तुम्हारी वृद्धि के लिए है, उसी प्रकार
तुम्हारी छँटाई के लिए भी है।
जिस प्रकार वह तुम्हारी ऊँचाइयों तक उठता है और तुम्हारी उन
सबसे कोमल शाखाओं को सहलाता है, जो
धूप में काँपती हैं। उसी प्रकार वह तुम्हारी जड़ों तक उतर जाएगा और उन्हें धरती से
अपनी पकड़ में हिलाकर रख देगा।
मकई की बालियों के पूलों की तरह वह तुम्हें अपने भीतर समेट
लेता है।
वह तुम्हें दाँवता[1] है ताकि तुम्हें नग्न कर दे।
वह तुम्हें फटकता है ताकि तुम्हें तुम्हारी भूसी से मुक्त
कर दे।
वह तुम्हें पीसता है ताकि तुम उज्ज्वल और श्वेत हो जाओ।
वह तुम्हें तब तक गूँधता है,
जब तक तुम लचीले न हो जाओ।
और फिर वह तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि को सौंप देता है ताकि
तुम ईश्वर के पवित्र भोज के लिए पवित्र रोटी बन सको।
ये सब काम प्रेम तुम्हारे साथ करेगा ताकि तुम अपने हृदय के
रहस्यों को जान सको और उस ज्ञान में जीवन के हृदय का एक अंश बन सको।
लेकिन यदि अपने भय के कारण तुम केवल प्रेम की शांति और
प्रेम के सुख की खोज करना चाहो, तो
तुम्हारे लिए यही बेहतर है कि अपनी नग्नता को ढक लो और प्रेम के खलिहान से बाहर
निकल जाओ, उस ऋतुविहीन संसार में जहाँ तुम हँसोगे, लेकिन तुम्हारी सारी हँसी नहीं होगी और रोओगे, लेकिन
तुम्हारे सारे आँसू नहीं होंगे।
प्रेम कुछ नहीं देता, सिवाय अपने आप के और कुछ नहीं लेता, सिवाय अपने आप
से।
प्रेम किसी पर अधिकार नहीं रखता और न ही वह अपने ऊपर किसी
का अधिकार चाहता है क्योंकि प्रेम अपने लिए ही पर्याप्त है।
जब तुम प्रेम करो, तो यह मत कहो, ‘ईश्वर मेरे
हृदय में है’ बल्कि यह कहो, ‘मैं ईश्वर
के हृदय में हूँ।’
और यह मत सोचो कि तुम प्रेम की दिशा निर्धारित कर सकते हो क्योंकि
प्रेम, यदि वह तुम्हें योग्य पाता है, तुम्हारी दिशा स्वयं निर्धारित करता है।
प्रेम की कोई दूसरी इच्छा नहीं, सिवाय इसके कि वह स्वयं को पूर्ण करे।
लेकिन यदि तुम प्रेम करते हो और तुम्हारे भीतर इच्छाएँ होना
अनिवार्य है, तो तुम्हारी इच्छाएँ
ये हों:
पिघल जाना और बहती हुई उस धारा के समान हो जाना, जो रात के लिए अपना मधुर गीत गाती हुई बहती
है।
अत्यधिक कोमलता की पीड़ा को जानना।
प्रेम की अपनी ही समझ से घायल होना और स्वेच्छा से आनंदपूर्वक
रक्त बहाना।
भोर में पंख लगे हुए हृदय के साथ जागना और प्रेम करने के एक
और दिन के लिए कृतज्ञता प्रकट करना।
दोपहर के समय विश्राम करना और प्रेम के परमानंद पर ध्यान
करना।
शाम ढलते अपने घर लौटना और कृतज्ञता से भर जाना।
और फिर अपने हृदय में प्रिय के लिए प्रार्थना और अपने
होंठों पर स्तुति का गीत लिए सो जाना।
****
फिर अलमित्रा ने दोबारा बोलकर कहा, और विवाह के विषय में, मास्टर?
और उसने उत्तर दिया, तुम दोनों साथ-साथ जन्मे हो और
सदा-सर्वदा साथ रहोगे।
जब मृत्यु के श्वेत पंख तुम्हारे दिनों को बिखेर देंगे, तब भी तुम साथ रहोगे।
हाँ, तुम ईश्वर
की मौन स्मृति में भी साथ रहोगे।
लेकिन अपने साथ-साथ रहने में कुछ अंतराल रहने दो,
और स्वर्ग की हवाओं को अपने बीच नृत्य करने दो।
एक-दूसरे से प्रेम करो, लेकिन प्रेम का बंधन मत बनाओ।
बल्कि उसे अपनी आत्माओं के तटों के बीच बहता हुआ एक गतिमान
समुद्र बनने दो।
एक-दूसरे के प्याले भरो, लेकिन एक ही प्याले से मत पीओ।
एक-दूसरे को अपनी रोटी दो,
लेकिन एक ही रोटी में से मत खाओ।
साथ-साथ गाओ और नाचो और आनंदित रहो, लेकिन तुममें से प्रत्येक अपने भीतर अकेला
भी रहे,
ठीक वैसे ही जैसे वीणा के तार अलग-अलग होते हैं, यद्यपि वे एक ही संगीत से कंपन करते हैं।
अपने हृदय एक-दूसरे को दो,
लेकिन उन्हें एक-दूसरे की निगरानी या अधिकार में मत सौंपो।
क्योंकि केवल जीवन का हाथ ही तुम्हारे हृदयों को अपने भीतर
धारण कर सकता है।
और साथ-साथ खड़े रहो, फिर भी एक-दूसरे के बहुत निकट मत हो जाओ क्योंकि मंदिर के स्तंभ एक-दूसरे
से अलग खड़े होते हैं और बलूत (Oak) का
वृक्ष तथा सरू (Cypress) का वृक्ष
एक-दूसरे की छाया में नहीं उगते।
****
और एक स्त्री, जिसने एक शिशु को अपने वक्ष से लगा रखा था, बोली,
हमसे बच्चों के विषय में कहो।
और उसने कहा, तुम्हारे बच्चे तुम्हारे बच्चे नहीं हैं।
वे जीवन की अपनी ही आकांक्षा से जन्मे पुत्र और पुत्रियाँ
हैं।
वे तुम्हारे माध्यम से आते हैं, लेकिन तुमसे नहीं आते और यद्यपि वे
तुम्हारे साथ हैं, फिर भी वे तुम्हारे नहीं हैं।
तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो, लेकिन अपने विचार नहीं क्योंकि उनके अपने
विचार हैं।
तुम उनके शरीर को घर दे सकते हो, लेकिन उनकी आत्माओं को नहीं क्योंकि उनकी
आत्माएँ आने वाले कल के घर में रहती हैं, जहाँ तुम जा नहीं
सकते। अपने स्वप्नों में भी नहीं।
तुम उनके समान बनने का प्रयत्न कर सकते हो, लेकिन उन्हें अपने जैसा बनाने की कोशिश मत
करो क्योंकि जीवन पीछे की ओर नहीं चलता और न ही बीते हुए कल के साथ ठहरता है।
तुम वे धनुष हो, जिनसे तुम्हारे बच्चे जीवित तीरों की भाँति आगे भेजे जाते हैं।
तीरंदाज़ अनंत के पथ पर लक्ष्य को देखता है और वह अपनी
शक्ति से तुम्हें मोड़ता है ताकि उसके तीर तेज़ी से और बहुत दूर तक जा सकें।
तीरंदाज़ के हाथों तुम्हारा झुकना आनंद के लिए हो क्योंकि
जिस प्रकार वह उड़ते हुए तीर से प्रेम करता है, उसी प्रकार वह स्थिर धनुष से भी प्रेम करता है।
****
फिर एक धनी व्यक्ति ने कहा,
हमसे देने के विषय में कहो।
और उसने उत्तर दिया, जब तुम अपनी संपत्ति में से देते हो, तो बहुत थोड़ा देते हो।
वास्तव में तुम तब देते हो,
जब तुम अपने आप में से देते हो क्योंकि तुम्हारी संपत्तियाँ आखिर
हैं ही क्या, सिवाय उन वस्तुओं के जिन्हें तुम इस भय से
सँभालकर और सुरक्षित रखते हो कि कहीं कल उनकी आवश्यकता न पड़ जाए?
और कल उस अत्यधिक सावधान कुत्ते के लिए कल क्या लेकर आएगा, जो पवित्र नगर की ओर जाने वाले
तीर्थयात्रियों के पीछे-पीछे उस निर्जन रेत में अपनी हड्डियाँ गाड़ता चलता है?
और आवश्यकता का भय क्या है,
सिवाय स्वयं आवश्यकता के?
जब तुम्हारा कुआँ पूरा भरा हुआ हो, तब प्यास लगने का डर क्या उस प्यास के समान
नहीं है, जो कभी बुझ नहीं सकती?
कुछ लोग ऐसे हैं, जिनके पास बहुत कुछ है, फिर भी वे उसमें से थोड़ा ही
देते हैं और वे उसे प्रतिष्ठा पाने के लिए देते हैं। उनकी छिपी हुई इच्छा उनके दान
को दूषित कर देती है।
और कुछ ऐसे हैं, जिनके पास बहुत थोड़ा है और वे सब कुछ दे देते हैं।
ये जीवन और जीवन की उदारता में विश्वास रखने वाले लोग हैं और
उनका भंडार कभी खाली नहीं होता।
कुछ लोग प्रसन्नता के साथ देते हैं और वही प्रसन्नता उनका
पुरस्कार होती है।
और कुछ लोग पीड़ा के साथ देते हैं और वही पीड़ा उनका
बपतिस्मा होती है।
और कुछ ऐसे हैं जो देते हैं और देने में न तो पीड़ा जानते
हैं, न आनंद की तलाश करते हैं, न ही सद्गुण का ध्यान रखते हुए देते हैं।
वे वैसे ही देते हैं जैसे, उस दूर की घाटी में मर्टल[2] का पौधा अपने सुगंधित श्वास को
आकाश में बिखेरता है।
ऐसे ही लोगों के हाथों से ईश्वर बोलता है और उनकी आँखों के
पीछे से वह धरती पर मुसकुराता है।
माँगे जाने पर देना अच्छा है,
लेकिन समझ-बूझकर बिना माँगे देना उससे भी अच्छा है।
और उदार-हृदय व्यक्ति के लिए ऐसे व्यक्ति की खोज करना जो
उसके दान को ग्रहण करे, देने से
भी बड़ा आनंद है।
और क्या ऐसी कोई वस्तु है जिसे तुम अपने पास रोककर रखना
चाहते हो?
तुम्हारे पास जो कुछ भी है,
वह किसी न किसी दिन दे दिया जाएगा।
इसलिए अभी दे दो ताकि देने का मौसम तुम्हारा हो, तुम्हारे उत्तराधिकारियों का नहीं।
तुम अक्सर कहते हो, “मैं देना चाहता हूँ, लेकिन केवल उसी को जो इसके
योग्य हो।”
तुम्हारे बाग़ के वृक्ष ऐसा नहीं कहते न तुम्हारे चरागाह के
झुंड।
वे इसलिए देते हैं कि जीवित रह सकें क्योंकि रोककर रखना
नष्ट हो जाना है।
निश्चय ही जो अपने दिन और अपनी रातें पाने के योग्य है, वह तुम्हारी ओर से और सब कुछ पाने के योग्य
भी है।
और जिसने जीवन के महासागर से पीने का अधिकार पाया है, वह तुम्हारी छोटी-सी धारा से अपना प्याला
भरने का भी अधिकारी है।
और इससे बड़ा कौन-सा मरुस्थल होगा, जो ग्रहण करने के साहस और विश्वास नहीं बल्कि
उदारता में स्थित हो?
और तुम कौन होते हो कि लोग अपना सीना चीरकर और अपने गर्व का
आवरण हटाकर तुम्हें अपनी योग्यता को नग्न और अपने अभिमान को बिना किसी संकोच के
दिखाएँ?
पहले यह सुनिश्चित करो कि तुम स्वयं देने के योग्य हो और
देने के माध्यम बनने के योग्य हो क्योंकि वास्तव में जीवन ही जीवन को देता है और
तुम, जो अपने को दाता समझते हो केवल एक साक्षी
हो।
और तुम, जो
ग्रहण करते हो और तुम सभी ग्रहण करने वाले हो कृतज्ञता का कोई भारी बोझ अपने ऊपर
मत लो, कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने ऊपर और देने वाले के ऊपर
भी एक जुआ रख दो।
इसके बजाय, दाता
के साथ उसके उपहारों पर ऐसे उठो जैसे पंखों पर उठते हो क्योंकि अपने ऋण के प्रति
अत्यधिक सचेत रहना उस उदारता पर संदेह करना है, जिसकी माता
मुक्तहृदया धरती है और पिता ईश्वर।
****
तब एक वृद्ध व्यक्ति, जो एक सराय का रखवाला था बोला, “हमसे खाने और पीने
के विषय में कहो।”
और उसने कहा, काश, तुम धरती की सुगंध पर ही जीवित रह सकते और किसी वायवीय पौधे[3] की तरह केवल प्रकाश से पोषित
हो सकते।
लेकिन चूँकि भोजन के लिए तुम्हें प्राण लेने पड़ते हैं और
अपनी प्यास बुझाने के लिए नवजात को उसकी माँ के दूध से वंचित करना पड़ता है इसलिए
इसे एक उपासना का कर्म बना दो।
और तुम्हारी भोजन-मेज़ एक ऐसी वेदी बन जाए, जिस पर वन और मैदान के पवित्र और निष्कलंक
प्राणियों की बलि उस मनुष्य के लिए दी जाए, जो उनसे भी अधिक
पवित्र और अधिक निष्कलंक है।
जब तुम किसी पशु का वध करो,
तो अपने मन में उससे कहना, “जिस शक्ति के
द्वारा तुम्हारा वध होता है, उसी शक्ति के द्वारा मेरा भी वध
होता है और मुझे भी भक्षण किया जाएगा।
क्योंकि जिस विधान ने तुम्हें मेरे हाथों में सौंपा है, वही मुझे भी किसी अधिक शक्तिशाली हाथ में
सौंप देगा।
तुम्हारा रक्त और मेरा रक्त कुछ और नहीं बल्कि उस स्वर्गीय
वृक्ष को पोषण देने वाला रस है।”
और जब तुम अपने दाँतों से किसी सेब को काटो, तो अपने मन में उससे कहना, “तुम्हारे बीज मेरे शरीर में जीवित रहेंगे और तुम्हारे आने वाले कल की
कलियाँ मेरे हृदय में खिलेंगी और तुम्हारी सुगंध मेरी साँस बन जाएगी और हम दोनों
सभी ऋतुओं में साथ-साथ आनंदित होंगे।”
और पतझड़ में, जब तुम अपनी अंगूर की बाड़ियों के अंगूरों को मदिरा निकालने के लिए इकट्ठा
करो, तो अपने मन में कहना, “मैं भी एक
अंगूर की बाड़ी हूँ और मेरे फलों को भी मदिरा निकालने के लिए एकत्र किया जाएगा और
नवीन मदिरा की तरह मुझे अनंत पात्रों में सुरक्षित रखा जाएगा।”
और सर्दियों में, जब तुम मदिरा निकालो, तो तुम्हारे हृदय में प्रत्येक
प्याले के लिए एक गीत हो और उस गीत में पतझड़ के दिनों, अंगूर
की बाड़ी और मदिरा निकालने के उस स्थान की स्मृति भी हो।
****
तब एक किसान ने कहा, हमसे काम के विषय में कहो।
और उसने उत्तर दिया, तुम काम करते हो ताकि धरती और धरती की
आत्मा के साथ कदम मिलाकर चल सको।
क्योंकि निष्क्रिय पड़े रहना ऋतुओं के लिए पराया हो जाना है
और जीवन के उस जुलूस से बाहर निकल जाना है, जो भव्यता और गर्वपूर्ण समर्पण के साथ अनंत की ओर बढ़ता चला जाता है।
जब तुम काम करते हो तो तुम एक ऐसी बाँसुरी होते हो, जिसके हृदय से घंटों की फुसफुसाहट संगीत
में बदल जाती है।
तुममें से कौन ऐसा सरकंडा बनना चाहेगा, जो मूक और निःशब्द हो जबकि बाकी सब मिलकर
एक स्वर में गा रहे हों?
तुमसे हमेशा कहा गया है कि काम एक अभिशाप है और श्रम एक
दुर्भाग्य।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तुम काम करते हो, तब तुम धरती के उस दूरतम स्वप्न का एक अंश
पूरा करते हो, जो उस स्वप्न के जन्म के समय तुम्हें सौंपा
गया था और श्रम के द्वारा स्वयं को उस स्वप्न के साथ बनाए रखते हुए, वास्तव में तुम जीवन से प्रेम कर रहे होते हो।
और श्रम के माध्यम से जीवन से प्रेम करना, जीवन के अंतरतम रहस्य के साथ अंतरंग होना
है।
लेकिन यदि अपनी पीड़ा में तुम जन्म को एक विपत्ति और शरीर
के भरण-पोषण को अपने माथे पर लिखा हुआ अभिशाप कहते हो, तो मैं तुम्हें उत्तर देता हूँ कि तुम्हारे
माथे पर जो कुछ लिखा है, उसे तुम्हारे माथे का पसीना ही धो
सकता है।
तुमसे यह भी कहा गया है कि जीवन अंधकार है और अपनी थकान में
तुम थके हुए लोगों की कही हुई बात को ही दोहराते हो।
लेकिन मैं कहता हूँ कि जीवन सचमुच अंधकार है, जब तक उसमें कोई प्रेरणा नहीं होती और हर
प्रेरणा अंधी है, जब तक उसमें ज्ञान नहीं होता और सारा ज्ञान
व्यर्थ है, जब तक उसमें काम नहीं होता और सारा काम खोखला है,
जब तक उसमें प्रेम नहीं होता।
और जब तुम प्रेम से काम करते हो, तब तुम स्वयं को अपने आप से, एक-दूसरे से और ईश्वर से जोड़ते हो।
और प्रेम से काम करना क्या है?
यह अपने हृदय से निकाले गए धागों से वस्त्र बुनना है, मानो तुम्हारा प्रिय उस वस्त्र को पहनने
वाला हो।
यह स्नेह से घर बनाना है,
मानो तुम्हारा प्रिय उस घर में रहने वाला हो।
यह कोमलता से बीज बोना और आनंद के साथ फसल काटना है, मानो तुम्हारा प्रिय उस फल को खाने वाला
हो।
यह तुम्हारे द्वारा बनाई गई हर वस्तु में अपनी आत्मा की एक
साँस भर देना है और यह जानना है कि सभी धन्य मृतक तुम्हारे चारों ओर खड़े हैं और
देख रहे हैं।
मैंने अक्सर तुम्हें यह कहते सुना है, मानो नींद में बोल रहे हो, “जो संगमरमर पर
काम करता है और उस पत्थर में अपनी ही आत्मा का आकार खोज लेता है, वह उससे अधिक श्रेष्ठ है जो मिट्टी को जोतता है।
और जो व्यक्ति इंद्रधनुष को पकड़कर उसे वस्त्र पर मनुष्य के
आकार में उतार देता है, वह उससे
महान है जो हमारे पैरों के लिए चप्पल बनाता है।”
लेकिन मैं तुमसे यह बात नींद में नहीं बल्कि दोपहर की पूर्ण
जागृति में कहता हूँ कि हवा विशाल ओक (oaks) से जितनी मधुरता से बोलती है, उतनी ही मधुरता से
घास की सबसे छोटी पत्ती से भी बोलती है।
और वही मनुष्य सचमुच महान है,
जो हवा की आवाज़ को अपने प्रेम से और भी मधुर बना दिए गए गीत में
बदल देता है।
काम, प्रेम का
साकार रूप है।
और यदि तुम प्रेम से काम नहीं कर सकते बल्कि केवल अरुचि के
साथ काम करते हो, तो बेहतर
है कि तुम अपना काम छोड़ दो और मंदिर के द्वार पर बैठ जाओ और उन लोगों से भिक्षा
लो, जो आनंद के साथ काम करते हैं।
क्योंकि यदि तुम उदासीनता के साथ रोटी पकाते हो तो तुम ऐसी
कड़वी रोटी पकाते हो, जो मनुष्य
की भूख का केवल आधा ही मिटाती है।
और यदि तुम्हें अंगूरों को कुचलना अखरता है, तो तुम्हारी वह अरुचि मदिरा में विष घोल
देती है।
और यदि तुम स्वर्गदूतों के समान गाओ, फिर भी तुम्हें गाने से प्रेम न हो,
तो तुम मनुष्य के कानों को दिन के स्वरों और संसार की आवाज़ों के
प्रति बहरा कर देते हो।
****
तब एक स्त्री ने कहा, हमसे आनंद और दुख के विषय में कहो।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारा आनंद तुम्हारा ही दुख है, जो अपना मुखौटा उतार चुका है।
और जिस स्रोत से तुम्हारी हँसी फूटती है, वही स्रोत अक्सर तुम्हारे आँसुओं से भरा
रहा है।
और ऐसा और कैसे हो सकता है?
तुम्हारे अस्तित्व में दुख जितनी गहरी लकीरें खींचता है, तुम उतना ही अधिक आनंद अपने भीतर समा सकते
हो।
क्या वह प्याला, जिसमें तुम्हारी मदिरा भरी जाती है वही प्याला नहीं है जिसे कुम्हार की
भट्ठी में पकाया गया था?
और क्या वह वीणा, जो तुम्हारी आत्मा को शांत करती है वही लकड़ी नहीं है जिसे चाकुओं से
खोखला किया गया था?
जब तुम आनंदित हो, तो अपने हृदय की गहराई में देखो और तुम पाओगे कि वही दुख, जिसने तुम्हें कभी पीड़ा दी थी, अब तुम्हें आनंद दे
रहा है।
जब तुम दुखी हो, तो फिर अपने हृदय में देखो और तुम देखोगे कि वास्तव में तुम उसी चीज़ के
लिए रो रहे हो, जो कभी तुम्हारा आनंद थी।
तुममें से कुछ कहते हैं, ‘आनंद दुख से बड़ा है’ और दूसरे कहते हैं, ‘नहीं, दुख ही बड़ा है।’
लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ,
वे एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
वे साथ-साथ आते हैं और जब उनमें से एक तुम्हारी मेज़ पर
तुम्हारे साथ अकेला बैठा हो, तो
याद रखना कि दूसरा तुम्हारे बिस्तर पर सो रहा है।
निश्चय ही तुम अपने दुख और अपने आनंद के बीच एक तराज़ू की
तरह झूलते रहते हो।
तुम तभी स्थिर और संतुलित होते हो, जब तुम्हारे भीतर कुछ भी शेष नहीं रहता।
जब खज़ाने का रखवाला तुम्हें अपना सोना और चाँदी तौलने के
लिए उठाता है, तो तुम्हारा आनंद या
तो ऊपर उठेगा या दुख नीचे उतर जाएगा।”
****
तब एक राजमिस्त्री आगे आया और बोला, “हमसे घरों के विषय में कहो।”
और उसने उत्तर दिया, “नगर की चारदीवारी के भीतर घर बनाने से पहले, अपनी
कल्पनाओं से वन-प्रदेश में एक कुंज बना लो क्योंकि जिस प्रकार तुम्हारे भीतर शाम के
समय घर लौटने की आकांक्षा होती है, उसी प्रकार तुम्हारे भीतर
एक ऐसा यात्री भी है, जो सदा दूर और अकेला रहता है।
तुम्हारा घर तुम्हारा विस्तृत शरीर है।
वह सूर्य के प्रकाश में बढ़ता है और रात की निस्तब्धता में
सोता है और वह स्वप्नविहीन नहीं है। क्या तुम्हारा घर भी स्वप्न नहीं देखता और
स्वप्न देखते हुए क्या वह नगर को छोड़कर किसी उपवन या पहाड़ी की चोटी पर नहीं चला
जाता?
काश, मैं
तुम्हारे घरों को अपनी मुट्ठी में समेट पाता और किसी बीज बोने वाले की तरह उन्हें
जंगलों और घास के मैदानों में बिखेर देता।
काश, घाटियाँ
तुम्हारी गलियाँ होतीं और हरे-भरे पथ तुम्हारी सँकरी गलियाँ ताकि तुम अंगूर की
बाड़ियों के बीच एक-दूसरे को खोजते हुए चलो और अपने वस्त्रों में धरती की सुगंध
लेकर लौटो।
लेकिन अभी ऐसा होना शेष है।
तुम्हारे पूर्वजों ने भय के कारण तुम्हें एक-दूसरे के बहुत
पास-पास बसा दिया था और वह भय अभी कुछ समय और बना रहेगा। कुछ समय और तुम्हारे नगर
की दीवारें तुम्हारे चूल्हों को तुम्हारे खेतों से अलग रखेंगी।
और मुझे बताओ, हे ऑर्फ़लीज़ के लोगो, इन घरों में तुम्हारे पास
क्या है और बंद दरवाज़ों के पीछे तुम किस चीज़ की रक्षा करते हो?
क्या तुम्हारे पास शांति है... वह शांत प्रेरणा, जो तुम्हारी शक्ति को प्रकट करती है?
क्या तुम्हारे पास स्मृतियाँ हैं... वे झिलमिलाते मेहराब, जो मन के शिखरों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं?
क्या तुम्हारे पास सौंदर्य है... वह जो हृदय को लकड़ी और
पत्थर से बनी वस्तुओं से उठाकर पवित्र पर्वत की ओर ले जाता है?
मुझे बताओ, क्या
ये सब तुम्हारे घरों में हैं?
या तुम्हारे पास केवल सुख-सुविधा है और सुख-सुविधा की लालसा...
वह छिपकर आने वाली चीज़, जो पहले
घर में अतिथि बनकर प्रवेश करती है, फिर स्वामिनी बन जाती है
और अंततः मालिक?
हाँ और वह तुम्हारी इच्छाओं की प्रशिक्षक बन जाती है और
काँटे और कोड़े से तुम्हारी महान आकांक्षाओं को कठपुतलियों में बदल देती है।
उसके हाथ रेशम जैसे कोमल हैं,
लेकिन उसका हृदय लोहे का है।
वह तुम्हें केवल इसलिए सुलाती है कि तुम्हारे बिस्तर के पास
खड़ी होकर देह की गरिमा का उपहास कर सके।
वह तुम्हारी स्वस्थ इंद्रियों का मज़ाक उड़ाती है और उन्हें
नाज़ुक पात्रों की तरह थीस्ल[4] की रूई पर लिटा देती है।
निश्चय ही, सुख-सुविधा
की लालसा आत्मा के आवेग को मार डालती है और फिर अंतिम संस्कार में दांत निपोरती (मुस्कराती)
हुई चलती है।
लेकिन तुम, आकाश
के विस्तार की संतानों, विश्राम में भी बेचैन रहने वालों,
तुम न तो फँसाए जाओगे और न वश में किए जाओगे।
तुम्हारा घर लंगर नहीं बल्कि मस्तूल होगा।
वह किसी घाव को ढकने वाली चमकीली झिल्ली नहीं बल्कि आँख की
रक्षा करने वाली पलक होगी।
तुम अपने पंखों को इसलिए नहीं समेटोगे कि दरवाज़ों से होकर
निकल सको न अपने सिर इसलिए झुकाओगे कि वे छत से न टकराएँ और न साँस लेने से डरोगे
कि कहीं दीवारें दरककर गिर न पड़ें।
तुम उन कब्रों में निवास नहीं करोगे, जिन्हें मृतकों ने जीवितों के लिए बनाया
है।
और तुम्हारा घर चाहे कितना ही भव्य और वैभवशाली क्यों न हो, वह तुम्हारे रहस्य को अपने भीतर बंद नहीं
रखेगा और न तुम्हारी लालसा को आश्रय देगा।
क्योंकि तुम्हारे भीतर जो असीम है, वह आकाश के उस महल में निवास करता है,
जिसका द्वार प्रातःकाल की धुंध है और जिसकी खिड़कियाँ रात के गीत और
मौन हैं।
****
और बुनकर ने कहा, हमसे वस्त्रों के विषय में कहो।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारे वस्त्र तुम्हारे सौंदर्य को
बहुत कुछ ढक देते हैं, फिर भी वे
तुम्हारे असुंदर को नहीं छिपाते।
और यद्यपि तुम वस्त्रों में एकांत की स्वतंत्रता खोजते हो, फिर भी उनमें तुम्हें एक बंधन और एक जंजीर
मिल सकती है।
काश, तुम अपने
शरीर पर कम वस्त्र और अधिक त्वचा के साथ सूर्य और हवा का सामना कर पाते क्योंकि
जीवन की साँस सूर्य के प्रकाश में है और जीवन का हाथ हवा में है।
तुममें से कुछ कहते हैं, “उत्तर की हवा ने ही वे वस्त्र बुने हैं, जिन्हें हम
पहनते हैं।”
और मैं कहता हूँ, हाँ... उत्तर की हवा ही थी,
लेकिन लज्जा उसकी करघा थी और नसों को कोमल बनाने वाली
प्रवृत्ति उसका धागा।
और जब उसका काम पूरा हुआ,
तो वह जंगल में हँसी।
यह मत भूलो कि शालीनता अशुद्ध दृष्टि से बचाने वाली ढाल है।
और जब अशुद्धता संसार में नहीं रहेगी, तब शालीनता और क्या होगी, सिवाय एक बेड़ी और मन को मलिन करने वाली वस्तु के?
और यह मत भूलो कि धरती तुम्हारे नंगे पैरों का स्पर्श पाकर
आनंदित होती है और हवाएँ तुम्हारे बालों से खेलने के लिए तरसती हैं।
****
और एक व्यापारी ने कहा, हमसे क्रय-विक्रय के विषय में कहो।
और उसने उत्तर दिया और कहा, धरती तुम्हें अपने फल देती है और
यदि तुम केवल यह जान लो कि अपने हाथों को कैसे भरना है, तो तुम्हें किसी वस्तु का अभाव न होगा।
धरती के उपहारों का परस्पर आदान-प्रदान करने में ही तुम
प्रचुरता पाओगे और संतुष्ट होगे।
किन्तु यदि वह आदान-प्रदान प्रेम और सौम्य न्याय के साथ न
हो, तो वह कुछ लोगों को लोभ की ओर और दूसरों को
भूख की ओर ही ले जाएगा।
जब बाजार में समुद्र, खेतों और अंगूर के बागों में काम करने वाले तुम लोग बुनकरों, कुम्हारों और मसालों के संग्रहकर्ताओं से मिलो, तब पृथ्वी की उस महान
आत्मा का आह्वान करना, जो तुम्हारे बीच आए और उन तराजुओं तथा
हिसाब-किताब को पवित्र करे, जिनमें एक वस्तु के मूल्य को
दूसरी वस्तु के मूल्य के विरुद्ध तौला जाता है।
और उन खाली हाथों वालों को अपने लेन-देन में भाग लेने मत
देना, जो तुम्हारे श्रम के बदले तुम्हें केवल
अपने शब्द बेचते हैं।
ऐसे लोगों से तुम्हें कहना चाहिए, “हमारे साथ खेत में
आओ या हमारे भाइयों के साथ समुद्र पर जाओ और अपना जाल डालो क्योंकि भूमि और समुद्र
तुम्हारे लिए भी उतने ही उदार होंगे, जितने हमारे लिए।
और यदि गायक और नर्तक तथा बाँसुरी बजाने वाले आएँ तो उनके
उपहार भी खरीदना क्योंकि वे भी फल और सुगंधित धूप के संग्रहकर्ता हैं और जो कुछ वे
लाते हैं, यद्यपि वह स्वप्नों से गढ़ा हुआ होता है,
फिर भी वह तुम्हारी आत्मा के लिए वस्त्र और भोजन है।
और बाजार से विदा होने से पहले यह देख लेना कि कोई भी
व्यक्ति खाली हाथ अपने मार्ग पर न चला गया हो क्योंकि पृथ्वी की वह महान आत्मा तब
तक हवा पर शांतिपूर्वक नहीं सोएगी, जब तक तुममें से सबसे छोटे की आवश्यकताएँ भी पूरी न हो जाएँ।
****
अपराध और दंड पर
और तब नगर के न्यायाधीशों में से एक आगे आया और उसने कहा, हमसे अपराध और दंड के विषय में कहो।
और उसने उत्तर देते हुए कहा,
जब तुम्हारी आत्मा हवा पर भटकने लगती है, तभी
तुम अकेले और असावधान होकर दूसरों के प्रति और इसलिए अपने ही प्रति भी कोई अपराध
कर बैठते हो।
और उस किए हुए अपराध के कारण तुम्हें धन्य लोगों के द्वार
पर जाकर कुछ समय तक अनसुने खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
तुम्हारा ईश्वर-स्वरूप समुद्र के समान है. वह सदा निष्कलंक रहता है।
और आकाशीय आकाश (ether) के समान वह केवल पंखों वाले को ही ऊपर उठाता है।
तुम्हारा ईश्वर-स्वरूप सूर्य के समान भी है। वह छछूँदर के मार्गों को नहीं जानता, न ही साँप के बिलों को खोजता है।
किन्तु तुम्हारा ईश्वर-स्वरूप तुम्हारे भीतर अकेला नहीं
रहता।
तुममें बहुत कुछ अभी मनुष्य है और बहुत कुछ ऐसा है जो अभी
मनुष्य बना ही नहीं है,
बल्कि एक निराकार बौना-सा प्राणी है, जो धुंध में सोते हुए चलता है और अपनी ही
जागृति की खोज करता है।
और मैं अब तुम्हारे भीतर के उस मनुष्य के विषय में बोलूँगा।
क्योंकि अपराध और अपराध के दंड को वही जानता है। न तुम्हारा
ईश्वर-स्वरूप, न धुंध में भटकता वह
बौना।
मैंने अक्सर तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में बोलते
सुना है जो कोई अपराध करता है, मानो
वह तुममें से एक न हो, मानो वह तुम्हारे लिए कोई अजनबी और
तुम्हारी दुनिया में कोई घुसपैठिया हो।
किन्तु मैं कहता हूँ कि जिस प्रकार पवित्र और धर्मी व्यक्ति
तुममें से प्रत्येक के भीतर जो सर्वोच्च है, उससे ऊपर नहीं उठ सकता, उसी प्रकार दुष्ट और दुर्बल व्यक्ति भी उस निम्नतम
से नीचे नहीं गिर सकता, जो तुममें भी विद्यमान है।
और जिस प्रकार एक अकेला पत्ता पूरे वृक्ष की मौन चेतना के
बिना पीला नहीं पड़ता, उसी
प्रकार तुम्हारी सबकी छिपी हुई इच्छा के बिना कोई अपराधी अपराध नहीं कर सकता।
तुम एक जुलूस की भाँति अपने ईश्वर-स्वरूप की ओर साथ-साथ
बढ़ते हो।
तुम ही मार्ग हो और तुम ही पथिक हो।
और जब तुममें से कोई गिरता है तो वह अपने पीछे आने वालों के
लिए गिरता है... ठोकर के पत्थर से सावधान करने के लिए।
हाँ और वह उन लोगों के लिए भी गिरता है जो उसके आगे हैं। वे
भले ही उससे अधिक तेज और अधिक निश्चित पगों वाले हों, फिर भी उन्होंने उस ठोकर के पत्थर को हटाया
नहीं।
और यह भी यद्यपि यह बात तुम्हारे हृदय पर भारी पड़ेगी जिसकी
हत्या की गई है, वह अपनी ही हत्या के
लिए पूरी तरह उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं है और जिसे लूटा गया है, वह लूटे जाने में पूर्णतः निर्दोष नहीं है।
धर्मी व्यक्ति भी दुष्टों के कर्मों से निर्दोष नहीं है और
जिसके हाथ स्वच्छ हैं, वह अपराधी
के कर्मों से पूरी तरह अछूता नहीं है।
हाँ, अपराधी
अक्सर उस व्यक्ति का शिकार होता है, जिसे उसने चोट पहुँचाई
है और उससे भी अधिक बार वह व्यक्ति, जिसे दोषी ठहराया गया है,
उस व्यक्ति के अपराध का भार उठाने वाला होता है जो निर्दोष और
दोषरहित है।
तुम न्यायी और अन्यायी को,
अच्छे और दुष्ट को अलग नहीं कर सकते क्योंकि वे सूर्य के सम्मुख उसी
प्रकार साथ खड़े होते हैं, जैसे काला धागा और सफेद धागा एक
ही वस्त्र में बुने जाते हैं।
और जब काला धागा टूट जाता है,
तो बुनकर पूरे वस्त्र को देखेगा और वह करघे की भी जाँच करेगा।
यदि
तुममें से कोई विश्वासघाती पत्नी को न्याय के कटघरे में लाना चाहे तो उसे उसके पति
के हृदय को भी तराजू पर तौलना चाहिए और उसकी आत्मा को भी मापना चाहिए।
और जो अपराधी को कोड़े मारना चाहे, उसे उस व्यक्ति की आत्मा की ओर भी देखना
चाहिए, जिसके साथ अपराध हुआ है।
और यदि तुममें से कोई धर्म के नाम पर दंड देना चाहे और
बुराई के वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाए तो उसे उसकी जड़ों पर भी दृष्टि डालनी चाहिए और
निश्चय ही वह पाएगा कि अच्छे और बुरे, फलदायी और फलहीन, सभी की जड़ें पृथ्वी के मौन हृदय में एक-दूसरे से उलझी
हुई हैं।
और तुम न्यायाधीशों, जो न्याय करना चाहते हो,
तुम उस व्यक्ति के लिए क्या निर्णय सुनाओगे जो शरीर से
ईमानदार है, फिर भी आत्मा से चोर
है?
तुम उस व्यक्ति को क्या दंड दोगे जो शरीर से हत्या करता है, फिर भी आत्मा में स्वयं मारा जा चुका है?
और तुम उस व्यक्ति पर कैसे अभियोग चलाओगे जो अपने कर्मों
में छल करने वाला और अत्याचारी है,
फिर
भी स्वयं भी पीड़ित और आहत है?
और तुम उन लोगों को कैसे दंड दोगे जिनका पश्चात्ताप उनके
दुष्कर्मों से पहले ही अधिक बड़ा हो चुका है?
क्या पश्चात्ताप वही न्याय नहीं है, जिसे उसी विधान द्वारा कार्यान्वित किया
जाता है, जिसकी सेवा करने के लिए तुम इतने उत्सुक हो?
फिर भी तुम निर्दोष पर पश्चात्ताप नहीं लाद सकते और न ही
दोषी के हृदय से उसे उठा सकते हो।
वह बिना बुलाए रात में आएगा ताकि मनुष्य जाग उठें और स्वयं
अपने भीतर झाँकें।
और तुम जो न्याय को समझना चाहते हो, जब तक तुम सभी कर्मों को पूर्ण प्रकाश में
नहीं देखोगे, तब तक उसे कैसे समझ पाओगे?
तभी तुम जानोगे कि सीधा खड़ा मनुष्य और गिरा हुआ मनुष्य
वास्तव में एक ही मनुष्य हैं, जो सांझ के धुँधलके में अपने बौने-स्वरूप की रात और
अपने ईश्वर-स्वरूप के दिन के बीच खड़ा है।
और मंदिर की आधारशिला उसकी नींव में रखे सबसे निचले पत्थर
से ऊँची नहीं होती।
****
फिर एक वकील ने कहा, लेकिन हमारे कानूनों का क्या, मास्टर?
और उन्होंने उत्तर दिया, तुम्हें कानून बनाना अच्छा लगता है, लेकिन उन्हें तोड़ना उससे भी अधिक अच्छा
लगता है। ठीक वैसे ही जैसे समुद्र के किनारे खेलते बच्चे निरंतर रेत के महल बनाते
हैं और फिर हँसते हुए उन्हें ढहा देते हैं।
लेकिन जब तुम अपने रेत के महल बनाते हो, तब समुद्र और रेत किनारे पर ले आता है और
जब तुम उन्हें ढहा देते हो, तब समुद्र तुम्हारे साथ हँसता
है।
निश्चय ही, समुद्र
सदा निर्दोषों के साथ हँसता है।
लेकिन उनका क्या, जिनके लिए जीवन समुद्र नहीं है और मनुष्यों द्वारा बनाए गए कानून रेत के
महल नहीं हैं बल्कि जिनके लिए जीवन एक चट्टान है और कानून वह छेनी है, जिससे वे उसे अपने ही स्वरूप में तराशना चाहते हैं?
उस अपंग का क्या, जो नर्तकों से घृणा करता है?
उस बैल का क्या, जो अपने जुए से प्रेम करता है और जंगल के बारहसिंगों और हिरनों को भटके
हुए और आवारा जीव समझता है?
उस बूढ़े साँप का क्या, जो अपनी केंचुली नहीं उतार सकता और दूसरों को नग्न और निर्लज्ज कहता है?
और उसका क्या, जो विवाह-भोज में बहुत पहले आ पहुँचता है और पेट भर जाने तथा थक जाने के
बाद यह कहते हुए चला जाता है कि सभी भोज नियमों का उल्लंघन हैं और सभी भोज में
शामिल होने वाले कानून-तोड़ने वाले हैं?
इनके बारे में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि वे भी सूर्य के
प्रकाश में खड़े हैं, लेकिन
उनकी पीठ सूर्य की ओर है।
वे केवल अपनी परछाइयाँ देखते हैं और उनकी परछाइयाँ ही उनके
कानून हैं।
और उनके लिए सूर्य क्या है,
सिवाय परछाइयाँ डालने वाले के?
और कानूनों को मान्यता देना क्या है, सिवाय इसके कि झुककर धरती पर उनकी परछाइयों
की रूपरेखा खींची जाए?
लेकिन तुम, जो
सूर्य की ओर मुख करके चलते हो, धरती पर खींचे गए कौन-से चित्र तुम्हें बाँध सकते
हैं?
तुम, जो हवा के
साथ यात्रा करते हो, कौन-सा दिशासूचक तुम्हारी दिशा तय कर सकता है?
कौन-सा मनुष्य का कानून तुम्हें बाँध सकता है यदि तुम अपना
जुआ केवल इस तरह तोड़ते हो कि किसी मनुष्य के कारागार का द्वार नहीं तोड़ते?
तुम किन कानूनों से डरोगे यदि तुम नाचते हो, लेकिन किसी मनुष्य की लोहे की जंजीरों से
टकराकर ठोकर नहीं खाते?
और वह कौन है जो तुम्हें न्याय के कटघरे में ला सकता है यदि
तुम अपना वस्त्र उतार फेंकते हो, लेकिन
उसे किसी मनुष्य के मार्ग में नहीं छोड़ते?
ऑर्फ़लीज़ के लोगो, तुम ढोल को दबाकर उसकी आवाज़ रोक सकते हो, तुम वीणा
के तार ढीले कर सकते हो, लेकिन आकाश में गाने वाली चिड़िया स्काईलार्क
को गाने से कौन रोक सकता है?
****
स्वतंत्रता पर
और एक वक्ता ने कहा, हमें स्वतंत्रता के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, नगर-द्वार पर और अपने घर के अलाव के
पास मैंने तुम्हें स्वयं अपनी स्वतंत्रता के सामने दंडवत् करते और उसकी पूजा करते
देखा है। ठीक वैसे ही जैसे दास किसी अत्याचारी के सामने झुकते हैं और उसकी स्तुति
करते हैं, यद्यपि वह उनका वध करता है।
हाँ, मंदिर की
वाटिका में और दुर्ग की छाया में मैंने तुममें से सबसे स्वतंत्र लोगों को भी अपनी
स्वतंत्रता को जुए और हथकड़ी की तरह पहने देखा है।
और मेरा हृदय भीतर ही भीतर रक्तरंजित हो उठा क्योंकि तुम
तभी स्वतंत्र हो सकते हो, जब
स्वतंत्रता की खोज करने की इच्छा भी तुम्हारे लिए एक जुआ बनना बंद हो जाए और जब
तुम स्वतंत्रता को किसी लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के रूप में कहना छोड़ दो।
तुम वास्तव में तभी स्वतंत्र होगे, जब तुम्हारे दिन चिंता से और तुम्हारी
रातें अभाव और दुख से रहित न हों बल्कि जब ये सब तुम्हारे जीवन को घेरे रहें और
फिर भी तुम उनसे ऊपर उठो... नंगे और बंधनरहित।
और तुम अपने दिनों और रातों से ऊपर कैसे उठ सकते हो, जब तक कि उन जंजीरों को न तोड़ दो, जिन्हें तुम्हारी समझ के प्रभात में तुमने स्वयं अपने दोपहर के समय के
चारों ओर बाँध दिया था?
सच तो यह है कि जिसे तुम स्वतंत्रता कहते हो, वही इन जंजीरों में सबसे मजबूत है, यद्यपि उसकी कड़ियाँ सूर्य में चमकती हैं और तुम्हारी आँखों को चकाचौंध कर
देती हैं।
और वह क्या है, सिवाय तुम्हारे अपने ही व्यक्तित्व के उन टुकड़ों के, जिन्हें तुम त्याग देना चाहते हो ताकि स्वतंत्र हो सको?
यदि तुम किसी अन्यायी कानून को समाप्त करना चाहते हो तो वह
कानून तुम्हारे अपने हाथ से तुम्हारे ही माथे पर लिखा गया है। तुम उसे अपनी कानून
की पुस्तकों को जलाकर नहीं मिटा सकते, न अपने न्यायाधीशों के माथे धोकर, भले ही तुम उन पर पूरा समुद्र ही क्यों
न उँडेल दो।
और यदि तुम किसी निरंकुश शासक को सिंहासन से उतारना चाहते
हो तो पहले यह देखो कि तुम्हारे भीतर खड़ा उसका सिंहासन नष्ट हो चुका है या नहीं क्योंकि
कोई अत्याचारी स्वतंत्र और गर्वित लोगों पर कैसे शासन कर सकता है, यदि स्वयं उनकी स्वतंत्रता में कोई
अत्याचार और उनके अपने गर्व में कोई लज्जा न हो?
और यदि तुम किसी चिंता को अपने ऊपर से उतार फेंकना चाहते हो
तो वह चिंता तुमने स्वयं चुनी है। वह तुम पर थोपी नहीं गई है।
और यदि तुम किसी भय को दूर करना चाहते हो तो उस भय का आसन
तुम्हारे हृदय में है, उस
व्यक्ति के हाथ में नहीं, जिससे तुम डरते हो।
निश्चय ही, तुम्हारे
अस्तित्व के भीतर सभी वस्तुएँ निरंतर एक-दूसरे को आधा आलिंगन किए हुए गतिमान हैं, जिसकी
तुम इच्छा करते हो और जिससे तुम डरते हो, जो तुम्हें अप्रिय
है और जिसे तुम प्रिय मानते हो, जिसका तुम पीछा करते हो और
जिससे बच निकलना चाहते हो।
ये सब तुम्हारे भीतर प्रकाश और छाया की तरह जोड़ों में
गतिमान हैं और एक-दूसरे से लिपटे हुए हैं।
और जब छाया मिट जाती है और उसका अस्तित्व नहीं रहता, तब जो प्रकाश शेष रह जाता है, वह किसी दूसरे प्रकाश के लिए छाया बन जाता है।
और इस प्रकार, जब तुम्हारी स्वतंत्रता अपनी बेड़ियाँ खो देती है तो वह स्वयं किसी और भी
बड़ी स्वतंत्रता की बेड़ी बन जाती है।
****
और पुजारिन ने फिर कहा, हमें विवेक और आवेग (passion) के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारी आत्मा एक युद्धभूमि है, जहाँ तुम्हारा विवेक और तुम्हारा निर्णय
तुम्हारे आवेग और तुम्हारी इच्छाओं से युद्ध करते हैं।
काश, मैं
तुम्हारी आत्मा में शांति स्थापित करने वाला बन पाता ताकि तुम्हारे भीतर के तत्वों
के इस मतभेद और इस प्रतिद्वंद्विता को एकता और संगीत में बदल देता।
लेकिन मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ, जब तक कि तुम स्वयं भी अपने भीतर के सभी
तत्वों के बीच शांति स्थापित करने वाले नहीं बल्कि उन सभी के प्रेमी न बनो?
तुम्हारा विवेक और तुम्हारा आवेग तुम्हारी समुद्र-यात्रा
करती आत्मा के पतवार और पाल हैं।
यदि तुम्हारे पाल या तुम्हारा पतवार, इनमें से कोई एक भी टूट जाए तो तुम या तो
लहरों पर डगमगाते हुए बहते रहोगे या फिर समुद्र के बीचोंबीच ठिठककर रह जाओगे क्योंकि
अकेला विवेक, जब स्वयं ही शासन करता है तो एक बाँधने वाली
शक्ति बन जाता है और आवेग, यदि उस पर कोई अंकुश न हो तो ऐसी
अग्नि है जो स्वयं को ही जलाकर नष्ट कर देती है।
इसलिए अपनी आत्मा को अपने विवेक को आवेग की ऊँचाइयों तक उठा
लेने दो ताकि वह गा सके और अपने विवेक द्वारा अपने आवेग को दिशा देने दो ताकि
तुम्हारा आवेग अपने ही दैनिक पुनर्जन्म के द्वारा जीवित रहे और फीनिक्स की तरह
अपनी ही राख के ऊपर उठ सके।
मैं चाहता हूँ कि तुम अपने निर्णय और अपनी इच्छाओं को उसी
प्रकार समझो जैसे, तुम अपने घर में आए दो प्रिय अतिथियों को समझते हो।
निश्चय ही, तुम
एक अतिथि को दूसरे से अधिक सम्मान नहीं दोगे क्योंकि जो एक पर अधिक ध्यान देता है,
वह दोनों का प्रेम और विश्वास खो देता है।
पहाड़ियों के बीच, जब तुम श्वेत चिनारों की शीतल छाया में बैठे हो और दूर-दूर तक फैले खेतों
और चरागाहों की शांति और निश्चलता को अपने भीतर बाँट रहे हो तब अपने हृदय में मौन
होकर कहना, “ईश्वर विवेक में विश्राम
करता है।”
और जब तूफ़ान आए, प्रचंड वायु वन को झकझोर दे और गर्जन तथा
बिजली आकाश की महिमा की घोषणा करें तब श्रद्धा और विस्मय से अपने हृदय में कहना, “ईश्वर आवेग में
गतिशील है।”
और चूँकि तुम ईश्वर के आकाश-मंडल में एक श्वास हो और ईश्वर
के वन में एक पत्ता हो इसलिए तुम्हें भी विवेक में विश्राम करना चाहिए और आवेग में
गतिशील होना चाहिए।
****
और एक स्त्री ने कहा, हमें पीड़ा के बारे में बताइए।
और उसने कहा, तुम्हारी पीड़ा उस खोल के टूटने की प्रक्रिया
है, जो तुम्हारी समझ को घेरे हुए है।
जिस प्रकार फल की गुठली को टूटना पड़ता है ताकि उसका हृदय
सूर्य के प्रकाश में आ सके, उसी
प्रकार तुम्हें भी पीड़ा को जानना आवश्यक है।
और यदि तुम अपने जीवन के प्रतिदिन घटने वाले चमत्कारों के
प्रति अपने हृदय में विस्मय बनाए रख सको, तो तुम्हारी पीड़ा तुम्हें तुम्हारे आनंद से कम अद्भुत नहीं लगेगी।
और तुम अपने हृदय के मौसमों को उसी प्रकार स्वीकार करोगे, जैसे तुम अपने खेतों पर से गुजरने वाले
मौसमों को हमेशा स्वीकार करते आए हो।
और अपने दुख की सर्दियों के बीच भी तुम शांति और धैर्य के
साथ प्रतीक्षा करते रहोगे।
तुम्हारी बहुत-सी पीड़ा स्वयं चुनी हुई है।
वह कड़वी औषधि है, जिसके द्वारा तुम्हारे भीतर का चिकित्सक तुम्हारे रोगग्रस्त स्व को स्वस्थ
करता है।
इसलिए उस चिकित्सक पर विश्वास करो और उसकी औषधि को मौन और
शांति के साथ पी लो।
क्योंकि उसका हाथ चाहे भारी और कठोर ही क्यों न हो, अदृश्य की कोमल हथेली द्वारा निर्देशित
होता है।
और वह प्याला जो वह तुम्हारे सामने लाता है, भले ही वह तुम्हारे होंठों को जला दे,
उसी मिट्टी से बनाया गया है जिसे कुम्हार ने अपने पवित्र आँसुओं से
भिगोया है।
****
और एक व्यक्ति ने कहा, हमें आत्मज्ञान के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारे हृदय दिन और रातों के रहस्यों
को मौन में जानते हैं।
लेकिन तुम्हारे कान अपने हृदय के इस ज्ञान की ध्वनि सुनने
के लिए व्याकुल रहते हैं।
तुम उन बातों को शब्दों में जानना चाहते हो, जिन्हें तुम सदा से अपने अंतर्मन में जानते
आए हो।
तुम अपने स्वप्नों के नग्न शरीर को अपनी उँगलियों से छू
लेना चाहते हो।
और ऐसा चाहना उचित ही है।
तुम्हारी आत्मा का छिपा हुआ जलस्रोत ऊपर उठकर कल-कल करता
हुआ समुद्र की ओर बहना ही चाहता है और तुम्हारी अनंत गहराइयों में छिपा खजाना
तुम्हारी आँखों के सामने प्रकट होना ही चाहता है।
लेकिन अपने उस अज्ञात खजाने को तौलने के लिए कोई तराजू मत
रखो और अपने ज्ञान की गहराइयों को किसी डंडे या गहराई नापने वाली रस्सी से मत नापो
क्योंकि आत्मा एक ऐसा समुद्र है, जिसका
न कोई किनारा है न कोई माप।
यह मत कहो, “मैंने
सत्य पा लिया है,” बल्कि कहो, “मैंने
एक सत्य पाया है।”
यह मत कहो, “मैंने
आत्मा का मार्ग खोज लिया है।” बल्कि कहो, “मैं अपनी राह पर
चलती हुई आत्मा से मिला हूँ।” क्योंकि आत्मा सभी मार्गों पर चलती है।
आत्मा किसी एक सीधी रेखा पर नहीं चलती न ही वह सरकंडे की
तरह बढ़ती है।
आत्मा तो असंख्य पंखुड़ियों वाले कमल की भाँति धीरे-धीरे
अपनी अनंत परतों को खोलती हुई स्वयं को प्रकट करती है।
****
फिर एक शिक्षक ने कहा, हमें शिक्षण के बारे में बताइए।
और उसने कहा, कोई भी मनुष्य तुम्हारे सामने उसके अतिरिक्त
कुछ प्रकट नहीं कर सकता, जो
तुम्हारे ज्ञान के उषाकाल में पहले से ही आधा-जागा हुआ तुम्हारे भीतर विद्यमान है।
जो शिक्षक अपने अनुयायियों के बीच मंदिर की छाया में चलता
है, वह उन्हें अपनी बुद्धि नहीं देता बल्कि
अपना विश्वास और अपना प्रेम देता है।
यदि वह वास्तव में बुद्धिमान है, तो वह तुम्हें अपने ज्ञान के घर में प्रवेश
करने के लिए नहीं कहेगा बल्कि तुम्हें तुम्हारे अपने मन की देहरी तक ले जाएगा।
खगोलशास्त्री तुम्हें अंतरिक्ष के बारे में अपनी समझ बता
सकता है, लेकिन अपनी समझ तुम्हें दे नहीं सकता।
संगीतकार तुम्हारे लिए उस लय का गीत गा सकता है, जो समस्त अंतरिक्ष में व्याप्त है, लेकिन वह तुम्हें वह कान नहीं दे सकता जो उस लय को पकड़ सके न वह स्वर दे
सकता है जो उसकी प्रतिध्वनि बन सके।
और जो व्यक्ति संख्याओं के विज्ञान में पारंगत है, वह तुम्हें भार और माप के प्रदेशों के बारे
में बता सकता है, लेकिन वहाँ तक तुम्हें ले नहीं जा सकता।
क्योंकि एक मनुष्य की दृष्टि अपने पंख दूसरे मनुष्य को नहीं
दे सकती।
और जिस प्रकार ईश्वर के ज्ञान में तुममें से प्रत्येक अपने
आप में अकेला खड़ा है, उसी
प्रकार ईश्वर के अपने ज्ञान और पृथ्वी की अपनी समझ में भी तुममें से प्रत्येक को
अकेला होना होगा।
****
और एक युवक ने कहा, हमें मित्रता के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारा मित्र तुम्हारी आवश्यकताओं का
उत्तर है।
वह तुम्हारा खेत है, जिसमें तुम प्रेम के बीज बोते हो और कृतज्ञता की फसल काटते हो।
और वह तुम्हारी भोजन-मेज़ और तुम्हारा अलाव भी है क्योंकि
तुम अपनी भूख लेकर उसके पास आते हो और शांति पाने के लिए उसे खोजते हो।
जब तुम्हारा मित्र अपने मन की बात कहता है, तो तुम अपने मन में उठने वाले “नहीं” से
नहीं डरते और न ही अपने “हाँ” को रोकते हो।
और जब वह मौन होता है, तब भी तुम्हारा हृदय उसके हृदय को सुनना बंद नहीं करता।
क्योंकि मित्रता में बिना शब्दों के ही, सभी विचार, सभी
इच्छाएँ और सभी अपेक्षाएँ जन्म लेती हैं और बाँटी जाती हैं। ऐसे आनंद के साथ,
जिस पर कोई दावा नहीं किया जाता।
जब तुम अपने मित्र से विदा होते हो, तो शोक मत करो क्योंकि जो कुछ तुम उसमें
सबसे अधिक प्रेम करते हो, वह उसकी अनुपस्थिति में और अधिक
स्पष्ट दिखाई दे सकता है। ठीक वैसे ही जैसे पर्वत पर चढ़ने वाले को वह पर्वत मैदान
से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
और मित्रता में आत्मा को गहरा करने के अतिरिक्त और कोई
उद्देश्य न हो क्योंकि जो प्रेम अपने रहस्य के स्वयं उद्घाटित होने के अतिरिक्त
कुछ और पाने की इच्छा करता है, वह
प्रेम नहीं बल्कि आगे फेंका हुआ एक जाल है और उसमें केवल निकम्मी वस्तु ही फँसती
है।
और अपने मित्र के लिए अपना सर्वोत्तम बचाकर रखो।
यदि उसे तुम्हारे ज्वार के उतरने का समय जानना हो, तो उसे तुम्हारे ज्वार के उमड़ने का समय भी
जानने दो क्योंकि तुम्हारा मित्र क्या है कि तुम उसे उन घंटों में खोजो जिन्हें
तुम्हारे पास काटने के लिए कुछ नहीं?
उसे तो उन घंटों में खोजो जिन्हें तुम्हें जीना है क्योंकि
तुम्हारी आवश्यकता को पूरा करना उसका अधिकार है,
तुम्हारे खालीपन को भरना नहीं।
और मित्रता की मधुरता में हँसी हो और सुखों की साझेदारी हो क्योंकि
छोटी-छोटी चीज़ों की ओस में ही हृदय अपनी सुबह पाता है और फिर से ताज़ा हो उठता
है।
****
और फिर एक विद्वान ने कहा,
“हमें बात करने के बारे में बताइए।”
और उसने उत्तर दिया, तुम तब बोलते हो, जब तुम्हारे विचारों के साथ तुम्हारा मन
शांत नहीं रह जाता।
और जब तुम अपने हृदय के एकांत में और अधिक नहीं रह सकते, तब तुम अपने होंठों में रहने लगते हो और
ध्वनि तुम्हारे लिए मन बहलाव और समय बिताने का साधन बन जाती है।
और तुम्हारी बहुत-सी बातों में विचार आधा मारा जाता है क्योंकि
विचार अंतरिक्ष में उड़ने वाला एक पक्षी है, जो शब्दों के पिंजरे में अपने पंख तो फैला सकता है, लेकिन
उड़ नहीं सकता।
तुममें कुछ ऐसे लोग हैं जो अकेले रहने के भय से बात करने
वालों की संगति खोजते हैं।
एकांत का मौन उनके सामने उनके नग्न स्वरूप को प्रकट कर देता
है और वे उससे बच निकलना चाहते हैं।
और कुछ ऐसे हैं जो बोलते हुए बिना जाने या बिना सोचे-समझे, किसी ऐसे सत्य को प्रकट कर देते हैं जिसे
वे स्वयं नहीं समझते।
और कुछ ऐसे हैं जिनके भीतर सत्य विद्यमान है, लेकिन वे उसे शब्दों में नहीं कहते। ऐसे
लोगों के हृदय में आत्मा लयबद्ध मौन में निवास करती है।
जब तुम रास्ते में या बाज़ार में अपने मित्र से मिलो, तो अपने भीतर की आत्मा को अपने होंठों को
गति देने और अपनी जिह्वा को दिशा देने दो।
तुम्हारी आवाज़ के भीतर जो आवाज़ है, उसे उसके कान के भीतर के कान से बोलने दो क्योंकि
तुम्हारा मित्र तुम्हारे हृदय के सत्य को अपनी आत्मा में उसी तरह सँजोकर रखेगा जैसे,
शराब का स्वाद रंग के भुला दिए जाने और पात्र के मिट जाने के बाद भी स्मृति में
बना रहता है।
****
और एक खगोलशास्त्री ने कहा,
मास्टर, समय के बारे में क्या कहेंगे?
और उन्होंने उत्तर दिया, तुम समय को मापना चाहते हो... उसको, जिसे न मापा जा सकता है, न जिसकी कोई सीमा है।
तुम अपने आचरण को समय के अनुसार ढालना चाहते हो और यहाँ तक
कि घंटों और ऋतुओं के अनुसार अपनी आत्मा की दिशा भी निर्धारित करना चाहते हो।
तुम समय को एक ऐसी धारा बना लेना चाहते हो, जिसके किनारे बैठकर तुम उसके बहाव को देखते
रहो।
फिर भी, तुम्हारे
भीतर जो कालातीत है, वह जीवन की कालातीतता से परिचित है
और जानता है कि बीता हुआ कल आज की स्मृति मात्र है और आने
वाला कल आज का स्वप्न।
और यह भी कि तुम्हारे भीतर जो गाता और मनन करता है, वह आज भी उसी प्रथम क्षण की सीमाओं के भीतर
निवास कर रहा है, जिसने तारों को अंतरिक्ष में बिखेर दिया
था।
तुममें ऐसा कौन है जिसे यह अनुभव न होता हो कि प्रेम करने
की उसकी शक्ति असीम है?
और फिर भी ऐसा कौन है जिसे यह अनुभव न होता हो कि वही प्रेम
असीम होते हुए भी उसके अस्तित्व के केंद्र में समाया हुआ है और एक प्रेम-विचार से
दूसरे प्रेम-विचार की ओर न एक प्रेम-कर्म से दूसरे प्रेम-कर्म की ओर, कहीं जाता नहीं?
और क्या समय भी प्रेम की ही तरह अविभाजित और बिना गति का
नहीं है?
लेकिन यदि तुम्हें अपने विचार में समय को ऋतुओं में बाँटकर
मापना ही हो, तो प्रत्येक ऋतु को
अन्य सभी ऋतुओं को अपने भीतर समेट लेने दो।
और आज को अतीत को स्मृति के साथ तथा भविष्य को आकांक्षा के
साथ अपने भीतर समेट लेने दो।
****
और नगर के बुज़ुर्गों में से एक ने कहा, हमें अच्छाई और बुराई के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम्हारे भीतर जो अच्छा है, उसके बारे में मैं बोल
सकता हूँ, लेकिन बुराई के बारे में नहीं क्योंकि बुराई और
क्या है, सिवाय उस अच्छाई के, जिसे
उसकी अपनी भूख और प्यास ने यातना दे दी हो?
निश्चय ही, जब
अच्छाई भूखी होती है, तो वह अँधेरी गुफाओं में भी भोजन खोजती
है और जब प्यासी होती है, तो मृत जल भी पी लेती है।
तुम तब अच्छे होते हो, जब तुम अपने आप में एक होते हो।
लेकिन जब तुम अपने आप में एक नहीं होते, तब भी तुम बुरे नहीं होते क्योंकि बँटा हुआ
घर चोरों की गुफा नहीं होता। वह केवल एक बँटा हुआ घर होता है।
और बिना पतवार का जहाज़ संकटपूर्ण द्वीपों के बीच भटकता हुआ
निरुद्देश्य घूम सकता है, फिर भी
आवश्यक नहीं कि वह समुद्र की तलहटी में डूब जाए।
तुम तब अच्छे होते हो, जब तुम स्वयं को देने का प्रयत्न करते हो।
फिर भी जब तुम अपने लिए लाभ प्राप्त करना चाहते हो, तब तुम बुरे नहीं होते क्योंकि जब तुम लाभ
के लिए प्रयत्न करते हो, तब तुम उस जड़ के समान हो, जो धरती से चिपकी रहती है और उसके वक्ष से रस पीती है।
निश्चय ही फल जड़ से यह नहीं कह सकता, “मेरे जैसा बनो, पका हुआ, पूर्ण और अपनी प्रचुरता सदा बाँटने वाला।”
क्योंकि फल के लिए देना जितना आवश्यक है, जड़ के लिए पाना भी उतना ही आवश्यक है।
तुम तब अच्छे होते हो, जब अपनी वाणी में पूरी तरह जाग्रत रहते हो।
फिर भी जब तुम्हारी जिह्वा बिना किसी उद्देश्य के लड़खड़ाती
हुई बोलती है और तुम मानो सोए हुए होते हो, तब भी तुम बुरे नहीं होते क्योंकि लड़खड़ाती हुई वाणी भी एक दुर्बल जिह्वा
को मजबूत कर सकती है।
तुम तब अच्छे होते हो, जब अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता और साहस से कदम बढ़ाते हुए चलते हो।
फिर भी जब तुम वहाँ लँगड़ाते हुए पहुँचते हो, तब तुम बुरे नहीं होते क्योंकि लँगड़ाकर
चलने वाले भी पीछे की ओर नहीं चलते।
लेकिन तुम जो बलवान और तेज़ हो, ध्यान रखना कि लँगड़े के सामने यह समझकर
लँगड़ाकर मत चलो कि यही दया है।
तुम अनगिनत तरीकों से अच्छे हो और जब तुम अच्छे नहीं होते, तब भी तुम बुरे नहीं होते।
तुम केवल इधर-उधर भटक रहे होते हो और आलस्य कर रहे होते हो।
अफसोस, हिरन
कछुओं को तेज़ चलना नहीं सिखा सकते।
तुम्हारे विराट स्वरूप की ओर तुम्हारी जो लालसा है, उसी में तुम्हारी अच्छाई निहित है और यह
लालसा तुममें से प्रत्येक के भीतर है।
लेकिन तुममें से कुछ लोगों में यह लालसा एक ऐसी प्रबल धारा
है, जो वेग के साथ समुद्र की ओर दौड़ती है और
अपने साथ पहाड़ियों की ढलानों के रहस्य तथा जंगल के गीत बहा ले जाती है।
और दूसरों में यह एक समतल धारा है, जो मोड़ों और घुमावों में स्वयं को खोती
हुई किनारे तक पहुँचने से पहले ही ठहरती रहती है।
लेकिन जो व्यक्ति बहुत अधिक लालसा करता है, उसे उस व्यक्ति से, जिसकी
लालसा कम है, यह नहीं कहना चाहिए, “तुम
इतने धीमे और रुक-रुककर क्यों चलते हो?”
क्योंकि जो वास्तव में अच्छा है, वह नंगे व्यक्ति से यह नहीं पूछता,
“तुम्हारा वस्त्र कहाँ है?”
न ही वह उस व्यक्ति से, जिसका घर उजड़ चुका है, यह पूछता है, “तुम्हारे घर को क्या हो गया?”
****
फिर एक पुजारिन ने कहा, हमें प्रार्थना के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम अपने संकट और अपनी आवश्यकता में
प्रार्थना करते हो। काश, अपने आनंद
की परिपूर्णता में और अपनी समृद्धि के दिनों में भी तुम प्रार्थना कर पाते!
क्योंकि
प्रार्थना और क्या है, सिवाय
इसके कि तुम अपने अस्तित्व का विस्तार उस जीवंत आकाश-तत्व में कर दो, जो तुम्हें घेरे हुए है?
और यदि अपने अंधकार को अंतरिक्ष में उँडेल देना तुम्हें
सांत्वना देता है, तो अपने
हृदय की उषा को बाहर उँडेल देना भी तुम्हारे लिए आनंद का विषय होना चाहिए।
और यदि तुम्हारी आत्मा तुम्हें प्रार्थना के लिए पुकारती है
और तुम रोए बिना नहीं रह सकते, तो
उसे तुम्हें फिर और फिर प्रेरित करते रहने दो, रोते हुए भी,
जब तक कि तुम हँसते हुए वहाँ पहुँच न जाओ।
जब तुम प्रार्थना करते हो,
तो तुम आकाश में उन लोगों से मिलने के लिए ऊपर उठते हो, जो उसी समय प्रार्थना कर रहे होते हैं और जिनसे प्रार्थना के अतिरिक्त
किसी और माध्यम से तुम्हारी भेंट संभव नहीं होती।
इसलिए उस अदृश्य मंदिर की अपनी यात्रा को केवल आनंदमय
उल्लास और मधुर आत्मीय मिलन के लिए होने दो क्योंकि यदि तुम उस मंदिर में केवल
माँगने के लिए प्रवेश करोगे, तो
तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा और यदि तुम उसमें स्वयं को दीन करने के लिए प्रवेश
करोगे, तो तुम्हें ऊपर नहीं उठाया जाएगा और यदि तुम उसमें
दूसरों के कल्याण के लिए याचना करने के लिए भी प्रवेश करोगे, तब भी तुम्हारी नहीं सुनी जाएगी।
उस अदृश्य मंदिर में प्रवेश कर लेना ही पर्याप्त है।
मैं तुम्हें शब्दों में प्रार्थना करना नहीं सिखा सकता।
ईश्वर तुम्हारे शब्दों को तब तक नहीं सुनता, जब तक वे स्वयं उन्हीं के द्वारा तुम्हारे
होंठों से उच्चरित न हो रहे हों।
और मैं तुम्हें समुद्रों,
वनों और पर्वतों की प्रार्थना भी नहीं सिखा सकता।
लेकिन तुम, जो
पर्वतों, वनों और समुद्रों से जन्मे हो, अपने हृदय में उनकी प्रार्थना पा सकते हो।
और यदि तुम रात की निस्तब्धता में केवल सुनो, तो तुम उन्हें मौन में यह कहते सुनोगे,
“हे हमारे ईश्वर, जो हमारे पंखों वाला स्वरूप
है, हमारे भीतर तेरी ही इच्छा... इच्छा
करती है।
हमारे भीतर तेरी ही अभिलाषा... अभिलाषा करती है।
हमारे भीतर तेरा ही आवेग है,
जो हमारी उन रातों को जो तेरी ही हैं... तेरे ही दिनों में बदल देना
चाहता है।
हम तुझसे कुछ माँग नहीं सकते क्योंकि हमारे भीतर उनके जन्म
लेने से पहले ही तू हमारी आवश्यकताओं को जानता है।
तू ही हमारी आवश्यकता है और अपने अधिक-से-अधिक स्वरूप को
हमें देकर तू हमें सब कुछ दे देता है।”
****
फिर एक संन्यासी, जो वर्ष में केवल एक बार नगर आता था, आगे आया और
उसने कहा, हमें आनंद के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, आनंद एक स्वतंत्रता-गीत है, लेकिन वह स्वयं स्वतंत्रता नहीं है।
वह तुम्हारी इच्छाओं का प्रस्फुटन है, लेकिन वह उनका फल नहीं है।
वह ऊँचाई को पुकारती हुई एक गहराई है, लेकिन न वह स्वयं गहराई है, न ऊँचाई।
वह पिंजरे में बंद पक्षी का पंख फैलाकर उड़ जाना है, लेकिन वह स्वयं असीम आकाश नहीं है।
हाँ, वास्तव
में आनंद एक स्वतंत्रता-गीत है।
और मैं चाहता हूँ कि तुम उसे पूरे हृदय से गाओ, लेकिन मैं
यह नहीं चाहता कि उसे गाते-गाते तुम अपने हृदय को ही खो दो।
तुम्हारे कुछ युवा आनंद की खोज इस तरह करते हैं, मानो वही सब कुछ हो और लोग उन्हें दोष देते
और फटकारते हैं।
मैं न तो उन्हें दोष देना चाहता हूँ, न फटकारना।
मैं चाहता हूँ कि वे खोजें क्योंकि उन्हें आनंद मिलेगा, लेकिन केवल वही नहीं मिलेगा। उसकी सात बहनें हैं और उनमें सबसे छोटी भी आनंद
से अधिक सुंदर है।
क्या तुमने उस मनुष्य की कहानी नहीं सुनी, जो धरती में जड़ें खोजने के लिए खोद रहा था
और उसे खजाना मिल गया और तुम्हारे कुछ बुज़ुर्ग अपने आनंद को उन गलतियों की तरह
पछतावे के साथ याद करते हैं, जो नशे की हालत में उनसे हो गई
हों।
लेकिन पछतावा मन को धुँधला करना है, उसे दंडित करना नहीं।
उन्हें अपने आनंद को कृतज्ञता के साथ उसी तरह याद करना
चाहिए जैसे, वे गर्मी की ऋतु की फसल को याद करते।
फिर भी यदि पछतावा करना उन्हें सांत्वना देता है, तो उन्हें उसी में सांत्वना पाने दो।
और तुममें कुछ ऐसे भी हैं जो न तो खोजने की उम्र में युवा
हैं, न याद करने की उम्र में वृद्ध और खोजने तथा
याद करने के भय से वे सभी आनंदों से दूर रहते हैं, इस डर से
कि कहीं वे आत्मा की उपेक्षा न कर दें या उसके विरुद्ध अपराध न कर बैठें।
लेकिन आनंद से इस प्रकार विरत रहने में भी उनका अपना आनंद
है।
और इस तरह वे भी एक खजाना पा लेते हैं, यद्यपि वे काँपते हाथों से जड़ें खोजने के
लिए धरती खोद रहे होते हैं।
लेकिन मुझे बताओ, ऐसा कौन है जो आत्मा को ठेस पहुँचा सकता है?
क्या बुलबुल रात की निस्तब्धता को ठेस पहुँचा सकती है या
जुगनू तारों को?
और क्या तुम्हारी लौ या तुम्हारा धुआँ हवा पर कोई भार डाल
सकता है?
क्या तुम समझते हो कि आत्मा कोई ऐसा शांत सरोवर है, जिसे तुम एक डंडे से हिला सकते हो?
अक्सर अपने आप को आनंद से वंचित करके तुम केवल अपनी इच्छा
को अपने अस्तित्व की गहराइयों में संचित करते रहते हो।
कौन जानता है, जो आज छूट गया-सा प्रतीत होता है, वह कल की
प्रतीक्षा कर रहा हो?
तुम्हारा शरीर भी अपने अधिकार और अपनी उचित आवश्यकताओं को
जानता है और उसे धोखा नहीं दिया जा सकता।
और तुम्हारा शरीर तुम्हारी आत्मा की वीणा है और यह तुम्हारे
हाथ में है कि तुम उससे मधुर संगीत निकालो या उलझी हुई ध्वनियाँ।
और अब तुम अपने हृदय में पूछते हो, “हम आनंद में जो अच्छा है और जो अच्छा नहीं
है, उनमें भेद कैसे करें?”
अपने खेतों और अपने बगीचों में जाओ और वहाँ तुम सीखोगे कि
फूल से मधु एकत्र करना मधुमक्खी के लिए आनंद है, लेकिन मधुमक्खी को अपना मधु देना फूल के लिए भी आनंद है क्योंकि मधुमक्खी
के लिए फूल जीवन का स्रोत है और फूल के लिए मधुमक्खी प्रेम की संदेशवाहक है और
मधुमक्खी तथा फूल, दोनों के लिए आनंद देना और आनंद ग्रहण करना, दोनों ही एक आवश्यकता भी हैं और एक परम आनंद भी।
ओर्फलीज़ के लोगो, अपने आनंदों में फूलों और मधुमक्खियों के समान बनो।
****
और एक कवि ने कहा, हमें सौंदर्य के बारे में बताइए।
और उसने उत्तर दिया, तुम सौंदर्य को कहाँ खोजोगे और उसे
कैसे पाओगे, यदि वही तुम्हारा
मार्ग और तुम्हारी मार्गदर्शिका न हो?
और तुम उसके बारे में बोलोगे कैसे, यदि वही तुम्हारी वाणी की बुनकर न हो?
पीड़ित और आहत लोग कहते हैं,
“सौंदर्य दयालु और कोमल है। अपने ही वैभव से कुछ संकोच करती हुई
किसी नवयुवती माँ की तरह वह हमारे बीच चलती है।”
और भावुक लोग कहते हैं, “नहीं, सौंदर्य शक्ति और भय से भरा हुआ है। आँधी की
तरह वह हमारे नीचे की धरती और हमारे ऊपर के आकाश को हिला देता है।”
थके और क्लांत लोग कहते हैं,
“सौंदर्य कोमल फुसफुसाहटों से बना है। वह हमारी आत्मा में बोलता है।
उसकी आवाज़ हमारे मौन के सामने इस तरह धीमी पड़ जाती है जैसे, कोई मंद प्रकाश छाया
के भय से काँप रहा हो।”
लेकिन बेचैन लोग कहते हैं,
“हमने उसे पर्वतों के बीच पुकारते हुए सुना है और उसकी पुकार के साथ
घोड़ों के खुरों की टाप, पंखों की फड़फड़ाहट और सिंहों की
गर्जना की ध्वनि भी आई थी।”
रात में नगर के पहरेदार कहते हैं, “सौंदर्य पूर्व दिशा से उषा के साथ उदित
होगा।”
और दोपहर में मेहनत करने वाले मजदूर और राहगीर कहते हैं, “हमने उसे सूर्यास्त की खिड़कियों से धरती
पर झुकते हुए देखा है।”
सर्दियों में, बर्फ से घिरे लोग कहते हैं, “वह वसंत के साथ आएगा,
पहाड़ियों पर छलाँगें लगाता हुआ।”
और गर्मियों की तपिश में फसल काटने वाले कहते हैं, “हमने उसे पतझड़ के पत्तों के साथ नाचते
हुए देखा है और उसके बालों में बर्फ की एक लट भी देखी है।”
तुमने सौंदर्य के बारे में ये सब बातें कही हैं,लेकिन वास्तव में तुमने उसके बारे में नहीं बल्कि
अपनी उन अतृप्त आवश्यकताओं के बारे में कहा है।
और सौंदर्य कोई आवश्यकता नहीं बल्कि एक परमानंद है।
वह प्यासा मुँह या आगे बढ़ा हुआ खाली हाथ नहीं है बल्कि एक
प्रज्वलित हृदय और सम्मोहित आत्मा है।
वह, वह छवि नहीं है जिसे तुम देखना चाहते हो न वह गीत जिसे
तुम सुनना चाहते हो बल्कि वह ऐसी छवि है जिसे तुम आँखें बंद कर लेने पर भी देखते
हो और ऐसा गीत है जिसे तुम कान बंद कर लेने पर भी सुनते हो।
वह खुरदरी छाल के भीतर बहता हुआ रस नहीं है, न पंजे से जुड़ा हुआ कोई पंख बल्कि वह ऐसा
उद्यान है जो सदा खिला रहता है और ऐसे देवदूतों का झुंड है जो सदा उड़ता रहता है।
ओर्फलीज़ के लोगो, सौंदर्य तब जीवन है जब जीवन अपना पवित्र मुख अनावृत करती है।
लेकिन तुम ही जीवन हो और तुम ही वह आवरण भी हो।
सौंदर्य वह अनंतता है, जो दर्पण में स्वयं को निहार रही है।
लेकिन तुम ही अनंतता हो और तुम ही वह दर्पण भी हो।
****
और एक वृद्ध पुरोहित ने कहा, हमसे धर्म के विषय में कहो।
और उसने कहा, “क्या मैंने आज किसी और विषय में बात की है? क्या
धर्म सभी कर्म और सभी चिंतन नहीं है? और वह भी, जो न कर्म है, न चिंतन बल्कि एक आश्चर्य और विस्मय
है, जो आत्मा में निरंतर अंकुरित होता रहता है, यहाँ तक कि
तब भी, जब हाथ पत्थर काट रहे हों या करघे पर बुनाई कर रहे
हों?
कौन अपने विश्वास को अपने कर्मों से अलग कर सकता है या अपनी
आस्था को अपने व्यवसाय से?
कौन अपने घंटों को अपने सामने फैलाकर यह कह सकता है, ‘यह ईश्वर के लिए है और यह मेरे लिए,
यह मेरी आत्मा के लिए है और यह दूसरा मेरे शरीर के लिए’?
तुम्हारे सभी घंटे ऐसे पंख हैं, जो आकाश में एक आत्म से दूसरे आत्म तक
उड़ते हैं।
जो मनुष्य अपनी नैतिकता को केवल अपना सबसे अच्छा वस्त्र
समझकर पहनता है, उसके लिए नग्न रहना ही
बेहतर है।
हवा और सूर्य उसकी त्वचा में कोई छेद नहीं करेंगे।
और जो अपने आचरण को नैतिक नियमों से निर्धारित करता है, वह अपने गाने वाले पक्षी को पिंजरे में बंद
कर देता है।
सबसे मुक्त गीत सलाखों और तारों के बीच से नहीं निकलता।
और जिसके लिए उपासना एक ऐसी खिड़की है, जिसे वह केवल खोल भी सकता है और बंद भी कर
सकता है, उसने अभी तक अपनी आत्मा के उस घर में प्रवेश नहीं
किया, जिसकी खिड़कियाँ प्रभात से प्रभात तक खुली रहती हैं।
तुम्हारा दैनिक जीवन ही तुम्हारा मंदिर है और तुम्हारा
धर्म।
जब भी तुम उसमें प्रवेश करो,
अपने आप को पूरा का पूरा अपने साथ ले जाओ।
हल, धौंकनी, हथौड़ा,
और वीणा, वे सारी वस्तुएँ
जिन्हें तुमने आवश्यकता के कारण या आनंद के लिए अपने हाथों से बनाया है क्योंकि
अपने स्वप्न-संसार में तुम अपनी उपलब्धियों से ऊपर नहीं उठ सकते
और न अपनी असफलताओं से नीचे गिर सकते हो।
और सभी मनुष्यों को अपने साथ ले जाओ क्योंकि आराधना में तुम
उनकी आशाओं से अधिक ऊँचा नहीं उड़ सकते और न उनके निराशा-भरे गर्त से अधिक नीचे
अपने को झुका सकते हो।
और यदि तुम ईश्वर को जानना चाहते हो, तो पहेलियों का हल निकालने वाले मत बनो।
बल्कि अपने चारों ओर देखो और तुम उन्हें अपने बच्चों के साथ
खेलते हुए देखोगे।
और आकाश में देखो। तुम उन्हें बादलों में चलते हुए देखोगे, बिजली में अपनी बाँहें फैलाते हुए
और वर्षा के रूप में नीचे उतरते हुए।
तुम उन्हें फूलों में मुस्कराते हुए देखोगे, फिर उठते हुए और वृक्षों में अपने हाथ
हिलाते हुए।
****
तब अलमित्रा ने कहा, अब हम मृत्यु के विषय में पूछना चाहेंगे।
और उसने कहा, तुम मृत्यु का रहस्य जानना चाहते हो। लेकिन
तुम उसे कैसे पा सकोगे, जब तक कि
जीवन के हृदय में उसे खोजोगे नहीं?
वह उल्लू, जिसकी
रात से बँधी आँखें दिन के लिए अंधी हैं, प्रकाश के रहस्य को
कैसे प्रकट कर सकता है?
यदि तुम वास्तव में मृत्यु की आत्मा का दर्शन करना चाहते हो, तो जीवन के शरीर के लिए अपना हृदय पूरी तरह
खोल दो क्योंकि जीवन और मृत्यु एक हैं जैसे, नदी और समुद्र एक हैं।
तुम्हारी आशाओं और इच्छाओं की गहराई में उस पार के जगत का
तुम्हारा मौन ज्ञान निहित है और जैसे बर्फ के नीचे पड़े बीज वसंत का स्वप्न देखते
हैं, वैसे ही तुम्हारा हृदय वसंत का स्वप्न
देखता है।
उन स्वप्नों पर विश्वास करो क्योंकि उन्हीं में अनंतता का
द्वार छिपा है।
मृत्यु का तुम्हारा भय उस चरवाहे के कंपने के समान है, जो उस राजा के सामने खड़ा है जिसका हाथ
सम्मानपूर्वक उसके ऊपर रखा जाने वाला है। क्या वह चरवाहा अपने कंपने के भीतर इस
बात से आनंदित नहीं है कि वह राजा की मुहर धारण करेगा? फिर
भी क्या वह अपने कंपने के प्रति और अधिक सचेत नहीं रहता?
क्योंकि मरना और क्या है,
सिवाय इसके कि हवा में निर्वस्त्र खड़े हो जाना और सूर्य में पिघल
जाना?
और साँस लेना बंद करना और क्या है, सिवाय इसके कि साँस को उसकी बेचैन लहरों से
मुक्त कर देना ताकि वह निर्बाध होकर ऊपर उठे, फैलती जाए और
ईश्वर को खोज सके?
जब तक तुम मौन की नदी से नहीं पीते, तब तक तुम वास्तव में गा नहीं सकोगे।
और जब तुम पर्वत की चोटी पर पहुँच जाओगे, तभी तुम चढ़ना आरंभ करोगे।
और जब धरती तुम्हारे अंगों को अपने अधिकार में ले लेगी, तभी तुम वास्तव में नृत्य करोगे।”
****
विदाई
अब संध्या हो चुकी थी।
और द्रष्टा अलमित्रा ने कहा,
धन्य हो यह दिन और यह स्थान और तुम्हारी वह आत्मा जिसने वाणी पाई
है।
और उसने उत्तर दिया, क्या बोलने वाला मैं ही था? क्या मैं सुनने वाला भी
नहीं था?
फिर वह मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरा और सभी लोग उसके
पीछे-पीछे चले।
जब वह अपने जहाज़ तक पहुँचा तो वह उसके डेक पर खड़ा हो गया।
फिर एक बार लोगों की ओर मुख करके उसने ऊँचे स्वर में कहा, “ओर्फलीज़ के लोगो, हवा
मुझे तुम्हें छोड़ जाने का संकेत दे रही है। मैं हवा से कम उतावला हूँ, फिर भी मुझे जाना ही होगा।
हम घुमक्कड़, जो सदा अधिक एकांतपूर्ण मार्ग की खोज में रहते हैं, किसी
नए दिन की शुरुआत वहाँ नहीं करते जहाँ हमने दूसरा दिन समाप्त किया था और कोई
सूर्योदय हमें उस स्थान पर नहीं पाता जहाँ सूर्यास्त हमें छोड़ गया था।
धरती के सोते हुए समय में भी हम यात्रा करते रहते हैं।
हम उस दृढ़जीवी पौधे के बीज हैं और जब हम पक जाते हैं तथा
हमारा हृदय पूर्ण हो जाता है, तब
हमें हवा के हवाले कर दिया जाता है और हम चारों ओर बिखर जाते हैं।
तुम्हारे बीच मेरे दिन थोड़े थे और मेरे द्वारा बोले गए
शब्द उनसे भी कम।
लेकिन यदि तुम्हारे कानों में मेरी आवाज़ मद्धिम पड़ जाए और
तुम्हारी स्मृति से मेरा प्रेम मिट जाए, तब मैं फिर आऊँगा।
और तब मेरा हृदय अधिक समृद्ध होगा और मेरे होंठ आत्मा की
वाणी के प्रति अधिक ग्रहणशील होंगे और मैं बोलूँगा।
हाँ, मैं ज्वार
के साथ लौटूँगा।
और यद्यपि मृत्यु मुझे छिपा सकती है और महान मौन मुझे अपने
भीतर समेट सकता है, फिर भी
मैं एक बार फिर तुम्हारी समझ की खोज करूँगा।
और मेरी यह खोज व्यर्थ नहीं होगी।
यदि मैंने जो कुछ कहा है उसमें कुछ सत्य है, तो वह सत्य अधिक स्पष्ट स्वर में और ऐसे
शब्दों में स्वयं को प्रकट करेगा जो तुम्हारे विचारों के अधिक निकट होंगे।
ओर्फलीज़ के लोगो, मैं हवा के साथ जा रहा हूँ, लेकिन शून्य में नीचे
नहीं उतर रहा।
और यदि यह दिन तुम्हारी आवश्यकताओं और मेरे प्रेम की पूर्ति
नहीं है, तो इसे किसी दूसरे दिन तक के लिए एक वचन
मान लो।
मनुष्य की आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं, लेकिन उसका प्रेम नहीं बदलता न ही यह इच्छा
कि उसका प्रेम उसकी आवश्यकताओं को पूरा करे।
इसलिए जान लो कि उस महान मौन से मैं लौटूँगा।
भोर में दूर चली जाने वाली धुंध, जो खेतों में केवल ओस छोड़ जाती है,
फिर उठेगी, बादल में इकट्ठी होगी और फिर वर्षा
बनकर नीचे गिरेगी।
और मैं उस धुंध से भिन्न नहीं रहा हूँ।
रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारी गलियों में चला हूँ और
मेरी आत्मा तुम्हारे घरों में प्रवेश कर गई है।
तुम्हारे हृदयों की धड़कनें मेरे हृदय में थीं और तुम्हारी
साँस मेरे चेहरे पर थी और मैं तुम सबको जानता था।
हाँ, मैं
तुम्हारे आनंद और तुम्हारे दुख को जानता था और तुम्हारी नींद में तुम्हारे स्वप्न
मेरे स्वप्न थे।
और कितनी ही बार मैं तुम्हारे बीच पर्वतों के बीच की एक झील
रहा हूँ।
मैंने तुम्हारे भीतर पर्वत-शिखरों और झुकी हुई ढलानों का
प्रतिबिंब देखा है और तुम्हारे विचारों और इच्छाओं के गुजरते हुए झुंडों का भी।
और मेरी नीरवता में तुम्हारे बच्चों की हँसी धाराओं के रूप
में आकर मिली और तुम्हारे युवाओं की लालसा नदियों के रूप में।
और जब वे धाराएँ और नदियाँ मेरी गहराई तक पहुँचीं, तब भी उनका गाना बंद नहीं हुआ।
लेकिन उनसे भी अधिक मधुर और लालसा से भी अधिक महान कुछ मेरे
पास आया।
वह तुम्हारे भीतर का असीम था। वह विराट मनुष्य, जिसमें तुम सब केवल कोशिकाएँ और स्नायु हो।
वह, जिसके गान में
तुम्हारा सारा गायन केवल एक निःशब्द स्पंदन मात्र है।
उस विराट मनुष्य में ही तुम विराट हो और उसे देखते हुए ही
मैंने तुम्हें देखा और तुमसे प्रेम किया।
क्योंकि प्रेम किन-किन दूरियों तक पहुँच सकता है जो उस
विराट मंडल के भीतर न हों?
कौन-से दर्शन, कौन-सी आशाएँ और कौन-से अनुमान उस उड़ान से भी आगे निकल सकते हैं?
तुम्हारे भीतर वह विराट मनुष्य ऐसे है जैसे सेब के फूलों से
लदा हुआ कोई विशाल बलूत का वृक्ष।
उसकी शक्ति तुम्हें धरती से बाँधती है, उसकी सुगंध तुम्हें आकाश में उठा ले जाती
है, और उसकी स्थायित्व में तुम मृत्यु से परे हो।
तुमसे कहा गया है कि तुम भी एक जंजीर के समान हो। अपनी सबसे
कमजोर कड़ी जितने ही कमजोर।
लेकिन यह केवल आधा सत्य है।
तुम अपनी सबसे मजबूत कड़ी जितने ही मजबूत भी हो।
तुम्हें तुम्हारे सबसे छोटे कर्म से आँकना ऐसा है जैसे
समुद्र की शक्ति का अनुमान उसके झाग की दुर्बलता से लगाना।
तुम्हारी असफलताओं के आधार पर तुम्हारा न्याय करना ऐसा है
जैसे ऋतुओं की अस्थिरता के लिए ऋतुओं को ही दोष देना।
हाँ, तुम
समुद्र के समान हो।
और यद्यपि भारी तल वाले जहाज़ तुम्हारे तटों पर ज्वार की
प्रतीक्षा करते रहते हैं, फिर भी
तुम समुद्र के समान अपने ज्वार को शीघ्र नहीं ला सकते।
और तुम ऋतुओं के समान भी हो।
और यद्यपि अपनी शीत ऋतु में तुम अपने वसंत को नकार देते हो,
फिर भी वसंत तुम्हारे भीतर विश्राम करते हुए अपनी उनींदी
अवस्था में मुस्कराता रहता है और तुम्हारी उपेक्षा से अप्रसन्न नहीं होता।
ऐसा मत सोचो कि मैं ये बातें इसलिए कह रहा हूँ कि तुम
एक-दूसरे से कहो, “उसने
हमारी कितनी अच्छी प्रशंसा की। उसने हमारे भीतर केवल अच्छाई ही देखी।”
मैं तो तुम्हें उन बातों को शब्दों में कह रहा हूँ जिन्हें
तुम स्वयं विचारों में जानते हो। और शब्दों में व्यक्त ज्ञान, उस ज्ञान की छाया के अतिरिक्त और क्या है
जो शब्दों से परे है?
तुम्हारे विचार और मेरे शब्द उस बंद स्मृति से उठने वाली
तरंगें हैं, जो हमारे बीते हुए
कलों का लेखा सँजोए हुए है,
और उन प्राचीन दिनों का भी,
जब धरती हमें नहीं जानती थी, न स्वयं को और उन
रातों का भी, जब धरती उथल-पुथल और अराजकता से व्याकुल थी।
बुद्धिमान लोग तुम्हारे पास आए हैं ताकि तुम्हें अपनी
बुद्धि में से कुछ दे सकें।
मैं तुम्हारी बुद्धि में से कुछ लेने आया था और देखो, मुझे बुद्धि से भी महान कुछ मिल गया।
वह तुम्हारे भीतर की एक ज्वलंत आत्मा है, जो निरंतर स्वयं को और अधिक संचित करती
रहती है,
जबकि तुम, उसके
विस्तार से अनजान, अपने दिनों के मुरझाने पर विलाप करते रहते
हो।
यह उन शरीरों में जीवन की जीवन की खोज है जो कब्र से भयभीत
हैं।
यहाँ कोई कब्रें नहीं हैं।
ये पर्वत और मैदान एक पालना हैं और एक पग रखने की सीढ़ी।
जब कभी तुम उस खेत के पास से गुजरते हो जहाँ तुमने अपने
पूर्वजों को दफनाया है, तो उसे
ध्यान से देखना और तुम स्वयं को और अपने बच्चों को हाथों में हाथ डाले नाचते हुए
देखोगे।
सचमुच, तुम
अक्सर बिना जाने ही आनंद मनाते हो।
दूसरे लोग तुम्हारे पास आए हैं और तुम्हारे विश्वास के बदले
तुम्हें सोने के वादे देकर तुमसे धन, शक्ति और यश ले गए हैं।
मैंने वादे से भी कम तुम्हें दिया है, फिर भी तुम मेरे प्रति अधिक उदार रहे हो।
तुमने मुझे जीवन के प्रति और अधिक गहरी प्यास दी है।
निश्चय ही मनुष्य के लिए इससे बड़ा कोई उपहार नहीं कि उसकी
सभी आकांक्षाओं को प्यासे होंठों में और समस्त जीवन को एक झरने में बदल दे।
और मेरा सम्मान और मेरा प्रतिफल इसी में है कि जब भी मैं उस
झरने के पास पीने आता हूँ, तो स्वयं
जीवित जल को भी प्यासा पाता हूँ और जब मैं उसे पीता हूँ, तब
वह मुझे पीता है।
तुममें से कुछ ने मुझे अभिमानी समझा है और उपहार स्वीकार
करने में अत्यधिक संकोची भी।
वेतन या मजदूरी स्वीकार करने के लिए तो मैं सचमुच बहुत
अभिमानी हूँ, लेकिन उपहार स्वीकार
करने के लिए नहीं।
और यद्यपि जब तुम चाहते थे कि मैं तुम्हारी मेज़ पर बैठकर
भोजन करूँ, तब मैंने पहाड़ियों के
बीच बेर खाए और जब तुम प्रसन्नता से मुझे आश्रय देना चाहते थे, तब मैंने मंदिर के बरामदे में सोया। फिर भी क्या तुम्हारे प्रेमपूर्ण
ध्यान ने... तुम्हारी मेरी रातों और दिनों की चिंता ने... मेरे मुँह के भोजन को
मधुर और मेरी नींद को स्वप्नों से भर नहीं दिया?
इसी के लिए मैं तुम्हें सबसे अधिक आशीष देता हूँ।
तुम बहुत कुछ देते हो और जानते तक नहीं कि तुम कुछ दे रहे
हो।
सचमुच, जो
दयालुता स्वयं को दर्पण में निहारती है, वह पत्थर बन जाती है
और जो भलाई स्वयं को कोमल नामों से पुकारती है, वह अंततः एक
शाप को जन्म देती है।
और तुममें से कुछ ने मुझे दूर रहने वाला कहा है, अपनी ही एकांतता में डूबा हुआ और तुमने कहा
है, “वह जंगल के वृक्षों से मंत्रणा करता है, मनुष्यों से नहीं। वह पहाड़ों की चोटियों पर अकेला बैठता है और हमारे नगर
को नीचे देखता रहता है।”
यह सच है कि मैं पहाड़ियों पर चढ़ा हूँ और दूर-दराज़ के
स्थानों में चला हूँ।
मैं तुम्हें और कैसे देख सकता था, यदि किसी ऊँचाई या किसी बड़ी दूरी से नहीं?
और कोई वास्तव में निकट कैसे हो सकता है, जब तक कि वह दूर न हो?
और तुममें से दूसरे लोगों ने मुझे बिना शब्दों के पुकारा और
कहा, “अजनबी, अजनबी, उन दुर्गम ऊँचाइयों के प्रेमी, तुम उन चोटियों पर क्यों रहते हो जहाँ गरुड़ अपने घोंसले बनाते हैं?
तुम उस अप्राप्य वस्तु की खोज क्यों करते हो?
तुम कौन-से तूफ़ान अपने जाल में पकड़ना चाहते हो और आकाश
में उड़ते वाष्पमय पक्षियों का शिकार क्यों करते हो?
आओ और हममें से एक बन जाओ।
नीचे उतर आओ और हमारी रोटी से अपनी भूख मिटाओ और हमारी
मदिरा से अपनी प्यास बुझाओ।”
उन्होंने
अपनी आत्माओं के एकांत में ये बातें कहीं।
लेकिन यदि उनका एकांत और भी गहरा होता, तो वे जान पाते कि मैं केवल तुम्हारे आनंद
और तुम्हारे दुःख के रहस्य की खोज कर रहा था और मैं केवल तुम्हारे उन विराट रूपों
का शिकार कर रहा था जो आकाश में विचरण करते हैं।
लेकिन शिकारी भी शिकार था क्योंकि मेरे बहुत-से तीर मेरे
धनुष से निकलकर मेरे ही हृदय की ओर जा पहुँचे।
और उड़ने वाला भी रेंगने वाला था क्योंकि जब सूर्य में मेरे
पंख फैलते थे, तो धरती पर उनकी छाया
एक कछुआ होती थी।
और मैं, विश्वास
करने वाला, संदेह करने वाला भी था क्योंकि अक्सर मैंने अपने
ही घाव में अपनी उँगली रखी ताकि तुम पर मेरा विश्वास और तुम्हारा मेरा ज्ञान और
अधिक गहरा हो सके।
और इसी विश्वास और इसी ज्ञान के साथ मैं कहता हूँ, तुम अपने
शरीरों के भीतर बंद नहीं हो, न
घरों या खेतों में सीमित हो।
जो कुछ तुम हो, वह पर्वत के ऊपर निवास करता है और हवा के साथ विचरता है।
वह ऐसी कोई वस्तु नहीं जो गर्मी पाने के लिए धूप में रेंगकर
जाए या सुरक्षा के लिए अँधेरे में बिल खोदे बल्कि वह स्वतंत्र है। एक आत्मा, जो धरती को चारों ओर से घेरे हुए है और
आकाशीय अंतरिक्ष में गतिमान है।
यदि ये शब्द अस्पष्ट हैं,
तो इन्हें स्पष्ट करने का प्रयत्न मत करो।
सभी वस्तुओं का आरंभ अस्पष्ट और धुँधला होता है, उनका अंत ऐसा नहीं होता।
और मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे एक आरंभ के रूप में याद रखो।
जीवन और वह सब जो जीवित है,
धुंध में जन्म लेता है, स्फटिक की स्पष्टता
में नहीं।
और कौन जाने, स्फटिक स्वयं क्षीण होती हुई धुंध ही हो?
जब तुम मुझे याद करो, तो यह याद रखना चाहता हूँ। तुममें जो सबसे दुर्बल और सबसे भ्रमित दिखाई
देता है, वही सबसे शक्तिशाली और सबसे दृढ़निश्चयी है।
क्या तुम्हारी साँस ने ही तुम्हारी हड्डियों की संरचना को
खड़ा करके उसे कठोर नहीं किया?
और क्या वह स्वप्न जिसके देखे जाने की तुम्हें स्मृति तक
नहीं, तुम्हारे नगर का निर्माता और उसमें मौजूद हर वस्तु का रचयिता नहीं था?
यदि तुम केवल उस साँस की ज्वार-तरंगों को देख पाते, तो तुम बाकी सब कुछ देखना बंद कर देते और
यदि तुम उस स्वप्न की फुसफुसाहट सुन पाते, तो तुम्हें कोई
दूसरी ध्वनि सुनाई न देती।
लेकिन तुम न देखते हो, न सुनते हो और यह अच्छा ही है।
तुम्हारी आँखों पर पड़ा पर्दा उन्हीं हाथों द्वारा उठाया
जाएगा जिन्होंने उसे बुना था और तुम्हारे कानों को भर देने वाली मिट्टी उन्हीं
उँगलियों द्वारा भेदी जाएगी जिन्होंने उसे गूँथा था।
और तुम देखोगे।
और तुम सुनोगे।
फिर भी तुम्हें इस बात का दुःख नहीं होगा कि तुम कभी अंधे
रहे थे, न इस बात का पछतावा होगा कि तुम कभी बहरे
रहे थे।
क्योंकि उस दिन तुम सभी वस्तुओं में छिपे उद्देश्यों को
जानोगे,
और तुम अँधेरे को उसी तरह आशीष दोगे जैसे प्रकाश को आशीष
देते हो।
यह सब कहने के बाद उसने चारों ओर देखा और अपने जहाज़ के
कप्तान को पतवार के पास खड़ा देखा, जो कभी फूले हुए पालों को देख रहा था और कभी दूर क्षितिज को।
और उसने कहा, “धैर्यवान, अत्यंत धैर्यवान है मेरे जहाज़ का कप्तान।
हवा चल रही है और पाल बेचैन हैं। पतवार भी दिशा माँग रही है;
फिर भी मेरा कप्तान चुपचाप मेरी चुप्पी की प्रतीक्षा कर रहा
है।
और मेरे ये नाविक, जिन्होंने उस महान समुद्र का गान सुना है, उन्होंने
भी धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी है।
अब
उन्हें और प्रतीक्षा नहीं करनी होगी।
मैं तैयार हूँ, धारा समुद्र तक पहुँच गई है और एक बार फिर
महान माता ने अपने पुत्र को अपनी छाती से लगा लिया है।
विदा, ओर्फलीज़
के लोगो।
यह दिन समाप्त हो गया है।
वह हमारे ऊपर उसी तरह बंद हो रहा है जैसे जल-कुमुदिनी अपने
आने वाले कल पर बंद होती है।
जो कुछ हमें यहाँ दिया गया है, उसे हम अपने पास रखेंगे।
और यदि वह पर्याप्त न हुआ,
तो हमें फिर एक साथ आना होगा और मिलकर उस दाता की ओर अपने हाथ
बढ़ाने होंगे।
यह मत भूलना कि मैं तुम्हारे पास लौटूँगा।
थोड़ी देर बाद मेरी लालसा फिर किसी दूसरे शरीर के लिए धूल
और झाग इकट्ठा करेगी।
थोड़ी देर हवा पर विश्राम का एक क्षण और कोई दूसरी स्त्री
मुझे जन्म देगी।
तुमसे और तुम्हारे साथ बिताई अपनी जवानी से विदा।
अभी कल ही तो हम एक स्वप्न में मिले थे।
तुमने मेरे एकांत में मेरे लिए गीत गाए थे और तुम्हारी
लालसाओं से मैंने आकाश में एक मीनार खड़ी की थी।
लेकिन अब हमारी नींद उड़ गई है और हमारा स्वप्न समाप्त हो
गया है और अब भोर नहीं है।
दोपहर हमारे ऊपर आ चुकी है और हमारी अधजागी अवस्था पूर्ण
दिन में बदल गई है, और हमें
अलग होना ही होगा।
यदि स्मृति की संध्या में हम एक बार फिर मिलें, तो हम फिर साथ-साथ बातें करेंगे और तुम
मेरे लिए और भी गहरा गीत गाओगे।
और यदि किसी दूसरे स्वप्न में हमारे हाथ एक-दूसरे से मिल
जाएँ, तो हम आकाश में एक और मीनार बनाएँगे।”
यह कहकर उसने नाविकों को संकेत किया।
तुरंत उन्होंने लंगर उठाया और जहाज़ को उसके बंधे हुए स्थान
से मुक्त कर दिया और वह पूर्व की ओर चल पड़ा।
और लोगों के बीच से ऐसी पुकार उठी मानो वह एक ही हृदय की
पुकार हो।
वह संध्या के आकाश में उठी और समुद्र के ऊपर दूर तक फैल गई, जैसे कोई विशाल तुरही बज उठी हो।
केवल अलमित्रा मौन खड़ी रही।
वह तब तक जहाज़ को देखती रही जब तक वह धुंध में ओझल नहीं हो
गया।
और जब सभी लोग वहाँ से चले गए, तब भी वह अकेली समुद्र की दीवार पर खड़ी
रही और अपने हृदय में उसके ये शब्द दोहराती रही—
“थोड़ी देर, हवा पर विश्राम का एक क्षण और कोई दूसरी
स्त्री मुझे जन्म देगी।”

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