Friday, 11 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय चार: जलप्रलय और उसके बाद)

 

अध्याय 4 — जलप्रलय और उसके बाद

1915 में भी, जब उनकी मुलाकात उस्पेन्स्की से हुई, गुर्जिएफ़ को यह अवश्य एहसास हो गया होगा कि संस्थान स्थापित करने की उनकी योजनाएँ विफल होने के खतरे में हैं। सौभाग्य से, वे ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो इन बातों को दिल पर लेते। सुख-सुविधा और सुरक्षा अनिश्चितता की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक हो सकती हैं क्योंकि अनिश्चितता का एक लाभ यह है कि वह मन को सतर्क बनाए रखती है। वह विभिन्न समूहों के साथ अपना काम जारी रखते रहे, लेकिन समय आने पर आगे बढ़ जाने की तैयारी भी करते रहे। युद्ध हमेशा उनके ऊपर मंडराता रहता था। उस्पेन्स्की विशेष रूप से उस दृश्य से प्रभावित हुए जिसमें बैसाखियों से लदा हुआ एक ट्रक एक सैन्य अस्पताल की ओर जा रहा था। उन अंगों के लिए बैसाखियाँ, जो अभी तक बम से उड़ाए भी नहीं गए थे। प्रतिद्वंद्वी सेनाएँ देशभक्ति और आक्रोश जैसी पूरी तरह यांत्रिक भावनाओं पर प्रतिक्रिया कर रही थीं और कोई भी चीज़ उन्हें एक-दूसरे का कत्लेआम करने से रोक नहीं सकती थी। सेंट पीटर्सबर्ग में उस्पेन्स्की का समूह अक्सर नूह की नाव (Noah’s Ark) के विचार पर चर्चा करता था। ऐसा जहाज़ जो आने वाली घटनाओं के जलप्रलय से बच सके और अपने बनाने वालों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सके।

By Joe Michelli 

इस समय गुर्जिएफ़ मॉस्को में अपना काम जारी रखे हुए थे। उस्पेन्स्की के समूह के सदस्य कभी-कभी वहाँ जाते और गुर्जिएफ़ के नवीनतम व्याख्यानों के नोट्स लेकर लौटते। ‘कार्य’ (the work) मूलतः आत्म-निरीक्षण पर आधारित था, जो गुर्जिएफ़ की ‘केन्द्रों’ (centres) संबंधी शिक्षा पर आधारित था। मूलभूत समस्या यह थी कि ‘स्वयं को कैसे याद रखा जाए,’ अर्थात ‘self-remembering’ कैसे किया जाए। हमारी सामान्य चेतना की अवस्था में कोई केंद्रीय ‘मैं’ नहीं होता। जब मैं सुबह अपनी आँखें खोलता हूँ तो चीज़ें ‘दिखाई देती हैं’, लेकिन उन्हें देखने वाला ‘मैं’ नहीं होता। उन्हें ‘मशीन’, अर्थात रोबोट देख रहा होता है। उस्पेन्स्की ने इस विचार को एक सुविधाजनक चित्र के माध्यम से समझाया। जब मैं बाहरी दुनिया पर ध्यान देता हूँ तो मैं ऐसा हूँ जैसे बाहर की ओर संकेत करता हुआ एक तीर। जब मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ और ‘अपने भीतर’ उतरता हूँ तो मेरा ध्यान भीतर की ओर संकेत करता हुआ तीर बन जाता है। अब यदि मैं दोनों काम एक साथ करने की कोशिश करूँ अर्थात उस ‘तीर’ को एक ही समय में भीतर और बाहर दोनों ओर संकेत करने दूँ तो मुझे तुरंत पता चलता है कि यह कितना अविश्वसनीय रूप से कठिन है। एक-दो सेकंड बाद ही या तो मैं बाहरी दुनिया को भूलकर दिवास्वप्न में डूब जाता हूँ या फिर ‘अपने आप’ को भूलकर उस वस्तु में पूरी तरह डूब जाता हूँ जिसे मैं देख रहा हूँ। लेकिन गुर्जिएफ़ के अनुसार, स्वयं को याद रखने के ये क्षण जब तीर एक ही समय में दोनों दिशाओं में संकेत करता है, हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण होते हैं। गहरे सुख के सभी क्षणों में हमें एक ऐसा अनुभव होता है जिसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है, ‘क्या! मैं... यहाँ?’ मुझे केवल इस बात की चेतना नहीं होती कि मेरे साथ क्या घट रहा है बल्कि इस बात की भी चेतना होती है कि यह मेरे साथ घट रहा है। मॉस्को के दिनों में गुर्जिएफ़ के सबसे मूलभूत अभ्यासों में से एक यह था कि किसी वस्तु, मान लीजिए एक घड़ी को देखने का प्रयास किया जाए और उसी समय स्वयं को यह देखने के प्रति भी सचेत किया जाए कि ‘मैं उसे देख रहा हूँ’। उनके शिष्यों को शीघ्र ही यह एहसास होने लगा कि स्वयं को याद रखना (कितना) अत्यंत कठिन है।

गुर्जिएफ़ ने कहा, यह स्पष्ट है कि वर्तमान अवस्था में मनुष्य के भीतर कुछ बहुत बुनियादी रूप से गलत है। हम इतना कुछ अनुभव क्यों करें, केवल इसलिए कि उसके तुरंत बाद उसे भूल जाएँ? हमारे अनुभवों का आधा हिस्सा तो ऐसे हमसे फिसल जाता है जैसे पानी बत्तख की पीठ से फिसल जाता है। फिर भी अनुभव भोजन है और उसका उद्देश्य हमें विकसित होने में सक्षम बनाना है।

उस्पेन्स्की ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि इस दृष्टि से स्वयं को याद रखने के प्रयास अत्यंत मूल्यवान हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, उन दिनों मुझे रात में सेंट पीटर्सबर्ग की गलियों में घूमना और वहाँ के मकानों तथा सड़कों को ‘महसूस’ करना बहुत पसंद था। सेंट पीटर्सबर्ग ऐसे विचित्र संवेदनों से भरा हुआ है। मकान, विशेषकर पुराने मकान, बिल्कुल जीवित प्रतीत होते थे। ऐसा लगता था कि मैं उनसे लगभग बात कर सकता हूँ। इसमें ‘कल्पना’ जैसी कोई बात नहीं थी। मैं किसी चीज़ के बारे में सोचता नहीं था। मैं केवल चलता रहता था, स्वयं को याद रखने का प्रयास करता था और अपने आस-पास देखता था। वे संवेदनाएँ अपने आप उत्पन्न होती थीं।

उस्पेन्स्की उस नियंत्रण-बोध की शुरुआत का अनुभव कर रहे थे, जिसे बाद में फॉन्टेनब्लो में बेनेट ने अनुभव किया था।

उस्पेन्स्की स्वयं को याद रखने के एक असफल प्रयास की एक मज़ेदार कहानी भी सुनाते हैं।

“एक बार मैं लितेनी मार्ग से नेव्स्की की ओर जा रहा था और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद अपना ध्यान स्वयं को याद रखने पर टिकाए रखने में असमर्थ था। शोर, लोगों की आवाजाही... हर चीज़ मेरा ध्यान भटका रही थी। हर मिनट मैं अपने ध्यान की कड़ी खो देता, फिर उसे वापस पा लेता और फिर दोबारा खो देता। अंततः मुझे अपने ऊपर एक तरह की हास्यास्पद झुंझलाहट महसूस हुई और मैं बाईं ओर की एक गली में मुड़ गया। मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि कम-से-कम कुछ समय तक अपना ध्यान इस बात पर बनाए रखूँगा कि मुझे स्वयं को याद रखना है। मैं नेदेझ्दिन्स्काया पहुँच गया और इस दौरान ध्यान की वह कड़ी लगभग नहीं खोई, सिवाय शायद कुछ छोटे-छोटे क्षणों के। फिर मैं दोबारा नेव्स्की की ओर मुड़ा। मुझे लगा कि शांत गलियों में विचार की इस कड़ी को बनाए रखना आसान है, इसलिए मैं स्वयं को अधिक शोर वाली गलियों में परखना चाहता था। मैं नेव्स्की तक पहुँच गया और तब भी स्वयं को याद रखे हुए था। अब मुझे उस विचित्र भावनात्मक अवस्था का अनुभव होने लगा था जो इस तरह के बड़े प्रयास के बाद आती है... भीतर की शांति और आत्मविश्वास की अवस्था। ठीक मोड़ के पास एक तंबाकू की दुकान थी, जहाँ मेरे लिए सिगरेट बनाई जाती थीं। स्वयं को याद रखते हुए मैंने सोचा कि वहाँ जाकर कुछ सिगरेट मँगवा लूँ। दो घंटे बाद मेरी आँखें तावरीचेस्काया में खुलीं अर्थात वहाँ से बहुत दूर। जागने का वह अनुभव असाधारण रूप से तीव्र था। मैं लगभग कह सकता हूँ कि मैं सचमुच होश में आया। मुझे सब कुछ एक साथ याद आ गया। मैं कैसे नेदेझ्दिन्स्काया मार्ग पर चल रहा था, कैसे स्वयं को याद रख रहा था, कैसे मैंने सिगरेट के बारे में सोचा था और कैसे उसी विचार के आते ही ऐसा लगा था कि मैं अचानक गिर पड़ा और गहरी नींद में विलीन हो गया। और फिर भी, इस नींद में डूबे रहने के दौरान मैं लगातार उचित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से काम करता रहा था। ...तावरीचेस्काया से होकर गाड़ी में जाते समय मुझे एक अजीब बेचैनी महसूस होने लगी, मानो मैं कुछ भूल गया हूँ। और अचानक मुझे याद आया कि मैं स्वयं को याद रखना भूल गया था।”

यह प्रसंग कई महत्वपूर्ण बातों को स्पष्ट करता है। सबसे पहले, स्वयं को याद रखने के साथ आने वाली गहरी संतुष्टि और नियंत्रण की वह विचित्र अनुभूति, जिसकी तुलना लगभग यौन संतुष्टि से की जा सकती है। एक गहरी और व्यापक चेतना के जन्म जैसी होती है। फिर यह ध्यान देने योग्य है कि सिगरेट का विचार ही उसे ‘नींद’ में ले गया था। इससे समझ में आता है कि गुर्जिएफ़ को कुछ पुरानी आदतों को जान-बूझकर छोड़ना इतना महत्वपूर्ण क्यों लगता था ताकि उससे पैदा होने वाला तनाव एक ‘अलार्म घड़ी’ की तरह काम करे। यदि उस्पेन्स्की ने धूम्रपान छोड़ने का संकल्प किया होता तो तंबाकू का विचार स्वयं उसके उद्देश्य को बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त ‘झटका’ बन जाता, ऑक्टेव के उस कमजोर बिंदु को मजबूत करने वाला झटका।

अंत में, यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह एहसास होना कि वह स्वयं को याद रखना भूल गया था, वास्तव में जागने जैसा था। गुर्जिएफ़ का यह कथन कि सामान्य चेतना नींद का एक रूप है, केवल एक रूपक के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसे शाब्दिक अर्थ में लेना चाहिए। एक अन्य अवसर पर उस्पेन्स्की बताते हैं कि उन्होंने स्वयं को याद रखने की इतनी तीव्र अवस्था प्राप्त कर ली थी कि सड़क पर चलते हुए वह वास्तव में देख सकते थे कि लोग सोए हुए हैं और उनके सिर किसी प्रकार के स्वप्नों के बादल में लिपटे हुए दिखाई देते थे। फिर से, इसे केवल एक रूपक नहीं समझना चाहिए। ऐसा लगता है कि स्वयं को याद रखने से एक विचित्र प्रकार की ‘टेलीपैथी’ उत्पन्न होती है, जिसमें चेतना वास्तविकता के कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र के प्रति जागरूक हो जाती है। संभावना है कि एक अर्थ में उस्पेन्स्की सचमुच ‘उनके सिरों के भीतर’ देख सकते थे।

1916 की सर्दी जैसे-जैसे लंबी खिंचती गई, उस्पेन्स्की के लिए यह स्पष्ट होता गया कि उनका ‘Ark’ उन्हें अपने चारों ओर फैल रही अराजकता से बचाने वाला नहीं था। उस वर्ष क्रिसमस के ठीक बाद ज़ारिना का प्रिय रासपुतिन गायब हो गया। उसने भविष्यवाणी की थी कि यदि उसकी हत्या किसानों द्वारा की गई तो रूस सैकड़ों वर्षों तक समृद्ध बना रहेगा, लेकिन यदि उसकी हत्या अभिजात वर्ग के किसी व्यक्ति ने की तो राजपरिवार का विनाश निश्चित होगा और रूस में कोई भी कुलीन व्यक्ति जीवित नहीं बचेगा। उसकी हत्या प्रिंस फ़ेलिक्स युसुपोव ने की और कुछ सप्ताह बाद उसका शव नेवा नदी से बरामद हुआ।

गुर्जिएफ़ अपने गृह नगर अलेक्ज़ान्द्रोपोल लौट गए और उन्होंने उस्पेन्स्की को वहाँ आने के लिए तार भेजा। उस्पेन्स्की गुर्जिएफ़ की पृष्ठभूमि की इस झलक से बहुत उत्सुक हुए, विशेषकर एक ऐसी बड़ी की गई तस्वीर को देखकर जिसमें गुर्जिएफ़ को युवावस्था में फ्रॉक-कोट पहने दिखाया गया था। उस्पेन्स्की के अनुसार, इस तस्वीर से उन्होंने अनुमान लगा लिया कि उस समय गुर्जिएफ़ का पेशा क्या था, लेकिन उन्होंने उस रहस्य को अपने तक ही रखने का निश्चय किया। यह, निश्चित रूप से, वही ‘हिप्नोटिस्ट’ वाली तस्वीर थी जिसे बेनेट ने ‘गुर्जिएफ़: मेकिंग ए न्यू वर्ल्ड’ (Gurdjieff: Making a New World) में प्रकाशित किया है।

उस्पेन्स्की उलझन में थे। गुर्जिएफ़ अपना काम अच्छी तरह करते हुए और ऐतिहासिक घटनाओं से अप्रभावित दिखाई देते थे। उन्होंने उस्पेन्स्की से कहा कि उन्हें लगता है कि परिस्थितियाँ जल्द ही शांत हो जाएँगी और वे रूस में अपना काम जारी रख सकेंगे। (यदि वे सचमुच गंभीर थे और गुर्जिएफ़ के मामले में यह कभी निश्चित नहीं कहा जा सकता तो वे असाधारण रूप से दूरदृष्टिहीन थे।) फिर भी, गुर्जिएफ़ स्पष्ट रूप से किसी गहरे विचार में डूबा हुए थे। किस बात पर? संभवतः इस भावना पर कि उनकी ‘विधि’ अभी भी संतोषजनक नहीं थी और किसी नई चीज़ की आवश्यकता थी... कुछ अधिक व्यावहारिक। लोग नई धारणाओं को आराम से आत्मसात कर सकते हैं और फिर वापस सो सकते हैं। उसे लोगों को जागृत रखने के लिए नए तरीके खोजने थे।

उस्पेन्स्की सेंट पीटर्सबर्ग लौट गए। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि उनका इरादा किस्लोवोद्स्क जाकर एक नया कार्य-समूह स्थापित करने का है और उन्होंने उस्पेन्स्की तथा अन्य इच्छुक लोगों को वहाँ उनके साथ आने की सलाह दी। वास्तव में, गुर्जिएफ़ काकेशस के एस्सेन्तुकी चले गए। उन्होंने एक विला किराये पर लिया और गाँव के किनारे एक मकान भी लिया। वहाँ छह सप्ताह तक उनके शिष्यों ने एक नई तरह की तीव्रता के साथ काम किया। सबसे पहले गुर्जिएफ़ ने विभिन्न अभ्यास और तकनीकें शुरू कराईं। कुछ अभ्यासों में मांसपेशियों पर जोर देना या उन्हें ढीला करना शामिल था और आज के किसी योग-विद्यार्थी को वे परिचित लग सकते हैं। दूसरे अभ्यास अधिक जटिल थे। यहीं गुर्जिएफ़ ने अपने सबसे चौंकाने वाले और प्रभावशाली अभ्यासों में से एक शुरू कराया। ‘Stop’ यानी ‘रुक जाओ’ का अभ्यास। जब वे ‘Stop!’ कहते तो हर व्यक्ति को उसी क्षण जो कुछ भी वह कर रहा था, उसे बिल्कुल तुरंत रोक देना होता था। भले ही वह अपना एक कदम बीच में ही उठा रहा हो या मुँह में रखा भोजन निगलने वाला ही क्यों न हो। उसका कहना था कि इसका उद्देश्य लोगों को अपने काम करने के ढंग के प्रति जागरूक करना था। अपनी शारीरिक मुद्रा और मांसपेशियों की प्रतिक्रिया के प्रति बिल्कुल सटीक जागरूकता पैदा करना। बाद के वर्षों में प्रीएरे में वह आधी रात को छात्रावास में आ सकते थे और उँगलियाँ चटका सकते थे। तब हर व्यक्ति को कुछ ही सेकंड के भीतर बिस्तर से बाहर निकलकर किसी जटिल शारीरिक मुद्रा में खड़ा हो जाना पड़ता था। वह पूर्ण सतर्कता विकसित करने का प्रयास कर रहे थे।

गुर्जिएफ़ ने समझाया कि वह उन्हें ‘अति-प्रयास’ (super-effort) के सिद्धांत से परिचित करा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति खराब मौसम में पच्चीस मील पैदल चलता है और ठंडा तथा भूखा घर पहुँचता है और फिर घर के भीतर जाने से पहले दो मील और चलने का निर्णय करता है तो यह ‘अति-प्रयास’ है।

लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ गुर्जिएफ़ किसी महत्वपूर्ण बात को समझाने में असफल रहे। महत्वपूर्ण स्वयं ‘अति-प्रयास’ नहीं है बल्कि वह ऊर्जा है जिसे हम उस अति-प्रयास का सामना करने के लिए अपने भीतर से बुलाते हैं। गुर्जिएफ़ की ‘प्रणाली’ का पूरा उद्देश्य और न तो उनकी अपनी पुस्तकों में और न ही उनके बारे में लिखी गई पुस्तकों में इस बात पर पर्याप्त जोर दिया गया है। इस मूल धारणा पर आधारित है कि मनुष्य के भीतर उसकी कल्पना से कहीं अधिक ऊर्जा मौजूद है, ‘जीवनी-शक्ति के भंडार’ (vital reserves) की एक विशाल झील। जो चीज़ हमें इन भंडारों से काट देती है, वह आलस्य की भावना या अधिक सही ढंग से कहें तो अनिच्छा है। हम किसी प्रयास के बारे में सोचते हैं और कहते हैं, ‘ओह, कितना उबाऊ काम है।’ और यह ऊब की भावना तुरंत हमारी जीवन-शक्ति को कम कर देती है। यदि मैं किसी अति-प्रयास जैसे, उन अतिरिक्त दो मील चलने को आत्म-दया से कराहते हुए करूँ तो उसका कोई लाभ नहीं होगा। लेकिन यदि कोई अचानक आया संकट या अचानक मिली कोई अच्छी खबर (जैसे कि कोई प्रिय व्यक्ति दो मील दूर मेरा इंतज़ार कर रहा है) मुझे वे दो मील चलने का निर्णय करने के लिए प्रेरित कर दे तो मैं उन्हें फुर्तीले कदमों से चलूँगा और आवश्यकता पड़ने पर दस गुना अधिक दूरी तय करने के लिए भी तैयार रहूँगा। यही, इसलिए, इस अभ्यास का वास्तविक उद्देश्य है। उस आशावादी अवस्था और आंतरिक उद्देश्य-बोध को अपने भीतर जगाना, जो अति-प्रयास को आसान बना देता है। फ्रिट्ज़ पीटर्स की कहानी इसका प्रमाण है (देखिए अध्याय 1) कि गुर्जिएफ़ ने इन ‘जीवनी-शक्ति के भंडारों’ का उपयोग करने और अपनी ‘अनिच्छा’ को दबाकर उसके ऊपर विजय पाने की कला में महारत हासिल कर ली थी।

लेकिन गुर्जिएफ़ के ‘असाधारण प्रयास’ (super-effort) के सिद्धांत का व्यावहारिक महत्त्व यह था कि उनका मानना था कि इससे ‘कार्य’ (work) को एक नया आधार मिल सकता है। सेंट पीटर्सबर्ग या मॉस्को में अब तक ‘कार्य’, एक अर्थ में, पूरी तरह आंतरिक था। लेकिन अब गुर्जिएफ़ जान-बूझकर ऐसी कठिनाइयाँ खोज रहे थे, जिनके सामने वे अपने अनुयायियों को खड़ा कर सकें ताकि वे आवश्यक ऊर्जा और ध्यान को ‘एकत्रित’ करने के लिए बाध्य हों। मसलन, जब उनके शिष्य थॉमस द हार्टमैन, जो पहले सेना में अधिकारी रह चुके थे अपनी पत्नी के साथ वहाँ पहुँचे तो गुर्जिएफ़ ने ज़खारोफ़ नामक एक अनुयायी से समोवर में चाय बनाने को कहा। इसमें समोवर के नीचे लकड़ी और कोयले के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े जलाने की एक कठिन प्रक्रिया शामिल थी। वे बड़ी मुश्किल से जलते थे और यदि ज़खारोफ़ एक क्षण के लिए भी दूसरी ओर देख लेता तो आग बुझ जाती और उसे पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती। ऐसा लगता है कि अपने शेष जीवन में गुर्जिएफ़ को जान-बूझकर परेशानी और उलझन पैदा करने में बहुत आनंद आने लगा था। एक समय तो फ्रिट्ज़ पीटर्स ने क्रोध में आकर उनसे संबंध ही तोड़ लिया था। इसका उद्देश्य अपने शिष्यों को ‘असाधारण प्रयास’ करने के लिए मजबूर करना था। गुर्जिएफ़ हार्टमैन और उनकी पत्नी को गाँव में केक खरीदने के लिए ले गए और लौटते समय अपनी चाल इतनी तेज़ कर दी कि वे लगभग दौड़ने लगे। यह भी अपने शिष्यों को असाधारण प्रयास का अभ्यस्त बनाने का एक तरीका था।

थॉमस द हार्टमैन की पुस्तक ‘आर लाइफ विद मि. गुर्जिएफ़’ (Our Life with Mr Gurdjieff) शायद एक व्यक्ति के रूप में गुर्जिएफ़ के बारे में लिखे गए सभी विवरणों में सबसे अधिक रोचक और रहस्योद्घाटन करने वाली पुस्तकों में से एक है। इसमें वे गुर्जिएफ़ की जान-बूझकर की गई एक और ‘चाल’ का वर्णन करते हैं।  एस्सेंटुकी में गुर्जिएफ़ ने घोषणा की कि उनका इरादा फ़ारस (Persia) जाने का है। इससे उनके अनुयायियों में तत्काल चिंता और भ्रम पैदा हो गया। हार्टमैन स्वयं अभी भी सेना के अधिकारी थे और बिना अत्यंत गहरे अंतरात्मिक संघर्ष के भगोड़ा सैनिक नहीं बन सकते थे। लेकिन जिस दिन उनके प्रस्थान की घोषणा की गई थी, उसी दिन गुर्जिएफ़ ने कहा कि वे केवल तुआप्से (Tuapse) तक जा रहे हैं, जो काला सागर के निकट था और जो भी उनके साथ जाना चाहे, उसका स्वागत है। हार्टमैन दंपति और कुछ अन्य लोगों ने उनके साथ जाने का निर्णय किया। लेकिन तुआप्से पहुँचने पर उन्होंने गुर्जिएफ़ को बिस्तर पर लेटे हुए पाया। वे मानो निर्णय न कर पाने की स्थिति में थे। वहाँ ‘एक ऐसा भारी वातावरण था जो उस समय मनुष्य को अभिभूत कर देता है, जब उसे पता नहीं होता कि क्या करना है।’ और हार्टमैन बहुत सूक्ष्म ढंग से जोड़ते हैं, ‘श्री गुर्जिएफ़ निश्चित रूप से ऐसा वातावरण पैदा करना जानते थे।’ दूसरे शब्दों में, गुर्जिएफ़ को यह एहसास हो गया था कि उनके अनुयायी अब उनके अपने दृढ़ उद्देश्य-बोध पर निर्भर होने लगे हैं और वे चाहते थे कि यह आदत मजबूत होकर स्थायी रूप धारण करने से पहले ही उन्हें इससे बाहर झकझोर दें।

इसके बाद जो हुआ, वह भी गुर्जिएफ़ के व्यवहार का विशिष्ट उदाहरण है। उन्होंने एक गाड़ी खरीदी और घोषणा की कि अब वे वहाँ से चलेंगे। गुर्जिएफ़ गाड़ी और सामान लेकर आगे निकल गए और हार्टमैन दंपति से कहा कि वे पहाड़ों के ऊपर से पैदल चलकर कुछ मील दूर उनसे आ मिलें। वह यात्रा लंबी, कठिन और गर्म थी। अंततः उन्हें एक सराय मिली, जहाँ वे प्रतीक्षा कर सकते थे। आखिरकार अँधेरा होने के बाद गुर्जिएफ़ वहाँ पहुँचे। लेकिन उन्होंने उन्हें सोने जाने देने के बजाय प्रस्ताव रखा कि यात्रा को चाँदनी में आगे जारी रखा जाए। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। मैडम द हार्टमैन ऊँची एड़ी के जूते पहने हुए थीं और रात के दो बजे तक चलते रहे। तभी बारिश शुरू हो गई। गुर्जिएफ़ ने उनसे आग जलाने को कहा और फिर कहा कि अब वे सोएँगे, सिवाय हार्टमैन के, जिन्हें पहरे पर जागते रहने का आदेश दिया गया।

अगले दिन हार्टमैन थकान से चक्कर खा रहे थे। गुर्जिएफ़ ने उनसे कहा कि वे गाड़ी पर रखे सामान के ऊपर चढ़ जाएँ। लेकिन हार्टमैन ने पाया कि जैसे ही वे आँखें बंद करते, वे गाड़ी से नीचे गिरने लगते। इसलिए उन्हें नींद से लड़ते हुए जागते रहना पड़ा। वास्तव में गुर्जिएफ़ उद्देश्य भी यही था। उनका विश्वास था कि तीव्र प्रयासों के माध्यम से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है। वही ऊर्जा जिसकी मनुष्य को स्वयं को रूपांतरित करने के लिए आवश्यकता होती है। इस ऊर्जा के बिना मनुष्य आत्म-परिवर्तन के बारे में सोच सकता है, यहाँ तक कि उसकी तीव्र इच्छा भी कर सकता है, लेकिन उसे वास्तव में प्राप्त नहीं कर सकता।

और इस प्रकार यात्रा चलती रही। कम-से-कम हार्टमैन अब उसके पीछे छिपे उद्देश्य को समझ चुके थे। वे लिखते हैं, ‘फ़ारस जाने की बात करके और हर प्रकार की भावनात्मक तथा शारीरिक कठिनाइयाँ पैदा करके, वह अपरिचित परिस्थितियों में हमारे सामने बाधाओं की एक ऐसी सीढ़ी बना रहे थे, जिसे पार करके हमें अपने भीतर के एक निश्चित छोटे-से “प्रयास” (थोड़ा-सा और करो) तक पहुँचना था। हमारे समग्र विकास के पैमाने में मौजूद उस “थोड़ा-सा और करो” तक।’

आउच-दारी (Outch-Dary) नामक एक स्थान पर गुर्जिएफ़ की सलाह के विरुद्ध पेड़ से बेर खाने के बाद हार्टमैन गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और मृत्यु के बहुत निकट पहुँच गए। प्रलाप की अवस्था में उन्होंने अपनी पत्नी को मारने की कोशिश तक की। जब गुर्जिएफ़ भीतर आए तो हार्टमैन उन्मत्त अवस्था में उन पर झपट पड़े। लेकिन जब गुर्जिएफ़ ने अपना हाथ उनके माथे पर रखा तो उन्हें गहरी शांति का अनुभव हुआ और उनका शरीर शिथिल हो गया। गुर्जिएफ़ के पास अब भी उनकी ‘जादुई’ शक्तियाँ थीं। अंततः हार्टमैन स्वस्थ हो गए और वे एस्सेंटुकी लौट आए। लगता है कि यह पूरी यात्रा ही हार्टमैन दंपति को असामान्य मानसिक और शारीरिक तनाव की स्थिति में डालने के उद्देश्य से बनाई गई थी।

यही बात एक रेस्तराँ से जुड़ी एक मनोरंजक घटना में भी दिखाई देती है। हार्टमैन का मन एक सामाजिक क्लब में जाने का हुआ और गुर्जिएफ़ ने ऐसा दिखाया मानो वे और उनके एक डॉक्टर मित्र रात के भोजन के लिए आमंत्रित किए गए हों। महँगाई उस समय एक गंभीर समस्या थी और हार्टमैन की कोई नियमित आय नहीं थी। फिर भी वे उन दोनों को रेस्तराँ ले गए। गुर्जिएफ़ ने वहाँ उपलब्ध सबसे महँगा भोजन मँगवा लिया। हार्टमैन को वेटर को कुछ अतिरिक्त पैसे देकर अपनी पत्नी के पास जाकर और 500 रूबल लाने के लिए कहना पड़ा। लेकिन अगले दिन गुर्जिएफ़ ने वह पैसा हार्टमैन को लौटा दिया और समझाया कि यह सब उन्होंने उसके अपने भले के लिए किया था। हार्टमैन अभी भी एक वयस्क व्यक्ति की तरह व्यवहार नहीं कर रहे थे जैसा कि उस भोजन को लेकर उनकी परेशानी और शर्मिंदगी से स्पष्ट था। उनके भीतर का बालसुलभ हिस्सा ही था, जिसे इस पूरी परिस्थिति में बेचैनी और संकोच का अनुभव कराया जा रहा था।

अब रूस की स्थिति गंभीर हो चुकी थी। बोल्शेविक क्रांति हो चुकी थी। अस्थायी केरेन्स्की सरकार को उखाड़ फेंका गया था और रूस गृहयुद्ध से फट पड़ा था। हार्टमैन जैसे विद्यार्थी और अन्य पूर्व सैन्य अधिकारी खतरे में थे। लेकिन उस समय तक बोल्शेविक केवल काकेशस की उत्तरी ढलानों तक ही आगे बढ़े थे। दक्षिण में मेन्शेविक अर्थात वे उदारवादी समाजवादी जो बोल्शेविकवाद का विरोध करते थे... अभी भी सत्ता में थे। दुर्भाग्य से, गुर्जिएफ़ और उनके विद्यार्थी बोल्शेविक क्षेत्र में थे। गुर्जिएफ़ ने सबसे पहले स्थानीय बोल्शेविकों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने अपने एक विद्यार्थी, जो श्वेत रूसी वकील था, से कहा कि वह जाकर उन्हें अपनी कानूनी सेवाएँ देने की पेशकश करे। उस वकील ने प्रूधों और फूरिए[1] के बारे में एक जोशीला भाषण देकर उन्हें विश्वास दिला दिया कि वह एक कट्टर क्रांतिकारी है और उसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया।

गुर्जिएफ़ ने उस वकील से यह भी कहा कि वह एस्सेंटुकी सोवियत को एक औपचारिक पत्र लिखे, जिसमें काकेशस के माउंट इंदुए (Mount Indue) के लिए एक वैज्ञानिक अभियान आयोजित करने की अनुमति माँगी जाए। उन्होंने समझाया कि इस अभियान में वहाँ खड़े हुए पत्थरों, डोल्मेन की खोज की जाएगी और साथ ही सोने की भी तलाश की जाएगी। गुर्जिएफ़ ने बड़ी चतुराई से प्यातिगोर्स्क के एक समाचार-पत्र में एक लेख भी प्रकाशित करवाया। प्यातिगोर्स्क उस क्षेत्र की उच्च सोवियत का मुख्यालय था। उस लेख में अभियान और उसके उद्देश्यों के महत्त्व का वर्णन किया गया था। अनुमति मिल गई। गुर्जिएफ़ ने बोल्शेविकों को ‘सोना धोने’ के लिए बड़ी मात्रा में शुद्ध शराब उपलब्ध कराने के लिए भी मना लिया। बाद में उसे अपने पीने के लिए पतला कर लिया गया। (उस समय किसी भी प्रकार की शराब मिलना लगभग असंभव था।) वह वकील, जो अब तक पासपोर्ट कार्यालय का प्रभारी बन चुका था, उन सभी के लिए सोवियत पासपोर्ट जारी कर देता था।

हार्टमैन यह देखकर हैरान होते थे कि गुर्जिएफ़ घोड़ों के पेट पर उन्हें पीटते थे और उन्हें गुस्से तथा भय में पिछले पैरों पर खड़ा होने के लिए मजबूर करते थे। बाद में जब सैनिक घोड़ों को जब्त करने आए और दो घंटे बाद उन्हें वापस ले आए, यह कहते हुए कि वे खतरनाक हैं, तब हार्टमैन समझ गए कि गुर्जिएफ़ ऐसा क्यों कर रहे थे। अंततः बोल्शेविकों ने उस ‘अभियान’ के लिए एक रेलगाड़ी भी उपलब्ध करा दी, जो उन्हें बोल्शेविक क्षेत्र की सीमा पर स्थित माइकोप (Maikop) तक ले गई। उनके एस्सेंटुकी छोड़ने के दो सप्ताह बाद ही आतंक का शासन शुरू हो गया और सभी पूर्व सैन्य अधिकारियों को गोली मार दी गई।

माइकोप पर श्वेत रूसी सेनाओं का कब्ज़ा हो गया। अब और पासपोर्ट हासिल करना आवश्यक हो गया और श्वेत रूसी अधिकारी बहुत कठिनाई पैदा कर रहे थे। लेकिन गुर्जिएफ़ का भाग्य फिर साथ दे गया। समूह के एक सदस्य का एक पुराना मित्र, जो एक एडमिरल था, वहाँ आ पहुँचा और उसने सारी व्यवस्था कर दी। गुर्जिएफ़ और उनका दल माइकोप से निकलने के अगले ही दिन उस पर फिर से बोल्शेविकों का कब्ज़ा हो गया। लेकिन तब तक वे दक्षिण की ओर जा चुके थे। तिफ़्लिस की यात्रा कठिन और खतरनाक थी। एक जगह हार्टमैन और उनके साथियों को डाकुओं ने रोक लिया और लूट लिया। (गुर्जिएफ़ अपने विशिष्ट सौभाग्य के कारण इस समय आगे निकल चुके थे और उन्हें किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।) सौभाग्य से, हार्टमैन की पत्नी ने डाकुओं को उनका कुछ आवश्यक सामान ले जाने से मना लिया। वे बिना किसी शारीरिक नुकसान के बच निकले, यह उनका सौभाग्य था। इसी रास्ते पर दूसरे यात्रियों की हत्या की जा चुकी थी।

गुर्जिएफ़ ने जो यह घोषणा की थी कि वे खड़े हुए पत्थरों की खोज करेंगे, वह पूरी तरह काल्पनिक नहीं थी। एक पहाड़ी गाँव में जब उन्हें पता चला कि उस क्षेत्र में डोल्मेन मौजूद हैं तो उन्होंने वहाँ ले जाने के लिए कहा। जिस डोल्मेन के पास उन्हें ले जाया गया, वह ढक्कन वाले एक विशाल पत्थर के संदूक जैसा था। जब उनसे पूछा गया कि ऐसे पत्थरों का क्या उद्देश्य होता है तो गुर्जिएफ़ ने उत्तर दिया कि वे ‘रास्ते के संकेत’ हैं, जो दीक्षा (initiation) के स्थानों तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। यह उत्तर बताता है कि इन पत्थरों और उनके उद्देश्य के बारे में उन्हें कुछ गूढ़ ज्ञान था। इसकी पुष्टि आगे हुई। गुर्जिएफ़ ने अपने मार्गदर्शकों से पूछा कि क्या उस इलाके में और भी डोल्मेन हैं। उन्होंने कहा, नहीं। इसके बाद गुर्जिएफ़ ने कुछ माप और गणनाएँ कीं और उन्हें घने जंगलों के बीच से ले चले। रास्ता बनाने के लिए हाथ की कुल्हाड़ियों से झाड़ियाँ और पेड़ काटने पड़े। वे दल को दो और डोल्मेन तक ले गए, जो दोनों घनी वनस्पतियों से पूरी तरह ढँके हुए थे और स्थानीय लोगों के लिए भी अज्ञात थे। उनके मार्गदर्शक आश्चर्यचकित रह गए। अपनी यात्रा के विवरण में गुर्जिएफ़ ने एक रहस्यमय टिप्पणी की है कि उनके विद्यार्थियों में इंजीनियरिंग, खगोलशास्त्र और पुरातत्त्व के विभिन्न विशेषज्ञों ने उन्हें ‘डोल्मेन की समस्या को हल करने’ में सहायता की। यह अफ़सोस की बात है कि उनके इस ‘समाधान’ का कोई विवरण उपलब्ध नहीं लगता।

अंततः वे जॉर्जिया की राजधानी तिफ़्लिस पहुँचे, जो अभी भी मेन्शेविकों के अधिकार में थी। गुर्जिएफ़ को न केवल अपने अनुयायियों की देखभाल करनी थी बल्कि अट्ठाईस रिश्तेदारों का भी भार था, जो आगे बढ़ते तुर्कों के कारण अलेक्ज़ान्द्रोपोल छोड़कर वहाँ आ गए थे। (गुर्जिएफ़ के पिता की हत्या हो चुकी थी।) गुर्जिएफ़ स्वयं भी उस बीमारी से अभी पूरी तरह उबर नहीं पाए थे, जो यात्रा के दौरान उन्हें लगी थी, लेकिन अपनी विशिष्ट दृढ़ता के साथ उन्होंने फिर से पैसा कमाने का काम शुरू कर दिया। उनके कुछ विद्यार्थियों को आस-पास के इलाकों में भेजा गया, जहाँ वे बहुत सस्ते दामों पर पुराने कालीन खरीदते थे। दूसरे विद्यार्थी उन्हें धोकर और उनकी मरम्मत करके तैयार करते थे। फिर वे कालीन बेच दिए जाते थे। कुछ ही सप्ताहों में यह व्यवसाय खूब चल निकला और उनके पास अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त से भी अधिक धन हो गया। यह गुर्जिएफ़ के उस मूल दावे का एक और उदाहरण था कि जो लोग ‘कार्य’ में अच्छे होते हैं, वे जीवित रहने के व्यावहारिक व्यवसाय में भी अच्छे होंगे।

तिफ़्लिस में गुरजिएफ़ ने एक बार फिर अपना संस्थान स्थापित किया और उसे सरकार से भी कुछ सहायता मिली। वे धीरे-धीरे अपनी ‘पद्धति’ को अधिक परिष्कृत और विकसित कर रहे थे। एस्सेंटुकी छोड़ने से पहले उन्होंने ‘मूवमेंट्स’ या पवित्र नृत्यों को ‘चलित केंद्र’ (moving centre) के एक मूल अनुशासन के रूप में शुरू किया था। इसका उद्देश्य शरीर को अपनी एक अलग प्रकार की ‘चेतना’ प्रदान करना था। अब उन्होंने एक विवरण-पुस्तिका (prospectus) तैयार की, जिसमें उन्होंने लिखा कि वहाँ ‘इच्छाशक्ति, स्मृति, ध्यान, श्रवण, चिंतन, भावना और सहज-प्रवृत्ति के विकास के लिए अभ्यास’ कराए जाएँगे। लेकिन स्थिति अस्थिर थी। जॉर्जियाई सरकार ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति के सहारे टिकी हुई थी। जब अंग्रेज़ों ने वहाँ से हटने का निर्णय लिया तो यह केवल समय की बात थी कि बोल्शेविक सत्ता पर कब्ज़ा कर लें।

कॉन्स्टेंटिनोपल में ब्रिटिश सैन्य गुप्तचर विभाग का प्रमुख जॉन बेनेट नामक एक युवा ब्रिटिश अधिकारी था। गुर्जिएफ़ की तरह वह भी दरवेशों और उनके समारोहों से बहुत प्रभावित था। उसने एक वृद्ध दरवेश को पीठ के बल लेटे देखा था, जिसके शरीर पर एक बेहद तेज़ धार वाली तलवार रखी हुई थी और एक आदमी उस तलवार पर खड़ा था। फिर भी उस वृद्ध दरवेश के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी। बेनेट को विश्वास हो गया था कि हमारी मानवीय सीमाओं के रहस्य का उत्तर ‘पाँचवें आयाम’ (fifth dimension) की अवधारणा में छिपा है।

बेनेट की कॉन्स्टेंटिनोपल में उस समय तक उस्पेन्स्की से मुलाकात हो चुकी थी। इस समय तक उस्पेन्स्की ने गुर्जिएफ़ से अलग होने का निर्णय कर लिया था। ‘इन सर्च ऑफ द मिरैक्युलस’ (In Search of the Miraculous) में वे इसका कारण यह बताते हैं कि उन्हें लगा कि गुर्जिएफ़ का कार्य धीरे-धीरे धर्म की दिशा में अधिकाधिक झुकता जा रहा था। लेकिन लगभग निश्चित रूप से वास्तविक कारण यह था कि उस्पेन्स्की का मन इतना प्रभावशाली और मौलिक था कि वे लंबे समय तक किसी के ‘शिष्य’ बने नहीं रह सकते थे। साथ ही, गुर्जिएफ़ का रहस्यमय व्यक्तित्व उन्हें अत्यधिक चालाक और पूर्वी (oriental) ढंग का लगता था, जिसे उनका पश्चिमी सोच से ढला हुआ मन पूरी तरह समझ नहीं पाता था। कॉन्स्टेंटिनोपल में दोनों ने अपने-अपने रास्ते चुन लिए। उस्पेन्स्की की पहली पुस्तक ‘टरटियम ऑरगेनम’ (Tertium Organum) का हाल ही में अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ था और वह कुछ हद तक बहुत लोकप्रिय हो गई थी। इसी के कारण लेडी रोदरमेयर ने उस्पेन्स्की को लंदन आने का निमंत्रण दिया था। बेनेट उस्पेन्स्की के विचारों से प्रभावित नहीं हुआ। और जब उसे पता चला कि गुरजिएफ़ कॉन्स्टेंटिनोपल में मौजूद हैं तो उसकी पहली प्रतिक्रिया संदेह की थी। उसे एक सरकारी संदेश मिला था जिसमें चेतावनी दी गई थी कि गुर्जिएफ़ बोल्शेविक एजेंट हैं।

लेकिन गुर्जिएफ़ से पहली मुलाकात ने उसके सारे संदेह दूर कर दिए। उस व्यक्ति की ‘आँखें ऐसी थीं, जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं।’ और यह स्पष्ट था कि उसके पास उन विषयों का अत्यंत व्यापक और सटीक ज्ञान था, जिनके बारे में बेनेट अभी केवल शुरुआती स्तर पर ही जानता था। बेनेट को गुर्जिएफ़ के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत उनके पवित्र ‘मूवमेंट्स’ देखने के लिए आमंत्रित किया गया और वह उनसे गहराई से प्रभावित हुआ। यह आकर्षण जीवन भर बना रहा।

सितंबर 1921 तक, लगभग एक वर्ष तक, गुर्जिएफ़ ने कॉन्स्टेंटिनोपल से अपना संस्थान चलाया। वहाँ उन्होंने कुछ विचित्र ढंग से एक मनोचिकित्सक के रूप में भी काम शुरू कर दिया था। इसी भूमिका में उन्होंने एक युवा यूनानी को नशीली दवाओं की लत और शराब की लत से मुक्त किया। इसके बदले उसे एक ऐसे जहाज़ में आधा हिस्सा मिला, जिसे ब्रिटिश नौसेना ने अपने कब्ज़े में ले लिया था। बेनेट की सहायता से गुर्जिएफ़ उस जहाज़ को छुड़वाने और बेचने में सफल हो गए। उस जहाज़ में उनके हिस्से से उन्हें इतनी धनराशि मिल गई कि उनकी वह पुरानी महत्वाकांक्षा पूरी हो सके, जो कॉन्स्टेंटिनोपल पहुँचने के बाद से उनके मन में थी... अपने संस्थान को यूरोप ले जाना।


लेखक: कॉलिन विल्सन 

[1] Proudhon and Fourier दो 19वीं सदी के प्रसिद्ध फ्रांसीसी सामाजिक विचारक थे, जिनका संबंध समाजवाद और सामाजिक सुधार के शुरुआती विचारों से है। Pierre-Joseph Proudhon (पियेर-जोसेफ़ प्रूधों, 1809–1865) — फ्रांसीसी समाजवादी और अराजकतावादी विचारक। उनकी प्रसिद्ध उक्ति थी: “Property is theft” — “संपत्ति चोरी है।” वे केंद्रीकृत राज्य और निजी संपत्ति की आलोचना करते थे। Charles Fourier (शार्ल फ़ूरिए, 1772–1837) — फ्रांसीसी समाजवादी विचारक और यूटोपियाई समाजवाद (utopian socialism) के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक। उन्होंने ऐसे सामुदायिक समाज की कल्पना की जिसमें लोग अपनी रुचि और स्वाभाविक इच्छाओं के अनुसार काम करें। उनके आदर्श सामुदायिक समूह को फालांस्तेर (phalanstère) कहा जाता था।

 

Thursday, 10 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय तीन: मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग)

 अध्याय तीन: मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग

1909 में गुर्जिएफ़ ने निर्णय लिया कि अब शिक्षक के रूप में अपने नए जीवन की शुरुआत करने का समय आ गया है। अपनी पहली पुस्तक ‘हेरल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में वह इसका कारण बताते हुए कहता है कि उस समय ‘मनुष्यों के बीच एक व्यापक... मनोविकृति’ फैली हुई थी, जिसे ऑकल्टिज़्म या स्पिरिचुअलिज़्म कहा जाता था। उस समय वे ताशकंद में थे, जो अब सोवियत मध्य एशिया का हिस्सा है। वहाँ, मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग की तरह, हर प्रकार के गूढ़वाद और रहस्यवाद के प्रति जबरदस्त उत्सुकता थी। मैडम ब्लावात्स्की और रुडोल्फ़ स्टाइनर के सिद्धांतों में, सीआन्स (मृत आत्माओं से संपर्क करने की कथित बैठकें), मेज़ थपथपाकर आत्माओं से संपर्क करने और आत्मा द्वारा उपचार जैसी बातों में। और इसमें कोई संदेह नहीं कि गुर्जिएफ़ ने सोचा होगा कि वे इन सभी फैशनेबल गूढ़वादियों और रहस्यवादियों से मिलाकर भी अधिक ‘गुप्त ज्ञान’ जानते थे।



बहरहाल, वे स्पिरिचुअलिस्ट और थियोसोफ़िकल मंडलियों में जाने लगे। वे कहते हैं:

‘मेरे जीवन की परिस्थितियाँ इतनी अनुकूल रहीं कि छह महीने के भीतर न केवल मेरा संपर्क इन लोगों की बड़ी संख्या से हो गया बल्कि एक बहुत बड़े समूह में तथाकथित “परलोक की घटनाओं” को उत्पन्न करने का प्रसिद्ध “विशेषज्ञ” और मार्गदर्शक भी मान लिया गया।’

कुछ ही समय में, उनके अनुसार, उन्हें सभी अलौकिक ज्ञान का महान उस्ताद माना जाने लगा। वे अपनी ‘तरकीबें पैदा करने के कौशल’ के बारे में खुलकर बात करते हैं। इसलिए यह काफी संभव है कि उनके द्वारा उत्पन्न किए गए सभी ‘मनोवैज्ञानिक चमत्कार’ वास्तविक नहीं थे। इस समय उनका उद्देश्य ऐसे शिष्यों का एक समूह बनाना था जो स्वयं पर नियंत्रण की शक्ति की वास्तविक खोज में हों न कि उन उन्मादी उत्साही लोगों की तरह, जो उस समय सेंट पीटर्सबर्ग में रासपुतिन[1] के पीछे चल रहे थे। वे बताते हैं कि उनका उद्देश्य था, ‘जो कुछ मैं पहले ही सीख चुका था, उसे लोगों के जीवन में डाल सकूँ।’ अर्थात वे अपने विचारों को प्रयोग में लाकर उनकी परीक्षा करना चाहते थे। वे अपने विद्यार्थियों को ‘गिनी पिग’ अर्थात प्रयोग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्तियों के रूप में देखते थे।

उनकी सफलता जाहिर तौर पर काफी बड़ी थी। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि उन्होंने तीन अलग-अलग शहरों में तीन समूह बना लिए। हालाँकि वे यह नहीं बताते कि वे शहर कौन-से थे। इस समय के गुर्जिएफ़ के बारे में हमें लगभग कुछ भी पता नहीं है। उसके शिष्यों द्वारा लिखे गए किसी भी विवरण की शुरुआत इतनी पुरानी अवधि से नहीं होती। गुर्जिएफ़ स्वयं कहते हैं कि उन्होंने ताशकंद का अपना काम इसलिए समाप्त करने का निर्णय लिया क्योंकि वहाँ के लोग केवल तीन या चार अलग-अलग प्रकारों में आते थे और उन्हें लगा कि वास्तविक सफलता तभी संभव है जब उनके समूहों में मनुष्य के सभी प्रकारों के प्रतिनिधि हों। उनके अनुसार ऐसे कुल अट्ठाईस प्रकार हैं। इसलिए 1912 में उन्होंने रूस जाने का निर्णय लिया।

संभव है कि यह निर्णय 13 सितंबर 1911 को लिए गए एक संकल्प का परिणाम था। ‘हेरल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में वे इसकी ठीक तारीख बताते हैं। उस दिन, उनके अनुसार, उन्होंने अगले इक्कीस वर्षों तक ‘एक प्रकार का कृत्रिम जीवन जीने’ की शपथ ली। ऐसा जीवन जो पहले से तय किए गए एक कार्यक्रम के अनुसार और कुछ निश्चित सिद्धांतों के आधार पर संचालित किया जाना था।

‘कृत्रिम जीवन’ से उनका ठीक-ठीक क्या मतलब था? बेनेट का कहना उचित है कि गुर्जिएफ़ से मिलने वाले अधिकांश लोगों को लगता था कि वे किसी न किसी तरह ‘अपने आपको छिपा रहे हैं।’ जो लोग उन्हें अच्छी तरह जान पाए... जहाँ तक वास्तव में कोई उन्हें कभी पूरी तरह जान पाया, उन्हें लगता था कि वे एक भूमिका निभा रहे हैं और लोगों के प्रति कभी भी सीधे और सहज ढंग से प्रतिक्रिया नहीं देते। लेकिन उस्पेन्स्की जैसे शिष्यों को इस बात में कोई संदेह नहीं था कि इसका कारण यह नहीं था कि गुर्जिएफ़ के पास छिपाने के लिए कुछ था। इसका कारण यह था कि वे मानते थे कि वे अपने शिष्यों के साथ केवल एक वस्तुनिष्ठ ढंग अपनाकर ही कुछ निश्चित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। ठीक वैसे जैसे डॉक्टर अपने रोगी के साथ व्यवहार करता है और उसका उद्देश्य उन पर कुछ निश्चित प्रभाव उत्पन्न करना था। (आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी ऐसा बहुत करते हैं। उदाहरण के लिए, वे अपने प्रयोग के विषय को बता सकते हैं कि वह एक निश्चित प्रतिक्रिया अनुभव करेगा ताकि यह देखा जा सके कि क्या वह स्वयं को विश्वास दिला देता है कि उसे कोई ऐसा उद्दीपन प्राप्त हुआ है जो वास्तव में मौजूद ही नहीं था। ऐसे प्रयोगों में विषय से झूठ बोलना प्रयोग का आवश्यक हिस्सा होता है।) ताशकंद में दो वर्षों तक ‘शिक्षण’ करने के बाद संभव है कि गुर्जिएफ़ को लगा हो कि अब अपने शिष्यों के साथ एक नए प्रकार के संबंध की आवश्यकता है। गुरु और शिष्यों वाला संबंध नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक और उसके सहायकों जैसा संबंध।

अपने समूहों को संगठित करने के अतिरिक्त गुर्जिएफ़ अनेक व्यावसायिक गतिविधियों में भी लगे हुए थे। वे रेलवे और सड़कों की आपूर्ति तथा निर्माण के सरकारी ठेकों, पशुओं के व्यापार (जैसा कि उनके बढ़ई बनने से पहले उनके पिता भी करते थे), तथा दुकानों, रेस्तराँ और सिनेमाघरों के संचालन का उल्लेख करते हैं। वे कालीनों और प्राचीन वस्तुओं का व्यापार भी करते थे। 1912 में उन्होंने अपने विभिन्न व्यवसाय बेच दिए और दस लाख से अधिक रूबल प्राप्त किए। इसके बाद वे मॉस्को चले गए। वहाँ उन्होंने एक संपत्ति खरीदी और ‘मनुष्य के सामंजस्यपूर्ण विकास के संस्थान’ (Institute for the Harmonious Development of Man) की स्थापना की तैयारी शुरू कर दी।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गुर्जिएफ़ दुर्भाग्यशाली थे। उन्होंने ‘गुप्त ज्ञान’ की खोज में पंद्रह वर्ष बिताए थे और उसके बाद अगले तीन वर्ष धन-संपत्ति बनाने में लगाए थे। अब वे अपना संस्थान शुरू करने के लिए तैयार थे। अपनी जीवन-भर की साधना और कार्य को एक संगठित रूप देने के लिए, लेकिन ठीक उसी समय यूरोप अब तक के सबसे विनाशकारी और व्यापक युद्ध में डूबने वाला था। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की कोई जानकारी नहीं थी। बाद में उन्होंने कहा कि उन्होंने रूस को इसलिए चुना था क्योंकि वह ‘शांतिपूर्ण, समृद्ध और शांत’ था। एशिया और अफ्रीका में बिताए उनके वर्षों ने उन्हें आने वाली घटनाओं का कोई संकेत नहीं दिया था।

बेनेट को पूरा विश्वास है कि इन वर्षों में गुर्जिएफ़ का आना-जाना राजदरबार के उच्च वर्गों में था और उनकी मुलाकात ज़ार से भी हुई थी। निस्संदेह, वे ऐसे व्यक्ति थे जो उस समय की रूसी राजनीति पर पूरी तरह सकारात्मक प्रभाव डाल सकते थे। बेनेट का सुझाव है कि उनका संबंध ज़ार के आस-पास के एक उदारवादी दल से था और उन्हें ‘घृणित रासपुतिन के प्रभाव का प्रतिरोध करने वाले व्यक्ति’ के रूप में सामने लाया गया था। यह टिप्पणी उस समय की रूसी राजनीति के बारे में जानकारी की कमी को दर्शाती है। उस समय रासपुतिन का ज़ार पर बहुत कम या लगभग कोई प्रभाव नहीं था, यद्यपि ज़ारिना अब भी उस पर विश्वास करती थी। उसकी शराबखोरी और अनुचित आचरण के कारण उसका प्रभाव पहले ही कम हो चुका था। जहाँ तक रासपुतिन के किसी राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न है, वह उदारवाद और विवेकशीलता की दिशा में था। (1914 में उसने ज़ार को युद्ध में जाने से रोकने के लिए बहुत प्रयास किए थे।) इसलिए गुर्जिएफ़ के ‘प्रतिरोधी प्रभाव’ या ‘counter influence’ के रूप में इस्तेमाल किए जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी, गुर्जिएफ़ राजदरबार के इतना निकट अवश्य थे कि उनकी पहचान ज़ारिना की एक परिचारिका, काउंटेस ओस्ट्रोव्स्का से हुई, जिससे उन्होंने विवाह कर लिया।

अब, अंततः, हमें गुर्जिएफ़ से हुई मुलाकातों के प्रत्यक्ष विवरणों का सहारा लेने का अवसर मिलता है। इनमें सबसे आरंभिक विवरण संभवतः ‘ग्लिमपेसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) नामक एक ‘कहानी’ या निबंध है, जिसे 1914 में गुर्जिएफ़ के मॉस्को स्थित एक शिष्य ने लिखा था (गुर्जिएफ़ के प्रोत्साहन से)। इसमें उस समय का वर्णन है जब गुर्जिएफ़ पहली बार मॉस्को आए थे। अनाम लेखक बताता है कि अपने जीवन के एक दौर में उनकी रुचि गूढ़ विद्याओं में हो गई थी। निस्संदेह, वे क़बाला, टैरो आदि पर पुस्तकें पढ़ रहे थे। उन्होंने इस खोज को ऐसे उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जो विशेष रूप से रूसी प्रतीत होता है। (बर्द्याएव एक घटना सुनाते हैं कि सुबह पाँच बजे एक चर्चा-समूह के एक सदस्य ने कहा, ‘हम अभी सोने नहीं जा सकते। हमने अभी तक यह तय ही नहीं किया कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं।’) उनका एक मित्र, जिसे वे ‘A.’ कहकर संबोधित करते हैं, भी गूढ़ ज्ञान की खोज में उतना ही डूबा हुआ था। फिर अचानक उस मित्र की इस विषय में रुचि जाती हुई प्रतीत हुई। लेखक को यह पता नहीं था कि वह गुर्जिएफ़ से मिल चुका था।

एक दिन लेखक ने मॉस्को के एक समाचार-पत्र में ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन’ (The Struggle of the Magicians) नामक बैले का विज्ञापन देखा। उसके लेखक का नाम जी. आइ. गुर्जिएफ (G. I. Gurdjieff) दिया गया था। जब उसने यह बात A. को बताई तो उसके मित्र ने कुछ अनिच्छा के साथ स्वीकार किया कि वह गुर्जिएफ़ को जानता है और उसने मुलाकात की व्यवस्था करने का प्रयास करने पर सहमति दे दी।

एक रविवार की दोपहर A. ने फोन किया। ‘सात बजे रेलवे स्टेशन पर रहना। हम मिस्टर गुर्जिएफ़ से मिलने जा रहे हैं।’ लेखक को यह असुविधाजनक लगा। उसका कुछ महत्वपूर्ण काम था। लेकिन उसने उस काम को टालने का निश्चय किया और समय पर पहुँच गया। उसका परिचित वहाँ प्रतीक्षा कर रहा था और दोनों एक ऐसी जगह के लिए ट्रेन पर सवार हुए जिसे लेखक ‘मॉस्को के निकट एक ग्रामीण विश्राम-स्थल’ कहता है। रास्ते में A. ने उसे गुर्जिएफ़ के बारे में कुछ बताया कि उन्होंने वर्षों तक पूर्व के देशों में भटकते हुए बिताए थे और अब मॉस्को के निकट एक संस्थान स्थापित करने का निश्चय किया था। इस विवरण में यह गलत बात भी कही गई थी कि गुर्जिएफ़ दो या तीन वर्ष पहले रूस आए थे और सेंट पीटर्सबर्ग में रहते थे। गुर्जिएफ़ ने, हमेशा की तरह, इस गलती को कभी सुधारा नहीं, यद्यपि उन्होंने ‘ग्लिमपेसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) को अपने शिष्यों के बीच प्रसारित होने दिया।

स्टेशन से एक घोड़ागाड़ी, स्लीज उन्हें एक देहाती मकान के फाटक तक ले गई। वे मुख्य द्वार से भीतर गए, भारी परदों से ढँके एक बिल्कुल अँधेरे प्रवेश-कक्ष से गुज़रे और एक ऐसे कमरे में पहुँचे जहाँ एक अधेड़ व्यक्ति नीची गद्दीदार सीट पर बैठा हुक्का पी रहा था।

इन शुरुआती घटनाओं को बताना उपयोगी है क्योंकि जैसा कि हम आगे देखेंगे, भावी शिष्यों से मिलने का यह गुर्जिएफ़ का एक विशिष्ट तरीका था। अचानक फोन करना और कहना, ‘फलाँ जगह पर इतने बजे पहुँचो।’ इसका उद्देश्य केवल लोगों में जिज्ञासा पैदा करना नहीं था बल्कि उन लोगों को छाँटना भी था जिनमें पर्याप्त उत्साह और दृढ़ निश्चय नहीं था।

लेखक के अनुसार गुर्जिएफ़ का चेहरा पूर्वी लोगों जैसा था। ‘विशेष रूप से उसकी आँखों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। अपने आप में इसलिए नहीं बल्कि इसलिए कि वे जिस तरह मुझे देख रहे थे, वह ऐसा नहीं था मानो वे  मुझे पहली बार देख रहे हों बल्कि ऐसा था जैसे वे मुझे बहुत लंबे समय से और बहुत अच्छी तरह जानते हों।’ दीवारें और फर्श दुर्लभ पूर्वी कालीनों से ढँके थे और छत पर सुंदर रेशमी शॉल लटक रहे थे। प्रकाश कमल के फूल जैसी दिखाई देने वाली एक विशाल काँच की गोलाकार रोशनी से आ रहा था। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ ने एक उपयुक्त ‘रहस्यवादी’ वातावरण बनाने की पूरी तैयारी कर रखी थी। लेकिन उनकी बातचीत का स्वर अत्यंत ठोस और व्यावहारिक निकला और यही बात उनसे मिलने वाले अधिकांश ‘साधकों’ को प्रभावित करती थी। वे रूसी भाषा बहुत खराब और हिचकिचाते हुए बोलते थे। (उनकी मातृभाषाएँ यूनानी और अर्मेनियाई थीं)।

गुर्जिएफ़ ने सबसे पहले हर्मेटिक सूत्र ‘एज़ अबव सो बिलो’ (As above, so below)... ‘जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे,’ पर व्याख्यान देना शुरू किया। उन्होंने पहले इसे मनुष्य के जीवन से समझाया, फिर स्वयं पृथ्वी के जीवन से और उसके बाद सौरमंडल की ओर बढ़ गए। उन्होंने ‘लॉ ऑफ थ्री’ (Law of Three), ‘तीन के नियम,’ के बारे में बताया... तीन शक्तियाँ— क्रिया, प्रतिरोध और संतुलन। स्वाभाविक ही है कि इस सारी बात से उस गूढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाले व्यक्ति की साँस कुछ देर के लिए थम-सी गई।

इसके बाद गुर्जिएफ़ ने अपनी मूल ‘ब्रह्मांड-विज्ञान संबंधी’ (मनोवैज्ञानिक नहीं) व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की। चूँकि इस पुस्तक में मेरा अधिक संबंध गुर्जिएफ़ के मनोवैज्ञानिक विचारों से होगा, इसलिए इस समय उनकी ब्रह्मांड-विज्ञान संबंधी अवधारणा का संक्षिप्त परिचय देना सुविधाजनक होगा।

गुर्जिएफ़ के अनुसार ब्रह्मांड एक जीवित जीव है, जिसमें सात स्तर हैं और इनमें सबसे ऊँचा स्तर परम बुद्धि का है। इन स्तरों की कल्पना एक ऐसी सीढ़ी के रूप में की जा सकती है, जिसके माध्यम से ऊर्जा नीचे की ओर संचारित होती है और एक स्तर से दूसरे स्तर पर जाते हुए अपना स्वरूप बदलती जाती है। इस अर्थ में गुर्जिएफ़ की व्यवस्था क़बाला[2] की व्यवस्था जैसी है, जिसकी ‘ट्री लाइफ’ (Tree of Life- जीवन-वृक्ष) को भी एक ऐसी सीढ़ी की तरह देखा जा सकता है, जो नीचे मनुष्य से ऊपर ईश्वर तक पहुँचते हुए घूमती और मुड़ती जाती है। बेशक, ये ‘स्तर’ आध्यात्मिक वास्तविकता के क्षेत्र हैं, भौतिक संसार नहीं। लेकिन ‘जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे’ के नियम के कारण इन्हें भौतिक संसारों के रूप में भी देखा जा सकता है। इसी कारण गुर्जिएफ़ अपने सात स्तरों को ब्रह्मांड के सात अस्तित्वों से जोड़ते हैं: चंद्रमा, पृथ्वी, ग्रह, सूर्य, आकाशगंगा, समस्त संसारों की संपूर्णता और परम सत्ता। चंद्रमा सबसे निचले स्तर पर है और उस स्तर पर रहने वाला कोई भी व्यक्ति कम-से-कम छियानबे नियमों के अधीन होता है। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य केवल अड़तालीस नियमों के अधीन हैं। ग्रह चौबीस नियमों के अधीन हैं। और परम सत्ता केवल एक नियम अपने स्वयं के नियम, के अधीन है। गुर्जिएफ़ इस पूरी व्यवस्था को ‘रे ऑफ क्रीएशन’ (Ray of Creation—सृष्टि की किरण) कहते हैं।

जिन लोगों को यह बात समझ में न आए, उन्हें चिंता न करने की सलाह दी जाती है। इसके बिना भी गुर्जिएफ़ के विचारों का सार समझा जा सकता है। गुर्जिएफ़ के ब्रह्मांड-विज्ञान में उतना ही महत्वपूर्ण एक और विचार है—‘ऑक्टेव’ (सप्तक) के स्वरों का। मूलतः यही वह प्रमुख नियम है जो हमारी मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करता है। हर व्यक्ति ने यह अवश्य देखा होगा कि हम अपने लिए निर्धारित किए गए दीर्घकालीन लक्ष्यों तक बहुत कम पहुँच पाते हैं। हम कोई महत्वपूर्ण संकल्प लेते हैं और दृढ़ निश्चय करते हैं कि उसे पूरा करेंगे। एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए। कुछ समय तक हम अपने लक्ष्य की ओर बिना विचलित हुए सीधी रेखा में आगे बढ़ते रहते हैं। फिर, बिना इसका ध्यान दिए, हम अपनी प्रारंभिक प्रेरणा खो देते हैं और अपनी दिशा को थोड़ा बदल लेते हैं। बाद में फिर अपनी दिशा बदलते हैं। कभी-कभी हम ऐसा इतनी बार करते हैं कि अंततः हम ठीक उसका उलटा करने लगते हैं, जिसे करने के लिए हमने शुरुआत की थी। (उदाहरण के लिए, इससे यह समझाया जा सकता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के इतने सारे योद्धा अंततः दबंग और अत्याचारी क्यों बन जाते हैं।)

गुर्जिएफ़ के अनुसार इसका कारण ‘ऑक्टेव के नियम’ में निहित है। कंपनों (vibrations) की दृष्टि से देखें तो ऑक्टेव में दो स्थान ऐसे हैं जहाँ कंपन अन्य स्थानों की तुलना में ‘कमज़ोर’ होते हैं— Mi और Fa के बीच तथा Ti और Do के बीच। इन स्वरों के बीच पूर्ण स्वरों के बजाय अर्ध-स्वर होते हैं। और जब हमारी ऊर्जाओं की बात आती है, तो ये वही बिंदु हैं जहाँ, यदि हमें जान-बूझकर अतिरिक्त ऊर्जा या बल न दिया जाए तो हमारी दिशा बदल जाती है।

रचनात्मक प्रक्रियाएँ अवरोही ऑक्टेवों पर निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए, इस पुस्तक को लिखते समय मैंने सबसे पहले गुर्जिएफ़ के पूरे चिंतन पर विचार किया और उसे सात अध्यायों में बाँटने की योजना बनाई। यदि मेरे पास ऐसा कोई कंप्यूटर होता जो मेरी पूरी कल्पना को तुरंत शब्दों में बदल सकता तो यह पुस्तक दस मिनट में लिखी जा सकती थी। लेकिन जब उसे सात भागों में बाँट दिया गया, तब मुझे यह तय करना पड़ा कि प्रत्येक भाग में क्या रखना है और क्या छोड़ देना है। यदि इस पुस्तक का अंतिम रूप मेरी मूल कल्पना से कुछ भी मिलता-जुलता हुआ है तो इसका कारण केवल यही होगा कि मैंने ऑक्टेव के नियम को लागू किया और कुछ निश्चित बिंदुओं पर उस प्रारंभिक प्रेरणा को जान-बूझकर फिर से सशक्त किया। अर्थात मैंने काम को बीच में रोका और इस बात पर सावधानीपूर्वक दोबारा विचार किया कि मैं क्या कर रहा था। हर लेखक या कलाकार या संगीतकार, उस प्रक्रिया से भली-भाँति परिचित है जिसका मैं वर्णन कर रहा हूँ। इसीलिए चित्रकार बार-बार पीछे हटकर अपने कैनवास को देखता है, फिर उससे दूर चला जाता है, उस पर रात भर विचार करता है और अगले दिन नए सिरे से उसके पास लौटता है। किसी कलाकृति की रचना एक ही लगातार बिना रुके किए गए प्रयास में नहीं हो सकती। यदि कलाकार इस नियम की उपेक्षा करता है तो उसकी रचना का ‘रीढ़ टूट जाना’ बिल्कुल शाब्दिक अर्थ में हो सकता है। (इसी कारण बाल्ज़ाक के इतने सारे उपन्यास अत्यंत शानदार ढंग से शुरू होते हैं, लेकिन उनका अंत बहुत खराब होता है।)

इन सभी नियमों की रूपरेखा ‘ग्लिमपेसे ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) के लेखक को समझाने के बाद गुर्जिएफ़ बताते हैं कि मनुष्य के शरीर की तुलना तीन मंज़िलों वाली एक फैक्टरी से की जा सकती है। सिर, छाती और पेट। ये तीनों अलग-अलग प्रकार के ‘भोजन’ पर काम करते हैं। पेट को मांस और पेय की आवश्यकता होती है। छाती को हवा की जबकि मस्तिष्क को प्रभावों या अनुभवों (impressions) की आवश्यकता होती है। यह गुर्जिएफ़ की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था कि प्रभाव और अनुभव भी उतने ही ‘भोजन’ हैं जितनी रोटी और इनके बिना हम भूखे रह जाएँगे। संवेदी-वंचना (sensory deprivation) पर किए गए प्रयोगों में, जिनमें व्यक्ति को एक अँधेरे कमरे में रखा जाता है, उनके इस कथन की वास्तविकता सिद्ध हुई है। लेकिन 1912 में ऐसे प्रयोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और इसलिए उनका यह कथन विचित्र और बिना किसी प्रमाण के प्रतीत होता था। यह उन अनेक उदाहरणों में से एक है जो गुर्जिएफ़ की अंतर्दृष्टियों की चौंका देने वाली सटीकता को दर्शाते हैं।गुर्जिएफ़ के अनुसार, ये तीनों प्रकार के ‘भोजन’ अलग-अलग ऑक्टेव से संबंधित हैं।

अंत में उसने नए शिष्य को अपने बैले ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के बारे में कुछ बताया। उन्होंने समझाया कि इसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन करना था, लेकिन इसमें कुछ पवित्र नृत्य भी शामिल थे, जिनके अर्थ ‘तीन के नियम’ और ‘सात के नियम’ से संबंधित थे। (हम पहले ही देख चुके हैं कि गुर्जिएफ़ ने इन नृत्यों और इन नियमों के बारे में सारमंग मठ में कैसे सीखा था।) गुर्जिएफ़ अपने समय की अधिकांश कला के प्रति बहुत कठोर और उपेक्षापूर्ण थे। उनका कहना था कि वह कला पूरी तरह व्यक्तिपरक है। वह केवल व्यक्तिगत कलाकार की न्यूरोसिस का प्रतिबिंब है। वस्तुनिष्ठ कला एक अलग बात है क्योंकि उसका उद्देश्य सभी लोगों तक एक ही सार्वभौमिक अर्थ पहुँचाना होता है।

‘ग्लिम्पसेस ऑफ ट्रुथ’ (Glimpses of Truth) नामक यह ‘कहानी’ इस दृश्य के साथ समाप्त होती है कि A. खिड़की के परदे हटा देता है और पता चलता है कि बाहर दिन निकल चुका है... वास्तव में सुबह के नौ बज चुके हैं। गुर्जिएफ़ उन दोनों को वापस स्टेशन तक ले जाने के लिए एक घोड़ागाड़ी मँगवाते हैं। और यहीं यह अधूरा-सा विवरण समाप्त हो जाता है।

‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के माध्यम से ही पी. डी. उस्पेन्स्की, जो गुर्जिएफ़ के सबसे प्रभावशाली व्याख्याकार और प्रचारकों में से एक बने, उस व्यक्ति से परिचित हुए, जिसके विचारों के प्रति वे अपने शेष जीवन को समर्पित करने वाले थे।

उस्पेन्स्की भी, गुर्जिएफ़ की तरह, ‘गुप्त ज्ञान’ का खोजी थे और 1914 में उसकी खोज में भारत गए थे। वहाँ उनकी मुलाकात कई ऐसे गुरुओं से हुई जिन्होंने उन्हें अपने विद्यालयों में प्रवेश देने की पेशकश की, लेकिन उस्पेन्स्की की भारत में बस जाने की कोई इच्छा नहीं थी। वे मॉस्को लौट आए, जहाँ उन्होंने ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) के बारे में एक सूचना देखी और अपने समाचार-पत्र के लिए उसके बारे में एक प्रतिकूल टिप्पणी लिखी। 1915 के वसंत में उस्पेन्स्की ने सेंट पीटर्सबर्ग के लोगों के सामने ‘गुप्त ज्ञान’ की अपनी खोज के बारे में कई व्याख्यान दिए। वहाँ उनके परिचित बने दो लोगों ने उन्हें उस काकेशस के यूनानी व्यक्ति के बारे में बताया जो ‘द स्ट्रगल ऑफ द मैजिशियन्स’ (The Struggle of the Magicians) का रचयिता था। उस्पेन्स्की प्रभावित नहीं हुए। गुर्जिएफ़ की बातें उन्हें किसी और रहस्यवादी ढोंगी जैसी लगीं। गुर्जिएफ़ से उनकी पहली मुलाकात ने इस धारणा को बदल दिया, लेकिन उन्हें बुरी तरह उलझन में भी डाल दिया। एक पिछली गली के छोटे-से कैफ़े में उनका परिचय गुर्जिएफ़ से कराया गया। वे ‘पूर्वी प्रकार का व्यक्ति था, अब जवान नहीं रहे थे (गुर्जिएफ़ की आयु लगभग चालीस वर्ष थी), जिनकी काली मूँछें और भेदती हुई आँखें थीं। वे मुझे इसलिए चकित कर रहे थे क्योंकि ऐसा लगता था मानो वे भेष बदले हुए हों और उस जगह तथा उसके वातावरण से बिल्कुल मेल न खाते हों।’ गुर्जिएफ़ काकेशस के लहजे में बोलते थे जो किसी रूसी व्यक्ति को वैसा ही सुनाई देता होगा, जैसा किसी अंग्रेज़ को लैंकाशायर का बहुत भारी स्थानीय लहजा सुनाई दे अर्थात ऐसा लहजा, जिसे आम तौर पर गहरी या सूक्ष्म विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जाता।

उन्होंने पूर्वी दर्शन और ‘सत्य की खोज’ के बारे में बातचीत की और उस्पेन्स्की को जल्दी ही यह समझ में आ गया कि गुर्जिएफ़ उन अधिकांश बातों का स्वयं अनुभव कर चुके थे, जिनके बारे में वे बात कर रहे थे। इस बिंदु पर गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की को अपने कुछ शिष्यों की एक बैठक में आने का निमंत्रण दिया। वहाँ जाते समय उन्होंने उस्पेन्स्की को बताया कि जिस मकान में बैठक होने वाली थी, उसे किराये पर लेने में उन्होंने कितना भारी खर्च किया था। उन्होंने यह भी बताया कि मॉस्को के अनेक प्रोफेसर और कलाकार उसके विचारों में रुचि रखते थे। लेकिन जब उस्पेन्स्की ने उनके नाम पूछे तो गुर्जिएफ़ चुप हो गए। वे उस मकान पर पहुँचे और उस्पेन्स्की को यह देखकर कुछ संकोच हुआ कि वह तो स्कूल के अध्यापकों को मिलने वाले साधारण मकान जैसा था और वह भी किराया-मुक्त। गुर्जिएफ़ ने उन्हें अपने भारी खर्च की कहानी क्यों सुनाई थी? ऐसा लगता था मानो गुर्जिएफ़ जान-बूझकर उस्पेन्स्की की पहली धारणा को ही सही साबित करना चाहते हों कि वे किसी तरह का ठग या लोगों को अपने जाल में फँसाने वाला व्यक्ति हैं।

‘शिष्य’ स्कूल के अध्यापक जैसे दिखाई देते थे। उनमें से एक ने ‘Glimpses of Truth’ की पांडुलिपि ऊँचे स्वर में पढ़ी। उस्पेन्स्की को वह उलझी हुई और खराब ढंग से लिखी हुई लगी। उन्होंने पूछा कि गुर्जिएफ़ के शिष्य कौन-सी प्रणाली का अध्ययन कर रहे हैं। उन्हें उत्तर मिला, ‘अपने ऊपर काम करना’ (work on oneself)। लेकिन इसके बारे में और कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके अलावा, गुर्जिएफ़ ने पूछा कि क्या इस कहानी को किसी समाचार-पत्र में छापा जा सकता है। उस्पेन्स्की को कहना पड़ा कि नहीं। यह बहुत लंबी है और इसका न तो ठीक से आरंभ है, न अंत। ऐसा लग रहा था मानो गुर्जिएफ़ अपने व्यक्तिगत प्रचार के लिए उस्पेन्स्की का इस्तेमाल करना चाहते हों।

लेकिन उसी पिछली गली के कैफ़े में हुई बाद की मुलाकातों ने उस्पेन्स्की के मन में यह संदेह बिल्कुल नहीं रहने दिया कि गुर्जिएफ़ के पास वास्तविक ज्ञान था। गुर्जिएफ़ ने उससे दो बातें कहीं, जिन्होंने उन्हें तुरंत प्रभावित किया। पहली यह कि मनुष्य मूलतः एक ‘मशीन’ है, जो केवल अपने वातावरण पर प्रतिक्रिया करता है और दूसरी यह कि हमारा यह सोचना गलत है कि हमारे भीतर कोई एक अहं या कोई एक स्वतंत्र ‘मैं’ (I) है। हमारे भीतर दर्जनों ‘मैं’ हैं, संभवतः हजारों। इसीलिए हमारे लिए निरंतर एक ही ढंग से काम करना या व्यवहार करना इतना कठिन है। एक ‘मैं’ नए वर्ष का संकल्प लेता है, लेकिन कुछ ही घंटों बाद कोई दूसरा ‘मैं’ नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है और उस संकल्प को तोड़ने का निर्णय कर लेता है। यह धरातल से जुड़ी हुई मनोविज्ञान की ऐसी बात थी, जो उस्पेन्स्की के मूलतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बहुत आकर्षित करती थी।

जब गुर्जिएफ़ ने उस्पेन्स्की को बताया कि मॉस्को के उनके शिष्य सालाना एक हजार रूबल फीस देते हैं तो उस्पेन्स्की ने कहा कि यह रकम काफी अधिक लगती है। इस पर गुर्जिएफ़ ने समझाया कि उनके शिष्यों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे जो कुछ प्राप्त करते हैं, उसके लिए भुगतान करें। पहली बात यह कि लोग उस वस्तु का मूल्य नहीं समझते जिसे वे बहुत आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। दूसरी बात यह कि जो व्यक्ति साल में इतनी रकम भी नहीं जुटा सकता, वह संभवतः ‘कार्य’ (the work) में अच्छा नहीं होगा। गुर्जिएफ़ इस बात पर ज़ोर देते थे कि स्वयं को बदलने की शक्ति पैदा करने में सक्षम लोग वे होते हैं जो योग्य और कार्यकुशल होते हैं, न कि वे न्यूरोटिक स्वप्नदर्शी जो केवल कल्पनाओं में जीते हैं।

उनके संबंधों में निर्णायक मोड़ तब आया जब उस्पेन्स्की ने पूछा, ‘क्या मशीन बने रहना बंद करना संभव है?’ गुर्जिएफ़ ने उत्तर दिया, ‘यदि तुमने ऐसे प्रश्न अधिक बार पूछे होते तो शायद हमारी बातचीत कहीं पहुँच सकती थी। मशीन होना बंद करना संभव है, लेकिन इसके लिए सबसे पहले मशीन को जानना आवश्यक है।’

कहा जा सकता है कि आखिरकार उस्पेन्स्की ने सही प्रश्न पूछ लिया था और गुर्जिएफ़ ने सही उत्तर दे दिया था। अब से उस्पेन्स्की पूरी तरह यह सीखने के लिए समर्पित हो गए कि गुर्जिएफ़ उसे क्या सिखाना चाहते थे।

गुर्जिएफ़ ने कहा, मनुष्य एक कारागार में है। यदि उसे वहाँ से भाग निकलने का कोई अवसर प्राप्त करना है तो उसे सबसे पहले यह अनुभव करना होगा कि वह कारागार में है। जब तक वह इस बिंदु तक नहीं पहुँचता, तब तक वह कुछ भी शुरू नहीं कर सकता। इसके बाद प्रश्न उठता है। इससे बाहर कैसे निकला जाए? यहाँ गुर्जिएफ़ ने एक ऐसी बात कही जो उसके पूरे कार्य के केंद्र में है। लोगों के एक समूह के पास अकेले व्यक्ति की तुलना में भाग निकलने का अधिक अच्छा अवसर होता है क्योंकि वे मिलकर एक सुरंग खोद सकते हैं। अकेले व्यक्ति के लिए बाहर निकलने की संभावना बहुत कम होती है। क्योंकि मनुष्य मूलतः सोया हुआ है। वह सोचता है कि उसकी रोज़मर्रा की चेतना ही ‘जाग्रत चेतना’ है। उस अचेतन अवस्था के विपरीत जिसमें वह हर रात चला जाता है। यही शायद उसकी सबसे बड़ी भूल है। वास्तव में, जब हम सुबह जागते हैं तो हम केवल सोई हुई चेतना के ही एक दूसरे रूप में प्रवेश करते हैं। हम केवल परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया करते हैं और वही करते हैं जो कल और उससे पहले के दिन करते आए थे। कुछ चीज़ें हमें ‘जागने’ की क्षणिक झलक दे सकती हैं। अचानक आया कोई संकट, अपने पूरे जीवन-ढंग को बदलने की आवश्यकता का अनुभव, यहाँ तक कि किसी यात्रा या छुट्टी पर निकलना भी। एक माँ जब पहली बार अपने नवजात बच्चे को गोद में उठाती है तो वह एक क्षण के लिए ‘जाग’ सकती है और अचानक उसे यह एहसास हो सकता है कि जिस चेतना को वह अपने जीवन के हर दिन स्वाभाविक मानकर जीती आई है, वह आवश्यक नहीं है। जीवन पूरी तरह अलग हो सकता है, कहीं अधिक रोमांचक और जटिल। संक्षेप में, वह स्वतंत्र है। लेकिन यदि दस मिनट बाद ही वह स्वयं से पूछे, ‘यह स्वतंत्रता क्या है?’ तो वह उसे पहले ही भूल चुकी होती है।

गुर्जिएफ़ के दृष्टिकोण को समझना शायद तब आसान हो जाए, यदि ‘मशीन’ कहने के बजाय हम ‘रोबोट’ शब्द का इस्तेमाल करें। मेरे अचेतन मन में एक रोबोट है, जो मेरे लिए बहुत-से काम करता है। जब मैं टाइप करना, कार चलाना या कोई विदेशी भाषा सीखना शुरू करता हूँ तो मुझे यह सब कठिनाई के साथ और पूरी चेतना से, एक-एक कदम करके सीखना पड़ता है। लेकिन जल्दी ही मेरा ‘रोबोट-वैलेट’ (रोबोट-नौकर) मेरी जगह काम सँभाल लेता है और ‘मैं’ जितनी तेजी और कुशलता से नहीं कर सकता, उससे कहीं अधिक तेजी और कुशलता से टाइप करने या गाड़ी चलाने लगता है। यह रोबोट अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका महत्व आँका नहीं जा सकता। जब मैं बच्चा था, तब वह बहुत कम कुशल था और इसी कारण मैं भद्दा और अनाड़ी था तथा हर काम में मुझे कहीं अधिक प्रयास करना पड़ता था। अब मेरा रोबोट जीवन जीने के अधिकांश कामों का बोझ मेरे कंधों से उठा लेता है।

लेकिन इसमें एक समस्या है। वह केवल वही काम नहीं करता जो मैं चाहता हूँ कि वह करे जैसे, टाइप करना या फ़्रेंच बोलना। वह वे काम भी करता है जिन्हें मैं नहीं चाहता कि वह करे। मुझे संगीत और कविता पसंद है, लेकिन जब मैं किसी सिम्फनी को सुन लेता हूँ या किसी कविता को लगभग दर्जन भर बार पढ़ लेता हूँ तो उसका आधा प्रभाव समाप्त हो जाता है क्योंकि उस समय सुनने वाला ‘मैं’ नहीं बल्कि मेरा रोबोट होता है। यदि मेरा ध्यान किसी दूसरी बात में उलझा हुआ हो तो वह मेरे लिए खाना खा लेता है। यहाँ तक कि वह मेरी पत्नी के साथ प्रेम भी कर सकता है। मैं बहुत-से रोचक और नए अनुभवों से वंचित रह जाता हूँ क्योंकि मैं इस रोबोट पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो गया हूँ।

स्पष्ट है कि गुर्जिएफ़ इसी रोबोट और उसके प्रति हमारी गुलामी की बात कर रहा है। मैं चीज़ों की ‘नवीनता’ का अनुभव करने के लिए इस रोबोट को कुछ समय के लिए निष्क्रिय कर सकता हूँ। एक-दो गिलास शराब रोबोट को ढीला कर देते हैं। मेस्केलिन या एल एस डी (LSD)[3] जैसी मनःप्रभावी (psychedelic) दवाएँ रोबोट को पूरी तरह निष्क्रिय कर देती हैं और इसका परिणाम यह होता है कि नशा करने वाला व्यक्ति वास्तविकता की ऐसी चमक के सामने आ जाता है जो उसे चकाचौंध कर देती है। कोई फूल या पेड़ इतना वास्तविक प्रतीत हो सकता है कि उसका ध्यान उसी पर अटक जाता है और वह अर्थ से फूटता हुआ दिखाई देता है।

समस्या यह है कि ऐसी दवाएँ रोबोट को पूरी तरह निष्क्रिय कर देती हैं और यही वह स्थिति नहीं है जिसकी आवश्यकता है। आखिर हमने रोबोट को विकसित ही इसलिए किया था क्योंकि हम अधिक स्वतंत्रता चाहते थे। उसे पूरी तरह पंगु बना देना बुद्धिमानी नहीं है। वास्तव में, वास्तविक स्वतंत्रता के क्षणों में ‘वास्तविक मैं’ और रोबोट एक पूर्ण सामंजस्य में आ गए प्रतीत होते हैं। विलियम जेम्स कहते हैं कि कोई फुटबॉल खिलाड़ी वर्षों तक शानदार ढंग से खेल सकता है, फिर एक दिन वह अपने भीतर की किसी बाधा को पार कर जाता है और अचानक उससे कोई गलती ही नहीं होती। ऐसा लगता है मानो खेल स्वयं उसे खिला रहा हो। या कोई संगीतकार अचानक यह अनुभव कर सकता है कि वह अपने वाद्य को एक विचित्र पूर्णता के साथ बजा रहा है। ऐसे नियंत्रण के स्तर पर, जिसे उसने इससे पहले कभी हासिल नहीं किया था। वास्तव में, फॉन्टेनब्लो के जंगल में जॉन बेनेट के साथ भी यही हुआ था। सिवाय इसके कि उसका ‘वाद्य’ उसका अपना शरीर और उसका अपना मन था, जो अचानक उसकी इच्छानुसार किसी भी मनोदशा को उत्पन्न कर सकता था। और इस प्रकार की स्वतंत्रता किसी मनःप्रभावी दवा के माध्यम से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए ‘वास्तविक मैं’ और ‘रोबोट’ के बीच सक्रिय सहयोग आवश्यक है। उदाहरण के लिए, हर लेखक जानता है कि थोड़ी-सी शराब उसकी झिझक या मानसिक अवरोधों को दूर कर सकती है और उसे अधिक स्वतंत्रता से लिखने में मदद कर सकती है। तीन या चार गिलास उसे ऐसी गर्म और सुखद अवस्था में पहुँचा सकते हैं जिसमें उसे लगता है कि वह टाइपराइटर पर कोई महान कृति उँडेल सकता है। लेकिन अगली सुबह जब वह पढ़ता है कि उसने क्या लिखा था तो वह बकवास निकलती है। शराब ने उसकी झिझक और मानसिक अवरोध तो दूर कर दिए थे, लेकिन उसने उन आलोचनात्मक नियंत्रणों को भी हटा दिया था जो सही शब्द और सही अभिव्यक्ति का चुनाव करते हैं। शराब उस कठिन परिश्रम का विकल्प नहीं हो सकती जो उस अचानक होने वाली ‘सफल छलाँग’ या ‘break-through’ को जन्म देता है अर्थात आलोचना और प्रेरणा, रोबोट और ‘वास्तविक मैं’ के बीच होने वाला पूर्ण सहयोग।

इस तरह व्यक्त करने पर हम समझना शुरू कर सकते हैं कि गुर्जिएफ़ का लक्ष्य क्या था। हम विलियम जेम्स के ‘second wind’… ‘दूसरी साँस’ की बात कर रहे हैं, उन विचित्र शक्ति-प्रवाहों की, जिनमें हमें लगता है कि हम सामान्य से अधिक जीवंत हो गए हैं। हम इन्हें अपनी इच्छा से उत्पन्न करने की आशा कैसे कर सकते हैं? इसका उत्तर है, कामों को ‘स्वचालित रूप से’ न करके, आँखें केवल बाहरी दुनिया पर टिकाए हुए जीवन में बहते न चले जाकर। पहला कदम है। अंदर की ओर देखना और ‘वास्तविक मैं’ तथा रोबोट के बीच के जटिल संबंध का निरीक्षण करना। यह ध्यान की कोई विधि नहीं है, न रहस्यवाद की, न शारीरिक आत्म-अनुशासन की। यह मुख्यतः ज्ञान प्राप्त करने का एक तरीका है। ऐसा तरीका जो कुछ निश्चित बातों को जानने पर निर्भर करता है।



[1] पूरा नाम ग्रिगोरी रासपुतिन (Grigori Rasputin) था। वे रूसी साम्राज्य के अंतिम दौर के एक प्रसिद्ध रहस्यवादी, धार्मिक साधक और आध्यात्मिक प्रभावशाली व्यक्ति थे। वे ज़ार निकोलस द्वितीय और विशेष रूप से उनकी पत्नी ज़ारिना अलेक्ज़ान्द्रा के निकट पहुँच गए थे।

[2] यहाँ Qabalah (कबाला) यहूदी रहस्यवादी परंपरा है और Tree of Life (जीवन-वृक्ष) उसकी एक प्रमुख प्रतीकात्मक संरचना है।

[3] लाइसरजिक एसिड डायएथाइलामाइड। यह एक शक्तिशाली मनोप्रभावी (psychedelic) पदार्थ है, जो चेतना, धारणा, विचार और संवेदनाओं में गहरे बदलाव पैदा कर सकता है।

 

खलील जिब्रान (Khalil Gibran) की प्रसिद्ध पुस्तक द प्रोफेट (The Prophet) का हिंदी अनुवाद (संपूर्ण पुस्तक)

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