Tuesday, 7 July 2026

दासों के संदर्भ में -- पत्र 47

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे उन लोगों से यह जानकर प्रसन्नता हुई जो आपके साथ रह चुके हैं। आप अपने दासों के साथ आत्मीय और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। यह आपके विवेक और शिक्षा के अनुरूप ही है। “वे दास हैं।” नहीं, वे मनुष्य हैं। “वे दास हैं।” नहीं, वे आपके घर के सहचर हैं। “वे दास हैं।” नहीं, वे निम्न जन्म वाले मित्र हैं। “वे दास हैं।” बल्कि वे आपके सह-दास हैं। यदि आप यह ध्यान रखें कि भाग्य का प्रभाव आप पर भी उतना ही पड़ता है जितना उन पर।


By Liu Kang

    इसी कारण मैं उन लोगों पर हँसता हूँ जो यह समझते हैं कि अपने दासों के साथ भोजन करना उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। क्यों? इसका केवल एक ही कारण है—अहंकार की वह परंपरा, जिसमें स्वामी भोजन करता है और उसके चारों ओर दासों की भीड़ खड़ी रहती है। वह अपनी क्षमता से अधिक खाता है। अत्यधिक लालच उसके फूले हुए पेट पर बोझ डाल देता है। ऐसे पेट पर जो अपने वास्तविक कार्य को ही भूल चुका है। सिर्फ इसलिए कि वह भोजन करने की अपेक्षा उसे उल्टी करने में अधिक परिश्रम कर सके। उधर बेचारे दासों को बोलने के लिए अपने होंठ तक हिलाने की अनुमति नहीं होती। उनकी हर फुसफुसाहट को भी छड़ी के भय से रोक दिया जाता है। न छींक, न अनायास खाँसी, न ही हिचकी। कुछ भी दंड से मुक्त नहीं होता। यदि मौन किसी भी आवाज़ से टूट जाए तो उन्हें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वे पूरी रात भूखे और मौन खड़े रहते हैं।

    परिणाम यह होता है कि वही दास जो अपने स्वामी की उपस्थिति में बोल नहीं सकते, उसके बारे में दूसरों से बातें करने को तत्पर रहते हैं। लेकिन प्राचीन समय में, जब दास न केवल अपने स्वामी के सामने बोलते थे बल्कि उससे बातचीत भी करते थे, तब उनके होंठ सिले हुए नहीं थे। फिर भी वे उसके लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार रहते थे और उस पर आने वाले संकटों को स्वयं अपने ऊपर लेने का साहस रखते थे। वे भोज-समारोहों में खुलकर बोलते थे परंतु यातना के समय मौन रहते थे। बाद में, इसी अहंकार से प्रेरित होकर यह कहावत प्रचलित हुई—'अपने दासों की गिनती करो, तो अपने शत्रुओं की गिनती करोगे।' वास्तव में वे केवल दास होने के कारण हमारे शत्रु नहीं होते। हम स्वयं अपने व्यवहार से उन्हें शत्रु बना देते हैं।

    मैं उन सभी क्रूर और अमानवीय व्यवहारों की सूची भी नहीं बना सकता जो बोझ ढोने वाले पशुओं के साथ भी नहीं किए जाने चाहिए। मनुष्यों की तो बात ही अलग है। जब स्वामी भोजन के समय आराम से सोफे पर लेटा होता है तब एक दास उसके थूक के ढेरों को साफ कर रहा होता है। दूसरा मेज़ या सोफे के नीचे रेंग-रेंगकर उन टुकड़ों को बटोर रहा होता है जो नशे में धुत्त लोगों ने नीचे गिरा दिए हैं। तीसरा महँगे पक्षियों का मांस काट रहा होता है। उसका प्रशिक्षित हाथ बड़ी कुशलता से सीने और जाँघ के हिस्सों को सुंदर टुकड़ों में अलग करता है। कितना अभागा है वह जिसका जीवन केवल मुर्गे या पक्षी को ठीक ढंग से काटने की कला तक सीमित है! हालाँकि उससे भी अधिक अभागा वह व्यक्ति है जो उसे यह कला सिखाता है। पहला इसलिए सीखता है क्योंकि वह विवश है। दूसरा केवल अपने विलास और मनोरंजन के लिए उसे सिखाता है।

    एक अन्य दास मदिरा परोसने वाला है। उसे स्त्री की भाँति सजाया-सँवारा जाता है और वह अपनी बढ़ती आयु से संघर्ष कर रहा होता है। उसे बचपन से निकलने नहीं दिया जाता बल्कि बार-बार उसी अवस्था में लौटने के लिए बाध्य किया जाता है। उसकी चाल-ढाल किसी सैनिक जैसी हो चुकी है फिर भी उसके गाल चिकने रखे जाते हैं। शरीर के प्रत्येक बाल को या तो मुंडवा दिया जाता है या उखाड़ दिया जाता है। वह पूरी रात सेवा में लगा रहता है। उसकी पहली ड्यूटी अपने स्वामी के मद्यपान की सेवा करना है और दूसरी उसकी काम-वासना की पूर्ति करना। भोज-सभा में वह केवल एक लड़का माना जाता है पर शयनकक्ष में उसे पुरुष बना दिया जाता है।

    एक अन्य दास का काम अतिथियों का मूल्यांकन करना है। उसका दुर्भाग्यपूर्ण दायित्व है कि वह खड़ा होकर यह देखे कि कौन अतिथि चापलूस है, कौन अपने पेटू स्वभाव पर नियंत्रण नहीं रख सकता और कौन अपनी ज़बान पर लगाम नहीं रखता। ऐसे ही लोगों को अगले दिन फिर निमंत्रण दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी होते हैं जो भोजन-संबंधी रुचियों के निर्णायक होते हैं। उन्हें अपने स्वामी की पसंद-नापसंद का अत्यंत सूक्ष्म ज्ञान होता है— कौन-सा भोजन उसकी जिह्वा को उत्तेजित करता है, कौन-सा उसकी आँखों को अच्छा लगता है, कौन-सी नई वस्तु उसे आकर्षित कर सकती है, यहाँ तक कि तब भी जब उसका मन उचट रहा हो, कौन-सी चीज़ वह बार-बार परोसे जाने के कारण नापसंद करने लगा है और किसी विशेष दिन उसे किस भोजन की इच्छा है। इन्हीं लोगों के साथ वह भोजन करना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता है। वह यह मानता है कि अपने ही दास के साथ एक ही मेज़ पर बैठना उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। हे भगवान, कैसी विचित्र सोच है!

    फिर भी, उन्हीं दासों में उसके कितने सच्चे मित्र हो सकते हैं! एक बार मैंने कैलिस्टस (Callistus) के द्वार पर एक विचित्र दृश्य देखा। स्वयं कैलिस्टस का पूर्व स्वामी वहाँ प्रवेश पाने की प्रतीक्षा में खड़ा था। जिस व्यक्ति ने कभी उसे बेच दिया था जिसने उसे पुराने और निकम्मे दासों के साथ नीलामी में चढ़ा दिया था, वही अब भीतर प्रवेश तक नहीं पा सकता था जबकि अन्य लोगों को अनुमति मिल रही थी। यह उस दास की ओर से मिला हुआ प्रतिदान था जिसे उसने नीलामी की पहली खेप में डाल दिया था। उन दासों के साथ जिन्हें नीलामीकर्ता केवल बोली लगाने वालों को उत्साहित करने के लिए पहले प्रस्तुत करता है। भाग्य का चक्र घूम चुका था। अब बारी कैलिस्टस की थी कि वह उसे प्रवेश से वंचित करे। अब कैलिस्टस ही यह निर्णय कर रहा था कि वह व्यक्ति उसकी देहरी पार करने योग्य नहीं है। जिस स्वामी ने कभी कैलिस्टस को बेच दिया था, अब वही अपने कर्मों की कीमत चुका रहा था। कैलिस्टस को उसने बेचा था। अब कैलिस्टस उससे उसका मूल्य वसूल रहा था।

    यदि आप चाहें तो इस बात पर विचार कीजिए। जिस व्यक्ति को आप अपना दास कहते हैं, वह भी उसी प्रकार जन्मा है जैसे आप। वह भी उसी आकाश के नीचे रहता है। वह भी आपकी ही तरह साँस लेता है, जीता है और मरता है। यह पूरी तरह संभव है कि आप उसे एक दिन स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखें और उतना ही संभव है कि वह आपको दासता में पड़ा हुआ देखे। ट्यूटोबर्ग अरण्य युद्ध (Battle of the Teutoburg Forest) के समय, जब वरुस की सेना का विनाश हुआ था तब अनेक उच्च कुलों के प्रतिष्ठित व्यक्ति पतन का शिकार हो गए थे। वे लोग जो सैनिक सेवा के बाद सीनेटर बनने की आशा रखते थे, भाग्य के एक ही झटके में गिरा दिए गए। किसी को भाग्य ने चरवाहा बना दिया तो किसी को एक झोपड़ी का रखवाला। अब जाइए और उपहास कीजिए! जिन लोगों को आप तुच्छ समझते हैं, उनकी जैसी परिस्थितियाँ किसी भी समय आपके जीवन में भी आ सकती हैं। भाग्य का चक्र निरंतर घूमता रहता है और किसी के लिए भी स्थायी रूप से एक-सा नहीं रहता।

    मैं दासों के साथ व्यवहार के विषय में कोई लंबा भाषण देना नहीं चाहता। निस्संदेह, हम उनके प्रति अत्यंत घमंडी, कठोर और अपमानजनक व्यवहार करते हैं। पर मेरी सारी शिक्षा का सार केवल इतना है, अपने से निम्न स्थिति वाले व्यक्ति के साथ उसी प्रकार व्यवहार करो, जैसा तुम चाहते हो कि तुमसे उच्च स्थिति वाला व्यक्ति तुम्हारे साथ करे। जब भी तुम्हें यह स्मरण हो कि तुम्हारे पास अपने दास पर कितना अधिकार है, उसी समय यह भी याद रखो कि तुम्हारे स्वामी के पास तुम पर भी उतना ही अधिकार है। “लेकिन मेरा तो कोई स्वामी नहीं है,” तुम कहोगे। तुम अभी युवा हो। संभव है कि एक दिन तुम्हारा भी कोई स्वामी हो जाए। क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि हेकुबा कितनी आयु में दासी बनी थी? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि क्रोएसस की आयु कितनी थी? दारायस की माता की? प्लेटो की? और डायोजनीज़ की? 

    अपने दास के साथ दयालुता और मित्रतापूर्ण व्यवहार करो। उसे अपनी बातचीत में, अपनी योजनाओं में और अपने भोजन में भी सहभागी बनाओ। इस पर विलासप्रिय लोगों का पूरा वर्ग मेरे विरुद्ध चिल्लाने लगेगा। “इससे अधिक अपमानजनक और तुच्छ बात कुछ नहीं हो सकती! इससे बढ़कर लज्जाजनक क्या होगा!” किन्तु मैं इन्हीं लोगों को दूसरों के दासों के हाथ चूमते हुए पकड़ सकता हूँ।

    क्या तुम लोगों को यह ज्ञात नहीं कि हमारे पूर्वजों ने स्वामियों के प्रति उत्पन्न होने वाले वैमनस्य और दासों पर होने वाले अत्याचार को समाप्त करने के लिए क्या किया था? वे स्वामी को  'गृह-पिता' और दासों को 'गृह-परिवार के सदस्य' कहा करते थे। एक ऐसा संबोधन जो आज भी रंगमंचीय प्रहसनों में प्रचलित है। उन्होंने एक ऐसा उत्सव-दिवस निर्धारित किया था जिस दिन स्वामी अपने दासों के साथ भोजन करते थे। इसका अर्थ यह नहीं था कि वे केवल उसी दिन ऐसा करते थे बल्कि उस दिन विशेष रूप से ऐसा करना एक स्थापित परंपरा थी। उन्होंने दासों को घर के भीतर पद धारण करने और निर्णय देने का अधिकार भी प्रदान किया था क्योंकि वे घर को एक लघु राज्य के समान मानते थे।

    “तुम क्या कह रहे हो? क्या मैं अपने सभी दासों को अपनी मेज़ पर स्थान दूँ?” नहीं, उतना ही नहीं जितना तुम सभी स्वतंत्र व्यक्तियों को भी अपनी मेज़ पर स्थान नहीं देते। लेकिन यदि तुम यह सोचते हो कि मैं कुछ लोगों को केवल इसलिए बाहर रखना चाहता हूँ क्योंकि उनका काम कम सम्मानजनक या कम स्वच्छ है— जैसे अस्तबल का कर्मचारी या गायों की देखभाल करने वाला तो तुम गलत हो। मैं उनका मूल्यांकन उनके काम के आधार पर नहीं बल्कि उनके चरित्र के आधार पर करूँगा। काम तो संयोगवश मिलते हैं पर चरित्र वह चीज़ है जिसे प्रत्येक व्यक्ति स्वयं गढ़ता है। कुछ लोगों को अपने साथ भोजन करने दो क्योंकि वे उस सम्मान के योग्य हैं और कुछ को इसलिए कि वे उस सम्मान के योग्य बन सकें। यदि उनमें कोई दासोचित या हीन प्रवृत्ति है जो निम्न वातावरण में जीवन बिताने के कारण उत्पन्न हुई है तो सम्मानित और सद्गुणी लोगों के साथ भोजन करना उसे दूर कर देगा।

    मेरे प्रिय लूसीलियस, तुम्हें मित्रों की खोज केवल सभा-स्थलों या सीनेट भवन में ही करने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम ध्यानपूर्वक देखोगे तो अपने ही घर में भी उन्हें पा सकते हो। अच्छी सामग्री अक्सर केवल इसलिए व्यर्थ चली जाती है क्योंकि उसे कोई कुशल शिल्पकार नहीं मिलता। उन्हें परखो, तब तुम स्वयं देखोगे। जिस प्रकार कोई व्यक्ति घोड़ा खरीदते समय केवल उसकी जीन और लगाम देखकर, स्वयं घोड़े की जाँच किए बिना निर्णय करे तो वह मूर्ख कहलाएगा। उसी प्रकार किसी मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसके वस्त्रों और सामाजिक स्थिति के आधार पर करना भी अत्यंत मूर्खता है। क्योंकि सामाजिक स्थिति तो केवल एक और वस्त्र है जो हमारे ऊपर ओढ़ा हुआ है।

    “वह दास है।” पर संभव है कि उसका मन स्वतंत्र हो। “वह दास है।” तो क्या इससे उसकी योग्यता या संभावना कम हो जाती है? मुझे बताओ, ऐसा कौन है जो दास नहीं है? कोई व्यक्ति वासना का दास है, दूसरा लोभ का, तीसरा महत्त्वाकांक्षा का और सभी आशा के दास हैं। सभी भय के दास हैं। मैं तुम्हें एक ऐसे पूर्व कौंसुल (अधिकारी) को दिखा सकता हूँ जो एक वृद्धा स्त्री का दास बना हुआ है। एक धनी व्यक्ति को दिखा सकता हूँ जो अपनी दासी कन्या का दास है। मैं तुम्हें श्रेष्ठ कुलों के ऐसे युवकों को भी दिखा सकता हूँ जो रंगमंच के नर्तकों के अधीन बने हुए हैं। स्वेच्छा से स्वीकार की गई दासता से अधिक लज्जाजनक कोई दासता नहीं होती।

    अतः तुम्हें उन घमंडी लोगों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। अपने दासों के प्रति प्रसन्नचित्त और सौम्य व्यवहार रखो। उनसे ऊँचे पद पर रहते हुए भी अहंकारी मत बनो। ऐसा प्रयास करो कि वे तुमसे भय न करें बल्कि तुम्हारा सम्मान करें। इस पर कोई कहेगा कि मैं दासों की मुक्ति का समर्थन कर रहा हूँ और स्वामियों को उनके उच्च पद से नीचे उतारना चाहता हूँ, केवल इसलिए कि मैंने कहा है, “वे तुमसे भय न करें बल्कि तुम्हारा सम्मान करें।” वह कहेगा, “क्या बात है! क्या वे तुम्हारा सम्मान उसी प्रकार करें जैसे आश्रित लोग या सुबह अभिवादन करने वाले आगंतुक करते हैं?” जो व्यक्ति ऐसा कहता है, वह यह भूल जाता है कि जो बात एक देवता के लिए पर्याप्त है, वह दास-स्वामियों के लिए अपर्याप्त नहीं हो सकती। जिस व्यक्ति का सम्मान किया जाता है, उससे प्रेम भी किया जाता है। प्रेम तथा भय कभी साथ-साथ नहीं रह सकते। इसलिए मेरा विचार है कि तुम सही कर रहे हो, यदि तुम अपने दासों से भय उत्पन्न नहीं करना चाहते और उन्हें केवल शब्दों के द्वारा ही सुधारते हो। चाबुक तो उन पशुओं को प्रशिक्षित करने के लिए होते हैं जो बोल नहीं सकते।

    जो कुछ हमें अप्रिय या अपमानजनक लगता है, वह आवश्यक नहीं कि वास्तव में हमारे लिए हानिकारक भी हो। हमारी विलासप्रिय आदतें ही हमें उन्मत्त बना देती हैं; जो भी बात हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होती, उसी पर हम क्रोधित हो उठते हैं। हम ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हम स्वयं राजा हों। राजा भी अक्सर अपनी शक्ति और दूसरों की दुर्बलता को भूल जाते हैं। इस कारण क्रोधित हो उठते हैं, मानो उन्हें कोई क्षति पहुँची हो जबकि अपनी विशाल सत्ता और भाग्य के कारण वे वास्तव में ऐसी क्षति से सुरक्षित रहते हैं। वे इस तथ्य को भली-भाँति जानते भी हैं फिर भी अपनी तुच्छ मानसिकता के कारण दूसरों को हानि पहुँचाने का अवसर खोजते रहते हैं। वे स्वयं को पीड़ित मान लेते हैं ताकि दूसरों के साथ अन्याय कर सकें।

    मैं तुम्हें अधिक देर तक नहीं रोकना चाहता क्योंकि तुम्हें किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है। उत्तम चरित्र की एक विशेषता यह है कि वह स्वयं में संतुष्ट रहता है और इसलिए स्थिर बना रहता है। दुष्ट चरित्र चंचल होता है। वह बार-बार बदलता है परंतु बेहतर बनने के लिए नहीं बल्कि केवल परिवर्तन के लिए बदलता रहता है।


अभी के लिए विदा 

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