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Friday, 11 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय चार: जलप्रलय और उसके बाद)

 

अध्याय 4 — जलप्रलय और उसके बाद

1915 में भी, जब उनकी मुलाकात उस्पेन्स्की से हुई, गुर्जिएफ़ को यह अवश्य एहसास हो गया होगा कि संस्थान स्थापित करने की उनकी योजनाएँ विफल होने के खतरे में हैं। सौभाग्य से, वे ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो इन बातों को दिल पर लेते। सुख-सुविधा और सुरक्षा अनिश्चितता की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक हो सकती हैं क्योंकि अनिश्चितता का एक लाभ यह है कि वह मन को सतर्क बनाए रखती है। वह विभिन्न समूहों के साथ अपना काम जारी रखते रहे, लेकिन समय आने पर आगे बढ़ जाने की तैयारी भी करते रहे। युद्ध हमेशा उनके ऊपर मंडराता रहता था। उस्पेन्स्की विशेष रूप से उस दृश्य से प्रभावित हुए जिसमें बैसाखियों से लदा हुआ एक ट्रक एक सैन्य अस्पताल की ओर जा रहा था। उन अंगों के लिए बैसाखियाँ, जो अभी तक बम से उड़ाए भी नहीं गए थे। प्रतिद्वंद्वी सेनाएँ देशभक्ति और आक्रोश जैसी पूरी तरह यांत्रिक भावनाओं पर प्रतिक्रिया कर रही थीं और कोई भी चीज़ उन्हें एक-दूसरे का कत्लेआम करने से रोक नहीं सकती थी। सेंट पीटर्सबर्ग में उस्पेन्स्की का समूह अक्सर नूह की नाव (Noah’s Ark) के विचार पर चर्चा करता था। ऐसा जहाज़ जो आने वाली घटनाओं के जलप्रलय से बच सके और अपने बनाने वालों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सके।

By Joe Michelli 

इस समय गुर्जिएफ़ मॉस्को में अपना काम जारी रखे हुए थे। उस्पेन्स्की के समूह के सदस्य कभी-कभी वहाँ जाते और गुर्जिएफ़ के नवीनतम व्याख्यानों के नोट्स लेकर लौटते। ‘कार्य’ (the work) मूलतः आत्म-निरीक्षण पर आधारित था, जो गुर्जिएफ़ की ‘केन्द्रों’ (centres) संबंधी शिक्षा पर आधारित था। मूलभूत समस्या यह थी कि ‘स्वयं को कैसे याद रखा जाए,’ अर्थात ‘self-remembering’ कैसे किया जाए। हमारी सामान्य चेतना की अवस्था में कोई केंद्रीय ‘मैं’ नहीं होता। जब मैं सुबह अपनी आँखें खोलता हूँ तो चीज़ें ‘दिखाई देती हैं’, लेकिन उन्हें देखने वाला ‘मैं’ नहीं होता। उन्हें ‘मशीन’, अर्थात रोबोट देख रहा होता है। उस्पेन्स्की ने इस विचार को एक सुविधाजनक चित्र के माध्यम से समझाया। जब मैं बाहरी दुनिया पर ध्यान देता हूँ तो मैं ऐसा हूँ जैसे बाहर की ओर संकेत करता हुआ एक तीर। जब मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ और ‘अपने भीतर’ उतरता हूँ तो मेरा ध्यान भीतर की ओर संकेत करता हुआ तीर बन जाता है। अब यदि मैं दोनों काम एक साथ करने की कोशिश करूँ अर्थात उस ‘तीर’ को एक ही समय में भीतर और बाहर दोनों ओर संकेत करने दूँ तो मुझे तुरंत पता चलता है कि यह कितना अविश्वसनीय रूप से कठिन है। एक-दो सेकंड बाद ही या तो मैं बाहरी दुनिया को भूलकर दिवास्वप्न में डूब जाता हूँ या फिर ‘अपने आप’ को भूलकर उस वस्तु में पूरी तरह डूब जाता हूँ जिसे मैं देख रहा हूँ। लेकिन गुर्जिएफ़ के अनुसार, स्वयं को याद रखने के ये क्षण जब तीर एक ही समय में दोनों दिशाओं में संकेत करता है, हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण होते हैं। गहरे सुख के सभी क्षणों में हमें एक ऐसा अनुभव होता है जिसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है, ‘क्या! मैं... यहाँ?’ मुझे केवल इस बात की चेतना नहीं होती कि मेरे साथ क्या घट रहा है बल्कि इस बात की भी चेतना होती है कि यह मेरे साथ घट रहा है। मॉस्को के दिनों में गुर्जिएफ़ के सबसे मूलभूत अभ्यासों में से एक यह था कि किसी वस्तु, मान लीजिए एक घड़ी को देखने का प्रयास किया जाए और उसी समय स्वयं को यह देखने के प्रति भी सचेत किया जाए कि ‘मैं उसे देख रहा हूँ’। उनके शिष्यों को शीघ्र ही यह एहसास होने लगा कि स्वयं को याद रखना (कितना) अत्यंत कठिन है।

गुर्जिएफ़ ने कहा, यह स्पष्ट है कि वर्तमान अवस्था में मनुष्य के भीतर कुछ बहुत बुनियादी रूप से गलत है। हम इतना कुछ अनुभव क्यों करें, केवल इसलिए कि उसके तुरंत बाद उसे भूल जाएँ? हमारे अनुभवों का आधा हिस्सा तो ऐसे हमसे फिसल जाता है जैसे पानी बत्तख की पीठ से फिसल जाता है। फिर भी अनुभव भोजन है और उसका उद्देश्य हमें विकसित होने में सक्षम बनाना है।

उस्पेन्स्की ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि इस दृष्टि से स्वयं को याद रखने के प्रयास अत्यंत मूल्यवान हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, उन दिनों मुझे रात में सेंट पीटर्सबर्ग की गलियों में घूमना और वहाँ के मकानों तथा सड़कों को ‘महसूस’ करना बहुत पसंद था। सेंट पीटर्सबर्ग ऐसे विचित्र संवेदनों से भरा हुआ है। मकान, विशेषकर पुराने मकान, बिल्कुल जीवित प्रतीत होते थे। ऐसा लगता था कि मैं उनसे लगभग बात कर सकता हूँ। इसमें ‘कल्पना’ जैसी कोई बात नहीं थी। मैं किसी चीज़ के बारे में सोचता नहीं था। मैं केवल चलता रहता था, स्वयं को याद रखने का प्रयास करता था और अपने आस-पास देखता था। वे संवेदनाएँ अपने आप उत्पन्न होती थीं।

उस्पेन्स्की उस नियंत्रण-बोध की शुरुआत का अनुभव कर रहे थे, जिसे बाद में फॉन्टेनब्लो में बेनेट ने अनुभव किया था।

उस्पेन्स्की स्वयं को याद रखने के एक असफल प्रयास की एक मज़ेदार कहानी भी सुनाते हैं।

“एक बार मैं लितेनी मार्ग से नेव्स्की की ओर जा रहा था और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद अपना ध्यान स्वयं को याद रखने पर टिकाए रखने में असमर्थ था। शोर, लोगों की आवाजाही... हर चीज़ मेरा ध्यान भटका रही थी। हर मिनट मैं अपने ध्यान की कड़ी खो देता, फिर उसे वापस पा लेता और फिर दोबारा खो देता। अंततः मुझे अपने ऊपर एक तरह की हास्यास्पद झुंझलाहट महसूस हुई और मैं बाईं ओर की एक गली में मुड़ गया। मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि कम-से-कम कुछ समय तक अपना ध्यान इस बात पर बनाए रखूँगा कि मुझे स्वयं को याद रखना है। मैं नेदेझ्दिन्स्काया पहुँच गया और इस दौरान ध्यान की वह कड़ी लगभग नहीं खोई, सिवाय शायद कुछ छोटे-छोटे क्षणों के। फिर मैं दोबारा नेव्स्की की ओर मुड़ा। मुझे लगा कि शांत गलियों में विचार की इस कड़ी को बनाए रखना आसान है, इसलिए मैं स्वयं को अधिक शोर वाली गलियों में परखना चाहता था। मैं नेव्स्की तक पहुँच गया और तब भी स्वयं को याद रखे हुए था। अब मुझे उस विचित्र भावनात्मक अवस्था का अनुभव होने लगा था जो इस तरह के बड़े प्रयास के बाद आती है... भीतर की शांति और आत्मविश्वास की अवस्था। ठीक मोड़ के पास एक तंबाकू की दुकान थी, जहाँ मेरे लिए सिगरेट बनाई जाती थीं। स्वयं को याद रखते हुए मैंने सोचा कि वहाँ जाकर कुछ सिगरेट मँगवा लूँ। दो घंटे बाद मेरी आँखें तावरीचेस्काया में खुलीं अर्थात वहाँ से बहुत दूर। जागने का वह अनुभव असाधारण रूप से तीव्र था। मैं लगभग कह सकता हूँ कि मैं सचमुच होश में आया। मुझे सब कुछ एक साथ याद आ गया। मैं कैसे नेदेझ्दिन्स्काया मार्ग पर चल रहा था, कैसे स्वयं को याद रख रहा था, कैसे मैंने सिगरेट के बारे में सोचा था और कैसे उसी विचार के आते ही ऐसा लगा था कि मैं अचानक गिर पड़ा और गहरी नींद में विलीन हो गया। और फिर भी, इस नींद में डूबे रहने के दौरान मैं लगातार उचित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से काम करता रहा था। ...तावरीचेस्काया से होकर गाड़ी में जाते समय मुझे एक अजीब बेचैनी महसूस होने लगी, मानो मैं कुछ भूल गया हूँ। और अचानक मुझे याद आया कि मैं स्वयं को याद रखना भूल गया था।”

यह प्रसंग कई महत्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करता है। सबसे पहले, स्वयं को याद रखने के साथ आने वाली गहरी संतुष्टि और नियंत्रण की वह विचित्र अनुभूति, जिसकी तुलना लगभग यौन संतुष्टि से की जा सकती है। एक गहरी और व्यापक चेतना के जन्म जैसी होती है। फिर यह ध्यान देने योग्य है कि सिगरेट का विचार ही उसे ‘नींद’ में ले गया था। इससे समझ में आता है कि गुर्जिएफ़ को कुछ पुरानी आदतों को जान-बूझकर छोड़ना इतना महत्वपूर्ण क्यों लगता था ताकि उससे पैदा होने वाला तनाव एक ‘अलार्म घड़ी’ की तरह काम करे। यदि उस्पेन्स्की ने धूम्रपान छोड़ने का संकल्प किया होता तो तंबाकू का विचार स्वयं उसके उद्देश्य को बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त ‘झटका’ बन जाता, ऑक्टेव के उस कमजोर बिंदु को मजबूत करने वाला झटका।

अंत में, यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह एहसास होना कि वह स्वयं को याद रखना भूल गया था, वास्तव में जागने जैसा था। गुर्जिएफ़ का यह कथन कि सामान्य चेतना नींद का एक रूप है, केवल एक रूपक के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसे शाब्दिक अर्थ में लेना चाहिए। एक अन्य अवसर पर उस्पेन्स्की बताते हैं कि उन्होंने स्वयं को याद रखने की इतनी तीव्र अवस्था प्राप्त कर ली थी कि सड़क पर चलते हुए वह वास्तव में देख सकते थे कि लोग सोए हुए हैं और उनके सिर किसी प्रकार के स्वप्नों के बादल में लिपटे हुए दिखाई देते थे। फिर से, इसे केवल एक रूपक नहीं समझना चाहिए। ऐसा लगता है कि स्वयं को याद रखने से एक विचित्र प्रकार की ‘टेलीपैथी’ उत्पन्न होती है, जिसमें चेतना वास्तविकता के कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र के प्रति जागरूक हो जाती है। संभावना है कि एक अर्थ में उस्पेन्स्की सचमुच ‘उनके सिरों के भीतर’ देख सकते थे।

1916 की सर्दी जैसे-जैसे लंबी खिंचती गई, उस्पेन्स्की के लिए यह स्पष्ट होता गया कि उनका ‘Ark’ उन्हें अपने चारों ओर फैल रही अराजकता से बचाने वाला नहीं था। उस वर्ष क्रिसमस के ठीक बाद ज़ारिना का प्रिय रासपुतिन गायब हो गया। उसने भविष्यवाणी की थी कि यदि उसकी हत्या किसानों द्वारा की गई तो रूस सैकड़ों वर्षों तक समृद्ध बना रहेगा, लेकिन यदि उसकी हत्या अभिजात वर्ग के किसी व्यक्ति ने की तो राजपरिवार का विनाश निश्चित होगा और रूस में कोई भी कुलीन व्यक्ति जीवित नहीं बचेगा। उसकी हत्या प्रिंस फ़ेलिक्स युसुपोव ने की और कुछ सप्ताह बाद उसका शव नेवा नदी से बरामद हुआ।

गुर्जिएफ़ अपने गृह नगर अलेक्ज़ान्द्रोपोल लौट गए और उन्होंने उस्पेन्स्की को वहाँ आने के लिए तार भेजा। उस्पेन्स्की गुर्जिएफ़ की पृष्ठभूमि की इस झलक से बहुत उत्सुक हुए, विशेषकर एक ऐसी बड़ी की गई तस्वीर को देखकर जिसमें गुर्जिएफ़ को युवावस्था में फ्रॉक-कोट पहने दिखाया गया था। उस्पेन्स्की के अनुसार, इस तस्वीर से उन्होंने अनुमान लगा लिया कि उस समय गुर्जिएफ़ का पेशा क्या था, लेकिन उन्होंने उस रहस्य को अपने तक ही रखने का निश्चय किया। यह, निश्चित रूप से, वही ‘हिप्नोटिस्ट’ वाली तस्वीर थी जिसे बेनेट ने ‘गुर्जिएफ़: मेकिंग ए न्यू वर्ल्ड’ (Gurdjieff: Making a New World) में प्रकाशित किया है।

उस्पेन्स्की उलझन में थे। गुर्जिएफ़ अपना काम अच्छी तरह करते हुए और ऐतिहासिक घटनाओं से अप्रभावित दिखाई देते थे। उन्होंने उस्पेन्स्की से कहा कि उन्हें लगता है कि परिस्थितियाँ जल्द ही शांत हो जाएँगी और वे रूस में अपना काम जारी रख सकेंगे। (यदि वे सचमुच गंभीर थे और गुर्जिएफ़ के मामले में यह कभी निश्चित नहीं कहा जा सकता तो वे असाधारण रूप से दूरदृष्टिहीन थे।) फिर भी, गुर्जिएफ़ स्पष्ट रूप से किसी गहरे विचार में डूबा हुए थे। किस बात पर? संभवतः इस भावना पर कि उनकी ‘विधि’ अभी भी संतोषजनक नहीं थी और किसी नई चीज़ की आवश्यकता थी... कुछ अधिक व्यावहारिक। लोग नई धारणाओं को आराम से आत्मसात कर सकते हैं और फिर वापस सो सकते हैं। उसे लोगों को जागृत रखने के लिए नए तरीके खोजने थे।

उस्पेन्स्की सेंट पीटर्सबर्ग लौट गए। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि उनका इरादा किस्लोवोद्स्क जाकर एक नया कार्य-समूह स्थापित करने का है और उन्होंने उस्पेन्स्की तथा अन्य इच्छुक लोगों को वहाँ उनके साथ आने की सलाह दी। वास्तव में, गुर्जिएफ़ काकेशस के एस्सेन्तुकी चले गए। उन्होंने एक विला किराये पर लिया और गाँव के किनारे एक मकान भी लिया। वहाँ छह सप्ताह तक उनके शिष्यों ने एक नई तरह की तीव्रता के साथ काम किया। सबसे पहले गुर्जिएफ़ ने विभिन्न अभ्यास और तकनीकें शुरू कराईं। कुछ अभ्यासों में मांसपेशियों पर जोर देना या उन्हें ढीला करना शामिल था और आज के किसी योग-विद्यार्थी को वे परिचित लग सकते हैं। दूसरे अभ्यास अधिक जटिल थे। यहीं गुर्जिएफ़ ने अपने सबसे चौंकाने वाले और प्रभावशाली अभ्यासों में से एक शुरू कराया। ‘Stop’ यानी ‘रुक जाओ’ का अभ्यास। जब वे ‘Stop!’ कहते तो हर व्यक्ति को उसी क्षण जो कुछ भी वह कर रहा था, उसे बिल्कुल तुरंत रोक देना होता था। भले ही वह अपना एक कदम बीच में ही उठा रहा हो या मुँह में रखा भोजन निगलने वाला ही क्यों न हो। उसका कहना था कि इसका उद्देश्य लोगों को अपने काम करने के ढंग के प्रति जागरूक करना था। अपनी शारीरिक मुद्रा और मांसपेशियों की प्रतिक्रिया के प्रति बिल्कुल सटीक जागरूकता पैदा करना। बाद के वर्षों में प्रीएरे में वह आधी रात को छात्रावास में आ सकते थे और उँगलियाँ चटका सकते थे। तब हर व्यक्ति को कुछ ही सेकंड के भीतर बिस्तर से बाहर निकलकर किसी जटिल शारीरिक मुद्रा में खड़ा हो जाना पड़ता था। वह पूर्ण सतर्कता विकसित करने का प्रयास कर रहे थे।

गुर्जिएफ़ ने समझाया कि वह उन्हें ‘अति-प्रयास’ (super-effort) के सिद्धांत से परिचित करा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति खराब मौसम में पच्चीस मील पैदल चलता है और ठंडा तथा भूखा घर पहुँचता है और फिर घर के भीतर जाने से पहले दो मील और चलने का निर्णय करता है तो यह ‘अति-प्रयास’ है।

लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ गुर्जिएफ़ किसी महत्वपूर्ण बात को समझाने में असफल रहे। महत्वपूर्ण स्वयं ‘अति-प्रयास’ नहीं है बल्कि वह ऊर्जा है जिसे हम उस अति-प्रयास का सामना करने के लिए अपने भीतर से बुलाते हैं। गुर्जिएफ़ की ‘प्रणाली’ का पूरा उद्देश्य और न तो उनकी अपनी पुस्तकों में और न ही उनके बारे में लिखी गई पुस्तकों में इस बात पर पर्याप्त जोर दिया गया है। इस मूल धारणा पर आधारित है कि मनुष्य के भीतर उसकी कल्पना से कहीं अधिक ऊर्जा मौजूद है, ‘जीवनी-शक्ति के भंडार’ (vital reserves) की एक विशाल झील। जो चीज़ हमें इन भंडारों से काट देती है, वह आलस्य की भावना या अधिक सही ढंग से कहें तो अनिच्छा है। हम किसी प्रयास के बारे में सोचते हैं और कहते हैं, ‘ओह, कितना उबाऊ काम है।’ और यह ऊब की भावना तुरंत हमारी जीवन-शक्ति को कम कर देती है। यदि मैं किसी अति-प्रयास जैसे, उन अतिरिक्त दो मील चलने को आत्म-दया से कराहते हुए करूँ तो उसका कोई लाभ नहीं होगा। लेकिन यदि कोई अचानक आया संकट या अचानक मिली कोई अच्छी खबर (जैसे कि कोई प्रिय व्यक्ति दो मील दूर मेरा इंतज़ार कर रहा है) मुझे वे दो मील चलने का निर्णय करने के लिए प्रेरित कर दे तो मैं उन्हें फुर्तीले कदमों से चलूँगा और आवश्यकता पड़ने पर दस गुना अधिक दूरी तय करने के लिए भी तैयार रहूँगा। यही, इसलिए, इस अभ्यास का वास्तविक उद्देश्य है। उस आशावादी अवस्था और आंतरिक उद्देश्य-बोध को अपने भीतर जगाना, जो अति-प्रयास को आसान बना देता है। फ्रिट्ज़ पीटर्स की कहानी इसका प्रमाण है (देखिए अध्याय 1) कि गुर्जिएफ़ ने इन ‘जीवनी-शक्ति के भंडारों’ का उपयोग करने और अपनी ‘अनिच्छा’ को दबाकर उसके ऊपर विजय पाने की कला में महारत हासिल कर ली थी।

लेकिन गुर्जिएफ़ के ‘असाधारण प्रयास’ (super-effort) के सिद्धांत का व्यावहारिक महत्त्व यह था कि उनका मानना था कि इससे ‘कार्य’ (work) को एक नया आधार मिल सकता है। सेंट पीटर्सबर्ग या मॉस्को में अब तक ‘कार्य’, एक अर्थ में, पूरी तरह आंतरिक था। लेकिन अब गुर्जिएफ़ जान-बूझकर ऐसी कठिनाइयाँ खोज रहे थे, जिनके सामने वे अपने अनुयायियों को खड़ा कर सकें ताकि वे आवश्यक ऊर्जा और ध्यान को ‘एकत्रित’ करने के लिए बाध्य हों। मसलन, जब उनके शिष्य थॉमस द हार्टमैन, जो पहले सेना में अधिकारी रह चुके थे अपनी पत्नी के साथ वहाँ पहुँचे तो गुर्जिएफ़ ने ज़खारोफ़ नामक एक अनुयायी से समोवर में चाय बनाने को कहा। इसमें समोवर के नीचे लकड़ी और कोयले के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े जलाने की एक कठिन प्रक्रिया शामिल थी। वे बड़ी मुश्किल से जलते थे और यदि ज़खारोफ़ एक क्षण के लिए भी दूसरी ओर देख लेता तो आग बुझ जाती और उसे पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती। ऐसा लगता है कि अपने शेष जीवन में गुर्जिएफ़ को जान-बूझकर परेशानी और उलझन पैदा करने में बहुत आनंद आने लगा था। एक समय तो फ्रिट्ज़ पीटर्स ने क्रोध में आकर उनसे संबंध ही तोड़ लिया था। इसका उद्देश्य अपने शिष्यों को ‘असाधारण प्रयास’ करने के लिए मजबूर करना था। गुर्जिएफ़ हार्टमैन और उनकी पत्नी को गाँव में केक खरीदने के लिए ले गए और लौटते समय अपनी चाल इतनी तेज़ कर दी कि वे लगभग दौड़ने लगे। यह भी अपने शिष्यों को असाधारण प्रयास का अभ्यस्त बनाने का एक तरीका था।

थॉमस द हार्टमैन की पुस्तक ‘आर लाइफ विद मि. गुर्जिएफ़’ (Our Life with Mr Gurdjieff) शायद एक व्यक्ति के रूप में गुर्जिएफ़ के बारे में लिखे गए सभी विवरणों में सबसे अधिक रोचक और रहस्योद्घाटन करने वाली पुस्तकों में से एक है। इसमें वे गुर्जिएफ़ की जान-बूझकर की गई एक और ‘चाल’ का वर्णन करते हैं।  एस्सेंटुकी में गुर्जिएफ़ ने घोषणा की कि उनका इरादा फ़ारस (Persia) जाने का है। इससे उनके अनुयायियों में तत्काल चिंता और भ्रम पैदा हो गया। हार्टमैन स्वयं अभी भी सेना के अधिकारी थे और बिना अत्यंत गहरे अंतरात्मिक संघर्ष के भगोड़ा सैनिक नहीं बन सकते थे। लेकिन जिस दिन उनके प्रस्थान की घोषणा की गई थी, उसी दिन गुर्जिएफ़ ने कहा कि वे केवल तुआप्से (Tuapse) तक जा रहे हैं, जो काला सागर के निकट था और जो भी उनके साथ जाना चाहे, उसका स्वागत है। हार्टमैन दंपति और कुछ अन्य लोगों ने उनके साथ जाने का निर्णय किया। लेकिन तुआप्से पहुँचने पर उन्होंने गुर्जिएफ़ को बिस्तर पर लेटे हुए पाया। वे मानो निर्णय न कर पाने की स्थिति में थे। वहाँ ‘एक ऐसा भारी वातावरण था जो उस समय मनुष्य को अभिभूत कर देता है, जब उसे पता नहीं होता कि क्या करना है।’ और हार्टमैन बहुत सूक्ष्म ढंग से जोड़ते हैं, ‘श्री गुर्जिएफ़ निश्चित रूप से ऐसा वातावरण पैदा करना जानते थे।’ दूसरे शब्दों में, गुर्जिएफ़ को यह एहसास हो गया था कि उनके अनुयायी अब उनके अपने दृढ़ उद्देश्य-बोध पर निर्भर होने लगे हैं और वे चाहते थे कि यह आदत मजबूत होकर स्थायी रूप धारण करने से पहले ही उन्हें इससे बाहर झकझोर दें।

इसके बाद जो हुआ, वह भी गुर्जिएफ़ के व्यवहार का विशिष्ट उदाहरण है। उन्होंने एक गाड़ी खरीदी और घोषणा की कि अब वे वहाँ से चलेंगे। गुर्जिएफ़ गाड़ी और सामान लेकर आगे निकल गए और हार्टमैन दंपति से कहा कि वे पहाड़ों के ऊपर से पैदल चलकर कुछ मील दूर उनसे आ मिलें। वह यात्रा लंबी, कठिन और गर्म थी। अंततः उन्हें एक सराय मिली, जहाँ वे प्रतीक्षा कर सकते थे। आखिरकार अँधेरा होने के बाद गुर्जिएफ़ वहाँ पहुँचे। लेकिन उन्होंने उन्हें सोने जाने देने के बजाय प्रस्ताव रखा कि यात्रा को चाँदनी में आगे जारी रखा जाए। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। मैडम द हार्टमैन ऊँची एड़ी के जूते पहने हुए थीं और रात के दो बजे तक चलते रहे। तभी बारिश शुरू हो गई। गुर्जिएफ़ ने उनसे आग जलाने को कहा और फिर कहा कि अब वे सोएँगे, सिवाय हार्टमैन के, जिन्हें पहरे पर जागते रहने का आदेश दिया गया।

अगले दिन हार्टमैन थकान से चक्कर खा रहे थे। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि वे गाड़ी पर रखे सामान के ऊपर चढ़ जाएँ। लेकिन हार्टमैन ने पाया कि जैसे ही वे आँखें बंद करते, वे गाड़ी से नीचे गिरने लगते। इसलिए उन्हें नींद से लड़ते हुए जागते रहना पड़ा। वास्तव में गुर्जिएफ़ उद्देश्य भी यही था। उनका विश्वास था कि तीव्र प्रयासों के माध्यम से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है। वही ऊर्जा जिसकी मनुष्य को स्वयं को रूपांतरित करने के लिए आवश्यकता होती है। इस ऊर्जा के बिना मनुष्य आत्म-परिवर्तन के बारे में सोच सकता है, यहाँ तक कि उसकी तीव्र इच्छा भी कर सकता है, लेकिन उसे वास्तव में प्राप्त नहीं कर सकता।

और इस प्रकार यात्रा चलती रही। कम-से-कम हार्टमैन अब उसके पीछे छिपे उद्देश्य को समझ चुके थे। वे लिखते हैं, ‘फ़ारस जाने की बात करके और हर प्रकार की भावनात्मक तथा शारीरिक कठिनाइयाँ पैदा करके, वह अपरिचित परिस्थितियों में हमारे सामने बाधाओं की एक ऐसी सीढ़ी बना रहे थे, जिसे पार करके हमें अपने भीतर के एक निश्चित छोटे-से “प्रयास” (थोड़ा-सा और करो) तक पहुँचना था। हमारे समग्र विकास के पैमाने में मौजूद उस “थोड़ा-सा और करो” तक।’

आउच-दारी (Outch-Dary) नामक एक स्थान पर गुर्जिएफ़ की सलाह के विरुद्ध पेड़ से बेर खाने के बाद हार्टमैन गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और मृत्यु के बहुत निकट पहुँच गए। प्रलाप की अवस्था में उन्होंने अपनी पत्नी को मारने की कोशिश तक की। जब गुर्जिएफ़ भीतर आए तो हार्टमैन उन्मत्त अवस्था में उन पर झपट पड़े। लेकिन जब गुर्जिएफ़ ने अपना हाथ उनके माथे पर रखा तो उन्हें गहरी शांति का अनुभव हुआ और उनका शरीर शिथिल हो गया। गुर्जिएफ़ के पास अब भी उनकी ‘जादुई’ शक्तियाँ थीं। अंततः हार्टमैन स्वस्थ हो गए और वे एस्सेंटुकी लौट आए। लगता है कि यह पूरी यात्रा ही हार्टमैन दंपति को असामान्य मानसिक और शारीरिक तनाव की स्थिति में डालने के उद्देश्य से बनाई गई थी।

यही बात एक रेस्तराँ से जुड़ी एक मनोरंजक घटना में भी दिखाई देती है। हार्टमैन का मन एक सामाजिक क्लब में जाने का हुआ और गुर्जिएफ़ ने ऐसा दिखाया मानो वे और उनके एक डॉक्टर मित्र रात के भोजन के लिए आमंत्रित किए गए हों। महँगाई उस समय एक गंभीर समस्या थी और हार्टमैन की कोई नियमित आय नहीं थी। फिर भी वे उन दोनों को रेस्तराँ ले गए। गुर्जिएफ़ ने वहाँ उपलब्ध सबसे महँगा भोजन मँगवा लिया। हार्टमैन को वेटर को कुछ अतिरिक्त पैसे देकर अपनी पत्नी के पास जाकर और 500 रूबल लाने के लिए कहना पड़ा। लेकिन अगले दिन गुर्जिएफ़ ने वह पैसा हार्टमैन को लौटा दिया और समझाया कि यह सब उन्होंने उसके अपने भले के लिए किया था। हार्टमैन अभी भी एक वयस्क व्यक्ति की तरह व्यवहार नहीं कर रहे थे जैसा कि उस भोजन को लेकर उनकी परेशानी और शर्मिंदगी से स्पष्ट था। उनके भीतर का बालसुलभ हिस्सा ही था, जिसे इस पूरी परिस्थिति में बेचैनी और संकोच का अनुभव कराया जा रहा था।

अब रूस की स्थिति गंभीर हो चुकी थी। बोल्शेविक क्रांति हो चुकी थी। अस्थायी केरेन्स्की सरकार को उखाड़ फेंका गया था और रूस गृहयुद्ध से फट पड़ा था। हार्टमैन जैसे विद्यार्थी और अन्य पूर्व सैन्य अधिकारी खतरे में थे। लेकिन उस समय तक बोल्शेविक केवल काकेशस की उत्तरी ढलानों तक ही आगे बढ़े थे। दक्षिण में मेन्शेविक अर्थात वे उदारवादी समाजवादी जो बोल्शेविकवाद का विरोध करते थे... अभी भी सत्ता में थे। दुर्भाग्य से, गुर्जिएफ़ और उनके विद्यार्थी बोल्शेविक क्षेत्र में थे। गुर्जिएफ़ ने सबसे पहले स्थानीय बोल्शेविकों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने अपने एक विद्यार्थी, जो श्वेत रूसी वकील था, से कहा कि वह जाकर उन्हें अपनी कानूनी सेवाएँ देने की पेशकश करे। उस वकील ने प्रूधों और फूरिए[1] के बारे में एक जोशीला भाषण देकर उन्हें विश्वास दिला दिया कि वह एक कट्टर क्रांतिकारी है और उसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया।

गुर्जिएफ़ ने उस वकील से यह भी कहा कि वह एस्सेंटुकी सोवियत को एक औपचारिक पत्र लिखे, जिसमें काकेशस के माउंट इंदुए (Mount Indue) के लिए एक वैज्ञानिक अभियान आयोजित करने की अनुमति माँगी जाए। उन्होंने समझाया कि इस अभियान में वहाँ खड़े हुए पत्थरों, डोल्मेन की खोज की जाएगी और साथ ही सोने की भी तलाश की जाएगी। गुर्जिएफ़ ने बड़ी चतुराई से प्यातिगोर्स्क के एक समाचार-पत्र में एक लेख भी प्रकाशित करवाया। प्यातिगोर्स्क उस क्षेत्र की उच्च सोवियत का मुख्यालय था। उस लेख में अभियान और उसके उद्देश्यों के महत्त्व का वर्णन किया गया था। अनुमति मिल गई। गुर्जिएफ़ ने बोल्शेविकों को ‘सोना धोने’ के लिए बड़ी मात्रा में शुद्ध शराब उपलब्ध कराने के लिए भी मना लिया। बाद में उसे अपने पीने के लिए पतला कर लिया गया। (उस समय किसी भी प्रकार की शराब मिलना लगभग असंभव था।) वह वकील, जो अब तक पासपोर्ट कार्यालय का प्रभारी बन चुका था, उन सभी के लिए सोवियत पासपोर्ट जारी कर देता था।

हार्टमैन यह देखकर हैरान होते थे कि गुर्जिएफ़ घोड़ों के पेट पर उन्हें पीटते थे और उन्हें गुस्से तथा भय में पिछले पैरों पर खड़ा होने के लिए मजबूर करते थे। बाद में जब सैनिक घोड़ों को जब्त करने आए और दो घंटे बाद उन्हें वापस ले आए, यह कहते हुए कि वे खतरनाक हैं, तब हार्टमैन समझ गए कि गुर्जिएफ़ ऐसा क्यों कर रहे थे। अंततः बोल्शेविकों ने उस ‘अभियान’ के लिए एक रेलगाड़ी भी उपलब्ध करा दी, जो उन्हें बोल्शेविक क्षेत्र की सीमा पर स्थित माइकोप (Maikop) तक ले गई। उनके एस्सेंटुकी छोड़ने के दो सप्ताह बाद ही आतंक का शासन शुरू हो गया और सभी पूर्व सैन्य अधिकारियों को गोली मार दी गई।

माइकोप पर श्वेत रूसी सेनाओं का कब्ज़ा हो गया। अब और पासपोर्ट हासिल करना आवश्यक हो गया और श्वेत रूसी अधिकारी बहुत कठिनाई पैदा कर रहे थे। लेकिन गुर्जिएफ़ का भाग्य फिर साथ दे गया। समूह के एक सदस्य का एक पुराना मित्र, जो एक एडमिरल था, वहाँ आ पहुँचा और उसने सारी व्यवस्था कर दी। गुर्जिएफ़ और उनका दल माइकोप से निकलने के अगले ही दिन उस पर फिर से बोल्शेविकों का कब्ज़ा हो गया। लेकिन तब तक वे दक्षिण की ओर जा चुके थे। तिफ़्लिस की यात्रा कठिन और खतरनाक थी। एक जगह हार्टमैन और उनके साथियों को डाकुओं ने रोक लिया और लूट लिया। (गुर्जिएफ़ अपने विशिष्ट सौभाग्य के कारण इस समय आगे निकल चुके थे और उन्हें किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।) सौभाग्य से, हार्टमैन की पत्नी ने डाकुओं को उनका कुछ आवश्यक सामान ले जाने से मना लिया। वे बिना किसी शारीरिक नुकसान के बच निकले, यह उनका सौभाग्य था। इसी रास्ते पर दूसरे यात्रियों की हत्या की जा चुकी थी।

गुर्जिएफ़ ने जो यह घोषणा की थी कि वे खड़े हुए पत्थरों की खोज करेंगे, वह पूरी तरह काल्पनिक नहीं थी। एक पहाड़ी गाँव में जब उन्हें पता चला कि उस क्षेत्र में डोल्मेन मौजूद हैं तो उन्होंने वहाँ ले जाने के लिए कहा। जिस डोल्मेन के पास उन्हें ले जाया गया, वह ढक्कन वाले एक विशाल पत्थर के संदूक जैसा था। जब उनसे पूछा गया कि ऐसे पत्थरों का क्या उद्देश्य होता है तो गुर्जिएफ़ ने उत्तर दिया कि वे ‘रास्ते के संकेत’ हैं, जो दीक्षा (initiation) के स्थानों तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। यह उत्तर बताता है कि इन पत्थरों और उनके उद्देश्य के बारे में उन्हें कुछ गूढ़ ज्ञान था। इसकी पुष्टि आगे हुई। गुर्जिएफ़ ने अपने मार्गदर्शकों से पूछा कि क्या उस इलाके में और भी डोल्मेन हैं। उन्होंने कहा, नहीं। इसके बाद गुर्जिएफ़ ने कुछ माप और गणनाएँ कीं और उन्हें घने जंगलों के बीच से ले चले। रास्ता बनाने के लिए हाथ की कुल्हाड़ियों से झाड़ियाँ और पेड़ काटने पड़े। वे दल को दो और डोल्मेन तक ले गए, जो दोनों घनी वनस्पतियों से पूरी तरह ढँके हुए थे और स्थानीय लोगों के लिए भी अज्ञात थे। उनके मार्गदर्शक आश्चर्यचकित रह गए। अपनी यात्रा के विवरण में गुर्जिएफ़ ने एक रहस्यमय टिप्पणी की है कि उनके विद्यार्थियों में इंजीनियरिंग, खगोलशास्त्र और पुरातत्त्व के विभिन्न विशेषज्ञों ने उन्हें ‘डोल्मेन की समस्या को हल करने’ में सहायता की। यह अफ़सोस की बात है कि उनके इस ‘समाधान’ का कोई विवरण उपलब्ध नहीं लगता।

अंततः वे जॉर्जिया की राजधानी तिफ़्लिस पहुँचे, जो अभी भी मेन्शेविकों के अधिकार में थी। गुर्जिएफ़ को न केवल अपने अनुयायियों की देखभाल करनी थी बल्कि अट्ठाईस रिश्तेदारों का भी भार था, जो आगे बढ़ते तुर्कों के कारण अलेक्ज़ान्द्रोपोल छोड़कर वहाँ आ गए थे। (गुर्जिएफ़ के पिता की हत्या हो चुकी थी।) गुर्जिएफ़ स्वयं भी उस बीमारी से अभी पूरी तरह उबर नहीं पाए थे, जो यात्रा के दौरान उन्हें लगी थी, लेकिन अपनी विशिष्ट दृढ़ता के साथ उन्होंने फिर से पैसा कमाने का काम शुरू कर दिया। उनके कुछ विद्यार्थियों को आस-पास के इलाकों में भेजा गया, जहाँ वे बहुत सस्ते दामों पर पुराने कालीन खरीदते थे। दूसरे विद्यार्थी उन्हें धोकर और उनकी मरम्मत करके तैयार करते थे। फिर वे कालीन बेच दिए जाते थे। कुछ ही सप्ताहों में यह व्यवसाय खूब चल निकला और उनके पास अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त से भी अधिक धन हो गया। यह गुर्जिएफ़ के उस मूल दावे का एक और उदाहरण था कि जो लोग ‘कार्य’ में अच्छे होते हैं, वे जीवित रहने के व्यावहारिक व्यवसाय में भी अच्छे होंगे।

तिफ़्लिस में गुरजिएफ़ ने एक बार फिर अपना संस्थान स्थापित किया और उसे सरकार से भी कुछ सहायता मिली। वे धीरे-धीरे अपनी ‘पद्धति’ को अधिक परिष्कृत और विकसित कर रहे थे। एस्सेंटुकी छोड़ने से पहले उन्होंने ‘मूवमेंट्स’ या पवित्र नृत्यों को ‘चलित केंद्र’ (moving centre) के एक मूल अनुशासन के रूप में शुरू किया था। इसका उद्देश्य शरीर को अपनी एक अलग प्रकार की ‘चेतना’ प्रदान करना था। अब उन्होंने एक विवरण-पुस्तिका (prospectus) तैयार की, जिसमें उन्होंने लिखा कि वहाँ ‘इच्छाशक्ति, स्मृति, ध्यान, श्रवण, चिंतन, भावना और सहज-प्रवृत्ति के विकास के लिए अभ्यास’ कराए जाएँगे। लेकिन स्थिति अस्थिर थी। जॉर्जियाई सरकार ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति के सहारे टिकी हुई थी। जब अंग्रेज़ों ने वहाँ से हटने का निर्णय लिया तो यह केवल समय की बात थी कि बोल्शेविक सत्ता पर कब्ज़ा कर लें।

कॉन्स्टेंटिनोपल में ब्रिटिश सैन्य गुप्तचर विभाग का प्रमुख जॉन बेनेट नामक एक युवा ब्रिटिश अधिकारी था। गुर्जिएफ़ की तरह वह भी दरवेशों और उनके समारोहों से बहुत प्रभावित था। उसने एक वृद्ध दरवेश को पीठ के बल लेटे देखा था, जिसके शरीर पर एक बेहद तेज़ धार वाली तलवार रखी हुई थी और एक आदमी उस तलवार पर खड़ा था। फिर भी उस वृद्ध दरवेश के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी। बेनेट को विश्वास हो गया था कि हमारी मानवीय सीमाओं के रहस्य का उत्तर ‘पाँचवें आयाम’ (fifth dimension) की अवधारणा में छिपा है।

बेनेट की कॉन्स्टेंटिनोपल में उस समय तक उस्पेन्स्की से मुलाकात हो चुकी थी। इस समय तक उस्पेन्स्की ने गुर्जिएफ़ से अलग होने का निर्णय कर लिया था। ‘इन सर्च ऑफ द मिरैक्युलस’ (In Search of the Miraculous) में वे इसका कारण यह बताते हैं कि उन्हें लगा कि गुर्जिएफ़ का कार्य धीरे-धीरे धर्म की दिशा में अधिकाधिक झुकता जा रहा था। लेकिन लगभग निश्चित रूप से वास्तविक कारण यह था कि उस्पेन्स्की का मन इतना प्रभावशाली और मौलिक था कि वे लंबे समय तक किसी के ‘शिष्य’ बने नहीं रह सकते थे। साथ ही, गुर्जिएफ़ का रहस्यमय व्यक्तित्व उन्हें अत्यधिक चालाक और पूर्वी (oriental) ढंग का लगता था, जिसे उनका पश्चिमी सोच से ढला हुआ मन पूरी तरह समझ नहीं पाता था। कॉन्स्टेंटिनोपल में दोनों ने अपने-अपने रास्ते चुन लिए। उस्पेन्स्की की पहली पुस्तक ‘टरटियम ऑरगेनम’ (Tertium Organum) का हाल ही में अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ था और वह कुछ हद तक बहुत लोकप्रिय हो गई थी। इसी के कारण लेडी रोदरमेयर ने उस्पेन्स्की को लंदन आने का निमंत्रण दिया था। बेनेट उस्पेन्स्की के विचारों से प्रभावित नहीं हुआ। और जब उसे पता चला कि गुरजिएफ़ कॉन्स्टेंटिनोपल में मौजूद हैं तो उसकी पहली प्रतिक्रिया संदेह की थी। उसे एक सरकारी संदेश मिला था जिसमें चेतावनी दी गई थी कि गुर्जिएफ़ बोल्शेविक एजेंट हैं।

लेकिन गुर्जिएफ़ से पहली मुलाकात ने उसके सारे संदेह दूर कर दिए। उस व्यक्ति की ‘आँखें ऐसी थीं, जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं।’ और यह स्पष्ट था कि उसके पास उन विषयों का अत्यंत व्यापक और सटीक ज्ञान था, जिनके बारे में बेनेट अभी केवल शुरुआती स्तर पर ही जानता था। बेनेट को गुर्जिएफ़ के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत उनके पवित्र ‘मूवमेंट्स’ देखने के लिए आमंत्रित किया गया और वह उनसे गहराई से प्रभावित हुआ। यह आकर्षण जीवन भर बना रहा।

सितंबर 1921 तक, लगभग एक वर्ष तक, गुर्जिएफ़ ने कॉन्स्टेंटिनोपल से अपना संस्थान चलाया। वहाँ उन्होंने कुछ विचित्र ढंग से एक मनोचिकित्सक के रूप में भी काम शुरू कर दिया था। इसी भूमिका में उन्होंने एक युवा यूनानी को नशीली दवाओं की लत और शराब की लत से मुक्त किया। इसके बदले उसे एक ऐसे जहाज़ में आधा हिस्सा मिला, जिसे ब्रिटिश नौसेना ने अपने कब्ज़े में ले लिया था। बेनेट की सहायता से गुर्जिएफ़ उस जहाज़ को छुड़वाने और बेचने में सफल हो गए। उस जहाज़ में उनके हिस्से से उन्हें इतनी धनराशि मिल गई कि उनकी वह पुरानी महत्वाकांक्षा पूरी हो सके, जो कॉन्स्टेंटिनोपल पहुँचने के बाद से उनके मन में थी... अपने संस्थान को यूरोप ले जाना।


लेखक: कॉलिन विल्सन 

[1] Proudhon and Fourier दो 19वीं सदी के प्रसिद्ध फ्रांसीसी सामाजिक विचारक थे, जिनका संबंध समाजवाद और सामाजिक सुधार के शुरुआती विचारों से है। Pierre-Joseph Proudhon (पियेर-जोसेफ़ प्रूधों, 1809–1865) — फ्रांसीसी समाजवादी और अराजकतावादी विचारक। उनकी प्रसिद्ध उक्ति थी: “Property is theft” — “संपत्ति चोरी है।” वे केंद्रीकृत राज्य और निजी संपत्ति की आलोचना करते थे। Charles Fourier (शार्ल फ़ूरिए, 1772–1837) — फ्रांसीसी समाजवादी विचारक और यूटोपियाई समाजवाद (utopian socialism) के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक। उन्होंने ऐसे सामुदायिक समाज की कल्पना की जिसमें लोग अपनी रुचि और स्वाभाविक इच्छाओं के अनुसार काम करें। उनके आदर्श सामुदायिक समूह को फालांस्तेर (phalanstère) कहा जाता था।

 

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