Friday, 24 May 2019

एक सुबह जो पुरानी ही है

कल वीरवार था और आज शुक्रवार. यही तो बदला है. जिनको बाहर काम की तलाश में जाना है वे फिर से जाएंगे चिड़ियाँ, जब मैं सुबह सो रही थी तब तक वे अपने दाना दाना खोजने और खाने की तलाश में निकल गई होंगी. बस वाले फिर से बस चला रहे होंगे. सब्जी वाले अभी तक मंडी पहुँच गए होंगे. अखबार वाला बिलकुल भोर में अख़बारों को फेंक रहा होगा. सडकें अपनी जगह पर होंगी. क्षमता से ज़्यादा रेलें जान और माल ढो रही होंगी. बेहद ग़रीब सड़क पर सो रहा होगा. तो दूसरा कामगार ग़रीब उसी सड़क को साफ़ कर रहा होगा.

मैं फिर पूछती हूँ बदला क्या है?

मैं फिर से अपने रूटीन में के खोल में घुसने की तैयारी कर रही हूँ. जिसके पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं उसको हार का क्या ग़म भला. हम तो हर रोज़ इंसान बने रहने की लड़ाई में यकीं करते हैं. मेहनत करते हैं फिर खाते हैं. फिर सो जाते हैं. अपनी सुबह में ही मेहनत घुली रहती है. आप उस लड़ाई का दुःख न मनाओ जिसमें आपका कुछ था भी नहीं.

                                                                 

मैं फिर से पूछती हूँ कि आख़िर बदला क्या है?

कल ही शाम को घर लौटते हुए किसी ने उस रेप की ख़बर को बताया जिसमें अपराधी घर में घुसकर रेप कर गया. घर में! जी हाँ, उसी घर में जिसमें हम शाम को घर लौट कर आते हैं. जिसमें हम खुश होते हैं. आराम करते हैं. त्यौहार मनाते हैं. अब घर ही अपराध की जगह में तब्दील हो रहे हैं. क्या ये पहले से ही अपराध में तब्दील होते थे? यह सवाल मुझे परेशान तो नहीं करता पर मैं सोचती हूँ.

मैं हज़ार बार यही सोच रही हूँ कि बदलता क्या है? बदल क्या रहा है? जो बदल गया तो क्या हासिल क्या हुआ? जो नहीं बदलता तो क्या हासिल होने से छूट जाता? कल भी मेरी गरदन पर एक धारदार तलवार साथ रखी जाती थी. आज भी साथ है और शायद मरने तक रहेगी. 

Friday, 17 May 2019

अपार ख़ुशी का घराना- एक छोटा नोट

कुछ समझ नहीं आ रहा कि कैसे शुरुआत की जाए. लेकिन कहीं न कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ती है. इसलिए इस पोस्ट की शुरुआत पढ़ी हुई किताब पर बात कर के करती हूँ. मेरे पास जितना भी वक़्त जो सिर्फ मेरा होता है, बचता है उसी वक़्त में मैंने इस किताब को पढ़कर पूरा किया. "अपार ख़ुशी का घराना" किताब अरुंधती के लिखे अंग्रेज़ी उपन्यास "द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस" का हिंदी अनुवाद है. बहुत सी जानकारी आप गूगल से ले सकते हैं. पिछले साल के अंत में मैंने अपने आप से वादा किया था कि इस किताब को इस साल पढूंगी. यह वादा मैंने पूरा किया. शायद बेहद कम वादों में से एक यह है जो पूरा हुआ. 



खैर, उपन्यास काफी अच्छा है. एक बार पढ़ा जाना चाहिए. इसकी ख़ूबी यह है कि लेखिका उन किरदारों को केंद्र में रखती है जिनको हमने सामाजिक तौर पर कभी किरदार तो क्या इन्सान भी नहीं माना. आफ़ताब उर्फ़ अंजुम से आपको प्यार हो जाएगा. इस किन्नर किरदार में पूरी इंसानियत और करुणा को भरकर डाला गया है. बहुत प्यारा और वाजिब किरदार बन पड़ा है. यह अंजुम ही है जिसकी कहानी आपको किताब वापस रखने नहीं देती और आगे पढ़े जाने की दस्तक देती है. उसका जन्म और उसका नामकरण का क़िस्सा लेखिका इत्मिनान से सुनाती है. उसका ख्वाबगाह तक में जाने को लेखिका बेहद मार्मिक अंदाज़ में पेश करती है. लेकिन अंत में कश्मीर और उसके वर्णन में अंजुम को लेखिका थोड़ा भुला देती है. मेरी यहाँ यही गुजारिश थी कि अंजुम को और उभारना चाहिए था. बहुत कुछ उसके माध्यम से और भी कहा जा सकता था. 

किताब के अन्य किरदारों में मूसा, नागा, बिप्लव और तिलोत्तमा पाठक को कश्मीर और उसकी समस्या की तरफ ले जाते हैं. यह मेरा ख़याल है कि लेखिका ने गहरे में जाकर कश्मीर का हर बारीक़ वर्णन किया है जो वह कर सकती थीं. किसी भी जगह को देखने के कई रुख या आयाम हो सकते हैं. ठीक कश्मीर के साथ भी यही है. लेखिका की आलोचना करने वालों को अपने हिस्से का कश्मीर भी दिखाना चाहिए. लेखिका ने अपने विज़न से उन तमाम दृश्यों को रखा है जो वह समझती आ  रही हैं. 
  
लेखिका कश्मीर के अलावा अंत में एक किरदार की चिट्ठी के सहारे नक्सल की समस्या को पेश करती हैं. यहाँ भी मेरा यही ख़याल था कि इस  समस्या पर और भी लम्बा लिखा जाना चाहिए था जितना कश्मीर पर लिखा गया. आम पाठकों का कश्मीर और उसकी शब्दावली से रिश्ता न होने के चलते कुछ समझ में हेर-फेर हो सकती है. लेकिन बाकी जगह वह बहुत बेहतर ढंग से सबकुछ बताती चलती हैं. 

इस किताब की महिला किरदारों की बात की जाए तो दिलचस्प यह है कि अरुंधती ने उन तमाम लकीरों पर क्रोस लगाया है जो टीवी की दुनिया में हर पल छाये रहते हैं, सुंदरता का पैमाना लिए. महिला किरदार का रंग काला है और वे सभी अपनी तरह से सुन्दर हैं. (मुख्य क़िरदार) तिलो से आपको अंत में प्यार जो जाएगा. लेकिन उसकी अंत में अक्रियाशिलता आपको चुभ भी सकती है. और बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन अच्छा यह है कि पाठक ख़ुद से पढ़कर अपनी बात रखें.अन्य बहुत से क़िरदार हैं जिन्हें जानने के लिए आप को किताब पढनी होगी. सबकुछ तो नही बताया जा सकता.

चलते चलते इतना है कि इतने बड़े उपन्यास का फलक तैयार करना और अंत तक उसे बनाए रखते हुए निभाना कोई मामूली बात नहीं. जगह जगह लेखिका तथ्य भी रखती है जो एक अच्छी बात है. लेखिका के पास एक अपनी शब्दावली है जो वह कहीं सी नक़ल नहीं करती.  एक महीन चलती हुईप्रेमकथा भी है जोतड़प सी पैदा करती है और हमदर्दी भी. मैं पढ़ते वक़्त यही सवाल कर रही थी क्या सब कुछ ठीक नहीं हो सकता? कब होगा सब ठीक?

एक अंतिम बात अनुवाद उम्मीद से बेहतर है. पढ़िए कि दुनिया आपके ग़म और दुःख से परे भरी हुई है. जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूँ तो दूर कहीं सर्दी की वादियों में बंदूकें अपना निशाना साध रही होंगी. कर्फ्यू एक ज़िद्दी धब्बा बना हुआ होगा. सेना और आम लोगों के बीच तनाव बरक़रार होगा. त्रासदी यह है कि दोनों पक्ष अपने लोगों की सलामती की दुआ मांग रहे होंगे. हम जैसे रातजग्गी इस पोस्ट में उस दर्द को समेटने की कोशिश में भी होंगे.

फिर भी कहूँगी, दुनिया को जिंदगी के नाम होना चाहिए.  




 

Sunday, 5 May 2019

ओझल कविताएं

कभी कभी यह सोचती हूँ रूक कर
माँ ने अगर कोई कविता रसोई में गाई होगी 
तो उसका रंग कैसा होगा?
उसकी बनावट क्या रोटी और चाँद की तरह गोल होगी? 

क्या वह हल्दी की तरह पीली होगी?
क्या वह कविता
प्याज़ की तीखी गमक से सनी होगी?
या फिर प्याजी आंसुओं से तर होगी?

दाल की छौंक में कहीं माँ ने एक कविता
गुनगुनाई तो ज़रूर होगी.
इसका मुझे सौ प्रतिशत यकीं है
क्योंकि माँ का खाना एक-दो रोज ख़राब भी होता था

पिता के गुस्से के बावजूद
माँ स्थिर रहती थी  कई बार
यह स्थिरता माँ में ज़रूर कविता ने पैदा की होगी
दोनों ने एक-दूसरे को पूरक किया होगा



(जिस कविता ने माँ के अंदर कवयित्री पैदा की होगी)

उसका विरोध ज़रूर आटे के डिब्बे में बंद हुआ होगा
या फिर चाकू से सब्ज़ियों की तरह उसने
अपने कविता गीत को सम्पादित किया होगा
मुझे यकीं है कि उसकी रचनाएं

भोजन के रूप में रही होंगी
जिसे हम सब ने ख़ूबी से पचाया
हमने उसके हाथ के बने खाने को नहीं
उसकी रचनाओं को खाया...

मुझे यकीं है कि मेरी माँ
अच्छी कविता लिखती होगी
अदृश्य कविता जो बर्तन वाले ख़ाने
पर लटका करती होंगी

आज भी वे कविताएं
अपनी गूँज लिए
रसोई में रहती हैं
जहाँ माँ कविता बनाया करती थी

Thursday, 24 January 2019

एकालाप (कहानी)

"उमस...! सच कहूँ, मौसम का यह मिज़ाज़ मुझे कभी पसंद नहीं आया। सारा दिन मैं गर्मी में घुटकर पड़ी रह जाती हूँ। यह कमरा भी तो देखो, यहाँ एक रोशनदान तक नहीं है जहाँ से हवा, रोशनी या कुछ भी अंदर आ सके। इतनी भी गर्मी कहीं पड़ती है भला ! बिजली के क्या कहने ! आती है, जाती है। बस यही लगा रहता है। हाथ का पंखा एक पल भी हाथ से छूटता नहीं। छोड़ो तो मक्खियाँ मुझे खा जाने को आ जाती हैं। हिकारत - सी होती है मुझे कभी - कभी। ज़िंदगी में बहुत गड़बड़ है। आजकल तो मुझे लगता है, ज़्यादा ही झोल - मोल रहती है। तुम भी तो जब देखो पेट में इधर - उधर चैन से नहीं बैठती। कभी यहाँ घूम जाती हो तो कभी वहाँ। मुझे ऐसा लगता है कि मध्यम आकार की कोई मछली मस्ती कर रही हो। ओह ! मुझे ऐसे ख़याल नहीं लाने चाहिए। तुम पर खराब असर हो सकता है। पर मैं क्या करूँ ? मेरे आसपास का माहौल मुझे अच्छा सोचने भी नहीं देता। 

इसी बीच बिजली आने से पंखा धीमे - धीमे चलता हुआ तेज़ी से चलने लगा।
ओह ! अब मैं राहत की सांस ले सकती हूँ। अब पलंग पर जाकर लेट सकती हूँ। मेरा रंग कॉफी की तरह हो रहा है। चेहरे पर पसीने की बूंदें इस समय सो रही हैं। चेहरे पर एक अजीब - सा खिंचाव, हताशा, चिड़चिड़ाहट और असंतोष रहने लगा है। कमरे ने भी मेरे इस भाव के मुताबिक अपनी ऐसी ही रंगत बना ली है।

मैंने पीले रंग की ढीली - ढाली मैक्सी पहन रखी है। सोने का बिस्तर महकदार है। इस पर मैली और फटी हुई गहरे हरे रंग की चादर बिछी है। मैं अपनी इस दशा में काम नहीं कर पा रही हूँ। पलंग की वजह से कमरे में अधिक जगह नहीं बच पाती। बची हुई जगह में एक बर्नर वाला गैस स्टोव और छोटा सिलेन्डर दुबका पड़ा हुआ है, देखो तो। पास ही दीवार में ईंटों की एक रद्दी छोड़ी हुई अलमारी थी जिसमें रोते हुए दो कप दिख रहे हैं, उधर देखो। कुछ तश्तरियाँ और गिलास हैं। एक प्लास्टिक की मैली बाल्टी है। इसी में कपड़े धुलते हैं और नहाना भी इसी से होता है। मुझे याद है, जब यह बाल्टी खरीदकर लाई गई थी तब इसका रंग लाल था। चमकदार लाल !

कितना अच्छा हो चीज़ें बदले ही न। मैं ज़्यादा पढ़ी - लिखी तो नहीं पर कभी - कभी बहुत अजीब तरह से सोचने लगती हूँ। जैसे कोई दार्शनिक सोचता होगा। जब करने - धरने के लिए कुछ न हो तब दिमाग को करने के लिए बहुत कुछ मिल जाता है। सारा झोल दिमाग का ही है। दिल तो सिर्फ एक मांस का लाल लोथड़ा है। फिल्म वालों ने दिल को इस तरह पेश कर दिया है कि कल का पैदा हुआ बच्चा भी आशिक़ी के नगमें दिल से शुरू करता दिख रहा है। मुझे तो लगता है कि जीवन में सब कुछ, हमारा शरीर भी अपने - अपने हिस्से का काम करते हैं। बाहर के माहौल से टकराहट ही जीवन है। और अंतरंग मन का क्या ? हमारे अंदर भी कितनी टकराहटें होती हैं हर पल।

       


सुनो, तुम पेट में मचलो मत। तुम्हारे ऐसा करने से मेरे ख़याल बिखर जाते हैं। ऐसा लगता है पेट में कुछ घुमड़ - घुमड़कर हवा चल रही है। 

मैं भी कितनी पागल हुई जा रही हूँ। तुम मेरे पेट में से कैसे देख सकती हो यह दशा ? लेकिन तुम्हें पता है, तुम और मैं अलग नहीं हैं। तुम मेरे शरीर से जुड़ी हो। यह बहुत अद्भुत बात है कि मुझे हूबहू अपने जैसे इंसान बनाने की कला आती है। सभी औरतें ऐसा कर सकती हैं। और जो नहीं कर सकते वे कला के ज़रिये अपने को पेश कर लेते हैं। इसलिए तुम मेरी कला हो। कला के पास वह दिव्य शक्ति होती है जो सबकुछ देख सकती है और जीवन में बहा करती है। तुम कहोगी मैं फिर अजीब - सी दार्शनिक बातें कर रही हूँ। अच्छा है न तुम सुनती भी तो हो। तुम मेरे लिए सुनने वाले दो कान हो।

अभी सोने का समय नहीं हुआ है तुम्हारा। तुम सुनती हो तो लगता है कि मेरे साथ कोई है। तुम पेट में तैरती हो तो लगता मैं ज़िंदा हूँ। मैं मर नहीं सकती, क्योंकि तुम मेरे अंदर हो। 

अच्छा एक बात कहूँ ? मैं दार्शनिक नहीं हूँ। मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं है, शायद है भी ! मैं एकालाप बहुत करती हूँ।"


- महिला लंबी सांसें ले रही थी। ऐसी जो शायद वे कभी भूल गई हो। उसका पेट उभरा हुआ था। गर्भ के चलते ही वह सिकुड़कर और छोटी दिख रही थी। बाल बेढब थे। कंघी किए शायद काफी समय हुआ था। दयनीय स्थिति की उस समय मालकिन थी। अगर कोई भी व्यक्ति उसे देखता तो शायद उसे अच्छा खाना बनाकर तुरंत खिलाता। कमरे की एक दीवार पर दो कमीज़ें भी थीं जिससे पता चलता है कि उस महिला के साथ कोई रहता भी है। घर की स्वामिनी तो वह नहीं ही लग रही थी। पर कमीज़ें चिल्ला - चिल्लाकर बता रही थीं कि वे ही इस घर की मालिक हैं। शाम होते ही वे कमीज़ें बता देंगी कि वे सही हैं। सौ फीसदी सही।
उसने पलंग पर बाईं ओर करवट बदलते हुए फिर कहना शुरू किया -

"उस रात मैंने अजीब - सा सपना देखा। मैं भी कितनी मूर्ख हूँ। सपने तो अजीब होते ही हैं।तुम बहस कर रही थी मुझसे। बहस से मेरा रक्तचाप बहुत बढ़ गया था। मैंने कहा, देखो ज़रा, अभी खुद तो नाल से टिकी है और मुझसे ज़ुबान चला रही है ! मैं सांस न लूँ न, तो मर जाओगी तुम ! बेमौत...।

लेकिन तुम कुछ न बोली। तुम्हारी तो सूरत भी अभी विकसित नहीं हुई होगी। अजीब - सी पीली और भूरी शक्ल थी तुम्हारी। शरीर के नाम पर पिलपिला मांस। तुम बहुत ही दयनीय लग रही थी। मुझसे भी अधिक दया करने लायक प्राणी। मुझे किसी शक्ति से यह बात पता थी कि तुम लड़की हो...एक लड़की ! मैंने आँखें बंद कीं तो एक तरह के रंग के छींटें दिखाई देने लगे। शायद ये सब मेरे ज़्यादा सोचने का नतीजा है।

तुम चूंकि जन्मी नहीं हो इसलिए मैं तुमसे अच्छे से और मुनासिब बातें कह पाती हूँ। मैं अधिक पढ़ी - लिखी तो नहीं। पर लिखना जानती हूँ। मैं डायरी लिखती पर इस तरह का खर्च और रचना करना भी हम गरीबों के लिए भारी है। इसलिए मैं तुमसे ही बात कर लेती हूँ और सोचती हूँ कि मेरी बातें ही मेरी रचना है। और तुम, जिसने अभी जन्म नहीं लिया उस रचना की क़द्रदान। तुम मेरी डायरी ही हो। तुम्हें मैं एक तरह से रच ही तो रही हूँ।

अभी मेरी उम्र बत्तीस के पड़ाव पर है। जब मैं बाईस या तेईस की रही होउंगी, तब मैं कुछ - कुछ अंतराल में एक सपना देखा करती थी। बाईं ओर सीने की जगह पर कुछ चलता रहता था। बाद के बरसों में पता चला इस मांस के अंदरूनी लोथड़े को ही दिल कहते हैं। कुछ लोग मन भी कहते हैं। लेकिन एक बात कहूँ, जब दिल कहती हूँ तो ठोस चीज़ का अहसास होता है और जब मन कहती हूँ, तब अदृश्यता ही समझ आती है। मुझे दोनों से ही प्रभावित होने की मनाही थी। मैंने सपने में देखा, मैंने दिल को एक क़ैदखाने में ले जाकर रख दिया है। तुम कहोगी मैं पागल हूँ। पर मैं कहूँगी, नहीं ! यह सपना है। सपने अजीब ही होते हैं। 

जब मैंने उसे एक ऐसी जगह रखा जहाँ उसके मरने की अधिक संभावना थी तब मुझे डर भी लगा कि इसके बिना मैं जी भी पाऊँगी या नहीं। मुझे समझाया गया, खूब समझाया। इसके बिना लड़कियों की उम्र ज़्यादा होती है। मैं मान भी गई। कुछ दिनों बाद दिमाग भी निकालकर मैंने उसी तय क़ैदखाने में जा रख छोड़ा। इस बार मैं बहुत डर गई। घर आकर मैं बेहद परेशान रहने लगी। हालांकि मुझे यह बताया जाता रहा कि तुम ऐसी ही रहती आई हो सदियों से। लेकिन मेरी बेचैनी ने मुझे चैन न लेने दिया। मुझे लगा मैं मर रही हूँ। मुझे खुद को मरने से रोकना था। कैसे भी करके दोनों को वापस अपनी जगह सेट करने का खयाल था।

क़ैदखाने के गेट पर अजीबोगरीब जल्लाद बैठा करता था। अजीब इसलिए कि वह पूरा सामान्य - सा इंसान था। बिल्कुल सामान्य। मुझे हैरत हुई।

...तुम सुन तो रही हो न ? बोर हो जाओ तो बताना !

मैंने एक हफ्ते तक उस जगह के बारे में जानकारी जुटाई। इस काम में जोखिम था। लेकिन जोखिम ही ज़िंदगी की सच्चाई और सिंचाई है। मैं यह जोखिम नहीं उठाती तो मर सकती थी। फिर मुझे आगे आने वाली पीढ़ियों का भी खयाल आया। 

मैंने घड़ी के समय के मुताबिक रात एक बजे का समय चुना। मैं गई। जल्लाद से बोली कि एक झलक लेनी है दोनों की। बाहर से ही देखकर वापस आ जाऊँगी। उसे बहुत मनाना पड़ा। तब जाकर वह माना। जहाँ दोनों क़ैद थे, उस कमरे में एक आदमक़द खिड़की थी। मैंने बाहर से देखा। तुम यकीन नहीं करोगी। एक अजब रोशनी से वह जगह गुलज़ार थी। हरी लताएँ, ढेरों ताज़ा पत्तियाँ, फल, सबकुछ !
ऐसा लगा कि ज़िंदगी यहीं गुलज़ार है। मैंने नज़रें घुमाई तो देखती हूँ कि ढेरों किताबें, डायरियाँ और कलम वहाँ पड़ी थीं। मुझे बहुत हैरत हुई।

मुझे ऐसा अद्भुत दृश्य कभी नहीं दिखा था। एक पल को लगा कि दीवार टूट जाये और मैं वहाँ घुसकर इस नज़ारे को पास से निहार लूँ। इस खूबसूरती को देखने के दौरान अपने दिल और दिमाग की खबर के लिए नज़रें घुमाईं तो वे नहीं दिखे। मुझे फिर हैरत हुई। बाहर जल्लाद से पूछा कि कमरे में किताबें, लताएँ, पेन आदि के क्या कारण है ? तब वह घूरते हुए बोला इनसे दूर रहो। हिम्मत भी नहीं करना इनको देखने या छूने की। मैं घर आई। कई दिन सोई नहीं। इसी दौरान अपने कॉलेज के किताबघर गई। मैं अब भी सांस लेने की कमज़ोरी से गुज़र रही थी। पर जैसे ही किताब घर गई और उन्हें छूआ तब मेरा दर्द और रोग जाता रहा। मैं ठीक - सा महसूस कर रही थी। अब मुझे यह डर था कि अगर मैं इस जगह से निकलूंगी तब फिर सांस कम होगी और शायद मैं मर जाऊँगी। इसलिए काफी देर बैठी रही।

किताबघर बंद करने का समय हुआ तब मेरा डर और बढ़ा कि अब क्या होगा। मैंने आनन - फानन में जितनी किताबें जारी की जा सकती थीं, उतनी करवाकर अपने बैग में रख लीं। अपने संग ले आई। रात भर बैग अपने पास ही रखा। नज़रों से ओझल नहीं होने दिया। उनके पास होने से मुझे क़ैदखाने का वही दृश्य दिखा। अच्छा लगा।
अब यह सपना नहीं आता। कुछ दिन बाद मेरी शादी हुई और मेरा नाता किताबों से कम हो चला। चोरी - चुपके से सिरहाने कुछ अखबार की कतरने रखती हूँ या फिर कोई दो रुपए का पतला पैन जिनसे मुझे ऊर्जा मिलती रहती है। तुम जब आओगी तब तुम मेरी जैसी गलती मत करना। हमारी सारी शक्ति इन्हीं किताबों में है। इसलिए तुम इनको अपने से चिपका कर रखना ! सुन रही हो न ? मैंने क्या कहा ? कहीं तुम सो तो नहीं गई ? तुम कभी भी अपना दिल और दिमाग अपने से जुदा मत करना। वरना तुम्हें भी सांस लेने की परेशानी होगी और हो सकता है...।"
- इतना कहकर वह औरत अपनी करवट बदल लेती है,
"...कि तुम्हारी जान पर भी बन आए। हाँ, मुझे याद ज़रूर करते रहना !"

Wednesday, 15 August 2018

एक नोट

आपको पता है 15 अगस्त को क्या हुआ था?
टीचर का यह सवाल ऐसा था जो अब समझ आया. इस सवाल की मंशा जवाब की इच्छा के साथ नहीं थी बल्कि दिमाग में यह बैठा देने या जमा देने की जिद्द के साथ थी कि आपको आज़ादी मिली थी. यह वहम था. क्या सिर्फ अंग्रेजों से ही आज़ादी चाहिए थी? देश को आज़ादी मिली थी. हम अंग्रेजों के गुलाम थे. वो हम पर राज करते थे. हमें बहुत से नेताओं और लोगों ने आज़ादी दिलाई.  टीचर ने बहुत सालों तक यहीबताया जब तक स्कूल में पढ़ती रही. अब तो थकावट सीलगती इन जवाबों और बातों से. क्या मुझे भी आगे इसी जवाब को दोहराना होगा? यह सवाल अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है. 
फिर भी मैंने यह जवाब याद कर लिया था.

15अगस्त 1947- देश आजाद हो गया!

 ...15 अगस्त सन् 1947 को आज़ादी मिली थी. मैंने बहुत कुछ याद किया.
पर वास्तव की ज़िन्दगी में आज़ादी शब्द और बर्ताव में फर्क था. दिमाग से लेकर दिल में जंजीरें थीं और हैं. आज भी बहुत बड़ा बदलाव नहीं है. कभी कभी लगता है मेरी ज़िन्दगी के साथ ही यह जद्दोजहद दफ्न हो जाएगा. आसपास कितना बुरा हो रहा है. बहुत बुरा. कभी कभी इतनी गहरी चोट लगती है कि वह दिखाई और बताई नहीं जा सकती.

मुझे आज भी एक आज़ादी का इंतजार रहता है. सभी के लिए इस शब्द के अपने मायने हैं और शायद सभी को इस आज़ादीका इंतजार होगा ...है!

खलील जिब्रान (Khalil Gibran) की प्रसिद्ध पुस्तक द प्रोफेट (The Prophet) का हिंदी अनुवाद (संपूर्ण पुस्तक)

  द प्रोफेट जहाज़ का आगमन   अलमुस्तफ़ा, चुना हुआ और प्रिय, जो अपने ही युग के लिए प्रभात के समान था , बारह वर्षों से   नगर में उस जहाज़...