Thursday, 22 February 2018

गुमशुदा (कहानी)

एक लंबी सुबह वाली उबासी लेते हुए... टाइम तो देखूँ! ...हे भगवान! दस बज गए। छुट्टी के दिन टाइम बहुत भागता है। कमबख़्त कहीं का! एक दिन तो मिलता है कमर सीधी करने का...आराम करने का...तय समय से थोड़ा आधिक सोने का...अपने हाथ की एक गरम चाय बनाकर एक प्याली सुरूर से पीने का...! शर्मिला के मन में यही वाक्य आ जा रहे थे।  
                             

    सुबह के दस बज चुके थे। शर्मिला अब पूरी तरह से जाग चुकी थी। बिस्तर में बगल पर कोई नहीं था। इसका साफ मतलब था कि मानव अपने काम पर जा चुका था। उसकी रविवार को छुट्टी नहीं होती। उसने बिस्तर पर बैठे बैठे बगल में हाथ फेरा। उसने शायद मानव को महसूस करने की कोशिश की। उसने एक लंबी सांस भरी। तभी दरवाजे पर घंटी बजी।

    उसने अपनी अस्त व्यस्त मैक्सी को दुरुस्त किया। बालों को दोनों हाथों से संभालते हुए जुड़ा कसा। लेकिन उनमें तैल न लगा होने के कारण जुड़ा ढीला बंधा। इस बात पर ध्यान दिये बिना वह उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दरवाजे पर दो कुंडियाँ लगी थीं। उसने अपना दम लगाते हुए जैसे तैसे उन्हें खोला और अपने सामने अक्षर को पाया। वह शर्मिला को देखते ही बोला- “शर्मिला दीदी... मैं कितनी बार आ चुका हूँ। और आप हैं कि दरवाजा खोल ही नहीं रही हैं। ...लाइये जल्दी से कूड़ा दीजिये...नीचे बड़ा भाई खड़ा रिक्शा लेकर..!” शर्मिला जो थकावट महसूस कर रही थी, ने अनमना चेहरा बनाते हुए कहा- “अक्षर अब तू भी डाँटेगा क्या? पता नहीं सनडे है। थकावट से नींद आ जाती है। सर्दियों में तो और। ...आजा(पीछे हटते हुए) घर में बैठ कुछ देर। चाय पिएगा। तू भी कितना मेहनती है। जब नया नया आया था तब कितना छुटकू सा था। आज तेरी लंबाई मेरी लंबाई से भी ऊपर जा रही है।” पीछे मुड़कर देखते हुए शर्मिला ने थोड़ा ज़िद्द करते हुए कहा- “आ भी जा। कार्ड भेजूँ!”

    अक्षर ने बड़ा सा थैला बाहर रखते हुए रसोई की ओर रुख किया और फटाफट कूड़े की पोलिथीन उठाकर दरवाज़े की ओर लपका। शर्मिला ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। अक्षर बाहर जाते हुए बोला- “दीदी मार्च में पेपर शुरू होंगे। इसलिए जल्दी जल्दी काम कर के मुझे पढ़ाई करनी होती है। जब आपकी लगातार छुट्टी होगी तब आऊँगा। आप चाय अच्छा बनाते हो।” ऐसा कहते हुए वह फटाफट सीढ़ियाँ उतरने लगा। शर्मिला दरवाज़े तक आई और अक्षर के कदमों की आवाज को सुनती रही। जब आवाज़ गायब हो गई तब वह दरवाजे की सिर्फ एक कुंडी लगाकर वापस अपने घर के बीच वाले हिस्से में खड़ी हो गई। उसने चारों तरफ नज़रें दौड़ाई। उसे लगा कि यह किसी अजनबी का घर है। फिर वह अपने सोने के कमरे में गई। बिस्तर की मुड़ी-तुड़ी बेतरतीब चादर और कंबल को देखकर उसे अजीब लगा। उसने सिर्फ कंबल ठीक किया और धड़ाम से सर्दी को महसूस करते हुए कंबल में घुस गई। बालों का ढीला जुड़ा खुल गया और वह आँखें बंद कर लेट गई। उसे याद आया कि इतनी अधिक सर्दी में वह मैक्सी में कैसे अभी तक रह गई थी। उसे अपने पर खिन्न आई। उसने अपनी करवट बदली और मानव के हिस्से पर अपना हाथ कंबल से निकालकर उसे सहलाने लगी। उसने अपनी करवट को फिर सीधा किया और आँखें बंद ही करे रही। चार साल पहले का एक दृश्य दिखा जिसमें वह मानव के साथ कोर्ट में शादी कर रही है। घर वालों में कोई नहीं है। महज कुछ दोस्त हैं। वह रजिस्टर पर दस्तख़त कर रही है। उसने नीली साड़ी पहनी है। मानव ने सफ़ेद कमीज़। दोनों गंभीर दिख रहे हैं। उसके चेहरे पर इस दृश्य को देखकर भी कोई भाव नहीं आया।  

 
    सिरहाने के पास पड़ी छोटी मेज पर अपनी और मानव की शादी का फोटो फ्रेम रखा हुआ था। उसने चुपके से उस फोटो को निहारा। चार साल हो गए। वह हैरान हो गई। वह धप से अचानक उठकर बैठ गई। उसके बाल फिर से चेहरे के ऊपर आ गए। उसने गुस्से से उन्हें पीछे किया। वह बड़बड़ाई। अजीब मुसीबत हैं ये बाल। इनसे तो आज छुटकारा पाकर ही रहूँगी चाहे मानव कुछ भी कहता रहे। मैंने क्या उसकी पसंद की चीजों को ढोने का ठेका लिया हुआ है। वह लड़खड़ाती हुई कंबल से फुर्र से उठ खड़ी हुई। गुसलखाने की तरफ लपकी। न जाने उसे क्या याद आया और अलमारी की ओर मुड़ी। चर्र की आवाज़ हुई और हाथ में उसके एक कैंची नज़र आई। वह घुसी तो कैंची से कुछ खर्र खर्र काटने की आवाज़ आई और उसके बाद नल से गिरते हुए पानी का बाल्टी में अपना आयतन बनाना ही समझ आया। 

    शर्मिला नहाकर जब बाहर निकली तब वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी। वह सीधे आईने के सामने गई। उसने तौलिये से फिर से बालों का टपकता हुआ पानी पोंछा। वह पहली बार आज मुसकुराई। वह बहुत खुश हुई। उसने खुशी से एक उछाल लगाई और बोली- येएएए..! उसे सर्दी का अहसास हुआ। उसने अलमारी के चरमराते हुए दरवाजे को फिर खोला और मरून शाल निकाल कर जल्दी से अपने चारों ओर लपेट ली। इसके बाद गुसलखाने की तरफ जल्दी जल्दी गई। लंबे लबे कटे हुए बेजान बालों को रसोई में रखे कूड़े के बड़े डिब्बे में ऐसा पटका जैसे कोई बेहद घिन्न की वस्तु हो। उसे इस काम से फिर राहत महसूस हुई। 

    वह सोने के कमरे में वापस लौटी। कंबल तय कर बिस्तर ठीक किया। वह कमरे से बाहर निकल ही रही थी तभी उसने शादी की फोटो को औंधे मुंह रख दिया। वह बड़बड़ाई- “चौबीस घंटे एक ही फ्रेम को देखकर कितनी अजब सा अनुभव होता है। ज़िंदगी भी बड़ी चिपचिपी हो जाती है। मानव को आने दो। रात को कहूँगी कोई नई फोटो फ्रेम करवा ले। बदलाव भी तो जरूरी है।” फिर कमरे की दीवारों पर नज़र फेरते हुए बोली- “इसका रंग भी बदलवा लेंगे। थोड़ी सर्दी कम हो जाये। बिस्तर के सामने वाली दीवार पर वॉन गॉग की सूरजमुखी वाली पेंटिंग लगाएंगे... बड़ी सी। क्या शानदार लगेगा कमरा फिर।” वह थोड़ा उत्साहित हो गई थी। उसे सर्दी महसूस हुई और उसने दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाई। अब तक बारह बजने में दस मिनट शेष थे। वह जल्दी जल्दी कमरे निकल कर रसोई की तरफ बढ़ी। अपने लिए चाय का पानी गैस जलाकर रखा। सब्ज़ी की छोटी से प्लास्टिक की टोकरी में से अदरक खोजकर बेलन से कपड़े पर रख कूट-कूट कर चाय के बरतन में डाल दी। उसने इसके बाद चीनी और चायपत्ती डाली। चाय थोड़ी देर में खोलने लगी। शर्मिला ने चाय के निखार को देखा। भूरी भूरी। दमकती। उसे खाना पकाना नहीं सुहाता पर चाय की तो उसे नशेबाजी है। उसने बड़ा सा चाय का मग लिया। उसमें सारी चाय उड़ेलकर वह सोने के कमरे के बाहर वाले बैठक में पहुँच गई। वहाँ सोफ़े पर वह आहिस्ता से बैठी। चाय को सामने ही रखी छोटी टेबल पर रखकर उसने दोनों पैर ऊपर कर पालथी बनाई। बाल अभी भी नम थे। शाल को कसकर ठीक से लपेटा। फिर मग उठाकर चाय की एक घूंट को अपने अंदर लिया। उसे बेहद अच्छा लगा। उसे लगा कि उसे कितने बरस हो गए हैं कहीं लौटे हुए। वह कहाँ से लौट रही है उसे मालूम नहीं चला। 


 
    उसे हफ्ते के छह दिन तो गुम रहने का अहसास होता है। दिन दफ्तर में कट जाता है। कंप्यूटर की स्क्रीन कितनी उकताहट दे देती है। लेकिन जब महीने में बैंक में सैलरी का मैसेज आता है तब उसे अपनी मेहनत के ऊपर नाज होता है। ख़र्चे का दोनों बंटवारा करते हैं। ताकि दोनों एक दूसरे पर बोझ जैसे अहसास न छोड़ें। उसे अहसास हुआ कि घुटने मोड़े हुए उसे काफी देर हो गई है और दर्द हो रहा है। उसने पैर पसार दिये। चाय पीने के बाद उसे क़रार मिला। उसे कुछ खयाल आया कि वह कुछ करे। उसे लगा कि वह चिट्ठियाँ लिखना चाहती है। पर किसे? वह यह नहीं जानती। वह फटाफट उठी और अलमारी के नीचे दराज़ में खोजबीन करने लगी।
 
    नीचे के दराज़ में इस खोजबीन के दौरान उसने सोचा- “मैंने अपनी रचनात्मकता को कितनी तहों में दबा दिया है। भूल गई हूँ कितना कुछ! उसके हाथ में धूल चढ़ीं कुछ किताबें आ गईं। कुछ उपन्यास। कुछ कहानियों की किताबें। उसके चेहरे पर दूसरी बार ख़ालिस मुस्कान उतर आई। उसे फिर से बेहद अच्छा लगा। बहुत अच्छा। शाल के एक किनारे से ही उसने उन किताबों की धूल हटाई। उसकी पसंद की सारी किताबें थीं। उसने कई पढ़ी भी थीं। पर उससे कोई गर कोई पूछे की कौन सी किताब में लिखा हुआ है तो उसकी ज़ुबान लड़खड़ा जाएगी। सुबह से दूसरी बार था जो उसने अपने आप को खोजा था। पहली दफा बाल काटने में दूसरी दफा धूल से सनी किताबों में।  

    उसे तलब हुई कि वह फिर कुछ लिखे। पर किसे? उसे इस बार भी अहसास नहीं हुआ। उसने सारी किताबों को ठीक से साफ किया और सोने के कमरे में रखी कपड़ों की अलमारी में ऐसी जगह सजा आई कि जब भी वह अलमारी खोले उसे कपड़ों से पहले ये किताबें पहले दिखें। उसे खयाल आया कि मानव गुस्सा करेगा। उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। सोचा- “जाने दो, वह कब मेरी बातों पर खुश होता है! जब देखो उसे कुछ कुछ न परेशानी सालती रहती है। वह हमेशा बाहर खुशी को खोजता है। खुशी को मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट में खोजता है। महंगे कपड़ों पर टिकी दूसरों की भौंचक नज़रों में वह अपने को तलाशता है। कभी कभी मानव मुझे मेरा हमसाया नहीं लगता। बल्कि वह, वह साया बन रहा है जिससे कि पीछा छूटे।” उसने कमरे को फिर से चारों तरफ से देखा और मायूस होकर वापस सोफ़े के पास लौट आई। वह धड़ाम से सोफ़े पर बैठी न हो जैसे गिर पड़ी हो। थोड़ी देर बाद वह सोफ़े पर ही लेट गई।  

    लेटे-लेटे उसने छत के पंखें को कुछ मिनट तक घूरा। इस बीच वह कुछ सोच नहीं पाई। उसने पंखे की पंखुड़ियों पर नज़र दौड़ाई। कितनी धूल जमा थी। उसे घिन्न आई। उसे लगा कि वह अपने घर को कभी ठीक से जान समझ नहीं पाई। जिस बिल्डिंग में उनका यह फ्लैट है उसका नाम चाँद बिल्डिंग है। उसे तुरंत बिल्डिंग का नाम सोचकर हंसी आई। उसका यह फ्लैट उर्फ घर पांचवें माले पर है। शादी के अगले साल वह यहाँ रहने आई थी। तब वह काम नहीं करती थी। तब मानव पर ही सारी ज़िम्मेदारी थी। किस्तों को भरने के लिए और बेहतर ज़िंदगी के लिए उसने काम करना शुरू किया। 

    वह उस समय ऐसी नहीं थी। वह गाती थी। झूमती थी। घूमने की लालच लिए वह अपने कुँवारेपन में कहाँ कहाँ नहीं भटक आई थी। उसे बाहर जाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। लोगों के बीच उसका दम घुट जाता था। उसे यह मालूम था कि खुद को कैसे चाहा जाता है। वह जानती थी कि वह किस क़िस्म की इंसान है। 

    उसे मानव से प्यार था क्योंकि मानव भी उसे चाहता था। उसे लगा मानव भी एक इंसान ही है। सो उसने शादी के लिए हाँ कर दी। पर कहीं दिल में एक धुकधुकी बाक़ी रह गई कि क्या मानव सच में मुझे भी मानव समझेगा। पता नहीं शहर में रहने का श्राप है या फिर कर्मों का दोष कि वह चार साल के अंदर गुम हो चुकी है। वह धीरे-धीरे गुमशुदा हो रही है। उसे लेटे लेटे याद आया कि उसे खुद को खोजने की एक रिपोर्ट दर्ज़ करनी होगी, वह भी खुद के अन्तर्मन में। यही अलख उसे मानव के अन्तर्मन में भी जगानी होगी। 

    उसे तीव्र तलब हुई कि वह एक चिट्ठी लिखे। इस बार उसे पता है कि उसे चिट्ठी किसे लिखनी होगी। वह तपाक से उठी और अलमारी के दराज से कॉपी निकाल लाई। उसने लिखा- “मैं भी कमबख़्त हूँ। कितना सोती हूँ! ज़िंदगी की नींद अब खुली है। लग रहा था कि मैं कितना सो गई हूँ कि अब उठना नामुमकिन है। पर नहीं कुछ मानसिक धक्के लगने ज़रूरी होते हैं। हमारा मन, हमारा तन और हमारी इंद्रिया कितना जगाती हैं पर हम... कान होते हुए भी बहरे हो चुके हैं। मुझे मानव के कंधे पर सिर रख आँखें बंद कर बैठे हुए कितना समय गुज़र गया है। न उसे होश रहता है और न मैं उसे तलाशती हूँ। मुझे होश ही नहीं  होता कि उस आदिम के तन मन में झांक आने का मौका खोजूँ। उसकी तरल कल्पना तक में मैं अब गायब हो चुकी हूँ। ...एक दूसरे में दिलचस्पियों का मर जाना ज़िंदगी में ऊब मन की पैदाइश करना होता है। एक ही जगह गर्दन टिकाये बैठे हैं। दफ़्तर की मुश्किलों को हम दोनों ख़ूबी के साथ हल कर लेते हैं पर अपनी ज़िंदगियों को हम कठिन सवाल में तब्दील कर रहे हैं।...।” 

    शर्मिला अपने लिए लिखने वाली चिट्ठी को तीन घंटे तक लगातार लिखती रही। बदहवाश सी वह पेन को कागज पर चलाती रही। जब उसने दीवार पर टंगी घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो वक़्त शाम के पाँच बजने की ओर जा रहा था। उसे ज़ोरों की भूख लगी। उसे याद आया कि उसने सुबह से सिर्फ एक प्याला चाय को ही गले से नीचे उतारा है। वह कॉपी और पेन को टेबल पर आराम से रखकर उठी और रसोई की तरफ बढ़ी। उसे पहली बार रसोई में बिखरे हुए सामान से और गंदगी से तेज़ बदबू का अहसास हुआ। उसने जल्दी से उस सर्दी वाले दिन में खिड़की खोली और साफ सफाई में तल्लीन हो गई। उसे लगभग 2 घंटे लगे इस काम में। उसे अपनी छोटी सी रसोई को साफ करके फिर से बहुत खुशी का अहसास हुआ। सुबह से तीसरी बार। अब उसने अपने लिए एक प्याली चावल लेकर ज़ायकेदार खिचड़ी बनाने की तैयारी की। इस दौरान उसने मोबाइल में आशिक़ी फिल्म के गाने डाउनलोड किए। उसने बस एक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए गाने को बार बार सुना। खिचड़ी के पक जाने पर उसे एक प्लेट में रखकर वह वापस पेन और कॉपी के पास आ गई। उसने जब चम्मच से पहला खिचड़ी का कौर मुंह में लिया तब उसे अपने पर हैरानी हुई कि वह भी अच्छा खाना पका लेती है। वह फिर से बेहद खुश हुई। उसे लगा कि छुट्टी के दिन उसने अपने को पा लिया है। वह अपने को प्रेम करना फिर से जान गई है। 

    इसी बीच पलंग के सिरहाने के पास छोटी मेज पर रखी अलार्म खड़ी तेज़ी से बज उठी। शर्मिला को अपने कंधे पर किसी के हाथ रखे जाने का अहसास हुआ। जाना पहचाना स्पर्श। “शर्मिला उठो...जाना नहीं है क्या...पाँच बज रहे हैं...फिर कहोगी देरी हो गई। मानव तुमने उठाया नहीं..!” वह झटके से उठ बैठी। मानव को लगा कोई डरावना सपना देखा है उसने। उसने शर्मिला को गले से लगाते हुए कहा- “कुछ नहीं हुआ। सपना देख रही थीं तुम शायद।” उसके माथे को चूमा। उसके माथे पर आए बालों को ठीक करते हुए बोला- “तुम्हारे बाल बेजान से हो गए हैं। कटवा क्यों नहीं लेतीं। ढोती रहती हो।” ...मानव कुछ बोलता जा रहा था। इधर शर्मिला अपने सपने के बारे में सोच सोच कर अपने पर हैरान हो रही थी। उसने मानव को और कसते हुए कहा- “हाँ अब बोझ नहीं ढोऊँगी! वह कुछ देर मानव में खोई रही। उसे लगा जैसे उस के अंदर सीने में एक रोशनी का गोला फूट रहा है। वह गुमशुदा होते होते बच गई।      
                         
-------------------------------------
चित्र गूगल से साभार

रसना (कहानी) 

"पापा देखो! धूप घर में घुस गई...देखो न...चलो तो सही..! "

राघव जो जल्दी ही बुढ़ापे की मार झेलता हुआ दिखाई देता है। तनाव और दुख के कारण उसके बाल तेज़ी से सफ़ेद हो रहे हैं। चेहरे पर चमक कम है। त्वचा ढीली हो गई है। आँखें अपने गड्डों में बसने को बेताब होने लगी हैं। इस बच्ची को देखकर ही वह ज़िंदा है। वह तो खुद डायरी में लिखता है —

कभी कभी लगता है मेरे अंदर इस अंधेरे की तरह एक खाई है जो मेरे पैरों को पकड़ कर खींच रही है। आखिर मैं कब तक ज़िंदा रहूँगा ! लगता है मेरे अंदर कई कुएं खुद गए हैं। पर इनमें जीवन जल नहीं है। है तो काला, वह काला रस जिसमें मैं धीरे धीरे डूब रहा हूँ। ...क्या मैं जीवित हूँ ?...क्या मैं जीवित होने की शर्तें पूरी कर पा रहा हूँ ?...नहीं पता।”

वह कुछ नहीं भूलता, यही उसकी खास बात भी है और बुरी बात भी। हाल के वर्षों में उसने डायरी लेखन भी शुरू कर दिया था। यह बात उसकी गोद ली हुई बेटी ही जानती थी। वह रात को जब अपने पिता के कमरे में झाँकती थी तब पाती थी कि मेज़ पर मेज़-लाइट की रोशनी में उसका पिता न जाने क्या देर तक लिखता रहता है। क्योंकि डायरी नितांत निजी वस्तु है इसलिए न तो उसने कभी पिता की गैर - हाज़िरी में पढ़ा और न ही कभी उसके बारे में पूछा।

हालांकि राघव पिता बहुत अच्छा था और इस बात की पुष्टि यह बच्ची अपने चेहरे की हमेशा बनी रहने वाली मुस्कान से करती थी। राघव का घर गली में तीसरा मकान था जहां उसका परिवार कई बरस पहले आया था। राघव की उम्र उस समय सोलह बताई जाती है। वह घर का दूसरा बेटा था और उसके पिता किसी ब्लेड बनाने वाली कंपनी में अच्छी पगार पाया करते थे। पिता रविवार के दिन घर में अपनी पत्नी का सहयोग रसोई से लेकर कपड़े धोने तक में दिया करते थे।

यह दशक अस्सी के आसपास था इसलिए मोहल्ले में उनका भरपूर मज़ाक बना करता था। उनके लिए जोरू का गुलाम जुमला गढ़ लिया गया था। राघव के ठीक सामने वाले घर में चटाई बुनने का काम करने वाला एक परिवार रहता था। घर में माता-पिता और एक लड़की थी जिसकी क़द की लंबाई की परेशानी को उसके माता पिता के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। माता-पिता सर्दी हो या बरसात, किसी भी मौसम में सुबह छ: बजे उठकर बुनाई के काम में लग जाते थे। पर इस काम से वे अपनी लड़की को दूर रखा करते थे। उनका कहना था कि हम अधिक पढ़ - लिख नहीं पाये। अब अगर अपनी लड़की को पढ़ा पाए तो इससे बेहतर और क्या बात होगी !

रसना, जो उनकी बेटी का नाम था, वह पढ़ने-लिखने में बहुत बेहतर थी। क्योंकि दोनों परिवारों का घर आमने-सामने था इसलिए संवाद होना मुनासिब था। धीरे-धीरे दोनों परिवारों में रिश्ते गाढ़े होने लगे और परिवारों की दोस्ती के चलते रसना और राघव में भी काफी बढ़िया दोस्ती हो गई। गली में बाकी लोग भी छोटे - मोटे काम - धंधों या फिर नौकरी करने वाले लोग थे। यह मोहल्ला आम लोगों से जीवंत था।

रसना की सुंदरता में कोई कमी नहीं थी। उसका रंग धूप में सूखे हुए गेंहू की तरह चमकदार था और चेहरे की सुंदरता में होंठों के पास का तिल चार चंद लगा देता था। बाल उसके लंबे थे और वह अपना बहुत समय इन्हें दिया करती थी। रसना के घर में चटाई के शानदार छोटे-छोटे नमूने सजाये गए थे।

इकलौती संतान होने के चलते उसे अलग से एक छोटा कमरा हासिल था। उसकी मुस्कुराहट उसकी बातों से ज़्यादा अच्छी लगा करती थी। उसका धीर पसंद स्वभाव मोहल्ले में सराहनीय था। लेकिन कुछ ऐसा लोग ज़रूर अपनी नज़रों में उतार लाते हैं जिससे सामने वाले पर निशाना लगाया जाए।

रसना का क़द उसके व्यक्तित्व में एब की तरह कुरेदा गया। उसकी बाकी सारी खासियतों को धूल में मिला दिया गया। और उम्र के बढ़ते और शादी न होने के चलते उसे उसके बेहद कम क़द के लिए ताने दिये गए। रसना को घर में कभी इस बात का अहसास नहीं था कि उसका क़द बेहद कम था। लेकिन स्कूल और कॉलेज या फिर आस-पास मानो उसे कुरेद-कुरेदकर लोग कहते, बौनी रसना, नाटी रसना, बित्ता भर की रसना, छुटकी रसना, बेचारी रसना, अजीब-सी लगती है रसना, क्या होगा रसना का..!”

कितना कुछ सुनती थी रसना!

एक वक्त ऐसा आया कि उसे आदत लग गई इन सब बातों को सुनने की। पहले वह रो भी जाया करती थी पर कुछ अरसा हुआ कि उसने रोना भी बंद कर दिया है। ऐसे में राघव ही था जो उसे कहता था, तू मेरी दोस्त है। मजबूत रह। नौकरी के पेपर दे। अपने पैरों पर खड़ी हो। तुझे क्या करना है इन सब बातों से।” पर रसना जानती थी कि वह भी उसका मन रखने के लिए सब बातें करता है। कॉलेज में भी वह रसना को दूर से देख ले तो कन्नी काट लेता है। जानकर भी अनजान बन जाता है। घर का रास्ता एक है पर वह अलग ही आता है। क्या रसना नहीं जानती कि वह ऐसा क्यों करता है ? रसना उम्मीद से अधिक समझदार है। वह सब जानती है इसलिए अब वह खुद ही उसे देखकर अनजान बन जाती है। रसना उसे कब से चाहती थी। इस बात को राघव बहुत अच्छी तरह से जानता था। लेकिन वह तो अपने को स्मार्ट समझता है इसलिए वह कम से कम एक बौनी लड़की से तो प्यार नहीं कर सकता। लोग क्या कहेंगे !

रसना ने अपनी डायरियों में तमाम तरह के जज़्बात लिखे थे। कई तो उसे खुद ही समझ नहीं आते या अजीब लगते थे। उसने एक रोज़ लिखा, राघव से उम्मीद नहीं है पर प्रेम से थी। सुना है प्रेम अंधा होता है। उसे क़द की ज़रूरत नहीं होती। फिर क्या राघव को समझ नहीं आता?”

उसने एक रोज़ कैथरीन कुकसन का लिखा उपन्यास ‘कलर ब्लाइंड’ पढ़ा और वह बहुत प्रभावित हुई। उस एक संवाद से सबसे ज़्यादा, ईश्वर तो रंग ही नहीं देख सकता। ईश्वर रंग के मामले में अंधा होता है।”

उसने कुछ देर सोचा और मद्धिम रोशनी में डायरी में दर्ज़ किया —

क्या ईश्वर क़द के मामले में भी अंधा होता है? हाँ... होता तो ज़रूर होगा। वामन अवतार में जब वह आया तो क्या उसका भी ऐसा मज़ाक उड़ा था। खैर भगवान अजीब है। क्या वह आसमान में सच में रहता है जो हमारी सुनता होगा। ऊपर से तो उसे सब कुछ बराबर ही दिखता होगा। क्या मैं भी दिखती हूँ ? इतनी छोटी हूँ, क्या मैं दिखती होउँगी?”

इस बीच राघव के परिवार और रसना के परिवार ने दोनों की शादी की बात सोची जिसमें रसना की माँ ने कहा कि एक बार राघव और रसना की रज़ामंदी भी जाननी चाहिए। पर राघव से पहले रसना ने मना कर दिया। वह राघव का इंकार नहीं सह सकती थी। राघव ने इस सब के चलते चैन की सांस ली।

रसना ने इसके बाद राघव से लगभग दूर रहना शुरू कर दिया था। एक डायरी लेखन ही ऐसी जगह थी जहां वह उससे मिल लेती थी। बात कर लेती थी। इंसान की समानता की तमन्ना लेखन में कितनी समान हो जाती है। सभी लोगों के लिए लेखन सच्ची और वास्तविक डेमोक्रेसी जैसा स्पेस है। कम से कम रसना को तो यही लगता है। क्योंकि जब वह लिखती है तब वह बस एक लिखने वाली ही रहती है। जो भी शब्द दिलोदिमाग में तैरते हैं वह उन सब से घिर जाती है। कितना सुखकारी है लिखना !

बंद कमरे में वह अपने दिन डायरी लेखन और पढ़ने में गुजारती थी। कुछ दिनों से उसे अजीबोगरीब अहसास और सपने आते थे। इसका ज़िक्र उसने किसी से नहीं किया। रात को सोने के समय उसने अपने आप को देखा की छाती और गले के हिस्से में बॉल के समान एक गोला घूम रहा है। वह लगातार घूम रहा गोला सूरज के नवजात बच्चे सरीखा है। उसे लगा कि यह उसके अधिक सोचने और तनाव का नतीजा है। पर यह गोला लगातार घूमता रहा और घूमता रहा। उसने एक रोज़ हिम्मत कर के अपनी माँ को यह बात बताई। पर माँ के लिए अब वह छाती के बोझ में तब्दील हो चुकी थी सो माँ ने उसकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया।

अगले दिन रात में उसने लेखन से जुड़े कुछ ख़यालों को डायरी में उतारने के लिए कलम थामी। उसने लिखा, “अधूरे प्रेम और टूटते तारे, लेखन के लिए बहुत बढ़िया विषय हैं। कम से कम मेरे लिए तो हैं ही।” पर जैसे ही उसने तारे के बारे में सोचा वह रोशनी का गोला उसकी छाती में चक्कर काटने लगा। उसका गला सूख गया और वह पानी पीने दौड़ पड़ी। पर उसे राहत नहीं मिली। वह अधूरी चाहत और रोशनी के गोले में तड़पने लगी और सुबह कब हुई उसे मालूम नहीं चला।

इस बीच राघव अपनी ज़िंदगी के जश्न में खो गया। उसने रसना से उसके कद से भी बड़ा फासला अख़्तियार कर लिया। वह बेहद कम मिलता और रसना की आँखों से आँखें भी नहीं मिला पाता। उसके दोस्तों में जो कभी रसना का नाम भी आता तो वह गुस्से से उबल पड़ता। वह दिन - ब - दिन रसना के नाम से भी चिढ़ने लगा था। यहाँ तक कि उसने घर में घर बेचने की बात भी कह दी थी कि यह गली मोहल्ला उसके मानक पर उतर नहीं पाता। इसलिए उन्हें घर बेचकर कहीं ओर अच्छी कॉलोनी में चलना चाहिए।

पिता खासे नाराज़ हुए और बोले, अपनी कमाई करो और जहां चाहे बस जाओ।”

माँ ने खांसी से ज़रा आराम पाते हुए कहा, ज़िंदगी भर घर बदलेंगे या कभी टिककर जिएंगे।”

थोड़ा थमकर वे फिर बोलीं, अभी भी वक़्त नहीं गुज़रा है। रसना के बारे में सोचो। ज़िंदगी नेकी और क़ाबिलियत से अच्छी चलती है। रंगरूप की शाम ढल जाती है।” उस रात वह गुस्से के मारे घर देर से आया और बिना खाये बिस्तर में चला गया।

मेहनत के फल बड़े रसीले हुआ करते हैं। रसना की मेहनत रंग लाई थी। उसका किसी बैंक में क्लर्क के पद पर चुनाव हो गया था। वह इन मायूसियों में रोशनमान हो गई और उसके माँ-पिता भी खुशी से झूम उठे। रसना ने अपनी खुशी को खुले दरवाज़े से आई हुई रोशनी के समान लिया। पिता से बोली, आप दोनों को अब आराम करने की ज़रूरत है। चटाई बुनने में आप लोग थक जाते हैं। इसलिए आराम कीजिये। इतनी पगार तो है ही कि हम आराम से खा सकें।”

इसके दो महीने बाद ही रसना ने घर में रंग रोगन करवाया। अपने कमरे को खासतौर से सजाया और उसे किताबघर में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं बाद के महीनों में उसने तमाम रुचिकर किताबें खरीदीं और बाकायदा नियम से पढ़ने भी लगी। इस बीच उसके माँ-पिता ने उन किताबों से भरपूर नाता जोड़ लिया। पिता भी कुछ ही समय में एक अच्छे पाठक में तब्दील हो गए और बेहद कम पढ़ी - लिखी माँ को भी हल्की भाषा पढ़ना सिखाने में कामयाब हो गए।

उसके माँ-पिता ने यह पहली बार अनुभव किया कि किताबों की दुनिया में कितनी रचनात्मकता है। हर तरह के अनुभव हैं। जगहें हैं। कहानियाँ हैं। किरदार हैं। परिस्थितियाँ हैं। वह सब है जो ज़िंदगी के साथ मिलता है। किताबों की दुनिया में जाकर उन्हें अपने उस बर्ताव से घिन आई जो कभी वे रसना के क़द के चलते कर बैठे थे।

पर आसपड़ोस में लोग उन्हें हिकारत की नज़र से देखते थे जो बेटी के पैसों पर ज़िंदा थे। लेकिन रसना ने यह साफ कर दिया कि वह इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देती और घर में इसका ज़िक्र भी नहीं चाहती। उसने आगे भविष्य में अपनी योजनाओं पर ध्यान लगा लिया था। वह आत्मविश्वासी बन गई थी। यदि कोई उसे उसके क़द से कम भी समझता तो वह माकूल जवाब देती और परवाह नहीं करती।

रसना ने एक बहस यह भी खड़ी कि बौने लोग और बाकी लोग, लोग ही हैं। ‘स्नॉ व्हाइट’ के कहानी या फिर ‘गुलिवर ट्रेवल्स’ में आए बौने किरदार सिर्फ बौने ही नहीं बल्कि वे इनसे और भी आगे की खासियत रखते हैं। इस बीच एक पल को भी वह राघव को नहीं भूलती थी। रोशनी का गोला साथ - साथ चलता था। या यूं कहें कि रसना को उसकी आदत लग गई थी।

रसना की मुहब्बत डायरी में चाहे जितनी फलफूल रही थी पर उसके व्यावहारिक जीवन में एक रिश्ता आया और उसने अपने माँ - पिता के घोर आग्रह के चलते मान लिया। सब ठीक था। उसे इस अचानक आई खुशी पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि“गौरव का मेरी ज़िंदगी में आना मुझे हैरानी में डाल देता है। मुझे अपने श्रीमती रसना और कुमारी रसना के दो रूपों को देखकर कुछ समझ नहीं आता कि क्या आकलन किया जाये। यहाँ भरपूर सम्मान मिलता है जिसकी आदत नहीं रही कभी। अच्छा ...खुशियाँ क्या ऐसी ही होती हैं ? मैं खुश हूँ। गौरव जब आसपास रहते हैं तब मुझे बहुत अच्छा लगता है। छुट्टी का दिन घर में छोटा लगता है। मन में सवाल आता है कि रविवार इतना छोटा क्यों होता है ? धत् ! मैं पागल हो गई हूँ। दजीवन समय से बुना जाता है। बुनने के साथ साथ व्यक्ति अपने आप को भी बुनना जान जाता है। रसना अपने को जान रही थी पर दूसरी तरफ राघव अपने भटकाव को जीने की ललक में ही रह गया था। पर उसे एक बहुत बड़ा आघात लगा। इस बात का पता रसना को तब लगा जब वह अपने माँ-पिता से मिलने आई। उसे बताया गया कि राघव किसी काम से कहीं बाहर गया था। घर में उसका बड़ा भाई और माँ पिता ही थे। जाने क्या हुआ कि रात को आग की लपटों में कोई बच न सका। सब जन जलकर खाक हो गए। राघव जब आया तो रसना, जिसने अपने लिखने की आदत को अभी भी बरक़रार रखा था ने डायरी में लिखा -

मुझे राघव के लिए अच्छा नहीं लग रहा। ईश्वर को इंसान की ज़िंदगी में इस तरह की घटना को नहीं रचना चाहिए। वो जहां भी हो बस जल्दी से ज़िंदगी की तरफ मुड़े। हमें फिर से वापस आना होता है। कैसी भी बुरी घटना हो या सदमे लग जाएँ, तब भी हमें ज़िंदगी की तरफ वापस आना चाहिए। जीने से बेहतर कुछ नहीं।"

कुछ समय बाद राघव वापस मोहल्ले में आया और साथ में एक बच्ची लाया। पड़ोस के लोगों से उसने अपनी बातचीत लगभग समाप्त कर दी थी। लोगों ने उस बच्ची के बारे में खुद से कई क़यास लगाए और कुछ समय बाद चुप हो गए। अब कभी - कभी सामने के घर में आने वाली रसना को चोरी चुपके देखता है। कुछ दिनों से रात में उसके गले और छाती के नजदीक एक रोशनी का गोला घूमता है। जब जब वह घूमता है उसे रसना बहुत याद आती है। कई घंटों वह तड़पता है और उठ नहीं पाता। कभी - कभी उसे लगता है कि उसके बिस्तर के नीचे पानी इकट्ठा हुआ है और बहुत से तारे उस पानी में घुल रहे हैं।

"जीना तो उतना ही लंबा होता है जितना होता है और मरने के बारे में सोचने से बुरा कुछ नहीं होता।”

वह होश खो बैठा। जाने कहाँ चला गया कोई नहीं जानता !

 

Monday, 19 February 2018

पिंजड़ा तोड़- करेंगे पॉलिटिक्स और प्यार तक और उससे आगे भी ...जीते रहो


पिंजड़ा तोड़ मुहिम को देखते हुए कुछ सवाल अपने आप ज़ेहन में आ जाते हैं:-
इसकी शुरुआत वजह, कब कैसे कब तक
पिंजड़ा तोड़ के मायने क्या हैं?
क्यों जरूरी है ?
इसकी प्रक्रिया क्या हैं?
इसका माध्यम क्या है?
क्या क्या निकल कर आ रहा है?
लोगों की क्या प्रतिक्रियाएँ हैं? (घर और पढ़ने वालों की भी)
अहसास क्या होते हैं?
किस तरह के व्यक्तिगत बदलाव समझ आते हैं खुद में?
दूसरों के अंदर क्या बदलाव अब दिखते हैं?
लड़कों का क्या सहयोग रहता है?
संस्थाओं मसलन कॉलेजों या विश्वविद्यालय का क्या और कैसा दबाव रहता है?

इन सवालों को जानना है तो एक बार गूगल पर जाकर पिंजड़ा तोड़ मुहिम के दिलचस्प वीडियो और तस्वीरें जरूर देखें। मुझे तो इस मुहिम से इश्क़ सा कुछ है इसलिए एक छोटा सा नोट लिखा है।





बात यह 100 टका सही है कि हमारा आसपास हमेशा गतिशील होता है। उसमें हलचल होती है। हमेशा कुछ न कुछ घट ही रहा होता है। यह हम पर होता है कि हम किन घटनाओं को देखते, जुड़ते, जूझते, सुलझाते, दूर भागते, नज़र चुराते हैं, हथियार डाल देते हैं, या फिर मैदान में अपनी शुरुआत को शुरू कर भीड़ जाते हैं।

कभी कभी हम तर्क और किताबों में इतने खो जाते हैं कि आसपास चल रही महत्वपूर्ण घटनाओं को समझ तो दूर उनकी पहचान करने से भी महरूम रह जाते हैं। अपनी बुद्धि और शोध को पॉलिश करने में हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि हम अपने को दर्ज़ ही नहीं कर पायें। किताबें उन लोगों ने ही अंजाम तक लिखी जिन लोगों ने अपने समय और उसकी हलचल को दर्ज़ कर लिया।

ऐसा ही एक विषय है जो अपने दिलचस्प रंगों और तौर तरीकों से कुछ लोगों द्वारा चलाया जा रहा है। मशीनों के जमाने में बदतमीजियाँ तो हो रही है पर न समझियाँ भी कुछ कम नहीं। बहुत ज़्यादा हो रही है। नारीवाद विषय या फेमिनिज़्म पर किताबों की रचना का प्रोडक्शन या उत्पादन खूब किया जा रहा है। लेकिन इन सब में नारी ही छूटती जा रही है। जीती जागती इंसान की फिक्र न के बराबर है और किताबों में उसकी शक्ल, सूरत, हैसियत और दिक्कत के नमूने गढ़े जा रहे हैं। है न अजीब?



दिल्ली शहर के कुछ विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा चलाया जा रहा 'पिंजड़ातोड़ अभियान' अपने आप में एक महत्वपूर्ण और जीता जागता इंसानी समूह और गलत के खिलाफ के विद्रोह का एक दस्तावेज़ है। इसके बारे में टीवी पर कभी कभी एक या दो मिनट की कवरेज या झलक वाली खबर दिखाई जाती है। लेकिन हैरानी है कि इसे जितनी तवज्जो मिलनी चाहिए उतनी नहीं दी जाती। फिर भी यह दिन पर दिन बढ़ रहा है जो अच्छी बात है।

आज जब मशीन और इंटरनेट जैसी हाईटेक दुनिया में ज़िंदगी आसान और समान होनी चाहिए तब भी नतीजे और भी दुखद और चौंकाने वाले दिखलाई पड़ते हैं। जी हाँ 'द सेकंड सेक्स' बहुत अधिक जूझ रही है। अजीब किस्म के हालातों में पिंजड़ा तोड़ अभियान अपने अंदाज़ और विरोध की आवाज़ दर्ज़ भी करवा रहा है। यह सफर इतना आसान भी नहीं है।

इस अभियान की शुरुआत दिल्ली के (एक) विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा की गई। एक बार फिर से लड़कियों  को घड़ी की सुइयों को दिखाया गया और पाबंदी के कानून लागू कर दिये गए। हॉस्टल में आने और जाने के वक़्त की निगरानी और रोक के आदेशों के तानाशाही फरमान जारी हुए। इसके पीछे की वजहें ये बताई गईं कि शहर में आपके साथ कोई भी हादसा हो सकता है और अगर किसी लड़की के साथ कुछ भी हुआ तो इसमें विश्वविद्यालय फंस सकता है। उसकी शाख पर असर पड़ेगा। इतना ही नहीं नाम भी खराब होगा।



यह बात बहुत अजीब और दुखद है कि जहां हम सुपर पावर बनने के सपने देख रहे हैं वहीं हम यह भी तय कर रहे हैं कि लड़कियों के हॉस्टल में लौटने का समय क्या होगा। आपको अजीब नहीं लगता? किसी की आज़ादी पर सरेआम ताला लगाने के समान यह बात है। इतना ही नहीं यह बात और भी हैरानी वाली है कि लड़कियों के संदर्भ में एक खास विषय की पढ़ाई की बात निश्चित की गई है। पढ़ाई में भी रसोई गैस की व्यवस्था गृह विज्ञान के द्वारा सेट कर दी गई है। दिल्ली शहर के ही एक कॉलेज में एक प्रोजेक्ट के दौरान लड़कियों के लिए उनकी लैब में समयसीमा तय कर दी। जब बिटिया पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? सोचिए ये सारे सवाल। जरूरी हैं। अगर हमने अपने हिस्से की लड़ाई नहीं लड़ी तब आप इतिहास में एक धब्बा बनने के हकदार हैं।  

दिल्ली जैसे शहर में पढ़ने वाली छात्राओं के लिए तमाम तरह की एक रोक रूकावट की फेहरिश्त नज़र आ रही है तो सोच के भी डर लगता है कि देश के बाक़ी हिस्सों में क्या हाल होगा। समाज का परिवारों पर दबाव होता है। परिवारों का लड़कियों को 'अच्छी लड़की' में तब्दील करने अपना अलहदा अभियान है। साथ ही में 'इज्जत' जैसा शब्द भी कानों में डाला जाता है जो दिमाग में सेट होता जाता है। परिवार को एक इज्जत की जन्म जात घुट्टी का असर अपने सबसे खतरनाक तरीके से है। यह प्रभाव कुछ इस क़द्र है कि इस दबाव से कई लड़कियां उम्र भर नहीं निकल पातीं। ऐसे ही कई उदाहरण मिल जाएंगे। इसी दबाव का एक बड़ा और सार्वजनिक रूप स्कूल और कॉलेजों में भी जारी है। क्योंकि शहर सुरक्षित नहीं है, क्योंकि लोग अच्छे नहीं है, क्योंकि सरकार को मुआवज़ा देने के अलावा कुछ नहीं आता, क्योंकि पुलिस कुछ नहीं कर सकती इसलिए कछुए सा खोल बनाइये और बाहर मत निकलिए। बाकी लोग आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं इसलिए आप फलां समय तक वापस लौट आएं। अगर आपके साथ कोई हादसा होता है तो शोर होगा, पचड़ा होगा। अच्छी और अच्छे घर की लड़कियां देर रात तक घुमा नहीं करतीं वाला पंच लाइन मुफ्त में पकड़ा दिया जाएगा।

आजकल पिंजड़ा तोड़ की नई मुहिम करेंगे पॉलिटिक्स और करेंगे प्यार है। इसलिए यह फिर से सुर्खियों में है और एक ऐसे स्पेस के रूप में दिख रहा है जहां आपको सुनना ही होगा।


 

Wednesday, 14 February 2018

संस्कृति और साड़ी

सव्यसाची वाली खबर पढ़ी जाये या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा की! दोनों ही ख़बरें सेकंड सेक्स से जुड़ी जरूर है पर इनको अंजाम लोगों की कूड़ेदान वाली सोच ने ही दिया है। छात्रा बस में सफर कर रही थी और जब एक सनकी उसे टॉर्चर कर रहा था तब उसने खुद आवाज़ उठाई पर बस में कोई नहीं बोला। यह एक उदाहरण है कि समाज के तौर पर हम मर रहे हैं। हालात ये हैं कि दिल्ली में जो अपना सा शहर है, बाहर जाकर पूरे दिन बिताना बिना मतलब एक ज़ंग लड़कर आने जैसा है। सुबह और शाम को दिल्ली की बसों में हम सफर करने वाले आम लोग किसी तरह का संघर्ष कर रहे होते हैं, यह सिर्फ हम ही जानते हैं। दिल्ली में सफर, सफर जैसा नहीं बल्कि सफर जैसा है। 

परसों जब मैंने नैरोजी नगर से 442 नंबर की बस करीब पौने चार बजे शाम में ली तब दो घटनाएँ बस में हुईं जिन्हों ने मुझे चौंकाया नहीं। बल्कि ऐसी घटनाओं की आदत सी लग गई है। दाहिने ओर की दोनों  सीटें जो निर्भया हादसे के बाद महिलाओं को शांत होने के लिए दी गई थीं उन दोनों सीटों पर दो हट्टे कट्टे व्यक्ति शान से बैठे हुए थे। ऊपर जहां महिलाएं लिखा होता है उसे काले मार्कर से काट कर अंग्रेज़ी में MEN लिखा गया था। जब दो महिलाओं ने जो काफी बुजुर्ग थीं, ने उनसे उठने को कहा तो वे दोनों अकड़ गए और उन्हें उंगली से ऊपर इशारा करने लगे। भीड़ में किसी ने पीछे से बोला इन औरतों को तो सब कुछ चाहिए...इस पंक्ति को सुनकर भी मुझे हैरानी नहीं हुई। इसके बाद बस में सफ़दर जंग अस्पताल और एंड्यूरूज़ गंज से बहुत से लोग चढ़े, जिससे बस में बेहद भीड़ बढ़ चली। लोग कसमस खड़े थे। औरतें जैसे तैसे खड़े होने की जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं। 



इसी हाल में दूसरी घटना घटी जब एक महिला, जो क़रीब पचास साल की रही होंगी आकर मेरे बगल में खड़ी हुईं। वह काफी हाँफ रही थीं। एक बैठी हुई लड़की ने उन्हें सीट देने की कोशिश की पर वे बोली- "संत नगर उतरना है। कोई बात नहीं पाँच मिनट के लिए क्या बैठूँ!" इतने में महिला के पीछे एक 37-38 साल का आदमी ज़बरन चिपकता हुआ दिखा जो बेहद भयानक बात दृश्य था। उनके दूसरी ओर एक और व्यक्ति भीड़ का नाजायज़ फायदा उठाते हुए अपनी कोहनियों को उनकी छाती से जबरन टिका रहा था। मुझे नहीं मालूम वह क्यों नहीं बोलीं पर मेरा खून पूरा खौल गया था और मैं चिल्ला पड़ी- "ठीक से खड़े नहीं हो सकते? क्या चिपके जा रहे हो?" हालांकि मेरा बहुत हल्का सा विरोध उन्हें दुरुस्त कर गया। लेकिन ऐसे हालातों में बहुत गुस्सा आता है और शायद मेरे पास कोई बेंत हो तो मैं उसका इस्तेमाल इन सनकियों पर कर भी दूँ, बुद्ध से माफी मांगते हुए।  

लगभग हर लड़की और औरत के साथ इस तरह की घटनाएँ रोज़ ही बसों में होती रहती हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ। इन हरकतों की आवृत्ति इतनी अधिक है कि कई बार बहुत सी लड़कियां या औरतें बोलने से भी परहेज़ करती हैं।  एक  वजह  यह भी कि शिकायत पर तुरंत किसी भी तरह का एक्शन नहीं लिया जाता। या यूं कहूँ कि कुछ भी नहीं होता तो कई लोग कुछ न कहना ही मुनासिब समझते हैं। हम लड़कियों में तो एक डायलॉग मशहूर है - 'इग्नोर ही मारो!' इस से समझा जा सकता है कि हमारी व्यवस्था कितनी खराब है या फिर हमारे समाज में दीमक अच्छी तरह से लग चुकी है।

तसलीमा नसरीन के ट्वीट को भी मैं काफी देर से समझने की कोशिश कर रही हूँ लेकिन मुझे लगता है कि वह गलत हैं। उनके मुताबिक़ यह अपराध थोड़ा कम स्तर वाला है। इसके संदर्भ में उन्हो ने less victim जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। यह भयानक है। उसने जिसने कितनी ही किताबों में औरत के नज़रियों का रखा है। मुझे लगता है उन्हें अपने आप को उस लड़की की जगह रख कर सोचना चाहिए। वह एक लेखिका हैं और उन्हें ऐसा करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्हें मालूम होना चाहिए कि उनका इस तरह का बयान बेहद खराब है।


दूसरी अहम बात मशहूर डिज़ाइनर सव्यसाची से जुड़ी है, जिन्होने ऐसी बात की है जिससे मुझे इतनी शर्म आ रही है कि मैं यह पोस्ट भी उसी शर्म में लिख रही हूँ। सच में मुझे शर्म आती है जिस आदमी को यह लगता है कि वे महिलाएं या लड़कियां जो साड़ी पहनना नहीं जानती, उन्हें खुद पर शर्म आनी चाहिये। लो जी आ गई शर्म! मैंने आज तक साड़ी नहीं पहनी और न ही मुझे आगे इसका कोई शौकिया शौक है। उनके मुताबिक़ साड़ी संस्कृति का हिस्सा है। जब  लोग भारतीय महिला जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तब दिमाग में कतई साड़ी नहीं आती। न ही किसी एक महिला की छवि आती है। भारतीय महिला मतलब पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण सारी जगहों की औरतें। मैरी कॉम से लेकर पीवी सिंधु जैसी खिलाड़ियों का सोचती हूँ तब उनकी वही छवि दिखाई देती है जो वे खेल के मैदान में पहनती हैं या फिर जिस खेल के लिए वे मशहूर हैं, वही छवि समझ आती है।

मैंने जिस कॉलेज से पढ़ाई की है उस कॉलेज में अच्छी संख्या में उत्तर-पूर्व  के साथी थे और किसी भी तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम में शानदार प्रस्तुति देते थे। उस समय जो वे लिबास पहनते थे, वे साड़ी नहीं बल्कि उनके पारंपरिक लिबास होते थे। हर रंग में। आँखों को सुकून देने वाले। फिर सव्यसाची के दिमाग में साड़ी का कीड़ा क्यों कुलबुला रहा है? पंजाबी सूट उन्हें क्यों नहीं दिखाई देता? कश्मीरी पहनावे में क्यों उन्हें भारतीय महिला नहीं दिखती? क्यों उन्हें जींस पहनी हुई लड़की में संस्कृति की महक नहीं आती? क्या आधुनिक या आरामदायक पोशाक में संस्कृति नहीं बसती। क्या यही जरूरी है कि हाथ में कड़छी ली हुई और पाँच मीटर साड़ी में लिपटी रसोई में खड़ी औरत में ही भारतीय संस्कृति रहती है?

इन उपर्युक्त बातों में मैंने साड़ी परिधान की आलोचना नहीं की है। जिसे जो पसंद हो वे, वही पहनावा पहने। लोगों में इतनी सामान्य बुद्धि तो जरूर है कि उन्हें कब क्या पहनना है। इसलिए सव्यसाची यह कतई न कहें कि जिसे साड़ी बांधनी नहीं आती उन्हें शर्म आनी चाहिए। वे जिन मुट्ठी भर लोगों के लिए साड़ी डिज़ाइन करते हैं उन्हें ही हजारों रुपयों में बेचे और अपना कारोबार बनाए रखें। 

संस्कृति से जुड़े लिबास क्या हैं? यह सवाल भी उठना चाहिए। क्योंकर साड़ी हमारी संस्कृति की निशानी है? क्या सव्यसाची को नहीं पता कि बहुत सी कामगार महिलाएं साड़ी में पैर फँसने के दौरान बसों में, सीढ़ियाँ  चढ़ते समय, मोटर साईकिल में पल्लू या दुपट्टा फँसने  से दुर्घटनाओं की शिकार हो जाती हैं? इस तरह की घटनाओं के बारे में क्या कहा जाये? महिलाएं साड़ी में अच्छी लगती हैं, लंबे बाल में अच्छी लगती हैं, ढके कपड़ों में अच्छी लगती हैं...लड़कियों के मेहँदी वाले हाथ अच्छे लगते हैं, काजल वाली आँखें अच्छी लगती हैं, पतली कमर अच्छी लगती हैं, छातियों में अधिक उभार हो तो वे औरतें अच्छी लगती हैं, लड़कियों को गोरा होना ही चाहिए, उन्हें ही निखार की ज़रूरत होती है, उन्हें सुशील होना, उनकी आवाज़ सुरीली होनी चाहिए... मतलब किसी ऐसे पिटारे की कल्पना की गई है कि जो मर्ज़ी आए उड़ेल दिया जाये। यार अब बस करो, थोड़ा सांस ले लेने दो। छोड़ दो लोगों को  जिसे  जो पहनना  है  उसे वह पहनने दो। प्रलय नहीं आ गई अगर किसी को साड़ी बांधनी नहीं आती।

देशभक्ति की धारा में बहकर शायद वे ऐसा बयान दे गए। लेकिन उन्हें समझ आना चाहिए कि विचार रखने के बहाने विचार थोपे नहीं जाते। उन्हें अपने बयान का अर्थ समझ आ गया है, इसलिए वे अब सफाई भी दे रहे हैं। मुझे लगता है कि अगर वास्तव में आपको महिलाओं से जुड़े मुद्दे या पहनावे पर अपनी बात रखनी है तब बाकी महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी रखें। सुरक्षा पर, उनके आर्थिक हालातों पर, नए अवसरों पर, शिक्षा और स्वास्थ्य पर आदि ढेरों मुद्दे हैं मौजूद हैं। क्यों नहीं आप सर्द रातों में बंगाल या किसी गाँव में जाकर गरीब औरतों को साड़ी का तोहफा बाँट आते? यह आपके लिए बहुत अच्छा रहेगा। क्यों हम औरतें रहेंगी तभी तो आपकी संस्कृति भी ज़िंदा होगी! हालात तो यह है कि बच्चियाँ भूख में मर रही हैं और आप हैं कि शर्म की बात रहे हैं! 







 

Thursday, 25 January 2018

पश्मीना और एकांत (कहानी)


कमरे के एक कोने में टेबल रखा था। टेबल से सटी दीवार में बड़ी खिड़की थी। उसी से तेज़ हवा घर में आ रही थी। इसलिए टेबल पर खुली हुई डायरी के पन्ने हवा का मज़ा ले रहे थे। आनंद के लिए यह कमरा कोई मामूली कमरा नहीं था। उसने इस कमरे को पीला रंग दिया था। लेकिन ताज्जुब था कि उसे यह रंग पसंद नहीं था। फिर भी उसने इस रंग को अपने कमरे में जगह दी। खिड़की भी कौन सी उसे पसंद है! शोर के साथ साथ धूल और बरसातों का पानी घर में झोंकें के साथ आ जाता था। कितनी मेहनत लगती है, बरसातों में। कभी कभी उसे पूरा दिन साफ़ सफाई में लगाना पड़ता है। लेकिन जो चिढ़ शुरुआत में इस खिड़की से थी, वह अब हल्की पड़ गई है। गर्मियों के इस मौसम  में यह उसकी मनपसंद जगह है।
  
काफी समय हुआ कि अब वह घर से बाहर नहीं निकलता। न ही इस कमरे में कोई आता है। आनंद को लगता है कि वह कोई मरी हुई या हादसे की शिकार आत्मा है जिसे दूसरा जन्म नहीं मिला। उसे मुक्ति चाहिए भी नहीं थी! अरे, मरना भी तो नहीं चाहता! लेकिन अब इतना है कि वह बाहर घर के लोगों को और स्वयं को दिखाई नहीं देता। उसे यह भी नहीं मालूम कि वह बिना किसी से बात किए, देखे, सुने, अनुभव किए कैसे जिंदा है! एक साल में वह बेहद अजीब बन गया है। पिछली जनवरी की दिल्ली वाली कड़ाके की सर्दी में उसने स्वेटर ही पहनना बंद कर दिया था। वह अजीब है। कुछ दिनों से अजीब बात यह हुई है कि वह जब भी सांस लेता है तब पश्मीना नाम उसकी साँसों के साथ दिल में उतर जाता है।  वह पागल नहीं है, लेकिन!

हाँ, जनवरी में उसके बड़े भाई का जन्मदिन आता है इसलिए ही उसे यह महीना याद है। वह कई तरीके से महीने याद रखता है। यह उसकी कला है। स्कूल के समय, जनवरी उसे नोच खाने वाला महीना भी लगता था। उसका बस करता तो वह इन सर्दियों के दिनों को गरम तैल में तलकर ही बाहर परोसता। इतनी भी सर्दी होती है भला! उसे तुरंत याद आया कि अरे इसी महीने तो 26 जनवरी भी आती है। उसे बहुत बाद में पता चला कि गणतन्त्र किस चिड़िया का नाम होता है। या कानून को लागू करना कैसे होता है या फिर 1950 की तारीख उसे आखिर क्योंकर याद होनी चाहिए। ...उसे परेड और किचन में पकोड़े तलती हुई माँ की लाल छ-छ(दोनों हाथों में) चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई दी। उसे महक भी आई। तैल के गरम होने की या पकोड़े की या फिर दोनों की। वह महक को अलग अलग नहीं कर पाता। वह आँखें बंद कर सोचता चला गया। 

परेड को वह कैसे भूल सकता है! पक्का एमपी वाला है। एमपी की झांकी के लिए वह अपनी कमर से गर्दन तक टेड़ी कर लेता था। और जब झांकी आती तो वह गुस्सा जाता कि मन माफिक क्यों नहीं बनाते। बेकार बनाई है। लेकिन अच्छी क्या होती है वह बतला भी नहीं पाता। वह इन बातों को सोचकर चकरा जाता और बिना पकोड़े खाये बाहर खेलने चला जाता। हाँ, उसकी जिंदगी में जनवरी महीने में ऐसे ही क़िस्से रहते हैं। वह साल को अलहदा ढंग से याद करता है। वह अजीब है। पूरा अजीब! अजीब बनने में पश्मीना ने उसका साथ दिया है। वह अदृश्य होकर भी उसके साथ निरंतर रहती है। पश्मीना उसकी ज़िंदगी है।
  
दीवार घड़ी में रात के बारह बज रहे हैं और वह बिना बत्ती बंद किए फरवरी के महीने के बारे में सोच रहा है। वह दिमाग पर ज़ोर डाल रहा है कि उसे फरवरी के खास होने के बारे में खयाल क्यों नहीं आ रहे? घड़ी में बारह बजकर दस मिनट हुए तो उसके दिमाग ने कहा- “दिल से सोचो!” उसने सोचने का स्थान बदला और करवट भी। उसे वह टीचर याद आई जिसे उसने कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हुए सुना था, देखा था और महसूस किया था। शायद उसने दिलचस्पी भी ली थी जो एक तरफा थी। राजपूतों के हार के कारणों, को जिस प्रकार से वह पढ़ा रही थी वे सभी कारण उसे याद है। वह याद कर रहा है कि पृत्थ्वीराज चौहान को किसने हराया था। गौरी या गजनावी ने? न जाने वह बार बार क्यों भूल जाता है! उसे बादाम अच्छे नहीं लगते। जब उस टीचर ने पलटकर आनंद से पूछा कि पहले विश्व युद्ध के कारणों में से कोई चार बताओ तो वह मन में संयुक्ता ही बोल पाया। जिसे उसने ही सुना। लेकिन वह उसे घूरती रही और बोली- “बच्चों, तुम क्लास में हो भी या नहीं?” इस तरफ आनंद यही बोलता रहा- “संयुक्ता संयुक्ता..!”

घड़ी में सुबह के चार बजे हैं और एक-डेढ़ घंटे की नींद लेकर वह उठ गया है। वह अधिक सो नहीं पाता और सोचते सोचते रात बिता डालता है। वह आज की नौजवान पीढ़ी का लड़का है। वह फिर से खिड़की के पास पहुंचा। कुर्सी, टेबल और फिर खिड़की। उसे खिड़की और अपने दरम्यान टेबल बाधा जैसा लगा सो उसने टेबल को परे खिसका दिया। अब क्रम बदल गया। कुर्सी, कुर्सी पर वह और खिड़की पर टंगी उसकी दोनों आँखें।   

बाहर देखते हुए भी वह बाहर के दृश्यों से जुड़ नहीं पा रहा। वह अब मार्च के बारे में सोच रहा है। वह नहीं जानता कि मार्च तीसरा महीना है। वह गिनतियों में ज़्यादा यकीन नहीं करता। बल्कि उसका साफ मानना है कि यह महीना आता ही क्यों है? उसकी ऐसी सोच बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा के दौरान बनी थी। उसे उसी वक़्त से सिर दर्द की बीमारी भी शुरू हो गई थी। क्या कहते हैं, अर्ध कपारी या फिर मिग्रेन या फिर माइग्रेन...जाने दो मुझे क्या जो भी कहते हैं! लेकिन कितना सिर दर्द होता था। सबसे अधिक सिर दर्द अकाउंटेंसी के पेपर में हुआ था। लेकिन गया अच्छा था। पिछत्तर नंबर आ गए थे। अच्छे से पढ़कर जाता तो और आते। शेयर्स वाले सवाल सब गलत हो गए थे। कुछ नंबर तो दिये ही होंगे। फ़ाइनेंस वाले हिस्से में नंबर ज़्यादा आ गए होंगे। मन कहता है, उस हिस्से के सारे सवाल सही गए थे। मन कहता था कि डॉक्टर बनना है। डीएनए स्पेशलिस्ट...कहाँ बन पाया! ये स्साला मन क्या-क्या नहीं कहता... कॉमर्स बकवास है। मैंने तो कॉलेज में छोड़ ही दिया... न तो ठीक से हिसाब किताब कर पाया और न ही कुछ और। बैठे हुए सिगरेट ही फूँक रहा हूँ। मुझे मार्च का महीना पसंद नहीं। उसने उभरती हुई सुबह में खिड़की से चिल्लाकर कहा- “मुझे मार्च का महीना दुनिया में सबसे बकवास टाइम लगता है। आक्-थू...” उसने लगे हाथों थूक भी दिया...खिड़की से बाहर। इसी महीने तो वह पश्मीना से दूर होने के तरीके भी खोजता रहता था। उसे मार्च महीने से नफ़रत है, बहुत!

उसे सिगरेट पी लेने के बाद चाय की तलब जगी। उसने दरवाज़े पर लगी छोटी सी खिड़की पर ध्यान दिया। यही वह दूसरी खिड़की थी जिससे वह बाहर की दुनिया से जुड़ा हुआ था। उसी खिड़की से उसे खाना, पानी, अखबार, किताबें या फिर जो उसकी मांग होती वह सामान दिया जाता है। उसे यह ठीक भी लगता था। उसे भी कहाँ किसी से बात करने की इच्छा होती थी! उसे यही लगता था कि उसके कमरे के बाहर बहुत बड़ी खाई खुदी हुई है। जैसे ही दरवाजा खोलकर वह बाहर आएगा उसमें गिर जाएगा, रफ्तार के साथ। उसे याद नहीं कि ऐसा क्या हादसा हुआ जो उसने एक कमरे में कैद किया गया। वह तो एक रोज़ सिर दर्द की वजह से बेहोश हो गया था। कई दिन वह अस्पताल में रहा। उसे अस्पताल के दिन थी से याद नहीं हैं। वह जब घर लौटा तो कमरे में घुस गया और बाहर निकला ही नहीं। जब उसे बाहर निकालने की कोशिश की गई तो वह खुद ही नहीं गया। वह परजीवी सा महसूस करता है। पर वह क्या करे? मन अजीब हो चुका है। 

वह इसी खयाल में था। उसने दरवाजे की खिड़की की तरफ देखा और पाया कि चाय का कप और ब्रेड के दो पीस एक प्लेट में पड़े हुए थे। उसने झट से कदम बढ़ा कर उन्हें हासिल किया और खिड़की के पास चल दिया। वह भूखा था। पहले ब्रेड खाई फिर चाय धीरे धीरे पीने लगा। उसके दिमाग में न जाने क्या होने लगा। वह आराम से कुर्सी पर बैठा रहा। फिर आँखें बंद कीं। उसे प्रमोद याद आया। उसका दोस्त। स्कूल वाला। कितना होशियार था। सुंदर भी। उसकी धाक जल्दी जम जाती थी। उसने कॉलेज में कॉमर्स ही लिया था। वह हिसाब किताब में अच्छा था। लेकिन वह मर गया। डीटीसी की बस के नीचे आकर मरा। अप्रैल का ही महीना था। उसके दिमाग में प्रमोद को सोचते ही एक तस्वीर उभरी। जैसे दो पाटों का बंद दरवाजा। हाँ, बंद दरवाजा। 

किसी का जाना यही तो होता है। चैप्टर बंद हो जाना...नहीं समाप्त हो जाना, शायद! प्रमोद के मर जाने पर आनंद ने उस के साथ बिताया जाने वाला समय खोया। उसकी बातें खो दीं। एक शख़्स खो दिया जो उसे समझता था। आनंद उसके साथ कुछ भी साझा कर सकता था। ऐसा नहीं है कि लड़कों को अपने स्पेस की ज़रूरत नहीं होती। सच है वे ठहाके लगाते हैं, पर निजी स्पेस की तमन्ना उन्हें भी होती है। उसने अपनी बहन को कई बार देखा था, अकेले में रोते हुए, फोन पर चिपके हुए। ऐसा वह भी तो करता ही था। ओह! प्रमोद की मौत के बाद एकांत में ही उसे राहत मिली। काफी अरसे तक भयानक ख़्वाब आते रहे थे। जब तक उसकी याद पुरानी नहीं हुई वह याद आता ही रहा। उसके बाद उसकी जगह कोई नहीं ले पाया। पश्मीना भी नहीं। ऐसा सोचते हुए उसकी आँखों में पानी उतर आया। हाँ, अप्रैल का महीना उसने नितांत अपने अहसास को महसूस करते हुए रोने के लिए सुरक्षित कर रखा है। इस महीने में वह थोड़ा गमगीन हो जाता है। 

उसका ध्यान टूटा तो उसे मालूम चला कि वह कब से चाय का खाली कप हाथ में लिए हुए बैठा है। वह कुर्सी से उठा और कमरे में टहलने लगा। इस काम में उसके दिमाग में हरकत नहीं होती। पर जैसे ही वह कहीं स्थिर होता है उसे बहुत कुछ याद आने लगता है। वह बहुत कुछ सोचने लगता है। वह सच में बीमार है शायद! कमरे में चलते हुए उसे लगा कि कमरा बहुत गंदा हो रहा है। उसने झाड़ू के लिए इधर उधर नज़र दौड़ाई। उसकी चारपाई के नीचे उसे झाड़ू दिखाई दी। वह उसकी तरफ बढ़ा और उठाकर दीवारों के कोने में बन गए जाले साफ करने लगा। वह लगभग दो घंटे उस कमरे में यहाँ वहाँ कुछ न कुछ करता रहा। उसकी गर्दन में दर्द हुआ तो वह कुर्सी पर बैठ गया। जैसे ही स्थिर हुआ वह सोचने लगा। साथ ही साथ गर्दन के दर्द को भी महसूस करने लगा। घड़ी पर नज़र दौड़ाई तो ग्यारह बजकर तीस मिनट हो रहे थे। उसने सिर कुर्सी के पीछे वाले हिस्से में टिकाया और आँखें बंद कर लीं।



उसे मई का महीना याद आया जब वह गर्मियों की छुट्टी में अपने गाँव में जाया करता था। बचपन तो मज़ेदार कटता था पर जैसे ही वह सोलह बरस का हुआ, गाँव भी काटने लगा। “अरे, इसे बस एक अच्छी सी नौकरी मिल जाये वही काफी है। दिन भर न जाने क्या सोचता रहता है। जब देखो कमरे में घुसा रहता है।” पिता के इन शब्दों पर उसकी माँ ने पिता को हैरानी से देखा और फिर चुप कराने की कोशिश में बोलीं- “अभी तो स्कूल में ही है। इसकी उम्र ही क्या है जो नौकरी-नौकरी लगाए बैठे रहते हो। जा आनंद...जा जरा बाहर घूम आ! आनंद सिर नीचे किए हुए ही निकला था उस कमरे से। सभी रिशतेदारों के सामने से। सब उसे किस अजीब नज़रों से देख रहे थे। 

आनंद ने कभी सोचा ही नहीं था कि आखिर बड़े होकर उसे करना क्या है? उसे झंझट होती है इस सवाल से। उसने खुद से पूछा- “जीने के लिए क्या कुछ बनना जरूरी है? ऐसे बिना सोचे क्यों नहीं जी सकते? जब हालात होंगे वैसा कुछ जिंदगी में आ जाएगा। ...सारा खेल इन स्कूल वालों ने बिगाड़ रखा है। बच्चा कलम थामता नहीं कि पूछ लो क्या बनना चाहते हो? लो मैं कुछ नहीं बनना चाहता। मैं आनंद ही रहना चाहता हूँ। किसी को इससे क्या परेशानी है?” यही सोचता सोचता वह पके हुए गेंहू के खेतों की ओर निकल गया था। उसने पाया कि वह बीच पगडंडी पर खड़ा है और अगल बगल बस खेत ही खेत हैं। दूर कुछ पेड़ भी हैं। लोग खेतों के काम निपटाकर घरों की तरफ लौट रहे हैं। वह और आगे बढ़ गया। वह चलता जा रहा था तभी किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई- “ए बाबू ...सुनो जरा ये गठरी तो सिर पर रखवा दो।” दो बार एक ही वाक्य दोहराया गया। वह पीछे लौटा। उसने सोच कोई महिला होगी। वह पास गया। जब पास पहुंचा तो पाया कि वह बीस या इक्कीस साल की लड़की है जो नितांत थकी हुई है। वह मुस्कुराई। पर वह कुछ नहीं बोला और गठरी उठवाकर उसके सिर पर रखवा दी। वह बात करने के लिए कुछ बोली। आनंद ने जवाब नहीं दिया और जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ़ गया। आज उस बात को बीते हुए कितने बरस हो गए। पर वह उस मुसकुराती हुई लड़की का चेहरा नहीं भुला। सांवला सा। सफ़ेद दांत। हाँ, वह कुछ भूल ही नहीं पाता। उसकी यही सबसे बुरी और अच्छी बात है। मई का मतलब वह लड़की, जो मुस्कुराई थी उस शाम! पश्मीना भी तो कितनी सुंदर लगती है हँसती हुई, उसने अपनी आँखों में पश्मीना का चेहरा उतरता महसूस किया। 

पर वह इस तरह से क्यों नहीं रह पाता? मुस्कुराते हुए। इसी बीच दरवाजे पर बनी खिड़की खुली और एक खाने की थाली कमरे में दाखिल की गई। वह उठा और सुबह के चाय के बर्तन वापस कर खाने की थाली को लेकर चारपाई पर रख दिया। यह सब उसके लिए सामान्य घटना थी। हर दिन का रूटीन। 

वह कमरे से सटे गुसलखाने में गया। कुछ देर बाद नहाकर निकला। उसने सोचा आज मनपसंद रंग पहना जाये। अलमारी को खोला और कुछ देर जामुनी हर की कमीजों को देखा। पर उसने जामनी टी-शर्ट निकाली और पहन ली। खाने के लिए वह चारपाई की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने पहला कौर मुंह में रखा बिजली चली गई। उसे मन हुआ कि खाना फेंक दे। गर्मियों में बिजली क्यों काटते हैं? जून और जुलाई के बारे में सोचते हुए उसे दिमाग में दो जलते हुए गोले दिखते हैं जिनमें से भयावह आग निकलती है। उसे इन महीनों में पृथ्वी और लोगों की बहुत फिक्र होती है। इतनी गर्मी भी कहीं पड़नी चाहिए! खाना एक कोने में खिसका कर वह लेट गया। 

अखबार जो कि चारपाई पर ही पड़े थे, में से एक उठाया और अपने को हवा करने लगा। उसे अपनी एक बार गर्मी की छुट्टियाँ याद आईं जो उसके जीवन में सबसे अधिक शानदार थीं। उसने लकड़ी का एक कूलर बनाया था। और उसके अंदर की दीवारों पर स्टील लगाई थी। अंदर एक पुराने पंखें के बेकार पड़ी पंखुड़ी का इस्तेमाल किया था। उसने उसे आसमानी रंग से पेंट किया था और बीच-बीच में सफ़ेद रंग के धब्बे रंग किए थे जो बादलों का अहसास देते थे। बहुत ही सुंदर था। घर में उसकी इस रचनात्मकता को देखकर सब हैरान हो गए थे। पापा भी हैरान थे। उसकी बहन ने उसे इस मौके पर एक कमीज भी तोहफ़े में दी थी। 

इस खुशी के बाद उसने कई रचनात्मक काम किए। जैसे कुछ घड़े खरीदकर उन्हें रंग किया। उनमें सुंदर चित्र बनाए। घर में उन्हें कोने कोने में रखकर सजाया। जब मेहमान आते तब उनमें से कईयों ने उन घड़ों को मांगा भी पर माँ ने साफ़ मना कर दिया। ऐसे ही आनंद ने कुछ सिनरी भी बनाई जिन्हें बहन ने फ्रेम करवाकर अपने ऑफिस में लगाया और कुछ को तोहफों में भी बांटा। क्रिएटिव आनंद उसने कॉपी पर अपना नाम लिखा। वह खुश रहता था, जब वह कुछ रचता था। वह आँखें बंद कर अपनी इस रचनात्मकता को सोचकर मुस्कुरा रहा था तभी बिजली आने पर पंखा रफ़्तार से चलने लगा। वह फटाफट उठा और खाना जल्दी जल्दी खाने लगा। वह जब खा चुका तब कमरे में टहलने लगा। उसने सिगरेट का पैक खोजा। मिला। उसमें एक भी सिगरेट नहीं थी। वह चिढ़ गया। पैक कमरे में फेंक दिया। कुछ पल बाद उसे अपने इस गुस्से पर अफसोस हुआ। सिगरेट के पैक को उठा कर कूड़े के डिब्बे में डाला। उसने समय व्यतीत करने के लिए किताब पढ़ने का सोचा। लेकिन उसे लगा कि उसे ऐसी दशा में पश्मीना खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी देख रही है। उसने संयमित होने की कोशिश की।

उसे किताब पढ़ने का बहुत शौक तो नहीं था। पर जबसे वह सिर्फ इस कमरे में रहने लगा था तब से ही किताबें पढ़ने के शौक को पनपाने की कोशिश में लगा है। अच्छा है। लोगों से बात करो तब कितनी ऊर्जा ज़ाया होती है। इसलिए वह दुनिया का महान साहित्य पढ़ना ही बेहतर समझता है। कुछ देर वह महान किताबें छांटता रहा और कनफ्यूज़ हो गया। उसने महान शब्द के बारे में सोचा। उसने अपने मन में ही एक बहस शुरू की। उसे याद आया कि उसकी स्कूल और कॉलेज की किताबों में इस शब्द का खूब इस्तेमाल देखा था। बहुत से लोगों से जुड़कर यह शब्द उसके सामने आया था। ऐसे शब्द महात्मा गांधी और बुद्ध आदि व्यक्तित्व के संदर्भ में आए थे। उसने कहा- “आखिर वह क्योंकर किसी के कहने पर किसी दूसरे को महान मान लें। उसे खुद ही पढ़कर समझकर किसी को महान कहना या न कहना चाहिए।” उसने मन में यह तय किया कि वह जब तक किसी के संदर्भ खुद से पूरी तरह निगाह नहीं डाल लेगा कभी महान नहीं मानेगा। 

उसे महात्मा से गांधीजी याद आए। गांधी जी से अगस्त का महीना याद आया। वह कभी भी गांधी जी के खिलाफ कुछ नहीं कह पाता क्योंकि उसकी माँ को उसकी केवल इसी एक बात पर बुरा लग सकता है। उसकी माँ गांधी जी की बेहद इज्जत करती हैं। वह अभी तक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के बारे में ठीक से नहीं जानता। अगस्त के महीने में जब दिल्ली की हर एक जगह चाक-चौबन्द हो जाया करती थीं (जब वह घर से बाहर जाता था) तब उसे ठीक ठीक पता चल जाता था कि आज़ादी का दिन आने वाला है। अगस्त से वह बहुत कुछ याद कर सकता है। वह उड़ती-कटती पतंगें याद कर सकता है। वह पाँच वर्षीय योजनाओं को याद कर सकता है, भारत के पहले प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति आदि आदि सबको याद कर सकता है। उसे स्कूल की किताबों और अखबारों से यह जानकारी मिल जाती है कि उसका देश इसी महीने में सन् 1947 में आज़ाद हुआ था। 

एक बार उसके इंग्लिश के अध्यापक क्लास नौवीं में सबसे पूछ रहे थे- “देश कब आज़ाद हुआ था?” कईयों को मालूम नहीं था। उसका चौथा नंबर था। वह इतना गुस्से से भर गया था कि उसके मन ने कहा- “देश कभी आज़ाद ही नहीं हुआ। फिर ये आदमी पूछ क्यों रहा है? क्या वह अपना सामान्य ज्ञान अच्छा करना चाहता है? मुझसे पूछेंगे तो कहूँगा अभी देश आज़ाद होना बाकी है। ...नहीं हुआ आज़ाद। 47 तो एक पड़ाव था।” पर उस रोज़ उसकी बारी नहीं आई। उसे यह अच्छा लगा कि उसकी बारी नहीं आई।

उसे आज़ादी शब्द से सितंबर का महीना याद हो आया। कॉलेज में प्रमोद के बाद शाहजहाँ उसका दोस्त बना था। उसी के साथ उसने सिगरेट पीने की शुरुआत की थी। शाहजहाँ तो मान ही नहीं रहा था। लेकिन आनंद के ज़िद्द पर वह अच्छे सुट्टे लेना सीख गया। बाद में उसे यह भी पता लगा कि सिगरेट पीना कभी भी आज़ादी का प्रतीक नहीं है। बल्कि अपनी ही सेहत को खराब करना है। हालांकि वह इस लत से अभी तक निजात नहीं ले पाया है। कभी कभी वह इतना लंबा कश लेता था कि उसका दम निकल जाता था। हुतूतू फिल्म में भी एक गाना है- “इतना लंबा कश लो यारों दम निकल जाये..!” आनंद उसके साथ दिल्ली की कई जगहों पर बिना पिता और माँ के घूमा। उसे पहली बार किसी के कंधे या हाथ पकड़ने की इच्छा नहीं हुई। वह बस में यहाँ वहाँ जाता। जगहों और लोगों को करीब से देखता। लड़कियों से भी कॉलेज में थोड़ी बहुत बात करने की शुरुआत उसने इसी महीने से शुरू की थी। पश्मीना भी इसी महीने में उसकी दोस्त बनी थी। अजीब सी लगती थी। ऐसा लगता था कि वह कोई रूह है। सांवला सा रंग था। बाल लाल थे। कद कोई खास लंबा नहीं था। वह उससे काफी बातें साझा कर लेती थी। उसके पास रहने से आनंद में अजीब सी अंदरूनी हलचल रहती थी। सितंबर के महीने में वह ज़्यादा खूबसूरत लगती थी। इसलिए आनंद के लिए यह महीना प्रेम का महीना था। पश्मीना का महीना था। वह कहती थी- “मैं जहां भी रहूँ, मैं तुम्हें ऐसी वाइब्स भेजा करूंगी कि तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ। मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा बस मन में एक दर्द के साथ आनंद कहना होगा। तब देखना तुम्हारे दिल में भी पश्मीना...पश्मीना नाम की गूंज हुआ करेगी।” वह झटके से सोच से बाहर आया जब शाम की अजान ने उसे जगाया। 

अक्तूबर के महीने में उसे दीपावाली ही याद आती है। हालांकि अब उसे इस त्योहार को लेकर कोई खास उत्साह नहीं बचा। उसे किसी भी त्योहार के प्रति कोई खास लगाव नहीं है। थोड़ा बहुत क्रिसमस और नए साल में अब भी दिलचस्पी लेता है क्योंकि इन्हीं अवसरों पर पश्मीना उसे याद कर लेती है। अक्तूबर को वह अपनी घर बैठे करने वाली नौकरी के लिए भी याद करता है। वह लोगों और कंपनियों के लिए वेब डिजाइंग का काम घर बैठे कर देता है। इससे उसे ठीक ठाक कमाई हो जाती है। कई बार कुछ दूसरी सामाजिक संस्थाओं के प्रोपज़ल और रिपोर्टों को भी अच्छी क़ीमत पर तैयार कर देता है। उसने सबसे पहला काम और पहली कमाई अक्तूबर के महीने में ही की थी इसलिए वह जल्दी भूल नहीं पाता। उसे दो अक्तूबर को गांधी जी याद आ जाते हैं। गांधी जी के बारे में सोचकर वह कुछ पल मानो कहीं ठहर जाता है। उसका दिल धीमे धड़कता है। वह दिमाग में एक शांति का अनुभव करता है। जब वह शांति शब्द सोचता है तब उसे महात्मा बुद्ध भी दिखाई देते हैं। उसे मन करता है कि वह ध्यान लगाए और अपने आप को अंदरूनी शांति दे। लेकिन जब पश्मीना नाम उसके अंदर साँसों से गुज़रता है, तब उसे सबसे ज़्यादा शांति महसूस होती है।  

आजकल वह देश के हालातों पर भी कड़ी नज़र बनाए रखता है। हालांकि वह अखबार में बहुत दिलचस्पी नहीं लेता पर सोशल साइट्स से उसे काफी सटीक जानकारी मिल जाती है। उसने हर साइट्स पर अपने बिना फोटो वाले अकाउंट खोल रखे हैं। वह सब पर नज़र भी रख लेता है। वह समय की तरह है। सब जगह होते हुए भी वह कहीं नहीं है। क्योंकि वह किसी से चैट नहीं करता। इसकी एक वजह पश्मीना भी है। वह फेसबुक इस्तेमाल करती है। इसलिए वह उसे यहीं इसी जगह जी भर के देख लेता है। कई बार पश्मीना ने उससे अपनी भी प्रोफ़ाइल फोटो लगाने की गुजारिश की है। पर वह नहीं लगाता। वह सुंदर है या नहीं, उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसे क्या करना है आईने में खुद को देखकर! वह तो जब पश्मीना को देखता है तब उसके चेहरे में खुद को पा लेता है। क्या पश्मीना के साथ भी ऐसा होता है

नवंबर खुद के लिए वह ऐसा महीना मानता है जब वह ध्यान, मौन, अवलोकन, जीवन-मरण, परिपक्वता जैसे शब्दों को समझने और रत्ती भर भी अपने व्यक्तित्व में उतार लेने की कोशिश करता हुआ पाया गया था। एक बार फिर वह बुद्ध को याद करता है। यही वह परिवर्तनकारी महीना था जब वह अपने अंदर कुछ अलग सा महसूस करता था। हालांकि यह सब उसके लिए बहुत आसान नहीं था। आज भी नहीं है। वह इंकार भी नहीं करता अपनी कमजोरियों से। लोग लक्ष्य बनाकर जीते हैं। आनंद बिना लक्ष्य ही जीता है। उसे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग दुनिया में तमाम तरह का ताम-झाम हासिल करना चाहते हैं। पर वह बिना किसी ताम-झाम के जीना चाहता है। वह हमेशा इस कमरे में बंद होकर नहीं  जिएगा। उसे दुनिया के रंग देखने है। शायद एक दिन किसी यात्री की तरह घूमने में उसकी मौत हो जाये पर वह उसी मौत को गले भी लगा लेगा। उसके घर के लोग उसके बारे में सोचते हैं कि उनका लड़का पागल हो गया है। पर यह सच नहीं है। यह उसके खुद के जीने का तरीका है। वह पागल नहीं है। वह बस ऐसा ही है। वह सभी की नक़ल नहीं कर सकता। इसलिए वह दिमागी तौर पर मजबूत बनना चाहता है। ताकि जब वह बाहर की दुनिया में प्रवेश करे तो अपने को तिनके की तरह गिरते हुए न पाये बल्कि एक पेड़ की तरह खड़ा पाये और अपने आप को हर तरह के अनुभवों से सींचे। नवंबर का महीना ही है जब वह अपने से बेहतर मुलाक़ात कर पाता है। उसे पश्मीना के लिए अपने व्यक्तित्व को और निखारने की तमन्ना भी तो है।  

दिसंबर उसे एक रहस्यमयी महीना लगता है। या फिर वह कभी समझ नहीं पाता कि यह महीना आखिर उससे क्या कहता है। कभी कभी वह दुविधा में फंस जाता है। क्या करे वह? वह पश्मीना को पा ले, या फिर अपने देश भ्रमण की योजना को शुरू करे, या फिर समाज के लिए कुछ करना शुरू करे या फिर ध्यान लगाकर संत बन जाये। वह पागल हो जाएगा यदि दिसंबर को न समझ पाया। वह ठीक से सोच नहीं पाता। उसके दिमाग के सारे पुर्ज़े ढीले पड़ जाते हैं। वह अपनी चारपाई पर आकर लेट जाता है। वह रोता है कभी हँसता है। वह इसी दशा में न जाने कब सो गया। सुबह की चार बजे की अजान पर उसकी आँख खुली। वह उठ कर बैठ गया। उसने अपने दिल में कुछ हरकत होते हुए महसूस की। उसे लगा उसका दिल पश्मीना...पश्मीना बोल रहा है। वह जल्दी जल्दी तैयार हुआ। दाड़ी बनाई। गुलाबी टी-शर्ट जींस के साथ पहनी। हाथ घड़ी को टेबल पर ही छोड़ दिया। कई अरसे से बंद कमरे के दरवाज़े को खोलकर निकला। वह कुछ सोच नहीं रहा था क्योंकि उसका दिल बस पश्मीनापश्मीना कह रहा था। कुछ देर बाद वह अपने होठों से भी यही नाम दोहराता हुआ पश्मीना के घर की तरफ बढ़ गया।  




         

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...