प्रिय लूसीलियस
आपकी पुस्तक वचनानुसार पहुँच गई। मैंने उसे यह सोचकर खोला कि बाद में अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ूँगा और उस समय केवल थोड़ा-सा स्वाद लेने के उद्देश्य से उसे देखूँगा। परंतु स्वयं उस कृति ने मुझे आगे पढ़ते रहने के लिए आकर्षित कर लिया। वह कितनी प्रभावशाली और वाग्मिता से परिपूर्ण थी, इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि उसका आकार-प्रकार प्रथम दृष्टि में लिवी या एपिक्यूरस की रचनाओं जैसा विशाल प्रतीत होता है न कि आपकी या मेरी रचनाओं जैसा। फिर भी उसमें ऐसी मधुरता थी कि उसने मुझे बाँधे रखा और आगे बढ़ाती रही। परिणामस्वरूप मैंने उसे बिना किसी विलंब के पूरा पढ़ डाला। सूर्य का प्रकाश मुझे बाहर बुला रहा था। भूख सताने लगी थी। तूफ़ान का भय भी था फिर भी मैं उसे अंत तक पढ़ता रहा। उसने मुझे केवल आनंद ही नहीं दिया बल्कि हर्ष और प्रसन्नता से भी भर दिया।
इस रचना में कैसी प्रतिभा और कैसी ऊर्जस्विता दिखाई देती है! मैं इसे 'प्रभावशाली' कहता, यदि इसमें कहीं-कहीं शांत और विश्रामपूर्ण अंश भी होते, यदि इसका उत्कर्ष केवल बीच-बीच में प्रकट होता। परंतु यहाँ तो प्रभाव क्षणिक नहीं बल्कि निरंतर बना रहता है। इसकी शैली पुरुषोचित, संयत और शुद्ध है। फिर भी समय-समय पर उसमें मधुरता का ऐसा स्वर उभर आता है जो बिल्कुल उपयुक्त और कोमल प्रतीत होता है। आप ऊँचे और सीधे खड़े हैं। मैं चाहता हूँ कि आप ऐसे ही बने रहें। आपको इसी प्रकार आगे बढ़ना चाहिए। विषय-वस्तु ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। इसी कारण व्यक्ति को ऐसा उर्वर और समृद्ध विषय चुनना चाहिए जो उसकी प्रतिभा को प्रेरित करे और उसे पूरी तरह सक्रिय बनाए रखे।
मैं इस पुस्तक के बारे में दूसरी बार पढ़ लेने के बाद और अधिक लिखूँगा। इस समय मेरा निर्णय अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। ऐसा लगता है मानो मैंने इन बातों को पढ़ा नहीं बल्कि सुना हो। मुझे कुछ प्रश्न पूछने की भी अनुमति दीजिए। आपको किसी बात का भय नहीं होना चाहिए। मैं आपको सत्य ही बताऊँगा। आप सचमुच भाग्यशाली हैं! आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को आपसे झूठ बोलने का कारण दे, चाहे वह व्यक्ति आपसे इतनी दूर ही क्यों न हो। हाँ, एक बात अवश्य है। आजकल लोग बिना किसी कारण के भी, केवल आदतवश, झूठ बोलने लगते हैं।
अभी के लिए विराम
विदा
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