अध्याय 6 — नई दिशाएँ
गुर्जिएफ़ की
दुर्घटना जिसमें उनकी मृत्यु लगभग निश्चित हो गई थी, उनके जीवन में एक नए युग की
शुरुआत थी। उन्होंने निर्णय लिया कि उनके विचारों को आने वाली पीढ़ियों तक
पहुँचाया जाना चाहिए। एक सुबह कॅफ़े द ला पे (Café de la Paix) में
उन्होंने ओल्गा द हार्टमैन को बोलकर लिखवाना शुरू किया, “विश्व की रचना के 223वें वर्ष में... समूचे ब्रह्मांड के आर-पार ‘अंतरिक्ष-पार’
संचार का जहाज़ कर्नाक उड़ रहा था।” यही उनके विशाल ग्रंथ ‘बीएलज़ेबब्स टेल्स टू
हिज़ ग्रैंडसन ‘ (Beelzebub’s Tales to His Grandson) की
शुरुआत थी।
यह सभी के लिए गहरे निराशा का समय था। गुर्जिएफ़ की
दुर्घटना ने उनके शिष्यों को भीतर तक हिला दिया था। उन्हें लगता था कि गुर्जिएफ़ को कोई नुकसान पहुँच ही नहीं
सकता। स्वयं गुर्जिएफ़ भी इस दुर्घटना से गहराई से विचलित हुए। उन्हें लगा कि इस
दुर्घटना के कारण उनकी चेतना अपने विकास की किसी पहले की अवस्था में लौट गई है। उनकी
शारीरिक स्थिति बुरी तरह टूट चुकी थी और यह स्पष्ट था कि संस्थान पहले की तरह जारी
नहीं रह सकता। उन्होंने अपने एकत्रित शिष्यों से घोषणा की कि वे इसे बंद करने का
इरादा रखते हैं। अधिकांश रूसी शिष्य अगले ही दिन अपना सामान बाँधकर चले गए। वास्तव
में संस्थान चलता रहा। लेकिन गुर्जिएफ़ अब उसे अपने जीवन का कार्य नहीं मानते थे।
इसके बाद और भी समस्याएँ आईं। उनकी माँ, जो उनकी बहन और भाई
के साथ प्रीएरे में रह रही थीं, यकृत की बीमारी से पीड़ित थीं। दुर्घटना के कुछ ही
समय बाद उनका निधन हो गया। गुर्जिएफ़ अपनी माँ से बहुत गहरे जुड़े हुए थे और यह
उनके लिए बहुत बड़ा आघात था। यहाँ भी बेनेट ने एक ऐसी घटना बताई है, जो गुर्जिएफ़ के बारे में बहुत कुछ प्रकट करती है। कई
वर्षों बाद, 1948 में, बेनेट पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने गए। बेनेट की अपनी माँ
का निधन हो चुका था और गुर्जिएफ़ ने उनसे उनकी माँ के बारे में पूछा। फिर गुर्जिएफ़
ने एक विचित्र बात कही, “उन्हें
सहायता की आवश्यकता है क्योंकि
वे अपने आप अपना रास्ता नहीं खोज सकतीं। मेरी अपनी माँ अब मुक्त हैं और मैं उनकी
सहायता कर सकता हूँ। उनके माध्यम से तुम्हारी माँ की भी सहायता की जा सकती है, लेकिन तुम्हें दोनों को एक-दूसरे के संपर्क में लाना होगा।”
उन्होंने बेनेट को निर्देश दिया कि वे दो कुर्सियाँ लें और उनके सामने खड़े हों।
उन्हें कल्पना करनी थी कि एक कुर्सी पर उनकी अपनी माँ बैठी हैं और दूसरी पर गुर्जिएफ़
की माँ। बेनेट ने कई सप्ताह तक पूरी लगन से यह अभ्यास किया और पाया कि यह अत्यंत
कठिन था। एक अवसर पर वे आधे घंटे तक फूट-फूटकर रोते रहे। ऐसा लगता था कि कुछ भी
नहीं हो रहा है। फिर एक दिन उन्हें कमरे में कुछ उपस्थितियों का आभास हुआ। अंततः
वे उपस्थितियाँ उनकी अपनी माँ और गुर्जिएफ़ की माँ का रूप लेने लगीं। धीरे-धीरे
उन्हें महसूस हुआ कि दोनों के बीच संपर्क स्थापित हो गया है और उनके भीतर राहत तथा
कृतज्ञता की एक विशाल लहर उठी। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा था, “तुम स्वयं उनकी सहायता नहीं कर सकते, लेकिन मेरी माँ के
माध्यम से मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ।” ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि गुर्जिएफ़
का विश्वास था कि मृत्यु के बाद भी किसी प्रकार उनका अपनी माँ से संपर्क बना हुआ
था।
मोटर दुर्घटना के साथ एक और त्रासदी जुड़ी हुई थी। कुछ समय
से गुर्जिएफ़ की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं और उन्हें ठीक करने के लिए गुर्जिएफ़
मध्य एशिया की एक ऐसी तकनीक का प्रयोग करते हुए बहुत बड़े प्रयास कर रहे थे, जिसमें सूक्ष्म या आकाशीय शक्ति (astral
power) का उपयोग किया जाता था।
मोटर दुर्घटना के कारण यह संभव नहीं रह गया और कुछ ही समय बाद उनकी पत्नी का निधन
हो गया। फिर भी, ओल्गा दे हार्टमैन
द्वारा सुनाई गई एक घटना एक बार फिर गुर्जिएफ़ की उन विचित्र शक्तियों को
प्रदर्शित करती है। अंत के दिनों में उनकी पत्नी इतनी पीड़ा में थीं कि वे न तो
कुछ खा सकती थीं और न ही पानी पी सकती थीं। गुर्जिएफ़ ने आधा गिलास पानी मँगवाया
और उसे पाँच मिनट तक अपने हाथों में पकड़े रखा। फिर उन्होंने ओल्गा दे हार्टमैन से
वह पानी अपनी पत्नी को देने के लिए कहा। उनकी पत्नी बिना किसी पीड़ा के वह पानी पी
सकीं और अचानक वे फिर से तरल भोजन लेने में समर्थ हो गईं।¹
धीरे-धीरे गुर्जिएफ़ अपनी दुर्घटना के प्रभावों से उबरने
लगे। उनका झुकाव इस विश्वास की ओर था कि किसी “शत्रुतापूर्ण शक्ति” ने दुर्घटना
पैदा की थी और वह सक्रिय रूप से उनके कार्य में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही
थी। लेकिन अब उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा लेखन में लगा दी। अब उनकी आय का एक बड़ा
हिस्सा अमेरिका से आता था, जहाँ
ओरेज ने अपना गुर्जिएफ़ समूह शुरू कर दिया था। गुर्जिएफ़ ओरेज द्वारा अपने विचारों
को शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किए जाने से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन धन के लिए वे उनके आभारी थे।
गुर्जिएफ़ का लेखन विशेषकर बिएलज़ेबब (Beelzebub) हमेशा विवाद का विषय बना रहेगा। उसकी शैली इतनी असाधारण
रूप से उलझी हुई है कि पहली नज़र में वह आडंबरपूर्ण निरर्थकता जैसी प्रतीत होती
है। उसमें अजीबोगरीब शब्द भी भरे पड़े हैं। कुंडाबफ़र (kundabuffer), गेडोरोपूलो
(gaidoropoolo), जेनियोट्रियामाज़िकाम्नियन
(geneotriamazikamnian), हार्ह्रिन्ह्रार्ह
(harhrinhrarh), ब्लास्टेगोक्लॉर्नियन
(blastegoklornian) और
ऐसे दर्जनों अन्य शब्द। (अंतिम
शब्द का अर्थ केवल हमारे ग्रह के वायुमंडल की परिधि है। इससे यह प्रश्न उठता है कि
गुर्जिएफ़ को इसके लिए एक नया शब्द गढ़ने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी।) उनके अनेक
अनुयायियों द्वारा दी जाने वाली व्याख्या यह है कि इस शैली को जान-बूझकर कठिन
बनाया गया है ताकि
पाठक को उसे समझने के लिए मेहनत करनी पड़े। उनके आरंभिक ग्रंथ ‘हेरल्ड ऑफ कमिंग
ऐज’ (Herald
of Coming Good) का अध्ययन इस दृष्टिकोण को कुछ समर्थन देता है
क्योंकि उसमें शैली की कठिनाई मुख्यतः दर्जनों आश्रित
उपवाक्यों (subordinate clauses) को एक ही वाक्य में जोड़ देने के कारण पैदा होती है। उदाहरण
के लिए:
“यह लंबा खिंच गया और मेरे लिए बिल्कुल अस्वाभाविक जीवन, जो हर दृष्टि से उन स्वभावगत विशेषताओं के भी बिल्कुल
विपरीत था, जो मेरी परिपक्वता के
समय तक मेरे व्यक्तित्व में गहराई से जम चुकी थीं, मेरे उस निर्णय का सीधा परिणाम था, जो ऐतिहासिक उदाहरणों की एक पूरी शृंखला के मेरे पिछले
अध्ययन के परिणामों पर आधारित था और जिसका पहला उद्देश्य यह था कि अपने बाहरी
व्यवहार को कुछ हद तक अस्वाभाविक बनाकर, मेरे संबंध में उस ‘किसी चीज़’ के निर्माण
को रोका जाए, जिसे प्राचीन काल से
जाना जाता था और जिसे यहूदा के महान राजा सोलोमन ने ‘त्ज़वार्नोहार्नो’ (Tzvarnoharno) कहा
था। यह वह ‘कुछ’ है जो
हमारे पूर्वजों के अनुसार लोगों के सामुदायिक जीवन में एक प्राकृतिक प्रक्रिया
द्वारा तथाकथित ‘साधारण लोगों’ के बुरे कार्यों के मेल के परिणामस्वरूप उत्पन्न
होता है और उस व्यक्ति तथा उसके द्वारा सामान्य मानव-कल्याण के लिए किए गए समस्त
कार्यों, दोनों के विनाश का कारण बनता है, जो ऐसा कुछ करने का प्रयास करता है।”
यहाँ बेनेट की यह व्याख्या कि ‘त्ज़वार्नोहार्नो’ (Tzvarnoharno) संभवतः
पहलवी भाषा[1] के “राजसी वैभव” के अर्थ वाले
शब्द से निकला है, गुर्जिएफ़
के आशय को समझने में हमारी कोई विशेष सहायता नहीं करती। सौभाग्य से, उनकी अंतिम पुस्तक ‘लाइफ़ इज़ रियल ओनली देन, व्हेन ‘आइ ऐम’ (Life
Is Real Only Then, When ‘I Am)
का एक अंश इस पर कुछ प्रकाश डालता है। गुर्जिएफ़ वहाँ कहते
हैं कि वे अपनी गंभीर मोटर दुर्घटना को उस “कुछ” की अभिव्यक्ति मानते हैं, जो लोगों के सामूहिक जीवन में जमा होता रहता है। इससे ऐसा
संकेत मिलता है कि यह एक प्रकार की शत्रुता है, जो अचेतन रूप से उन लोगों की ओर निर्देशित होती है
जिन्होंने अत्यधिक सफलता प्राप्त कर ली हो।
किसी भी स्थिति में यह स्पष्ट है कि उस अंश की अस्पष्टता गुर्जिएफ़
की एक ही वाक्य में एक दर्जन कोष्ठक डाल देने की आदत के कारण और बढ़ जाती है। मुझे
संदेह है कि यह पाठक को जान-बूझकर परेशान करने की कोशिश नहीं बल्कि उनकी सोचने की एक आदत थी। गुर्जिएफ़ के मौखिक
व्याख्यान हमेशा स्पष्ट और मुद्दे पर केंद्रित होते थे। लेकिन जब वे कलम उठाते थे
तो उनका मन स्वाभाविक रूप से एक अधिक विस्तृत और अलंकृत
पूर्वी शैली में बहने लगता था।
ओरेज का मत था कि जब अपने विचारों को कागज़ पर व्यक्त करने
की बात आती है, तो गुर्जिएफ़ मूलतः
अक्षम थे। विलियम सीब्रुक भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचे। वे बताते हैं कि जनवरी
1931
में गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि वे न्यूयॉर्क के कुछ संस्कारी
और शिक्षित लोगों को गुर्जिएफ़ के अपार्टमेंट में आमंत्रित करें
ताकि वे उनकी नई पुस्तक का पाठ सुन सकें। अद्भुत और अत्यंत
विस्तृत पूर्वी भोजन तैयार किया गया था (गुर्जिएफ़ एक प्रसिद्ध रसोइए थे)। उपस्थित
लोगों में लेखक लिंकन स्टीफ़न्स और मनोवैज्ञानिक जे. बी. वॉटसन भी थे। जब कुछ समय
तक पाठ चलता रहा तो वॉटसन
ने बीच में रोककर कहा कि या तो यह कोई बहुत जटिल मज़ाक है या फिर बिल्कुल बकवास है। दोनों ही स्थितियों में शायद
बेहतर होगा कि पाठ बंद कर दिया जाए और बातचीत की जाए। लेखक ने इस टिप्पणी को बिना
बुरा माने स्वीकार कर लिया। भोजन के दौरान वे इतने मनोरंजक और विनोदी रहे कि
मेहमान उनसे यह स्वीकार करने के लिए कहने लगे कि उनकी पुस्तक वास्तव में एक मज़ाक
है। सीब्रुक के अनुसार, गुर्जिएफ़
को इससे कोई आपत्ति नहीं हुई। लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि उनकी पुस्तक उनके
श्रोताओं की समझ से ऊपर की चीज़ है।
बीएलज़ेबब (Beelzebub) के
बारे में और चाहे जो कहा जाए, यह
निश्चित रूप से कोई मज़ाक नहीं है। स्वयं गुर्जिएफ़ इसे स्पष्ट करते हैं। वे लिखते
हैं कि 1927
में, तीन
वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, उन्हें
यह एहसास हुआ कि वे अंततः अपने विचारों को पाठकों तक पहुँचाने में सफल नहीं हुए
हैं और पुस्तक का बड़े पैमाने पर पुनर्लेखन करना आवश्यक होगा। उनकी थकान और लेखन
की कठिनाइयों ने उन्हें आत्महत्या के बारे में सोचने तक के लिए विवश कर दिया।
लेकिन पुस्तक को पूरी तरह से फिर से लिखा गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि इतनी अथक
मेहनत के बाद भी यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं है जो पहली बार गुर्जिएफ़ के
विचारों से परिचित होना चाहते हैं। (मैं एक ऐसे अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति को जानता
हूँ जो इस बात पर अडिग विश्वास करता रहा कि गुर्जिएफ़ एक ढोंगी हैं क्योंकि उसने
उनके विचारों को बीएलज़ेबब (Beelzebub) के
माध्यम से समझने का प्रयास किया था।)
दूसरी ओर, बेनेट, जो गुर्जिएफ़ के मुख्य विचारों से भली-भाँति परिचित थे, ने मुझे बताया कि उन्होंने इसे लगभग बारह बार पढ़ा था और हर
बार उन्हें ऐसे नए अर्थ मिले, जिन्हें
उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। कुल मिलाकर, शायद यह मानना सुरक्षित है कि यह गुर्जिएफ़ के अत्यंत
उत्पादक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण एकल कृति है।
बीएलज़ेबब को लिखने में लगे जबरदस्त परिश्रम ने गुर्जिएफ़ को एक और
महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि दी। वे बताते हैं कि वे प्रीएरे में उस बेंच पर बैठे थे, जहाँ वे अपनी पत्नी और माँ के साथ बैठा करते थे
और अचानक उन्हें यह बात समझ में आई कि उनकी रचनात्मकता उन
कष्टों के कारण बढ़ गई थी, जिन्हें
उन्होंने अपनी पत्नी और माँ की मृत्यु के परिणामस्वरूप झेला था। दूसरे शब्दों में, इस पीड़ा ने उनके ‘essence’ यानी ‘सार’ को मजबूत कर दिया था। उन्होंने यह भी अनुभव किया
था कि दुर्घटना के बाद जब वे बिस्तर पर पड़े थे, तब उनसे मिलने आने वाले मित्र उनकी ऊर्जा को सोख लेते थे और
उन्हें थका हुआ छोड़ जाते थे। वे उस चीज़ को सोख रहे थे जिसे गुर्जिएफ़ हैम्ब्लेज़ॉइन
(hanblezoin) कहते
थे अर्थात सूक्ष्म शरीर (astral body) की ऊर्जा, जो
रचनात्मक कार्य के लिए आवश्यक है। गुर्जिएफ़ को जो अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई, वह यह थी कि हैम्ब्लेज़ॉइन (hanblezoin) को
सचेत प्रयास और ‘जानबूझकर स्वीकार की गई पीड़ा’ (intentional suffering)
के द्वारा पैदा करना आवश्यक है। वैसी पीड़ा, जैसी संत अपने काँटों या कीलों की शय्या पर लेटकर अनुभव
करते हैं।
इसी विचार को ध्यान में रखते हुए गुर्जिएफ़ ने जान-बूझकर
अपने अनेक शिष्यों से छुटकारा पाना शुरू कर दिया जैसे, हार्टमैन दंपति। उन्हें लगा
कि ये लोग न केवल उन पर बहुत अधिक निर्भर होते जा रहे थे बल्कि उन्हें स्वयं भी बहुत अधिक आरामदायक स्थिति में रख
रहे थे। 1929
में कुछ अंग्रेज़ी कीपर्स (kippers) को
लेकर हुए विवाद को हार्टमैन दंपति को पेरिस में रहने के लिए भेजने के बहाने के रूप
में इस्तेमाल किया गया। कई अन्य शिष्यों से भी वहाँ से चले जाने के लिए कहा गया। फिर
भी,
जो लोग वहाँ से चले गए, वे सभी गुर्जिएफ़ के प्रति वफ़ादार बने रहे। उन्हें विश्वास
था कि यह सब महज़ गुर्जिएफ़ की सनक नहीं थी।
ओरेज को अस्वीकार किए जाने का एक असाधारण रूप से कठिन अनुभव
झेलना पड़ा। जब वह इंग्लैंड में थे, गुर्जिएफ़ न्यूयॉर्क गए और ओरेज के समूह से एक ऐसे
दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें
ओरेज के साथ संबंध तोड़ने की सहमति थी। जब ओरेज को यह दस्तावेज़ दिखाया गया
तो उन्होंने इस आघात को शांतिपूर्वक स्वीकार किया और स्वयं
उस पर हस्ताक्षर कर दिए।
गुर्जिएफ़ के इस प्रकार के कार्यों के पीछे के उद्देश्यों
का आकलन करते समय ओल्गा दे हार्टमैन द्वारा सुनाई गई एक घटना को ध्यान में रखना
उपयोगी है। गुर्जिएफ़ ने सुझाव दिया कि ओल्गा अपने माता-पिता से कहें कि वे
लेनिनग्राद छोड़कर प्रीएरे आ जाएँ क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियाँ लगातार अधिक खतरनाक होती जा
रही थीं। उनकी बहन और माता-पिता आ गए, लेकिन फॉन्टेनब्लो में वे खुश नहीं थे क्योंकि जैसा कि श्रीमती द हार्टमैन कहती हैं, “गुर्जिएफ़ हम
सबके साथ अक्सर जिस निर्मम ढंग से बात करते थे, उसके कारण।” एक सुबह गुर्जिएफ़ और ओल्गा के पिता एक बेंच पर
बैठे थे। ओल्गा किसी प्रश्न के बारे में पूछने आईं। गुर्जिएफ़ ने उन्हें गुस्से
में उत्तर दिया और उनके पिता परेशान तथा दुखी दिखाई दिए। तब गुर्जिएफ़ ने उनके
पिता की ओर मुड़कर कहा, “देखिए, पिता जी, आप
मुझसे क्या करवाते हैं। आपने अपनी बेटी पर कभी चिल्लाया नहीं, इसलिए उसे इस अनुभव से गुजरना नहीं पड़ा, जबकि लोगों के लिए हर तरह के अनुभव आवश्यक होते हैं। इसलिए
अब मुझे आपकी जगह यह करना पड़ रहा है।” लगता है कि उनके पिता समझ गए कि गुर्जिएफ़ का
आशय क्या था।
“लोगों के लिए हर तरह के अनुभव आवश्यक होते हैं।” ऐसा लगता
है कि यही सिद्धांत गुर्जिएफ़ के कुछ सबसे रहस्यमय कार्यों के पीछे था। पीटर्स
स्वयं एक अत्यंत आघातकारी अनुभव के बाद इस बात को समझने लगे। 1934 में पीटर्स को शिकागो जाना पड़ा और गुर्जिएफ़ ने घोषणा की
कि वे उनके साथ जाएँगे। यह यात्रा एक दुःस्वप्न जैसी थी। गुर्जिएफ़ रेलवे स्टेशन
देर से पहुँचे और उन्होंने पीटर्स से कहा कि वह कोई कहानी गढ़कर ट्रेन को रुकवाने
या देर करवाने का प्रयास करे। पीटर्स वास्तव में ऐसा करने में सफल हो गए। गुर्जिएफ़
को उनकी बर्थ तक पहुँचाने में पैंतालीस मिनट लग गए। पूरे रास्ते वे ऊँची आवाज़ में
शिकायत करते रहे जबकि
कंडक्टर बार-बार उनसे सो रहे यात्रियों की खातिर चुप रहने की विनती करता रहा। फिर गुर्जिएफ़
ने खाने,
पीने और सिगरेट पीने का निर्णय लिया, यहाँ तक कि कंडक्टर ने धमकी दी कि अगले स्टेशन पर वह उन्हें
ट्रेन से उतार देगा। जब पीटर्स ने अपना आपा खो दिया तो गुर्जिएफ़ ने उदास होकर उनसे पूछा कि पीटर्स उनके साथ इस
तरह व्यवहार क्यों कर रहे हैं।
अपनी बर्थ में पहुँचने के बाद गुर्जिएफ़ ने पानी माँगा, जिससे दूसरे यात्री बेहद क्रोधित हो गए। वे सुबह चार बजे ही
जाकर सो पाए। अगली सुबह नाश्ते के समय गुर्जिएफ़ ने दही (yogurt)
खाने की इच्छा को लेकर अंतहीन हंगामा किया। सबको पागलपन की
हद तक परेशान करने के बाद अंततः उन्होंने सामान्य अमेरिकी नाश्ता ही किया। यात्रा
के बाकी समय में वे धूम्रपान करके, बहुत अधिक शराब पीकर और तेज़ गंध वाली चीज़ों, विशेषकर चीज़
को साथ रखकर अपने सहयात्रियों को लगातार परेशान करते रहे।
जब वे शिकागो पहुँचे तो पीटर्स ने गुस्से में उनसे कहा कि वह अब उनके साथ नहीं
रहेगा। गुर्जिएफ़ ने इतना हंगामा खड़ा कर दिया कि पीटर्स को अंततः उनके और उनके
प्रशंसक शिष्यों के समूह के साथ जाने के लिए तैयार होना पड़ा। अंततः पीटर्स ने
शिष्यों को चौंकाते हुए गुर्जिएफ़ की निंदा अत्यंत अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा
में की और वहाँ से निकल गया। लेकिन कुछ वर्षों बाद जब न्यूयॉर्क में उसने फिर गुर्जिएफ़
को देखा तो उसे
अचानक समझ में आया कि पूरी घटना इस तरह बनाई गई थी कि उसके भीतर गुर्जिएफ़ की अंधी
पूजा करने वाली मानसिकता टूट जाए। निस्संदेह, यह प्रयोग सफल हुआ था।
पीटर्स की एक और घटना गुर्जिएफ़ की लोगों को ‘सँभालने’ की
कुशलता और उनकी हास्य-बुद्धि को दिखाती है। गुर्जिएफ़ ने कुछ ‘महत्वपूर्ण’ लोगों
को भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके आने से पहले उन्होंने पीटर्स से कहा कि वह उन्हें
अपने ज्ञान में मौजूद हर अश्लील शब्द और वाक्यांश सिखाए। मेहमान आए। उनमें कई
पत्रकार भी थे और भोजन के लिए बैठ गए। कुछ संरक्षणवादी और थोड़े उपेक्षापूर्ण
अंदाज़ में वे गुर्जिएफ़ से उनके कार्य के बारे में प्रश्न पूछने लगे। तब गुर्जिएफ़
ने समझाना शुरू किया कि अधिकांश लोग वास्तव में सत्य या व्यवस्था की इच्छा से
प्रेरित नहीं होते बल्कि
उनकी प्रेरणा का मूल उनकी यौन इच्छाएँ होती हैं। उन्होंने एक सुंदर और अच्छे कपड़े
पहनी हुई महिला से कहा कि अपने रूप-रंग का इतना ध्यान रखने के पीछे उसकी “संभोग की
इच्छा” काम करती है। फिर वे अपनी यौन क्षमता के बारे में बोलने लगे और उसके बाद
विभिन्न जातियों के यौन व्यवहारों के बारे में बातें करने लगे। इस दौरान वे
जान-बूझकर सबसे अश्लील और भद्दे शब्दों का प्रयोग करते रहे। भोजन समाप्त होने के
बाद मेहमान आपस में फ़्लर्ट करने लगे और कुछ ही समय में उनमें से कई लोग आधे-अधूरे
कपड़ों में इधर-उधर पड़े हुए थे। जिस महिला की गुर्जिएफ़ ने प्रशंसा की थी, वह स्वयं गुर्जिएफ़ के साथ प्रणय-संबंध स्थापित करने की
कोशिश करने लगी। वहीं दूसरी महिला ने रसोई में पीटर्स को घेरने की कोशिश की। जब
पीटर्स ने उसे ठुकरा दिया तो उसने उस पर आरोप लगाया कि वह “उस गंदे बूढ़े आदमी का
छोटा समलैंगिक” है।
अचानक गुर्जिएफ़ ने अपनी गूँजती हुई, आदेशात्मक आवाज़ में सबको सावधान किया और उनका मज़ाक उड़ाते
हुए कहा कि अब वे जान चुके हैं कि वे वास्तव में किस तरह के लोग हैं। अंत में
उन्होंने कहा कि यह पाठ पढ़ाने के लिए उन्हें भुगतान मिलना चाहिए और वे चेक
स्वीकार करने में प्रसन्न होंगे। परिणामस्वरूप उन्होंने कई हज़ार डॉलर इकट्ठे कर
लिए।
1935 तक गुर्जिएफ़ ने लेखन भी छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी अंतिम
पुस्तक ‘लाइफ़ इज़ रियल ओनली देन, व्हेन
‘आइ ऐम’ (Life Is Real Only Then, When ‘I Am’) को
आधे से भी कम पूरा होने पर छोड़ दिया। चूँकि उस समय उनकी उम्र साठ वर्ष से कुछ ही
अधिक थी या यदि उनके पासपोर्ट की तारीख सही थी तो केवल अट्ठावन वर्ष। इसलिए यह असंभव-सा लगता है कि वे
अपने जीवन के कार्य को समाप्त मान चुके थे। लेकिन संस्थान समाप्त हो चुका था और
आगे कुछ लिखने की उनकी कोई योजना दिखाई नहीं देती थी। प्रीएरे को 1933 में बेच दिया गया था। जब पीटर्स तीस के दशक के मध्य में
न्यूयॉर्क में गुर्जिएफ़ से मिले, तब
वे फिर आर्थिक तंगी में थे। वे नशे की लत वाले लोगों और शराबियों का इलाज करके
पैसे कमाते थे। (सौभाग्य से यह अवधि बहुत लंबी नहीं रही।) इसलिए गुर्जिएफ़ अमेरिका
में व्याख्यान और शिक्षा देते रहे। अपना समय शिकागो और न्यूयॉर्क के समूहों के बीच
बाँटते हुए जबकि उस्पेन्स्की लंदन में अपना कार्य जारी रखे हुए थे।
दोनों एक विचित्र विरोधाभासी स्थिति में थे। वे शिक्षण को
फैलाना चाहते थे, लेकिन
साथ ही यह भी चाहते थे कि वह बहुत तेज़ी से या बिना किसी चयन के न फैले। पीटर्स
शिकागो के समूह के बारे में टिप्पणी करते हैं:
“मुझे लगा कि वे उनके शिक्षण की ओर बहुत अच्छे कारणों से
नहीं बल्कि अनेक तरह के
कारणों से आकर्षित हुए थे। अकेलेपन के कारण या शायद इसलिए कि वे स्वयं को समाज से अलग, अनुपयुक्त या बहिष्कृत समझते थे। उनमें से अधिकांश ने कला, थियोसॉफी और गूढ़ विद्याओं में थोड़ा-बहुत हाथ आज़माया
था... जब उनका व्यक्तिगत मार्गदर्शन नहीं होता था और उनका शिक्षण इस तरह चलता रहता
था,
तब मुझे उसके शिक्षण में एक निश्चित खतरा दिखाई देने लगा।”
उस्पेन्स्की के लंदन के शिष्यों को षड्यंत्रकारियों की तरह
व्यवहार करने के लिए कहा जाता था और उन्हें आदेश था कि वे किसी बाहरी व्यक्ति के
साथ इस शिक्षण की चर्चा न करें। जब बेनेट ने उस्पेन्स्की के कथनों को उद्धृत करने
की अनुमति माँगी तो
उन्हें मना कर दिया गया।
शिक्षक के रूप में गुर्जिएफ़ और ओस्पेन्स्की के बीच मुख्य
अंतर यह था कि गुरजिएफ़ को मनुष्य हमेशा मनोरंजक और दिलचस्प लगते थे, जबकि ओस्पेन्स्की अपने अनुयायियों को एक वैज्ञानिक जैसे
दिखाई देते थे—ऐसे व्यक्ति के रूप में जो ‘नींद के विरुद्ध संघर्ष’ के विचार को
फैलाने में पूरी तरह व्यस्त था और व्यक्तियों के रूप में लोगों में उसकी रुचि बहुत
कम थी। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ अपने शिष्यों से शांत भाव से काफी मनोरंजन
प्राप्त करते थे। पीटर्स एक ऐसी लड़की की कहानी सुनाते हैं, जो नर्तकी थी और उनके किसी समूह में कुछ अधिकार प्राप्त कर
चुकी थी,
लेकिन वह आक्रामक और कठिन स्वभाव की थी। एक दिन, व्याख्यान के दौरान गुर्जिएफ़ के किसी कथन को उसने खुले तौर
पर चुनौती दी। इसके बाद गुर्जिएफ़ ने उसे संदेश भेजा कि वह रात तीन बजे अकेले उनके
कमरे में आए। वहाँ वे उसे कुछ अद्भुत चीज़ें दिखाएँगे। पीटर्स ने यह संदेश उस
लड़की तक पहुँचा दिया। लड़की बेहद नाराज़ हुई। उसने कहा कि वह प्रस्ताव को पहचानती
है जब वह उसे सुनती है और अब उसका गुर्जिएफ़ से कोई लेना-देना नहीं रहेगा। जब
पीटर्स ने यह संदेश वापस गुर्जिएफ़ को दिया तो गुर्जिएफ़ संतुष्टि से मुस्कराए और कहा कि यही तो वे
चाहते थे। उन्होंने एक दिलचस्प बात और कही। अच्छा ही हुआ कि उसने उनके निमंत्रण को
ठुकरा दिया क्योंकि यदि वह मान जाती तो उसके बाद पैदा होने वाले “प्रतिकंपनों” (reverberations)
से निपटने के लिए उनके पास समय नहीं होता। इसका संकेत यही
लगता है कि किसी भी प्रकार का ‘सम्बन्ध’ अपने परिणामों के बिना नहीं हो सकता। ‘कैजुअल
सेक्स’ (Casual
sex) यानी बिना किसी परिणाम या भावनात्मक बंधन के यौन संबंध, इन
शब्दों का मेल ही अपने आप में विरोधाभासी है। एक बार फिर ऐसा महसूस होता है कि गुर्जिएफ़
मानव अस्तित्व के कुछ अंतर्निहित नियमों से परिचित थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध से कुछ समय पहले गुर्जिएफ़ पेरिस लौट
आए। जब जर्मनों ने फ्रांस पर आक्रमण किया तो उन्होंने ‘मुक्त फ्रांस’ में भाग जाने के आग्रहों को
अनदेखा कर दिया और र्यू दे कोलोनेल रेनार (Rue des Colonels Rénards) स्थित
अपने फ्लैट में ही बने रहे। युद्ध के बाद उनसे मिलने वाले शुरुआती अमेरिकी
अनुयायियों में से एक फ्रिट्ज़ पीटर्स थे। जैसा कि हमने पहले अध्याय में देखा है, पीटर्स गहरे तंत्रिका-अवसाद की अवस्था में गुर्जिएफ़ के पास
आए थे और गुर्जिएफ़ ने किसी प्रकार की जीवनदायी ऊर्जा के संचार से उनका अवसाद
तत्काल दूर कर दिया था। गुर्जिएफ़ ने पीटर्स को बताया कि युद्ध के दौरान वे कालीन
बेचकर आराम से जीवित रहे थे। उनके पास कृत्रिम पलकों का निर्माण करने वाली एक
कंपनी भी थी। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने बहुत-से लोगों, जर्मनों, पुलिसवालों और काला बाज़ार करने वालों के साथ लेन-देन किए
थे और इस प्रकार तंबाकू तथा ब्रांडी जैसी आवश्यक चीज़ों की आपूर्ति बनाए रखी थी। वे
अब भी शिष्यों से घिरे हुए थे, जो
उनकी आय का एक हिस्सा भी उपलब्ध कराते थे। लेकिन पीटर्स ने कुछ ऐसे वृद्ध लोगों को
भी फ्लैट में आते देखा जो काफ़ी जर्जर और निर्धन दिखाई देते थे। गुर्जिएफ़ उनके
साथ ऐसी दयालुता और कोमलता से पेश आते थे, जो अपने विद्यार्थियों के प्रति उनके व्यवहार से बिल्कुल
अलग थी। ऐसा लगता था कि वे इन लोगों को अपने ‘पेंशनर’ मानते थे।
अन्य अमेरिकी विद्यार्थी भी धीरे-धीरे पेरिस लौटने लगे। बेनेट
अपनी पत्नी के साथ आए, जो किसी
रहस्यमय बीमारी से पीड़ित थीं। उन्हें गुर्जिएफ़ पहले से अधिक वृद्ध और उदास दिखाई
दिए,
हालाँकि उनका शरीर अब भी पहले की तरह सीधा और तना हुआ था। अब
गुर्जिएफ़ सामान्य, अनौपचारिक
कपड़े पहनते थे। गले से खुली हुई कमीज़, अस्त-व्यस्त पतलून और लाल फ़ेज़ टोपी। दोपहर के भोजन के
दौरान जब लगभग चालीस लोग उस छोटे-से भोजन-कक्ष में ठुँसे हुए थे, उन्होंने देखा कि
श्रीमती बेनेट दर्द में हैं। गुर्जिएफ़ दो गोलियाँ लेकर आए और उनसे कहा कि वे
उन्हें निगल लें। बाद में उन्होंने उनसे पूछा, “अब तुम्हारा दर्द कहाँ है?” उन्होंने उत्तर दिया, “वह चला गया।” गुर्जिएफ़ ने फिर पूछा, “मैं पूछता हूँ, अब वह कहाँ है?” उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने उत्तर दिया, “आप उसे अपने साथ ले गए हैं।” वास्तव में इसके बाद उनके
स्वास्थ्य में अचानक सुधार होने लगा।
केनेथ वॉकर और उनकी पत्नी भी उस फ्लैट में आए। वॉकर कई
वर्षों तक उस्पेन्स्की के विद्यार्थी रहे थे और उनका परिचय उस्पेन्स्की से मॉरिस
निकोल ने कराया था, जो मूल
प्रीएरे समूह के सदस्यों में से एक थे। वॉकर ने उस फ्लैट का वर्णन एक भरे-ठुँसे
पुराने सामान की दुकान जैसा किया है। जब वे सभी बीएलज़ेबब (Beelzebub) का
पाठ सुन रहे थे, तब गुर्जिएफ़ अंदर
आए। वॉकर ने टिप्पणी की कि वे उनकी कल्पना से छोटे कद और अधिक स्थूल थे।
उन्होंने उनकी तीखी आँखों पर भी ध्यान दिया। एक बार फिर
दोपहर के भोजन पर बहुत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे और सबको आर्मान्याक या
वोदका के साथ जाम उठाकर पीने के लिए कहा गया। गुर्जिएफ़ ने एक बार समझाया था कि वे
अपने मेहमानों को हमेशा थोड़ा-बहुत नशे में कर देते हैं क्योंकि यह उनके ‘व्यक्तित्व’ को हटाने और उनके भीतर वास्तव
में जो कुछ है, उसे प्रकट करने का
सबसे तेज़ तरीका है। इसी मुलाक़ात के बाद वॉकर की पत्नी ने गुर्जिएफ़ को एक
‘जादूगर’ के रूप में वर्णित किया।
कई अन्य उस्पेन्स्की-शिष्यों ने भी उस फ्लैट पर आना-जाना
शुरू कर दिया। वॉकर टिप्पणी करते हैं कि “बहुत अधिक सिद्धान्त-विमर्श ने उनके लंदन
के अनुयायियों के मन को अत्यधिक कठोर बना दिया था और हमारे व्यवहार को बहुत अधिक
सोच-समझकर किया जाने वाला और उदास बना दिया था। हमें प्लायमथ ब्रेथ्रेन के चर्च
जाने वाले लोगों जैसे चेहरे अपना लेने का खतरा था।” गुर्जिएफ़ के शराब से भरे
दोपहर के भोजन और रात्रिभोज (जो हमेशा आधी रात के काफी बाद शुरू होते थे) ठीक वही
थे जिनकी उन्हें आवश्यकता थी ताकि वे तनावमुक्त हो सकें और एक-दूसरे के अधिक निकट
आ सकें। यह एक बार फिर गुर्जिएफ़ और उस्पेन्स्की के बीच के मूलभूत अंतर को स्पष्ट
करता है। वॉकर कहते हैं कि गुर्जिएफ़ ने उन्हें ‘कार्य’ (Work)
के प्रति बिल्कुल नया दृष्टिकोण दिया। उस्पेन्स्की
अनुशासनप्रिय थे। जब वे कोई काम सौंपते थे तो वॉकर उसे जितनी सावधानी से संभव हो, पूरा करते थे, लेकिन उससे आगे जाने की कभी कोशिश नहीं करते थे:
“गुर्जिएफ़ के साथ मैंने व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की भावना
विकसित करना और स्वतंत्रता की एक नई अनुभूति प्राप्त करना शुरू किया। लेकिन साथ ही
यह ऐसी स्वतंत्रता थी जिसका बहुत सावधानी से उपयोग करना पड़ता था
क्योंकि गलती की सज़ा बहुत बड़ी थी। यह सज़ा थी, अपनी गलती
के कारण अपने शिक्षक को गंभीर असुविधा में पड़े हुए देखना और गुर्जिएफ़ के निकट लंबे समय तक रहना कठिन था, बिना उनके प्रति स्नेह विकसित किए।”
उस शरद ऋतु, 1948 में गुर्जिएफ़ एक बार फिर अमेरिका लौट गए। उस्पेन्स्की को
विश्वास था कि यूरोप का विनाश निश्चित है। इसलिए उन्होंने युद्ध के वर्षों में
न्यूयॉर्क में अपना कार्य जारी रखा था, लेकिन अंततः बीमारी ने उन्हें वापस लंदन जाने के लिए विवश
कर दिया। 1948 में उनकी
मृत्यु हो गई। वे अपनी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक की पांडुलिपि पीछे छोड़ गए, जिसका नाम था ‘फ्रैगमेंट्स ऑफ़ ऐन अननोन टीचिंग’ (Fragments
of an Unknown Teaching)
और जिसे बाद में ‘इन सर्च ऑफ़ द मिरैक्युलस ‘ (In
Search of the Miraculous)
शीर्षक से प्रकाशित किया गया। गुर्जिएफ़ ने न्यूयॉर्क में
उस्पेन्स्की के समूह की जिम्मेदारी संभाल ली। उनके प्रभाव का वर्णन इर्मिस बी.
पोपोफ़ ने अपनी पुस्तक ‘गुर्जिएफ़’ में किया है। वह लिखती हैं कि गुर्जिएफ़ ने लोगों पर
दयालुता और करुणा की एक अत्यन्त गहरी छाप छोड़ी।
न्यूयॉर्क में गुर्जिएफ़ का प्रवास पेरिस के दिनों जितना ही
भाग-दौड़ और गतिविधियों से भरा हुआ लगता है। दर्जनों लोगों के लिए विशाल भोज, नृत्य की कक्षाएँ, व्याख्यान और चाइल्ड्स रेस्त्रां (Child’s
Restaurant) में चलने वाले अंतहीन सत्र। गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की की
पुस्तक की पांडुलिपि भी पढ़ी और अपनी बीएलज़ेबब (Beelzebub) को
प्रकाशन के लिए तैयार किया। वह उस्पेन्स्की के काम की प्रशंसा करते थे, लेकिन उनका आग्रह था कि उनके शिक्षण का बेहतर मूल-स्रोत बीएलज़ेबब
(Beelzebub) ही
है।
चाइल्ड्स रेस्त्रां (Child’s Restaurant) उनकी
‘जादुई’ शक्ति के अंतिम प्रदर्शनों में से एक का स्थल बना। बेनेट उन दिनों
न्यूयॉर्क में थे और एक सुबह चाइल्ड्स (Child’s) में
गुर्जिएफ़ से मिलने गए। गुर्जिएफ़ ने उनसे कागज़ की एक शीट लेकर लिखने को कहा।
बेनेट ने पाया कि उनका हाथ अपने-आप लिख रहा था और लिखावट भी उनकी अपनी नहीं थी।
उसमें बीएलज़ेबब (Beelzebub) के
आगामी प्रकाशन की घोषणा थी और यह अनुरोध किया गया था कि अधिक-से-अधिक शिष्य इसकी
प्रतियाँ खरीदें, प्रति प्रति 100 पाउंड की कीमत पर। उस दिन बाद में गुर्जिएफ़ ने शिष्यों के
एक समूह के सामने उस पत्र को ज़ोर से पढ़ा। उनमें से कई ने टिप्पणी की कि इसे गुर्जिएफ़
के अलावा और कोई नहीं लिख सकता था।
अगले वसंत में गुर्जिएफ़ पेरिस लौट आए। केनेथ वॉकर ने देखा
कि उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ रहा था और उन्हें सलाह दी कि पेट में जमा
तरल पदार्थ को निकालने के लिए उनका ऑपरेशन होना चाहिए। गुर्जिएफ़ ने इस सलाह को, ऐसा लगता है, अनदेखा कर दिया।
बेनेट भी उनसे नियमित रूप से मिलते रहे और उन्होंने पाया कि
गुर्जिएफ़ पहले की तरह ही कठोर अपेक्षाएँ रखने वाले थे। असम्भव-सी लगने वाली
माँगों को पूरा करने के लिए बेनेट स्वयं को अपनी सीमा तक खींचते रहे। फिर अचानक
उन्हें समझ में आया कि यह गुर्जिएफ़ की एक और ‘चाल’ थी। बेनेट की समस्या यह थी कि
वे किसी बात के लिए ‘नहीं’ कह पाने में असमर्थ थे और गुर्जिएफ़ उन्हें यही क्षमता
विकसित करना सिखा रहे थे। यह समझ में आते ही बेनेट ने अत्यन्त गहरी राहत का अनुभव
किया।
एक बार फिर, गुर्जिएफ़ की सहायता से बेनेट को असामान्य अनुभव होने लगे। गुर्जिएफ़
के फ्लैट में शाम के भोजन से पहले जब वे ज़ोर से पढ़ रहे थे तो अचानक उन्हें लगा कि वे अपने शरीर से बाहर निकल गए हैं
और कुछ फीट दूर खड़े होकर अपनी ही आवाज़ को पढ़ते हुए सुन रहे हैं। इसके बाद
उन्होंने अपनी भावनात्मक अवस्थाओं को इच्छानुसार नियंत्रित करने की क्षमता फिर से
अनुभव की। उन्होंने यह भी पाया कि वे दूसरी जगहों पर घट रही घटनाओं के प्रति सचेत
हो सकते थे। एक दिन इसकी पुष्टि करने के लिए उन्होंने लंदन में अपनी पत्नी को फोन
किया और यह सत्यापित किया कि वह अपनी कुछ महिला मित्रों के साथ एक निश्चित बैठक
में गई थीं। ठीक वही दृश्य उन्होंने अपनी ‘दूरदर्शिता’ (clairvoyance)
की अवस्था में देखा था।
अक्टूबर में जब बेनेट पेरिस लौटे, तब यह स्पष्ट था कि गुर्जिएफ़ अब बहुत बीमार हो चुके थे।
अठारह महीने पहले वे एक और कार दुर्घटना का शिकार हुए थे, जिसमें उन्हें गंभीर चोट लगी थी। उस समय बेनेट उस
जीवन-शक्ति से बहुत प्रभावित हुए थे जिसने उन्हें मरने से बचा लिया था। लेकिन अब ड्रॉप्सी
(पेट में पानी जमा होने के कारण होने वाला रोग) के कारण उनके पैर सूज गए थे और ऐसा
लगता था कि उनमें जीने की इच्छा ही नहीं बची थी। शनिवार, 22 अक्टूबर 1949 की सुबह बेनेट ने उन्हें एक कैफ़े में बैठे देखा। वे बीमार
और थके हुए दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बेनेट से कहा, “अगले पाँच वर्ष निर्णायक होंगे। यह एक नई दुनिया की शुरुआत
है या तो पुरानी दुनिया मुझे ‘चिक’ कर देगी” (उन्होंने जूँ को कुचलने जैसी आवाज़
निकाली) “या मैं पुरानी दुनिया को ‘चिक’ कर दूँगा” अर्थात उसे कुचल दूँगा... “चिक।
तब नई दुनिया शुरू हो सकती है।” इससे लगता है कि गुर्जिएफ़ को कम-से-कम अगले पाँच
वर्षों तक जीवित रहने की उम्मीद थी। बेनेट उन्हें उनकी कार में घर तक लेकर गए। यह
अपने आप में काफी साहस का काम था क्योंकि गुर्जिएफ़ हमेशा बहुत खराब ड्राइवर रहे थे और अब
उनके पैर इतने सूज चुके थे कि वे ब्रेक तक नहीं दबा सकते थे। एवेन्यू कार्नो (Avenue
Carnot) को पार करते समय एक लॉरी तेज़ी से उनकी ओर आई। गुर्जिएफ़
उसी गति से गाड़ी चलाते रहे और वह लॉरी उन्हें बाल-बाल बचाते हुए निकल गई। अपने
फ्लैट के बाहर कार रोकने के लिए उन्हें उसे धीरे-धीरे अपने आप नीचे की ओर लुढ़कने
देना पड़ा।
चार दिन बाद गुर्जिएफ़ के अमेरिकी डॉक्टर ने उन्हें देखा और
उन्हें अमेरिकन अस्पताल ले जाने का आदेश दिया। उनका रक्तचाप इतना अधिक था कि
उन्हें सीरम का इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता था। उनके पेट से बहुत बड़ी मात्रा में
तरल पदार्थ निकाला गया, लेकिन
शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगले शनिवार, 29 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन इस बात को लेकर भी कुछ
संदेह था कि वास्तव में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं। मृत्यु के चार घंटे बाद भी
उनका माथा गर्म था। और जब बेनेट अमेरिकन अस्पताल के चैपल में उनके शव के पास अकेले
खड़े थे तो
उन्हें किसी के साँस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। यहाँ तक कि जब उन्होंने स्वयं
साँस रोक ली और अपनी आँखें बंद कर लीं, तब भी। उन्हें संदेह हुआ कि गुर्जिएफ़ ने जाते-जाते भी उनके
साथ कोई व्यावहारिक मज़ाक किया है।
जब शव-परीक्षा की गई तो डॉक्टर हैरान रह गए। उनकी आँतें इतनी अधिक नष्ट और सड़
चुकी थीं कि चिकित्सकों के अनुसार उन्हें वर्षों पहले ही मर जाना चाहिए था।
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