Wednesday, 12 August 2026

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 1 (अध्याय दो)

 

जॉन का जन्मदिन मार्च 1935 में शनिवार के दिन पड़ा था। उस जन्मदिन की सुबह जब उसकी आँख खुली, तो उसे महसूस हुआ कि उसके आस-पास की हवा में कोई अनिष्ट छिपा हुआ है, मानो उसके भीतर कुछ ऐसा घट चुका हो, जिसे अब किसी भी तरह पलटा नहीं जा सकता। वह अपने सिर के ठीक ऊपर छत पर पड़े पीले दाग को घूरता रहा। रॉय अभी भी बिस्तर की चादरों में पूरी तरह दुबका हुआ था और उसकी साँसें धीमी, सीटी जैसी आवाज़ के साथ आ-जा रही थीं। घर में और कहीं कोई आवाज़ नहीं थी। अभी तक कोई भी नहीं जागा था। पड़ोसियों के रेडियो भी खामोश थे और उसकी माँ अभी तक उसके पिता का नाश्ता बनाने के लिए नहीं उठी थी। जॉन को अपनी इस घबराहट पर आश्चर्य हुआ। फिर उसे समय का खयाल आया और तभी जब छत का वह पीला दाग धीरे-धीरे एक नग्न स्त्री के शरीर का रूप लेने लगा। उसे याद आया कि आज उसका चौदहवाँ जन्मदिन है और उसने पाप किया है।

By Carl Van Vechen

            फिर भी उसका पहला विचार था, “क्या किसी को याद रहेगा?” क्योंकि ऐसा एक-दो बार हो चुका था कि उसका जन्मदिन पूरी तरह किसी की नज़र में आए बिना बीत गया था और किसी ने भी यह नहीं कहा था, “जन्मदिन मुबारक हो, जॉनी,” न ही उसे कुछ दिया था। यहाँ तक कि उसकी माँ ने भी नहीं।

रॉय फिर से हिला और जॉन ने उसे अपने से दूर कर दिया तथा सन्नाटे को सुनता रहा। दूसरी सुबहों में जब उसकी आँख खुलती थी तो वह अपनी माँ को रसोई में गाते हुए सुनता था। अपने पीछे वाले कमरे में कपड़े पहनते समय अपने पिता को कराहते और मन-ही-मन प्रार्थनाएँ बुदबुदाते हुए सुनता था। कभी-कभी सारा की बातचीत और रूथ के चीख-चीखकर रोने की आवाज़ भी सुनाई देती थी। रेडियो बज रहे होते, बर्तन और कड़ाहियाँ खड़खड़ा रहे होते और आस-पास के सभी लोगों की आवाज़ें सुनाई देती थीं। लेकिन आज सुबह तो बिस्तर के स्प्रिंग की चरमराहट तक ने इस सन्नाटे को भंग नहीं किया। इसलिए जॉन को ऐसा लग रहा था, मानो वह अपने ही उस अनकहे विनाश को सुन रहा हो। उसे लगभग विश्वास हो चला था कि वह उस महान “उठ खड़े होने वाले दिन” की सुबह देर से जागा है। उसे लगा सभी उद्धार पाए हुए लोग पलक झपकते ही रूपांतरित हो गए हैं और बादलों में यीशु से मिलने के लिए उठ गए हैं। जबकि वह अपने पापी शरीर के साथ पीछे छूट गया है ताकि उसे एक हज़ार वर्षों तक नरक में बाँधकर रखा जाए।

उसने पाप किया था। संतों, अपनी माँ और अपने पिता की मौजूदगी के बावजूद। उन चेतावनियों के बावजूद जिन्हें उसने अपने जीवन की शुरुआत से ही सुना था। उसने अपने हाथों से ऐसा पाप किया था जिसे क्षमा करना कठिन था। स्कूल के शौचालय में अकेले, वह उन लड़कों के बारे में सोच रहा था जो उससे उम्र में बड़े, कद में ऊँचे और अधिक निडर थे और जो आपस में यह शर्त लगाया करते थे कि किसका पेशाब सबसे ऊँची मेहराब बनाते हुए दूर तक जाएगा। वहीं उसने अपने भीतर हो रहे एक ऐसे परिवर्तन को देखा था, जिसके बारे में वह कभी किसी से कहने का हिम्मत नहीं कर सकता था।

जॉन के पाप का अँधेरा शनिवार की शाम को चर्च के भीतर छाए अँधेरे जैसा था। उस सन्नाटे जैसा, जो चर्च में तब होता था जब वह वहाँ अकेला होता था। वह झाड़ू लगाता, बड़े बाल्टी में पानी भरता और कुर्सियों को उलट-पलटकर ठीक करता, उस समय से बहुत पहले, जब संत लोग वहाँ आते थे। यह उस उपासना घर (tabernacle) के भीतर रहते हुए उसके मन में उठने वाले विचारों जैसा था, जिसमें उसका पूरा जीवन बीता था। उस उपासना घर जैसा, जिससे वह घृणा भी करता था। लेकिन प्रेम भी करता था और डरता भी था। यह रॉय की गालियों जैसा था। उन गालियों की वे प्रतिध्वनियाँ जैसी थीं जो जॉन के भीतर उठती थीं। उसे याद आया कि किसी दुर्लभ शनिवार को, जब रॉय जॉन की चर्च साफ करने में मदद करने आया था, तब उसने ईश्वर के घर में ही गालियाँ दी थीं और यीशु की आँखों के सामने अश्लील इशारे किए थे। उसका पाप इन सब चीज़ों जैसा था। उन दीवारों जैसा भी, जो सब कुछ देखती थीं और उन दीवारों पर लगे पोस्टरों जैसा, जो यह गवाही देते थे कि पाप की मज़दूरी मृत्यु है। उसके पाप का अँधेरा उस कठोर हृदयता में था, जिसके कारण वह ईश्वर की शक्ति का प्रतिरोध करता था। उस उपहास में था जो अक्सर उसके भीतर तब उठता था, जब वह उन लोगों की रोती, टूटती हुई आवाज़ें सुनता था और देखता था कि उनकी काली त्वचा पसीने से चमक रही है, जब वे अपने हाथ ऊपर उठाते और प्रभु के सामने मुँह के बल गिर पड़ते थे। क्योंकि उसने अपना निर्णय कर लिया था। वह अपने पिता जैसा नहीं बनेगा, न अपने पिता के पिता जैसा। उसका जीवन अलग होगा।

क्योंकि जॉन पढ़ाई में बहुत अच्छा था, हालाँकि एलिशा की तरह गणित या बास्केटबॉल में नहीं। लोग कहते थे कि उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है। वह अपने लोगों का एक महान नेता बन सकता है। जॉन को अपने लोगों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी और उन्हें कहीं नेतृत्व देकर ले जाने में तो उससे भी कम। लेकिन यह वाक्य, जो वह बार-बार सुनता आया था, उसके मन में एक विशाल पीतल के फाटक की तरह उभरता था, जो उसके लिए बाहर की ओर खुल रहा था। एक ऐसी दुनिया की ओर, जहाँ लोग उसके पिता के घर के अँधेरे में नहीं रहते थेजहाँ उसके पिता के चर्च के अँधेरे में यीशु से प्रार्थना नहीं करते थेजहाँ वह अच्छा खाना खाता, बढ़िया कपड़े पहनता और जितनी बार चाहता, सिनेमा देखने जाता। उस दुनिया में जॉन, जिसे उसके पिता बदसूरत कहते थे, जो अपनी कक्षा में हमेशा सबसे छोटा लड़का होता था और जिसका कोई दोस्त नहीं था अचानक सुंदर, लंबा और लोकप्रिय हो जाता था। लोग जॉन ग्राइम्स से मिलने के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़कर आतुर हो जाते थे। वह कवि होता या किसी कॉलेज का अध्यक्ष या फिल्मी सितारा। वह महँगी व्हिस्की पीता और हरे पैकेट वाली लकी स्ट्राइक सिगरेट पीता।

जॉन की प्रशंसा केवल अश्वेत लोग ही नहीं करते थे क्योंकि जॉन को लगता था कि वे किसी भी हालत में उसे वास्तव में जान नहीं सकते। बल्कि श्वेत लोग भी ऐसा कहते थे... बल्कि सबसे पहले उन्होंने ही यह बात कही थी और अब भी कहते थे। जब जॉन पाँच साल का था और पहली कक्षा में पढ़ता था, तभी पहली बार किसी की नज़र उस पर पड़ी थी। चूँकि जिस नज़र ने उसे देखा था, वह पूरी तरह अपरिचित और निर्वैयक्तिक थी। इसलिए पहली बार उसे बेचैनी के साथ अपने अलग, स्वतंत्र अस्तित्व का एहसास होने लगा।

उस दिन वे वर्णमाला सीख रहे थे। एक बार में छह बच्चों को ब्लैकबोर्ड के पास भेजा जाता था ताकि बच्चे वे अक्षर लिखें जिन्हें उन्होंने याद किया था। छह बच्चे लिख चुके थे और अध्यापक के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे कि तभी पीछे का दरवाज़ा खुला और स्कूल की प्रधानाचार्य कमरे में दाखिल हुई। उससे हर कोई बहुत डरता था। कोई भी कुछ नहीं बोला, न ही कोई हिला। उस सन्नाटे में प्रधानाचार्य की आवाज़ गूँजी:

वह बच्चा कौन है?”

वह ब्लैकबोर्ड पर लिखे जॉन के अक्षरों की ओर इशारा कर रही थी। उसके द्वारा ध्यान दिए जाने को कोई विशेष सम्मान या पहचान मिलने की संभावना जॉन के मन में आई ही नहीं। इसलिए वह बस उसे घूरता रहा। फिर उसने दूसरे बच्चों की स्थिरता और इस बात से समझ लिया कि वे उसकी ओर देखने से बच रहे थे कि चुना तो उसी को गया है, सज़ा देने के लिए।

बोलो, जॉन,” अध्यापिका ने धीरे से कहा।

उसकी आँखों में आँसू आने ही वाले थे। उसने धीमी आवाज़ में अपना नाम बुदबुदाया और प्रतीक्षा करने लगा। सफेद बालों और लोहे जैसी कठोर मुखाकृति वाली प्रधानाचार्या ने नीचे झुककर उसकी ओर देखा।

तुम बहुत होशियार लड़के हो, जॉन ग्राइम्स,” उसने कहा। “अच्छा काम करते रहो।”

फिर वह कमरे से बाहर चली गई।

उस पल ने उस समय से आगे के लिए उसे, यदि हथियार नहीं तो कम-से-कम एक ढाल अवश्य दे दी थी। उसे पूरी तरह बिना किसी विश्वास या समझ के यह एहसास हो गया था कि उसके भीतर एक ऐसी शक्ति है जो दूसरे लोगों में नहीं है। वह इस शक्ति का उपयोग स्वयं को बचाने और स्वयं को ऊपर उठाने के लिए कर सकता है। शायद इसी शक्ति के बल पर एक दिन वह वह प्रेम पा सकेगा, जिसकी उसे इतने लंबे समय से तीव्र लालसा थी। जॉन के भीतर यह कोई ऐसी आस्था नहीं थी जो मृत्यु या परिवर्तन के अधीन हो सकती थी, न ही ऐसी आशा थी जिसे नष्ट किया जा सके। यह उसकी पहचान थी और इसलिए उस दुष्टता का भी एक हिस्सा थी, जिसके कारण उसका पिता उसे पीटता था और जिसे वह अपने पिता का सामना करने के लिए अपने भीतर थामे रहता था। उसके पिता की बाँह ऊपर उठती और फिर नीचे आती तो जॉन रो पड़ता। उसके पिता की आवाज़ उसे काँपने पर मजबूर कर देती। फिर भी उसका पिता कभी पूरी तरह विजयी नहीं हो सकता था क्योंकि जॉन अपने भीतर ऐसी कोई चीज़ सँजोए हुए था, जिस तक उसका पिता पहुँच नहीं सकता था। वह अपने भीतर अपनी घृणा और अपनी बुद्धि को सँजोए हुए था। दोनों एक-दूसरे को पोषित करती थीं। वह उस दिन के लिए जी रहा था जब उसका पिता मृत्युशय्या पर पड़ा होगा और वहजॉन, उसकी मृत्युशय्या के पास खड़े होकर उसे गालियाँ देगा। और यही कारण था कि यद्यपि उसका जन्म इसी आस्था में हुआ था, यद्यपि उसका पूरा जीवन संतों, उनकी प्रार्थनाओं और उनके उल्लास से घिरा रहा था, और यद्यपि वह उपासना घर, जिसमें वे उपासना करते थे, उन अस्थिर और असुरक्षित घरों की अपेक्षा उसके लिए कहीं अधिक वास्तविक था, जिनमें वह और उसका परिवार जीवन भर रहे थे। फिर भी जॉन का हृदय प्रभु के प्रति कठोर हो गया था। उसका पिता ईश्वर का सेवक था। स्वर्ग के राजा का दूत था। जॉन अनुग्रह के सिंहासन के सामने तब तक झुक नहीं सकता था, जब तक कि उसे पहले अपने पिता के सामने घुटने न टेकने पड़ें। और ऐसा करने से उसका इनकार ही उसके जीवन का आधार बन गया था। उसके गुप्त हृदय में यह दुष्टता फलती-फूलती रही, जब तक कि वह दिन नहीं आया, जब उसका पाप पहली बार उसके सामने आ खड़ा हुआ।

 

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