Friday, 27 January 2017

वरशिप हैंड्स

कभी-कभी बहुत उट-पटांग सोच दिमाग़ में दस्तक़ देती है और मैं थोड़ा अस्थिर हो जाती हूँ। किसी रिश्तेदार का घर में आना होता तब, ले देकर बात मेरे सफ़ेद होते बालों और शादी पर आ टिकती है। मुझे बड़ा मज़ा आता है इस तरह के लोगों की परेशानियों को देखकर। कितना परेशान होते हैं लोग दूसरों की बेटियों के लिए। यह बहुत दिलचस्प है कि वे कहते सिर्फ अपने दिखावटीपन के लिए ही हैं। कुछ लोग (औरतें भी) और भी बेमिसाल होते हैं। सबसे मज़ेदार वो अंटी जी, जो मुझे सोलह सोमवार का व्रत करने की मुफ़्त सलाह दे गईं। उनके अनुसार 'सोलह सोमवर उपवास करोगी तो तुम्हें महादेव जैसा पति मिलेगा।' मुझे यह नहीं मालूम कि उन्हों ने यही सलाह किसी लड़के को भी दी है कि नहीं। अगर वह भी सोलह शुक्रवार और सोमवार उपवास करेगा तो उसे पार्वती जैसी पत्नी मिलेगी या दुख ख़त्म हो जाएंगे।

    तीज त्योहाओं पर औरतों (अधिकतर)के भूखे रहने के चलन का मैंने एक अरसे तक बहुत अधिक सम्मान किया। लेकिन जब बात मुझ पर आई तो मैंने मन में इस सम्मान ही हवाइयाँ ही उड़ा दीं। मुझे लगता है कि मैं खुश किस्मत हूँ जो मुझ पर व्रत रखने उर्फ़ भूखे रहने का पारिवारिक और सांस्कृतिक दबाव नहीं डाला जाता। उल्टा मेरी माँ मेरी शारीरिक कमजोरी को देखते हुए व्रत रखने से पहले ही मना कर देती हैं। ख़ैर, मुझे सोलह सोमवार या शुक्रवार करने की तनिक भी इच्छा नहीं है।

    इस धार्मिकता का पेंच बहुत गहरा है और हमारी परवरिश के साथ-साथ समाजीकरण (धार्मिकीकरण और संस्कृतिकरण विशेष) की प्रक्रिया के चलते हमारे खून में भी बह रहा है। आसान नहीं इससे बाहर निकलना। मैं नहीं निकल पाई हूँ अभी तक। आज भी कभी कोई बात हो जाए या मुझे चौंकना पड़ जाए, खुशी में, शांति में, दर्द में तब मेरी ज़ुबान पर कृष्णा, राम, हे भगवान शब्द तुरंत बोल पड़ती हूँ। खुद से। मुझे वैसे इस नाम से कोई आपत्ति भी नहीं। हालांकि मैं मूर्तियों के आगे धरम क़ायदे से सुगंधित अगरबत्ती नहीं दिखाती। इसकी दो वजह भी हैं। पहली मुझे खुशबूओं से दिक्कत हो जाती है दूसरा मुझे मूर्ति से कोई जुड़ाव या आत्मिकता-सा का बोध नहीं होता। हाँ, मैं उन लोगों को बहुत सम्मान से देखती हूँ जो यह सब करते हैं। शायद उनकी आत्मा से परमात्मा के तार ज़रूर जुडते होंगे। यह अच्छी बात है। रफ़्तार में भागती ज़िंदगी में यह अहम तत्व है। इसके अलावा, सभी को पूरा हक़ है अपनी शैली से ज़िंदगी जीने का।



    लेकिन आपको अब इस जमाने में थोड़ा ध्यान से और चालाकी से जीना होगा। आधी आबादी के लिए यह समय बहुत बेहतरीन है। आज हमारे पास पढ़ने लिखने का हक़ है। सोचने के लिए कुछ हद तक स्पेस है। इंटरनेट और नई तकनीकों के चलते घर से बाहर झाँकने और जीने के कम पर कुछ मौक़े मिलने लगे हैं। हालांकि हमारे समय में कुछ बड़ी चुनौतियाँ हैं जिनका हमें सामना करने के लिए मुस्तैद रहना जरूरी है। साथ में सक्रिय भी। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। शहर में रहने के कारण मेरी आँखों पर शहरी ऐनक है। गाँव की आधी आबादी को मैंने अभी तक अपनी दो आंखों से अब्ज़र्व नहीं किया है।   

    मैंने सुना है कि गाँव और शहर की आधी आबादी बहुत बड़ी मात्रा में धार्मिक भी है। इसे (धार्मिकता) जितना घर-परिवार समाज राज्य ने पोसा है उतना ही हिन्दी की (अन्य भाषा की धार्मिक फिल्मों ने भी) फिल्मों ने भी। मैं अपनी बात के पक्ष में सन् 1975 में आई 'जय संतोषी माँ' फिल्म का उदाहरण रखना चाहूंगी। मेरी माँ ने यह फिल्म घर से थोड़ी दूर ही पर बने सिनेमा हाल में जाकर देखी थी। उनका कहना है कि फिल्म उन्हें उस टाइम बहुत अच्छी लगी थी। साथ ही साथ फिल्म के गाने तो क़यामत ही थे। हाल तक मेरे घर में धार्मिक गाने बजते रहे हैं। हनुमान चालीसा बचपन से इतनी सुनी है कि याद हो गई थी। मैंने भी जब बाद में यह फिल्म देखी थी तब मुझे भी यह फिल्म बहुत अच्छी लगी थी। मुझे इसका गाना, 'मदद करो संतोषी माता...' बहुत पसंद आया था। आज भी इसके गाने मुझे अच्छे लगते हैं। इतना तय है कि इस फिल्म को दुबारा देखने के बाद मैं और मेरी माँ बहुत दिनों तक प्रभावित ही रहे। पर बात उतनी सादा-सिम्पल नहीं है। इसे समझने के लिए हमें कुछ बातों को जान लेना ठीक रहेगा।

    आज़ादी से पहले और उसके आसपास के सिनेमा में धार्मिक कथाएँ ख़ूब ज़ोर-शोर से दिखाई गईं। इसके पीछे का मक़सद यह बतलाया जाता है कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ सीधे तौर पर हमलावर फिल्म नहीं बनाई जा सकती थी। इससे उनके कोप का भाजन बनने का ख़तरा था। धार्मिक कथाओं के आड़ में जनता के मनोंरंजन के साथ साथ जनता में ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ एक मनोवैज्ञानिक विरोध पैदा करना अच्छा तरीका था। इसके अलावा भारत भूमि ढेर सारी कल्पित कथाओं की ज़मीन है जहां कहानियाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाया करती थीं। सिनेमा का धंधा एक उत्तम धंधा था। दौलत और शोहरत शुरूआत में उतनी नहीं मिली पर बाद में इस क्षेत्र में क्रांति हुई और 'डॉन' से लेकर 'बाज़ीगर' जैसों ने अपना रुतबा क़ायम किया। जलवा आज भी जारी है।

    सन् 1975 फिल्म 'शोले' का भी बरस है। फिर ऐसा क्या था कि इस (जय संतोषी माता) धार्मिक और कम बजट की फिल्म ने कमाई और लोकप्रियता के कीर्तिमान स्थापित कर दिये? सोचने वाली बात है कि सन् 1912-13 के बाद के कई बरसों तक धार्मिक फिल्में अच्छी तादाद में बनती रहीं और सफल भी होती रहीं। रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों ने तो गली मोहल्लों को टीवी के आगे ही चिपका दिया था। वास्तव में मिथक कथाओं में अजब निरालापन है। सम्मोहन है। चमत्कार है। जब फिल्म उद्योग को इसमें ढेर सारा मुनाफ़ा दिखा तो उन्हों ने इसे एक दूसरे ढंग से इस्तेमाल करना शुरू किया। न जाने कौन-कौन से देवी देवता और पूजा पाठ के विधान कहानियाँ और दस्तूर खोजे गए जो आम जनता के लिए श्रद्धा के रूपों में तब्दील हो गए। यह भी याद रहे कि यह सब उसी धरती पर हुआ जहां मध्यकालीन भक्ति आंदोलन हुआ और भक्ति की नई परिभाषा गढ़ी गई थी।

    संतोषी माता बहुत पुरानी देवी नहीं हैं ऐसा फिल्म की शुरूआत से ही पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त यदि संतोषी माता के बारे में खोजबीन की जाए तो पता चलेगा कि सन् 1960 के आस-पास में वह लोकप्रिय होने लगी थीं और उत्तर भारतीय महिलाओं द्वारा पूजनीय बन चुकी थीं। देश में उनके मंदिर भी हैं पर वे इतने प्राचीन नहीं हैं जितने बाक़ी देवियों के हैं। इससे सिद्ध होता है कि वह बिल्कुल अपनी तरह की नई देवी थीं। इसके अलावा उनके वस्त्र और कमल के फूल के आसन पर ध्यान दें तो वह 'श्री' अर्थात लक्ष्मी को कॉपी करते हुए लगती हैं। फिल्म में उनका शस्त्र त्रिशूल को दिखाया गया है। ऐसा जान पड़ता है कि त्रिशूल पॉपुलर मिथक में पॉपुलर शस्त्र था। इसमें कोई बुराई नहीं। यदि यहाँ वहाँ से कुछ रूप-रंग, तत्व, गुण लेकर किसी की रचना की जाती है तो वह अपनी ही तरह की एक अच्छी रचना हो सकती है। संतोषी माता कुछ इसी तरह की (रचनात्मक) शांत और मृदु देवी हैं।

    फिल्म में दिखाया गया है, गणेश भगवान की बहन जब राखी के पर्व पर उन्हें राखी बांधती है तब उनके दो बेटे 'हमें भी एक बहन ला के दीजिये न' की ज़िद्द करते हैं और नारद मुनि व अपनी पत्नियों रिद्धी सिद्धि के आग्रह पर जादू से एक कन्या को प्रकट करते हैं। तब नारद मुनि उस कन्या का नाम (स्वतः गणेश जी की सलाह के बिना) संतोषी रख देते हैं। भविष्य में उसके उज्ज्वल नाम की भी बात करते हैं। तो दूसरी ओर फिल्म की मुख्य नायिका 'सत्यवती' को संतोषी माता की भक्तिन के रूप में एक गीत से स्थापित कर दिया जाता है। दर्शकों के दिमाग उसकी छवि बेहद आज्ञाकारी पुत्री, भक्तिन, पत्नी, आदर्श बहू और अच्छी औरत की सेट कर दी जाती है। फिल्म के एक घंटे के अंतराल तक वह अपने पति को स्वामी कहकर पुकारने लगती है। यह शब्द उस समय प्रचलित भी था। 

    फिल्म के दोनों मुख्य चरित्र 'संतोषी माता' और 'सत्यवती' के नाम पर गौर नहीं किया तो हम एक महत्वपूर्ण पक्ष को छूने से भूल जाएंगे। संतोषी एक स्त्रीलिंग शब्द है जिसे संतोष के पुल्लिंग शब्द से दूसरे खाने में देखा जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी देव का नाम संतोष स्थापित नहीं किया गया। सीधे तौर पर एक स्त्री से संतोषी नाम और गुण को चिपकाने का धार्मिक तरीका अपनाया गया। औरत को संतोषी बनने का धार्मिक आदेश संतोषी माता के प्रतीक और मिथक के सहारे दिया गया। खट्टे से परहेज़ का एक पूरा सेट अप किया गया और कहानियाँ बनाई गईं। हालांकि संतोष जैसी मानसिकता के पक्ष में  बहुत से दोहे भी रचे गए, जैसे-

गोधन  गजधन  और  रत्न  धन  खान
जब आवे संतोष धन सब धन धुरी समान

आज के समय में संतोषी कौन नहीं होना चाहेगा। जिसके पास जितना है वह और अधिक पाने की दौड़ में शामिल हो रहा है। एक नए तकनीकी का फोन हाथ में आया नहीं कि दूसरा फोन बाजार में आते ही हम उसे खरीदने के लिए परेशान हो जाते हैं। कपड़ों से भारी अलमारी भी हुमएन नए कपड़े खरीदने से रोक नहीं पाती। अतः यह फिल्म इस मामले में भी महत्वपूर्ण थी। 

    औरत देवी के लिए स्पेस तैयार किया गया। बजाय उसको सक्रिय करने के संतोष जैसे मानसिक समझौते को मिथक के सहारा दिया और बकायदा उसके लिए विधि विधान भी बनाया। दिन तय किया शुक्रवार का। अब नाम 'सत्यवती' पर आते हैं। सत्य को अपने में रखने या वहन करने वाली सत्यवती। इसका पुल्लिंग सत्यवान है। हालांकि फिल्म में सत्यवती के पति का नाम 'बिरजू' रखा गया है। मुझे लगता है जब एक फ़िल्मकार कहानी सोचता और लिखता है तब उसके किरदार के बारे में बहुत सोचता है। ठीक ऐसे ही उसके नाम को भी वह कई बार सोचता होगा। अमिताभ बच्चन का 'विजय' नाम आज तक मशहूर है तो शाहरुख और सलमान का क्रमश: 'राहुल' और 'प्रेम' अभी तक नज़र आता है। ठीक ऐसे ही सत्यवती नाम रखने का मक़सद यही रहा होगा कि यह औरत चरित्रवान है। सच बोलने वाली। फिल्म के अंत के दृश्य में जब छोटे भाई को खोजने गया बड़ा भाई लौटता है तब वह सत्यवती के 'देवी' होने पर मुहर भी लगा देता है। यह देवी आसमान में रहने वाली देवी से अलग है। यह वह 'देवी' है जो धरती पर रहती है। चमत्कार नहीं जानती पर अपने पति परिवार के लिए निष्ठावान है। वह भक्ति करती है। यहाँ तक चरित्र से कोई आपत्ति नहीं है। पर अजब बात यह है कि वह सभी दुखों को चुपचाप सह रही है और उसको दूर करने के लिए व्रत रखती है। वह अपने पर हो रहे अत्याचार के लिए पुलिस में रिपोर्ट नहीं करती। यह याद में रहना जरूरी है। जब मैं 'मीराबाई' को पढ़ती हूँ तब उनकी भक्ति को अलग पाती हूँ। मीरा अवश्य ही विद्रोहिणी महकती हैं और अत्याचार का जवाब भी देती हैं।



    बाद के दृश्यों में त्रिदेवों की पत्नियाँ सत्यवती का भरपूर टेस्ट लेती हैं। इधर सत्यवती भी हर बार संतोषी माँ के आगे नत मस्तक होकर टेस्ट पास करती जाती है। फिल्म के एक गीत में भी एक गजब की लाईन है, 'मत रो मत आज राधिके सुन ले बात हमारी, जो दुख से घबरा जाये वो नहीं हिन्द की नारी...!' धार्मिक फिल्म है इसलिए कहीं न कहीं औरतों के किरदार अकर्मक से जान पड़ते हैं। इसलिए आपको कुछ भी अटपटा नहीं लगेगा। अमूमन घरों में इस तरह के चरित्र आम बात हैं। खुद मैं अब भी गाने सुन लेती हूँ जैसे, 'मदद करो संतोषी माता, मदद करो संतोषी माता।' फिल्म के ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो बेहद खराब और आलोचनात्मक हैं। जैसे सत्यवती पर एक खल पात्र द्वारा हिंसा करने की कोशिश करना। पहले एक पुरुष (भावी पति) रक्षा करता है और दूसरी बार संतोषी माता रक्षा करती हैं। वह अपना त्रिशूल फेंक देती हैं और वह साँप में तब्दील हो जाता है और बलात्कार की कोशिश करने वाला गुंडा भाग जाता है।

    एक दिलचस्प बात इस धार्मिक फिल्म में कानून कहाँ और कैसे दिखा, यह भी जानना चाहिए। फिल्म के अंत में जब संतोषी माता की पूजा का प्रसाद खाकर गाँव के बच्चे बेहोश या निर्जीव हो जाते हैं तब एक सत्यवती के पति को शख्स कहता है  कि 'हम इसे हथकड़ी लगवा कर रहेंगे।' यानि फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि बहुत पुरानी नहीं है। पुलिस आ चुकी है समाज में। बकायदा राज्य में दंड का विधान है। लेकिन हैरत है फिल्म में इतने अत्याचार सत्यवती पर हो रहे हैं पर वह कानूनी रास्ता नहीं अपनाती। वास्तव में फिल्म का विषय कानूनी था ही नहीं। वह तो धार्मिक था।

    फिल्म में एक पक्ष पर और गौर किया जाना चाहिए। पति पत्नी संबंध। वास्तव में फिल्मांकन आदर्श के रूप में हुआ है। दोनों ही धार्मिक हैं। लेकिन जैसे ही बिरजू' को मालूम चलता है कि उसे अपने बाक़ी छ भाइयों का बचा-खुचा खाना दिया जाता है तब वह क्रोध में आ जाता है। अपनी पत्नी को छोड़ वह जाने लगता है। तब सत्यवती रोकती है और साथ जाने का आग्रह करती है। पर वह उसे यहीं ठहरने को कहते हुए अपनी सौंगंध दे देता है। सत्यवती इसे अपने स्वामी का आदेश मानकर कुछ बोल नहीं पाती। क्या यह अटपटा मालूम नहीं होता? फिल्म में सत्यवती और बाक़ी स्त्री चरित्रों को किसी भी आर्थिक काम के नज़रिये से सोचा तक नहीं गया है। वह घरेलू काम में है, माँ है, पत्नी है या फिर प्रेयसी के रूप में। सत्यवती के पिता मंदिर के पुजारी हैं और ग्रंथ पढ़ते हैं पर सत्यवती कहीं भी पढ़ाई लिखाई के संदर्भ से नहीं जुड़ती। अगर यही धार्मिक फिल्म है तो धर्म में औरतों के इन पक्षों में प्रकाश क्यों नहीं? यही मिथक कथाएँ सम्पदा हैं तो फिर इस सम्पदा में औरतों के नाम और चरित्र रोते बिलखते या फिर सिकुड़े हुए क्यों हैं?

    फिल्म का एक पहलू मुझे अच्छा लगा। हालांकि फिल्म में उसे ज़्यादा महत्व नहीं दिया गया। सत्यवती के पिता द्वारा सत्यवती के (वर के लिए) मन की बात जानना। उसकी माँ नहीं है। इसलिए पंडित पिता उससे बड़े प्यार से उसकी पसंद पूछते हैं और सकारात्मक रवैया रखते हैं। एक तरह से दोनों का प्रेम विवाह होता है। इस तरह से हमें अपने सिनेमा पर नज़र रखनी चाहिए। आज भी सिनेमा अटपटे औरतों के किरदार रच कर पर्दे पर उतार रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण लोकप्रिय फिल्म 'बाहुबली' में अवंतिका का चरित्र है। देखेंगे तो जानेंगे। आज के समय में बहुत-सी धार्मिक फिल्में तो नहीं बन रहीं पर टीवी सीरियल जरूर बन रहे हैं। 

    आज भी मेरी कई दोस्त सोलह सोमवार और शुक्रवार के व्रत करती हैं। मुझे वे बड़ी मासूम लगती हैं। शायद आसमान में बैठी संतोषी माँ उनकी इच्छा पूरी कर देती हैं। किसी की भी श्रद्धा पर शक करना गलत है। सबको हक़ है अपने विशवास के साथ रहने का। लेकिन क्या यह समय नहीं आ गया कि इस तरह के मिथकों और विधि विधानों से युक्त कथाओं को फिर से परखने का? मुझे लगता है आ गया है। यदि मुझे किसी वस्तु की कामना है तो मैं उसे पाने के लिए मेहनत करूंगी। दुख दर्द हैं, तो वे तो मानव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। उसे हटाने के लिए व्रत रखना जायज हो सकता है पर एक ही रास्ता नहीं हो सकता।

जय संतोषी माँ।    

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सभी चित्र गूगल से साभार



     

Tuesday, 24 January 2017

'रेमन' की क़मीज़ (कहानी


आज सुबह अपने भाई की दफ़्तरी की तैयारी देख रही थी। कभी कोई क़मीज़ निकाल रहे थे तो कहीं कुछ जुराबों की जोड़ी देख रहे थे। इस बीच भाभी की क्लास भी लग रही थी। तुम न जाने कहाँ सामान रख देती हो... खाना तो लगा दो... लंच रख दिया...शाम को गोभी मत बना देना...कुछ अच्छा सा पका देना... भाभी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था। कभी देखा भी नहीं है। जो भैया बोल रहे थे उसे करने की
 खामोश हामी देती जा रही थीं। मैं होती तो शायद हंगामा ही कर बैठती।


    आज भैया ने पीले रंग की क़मीज़ पहनी थी। अच्छे लग रहे थे। अचानक मेरी तरफ़ देख कर बोले- 'आज जाना नहीं है कहींकुछ दिन से देख रहा हूँअज़ीब सी रहती हो… जैसे गुम हो कहीं… ठीक हो?' वाक्य के बाद वाक्य में आया सवाल मुझे क़मीज़ के ख़याल से जगा गया। मैंने अपनी गरम शाल को अच्छे से बदन पर लपेटते हुए कहा- ‘हाँ। बिल्कुल ठीक हूँ। जानते ही हो सर्दी में तबीयत कैसे बिगड़ जाती है और आलस बहुत आ जाता है...।' वो बस ‘हम्म’ बोले और जल्दबाज़ी में निकल गए। उनके पास समय कहाँ थानौकरी बजानी थी। 

    मेरे मन में बार बार क़मीज़ का ख़याल रह रहकर आ रहा था। जिस क़मीज़ का ख़याल आ रहा था उसका रंग गाढ़ा लाल था। क्यों अटका है दिमागआज क़मीज़ परशायद कोई कहानी आने को हो रही है मेरे मन में। भाभी मुझे चाय देने आई तब ध्यान टूटा और मैंने अपने हाथ में गरम गिलास ले लिया। मुझे लगा वो कुछ देर मेरे पास बैठेंगी और कुछ बात होगी। पर वो तो तुरंत ही चली गईं। मैंने सोचते सोचते चाय पी। आख़िरी घूट जो अंदर गया तो लगा- 'हाय इतनी जल्दी ख़त्म हो गई!' चाय पीने के थोड़ी देर बाद मुझे नींद आ गई। जब ऐसी नींद का अहसास हो तब मुझे अंदाज़ लग जाता है कि मैं देर तक इस दुनिया में नहीं रहूँगी। कोई दरवाज़ा खुलता है और में भीतर चली जाती हूँ। जिसे लोग सपना या ख़्वाब कहकर पुकारा करते हैं मैं उस दुनिया को अपने सबसे क़रीब पाती हूँ। अपनी असली जगह। ख़ैर, मैं पहुँच चुकी थी।  

    इस बार मेरी उम्र लगभग दस बरस के आसपास है। रविवार का दिन है सो माँ ने हम सभी पर मेहनत कर के हमें तैयार कर दिया है। मैंने अपना वही नीला रंग पहना है। मेरे लिए ख़ास तौर से माँ ने सिला है। नीला सूती का टॉप और निकर। पापा को मैं ऐसे ही कपड़े में अच्छी लगती हूँ। बालों को ज़िद्द कर के पापा ने कटवा दिया है। माँ का कहना है कि लड़कियों के बाल बड़े होने चाहिए। पर बैंगलोर जाने से पहले वो बाल कटवा गए। सर्दी जाती हुई दिनों में थोड़ी बहुत ही रह गई है।... लो टीवी के एंटीना पर कौआ बोल रहा है। मैं गणित की कॉपी में कुछ सवाल हल कर रही हूँ। शायद गुणा के हैं। मैंने उस पक्षी को घूरा। काले कागा का बोलने का मतलब घर में किसी मेहमान का आना। मैंने कागा को घूरते हुए सोचा अब कौन आ सकता है। मामाजी तो कुछ दिन पहले ही गए हैं। अभी इसी तरह के खयाल चले रहे थे दिमाग में, तभी किसी ने मेरे नाम को उत्साह से पुकारा। देख जया! जल्दी नीचे आ!... फूफाजी आए हैं और देख कितना सामान लाये हैं। हम दोनों भाई बहन की निगाह सबसे पहले उनके हाथ में पड़े खाने के समान पर गई। 

    मेरे फूफाजी एकदम वज़नदार आदमी थे। रंग ख़ूब गोरा था इसलिए बुआ की जगह दादी को पसंद आ गए थे। यह नहीं मालूम कि बुआ को वो उस समय पसंद थे भी या नहीं। बस दादी ने ही सभी फैसले ले लिए थे। बुआ की शक्ल से ऐसा मालूम होता है कि वो बहुत जल्दी 'अडजस्टमेंट का शिकार' हो गई थीं। माँ के बारे में ऐसा नहीं लगा। शायद हो भी सकता है। माँ अच्छी अभिनेत्री है। जब देखो खुश ही नज़र आती है। ख़ैर, मेरे आस पड़ोस में सभी शादीशुदा औरतें खुश ही दिखती हैं। माँ गौरी अगर आसमान से देखती होंगी तो ज़रूर खुश होंगी कि देखो उनका वरदान कितना शानदार काम कर रहा है! ...वापस फूफा जी पर आते हैं। फूफा जी दिल के बेहद बुरे इंसान हैं। वो लोगों पर बहुत खर्च करते हैं इसके अलावा लड़कियों को बहुत छूट भी देते हैं। इतनी छूट दी है कि लड़कियों की ज़ुबान कैंची जैसी चलती है। ऐसा मेरी दादी और और फूफाजी की माँ का कहना है। पर हमारे घर जब भी आते हैं, मुझे तो बहुत अच्छा लगता है। 

    माँ के साथ तरकारी कटवाने के साथ साथ कई गाँव की बातें भी बताते हैं। मुझे बैठने का मौका भी मिल जाता है। हालांकि माँ की शिकायत है कि बड़ों की बैठकी में 'तुम बच्चे' नहीं जमने चाहिए। पर फूफा जी अलग हैं। कहते हैं- 'जाने दो, इन्हें भी तो कल दुनियादारी में उतरना ही है। अभी से सीख लेने दो।

    बातें निकलती हैं तो कितने क़िरदार भी निकल आते हैं उनके साथ। ऐसा ही एक क़िरदार हलधर भईया निकल आए। फूफाजी के सबसे बड़े लड़के। गाँव से शहर तक उन्हीं के चर्चे गूँजते हैं। सो इस बार फिर उनकी शादी का ज़िक्र छिड़ गया। फूफाजी तो अब हलधर भईया के इस नए रूप को अपना चुके हैं पर बुआ हैं कि आज भी उन पर शादी का दबाव डाल रही हैं। 

    '
हलधर भईया कुँवारा बाप हैं।'    

    कुछ बरस पहले वो दिल्ली में हमारे ही साथ रहते थे कोई तकनीक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उन्हें भी कपड़ों का बेहद शौक़ था और फूफाजी से वह बेहिसाब रुपया लेकर अपने पर खर्च करते थे। माँ ने कई बार कहा भी कि इतनी खर्चीली अच्छी नहीं है। तब वह कहते - 'मामी, तुम न जानो कि क्लास में कितने बड़े लोग आते हैं। बराबर का न दिखूँ तो किताब के शबद (शब्द) भागने लगते हैं। आँख टिकती है नहीं।' इसी दौरान उन्हें किसी पहाड़ी लड़की से इश्क़ हो गया। उस लड़की को लाल रंग बहुत पसंद था। सो हलधर भईया लाल रंग की क़मीज़ बहुत पहना करते थे। हालांकि हम सब उनका मज़ाक उड़ाते थे। पर वह कहते थे- 'इश्क़ होगा तब जानोगे!' उन्हें अपनी एक ख़ास कपड़े की क़मीज़ से न जाने क्यों इतना लगाव था कि वह खुद उसे धोया करते। बड़े जतन से रखते थे। माँ ने कहा भी- 'मुझे दे दिया करो धोने के लिए। पढ़ाई में मन लगाओ। घर के काम तुम न किया करो। दीदी सुनेंगी तो कहेंगी कि मेरे लड़के की एक क़मीज़ भी नहीं धोई जा रही।'

    लेकिन हलधर भईया ने कहा- 'मामी आप चिंता न करो। रेमंड की क़मीज़ है। इसकी धुलाई मैं ही करूँ तो अच्छा है।' इस बात से इतना तय था कि यह क़मीज़ उनकी जान बन गई थी। एक दाग भी नहीं लगने देते थे। मैंने पूछा भी था एक बार। 'भईया, ऐसा क्या है इस क़मीज़ में जो जान से अधिक समझते हो?' वो बस मुस्कुरा कर बोले- 'बच्ची है तू! चल जा पढ़ाई लिखाई कर।'

    पढ़ाई के बीच में उन्हें गाँव से बुलावा आ गया कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है। सो दो या चार दिन ख़ातिर आ जाओ। वो जो गए वापस दिल्ली लौटे ही नहीं। गाँव के ही होकर रह गए। 

    आइये, उनकी आगे की कहानी लोगों की कही- सुनी बातों से आप लोगों को बताती हूँ। 

    अक्तूबर की हल्की सर्दियों के महीने में वे गाँव गए। बुआ की हालत बहुत ही अधिक खराब थी। फूफा जी का दिल बैठ गया था कि उन्हें कुछ हो गया तो बेटियों और बेटे को कौन देखेगा। इस हालात में हलधर भईया ने बुआ जी की ख़ूब सेवा की और अच्छे से अच्छे अस्पताल में ले गए। उनकी दशा में सुधार आ रहा था। दिसंबर के अंत में बुआ जी बिलकुल चंगी हो गई थीं। सो हलधर भईया पर दबाव डाला गया कि शहर आकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लें। वो शुरू में राज़ी नहीं थे। पर फूफाजी की बातों से मान गए। 

    हमारे गाँव से रेलवे स्टेशन लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर है। इसलिए ट्रेन चाहे कितने भी समय कि हो लोग 10 से 12 घंटे पहले ही पहुँच जाते हैं। कारण कोई साधन नहीं है। जो है वह भी बहुत नाममात्र का। इसलिए जनवरी के सर्द दिनों में कोई भी वाहन ही नहीं मिल रहा था जो रात को स्टेशन पहुंचा दे, ताकि सुबह की ट्रेन पकड़ी जा सके। ट्रेन का टिकट तो रात के समय वाला भी मिल सकता था। ताकि सुबह स्टेशन के लिए रवाना हुआ जाए। पर हलधर भईया रात को सफर कर के (गाँव से स्टेशन का) परंपरा और डर ख़त्म करना चाहते थे। गाँव के लोगों में भूत-पिशाच, चुड़ैल, डाकू, चोर लूटेरों आदि का गजब भय था। इसलिए वे रात को ही सफर पर जाकर यह बतलाना चाहते थे कि इन सब वहम को ख़त्म करना होगा। इसलिए जानबूझकर ऐसी टाइमिंग वाली ट्रेन का टिकट ले आए थे। 

    फूफाजी भी कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। उन्हों ने रात के अंधेरे को ख़त्म करने के लिए जाने कौन सी कुलदेवी की पूजा का आयोजन कर लिया और सभी गाँव वालों को रातभर उसमें शामिल होने का न्योता दे डाला। इससे दो काम हुए। गाँव में जनरेटर से लाइट आ गई। गाँव रोशनमान हो गया दूसरा गाँव के सभी बड़े-बूढ़े, लड़के लड़कियां, बच्चे, आदमी औरतें एक जगह इकट्ठा हो गए। तय किया गया कि देवी का विसर्जन स्टेशन के पास पढ़ने वाली नहर में कर देंगे। नहर है तो क्या हुआ, सुना है गंगा जी से ही निकली है। 

    लोग बताते हैं कि उस रात गाँव में बहुत हलचल थी। गीत संगीत, बातें, दुख, किस्सेखुशी, हंसी, किलकारी सब कुछ इकट्ठा हो गया था। फूफाजी के नाम को लेकर आशीष गीत गाये जा रहे थे।  या सात जीपों का इंतजाम किया गया था। देवी के विसर्जन में यह सभी जीपें जाने वाली थीं। आठवीं जीप में हलधर भईया और गाँव के पाँच छ लड़के स्टेशन तक उन्हें छोड़ आते, ऐसी योजना बनाई जा चुकी थी।

    औरतों ने गीत मंगल गाया और विदा किया। सभी जीपें आगे जा रही थी अच्छी गति के साथ। सबसे पीछे हलधर भईया की जीप थी। भईया ने पहले ही चालक को जीप धीमें धीमें चलाने का हुक्म दिया था। सो ये सभी दोस्त यार ख़ूब शहर और उसके मिजाज की बात करते हुए मज़े में जा रहे थे। कोई भोजपुरी गीत भी बजाया जा रहा था। (मुझे नहीं मालूम कौन-सा)

    भईया को अचानक क्या सुनाई दिया और गाना बंद करवा कर सभी को श...कर के चुप करवाया। बोले- 'कोई बच्चा रो रहा है शायद!' गाड़ी में बैठे लोगों में से एक बोला- 'अरे चलो। किसी डायन या चुड़ैल का काम है। ऐसे ही रास्ता रोका जाता है।' भईया नहीं माने और गाड़ी से उतर गए। टॉर्च को जलाते हुए वह उस जगह पहुँच गए जहां से बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही थी। टॉर्च की रोशनी में उन्हे वह बच्चा दिखा तो झट उठा कर सीने से चिपटा लिया। जैकेट के अंदर और रेमंड क़मीज़ से चिपटा हुआ बच्चा कुछ पल में सर्दी से राहत पा कर चुप हो गया। भईया ने कई आवाज़ें लगाईं। गुस्से में आठ दस भयंकर गाली भी दी। कहा- 'साला, पालना नहीं होता तो पैदा क्यो करते हो? सर्दी में इतने से बच्चे को कोई छोड़ता है क्या? साले इंसान हो या जनावर'(जानवर)...!' थोड़ी सी दूर कोई सफ़ेद साया सा दिखा। लेकिन भईया जैसे ही टॉर्च उस ओर ले गए, हिलती हुई झाड़ियों के अलावा कुछ न दिखा। बच्चा रेमंड क़मीज़ से चिपकाए वे वापस जीप में आए और घर वापस चलने को कह दिया। 

    उधर फूफाजी स्टेशन पर हलधर भईया को न पाकर ख़ूब परेशान हुए और देवी को विसर्जित किए बिना ही वापस घर आ गए। ...घर पहुंचे तो बेटे को तो नहीं पाया पर कंबल में एक बच्चे को गोद में लिया हुआ कुँवारा बाप ज़रूर उन्हें दिखा। उस रात गुस्सा और ख़ामोशी फूफाजी के घर में ख़ूब रही। शायद यह सिलसिला ज़्यादा चला भी। किसी ने भईया को 'किरांतिकारी' तो 'पागल' भी कह दिया था।   


    बच्ची अब थोड़ी बड़ी हो गई है। भईया ने उसका नाम बुलबुल रखा है। कहते हैं यही अच्छा नाम है। शुरू में उनके इस फैसले से बहुत झगड़े हुए पर अब घर सामान्य हो गया है। भईया 'हलधर मैया' में तब्दील हो चुके हैं। शहर के प्रेम को यह कहानी सूचित कर चुके हैं। उन्हें दुख है पर बुलबुल को देखकर भूल जाते हैं। 

    रुकिए...रेमंड की क़मीज़ को क्यों भूल गए?

    बुआ एक रोज़ उस क़मीज़ को धोने जा रही थीं। भईया ने न जाने क्या सोचकर कहा कि इसका पौंछा वगैरह बना लो। मैं नहीं पहनूंगा। इस बात पर बुआ हैरान होकर बोल उठीं- 'तू ही तो कहता था रेमन की क़मीज़ है रेमन की क़मीज़ है...और आज इसे कह रहा है पौंछा बना लो। तुझे क्या हो गया है...इस बच्ची के पीछे तू पगला गया है।' भईया कुछ न बोले बस बच्ची की ओर देखा। वह बड़े इत्मीनान से सो रही थी।(ऐसा मुझे बताया गया)

    लगभग एक महीने बाद दूसरे किसी गाँव से खबर आई कि किसी लड़की ने आत्महत्या कर ली है। पुलिस जांच में कुछ और मालूम चल रहा है। कहा जा रहा है कि एक लड़की का उसी के घर किसी रिश्तेदार ने जबरन अत्याचार किया था। लड़की ने राज़ खोलने की धमकी दी तो मार दिया गया। पुलिस की तहक़ीक़ात जारी है। न जाने कौन दोषी था, मुझे यह नहीं मालूम। 

    ...मेरी आँख खुली है तो ऐसा लग रहा है कि मैं कई महीनों से सोई हूँ। सपने देखना अपने को थका भी देता है। कितने बरस पीछे चली गई थी। माँ ने जया-जया कर मुझे उठाया तो मालूम चला बुलबुल आई है फूफाजी के साथ। मैं फौरन उठकर उससे मिलने चल दी। 


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किसी की दिली इच्छा थी कि इस बड़ी कहानी को छोटे रूप में लिखा जाए। पता नहीं कितना सफल हुई हूँ। पर लिख तो दिया है। 

गाँव का जबरन एक सुंदर खाका खींचा जाता है। पर ऐसा नहीं है कि वहाँ औरतों या लड़कियों से संबन्धित हिंसा नहीं होती। कई बार तो घर की मजबूत दीवारों में उनकी आहों की चुनाई कर दी जाती है। यौनिक हिंसा की घटनाएँ भी जब तब सुनने को मिलती ही रहती हैं। मेरी जानकारी में किस्सों के रूप में पाँच या छ घटनाएँ मुझे बताई गई हैं, जहां अगर यकीन किया जाए तो महिलाओं के साथ हिंसा हुई है। बड़े घर (ज़ात) की कहानियाँ और भी दर्दनांक होती हैं जबकि तथाकथित निम्न जातियों में विरोध के मजबूत स्वर सुनने को मिलते हैं। 

(आपका अनुभव अलग हो सकता है)             

 

Monday, 16 January 2017

कसैला

लैपटाप में समय एक बजकर उनचालीस मिनट का हो चला है। मैं अभी अभी छत पर धूप में अपने तन और मन को सेंक आ रही हूँ। अच्छा लगता है न अपने को धूप के पास (में) कुछ देर रख देना! रोम रोम गरम रोशनी को अपने अंदर सोखता है। एक ऐसा एहसास होता है जो इस 'दीन-दुनिया' से बाहर ले जाता है। मैंने कुछ मिनटों के लिए अपने आप को रोशनी के हवाले कर दिया था। कुछ देर बाद नज़रें खुलीं तब छत के कोने में चुपचाप खड़ी एक ख़राब ट्यूबलाईट पर नज़र गई। सूर्या की ट्यूबलाईट, 36 वॉट की। नीले रंग के गत्ते और सजावट के साथ। मैंने कुछ देर तक लिखे हुए शब्द सूर्या को देखा। ...काफी देर तक देखा। मुझे कोई कहानी याद आई। भगवान सूर्य और कुंती की। उसके बाद मन में सवाल आया कि 'सूर्य' को एक आदमी क्यों बताया गया है? वह चमकता है। उसमें आग है। लोग बोलते हैं कि पगली उसमें तो हाइड्रोज़न हीलियम में बदलती है। फिर भी वह आदमी क्यों है? वो एक औरत क्यों नहीं है? मैं कहती हूँ न आप मेरी नज़र से देखिये और सोचिए कि सूर्य एक औरत है। कारण उसमें से हर पल ढेरों उर्ज़ा और बच्चे जन्म लेते हैं। रोशनियाँ ही तो उसके बच्चे हैं। वही तो जीवन को पोषण दे 'रही' है। ...इसके बाद एक बाद एक ख़याल आए। आकाश भी औरत है। जल भी औरत है। धरती को तो आप औरत मानते ही हैं। अग्नि भी औरत है। वायु भी औरत है। आपने न जाने क्यों इन्हें पुरुष के लिंग-लिबास पहना दिये हैं। मैं नहीं मानती आपकी भाषा।

मुझे ज़ुबान का तोहफ़ा कुदरत से मिला है और इसको पोसा है परिवार और समाज ने। मुझे पाँच साल का होते ही स्कूल में भर्ती करवाया गया। मैं तब से अब तक पढ़ ही रही हूँ। लेकिन क्या मैं वो बन पाई हूँ जो मुझे बनना है। मुझे बनना क्या है? लोगों ने जो बोला वही बनना चाहा। डॉक्टर, टीचर, लेक्चरर, एक क्लर्क, एक अधिकारी, एक अफ़सर, गायिका, नृत्यांगना और पता नहीं क्या क्या! लेकिन इस सब से ऊपर ध्यान रखने वाली बात यह है कि मुझे सबसे पहले एक इंसान बनने का शौक़ है। हाँ, वही इंसान जिसका लिंग क़ुदरत ने एक औरत का बनाया है। एक लड़की। मेरा मन कभी गाने का करता है तो कभी कहीं घूमने का। क्या आपको नहीं मालूम कि हम सबका एक मन है, जो बायीं ओर रहता है? अब अगर मैं नए साल का उत्सव मनाने के लिए रात को अपनी स्कर्ट के साथ सड़क पर निकल गई तब इसमें कौन सी वाली संस्कृति का ताला टूट गया? मैंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया जिसे लेकर हाय तौबा मचा दी गई? मुद्दा तो मुझे तंग करने वालों की मानसिकता का होना चाहिए था पर 'घासपिटे' लोगों ने फिर से उंगली हम औरतों की तरफ कर दी। आपकी जमात को यह क्यों नहीं समझ आता कि हम अलग लिंग वाले इंसान ही हैं? मुझे यह बहुत अजीब सोच लगती है कि मेरे शरीर के अंग से घर, परिवार, जाति-बिरादरी और संस्कृति की तथाकथित 'पवित्र' इज्जत जुड़ी है।



मुझे  बताया गया है कि बैंगलोर एक पढ़ा लिखा शहर है। मैं दो बार एक कार्यकर्ता की हैसियत से वहाँ गई भी हूँ। मुझे वहाँ अच्छा लगा था। क्यों? इसके पीछे कुछ छोटे अनुभव हैं। मैं रोड पार कर रही थी तब एक रफ़्तार में आ रही गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगाया। कार चालक ने मुझे मुस्कुराते हुए शालीन इशारा किया कि सड़क पार कर लीजिये। ऐसा लगभग तीन या चार बार हुआ। दिल्ली में मेरे साथ अभी तक एक ही बार ऐसा हुआ है। दूसरी बात भले ही वह आईटी शहर हो, लेकिन वहाँ पर लड़कियां अपने बालों में फूल लगाकर बाहर जाती हुई दिखती हैं। लगभग हर चौथी या पाँचवी लड़की को मैंने बालों में फूल लगाए हुए पाया। जिन भी पुरुषों से मुलाक़ात हुई वे नम्र मिजाज़ के मालूम हुए। ठीक लगे। कोई नकारात्मक तरंग उनमें से आती हुई मुझे मालूम नहीं हुई। फिर उस शहर में यह घटना कैसे घट गई कि जबरन किसी को तंग किया गया।  चिंता है, गुस्सा है और डर भी। यह कैसी जगह है जहां हिंसा करने वाला अपवित्र नहीं समझा जाता बल्कि उसके लिए किसी भी तरह की गाली का ईज़ाद भी नहीं किया जाता। मुझे ऐसी जगह अच्छी नहीं लगती। लो अब बैंगलोर भी दिल से उतर गया। 

मैं वजह खोज रही हूँ ऐसी घटनाओं की। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ वही लड़की शिकार हुई जो पश्चिमी कपड़ों में थी। मैं अमूमन भारतीय कपड़े में ही रहती हूँ। सूट और सलवार में। तब भी बहुत से हादसे हो जाते हैं। मेरी दोस्तों के साथ भी। छोटी छोटी बच्चियों के साथ भी। इन हादसों की खिलाफ़त बड़े बड़े लोग अपने अंदाज़ में करते हैं। मुझ जैसे मामूली लोग भी करते हैं। ख़ैर, बात बड़े लोगों की कर ली जाए। जब अमिताभ बच्चन 'यत्र तत्र' वाला श्लोक विज्ञापन टीवी से बाहर फेंकते हैं तब भी मैं खुश नहीं होती। उस विज्ञापन को मेरे कान और न ही मन कैच करता है। सुनिए, मुझे अपनी पूजा नहीं करवानी। आप क्यों पूजा करने की ज़िद्द पर अड़े हैं? मैं नहीं चाहती कि देवता बसें अब और ज़्यादा।



मुझे संस्कृति और सभ्यता में इस पेंच की खोज कर लेनी चाहिए। बहुत सी मिथक की कहानियों में औरतें रहती हैं जो मुझे बेमिसाल लगती हैं। पंचकन्या नाम से जानी जाने वाली औरतें बहुत ही प्रभावित करती हैं। अपने निर्णय और तौर-तरीक़ों से उन्हें मैं आज भी याद करती हूँ। सभी की तरह मेरा मन द्रौपदी के पास आकर रूकता है और बैठता भी है। अच्छा लगता है मुझे बार उनका क्रोध पढ़कर। अच्छा लगता है उनका राजसभा का वह क्रोधी रूप और भस्म कर के रख देने की ज़िद्द को देखकर। हैरत की बात है कि ये सभी महान मिथक कन्याएँ और औरतें कहीं भी अपनी पूजा करवाने की बात कहती नहीं दिखतीं। सभी अपने आत्मसम्मान और स्वतन्त्रता की मांग के साथ जीती दिखती हैं। पति, पिता और पुत्र (पुरुष) होने के बावजूद अपने मान और सम्मान के लिए उन पर कतई निर्भर नहीं करतीं। 

अच्छा एक मिनट रूकिए, मैं यहाँ उन निराली कहानियों को अंकित नहीं कर रही जिनके मुताबिक़ फलां देवी ने पृथ्वी लोक पर अपनी पूजा करवाने के लिए फलां काम किया। जैसा कि आजकल टीवी पर आने वाले नाटकों में दिखाया जा रहा है। आप कृपया सबूत खोजने न जाये। निश्चित रूप से ये वे कहानियाँ हैं जो बाद के समय में कुछ मसख़रों द्वारा कल्पित की गईं। अब 'यत्र तत्र' वाले श्लोक को रबड़ की तरह और खींचिए तो पाएंगे कि निहायती बेवकूफ़ी रची गई है। क्यों भाई! मुझे बताइये कि यदि मेरा सम्मान हर जगह होगा तो मुझे व आपको देवता के बसने से क्या मतलब? जब मुझे किसी भी तरह की मदद नहीं चाहिए, भय नहीं, सब कुछ उपलब्ध है तब देवता के बसने का क्या अभिप्राय? मैं नहीं चाहूंगी कि ऐसी जगह पर देव आसमान से आकर बसें। 'देवता' पुल्लिंग शब्द है। औरत और देवता में फर्क है। औरत इंसान है और देव वे जो इंसान से परे श्रेष्ठ और दिव्य शक्तिधारी है। इसका अर्थ तो देखिये कि सम्मान मेरा होगा और बसेंगे देव। मुझे लगता है इस तरह की सोच और समझ ने बहुत झोल पैदा किया। इस बात को कुछ दूसरी तरह से रचा जा सकता था। मुझे नहीं मालूम दूसरी तरह कैसे, पर कहा जा सकता था। मैंने प्राचीन भारत के इतिहास से जुड़ी किसी किताब में पढ़ा था कि इन्द्र ने ऊषा का बलात्कार किया था। इतना ही नहीं ऐसा मैंने 'दिल्ली' उपन्यास में पढ़ा है कि यमुना का टेढ़ा मेढ़ा होकर बहने की वजह उसके बालों से घसीटा जाना था, क्योंकि वह किसी देव से समागम के लिए इंकार कर रही थी। मैं अपनी जगह पर किसी बलात्कारी देव को नहीं बसाना चाहती। तो अमिताभ जी से यह पूछा जा सकता है कि किसी पुरुष देव को बसाने के लिए औरतों का सम्मान हो या फिर यह औरतों के लिए बिना शर्त पहली शर्त हो सम्मान?

अब श्लोक को वहीं रख देते हैं कुछ देर। वापस अपने मिथक पर आते हैं। जब हमारे पास ऐसी महान बहादुर औरताना मिथक किरदार है तो गड़बड़ कहाँ हो गई? यह सवाल मैं सोचती हूँ। फिर सिंधु घाटी की गलियों से गुज़रती हूँ। मुअन जोदाड़ो की उस डांसिंग गर्ल को राष्ट्रीय संग्रहालय में देखती हूँ जो गहनों में निहायत ही खूबसूरत लग रही है, पर फिर भी उसका अभिमान साथ है। उसे देखकर यह नहीं मालूम होता कि वह डरी और लाचार है। कुछ लोगों को कहते हुए सुना और देखा है कि वह थकी हुई है। पर मुझे नहीं लगता। मैंने उसे बहुत पास से देखा है। यकीन मानिए मुझे वह एक समझदार और आत्मविश्वासी औरत लगी। उसे बनाने वाले कलाकार ने उससे इतनी ईमानदारी दिखाई है कि उसकी सीधी नाक को और कम चौड़े शरीर में उसके तौर तरीकों को फिट किया है। सीधी नाक माने एक घमंड और अपने पर विश्वास।  सभ्यता को छूओ तो स्वाभिमान का पता चलता है। सभ्यता बनावट में मौजूद रहती है। वक़्त उसे घिस ज़रूर देता है पर फिर सभ्यता की कहानियाँ संस्कृति में बसने लगती हैं। यह एक तरह का हस्तांतरण है। यह दिलचस्प है। इसलिए कहा कि पंचकन्या ऐसी बहुत सी बातें मुझे बताती हैं जो कि एक बेहतर विचार और सक्रियता को देखने में मदद करती हैं। ... मेरे दिमाग का क्या कहिए कि मुझे बुद्ध की मूर्ति में भी एक औरत की महक मिलती है। आप मुझे पागल कहिए। पर न जाने क्यों उनकी करुणा में मुझे औरत ही दिखती है। उनके ध्यान में भी एक औरत की कोमलता और गंभीरता दिखती है।



दिल्ली सल्तनत की सुल्ताना 'रज़िया' भी मुझे आकर्षित करती है। जो दिल्ली शहर के तुर्कमान गेट के पास बुलबुल-ए-ख़ाना में याक़ूत के संग सो रही है, वह सुल्ताना थी जो लड़ती रही।(क़ब्र की जगह को लेकर विवाद है)  इल्तुतमिश की इस महान बेटी को मैं चाहती हूँ और याद करती हूँ। मुझे ‘अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरान-ए-सानी'- शाहजहाँ की बादशाह बेटी बेग़म जहांआरा का आत्मविश्वास और दिमागदारी बेहद पसंद आती है तो दूसरी तरफ़ रोशनआरा की औरंगजेब के प्रति प्यार और सहयोग चौंका जाता है। कहा जाता है दोनों ही बहनें बहुत अच्छी लेखिकायें थीं और शासन में बराबर की दिलचस्पी लिया करती थीं। इसके अलावा जहांआरा के पास शाही मोहर भी भी हुआ करती थी। चाँदनी चौक को डिज़ाईन करने वाली इस दिमागदार औरत में भी मुझे एक ऐसी रीढ़ की हड्डी दिखाई देती है जो हिंदुस्तान के मिथकों में प्रखर रूप में है। मुझे दारा शुकोह की प्रेमिका हिन्दू पत्नी राणादिल भी याद आ जाती है जिसने अपने शौहर के हारने के बाद औरंगज़ेब के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। वह जौहर नहीं हुई। बल्कि लेखन में नया रास्ता तलाशा और दारा की सोच को बढ़ाया। मुझे मीरा भी बहुत अच्छी लगती हैं। कृष्ण के प्रति प्रेम और ऐसा वाला प्रेम जिसमें वह कहती हैं- 'मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरों न कोई...' मैं इस निडरता और निष्ठा की कायल हूँ। सुन लो मध्यकालीन के लोगों...जान लो कि गिरिधर ही हैं मेरे सब कुछ और 'दूसरा' कोई नहीं हो सकता। बहुत से ऐसे उदाहरण हैं। सावित्री बाई फुले तक...एक से बढ़कर एक। इन सभी चरित्रों में एक ओफेंसिव मोड झलकता है न कि डिफेंसिव मोड। इसलिए वर्तमान के हालातों को देखकर मुझे मन करता है कि कुछ मोड अपना लिए जाएँ। ओफेंसिव मुझे बुरा नहीं लगता। हाँ कई लड़कियां और औरतें इस मोड में रहती हैं जो कि संतोषजनक बात है।


नया साल आ गया। सभी की तरह मैं भी खुश थी। लेकिन जब बैंगलोर वाली खबर देखी तब मेरा सिर चकरा गया। दिमाग में 'इंडिया'ज़ डॉटर' की तस्वीरें और संवाद घूमने लगे। हाँ, मैं बैन की हुई फिल्में देख लेती हूँ। मेरी रोचकता उनमें बढ़ जाती जिसे सरकार, कोई ख़ास व्यक्ति या तबका छुपा कर रखना चाहता है। आप मुझे तय कर लेने दीजिये की मेरे लिए क्या मूल्यवर्धक है और क्या नहीं। मेरे साथ मेरी माँ ने भी इस फिल्म को देखा। हम दोनों जेल में बंद उन लड़कों के बयानों से हिल गए जिन्हों ने यह घिनौना काम किया था। उनके चेहरे में कहीं भी ऐसे भाव नहीं दिखे जिससे कि अफसोस झलके। मेरी माँ जैसे ही उनके बयान सुनती तब गुस्से से कह उठती- 'इन्हें अभी तक ज़िंदा क्यों रखा गया है?' मैं समझ नहीं पा रही थी कि उनकी इस बात पर कैसे अपनी बात रखूँ। कैसे बताऊँ कि अहिंसा में उनकी बेटी बहुत यकीन करती है! मैं फिलहाल अभी भी जवाब खोज रही हूँ। फ़िल्म में आरोपियों के वकील ने अपने इंटरव्यू में कहा कि लड़कियां फूल की तरह होती हैं, कोमल। इसलिए उन्हें पुरुष से मिलने वाली रक्षा की ज़रूरत होती है। अब इन साहब का स्टेटमेंट सुनिए और ऊपर रेखांकित की गई औरतों से तुलना कीजिये। आपको मालूम चलेगा और आप एकदम से चौंक जाएंगे कि यह आदमी क्या बकवास कर रहा है!



उसके डीएनए में इतना बड़ा बदलाव कैसे हो गया कि वह औरतों की रक्षा करने की बात कहता है? सोच की यह छलांग बहुत अधिक लंबी है। मुझे हैरानी होती है। मिलना जुलना शब्द तो आप रोज़ ही पढ़ते होंगे। यह सिर्फ शब्द-जोड़ा नहीं है। इसका अर्थ मुझे लगता है दो अलग तरह के लोगों का मिलना और जुड़ना। अब अगर आप अपनी जीवन शैली के चुनाव में समाज जैसे चीज़ लाते हैं तब निश्चित तौर पर बहुत कुछ बदलेगा। मसलन एक जगह टिक जाने के बाद, परिवार के आने के बाद, अनाज उपजाने का बाद, आपका श्रम बदल जाएगा और बदला भी है। हो सकता है किन्हीं वजहों से काम का बंटवारा हुआ हो पर इससे यह नियति नहीं बन जाती कि औरत कमजोर है और रक्षा करने योग्य है। बहुत बड़ा बीज वास्तव में सत्ता के खेल में बोया गया है जहां शक्ति और भोग के अनियंत्रित धागे लिपटे नज़र आते हैं। शक्ति सत्ता में बने रहने की पुरुषों की दास्तां औरतों से कहीं अधिक संख्या में हैं। पुराने समय से शुरू करें तो अब तक के समय में भी ऐसा ही दिखाई देगा। औरतों का इसमें (कुछ उदाहरणों को छोड़ दें) बहुत कम भूमिका रही। धीरे धीरे विदेशी हमलों और आंतरिक संस्कृतिकरण (पालतूकरण) ने औरतों की बिरादरी को इस हद तक नुक्सान पहुंचाया कि वह घरेलू संपत्ति, इज्जत, कमजोर (कोमलता चिपकी ही रही) आदि आदि विशेषणों में क़ैद हो गई। संस्कृतिकरण का बेजोड़ नमूना फिल्म 'वॉटर' (2005) में दिखेगा। हाँ और भी ऐसे चित्रांकन मिलेंगे। फिल्म 'घटश्राद्ध' भी इसका अच्छा नमूना है। किसी किताब से औरतों की ज़िंदगी को बेहद निचले दर्जे में क़ैद करने की साज़िश भारतीय संस्कृति को कतई महान नहीं बनाती। कम से कम मैं इस संस्कृति को महान नहीं मानती। 


जस्टिस काटजू जिस महान मुग़ल बादशाह अकबर को गांधी से अधिक महान मानते हैं उसी बादशाह के बारे में यह भी कहा जाता है कि उसने एक ऐसा नियम बनाया कि शाही मुग़ल खानदान की लड़कियों की शादी न की जाएगी। ऐसा न हो कि कल हिंदुस्तान की गद्दी का एक और उम्मीदवार खड़ा हो जाए और शाही राजकुमारों से किसी भी तरह का झगड़ा हो। इतना ही नहीं जिस प्रेम कथा को लेकर आशुतोष गोवारीकर 'जोधा अकबर जैसी महंगी फिल्म बनाते हैं वास्तव में वहाँ भी प्रेम कम राजपूताना राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाने की मंशा अधिक नज़र आती है। यहाँ भी शक्ति को बढ़ाने के लिए औरतों को मोहरा बनाया गया। अगर अकबर की नज़र से इतिहास को देखने की बजाय उन सैंकड़ों शाही हरम में पड़ी हुई औरतों की नज़र से इतिहास देखा जाए तब तो सब उल्टा ही पड़ जाएगा। इसलिए जो इतिहास में अच्छे बनकर रहते हैं वास्तव में वे उतने अच्छे मुझे नहीं लगते। मुझे वहाँ भी एक क़ैद दिखती है। इसलिए यह सोच जिसे आप मानसिकता कहकर पुकारते हैं वह तो पुरानी है, कहने से एक महीन समझ मिलती है। जब निर्भया केस में आरोपियों का वकील यह बात कहता है तब मुझे लगता है कि वह एक घातक सोच की नहर को अपने इतिहास से लेकर आगे बढ़ा रहा है। कैसे बदलेंगे ऐसी सोच? क्योंकि पढे लिखे भी वही काम को अंजाम दे रहे हैं।

मैं इस सवाल का जवाब खोजने के लिए किताबों की तरफ बढ़ रही थी। कुछ बुद्धिजीवियों को भी सुन लिया पर मेरा मन नहीं माना। पंचकन्या और मीरा के पास मैं कितनी बार जाऊँगी! इसलिए यह मंथन मेरे मन में बिना रुके चल रहा था। अचानक मुझे जवाब मिला या कहूँ एक रुझान दिखा। एक रोज़ लैपटाप ठीक करवाने के सिलसिले में मुझे नेहरू प्लेस जाना पड़ा। मैं जल्दीबाज़ी में सीढ़ियाँ चढ़ते हुए एक बिल्डिंग की तरफ़ बढ़ रही थी। मार्केट बहुत बड़ा है और यहाँ तमाम तरह के लोग आते जाते रहते हैं। मेरे सामने से एक लड़की गुज़री जो लिबास से किसी बड़े दफ़्तर की कर्मचारी लग रही थी। उसके पीछे से दो लड़के उस पर फब्तियाँ कसते हुए निकल गए। मैं उनसे तीन हाथ की दूरी पर थी। मैंने सुना तो मुझे गुस्सा आया। पर जिस पर फब्तियाँ कसी गई थीं उस लड़की पर मानो कोई असर ही नहीं हुआ हो। वह चुपचाप 'इग्नोर' कर के आगे बढ़ती गई। मुझे इस पर खयाल आया कि यह भी ठीक है। इन कमीनों के मुंह कौन लगे! (कभी कभी मैं गाली भी दे लेती हूँ) इसके बाद मैंने अपना लैपटाप जमा कराया और अपनी चाय पीने की तलब को शांत करने के लिए एक ठीये की तरफ़ चल दी। अचानक एक भीड़ देखी और धमाकेदार गालियां एक लड़की के मुंह से सुनी तब मैं भी भीड़ में एक चेहरा बन गई। देखा, एक बंजारन लड़की एक 30 से 35 की उम्र के शख़्स को ख़ूब गालियां दे रही थी। पूरा मामला यह था कि उस आदमी ने उसे कुछ ऐसा कहा था कि उस बंजारन लड़की ने छूटते ही गालियां बकनी शुरू कर दी। वो कह रही थी, -हरामी के जने, सूअर...तू क्या समझा था कि तू कुछ भी बोल के चल देगा और मैं तुझे छोड़ दूँगी। कुत्ते तेरे घर तक दौड़ा के मारूँगी...।' लोग उस बंजारन लड़की पर हंस रहे थे। कोई तो यह भी कह रहा था कि यह ऐसी ही गिरि हुई औरतें होती हैं, इनकी ज़ुबान गंदी होती है, इनके मुंह नहीं लगना चाहिए...पर कुछ भी कहिए। उस आदमी की बोलती बंद हो गई थी। जब चाय वाले अंकल से पूछा तो बोले- 'उस आदमी ने उसे कुछ गंदा बात बोला तो कोई क्यों उसे छोड़ेगा! आदमी अब किसी भी लड़की को छेड़ने से पहके सौ बार सोचेगा।'



इन दोनों घटनाओं में कई बातें हैं। आप भी सोचिए। मैंने तो कुछ समझा है अपने स्तर से। सिनेमा ने जिन लोगों की फालतू और खराब गतिविधियों को चाँदी का वर्क़ चढ़ाकर 'राँझणा' बनाया है उसे भी पहचानते आइये। बातें इस क़द्र आगे बढ़ गई हैं कि अब आधी आबादी अलग सोच रखती है। हमले होंगे। आज नहीं तो कल होंगे। हमलों का प्रकार भी आपके सोच से परे होगा। हाँ, मुझे ऐसा लगता है। हो सकता है मैं ग़लत हूँ। पर यह भी हो सकता है कि मैं सही हूँ। शायद सौ फीसदी सही। मुझे अहिंसा पसंद है। पर पसंद की अपनी एक सीमा है।

...इस पोस्ट को लिखते लिखते मैं अगले दिन में पहुँच गई हूँ। अभी लैपटाप में समय 3 बजे का हो चला है। अब तो छत पर से धूप भी धीरे धीरे सरक रही होगी। ऐसा सोचा। ...मैं छत पर गई। 'सूर्य' को देखने की कोशिश की। नहीं देख पाई। फिर धूप को देखा। ...उसमें औरत को पाया। रोशनियाँ भला कब मर्द हुआ करती हैं। कुछ दिन बाद शायद मुझे रोशनी में कोई मर्द भी दिख जाए। लेकिन उसके लिए एक संतुलित स्पेस की ज़रूरत है। मैं जाती हूँ उस स्पेस को खोजने।         

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चित्रों के संदर्भ में- टूटने का मतलब हमेशा नेगेटिव नहीं होता। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि पुराने लिबास या शक्ल की जगह कुछ नया बनकर तैयार होना या करना। इसलिए मुझे टूटना भी पसंद है। एक नई ज़ुबान और सोच के साथ अपने आप को ढालना चुनौती देता है। लेकिन जो भी रूप बनें उसमें दरख्तों की कुछ ख़ासियत जरूर होनी चाहिए। 
 -सभी चित्र गूगल से साभार









Sunday, 8 January 2017

ज़ोया का मातम

(इस साल की यह पहली पोस्ट उन लड़कियों के लिए है जो अपने अंदर की चाहतों को, जो उनकी ख़ालिस रूह भी है, को घर-परिवार, समाज और दुनिया के लिए न सिर्फ़ दबाती हैं बल्कि उनका क़त्ल भी करती हैं। मैं इस साल कुछ इसी तरह के अहसास को लिखने की कोशिश करूंगी जिन पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते। मैं उन्हें हर लड़की के चेहरे पर खोजने की तमन्ना रखती हूँ। आज पहली कोशिश की है। बताइएगा।) 



नए बरस का आज आठवाँ दिन है। घड़ी में समय की उम्र दोपहर के 3 बजकर 20 मिनट हो चली है। मैंने इतने दिनों से कुछ भी नहीं लिखा और न ही सोचा। भला बिना सोचे कैसे लिखूँ! बाहर शोर हो तो बिन शोर वाली जगह पर जाकर बचा जा सकता है। पर जब ख़ुद के अंदर शोर ही शोर हो तो कहीं भी ठिकाना नहीं होता। शोर का ऑरिजिन जानती हूँ पर वहाँ से कैसे निकलूँ यह नहीं जानती। शायद अभी मन भी नहीं निकलने का। ऐसा दर्द कभी हुआ ही नहीं। यह नहीं पता कि दर्द में भी मज़ा होता है। कितना अच्छा लग रहा है दर्द। दवा की ख़्वाहिश ही नहीं हो रही। न राहत की आरज़ू है। बस लग रहा है कि दिन ऐसे ही टिके रहें। मैं तो चुपचाप अपने में बह रही थी तभी ज़ोया ने मुझे झकझोर दिया। ऐसे लगा किसी ने ऊंचे पहाड़ से धक्का दे दिया।

मैंने अपनी नाराजगी जतला दी। वो गुस्से में बोली- 'तू सब बर्बाद कर रही है। भला यह सब भी कोई सोचता है!' मैंने कहा- 'इसमें क्या बुराई है? दर्द मेरा है। दुख है सो भी मेरा। इसमें तुझे क्या हो रहा है? मैं क्या सोचूँ और क्या नहीं, कम-से-कम इतना हक़ तो मेरे पास रहने दो। तुम मुझे अकेले क्यों नहीं छोड़ देतीं? तुम चली क्यों नहीं जातीं?'

वो बेहद गुस्सा हो गई और मुझे अपनी लाल लाल आँखों से देखने लगी। ऐसा लगा कि अगर उसके हाथों में चाकू हो तो मेरे सीने के पार करने में उसे पल भी नहीं लगेगा...हम दोनों में अभी यह बहस हो ही रही तभी दरवाजे पर दस्तक हो गई। दरवाज़ा लकड़ी के दो पालों वाला था। पुरानी वाली चटकनी लगी थी। दरवाज़े की, हालांकि कोई जरूरत नहीं थी पर फिर भी जमाने को देख कर अब्बा ने लगवा दी थी। ख़ैर मैंने तब भी कोई ऐतराज़ दर्ज़ नहीं करवाया। लगा कि मेरा ही भला इसमें छुपा है। थोड़ी कम रोशनी या हवा ही तो आएगी। जाने दो क्या फर्क पड़ता है। पर ज़ोया को दरवाज़ा लगने की बेहद खुशी थी। मुझे तो शक़ है कि यह रुकावट लगाने की उकसाहट अब्बा के दिमाग में उसने ही डाली होगी। न जाने कौन सी पढ़ाई पढ़ती है। इतनी किताबें पढ़ने के बाद भी मन से किसी सूखते हुए तालाब सी बातें करती हैं। खुद भी कशमकश में ही जीती है। खुश तो ऊपर से ही दिखती है। कहने को तो अब्बा की मैं ही इकलौती बेटी हूँ पर आजकल वो मुझमें से उभर कर आ जाती है। अब्बा को मुझमें ही दो बेटियाँ दिखने लगी हैं।



बहरहाल दस्तक की वजह कोई आदम नहीं था। न जाने कैसे दस्तक हुई थी! जैसे हवा ने ही की हो। हाँ शायद तेज़ हवा ही होगी। पर जब मैंने बाहर झाँककर देखा तब हवा तो मद्धम ही थी। रोशनी भी मीठी ही लगी। फिर ऐसा कौन था जिसने मीठी खटखटाहट की थी। ज़ोया को इस बार भी अच्छा नहीं लगा। उसने कहा कि अंदर से दरवाज़े की चटकनी ठीक से लगा कर रखूँ। इतनी मज़बूती से दरवाज़ा लगाऊँ कि बाहर से देखने वाले को लगे जैसे अंदर कोई नहीं रहता। कोई ज़रूरत नहीं दरवाज़ा खोल कर जश्ने बहारा की नुमाइश की जाये। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा- 'अंदर ऐसा है ही क्या जो जश्ने बहारा तुम्हें दिखता है, क्या सांस भी न ली जाए? इंसान होने का मतलब है क्या तुम्हारी नज़रों में?'

हम दोनों में तूतू-मैंमैं शुरू हो गई। मैंने सोच लिया था कि ज़ोया से पीछा आज छुड़ा ही लूँगी। इसने कई बरसों से मुझे चैन से जीने नहीं दिया है। अम्मी अब्बा की ये लाड़ली बनी फिरती है। पर नक़ाब है। इसका अस्तित्व मेरे बिना नहीं है। झूठ को जीती है। अपने को भी मारती है और चाहती है कि दूसरा भी इसकी तरह मरे। ज़ोया को मेरी बातें और सवाल अंदर तक चोट दे रहे थे। वो अच्छी तरह से तिलमिलाई हुई थी। मैंने उसके चेहरे पर हिंसक होने की निशानियाँ देख ली थीं। पर न जाने वो कुछ न बोली और अपने पर क़ाबू करते हुए पल में ग़ायब हो गई। मुझे उसके जाने से राहत मिली। मैं अक्सर उसकी लाग लपेट वाली बातों का हिस्सा रही हूँ और कभी इंकार तो किया ही नहीं। मेरा ही हम साया है सो उसे नाराज़ नहीं किया कभी। पर अब वो मुझपर अपने को थोपती है। हावी होती है। मुझे कुफ़्त होती है।

दस्तक के बाद दरवाज़ा हल्का सा खुला था। रोशनी पूरे घर में छा गई थी। ऐसी महक फैली हुई थी जैसे बहुत से मोगरे के फूल एक साथ सुबह सुबह खिले हों। रोशनी में हल्की गरमाई भी थी जिससे कमरे के अंदर की शीलन और चिपचिपाहट धीरे-धीरे सूख रही थी। इस अहसास को मेरा रोम-रोम अपने अंदर सोख रहा था। मुझे मालूम चल रहा था कि इंसान बनना क्यों खुशकिस्मत वाली बात है। मैं इसी महकदार अहसास को मन में लिए न जाने कब सो गई।

दिन के बाद शाम ही आती है। यही दस्तूर है। लेकिन मैंने उल्टा देखना शुरू कर लिया था। मैं शाम के बाद दिन और सुबह को क्रम समझने लगी थी। अंधरे से भी मुझे प्यार हो चुका था। कई महीने गुज़रे चुके थे। ज़ोया का कोई आता पता नहीं था। मुझे तो खुशी ही थी कि अच्छा है उसका आना जाना बंद हो गया। उसके न रहने से हर जगह एक संतुलन ही दिखता था और है। वो जब सामने नहीं रहती तो अब्बा के कान भरने वाला भी कोई नहीं रहता। चैन ओ अमन होता है।
 
एक छुट्टी के रोज़ मैं अपने कमरे को दुरुस्त करते हुए गीत गा रही थी। तभी हाथ में कुछ महकी हुई चिट्ठियाँ आ लगीं। मेरे पूरे बदन में थरथराहट सी दौड़ गई। मैंने अपने कानों से आवाज़ों को देखा, जांचा और परखा कि कोई आसपास तो नहीं। क्योंकि मेरी नज़रें तो चिट्ठियों पर थी। मुझे वही महक आई जो कुछ महीने पहले दरवाज़े के खुलते वक़्त रोशनी के साथ कमरे में फैल गई थी। वही मोगरे वाली। मैं चिट्ठियों को एक टेबल पर रख धूल झाड़ने के काम में लग गई। काम कर के अपने लिए एक कप चाय बनाई। घर में कोई नहीं था इसलिए आज़ादी का बेहतरीन अहसास मन में घूम रहा था। चाय का कप टेबल पर रखते हुए मैंने चिट्ठियों को मीठी नज़र से मुसकुराते हुए देखा। कुछ ही पल में एक चिट्ठी मेरे हाथों में थी। न जाने कौन सा इत्र था जो मेरे रोम रोम में समा रहा था। मैंने चिट्ठी खोली और पढ़नी शुरू कर दी।...

 अभी पहली पंक्ति के रस को पीया ही था तब तक न जाने कहाँ से ज़ोया धमक पड़ी। उसने गुस्से में मेरे हाथों से चिट्ठी खींच ली। मैंने भी गुस्से में उससे कहा- 'पागल हुई जाती हो क्या? दिमाग नहीं रखती कि किसी की निज़ी चिट्ठी को नहीं लिया जाता।'

वो तो जैसे फूंफकार रही थी। डंसने के लिए तैयार थी। उसने गुस्से की नज़रों से कहा- 'तूने अब्बा की इज्जत का ख़याल नहीं रखा। बदनामी का गुल ऐसे खिला रही है कि गली मोहल्ले में तेरी ही चर्चा चल रही है। अपने दुपट्टे को ऐसा लहरा आई है कि हर कोई दूसरा लड़का इसकी छाया को बेताब है। कुछ तो ख़याल रखा होता कि तू एक लड़की है। अपना ही सोच रही है। ज़ाहिल कहीं की! पढ़ाई का असर भी नहीं तेरे पास। जाने क्या आग लगी तेरे बदन में।' ...वो बोले जा रही थी। मैंने उसे बहुत कोशिश की अनसुना कर ने की। मैंने कर भी दिया। पर वह हिंसक हो गई और अचानक मेरी बेशकीमती दौलत पर हमला बोल दिया। उसने टेबल से चिट्ठियों पर एक झपट्टा मारा और रसोई घर की तरफ़ भाग निकली। मैं ज़ोया चिल्लाते चिल्लाते उसके पीछे हो ली। मेरा पारा चढ़ चुका था। मैं अपने आपे में नहीं थी। फिर भी मैंने उसके आगे चिट्ठियों के लिए मिन्नतें कीं।

उसने पास में पड़ी माचिस से गैस चूल्हा जला लिया। मैं, 'ज़ोया मेरी चिट्ठियाँ लौटा दो कहती रही।' उसने मुझे दोनों हाथों से सामने की दीवार पर धक्का दे दिया। मैंने संभलने की कोशिश की फिर भी मैं दीवार पर जा लड़ी। मेरी दोनों कुहनियों पर ज़ोरदार चोट लगी। तब भी मैं उठी और ज़ोया की तरफ झपटी। मेरी फुर्ती तेज़ साबित नहीं हुई थी। उसने चिट्ठियों को गैस पर बेदर्दी से झोंक दिया था। मैं अम्मी अब्बा के नाम से भी चिल्लाई। सोचा क्या पता कहीं से आ जाएँ और ज़ोया को रोक दें। पर वहाँ कोई नहीं था तो आता कौन! मेरी चिट्ठियों से चमकीली आग निकली और काले धुएँ के साथ उन्हें काले पेपर-पापड़ में तब्दील कर गई। मैं अब उबल रही थी। मैंने ज़ोया को ज़ोर से धक्का दिया। उसका सिर बर्तन वाली दीवार से टकरा गया। इस बीच बर्तनों के गिरने की तेज़ आवाज़ हुई। लेकिन मुझमें सब्र नहीं था। मैं ज़ोया को यह बतला देना चाहती थी कि उसने बहुत बड़ा ज़ुर्म किया है और उसे इसकी सज़ा मिलेगी।

पर वह कम नहीं है। उसने बड़ी पक्की परवरिश का खून दौड़ता है। उसे इज्ज़त और बेइज्ज़त जैसे शब्दों का बड़ा ख़याल रहता है। उसके मुताबिक़ मैंने मुहब्बत कर के बड़ा पाप किया है। मुझे इस बात का कतई हक़ नहीं कि मैं इस तरह से परवाज़ भरूँ। उसने अपने माथे को बाएँ हाथ से छूआ तो खून लिपट आया। उससे अपना खून देखा न गया। उसका बहता खून देख कर इस बीच मेरा दिल पसीज गया। मैं उसके पास उसे देखने दौड़ी तब तक उसने चाकू से मुझपर हमला कर दिया। वो उठी और मेरे पेट पर कई चाकू से वार किए। मुझे पता था कि अब मैं मर जाऊँगी। मैं कमजोर थी। ज़ोया ख़तरनाक। उसने बचपन से कट्टर ख़याल पाये हैं और मैंने ख़यालों की कट्टरता को कभी अपनाया ही नहीं। मैंने रुई से भी हल्के अहसासों को जीना चाहा था पर ज़ोया की नज़र में यह गुनाह से कम न था। मेरा जिस्म ज़मीन पर गिर चुका था। रसोई में खून था। मैंने दर्द से जो आँखें बंद की तो वापस न खुलीं।

दूसरी तरफ़ ज़ोया खुश थी कि उसने एक बहकी हुई लड़की और तय नियमों को न मानने वाली रूह को शरीर से बाहर कर दिया था। उसने मेरी लाश को घर के पीछे खाली पड़ी ज़मीन में दफन कर दिया। ज़ोया में दिली और जिस्मानी ताक़त हद से ज़्यादा रही है। इसलिए उसको इस काम में कोई दिक्कत नहीं आई। लगभग दो घंटे में उसने मेरी सारी निशानियों को ख़त्म कर दिया था। कुछ बचा ही नहीं था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि रसोई में किसी का क़त्ल किया गया है।

अगले रोज़ अम्मी और अब्बा आए तब तक ज़ोया नॉर्मल बन गई थी। अम्मी को कुछ शक़ भी हुआ कि ज़ोया के मिजाज़ से मैं ग़ायब हूँ पर अब्बा ने कहा कि लड़की हमारी एकदम दुरुस्त है। तुम नाहक़ ही चिंता करती हो। शाम के खाने पर भी मैं ज़ोया के अंदर नहीं दिखी। अब्बा ने कहा कि पढ़ाई का असर बच्ची के दिमाग़ पर काफी हो गया है। आराम करेगी तब ठीक हो जाएगी। पर अम्मी का शक़ है कि जाता नहीं। उन्हें रसोई में खून की गंध लगी थी। सो वो रात को ज़ोया के पास आ गईं। वो अपने तई कुछ तफ़तीश करना चाह रही थीं। ज़ोया पढ़ाई के टेबल के साथ बैठी थी। अंधेरे में। अम्मी ने पास जाकर ज़ोया के सिर पर हाथ रखा और मैं फफक फफक रो पड़ी। मैंने अम्मी को बताया कि ज़ोया ने आपकी ग़ैर-हाज़िरी में मेरा क़त्ल कर दिया था। अम्मी को समझ नहीं आया कि ज़ोया को आख़िर हो क्या गया है।  


                                                            पिकासो की एक पेंटिंग

कुछ दिनों बाद अब्बा गुलाब के कुछ कलम खरीद लाये और वहीं लगा दिया जहां मैं दफ्न थी। मुझे सुकून मिला। मुझे ठंडक का अहसास हुआ। अम्मी ने बड़े जतन से उन नन्हें पौधों की देख रेख की। उनमें गुलाब की कलियाँ आने लगी थीं। सब ठीक चल रहा था। अब ज़ोया का बर्ताव भी बदल गया था। वह शांत रहती थी मानो किसी गुनाह के लिए अफ़सोस में जीती हो। अम्मी उस पर ग़ौर किया करती थीं। 

एक रात अम्मी ने अपनी डायरी में दर्ज़ किया- 'ज़ोया, पीर के रोज़ अंधेरे में उन गुलाबों को अपने आसुओं से सींच रही थी। न जाने मेरी इकलौती बच्ची को कौन से साये ने घेर लिया है! दिन भर कुढ़ती है। जैसे उसने किसी का क़त्ल कर दिया हो। गुलाब के पौधों के पास ऐसे शांत होकर बैठती है जैसे किसी अपने के मरने के ग़म का मातम मना रही हो।...मैंने ज़ोया के अब्बा से दरगाह पर चादर चढ़ाने को कह दिया है। मैं तो चाहती हूँ कि हमारी बच्ची के सिर से जो भी बला है जल्दी चली जाये...!'    

    

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय सात: गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?)

  7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की ? बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन ( Beelzebub’s Tales to His Grandson ) , जिसे गुर्जिएफ़ अपने शिक्षण ...