Wednesday, 9 September 2026

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय दो: प्रारंभिक वर्ष)

वह व्यक्ति कौन था, जिसकी संकेंद्रित शक्ति से भरी उपस्थिति ने उसके इतने सारे समकालीनों को प्रभावित किया?



गुर्जिएफ़ के बारे में प्रकाशित शुरुआती विवरणों में से एक जे. जी. बेनेट की पुस्तक (ह्वट आर वी लिविंग?) ‘What Are We Living For?’ में मिलता है, जो 1949 में प्रकाशित हुई थी। उसी वर्ष जब गुर्जिएफ़ की मृत्यु हुई। बेनेट कहते हैं, “जो लोग ऐसी बातों में रुचि रखते हैं, वे कई वर्षों से यह जानते रहे हैं कि एक असाधारण शिक्षक पश्चिम में आ चुका था। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने ज्ञान के उन स्रोतों तक पहुँच प्राप्त कर ली थी, जिन तक उससे पहले किसी पश्चिमी अन्वेषक की पहुँच नहीं हुई थी।” वे आगे लिखते हैं, “गुर्जिएफ़ अपने तिरासीवें जन्मदिन से आगे निकल चुके हैं... उनका जन्म कॉकस क्षेत्र में एक पुराने यूनानी परिवार में हुआ था, जो सौ वर्ष से भी अधिक पहले एशिया माइनर की प्राचीन यूनानी बस्तियों में से किसी एक से वहाँ आकर बसा था। बचपन के आरंभिक वर्षों से ही उन्हें अनेक असाधारण व्यक्तियों से मिलने के अवसर मिले। इन लोगों के संपर्क से उनमें यह विश्वास पैदा हुआ कि मनुष्य और संसार के बारे में यूरोपीय विज्ञान और साहित्य में प्रचलित धारणाओं में कोई अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ छूट गई है। वही विज्ञान और साहित्य, जिनका अध्ययन करने के लिए उन्हें तैयार किया गया था।”

वास्तव में, गुर्जिएफ़ की मृत्यु के समय उनकी आयु तिरासी वर्ष के आस-पास भी नहीं थी। उनके पासपोर्ट में उनकी जन्मतिथि 28 दिसंबर 1877 दी गई थी। यदि यह तारीख सही है तो उनकी मृत्यु उनके बहत्तरवें जन्मदिन से कुछ ही पहले हुई थी। अपनी पुस्तक ‘दि ऑकल्ट’ (The Occult) में मैंने 1873 की तारीख को अधिक संभावित माना है। जन्म-वर्ष में इस अंतर से गुर्जिएफ़ की राष्ट्रीयता के प्रश्न पर थोड़ा फर्क पड़ता है। यदि उनका जन्म 1873 में हुआ था तो वे तुर्की के नागरिक थे और यदि दिसंबर 1877 में हुआ था तो वे रूसी थे क्योंकि उनका जन्मस्थान गुमरू (Gumru) 1877 के रूस-तुर्की युद्ध के दौरान रूस के अधिकार में आ गया था। बाद में ज़ार के पिता के नाम पर इसका नाम अलेक्ज़ान्द्रोपोल रख दिया गया।

गुर्जिएफ़ के पिता यूनानी थे और उनकी माँ आर्मेनियाई। लगभग 1878 में उनका परिवार पास के शहर कार्स चला गया। 1877 में कार्स पर रूसियों ने अधिकार कर लिया था और वहाँ रहने वाले बहुत-से तुर्कों का नरसंहार किया गया था। जब कार्स रूस का हिस्सा बना तो हजारों तुर्क वहाँ से बाहर चले गए और हजारों रूसी वहाँ आकर बस गए। यह समझना महत्वपूर्ण है कि गुर्जिएफ़ का जन्म एक ऐसे जातीय मिश्रण वाले वातावरण में हुआ था अर्थात एक सुरक्षित और स्थिर संस्कृति के ठीक विपरीत परिस्थिति में। ऐसी परिस्थितियाँ व्यक्ति के भीतर अपनी जड़ों से कटे होने और असुरक्षा की भावना पैदा कर सकती हैं, लेकिन वे जीवित रहने की इच्छा को भी तीव्र कर सकती हैं। गुर्जिएफ़ जन्मजात रूप से जीवित रहने वाला व्यक्ति (survivor) थे।

उनके पिता पेशे से बढ़ई थे, लेकिन अपनी पसंद से वे एक बार्ड (bard) अर्थात पेशेवर कथावाचक थे। शुरू से ही गुर्जिएफ़ के भीतर अतीत के साथ गहरा संबंध-बोध था। उनके पिता एपिक ऑफ गिलगमेश (Epic of Gilgamesh)[1] यानी गिलगमेश के महाकाव्य के कुछ अंश सुनाया करते थे। एक दिन गुर्जिएफ़ ने एक पत्रिका में पढ़ा कि पुरातत्त्वविदों ने बेबीलोनिया में उस महाकाव्य की प्राचीन पट्टिकाएँ खोज निकाली हैं। वे बताते हैं कि उन्हें यह जानकर “इतनी आंतरिक उत्तेजना हुई, मानो मेरा भविष्य का भाग्य ही इस पूरी बात पर निर्भर करता हो।” उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि पत्रिका में छपी महाकाव्य की पंक्तियाँ लगभग वैसी ही थीं जैसी उनके पिता उन्हें सुनाया करते थे और फिर भी वे पंक्तियाँ हजारों वर्षों से मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आई थीं। यहाँ महत्वपूर्ण बात वह निहित संकेत है जिसे लेखक सीधे नहीं कहता, यदि प्राचीन ज्ञान का एक रूप इस तरह जीवित रह सकता था तो संभव है कि प्राचीन ज्ञान के दूसरे रूप भी इसी तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहे हों।

अधिकांश बच्चों की तरह गुर्जिएफ़ भी “occult” यानी गूढ़ विद्याओं और परा-मानसिक घटनाओं की दुनिया से आकर्षित थे। लेकिन अधिकांश बच्चों से अलग, इस क्षेत्र में उन्हें कुछ प्रत्यक्ष अनुभव भी प्राप्त हुए। अपने शिक्षक फादर बोगाचेव्स्की के घर पर गुर्जिएफ़ ने एक ‘टेबल रैपिंग’ (table rapping) सत्र देखा। इसमें मेज़ का एक पाया प्रश्नों के उत्तर देने के लिए थपथपाने या खटखटाने लगता था। उस समय गुर्जिएफ़ अपनी प्रिय बहन की मृत्यु के कारण अभी भी गहरे शोक में थे। उस पूरी रात वे जागते रहे और मृत्यु के बाद जीवन की समस्या के बारे में सोचते रहे। जब गुर्जिएफ़ ने अपने पहले शिक्षक, फादर बोर्श से ऐसी बातों के बारे में पूछा तो बोर्श ने दृढ़ता से कहा कि यह सब बकवास है। इसके परिणामस्वरूप गुर्जिएफ़ को उस व्यक्ति की बात पर ही संदेह होने लगा, जिसे वे पहले ज्ञान का साक्षात रूप मानते थे। उन्होंने इस विषय पर पुस्तकें उधार लेकर पढ़ीं, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।

एक बार एक मंदबुद्धि-सी भविष्यवक्ता ने उनकी मौसी से कहा कि गुर्जिएफ़ के शरीर के दाहिने हिस्से में एक बुरा घाव होगा और उनके साथ किसी आग्नेयास्त्र से दुर्घटना होगी। वास्तव में वह घाव उन्हें कुछ समय से परेशान कर रहा था, लेकिन उन्होंने इसके बारे में किसी को नहीं बताया था। एक सप्ताह बाद, जब वे बत्तखों का शिकार करने गए हुए थे तो गुर्जिएफ़ के पैर में गोली लग गई। इसके बाद गुर्जिएफ़ स्वयं उस भविष्यवक्ता के पास गए। वह दो जलती हुई मोमबत्तियों के बीच बैठी और काफी देर तक उनके अंगूठे के नाखून को घूरती रही जिसमें उसे ‘चित्र’ दिखाई देते थे। उसने जो भविष्यवाणियाँ की थीं, वे भी पूरी हुईं। हालाँकि गुर्जिएफ़ हमें यह नहीं बताते कि वे भविष्यवाणियाँ क्या थीं।

1888 में गुर्जिएफ़ ने एक बच्चे के चीखने की आवाज़ सुनी। उन्होंने देखा कि बच्चों के एक समूह ने एक यज़ीदी लड़के के चारों ओर एक घेरा बना रखा था। (यज़ीदी एक धार्मिक संप्रदाय था, जिसे आम तौर पर शैतान-पूजक माना जाता था।) वह लड़का उस घेरे से बाहर निकलने में असमर्थ था। जैसे ही गुर्जिएफ़ ने घेरे का एक हिस्सा मिटा दिया, बच्चा उससे बाहर निकल सका। गुर्जिएफ़ इस घटना से बहुत प्रभावित हुए। वह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास जाकर पूछते रहे कि इस घटना का क्या अर्थ हो सकता है। एक आदमी ने उनसे कहा कि बच्चों ने उनके साथ मज़ाक किया था। दूसरे ने कहा कि यह केवल हिस्टीरिया का एक रूप था। बाद के वर्षों में गुर्जिएफ़ ने यही प्रयोग एक यज़ीदी स्त्री के साथ किया। जब उसके चारों ओर एक घेरा खींचा गया तो वह उसके बाहर नहीं जा सकी। उसे बाहर खींचने के लिए गुर्जिएफ़ और एक दूसरे ताकतवर आदमी को मिलकर ज़ोर लगाना पड़ा। गुर्जिएफ़ ने यह भी पुष्टि की कि जब किसी यज़ीदी को घेरे से बाहर खींचा जाता है तो वह कैटालेप्सी (एक ऐसी अवस्था जिसमें शरीर लगभग जड़ हो जाता है) में चला जाता है। यदि उसे फिर से घेरे के भीतर रख दिया जाए तो यह अवस्था समाप्त हो जाती है। अन्यथा, गुर्जिएफ़ के अनुसार, यह तेरह या इक्कीस घंटे बाद अपने-आप समाप्त हो जाती है।

एक सुबह गुर्जिएफ़ ने स्त्रियों के एक समूह को उत्तेजित होकर बातें करते देखा। उनसे उन्हें पता चला कि एक युवक, जिसे पिछले दिन दफनाया गया था, ततार लोगों की प्रथा के अनुसार मिट्टी की केवल हल्की परत के नीचे। रात में घर लौटने के लिए चल पड़ा था। किसी ने उसे देख लिया और शोर मचा दिया। पड़ोसियों ने उस शव का गला काट दिया और उसे वापस कब्रिस्तान ले गए। (दुनिया के इस हिस्से में पिशाचों की कहानियाँ प्रचलित हैं।) एक बार फिर गुर्जिएफ़ ने अपने परिचित हर व्यक्ति से पूछा कि इस घटना का क्या अर्थ हो सकता है।

अलेक्ज़ान्द्रोपोल से माउंट द्ज़ाद्ज़ुर पर स्थित एक संत की समाधि तक जाने वाले तीर्थयात्रियों के एक समूह के साथ गुर्जिएफ़ ने देखा कि एक लकवाग्रस्त व्यक्ति रेंगते हुए संत की समाधि तक पहुँचा और फिर वहाँ से पूरी तरह स्वस्थ होकर पैदल वापस चला गया। वह तब भी उतना ही चकित हुआ जब एक लंबे सूखे के दौरान अन्ताकिया का एक पादरी चमत्कार करने वाली एक धार्मिक प्रतिमा लेकर आया और बारिश के लिए प्रार्थना की। जब जुलूस वापस नगर की ओर लौट रहा था, तभी बादल घिर आए और मूसलाधार बारिश होने लगी।

गुर्जिएफ़ के घर के बगल में एक युवा विवाहित स्त्री ‘तेज़ी से फैलने वाले क्षय रोग’ से मर रही थी। एक सुबह, ठीक उस समय जब एक डॉक्टर गुर्जिएफ़ से कह रहा था कि वह स्त्री शीघ्र ही मर जाएगी, उसकी सास बगीचे में गुलाब के फलों को (rose hips)[2] तोड़ने की अनुमति माँगने आई। उसने बताया कि उसे स्वप्न में वर्जिन मेरी दिखाई दी थीं और उन्होंने उससे कहा था कि गुलाब के फलों को दूध में उबालकर उस मरती हुई स्त्री को पिलाए। डॉक्टर हँस पड़ा। लेकिन अगली सुबह गुर्जिएफ़ ने उस ‘मरती हुई’ स्त्री को चर्च से बाहर निकलते देखा। एक सप्ताह बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी। डॉक्टर ने समझाया कि यह सब महज़ संयोग था।

कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि बचपन और किशोरावस्था में गुर्जिएफ़ के सामने असामान्य घटनाएँ सामान्य से कहीं अधिक संख्या में आईं, मानो नियति उनकी अत्यंत सक्रिय बुद्धि को किसी निश्चित दिशा में ले जाना चाहती हो। उनका परिवार चाहता था कि वह पादरी बने। उसके पहले ‘शिक्षक’ फादर बॉर्श, जो कार्स मिलिट्री स्कूल के डीन थे (और व्यवहारतः पूरे क्षेत्र के ‘बिशप’ के समान प्रभाव रखते थे), इस बात पर ज़ोर देते थे कि पादरियों को चिकित्सा का कुछ ज्ञान भी होना चाहिए क्योंकि यदि बीमारी शरीर में हो और वे आत्मा को ठीक करने की कोशिश करते रहें तो वे अपना समय व्यर्थ कर सकते हैं। गुर्जिएफ़ का स्वाभाविक झुकाव हस्तकौशल की ओर भी था। उन्हें चीज़ों से छेड़छाड़ करना, उन्हें खोलना और फिर ठीक करना अच्छा लगता था। घर की टूटी-फूटी वस्तुओं की मरम्मत भी वह करते थे। वे अलेक्ज़ान्द्रोपोल जाकर तरह-तरह की मरम्मत का काम करके जेब-खर्च कमा लिया करते थे। (वह शर्म के कारण वहाँ जाते थे। वह नहीं चाहते थे कि कार्स में किसी को पता चले कि उनका परिवार कितना गरीब था।) इस प्रकार उनका समय धर्मशास्त्र, चिकित्सा और जूते ठीक करने या घड़ियों की मरम्मत जैसे हस्तकौशल के कामों के बीच बँटा रहता था।

ऐसा लगता है कि डीन बॉर्श ने गुर्जिएफ़ के जीवन-कार्य की नींव उन टिप्पणियों से रख दी थी जो वे मानव-स्वभाव के सामान्य ‘नियमों’ के बारे में करते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने बताया कि बहुत-से वयस्क इसलिए परिपक्व नहीं हो पाते क्योंकि अपने व्यक्तित्व को पूर्ण करने के लिए उन्हें विपरीत लिंग के ‘उपयुक्त प्रकार’ का व्यक्ति नहीं मिलता। यदि कोई व्यक्ति अपने लिए उस उपयुक्त प्रकार के व्यक्ति को नहीं खोज पाता तो संभव है कि अंततः उसे दूसरे दर्जे का कोई साथी मिल जाए, जो उसके व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से विकसित होने से रोक दे। डीन के अनुसार इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसके पास विपरीत लिंग का वह व्यक्ति हो जो उसके अनुरूप हो, तभी वह अपनी संभावनाओं को साकार कर सकता है। यह विचार सुनने में ऐसा लगता है मानो यह प्लेटो या गोएथे से लिया गया हो, लेकिन डीन ने इसका श्रेय ‘हमारे बहुत दूर के पूर्वजों’ को दिया। इससे फिर ऐसा प्रतीत होता था कि यह किसी प्राचीन ज्ञान का अंश है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चला आया था।

किशोरावस्था के शुरुआती वर्षों में गुर्जिएफ़ कभी तारीखों के बारे में स्पष्ट नहीं होते। उन्होंने तिफ़्लिस के रेलवे स्टेशन पर भट्ठी जलाने वाले कर्मचारी (stoker) की नौकरी कर ली। इसी दौरान उनकी पहली महत्वपूर्ण मित्रता अपने ही उम्र के एक व्यक्ति से हुई। उसका नाम सार्किस पोगोसियन था और वह धर्मशास्त्र का विद्यार्थी था। उसका पिता तुर्की का रंगरेज़ था। गुर्जिएफ़ के अनुसार, वह उन अलौकिक घटनाओं से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए एचमियादज़िन गया, जो उसे लगातार परेशान कर रहे थे। एचमियादज़िन आर्मेनियाई लोगों के लिए वही धार्मिक महत्त्व रखता था जो मुसलमानों के लिए मक्का का। वह अपने साथ एक पार्सल लेकर गया था, जिसे उसे एक युवा नवदीक्षित साधु तक पहुँचाना था। उस नवदीक्षित ने उसे अपने कमरे में रहने के लिए आमंत्रित किया।

उस समय गूर्जिएफ़ की अपनी विचार-दिशा मूलतः धार्मिक थी। वे तीर्थस्थलों पर जाते और धार्मिक स्थलों पर प्रार्थना करते थे। (यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि यदि परिस्थितियाँ कुछ अलग होतीं तो गुर्जिएफ़ यूनानी ऑर्थोडॉक्स चर्च का एक आर्किमैंड्राइट[3] बन सकते थे या रासपुतिन जैसे अत्यंत अपरंपरागत धार्मिक शिक्षक का रूप भी ले सकते थे।) बाद में पोगोसियन जो अब पादरी बनने के लगभग कगार पर था, तिफ़्लिस में गुर्जिएफ़ के पास रहने आया। पादरी बनने का विचार पोगोसियन को उदास करता था। जब गुर्जिएफ़ ने उसे स्टेशन पर नौकरी करने का सुझाव दिया तो वह तुरंत तैयार हो गया और ताला बनाने वाला बन गया। इस समय गुर्जिएफ़ ने कई महीने तिफ़्लिस और कार्स के बीच प्रस्तावित रेलवे मार्ग का सर्वेक्षण करने में बिताए। उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उन कस्बों और गाँवों के प्रभावशाली लोगों से संपर्क करना शुरू किया, जहाँ से रेलवे गुजरने वाली थी। उन्हें वहाँ रेलवे का एक ‘पड़ाव’ बनवाने की पेशकश की। उनमें से अधिकांश ने उन्हें रिश्वत दे दी।

तिफ़्लिस लौटकर उनके पास इतना पैसा था कि वे रेलवे की नौकरी छोड़कर अपना पूरा समय पढ़ने में लगा सकें। लंबी चर्चाओं के बाद वे और पोगोसियन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कोई ‘गुप्त ज्ञान’ अवश्य है, जो प्राचीन काल से चला आ रहा है। उन्होंने स्थानीय पुस्तक-विक्रेता से बहुत-सी पुरानी आर्मेनियाई पुस्तकें खरीद ली थीं। अब वे प्राचीन आर्मेनियाई राजधानी एनी के खंडहरों में चले गए, वहाँ एक झोंपड़ी बनाई और अपना पूरा दिन अध्ययन तथा विचार-विमर्श में बिताने लगे।

यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि ऐसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता गुर्जिएफ़ को उस क्षेत्र में रूसी-तुर्की युद्ध के बाद पैदा हुई अस्थिर परिस्थितियों के कारण मिली थी। यदि गुर्जिएफ और पोगोसियन सेंट पीटर्सबर्ग या कॉन्स्टेंटिनोपल में पैदा हुए होते तो उनके लिए उस ‘व्यवस्था’ में समा जाने और कोई सम्मानजनक पेशा अपना लेने से बचना कठिन होता। एशिया के उस इलाके में, जो कुछ हद तक अमेरिकी ‘वाइल्ड वेस्ट’ जैसा था, किसी को बहुत अधिक परवाह नहीं थी कि वे अपने परिवार की योजनाओं को नज़रअंदाज़ करके अपने अजीबोगरीब विचारों के पीछे क्यों जा रहे हैं।

इसलिए गुर्जिएफ़ और पोगोसियन अपना दिन बातें करने और उस प्राचीन नगर के खंडहरों में खोजबीन करने में बिता सकते थे। एक दिन भूमिगत रास्ते की खोज करते हुए उन्हें एक साधु की कोठरी मिली, जिसमें प्राचीन आर्मेनियाई भाषा में लिखी कुछ सड़ती हुई चर्मपत्र-पांडुलिपियाँ थीं। वे इन पांडुलिपियों को पढ़ने और समझने के लिए अलेक्ज़ान्द्रोपोल लौटे। पता चला कि वे किसी फादर आरेम को लिखे गए पत्र थे। उनमें से एक में कुछ ‘रहस्यों’ का उल्लेख था और उसके परिशिष्ट में ‘सरमूंग ब्रदरहुड’ का उल्लेख था, जो कभी सिरानूश नामक नगर में अस्तित्व में था। उन्होंने इस नाम को उस गूढ़ (esoteric) बंधुत्व के नाम के रूप में पहचान लिया, जिसके बारे में उनकी एक पुस्तक में कहा गया था कि वह ईसा से लगभग 2500 वर्ष पहले तक पुराना था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ये पांडुलिपियाँ सातवीं शताब्दी ईस्वी की थीं और उनमें जिस ‘निव्स्सी’ नामक नगर का उल्लेख था, वह वर्तमान मोसुल था। उनका यह भी मानना था कि सरमूंग ब्रदरहुड के वंशज वर्तमान ‘ऐसोर’ लोग थे। पांडुलिपि में लिखा था कि यह गुप्त विद्यालय निव्स्सी से तीन दिन की यात्रा की दूरी पर स्थित एक घाटी में चला गया था। वह स्थान बहुत दूर नहीं था। सीधे दक्षिण की ओर कुछ सौ मील। गुर्जिएफ़ और पोगोसियन ने तय किया कि यह देखना उचित होगा कि उस प्राचीन विद्यालय के कोई चिह्न अभी भी वहाँ मौजूद हैं या नहीं। अब उन्हें केवल इस अभियान के लिए धन की आवश्यकता थी। वह धन उन्हें आर्मेनियाई देशभक्तों की एक स्थानीय समिति से मिला, जिसने ‘मूश’ नामक स्थान पर एक अभियान भेजने का निर्णय लिया था। पोगोसियन ने उन्हें अपने और गुर्जिएफ़ को इस अभियान का प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए राज़ी कर लिया। इस प्रकार गुर्जिएफ़ ‘गुप्त ज्ञान’ की खोज में अपनी पहली यात्रा पर निकल पड़े।

दुर्भाग्य से, गुर्जिएफ़ ने यह बताना पसंद नहीं किया कि उन्होंने वहाँ वास्तव में क्या सीखा। वे अपनी पुस्तक ‘मीटिंग्स विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings with Remarkable Men) में बताते हैं कि वे और पोगोसियन दक्षिण की ओर गए और यात्रा के बड़े हिस्से में उन्होंने अपने आपको कॉकस के ततार लोगों के रूप में छिपाए रखा। उन्हें ऐसी अफ़वाहें सुनने को मिली थीं कि शिलालेखों की नकल करने की कोशिश करने वाले अंग्रेज़ों को ऐसोर लोगों ने ज़िंदा चमड़ी उतारकर मार डाला था। एक स्थान पर पोगोसियन को एक जहरीली मकड़ी ने काट लिया। गुर्जिएफ़ ने चाकू से ज़हर को काटकर निकालने की कोशिश की, लेकिन घाव में संक्रमण हो गया। एक आर्मेनियाई पादरी, जिसे उन्हें एक पत्र पहुँचाना था, ने उन्हें एक महीने तक अपने घर में रखा। उस पादरी ने गुर्जिएफ़ को अपने पास मौजूद एक पुराने नक्शे की कहानी सुनाई। एक रूसी राजकुमार ने वह नक्शा 500 पाउंड में खरीदने की पेशकश की थी और अंततः उसकी नकल करने की अनुमति के लिए 200 पाउंड दिए थे। गुर्जिएफ़ ने नक्शा देखने का अनुरोध किया और उसे देखकर अत्यंत उत्साहित हो गए। वह प्राचीन मिस्र का नक्शा था। जब पादरी घर से बाहर था, तब गुर्जिएफ़ और पोगोसियन ने किसी तरह वह नक्शा हासिल कर लिया और उसकी नकल कर ली। गुर्जिएफ़ स्वीकार करते हैं कि यह अनैतिक था, लेकिन उन्हें लगता था कि ऐसा करना आवश्यक था। बाद में स्मिर्ना में गुर्जिएफ़ और पोगोसियन नाविकों के दो गुटों के बीच हुई मारपीट में फँस गए और दोनों को मामूली चोटें आईं। अगले दिन बंदरगाह पर उन नाविकों ने उन्हें पहचान लिया। वे उन नाविकों के प्रति आभार व्यक्त करने आए थे। पता चला कि वे अंग्रेज़ थे। जब उन्हें पता चला कि गुर्जिएफ़ और पोगोसियन अलेक्ज़ान्द्रिया जाना चाहते हैं तो उनमें से दो नाविक इसकी व्यवस्था करने के लिए चले गए। परिणाम यह हुआ कि गुर्जिएफ़ और पोगोसियन एक अंग्रेज़ी युद्धपोत पर मिस्र के लिए रवाना हो गए। गुर्जिएफ़ जहाज़ के पीतल के हिस्सों को चमकाने का काम करते थे और पोगोसियन इंजन-कक्ष में काम करते थे। पोगोसियन ने जहाज़ के साथ लिवरपूल जाने का निर्णय लिया, जहाँ वह इंजीनियर बन गए। गुर्जिएफ़ मिस्र गए और फिर यरूशलम पहुँचे, जहाँ वह रूसी पर्यटकों के लिए पेशेवर गाइड बन गए। लेकिन हमें यह नहीं बताया जाता कि क्या गुर्जिएफ़ और पोगोसियन को वास्तव में अपना सरमूंग ब्रदरहुड मिला या गुर्जिएफ़ ने ‘रेत से ढके होने से पहले के मिस्र’ के अपने नक्शे के माध्यम से कोई महत्त्वपूर्ण खोज की। हाँ, वह एक विचित्र संयोग की बात अवश्य बताते हैं। यह मिस्र की उनकी दूसरी यात्रा थी। एक पिरामिड के नीचे बैठकर वे अपने नक्शे की प्रति देख रहे थे। उन्होंने ऊपर देखा तो पाया कि एक सफेद बालों वाला व्यक्ति उनके सामने खड़ा है। उस व्यक्ति ने बड़े उत्साह से पूछा कि गुर्जिएफ़ को यह नक्शा कहाँ से मिला। वह वही राजकुमार निकला जिसने आर्मेनियाई पादरी को उसकी नकल करने के लिए 200 पाउंड दिए थे। उसका नाम प्रिंस यूरी लुबोवेद्स्की था। गुर्जिएफ़ और वह घनिष्ठ मित्र बन गए।

बेनेट का विश्वास था कि अंततः गुर्जिएफ़ को अपना सरमूंग ब्रदरहुड या उनके आधुनिक वंशज मिल गए थे। बेनेट ने स्वयं ‘निव्स्सी से तीन दिन की घुड़सवारी की दूरी पर स्थित घाटी’ का पता लगाया और निष्कर्ष निकाला कि वह स्थान शेख़ अदी था, जो यज़ीदियों का प्रमुख पवित्र स्थल है। गुर्जिएफ़ यह भी बताते हैं कि इस ब्रदरहुड का एक केंद्र उत्तरी हिमालय में स्थित ‘ओल्मान’ मठ में था, जहाँ उनके अनुसार उन्होंने तीन महीने बिताए थे। ऐसा संभव है कि वहीं गुर्जिएफ़ ने अंततः उन रहस्यों की खोज की, जिन्हें एक दिन वह अपने शिष्यों तक पहुँचाने वाले थे।

अब तक पाठक के मन में शायद यह विचार आने लगा होगा कि गुर्जिएफ़ बहुत बड़ा मज़ाक करने वाला व्यक्ति रहे होंगे और उन्होंने अपनी ‘सत्य की खोज’ की यह अद्भुत कहानी स्वयं गढ़ ली होगी। इसलिए मैं एक ऐसी घटना का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो उसके गूढ़ ज्ञान के अधिकार को प्रमाणित करती है। ‘मीटिंग्स विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings with Remarkable Men) पुस्तक में वे एक प्रतिभाशाली रूसी युवती विटवित्स्काया से अपनी मुलाकात की कहानी सुनाते हैं। उसने गुर्जिएफ़ को बताया कि वह संगीत के प्रभाव से हमेशा आकर्षित रही है। उसका विश्वास था कि संगीत अपने प्रभाव उत्पन्न करता है। किसी प्रकार के कंपन के माध्यम से, जो हमारे शरीर के जैविक कंपनों पर असर डालते हैं। अफ़ग़ानिस्तान के एक मठ में उसने सीखा था कि पियानो पर कुछ निश्चित स्वरों को बजाकर श्रोताओं पर विशेष प्रकार के प्रभाव कैसे उत्पन्न किए जा सकते हैं। गुर्जिएफ़ स्वयं उसकी कुछ धारणाओं की पुष्टि इस प्रकार कर सके कि उसने बताया कि उसने एसेनी लोगों के बीच एक पौधे को केवल आधे घंटे में उसके बीज से उगते देखा था और यह प्राचीन हिब्रू संगीत के माध्यम से किया गया था।

फ्रिट्ज़ पीटर (Fritz Peters) अपनी पुस्तक ‘चाइल्डहुड विद गुर्जिएफ’ (Childhood With Gurdjieff) में बताते हैं कि एक रूसी परिवार प्रीएरे आया था। गुर्जिएफ़ ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे देख सकते हैं कि उस परिवार की बेटी कुछ निश्चित संगीत-स्वरों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है और यदि एक खास कॉर्ड बजाया जाए तो वह बेहोशी जैसी तंद्रा (trance) में चली जाएगी। उस अनजान लड़की को कमरे में बुलाया गया। गुर्जिएफ़ ने अपने पियानोवादक हार्टमैन से पियानो बजाने को कहा। जैसे ही उसने वह निश्चित कॉर्ड बजाया, लड़की बेहोश होकर गिर पड़ी और उसे होश में लाने में काफी समय लगा। गुर्जिएफ़ ने उसे कई बार इस प्रयोग को दोहराने के लिए राज़ी कर लिया। हर बार पीटर्स ने देखा कि जागने के बाद लड़की के चेहरे पर उलझन और हिस्टीरिया के लक्षण दिखाई देते थे। पीटर्स को पूरा विश्वास हो गया कि इस पूरे मामले में किसी प्रकार की मिलीभगत की कोई संभावना नहीं थी।

तो, इस प्रकार का ज्ञान वह ज्ञान था जिसकी खोज गुर्जिएफ़ कर रहे थे। ऐसा ज्ञान जो मनुष्यों पर शक्ति प्रदान कर सके। लेकिन वह केवल शक्ति के लिए शक्ति में रुचि नहीं रखते थे। वे जानना चाहते थे कि एक यज़ीदी लड़का ‘जादुई घेरे’ के भीतर क्यों बंद हो जाता है और एक निश्चित कॉर्ड किसी लड़की को ट्रांस में क्यों पहुँचा सकता है। विट्वित्स्काया ने उसे इस प्रश्न का एक हिस्सा समझाया, जब उसने गुर्जिएफ़ को ‘मोनोसाइकी ब्रेथ्रेन’ से सीखे हुए रहस्यों के बारे में बताया। उसने कहा कि जब उपस्थित लोग बिल्कुल उन परिस्थितियों के अनुरूप होते थे जिनकी आवश्यकता थी, तो वह अपनी इच्छा से उन सभी में हँसी, आँसू, द्वेष, दयालुता आदि उत्पन्न कर सकती थी। अर्थात मनुष्यों की भावनाओं को इस तरह सक्रिय किया जा सकता था मानो वे मशीनें हों। गुर्जिएफ़ के गूढ़ धर्मों के अध्ययन से प्राप्त शायद सबसे महत्त्वपूर्ण धारणा यही थी कि मनुष्य लगभग पूरी तरह यांत्रिक है। वह मानते हैं कि वह ‘जीवित’ है क्योंकि वह हँसता है, रोता है, क्रोधित होता है और दुख महसूस करता है। लेकिन गुर्जिएफ़ के अनुसार वास्तव में ये प्रतिक्रियाएँ कुछ निश्चित उद्दीपनों के प्रति कंप्यूटर जैसी प्रतिक्रियाओं से अधिक कुछ नहीं हैं। सिर्फ़ प्रतिवर्त क्रियाएँ (reflexes)। गुर्जिएफ़ के बारे में बेनेट की एक पुस्तक के शीर्षक ‘इज़ देयर लाइफ ऑन अर्थ?’ (Is There Life on Earth?) का अर्थ भी यही है। उत्तर है: बहुत कम। जिसे हम जीवन कहते हैं, उसका अधिकांश हिस्सा यांत्रिक प्रतिक्रिया है।

लेकिन क्या हम अपने इन यांत्रिक तंत्रों से कुछ हद तक स्वतंत्र हो सकते हैं? जब लोगों ने गुर्जिएफ़ से यह प्रश्न पूछा तो उन्होंने उनसे कहा कि उन्होंने अभी-अभी स्वतंत्र इच्छा विकसित करने की दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।

संगीत के बारे में विट्वित्स्काया की खोज स्पष्ट रूप से दिखाती है कि यह ‘मशीन’ कंपनों द्वारा नियंत्रित होती है। इस मामले में संगीत के कंपन द्वारा। और इस अंतर्दृष्टि की पुष्टि तब हुई जब गुर्जिएफ़ ने तुर्केस्तान के एक ‘सरमूंग’ मठ में कुछ समय बिताया। उन्हें और उनके मित्र सोलोविएफ़ को आँखों पर पट्टी बाँधकर वहाँ ले जाया गया और उनसे शपथ ली गई कि वे उस मठ का स्थान कभी प्रकट नहीं करेंगे, चाहे वे अनुमान लगाकर उसका पता ही क्यों न लगा लें। वहाँ गुर्जिएफ़ ने एक बार फिर प्रिंस लुबोवेद्स्की को देखा और यह उनकी अंतिम मुलाकात थी। लुबोवेद्स्की उन्हें मठ के ‘महिलाओं के प्रांगण’ में ले गया, जहाँ उन्हें पवित्र नृत्य देखने को मिले। वहाँ उन्होंने कुछ विचित्र ‘उपकरण’ देखे, जिनका उद्देश्य पुजारिनों को पवित्र नृत्यों की मूल शारीरिक मुद्राएँ सिखाना था। गुर्जिएफ़ के अनुसार, प्रत्येक उपकरण एक त्रिपाद पर खड़े एक स्तंभ से बना था। इस स्तंभ से अलग-अलग स्थानों पर सात ‘शाखाएँ’ या भुजाएँ निकली हुई थीं। प्रत्येक भुजा स्वयं सात हिस्सों में विभाजित थी और ये अलग-अलग हिस्से बॉल-एंड-सॉकेट जोड़ से जुड़े हुए थे... ठीक मनुष्य के कंधे के जोड़ की तरह। वहाँ एक अलमारी भी थी जिसमें कई प्लेटें रखी थीं और प्रत्येक प्लेट पर एक रहस्यमय शिलालेख था। इन शिलालेखों में ‘भुजाओं’ की स्थिति बदलने के निर्देश दिए गए थे। ये विभिन्न स्थितियाँ पवित्र नृत्यों की अलग-अलग मुद्राओं और गतियों की मूल वर्णमाला थीं। गुर्जिएफ़ कहते हैं कि जब उन्होंने इन नृत्यों को देखा तो वे इस बात से स्तब्ध थे कि उनके नृत्य में कौन-सा अर्थ या भाव निहित था इसलिए नहीं क्योंकि उस समय वे उसे समझते ही नहीं थे बल्कि इसलिए कि वे उन्हें जिस बाहरी सटीकता और पूर्णता के साथ करते थे, वह अद्भुत थी। निश्चित रूप से यही नृत्य उन गतियों का आधार बने जिन्हें बाद में गुर्जिएफ़ ने अपने शिष्यों को सिखाया। मैंने स्वयं ग्लॉस्टरशायर के शेरबोर्न हाउस में बेनेट के शिष्यों को ये नृत्य करते देखा है, इसलिए मैं पुष्टि कर सकता हूँ कि उनकी सटीकता और पूर्णता ध्यान को पूरी तरह बाँध लेती है और एक विचित्र सौंदर्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है।

लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात भुजाओं और उनके खंडों की संख्या है। सात गुणा सात। जैसा कि हम आगे देखेंगे, गुर्जिएफ़ की शिक्षा का तकनीकी पक्ष ‘ऑक्टेव’ की धारणा पर निर्भर करता है अर्थात स्वरक्रम के सात सुर, जिसके बाद फिर पहले सुर पर वापसी होती है। उनका दावा है कि ब्रह्मांड सृष्टि के सात स्तरों से बना है, जो कंपन के सात स्तर भी हैं। कंपन की यह धारणा गुर्जिएफ़ की विचारधारा के केंद्र में है। मनुष्य ‘सात के नियम’ के अधीन है। मनुष्य के सात ‘मन’ या केंद्र भी हैं, जिनमें बौद्धिक मन सबसे निचला या कम-से-कम सबसे भद्दा और कम कुशल है। इसके अलावा एक गतिशील केंद्र है, जो शरीर को नियंत्रित करता है। एक भावनात्मक केंद्र, एक यौन केंद्र, एक सहज-बोध केंद्र तथा एक उच्चतर भावनात्मक और एक उच्चतर चिंतन केंद्र भी है। वह एक दूसरे नियम, ‘तीन के नियम’, के भी अधीन है। यह नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया तीन शक्तियों का परिणाम होती है न कि दो शक्तियों का, जैसा कि विज्ञान मानता है। पहली दो शक्तियाँ धनात्मक और ऋणात्मक केवल एक-दूसरे को संतुलित करती हैं। उन्हें तीसरी शक्ति की एक प्रकार की प्रेरणा की आवश्यकता होती है। ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि स्तंभ के आधार पर बना त्रिपाद इसी ‘तीन के नियम’ का प्रतीक था।

संक्षेप में, ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ ने अपने अधिकांश महत्त्वपूर्ण मूल सिद्धांत उन्हीं सरमूंग मठों से प्राप्त किए, जहाँ उन्हें एक शिष्य के रूप में स्वीकार किया गया था। हम कह सकते हैं कि उनकी खोज एनी के खंडहरों में स्थित उस भूमिगत साधु-कक्ष से शुरू हुई और हिमालय के सरमूंग मठ में समाप्त हुई। सत्य की उनकी खोज का विवरण खंडित है और कभी-कभी उलझा हुआ भी। वह बताता है कि वे उन लोगों के एक समूह के सदस्य थे, जो स्वयं को ‘सत्य के खोजी’ कहते थे और जिनके नेता प्रिंस लुबोवेद्स्की थे। लेकिन ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) में इन दूसरे ‘खोजियों’ की भूमिका बहुत ही मामूली दिखाई देती है। लेकिन शायद उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कथन उनकी पहली पुस्तक ‘हेराल्ड ऑफ कमिंग गुड’ (Herald of Coming Good) में मिलता है। उसमें वे कहते हैं कि मध्य एशिया के एक सूफ़ी मठ में कुछ समय बिताने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनके प्रश्नों के उत्तर ‘मनुष्य की अचेतन मानसिकता के क्षेत्र में’ पाए जा सकते हैं अर्थात उसके अचेतन मन में।

दूसरे शब्दों में, वास्तविक उत्तर पहले से ही हमारे भीतर मौजूद हैं। उन्हें केवल बहुत सूक्ष्म आत्म-अवलोकन के द्वारा और हम जो देखते हैं उसके बारे में तर्क करने तथा उसका विश्लेषण करने के माध्यम से खोजा जा सकता है। इसलिए व्यावहारिक दृष्टि से हम गुर्जिएफ़ की ‘खोज’ के बाकी हिस्से को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, जो उसे एशिया के विभिन्न स्थानों तक ले गया। ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) उनके शुरुआती दिनों की एक स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है, लेकिन इसे सावधानी के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इस पुस्तक का एक पूरा खंड बताता है कि ‘सत्य के खोजी’ गोबी मरुस्थल में एक खोए हुए नगर की खोज में निकले थे और अपने साथ बीस फुट ऊँचे खंभे जैसे पायों (stilts) को ले गए थे ताकि वे रेत के तूफ़ानों के ऊपर से चल सकें। यह कहानी शुद्ध कल्पना जैसी लगती है। बेनेट का मानना है कि यह संभवतः उन लोगों का रूपक है जो सत्य को ‘वहाँ बाहर’ खोजते हैं न कि ‘यहाँ भीतर’। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस पुस्तक में कितना हिस्सा गढ़ा हुआ है। उसका सबसे बड़ा महत्त्व इस बात में है कि गुर्जिएफ़ की चार पुस्तकों में यही सबसे आसानी से समझ में आने वाली और पठनीय पुस्तक है और यह हमें एक वास्तविक मनुष्य के रूप में गुर्जिएफ़ की बहुत अच्छी तस्वीर देती है। वे पैसे कमाने के अपने विभिन्न संदिग्ध तरीकों का वर्णन करने से भी कभी नहीं हिचकते जैसे, गौरैयाओं को पकड़ना, उन्हें अलग-अलग रंगों में रंगना और ‘अमेरिकी कैनरी’ के नाम पर बेचना। उनके विभिन्न साथियों की कहानियाँ यहाँ तक कि उनके कुत्ते की कहानी भी, उन्हें एक उदार और स्नेही व्यक्ति के रूप में दिखाती हैं। जो लोग उन्हें अच्छी तरह जानते थे, उनके अनुभव भी इस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। लेकिन यह संभावना बहुत कम है कि हम कभी ठीक-ठीक जान पाएँगे कि 1891 में उनके साहसिक जीवन की शुरुआत करने से लेकर लगभग 1910 तक उन्होंने क्या किया। 1891 में उन्होंने अपनी यात्राएँ शुरू की थीं और उनकी उम्र चौदह या उन्नीस वर्ष रही होगी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि जन्म की कौन-सी तारीख सही मानी जाए। लगभग 1910 में वे पहली बार मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में आत्म-ज्ञान के शिक्षक के रूप में दिखाई देते हैं। यह लगभग निश्चित लगता है कि इस बीच एक ऐसा दौर आया था जब गुर्जिएफ़ पेशेवर सम्मोहनकर्ता और चमत्कार दिखाने वाले बन गए थे जिसे उनके आलोचक निस्संदेह ‘छद्मविद्’ या ठग कहेंगे। ‘मीटिंग विद रीमार्केबल मेन’ (Meetings With Remarkable Men) के ‘एकिम बे’ वाले अध्याय में वे बताते हैं कि उन्होंने और एकिम बे ने ताशकंद में पैसों की अपनी तत्काल आवश्यकता पूरी करने के लिए एक सभागार किराए पर लिया और सम्मोहन तथा अन्य घटनाओं का एक ‘जादुई’ प्रदर्शन किया। बेनेट की पुस्तक ‘गुर्जिएफ: मेकिंग ए न्यू वर्ल्ड’ (Gurdjieff: Making a New World) में एक असाधारण तस्वीर है, जिसमें बालों वाले युवा गुर्जिएफ़ ‘पेशेवर सम्मोहनकर्ता’ के रूप में दिखाई देते हैं। वे किसी मंच की पृष्ठभूमि के सामने खड़े हैं और देखने में विक्टोरियाई युग के किसी पैंटोमाइम नाटक के खलनायक जैसे लगते हैं। बेनेट का अनुमान है कि गुर्जिएफ़ का यह ‘पेशेवर’ दौर लगभग 1907 से 1910 तक चला।

लेकिन इन शुरुआती वर्षों की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना लगभग 1904 में घटी। यह घटना गोबी मरुस्थल के किनारे स्थित एक नगर के पास हुई थी और उसका वर्णन उनकी अंतिम पुस्तक ‘लाइफ इज़ रियल ओनली देन, वेन ‘आय एम’ (Life Is Real Only Then, When ‘I Am’) में मिलता है। कुछ समय से गुर्जिएफ़ का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था। वास्तव में इसकी शुरुआत 1896 में हुई थी, जब क्रेट द्वीप पर उन्हें एक भटकी हुई गोली लग गई थी। इसके बाद उन्होंने रूस तक पैदल लौटने का निर्णय लिया। 1902 में एक दूसरी ‘भटकी हुई गोली’ ने उन्हें मृत्यु के बहुत निकट पहुँचा दिया। गोबी मरुस्थल के किनारे, यांगिहिसार के पास किसी स्थान पर वे तीन महीने तक बेहोश रहे। दो वर्ष बाद उन्होंने ज़ार के सैनिकों और क्रांतिकारियों के एक समूह के बीच आ जाने की भूल की। तीसरी भटकी हुई गोली ने फिर उनकी जान लगभग ले ही ली। विचित्र संयोग से वे फिर उसी स्थान पर स्वास्थ्य लाभ करते हुए पाए गए, जो गोबी मरुस्थल के किनारे था।

एक शाम, जब उनका शारीरिक स्वास्थ्य ठीक हो चुका था, गुर्जिएफ़ चाँदनी में लेटा हुए पिछले कुछ वर्षों के बारे में सोच रहे थे। उनके विचार उन्हें गहरी उदासी में ले गए। वास्तव में उनकी अपनी कमियाँ उन्हें इतनी भयानक लगीं कि उन्हें अपने पूर्णतः निरर्थक होने का अनुभव होने लगा। उनके विचारों की नकारात्मक धारा इतनी शक्तिशाली थी कि वे उनसे मुक्त नहीं हो पा रहे थे। उन्हें लगा कि वे बेहोश होने वाले हैं। तभी ऊँटों की हलचल ने उनका ध्यान भंग किया और उन्हें ‘आत्मा की इस अँधेरी रात’ से बाहर निकलने में सहायता मिली। एक झरने के पास लेटे हुए उन्होंने आत्म-परीक्षण की प्रक्रिया शुरू की। उन्हें लगा कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जो विभिन्न ‘शक्तियाँ’ अर्जित की थीं, उनका इस्तेमाल उनकी सबसे बुरी प्रवृत्तियों की संतुष्टि के लिए हुआ था। आत्म-प्रेम, अहंकार, गर्व और यौन वासना के लिए। गुर्जिएफ़ के अनुसार उनकी शक्तियाँ ‘इतने ऊँचे स्तर तक पहुँच चुकी थीं कि केवल कुछ घंटों की आत्म-तैयारी के बाद मैं दस मील की दूरी से एक याक को मार सकता था या चौबीस घंटों में जीवन-शक्तियों को इतनी सघनता से संचित कर सकता था कि पाँच मिनट में एक हाथी को सुला सकता था।’ फिर भी इन अर्ध-जादुई शक्तियों के बावजूद वे स्वयं को मशीन से कुछ अधिक नहीं समझते थे। वे कुछ सेकंड से अधिक समय तक ‘स्व-स्मरण’ (self-remembering) अर्थात तीव्र आत्म-जागरूकता की अवस्था बनाए रखने में अभी भी असमर्थ थे।

वे अपनी आत्म-जागरूकता को बढ़ाने और अपने आंतरिक अस्तित्व को तात्कालिकता की भावना से झकझोरने के लिए क्या कर सकते थे? पुराने संत कीलों के बिस्तर पर सोते थे और खुरदरे बालों से बने वस्त्र पहनते थे। गुर्जिएफ़ भी ऐसी ‘यांत्रिक’ साधनाएँ आज़मा चुके थे, लेकिन उन्होंने पाया कि वे पर्याप्त नहीं थीं। उन्होंने तय किया कि एकमात्र रास्ता कोई बहुत बड़ा त्याग करना है। उदाहरण के लिए, कोई पक्का धूम्रपान करने वाला व्यक्ति तंबाकू छोड़ सकता है ताकि उससे वंचित रहने की पीड़ा लगातार एक तरह की ‘अलार्म घड़ी’ का काम करती रहे। लेकिन वे किस चीज़ का त्याग करें? ‘सोचते-सोचते मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि मैं जानबूझकर अपने पास मौजूद असाधारण शक्ति का उपयोग करना बंद कर दूँ... तो मेरे भीतर ऐसी कोई स्मरण कराने वाली शक्ति अवश्य उत्पन्न होगी।’ संक्षेप में, वे अपनी सम्मोहन और टेलीपैथी की शक्तियों का त्याग करने वाले थे।

‘जैसे ही मैंने इस विचार का अर्थ समझा, ऐसा लगा मानो मेरा पुनर्जन्म हो गया हो। मैं उठ खड़ा हुआ और झरने के चारों ओर एक छोटे बछड़े की तरह दौड़ने लगा।’

इसके बाद गुर्जिएफ़ ने शपथ ली कि वे फिर कभी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल केवल आत्म-संतुष्टि के लिए नहीं करेंगे बल्कि केवल ‘वैज्ञानिक’ उद्देश्यों के लिए करेंगे।

यही वह क्षण था जब वह केवल एक ‘जादूगर’, अपने समकालीन एलीस्टर क्रॉली की तरह रहना बंद कर एक शिक्षक बन गए । यह उनके जीवन के एक नए युग की शुरुआत थी।

लेखक: कॉलिन विल्सन 

[1] ‘गिलगमेश का महाकाव्य’ प्राचीन मेसोपोटामिया का एक महान महाकाव्य है और विश्व के सबसे प्राचीन ज्ञात साहित्यिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसकी कथा उरुक के शक्तिशाली राजा गिलगमेश और उसके प्रिय मित्र एन्किडु के इर्द-गिर्द घूमती है। मित्र की मृत्यु के बाद गिलगमेश मृत्यु और अमरत्व के रहस्य को जानने की यात्रा पर निकलता है। इस यात्रा के माध्यम से महाकाव्य मित्रता, प्रेम, मृत्यु, मनुष्य की सीमाओं और जीवन के अर्थ जैसे सार्वभौमिक प्रश्नों पर विचार करता है। 

[2] गुलाब के फूल के बाद बनने वाला फल

[3] ग्रीक ऑर्थोडॉक्स और कुछ अन्य पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्चों में पादरियों की एक वरिष्ठ धार्मिक उपाधि है। सामान्यतः यह किसी वरिष्ठ मठवासी या मठ के प्रमुख/वरिष्ठ पादरी को दी जाती है।

The War Against Sleep: The Philosophy of Gurdjieff का हिंदी अनुवाद (अध्याय एक: जादूगर)

 

नींद के विरुद्ध युद्ध

गुर्जिएफ़ का दर्शन

द्वारा
कॉलिन विल्सन

 


 

1—जादूगर

1917 की एक उजली गर्मियों की सुबह लगभग तीस वर्ष की एक आकर्षक रूसी महिला सेंट पीटर्सबर्ग के नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट स्थित फिलिपोव कैफ़े में अपने मित्र पीटर डेमियानोविच उस्पेन्स्की के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। असामान्य रूप से उस दिन उस्पेन्स्की देर से आ रहे थे। जब वे अंततः जल्दी-जल्दी वहाँ पहुँचे तो वे असाधारण रूप से उत्तेजित दिखाई दे रहे थे। उनके मुँह से निकले पहले शब्द थे, “मुझे लगता है, इस बार हमें सचमुच वह चीज़ मिल गई है जिसकी हमें तलाश थी।” फिर उन्होंने उसे याद दिलाया कि 1915 में मॉस्को में उनकी मुलाकात एक असाधारण शिक्षक से हुई थी, जो मानव अस्तित्व की मूलभूत समस्याओं के बारे में ऐसे ढंग से बात करता था, मानो उसे उनके बारे में गहरा ज्ञान और अधिकार प्राप्त हो। उसका नाम था जॉर्ज इवानोविच गुर्जिएफ़। अब उस्पेन्स्की ने बताया, गुर्जिएफ़ सेंट पीटर्सबर्ग आ चुके थे और ठीक उसी समय सड़क के उस पार स्थित फिलिपोव कैफ़े की दूसरी शाखा में उनका इंतज़ार कर रहे थे। उस महिला, अन्ना बुत्कोव्स्की, का कहना है:

“जब मैं दूसरे फिलिपोव कैफ़े में दाखिल हुई तो मैंने देखा कि एक व्यक्ति दूर कोने में मेज़ पर बैठा हुआ था। उसने साधारण काला कोट पहन रखा था और सिर पर वह ऊँची अस्त्राखान टोपी[1] थी, जो रूसी पुरुष सर्दियों में पहनते हैं। उसके सुडौल और पुरुषोचित चेहरे के नैन-नक्श तथा उसकी ऐसी दृष्टि में, जो मानो सीधे आपके भीतर तक उतर जाती थी (हालाँकि वह किसी भी तरह अप्रिय नहीं थी), यूनानी वंश की झलक दिखाई देती थी। उसका सिर अंडाकार था, आँखें काली थीं और रंग जैतूनी था। उसने काली मूँछ रखी हुई थी। उसका व्यवहार बहुत शांत और सहज था और वह बिना किसी हाव-भाव के बोलता था। उसके साथ केवल बैठना भी बहुत सुखद लगता था। यद्यपि रूसी उसकी मातृभाषा नहीं थी, फिर भी वह रूसी बहुत धाराप्रवाह बोलता था। लेकिन उसका बोलने का ढंग हमारे ढंग से कुछ अलग था। अधिक सटीक और अधिक चित्रात्मक। कभी-कभी वह कुछ ‘आलसी’ आवाज़ में बोलता था और आपको लगता था कि वह प्रत्येक वाक्य को उसी विशेष अवसर के लिए बहुत सावधानी से गढ़ रहा है। वह उन बने-बनाए वाक्यों की तरह बिल्कुल नहीं बोलता था, जिनका हम सामान्य बातचीत में इस्तेमाल करते हैं और जिनमें सृजनात्मक शक्ति या वैयक्तिकता नहीं होती। बहुत जल्दी आपको समझ में आ जाता था कि उसमें शब्दों को प्रभावशाली ढंग से संयोजित करने की अद्भुत क्षमता थी। मैं वहाँ बैठी थी और मुझे महसूस हो रहा था कि आखिरकार मैं एक गुरु की उपस्थिति में हूँ।”

गुर्जिएफ़ से मिलने वाले लगभग हर व्यक्ति पर उन्होंने इसी प्रकार का प्रभाव डाला। हमारे पास उनके शिष्यों द्वारा अपनी पहली मुलाकात के बारे में लिखे हुए शायद एक दर्जन विवरण हैं। लगभग बिना किसी अपवाद के उनमें उस “दृष्टि, जो सीधे आपके भीतर तक उतर जाती थी” का उल्लेख मिलता है। लगभग उसी समय थॉमस डी हार्टमैन नाम का एक युवा सेना अधिकारी भी गुर्जिएफ़ से मिला। जब काले कोट और काली मूँछों वाले दो व्यक्ति कैफ़े में उसकी ओर आते दिखाई दिए तो वह सोचने लगा कि इनमें से गुर्जिएफ़ कौन है। “लेकिन उनमें से एक व्यक्ति की आँखों ने बहुत जल्दी मेरी यह अनिश्चितता दूर कर दी।” जे. जी. बेनेट, जिन्होंने 1920 में कॉन्स्टेंटिनोपल में गुर्जिएफ़ से मुलाकात की थी, ने लिखा, “मैंने ऐसी आँखों की जोड़ी पहले कभी नहीं देखी थी। दोनों आँखें इतनी अलग थीं कि मुझे लगा, शायद प्रकाश ने मेरी आँखों के साथ कोई चाल चली है।” इन सभी अलग-अलग अनुभवों को 1948 में पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने के बाद चिकित्सक केनेथ वॉकर की पत्नी द्वारा कही गई बात संक्षेप में व्यक्त करती है, “उन्होंने मुझ पर जो सबसे प्रमुख प्रभाव डाला, वह था अपार जीवन-शक्ति और संकेंद्रित सामर्थ्य का। मुझे ऐसा लगा कि वह वास्तव में मनुष्य नहीं बल्कि कोई जादूगर है।”

वास्तव में गुर्जिएफ़ एक प्रकार के जादूगर ही थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनमें कुछ जादुई अथवा मानसिक शक्तियाँ थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि वे स्वयं इन शक्तियों को अप्रासंगिक या महत्वहीन मानते थे। गुर्जिएफ़ की केंद्रीय चिंता मनुष्य की संभावनाओं को लेकर थी या अधिक सटीक रूप से कहें तो मानव चेतना की संभावनाओं को लेकर। उस्पेन्स्की ने इसे अपनी एक छोटी-सी पुस्तक “द साइकोलॉजी ऑफ़ मैन्स पॉसिबल इवोल्यूशन” (The Psychology of Man’s Possible Evolution) में बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि सामान्य मनोविज्ञान मनुष्य का अध्ययन उस रूप में करता है, जैसा वह वास्तव में है। लेकिन मनोविज्ञान का एक दूसरा प्रकार भी है, जो मनुष्य का अध्ययन “इस दृष्टि से नहीं करता कि वह क्या है या जैसा दिखाई देता है बल्कि इस दृष्टि से करता है कि वह क्या बन सकता है अर्थात उसकी संभावित विकास-यात्रा के दृष्टिकोण से।”

इस तरह व्यक्त करने पर यह विचार कुछ अस्पष्ट और सामान्य-सा लगता है। लेकिन गुर्जिएफ़ का दृष्टिकोण अत्यंत सटीक और विशिष्ट था।  उनके शिष्यों के लेखन में उनकी अपनी असाधारण शक्तियों के कार्य करने के अनेक विवरण मिलते हैं। फ्रिट्ज़ पीटर्स, जो बचपन से गुर्जिएफ़ को जानते थे, बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरंत बाद जब वे पेरिस में गुर्जिएफ़ से मिलने गए तो क्या हुआ। युद्ध के अनुभवों ने पीटर्स को लगभग मानसिक तंत्रिका-विघटन की स्थिति तक पहुँचा दिया था। जिस क्षण गुर्जिएफ़ ने उन्हें देखा, उन्हें समझ में आ गया कि पीटर्स बीमार हैं।

“जब हम उनके अपार्टमेंट पहुँचे तो वे मुझे एक लंबे गलियारे से होते हुए एक अँधेरे शयनकक्ष में ले गए। उन्होंने बिस्तर की ओर संकेत किया, मुझे लेटने को कहा और बोले, “जब तक तुम्हें आवश्यकता हो, यह तुम्हारा कमरा है।” मैं बिस्तर पर लेट गया और वे कमरे से बाहर चले गए। लेकिन दरवाज़ा बंद नहीं किया। उन्हें देखकर मुझे इतनी जबरदस्त राहत और इतनी उत्तेजना महसूस हुई कि मैं बेकाबू होकर रोने लगा। फिर मेरे सिर में भयंकर दर्द होने लगा। मैं आराम नहीं कर पा रहा था। उठकर रसोई में गया, जहाँ मैंने उन्हें मेज़ पर बैठे पाया। मुझे देखते ही वे चिंतित हो गए और पूछा कि क्या हुआ है। मैंने कहा कि मुझे अपने सिरदर्द के लिए एस्पिरिन या कोई और दवा चाहिए। लेकिन उन्होंने सिर हिला दिया, खड़े हुए और रसोई की मेज़ के पास रखी दूसरी कुर्सी की ओर इशारा किया। उन्होंने दृढ़ता से कहा, “दवा नहीं। मैं तुम्हें कॉफ़ी देता हूँ। जितनी गरम हो सके, उतनी गरम पीना।” मैं मेज़ पर बैठ गया। उन्होंने कॉफ़ी गरम की और फिर मुझे लाकर दी। इसके बाद वे कमरे के उस पार जाकर फ्रिज के सामने खड़े हो गए और मुझे देखने लगे। मैं अपनी आँखें उनसे हटा ही नहीं पा रहा था और मैंने महसूस किया कि वे बेहद थके हुए दिखाई दे रहे थे। इतने थके हुए व्यक्ति को मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मुझे याद है, मैं मेज़ पर झुका हुआ कॉफ़ी की चुस्कियाँ ले रहा था कि तभी मुझे अपने भीतर ऊर्जा का एक अजीब-सा उभार महसूस हुआ। मैंने उन्हें देखा, अपने-आप सीधा होकर बैठ गया और ऐसा लगा मानो उनके शरीर से एक तीव्र विद्युत-नीली रोशनी निकलकर मेरे भीतर प्रवेश कर रही हो। जैसे ही ऐसा हुआ, मुझे महसूस हुआ कि मेरी सारी थकान बाहर निकल रही है। लेकिन उसी क्षण उनका शरीर झुक गया और उनका चेहरा धूसर पड़ गया, मानो उनके शरीर से जीवन-शक्ति ही खींच ली गई हो। मैंने उन्हें आश्चर्य से देखा। जब उन्होंने मुझे सीधा बैठा हुआ, मुस्कराता और ऊर्जा से भरा देखा, तो उन्होंने जल्दी से कहा, “अब तुम ठीक हो। चूल्हे पर रखे खाने का ध्यान रखना। मुझे जाना होगा।” उनकी आवाज़ में कुछ अत्यंत तत्क्षण और जरूरी-सा था। मैं उनकी मदद करने के लिए झट से खड़ा हो गया। लेकिन उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया और धीरे-धीरे लँगड़ाते हुए कमरे से बाहर चले गए।

ऐसा प्रतीत होता था कि गुर्जिएफ़ ने किसी मानसिक अनुशासन के माध्यम से किसी तरह अपनी जीवन-ऊर्जा पीटर्स में प्रवाहित कर दी थी या फिर किसी प्रकार पीटर्स के भीतर स्थित जीवन-शक्ति के स्रोत को स्पर्श कर दिया था। जो भी हुआ हो, उसका परिणाम यह हुआ कि गुर्जिएफ़ स्वयं की ऊर्जा से खाली हो गए। पीटर्स कहते हैं, “मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि वह अपने भीतर से दूसरों तक ऊर्जा पहुँचाना जानते थे और मुझे यह भी विश्वास हो गया था कि ऐसा करना उनके लिए बहुत बड़ी कीमत पर ही संभव था।” इसके बाद जो हुआ, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अगले कुछ ही मिनटों में यह भी स्पष्ट हो गया कि वे अपनी ऊर्जा को बहुत तेजी से फिर से प्राप्त करना जानते थे। जब वे दोबारा रसोई में आए तो उन्हें देखकर मैं हैरान रह गया। वे फिर से एक युवा व्यक्ति जैसे दिखाई दे रहे थे... सतर्क, मुस्कराते हुए, कुछ शरारती और प्रसन्नचित्त। उन्होंने कहा कि यह मुलाकात बहुत सौभाग्यपूर्ण रही और यह कि मैंने उन्हें लगभग असंभव प्रयास करने के लिए विवश कर दिया था। लेकिन जैसा कि मैंने स्वयं देखा था यह हम दोनों के लिए बहुत अच्छी बात साबित हुई थी।

गुर्जिएफ़ की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब पीटर्स पहली बार उनके अपार्टमेंट में आया था, तब वह थके हुए दिखाई दे रहे थे, “मैंने कभी किसी को इतना थका हुआ नहीं देखा था।” उन्होंने पीटर्स को अपनी जीवन-शक्ति प्रदान करने का प्रयास किया, जिससे वे स्वयं और भी अधिक थक गए। और फिर, पंद्रह मिनट के भीतर ही वे पूरी तरह तरोताज़ा और ऊर्जावान हो गए। इसका संकेत बिल्कुल स्पष्ट है। ऐसा लगता है कि गुर्जिएफ़ स्वयं यह भूल चुके थे कि उनमें अपनी ऊर्जा को फिर से जागृत करने की शक्ति है और फ्रिट्ज़ पीटर्स की अत्यधिक थकान ने उन्हें एक बहुत बड़ा प्रयास करने के लिए विवश कर दिया। पीटर्स के आने से पहले गुर्जिएफ़ अपनी थकान को एक स्वाभाविक और अपरिहार्य चीज़ मानकर स्वीकार कर रहे थे। लेकिन पीटर्स में ऊर्जा प्रवाहित करने से उन्हें यह याद आया कि वे किसी तरह जीवन-शक्ति के स्रोत तक पहुँच सकते हैं और अपनी ऊर्जा को फिर से जगा सकते हैं। इसीलिए उन्होंने पीटर्स से कहा था कि यह मुलाकात उन दोनों के लिए सौभाग्यपूर्ण थी।

यह कहानी हमें ठीक-ठीक समझने में मदद करती है कि केनेथ वॉकर की पत्नी ने गुर्जिएफ़ को जादूगर क्यों समझा था। साथ ही, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी “जादुई” शक्तियाँ उस प्रकार की नहीं थीं, जैसी हम कुख्यात तांत्रिकों या जादूगरों जैसे, मैडम ब्लावात्स्की या एलीस्टर क्रॉली से जोड़ते हैं। मैडम ब्लावात्स्की के बारे में ऐसी कहानियाँ मिलती हैं कि वे पूरे कमरे में अलग-अलग जगहों से खटखटाने जैसी आवाज़ें उत्पन्न कर देती थीं। क्रॉली के बारे में कहा गया है कि वे किसी तरह लोगों को चारों हाथ-पैरों पर चलने और कुत्तों की तरह हुआँ-हुआँ करने के लिए विवश कर देते थे। लेकिन उनके बारे में ऐसी कोई घटना नहीं मिलती जिसमें उन्होंने किसी व्यक्ति पर गुर्जिएफ़ जैसा पूर्णतः स्फूर्तिदायक प्रभाव डाला हो। यह मान लेना भी आवश्यक नहीं है कि गुर्जिएफ़ ने किसी प्रकार के टेलीपैथिक ऊर्जा-हस्तांतरण द्वारा पीटर्स को पुनर्जीवित किया था। कोई मनोवैज्ञानिक शायद यह तर्क देगा कि उन्होंने यह काम किसी प्रकार के सुझाव (suggestion) द्वारा किया था।

जहाँ तक गुर्जिएफ़ की अपनी ऊर्जा को पुनः प्राप्त करने की क्षमता का प्रश्न है, उसके मूल तत्व को उन्नीसवीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक समझ चुके थे। फ्रायड और युंग के युग से भी कई दशक पहले। विलियम जेम्स ने अपने एक महत्वपूर्ण निबंध ‘दि एनर्जीज ऑफ मैन’ (The Energies of Man) में इस विषय पर चर्चा की है।

हर व्यक्ति इस अनुभव से परिचित है कि अलग-अलग दिनों में हम स्वयं को कम या अधिक जीवंत महसूस करते हैं। हर व्यक्ति जानता है कि किसी भी दिन हमारे भीतर कुछ ऐसी ऊर्जाएँ सुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं, जिन्हें उस दिन की परिस्थितियाँ जागृत नहीं कर पातीं। लेकिन यदि परिस्थितियाँ अधिक प्रेरक हों तो हम उन ऊर्जाओं को प्रकट कर सकते हैं। हममें से अधिकांश को ऐसा लगता है, मानो हमारे ऊपर किसी प्रकार का बादल छाया हुआ है, जो हमें स्पष्ट समझ, तर्क में दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता के अपने उच्चतम स्तर तक पहुँचने से रोक रहा है। हमें जितना होना चाहिए, उसकी तुलना में हम केवल आधे जागे हुए होते हैं। हमारी आंतरिक अग्नि धीमी पड़ गई है, हमारी ऊर्जा का प्रवाह रुक गया है। हम अपनी संभावित मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के केवल एक छोटे-से हिस्से का उपयोग कर रहे हैं। कुछ लोगों में अपनी वास्तविक क्षमताओं से कटे होने की यह अनुभूति इतनी तीव्र होती है कि तब वे उन गंभीर न्यूरैस्थेनिक (neurasthenic) और साइकेस्थेनिक (psychasthenic) अवस्थाओं से ग्रस्त हो जाते हैं, जिनका वर्णन अनेक चिकित्सा-पुस्तकों में मिलता है। ऐसी अवस्थाएँ जिनमें पूरा जीवन ही असंभवताओं का एक जाल बन जाता है।  

व्यापक रूप से कहें तो मनुष्य अपनी वास्तविक सीमाओं से बहुत नीचे रहकर जीवन जीता है। उसके भीतर विभिन्न प्रकार की ऐसी शक्तियाँ होती हैं, जिनका वह आदतन उपयोग नहीं करता। वह अपनी अधिकतम क्षमता से कम ऊर्जा लगाता है और अपनी सर्वोत्तम क्षमता से कम स्तर पर व्यवहार करता है। बुनियादी क्षमताओं में, उनके समन्वय में, अपनी प्रतिक्रियाओं को रोकने और नियंत्रित करने की शक्ति में हर संभव अर्थ में उसका जीवन सिकुड़ जाता है, ठीक वैसे जैसे हिस्टीरिया से पीड़ित व्यक्ति का दृष्टिक्षेत्र सिकुड़ जाता है। लेकिन हमारे मामले में इसका बहाना भी कम है क्योंकि वह बेचारा हिस्टीरिया-ग्रस्त व्यक्ति तो रोग से पीड़ित है। जबकि हममें से बाकी लोगों में समस्या केवल एक जड़ जमाई हुई आदत है। अपने पूर्ण स्वरूप की तुलना में स्वयं को कमतर मानने और उसी स्तर पर जीने की आदत।

जेम्स इस शक्ति का उदाहरण ‘सेकंड विंड’ (‘second wind’) की प्रसिद्ध घटना से देते हैं। जब हम कोई काम पूरा कर रहे होते हैं तो जैसे ही हमें थकान महसूस होती है अर्थात जैसे ही हम थकान की पहली परत से टकराते हैं, हम सामान्यतः रुक जाने के आदी होते हैं। लेकिन यदि हम स्वयं को आगे बढ़ने के लिए मजबूर करें तो एक आश्चर्यजनक घटना घटती है। एक सीमा तक थकान बढ़ती जाती है, फिर अचानक गायब हो जाती है और हम पहले से बेहतर महसूस करने लगते हैं। वे यह भी बताते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में न्यूरैस्थेनिया के रोगियों के उपचार की एक सामान्य विधि यह थी कि रोगियों को सामान्य से अधिक प्रयास करने के लिए लगभग डाँटकर या दबाव डालकर तैयार किया जाता था। “पहले अत्यधिक कष्ट आता है, फिर अप्रत्याशित राहत मिलती है।” और वे आगे कहते हैं, “हम थकान की उन अवस्थाओं के कारण रुक जाते हैं, जिनका पालन करना हमने केवल आदत के कारण सीख लिया है।”

इस वाक्य में जेम्स ने गुरजिएफ़ के जीवन-कार्य के सार को परिभाषित कर दिया है।  यह सच है कि गुर्जिएफ़ के विचार मनोविज्ञान, दर्शन, ब्रह्मांड-विज्ञान और यहाँ तक कि रसायनविद्या तक के एक विशाल क्षेत्र को समेटते हैं। लेकिन उनके पूरे कार्य के केंद्र में यह विचार है कि हमारे भीतर हमारी कल्पना से कहीं अधिक शक्तियाँ मौजूद हैं और हमारी दिखाई देने वाली सीमाएँ एक विशेष प्रकार की आलस्यपूर्ण प्रवृत्ति के कारण हैं। यह आलस्य इतना आदतन हो गया है कि अंततः वह एक यांत्रिक व्यवस्था (mechanism) में बदल गया है।

तो इस व्यवस्था को नियंत्रित या निष्क्रिय कैसे किया जाए? विलियम जेम्स अपने जीवन-शक्ति के भंडार पर लिखे निबंध में बताते हैं कि हम अपनी गहरी शक्तियों का उपयोग तब करते हैं जब हमें किसी संकट से या किसी गहरे तात्कालिक उद्देश्य-बोध से प्रेरणा मिलती है। वे कर्नल बेयर्ड-स्मिथ का उदाहरण देते हैं, जो 1857 में भारतीय विद्रोहियों द्वारा दिल्ली की छह सप्ताह की घेराबंदी के दौरान उसकी रक्षा के प्रभारी थे। उनका मुँह घावों से भरा हुआ था और उनका पूरा शरीर भी घावों से ढका था। उनका घायल टखना काला पड़ चुका था और उसमें सड़न पैदा हो गई थी। दस्त ने उन्हें लगभग हड्डियों का ढाँचा बना दिया था। वे भोजन नहीं कर सकते थे और लगभग पूरी तरह ब्रांडी के सहारे जीवित थे। फिर भी ऐसा लगता था कि इन सबका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। संकट अर्थात महिलाओं और बच्चों के जीवन की रक्षा करने की आवश्यकता ने उन्हें इतनी संकेंद्रित दृढ़ता की अवस्था में रखा कि वे पूरी घेराबंदी के दौरान सतर्क और ऊर्जावान बने रहे। स्पष्टतः उन्होंने वही किया जो गुर्जिएफ़ ने फ्रिट्ज़ पीटर्स को रसोई में छोड़ते समय किया था, अपने भीतर गहराई में जाकर अपनी जीवन-शक्ति के भंडार को जागृत कर लिया।

वास्तव में, जान-बूझकर प्रेरणा, उत्तेजना, यहाँ तक कि संकट की तलाश करना उस “हम पर कोई बादल छाया हुआ है” वाली अनुभूति से बाहर निकलने के हमारे पसंदीदा मानवीय उपायों में से एक है। एक उदास गृहिणी अपने लिए नई टोपी खरीदने चली जाती है। एक ऊबा हुआ आदमी शराब पीकर नशे में हो जाता है। एक असंतुष्ट किशोर कार चुरा लेता है या फुटबॉल मैच में पीतल के मुक्के (knuckledusters) लेकर पहुँच जाता है। सामान्यतः किसी व्यक्ति में उपलब्धियों की जितनी अधिक संभावनाएँ होती हैं, उतना ही अधिक वह उस अनुभूति का विरोध करता है कि वह अपनी वास्तविक क्षमताओं से “कट गया” है। शॉ के नाटक में कैप्टन शोटोवर ऐली डन को कहते हैं, “तुम्हारी उम्र में मैं कठिनाइयों, खतरे, भय और मृत्यु की तलाश करता था ताकि अपने भीतर के जीवन को अधिक तीव्रता से महसूस कर सकूँ।” यही प्रेरणा, उदाहरण के लिए, अर्नेस्ट हेमिंग्वे को बड़े शिकार करने, बुलफाइटिंग में जाने और युद्ध संवाददाता के रूप में काम करने के लिए इतना समय बिताने के लिए प्रेरित करती थी।

अपनी ही आलस्यपूर्ण जड़ता के बंधनों को तोड़ने की यह इच्छा कभी-कभी मनुष्यों को ऐसे व्यवहार की ओर भी ले जाती है, जो स्पष्टतः उनके अपने हितों के विरुद्ध होता है। वान गॉग ने कला-विक्रेता की आरामदायक नौकरी छोड़ दी और बेल्जियम के खदान-मज़दूरों के बीच एक सामान्य धर्म-प्रचारक बन गया। लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया ने सरकार की आरामदायक नौकरियाँ ठुकराकर आर.ए.एफ. में एक साधारण विमानकर्मी बनना स्वीकार किया। दार्शनिक विट्गेंश्टाइन ने विरासत में मिली अपनी संपत्ति बाँट दी और कम वेतन वाले स्कूल-शिक्षक बन गए। इन “बाहरी लोगों” को अपने भीतर की जड़ता और ठहराव से बाहर निकलने की आवश्यकता प्रेरित कर रही थी। उनका उद्देश्य था उस “आदतन तंत्रिका-विकार” (habit neurosis) अर्थात “अपने पूर्ण स्वरूप की तुलना में स्वयं को कमतर मानने की आदत,” से छुटकारा पाना।

लेकिन जान-बूझकर खतरे या असुविधा की तलाश करने में स्पष्ट रूप से कुछ बेतुकापन भी है क्योंकि हम अपने जीवन का इतना बड़ा हिस्सा इनसे बचने में ही लगा देते हैं। निश्चित ही हमारी जीवन-शक्ति के भंडार तक पहुँचने के दूसरे रास्ते भी होने चाहिए। ऐसा नहीं कि हमें हर बार अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े या कीलों से भरे बिस्तर पर सोना पड़े। मसलन, यह स्पष्ट है कि स्वयं संकट जीवन-शक्ति का प्रवाह पैदा नहीं करता। बल्कि संकट के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ऐसा करती है। ऐसा लगता है मानो हमारे भीतर की कोई आवाज़ आदेश देती है और हमारे अंदर कोई चीज़ अचानक सावधान होकर सक्रिय हो जाती है। कर्नल बेयर्ड-स्मिथ की विद्रोह के प्रति प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने स्वयं को आदेश दिया कि वे आगे बढ़ते रहें, दर्द और भूख को अनदेखा करें और तब तक टिके रहें जब तक संकट नियंत्रण में न आ जाए। विद्रोह ने केवल उनमें परिस्थिति की गंभीरता का बोध पैदा किया था और उसी गंभीरता के प्रति उनकी “जीवन-शक्ति के भंडार” ने प्रतिक्रिया की। यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपने भीतर परिस्थिति की गंभीरता तथा प्रयास की आवश्यकता का ऐसा बोध पैदा कर सके तो उसे अपनी ऊर्जा जगाने के लिए किसी भारतीय विद्रोह की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

यह कैसे किया जाए? गुर्जिएफ़ के अनुसार इसका उत्तर दो भागों में है। पहला, मनुष्य को अपनी सामान्य सीमाओं से बाहर निकलने के कार्य के प्रति पूरी तरह और संपूर्ण रूप से स्वयं को समर्पित करना होगा। इसके लिए उसी प्रकार की प्रतिबद्धता चाहिए, जिसने संतों को खंभों के ऊपर बैठने तक के लिए प्रेरित किया था। दूसरा, उसे उस जटिल “कंप्यूटर” की कार्यप्रणाली को कुछ हद तक समझना होगा, जिसमें मानव आत्मा निवास करती है। गुर्जिएफ़ की मृत्यु कंप्यूटर के युग से पहले हो गई थी, इसलिए वे इसके लिए मशीन (machine) शब्द का इस्तेमाल करते थे। लेकिन निस्संदेह उन्हें “computer” शब्द अधिक सुविधाजनक और सटीक लगता। “मशीन को समझो।” यह शरीर एक कंप्यूटर है। यह मस्तिष्क भी एक कंप्यूटर है। सभी कंप्यूटरों की तरह इनमें भी हमारी माँग से कहीं अधिक व्यापक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ देने की क्षमता है। लेकिन व्यापक प्रतिक्रियाएँ तभी प्राप्त की जा सकती हैं जब हम उनकी कार्यप्रणाली को अच्छी तरह समझें।

इन दो उद्देश्यों में से पहले को प्राप्त करने के लिए गुर्जिएफ़ की विधि सरल थी। वे अपने शिष्यों से असाधारण स्तर की प्रतिबद्धता की माँग करते थे। जब ग्यारह वर्षीय फ्रिट्ज़ पीटर्स ने उनसे कहा कि वह “मनुष्य के बारे में सब कुछ” जानना चाहता है तो गुर्जिएफ़ ने बड़ी तीव्रता से पूछा, “क्या तुम मेरे लिए एक काम करने का वादा कर सकते हो?” पीटर्स के हाँ कहने पर गुर्जिएफ़ ने शातो दु प्रीएरे के विशाल लॉन की ओर इशारा किया और उससे कहा कि उसे सप्ताह में एक बार उन सभी लॉनों की घास काटनी होगी।

उन्होंने दूसरी बार अपनी मुट्ठी मेज़ पर मारी। “तुम्हें अपने ईश्वर की शपथ लेकर वादा करना होगा।” उनकी आवाज़ बेहद गंभीर थी। “तुम्हें मुझसे वादा करना होगा कि चाहे कुछ भी हो जाए... तुम यह काम करोगे। चाहे कोई तुम्हें रोकने की कोशिश करे, फिर भी तुम्हें इसे करना होगा।” पीटर्स आगे कहते हैं, “यदि आवश्यक होता तो मैं लॉन काटते-काटते मर जाता।” वास्तव में, गुर्जिएफ़ ने इसके बाद उसे लगातार अधिक-से-अधिक कठिन काम कराया। यहाँ तक कि वह चार दिनों में सारे लॉन की घास काटने लगा।

यह सिद्धांत कुछ-कुछ कमांडो प्रशिक्षण जैसा है। प्रशिक्षु को लगातार अधिक कठिन बाधाओं का सामना करने के लिए तैयार किया जाता है, यहाँ तक कि वह पीठ के बल चट्टानों से नीचे उतर सके और नाश्ते में काँटेदार तार खा सके। यही गुर्जिएफ़ की विधि का आधार था। लेकिन इसका उद्देश्य केवल शक्ति और सतर्कता विकसित करना नहीं था। गुर्जिएफ़ अपने शिष्यों को यह भी सिखाना चाहते थे कि वे आदतों को विकसित न करें। आदत तब पैदा होती है जब हम किसी काम को यांत्रिक ढंग से करते हैं और हमारा मन कहीं और होता है। गुर्जिएफ़ के शिष्यों को कठिन परिश्रम कराया जाता था। लेकिन यह अत्यंत महत्वपूर्ण था कि वे माइंडफुलनेस (mindfulness) यानी सजगता और तीव्र जागरूकता बनाए रखें।

अपने जीवन के अपेक्षाकृत शुरुआती दौर में जिस पर हम अगले अध्याय में विस्तार से विचार करेंगे, गुर्जिएफ़ का परिचय पूर्वी प्रकार के कुछ ऐसे नृत्यों से हुआ, जिनमें असाधारण रूप से जटिल शारीरिक गतियाँ करनी पड़ती थीं। जो व्यक्ति एक हाथ से सिर थपथपाने और दूसरे हाथ से पेट रगड़ने की कोशिश करता है, वह जानता है कि यह कितना कठिन है। गुर्जिएफ़ ने ऐसे नृत्य तैयार किए जिनमें विद्यार्थी को दोनों हाथों के साथ-साथ दोनों पैरों और सिर से भी अलग-अलग क्रियाएँ करनी पड़ती थीं। बाद में ये नृत्य “कार्य” अर्थात द वर्क (the Work) के प्रशिक्षण का एक मूलभूत हिस्सा बन गए। इनका उद्देश्य शरीर की संभावनाओं की सीमा को विस्तृत करना था जिसे गुर्जिएफ़ मूविंग सेंटर (moving centre - गतिशील केंद्र) कहते थे। यह सच है कि ये नृत्य या “movements” स्वयं भी आदत में बदल सकते थे। लेकिन कुछ परिस्थितियों में वे चेतना की नई अवस्थाएँ उत्पन्न करने में आश्चर्यजनक रूप से प्रभावशाली हो सकते थे।  इसका एक अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण जे. जी. बेनेट की आत्मकथा विटनेस (Witness) में मिलता है, जिसमें 1923 में फॉन्टेनब्लो (प्रीएरे) में गुर्जिएफ़ के साथ बेनेट के अनुभव का वर्णन है।

बेनेट पूर्व में रहते हुए हुई पेचिश से पीड़ित थे। वे लिखते हैं:

हर सुबह बिस्तर से उठना और अधिक कठिन होता जा रहा था और धूप की गर्मी में भारी काम करने से मेरा शरीर पीछे हटने लगा था। लगातार दस्त ने मुझे बहुत कमजोर कर दिया था, लेकिन किसी तरह मैं काम करता रहा।

अंततः एक दिन ऐसा आया जब मैं बिल्कुल खड़ा नहीं हो सकता था। बुखार से मैं काँप रहा था और स्वयं को बहुत दयनीय महसूस कर रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं असफल हो गया हूँ। ठीक उसी समय जब मैं अपने आप से कह रहा था, “आज मैं बिस्तर पर ही रहूँगा,” मुझे लगा कि मेरा शरीर स्वयं उठ रहा है। मैंने कपड़े पहने और हमेशा की तरह काम पर चला गया, लेकिन इस बार मुझे एक विचित्र अनुभूति हो रही थी, मानो मुझे किसी ऐसी श्रेष्ठ इच्छा-शक्ति ने संभाल रखा हो, जो मेरी अपनी नहीं थी। हमने पूरी सुबह हमेशा की तरह काम किया। उस दिन मैं दोपहर का भोजन नहीं कर सका, लेकिन जमीन पर लेट गया और सोचने लगा कि कहीं मैं मर तो नहीं जाऊँगा। गुर्जिएफ़ ने अभी-अभी दोपहर के समय लिंडन वृक्षों के झुरमुट के नीचे खुले में व्यायाम करने की प्रथाएँ शुरू की थीं। जब विद्यार्थी उन पेड़ों के नीचे इकट्ठा होने लगे, तो मैं भी उनके साथ जा मिला।

हमने एक नए और अविश्वसनीय रूप से जटिल व्यायाम से शुरुआत की, जिसे सबसे अनुभवी रूसी विद्यार्थी भी ठीक से नहीं कर पा रहे थे। व्यायाम की संरचना को बोर्ड पर प्रतीकों के माध्यम से बनाया गया था और सिर, पैर, हाथ तथा धड़ को स्वतंत्र क्रमों का पालन करना था। यह हम सभी के लिए एक यातना थी।

शीघ्र ही मुझे संगीत और अपनी कमजोरी के अलावा किसी और चीज़ का बोध होना बंद हो गया। मैं बार-बार अपने आप से कह रहा था, “अगले बदलाव पर मैं रुक जाऊँगा।” एक-एक करके सभी अंग्रेज़ विद्यार्थी अभ्यास से बाहर होते गए और अधिकांश रूसी महिलाएँ भी।

गुर्जिएफ़ गंभीरता से खड़े होकर देख रहे थे। समय ने पहले और बाद का अपना अर्थ खो दिया था। न अतीत था, न भविष्य। केवल वर्तमान की वह पीड़ा थी जिसमें मुझे अपने शरीर को चलाना पड़ रहा था। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि गुर्जिएफ़ अपना पूरा ध्यान मुझ पर केंद्रित किए हुए हैं। उनकी ओर से एक मौन माँग थी, जो उसी समय प्रोत्साहन भी थी और एक वचन भी, मुझे हार नहीं माननी है चाहे यह यह मुझे मार ही क्यों न डाले।

अचानक मैं एक अपार शक्ति के प्रवाह से भर गया। मेरा शरीर मानो प्रकाश में बदल गया था। सामान्य ढंग से मुझे अपने शरीर की उपस्थिति का एहसास ही नहीं हो रहा था। न कोई प्रयास था, न पीड़ा, न थकान, यहाँ तक कि भार का भी कोई एहसास नहीं था। मेरी अवस्था ऐसी आनंदमय थी, जैसी मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की थी।

यह यौन मिलन की परमानंद-अवस्था से बिल्कुल अलग थी क्योंकि यह पूरी तरह शरीर से मुक्त और उससे निरपेक्ष थी। यह उस विश्वास की उल्लासपूर्ण अनुभूति थी, जो पर्वतों को भी हिला सकता है। सभी लोग चाय पीने के लिए घर के भीतर चले गए, लेकिन मैं विपरीत दिशा में रसोई के बगीचे की ओर चला गया। वहाँ मैंने एक फावड़ा उठाया और खुदाई शुरू कर दी। धरती खोदना हमारी शारीरिक प्रयास-क्षमता की एक कठोर परीक्षा है। एक मजबूत व्यक्ति थोड़े समय के लिए बहुत तेज़ी से खोद सकता है या लंबे समय तक धीरे-धीरे खोद सकता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति चाहे उसने कितना भी असाधारण प्रशिक्षण क्यों न लिया हो लंबे समय तक तेज़ गति से खुदाई करने के लिए अपने शरीर को विवश नहीं कर सकता। मुझे अपने भीतर आई उस शक्ति की परीक्षा लेने की आवश्यकता महसूस हुई और मैंने दोपहर की भीषण गर्मी में एक घंटे से अधिक समय तक ऐसी गति से खुदाई की, जिसे मैं सामान्यतः दो मिनट तक भी बनाए नहीं रख सकता था। मेरा कमजोर, विद्रोह करता और पीड़ा से भरा शरीर अब मजबूत और आज्ञाकारी हो गया था। दस्त बंद हो गए थे और कई दिनों से मेरे पेट में जो लगातार कुतरता हुआ दर्द था, वह भी समाप्त हो गया था। इसके अलावा, मुझे विचारों की ऐसी स्पष्टता का अनुभव हुआ, जो मैंने इससे पहले केवल अनायास और कभी-कभार ही जानी थी। “मेरी मानसिक आँखों के सामने” इस वाक्यांश का मेरे लिए एक नया अर्थ हो गया था। मैं जिन चीज़ों को देख रहा था, पेड़, नहर में बहता पानी और यहाँ तक कि फावड़ा, उनमें से प्रत्येक की शाश्वत संरचना को मैं मानो “देख” पा रहा था। और अंत में अपने शरीर को भी। मुझे याद है कि मैंने ऊँची आवाज़ में कहा था, “अब मैं समझता हूँ कि ईश्वर स्वयं को हमसे क्यों छिपाता है।” लेकिन आज भी मुझे उस विस्मयकारी कथन के पीछे की अंतर्दृष्टि याद नहीं है।

बेनेट जंगल में टहलने चले गए और उनकी मुलाकात गुर्जिएफ़ से हुई। गुर्जिएफ़ ने मनुष्य के लिए स्वयं को बदलने हेतु आवश्यक “उच्चतर भावनात्मक ऊर्जा” (higher emotional energy) की आवश्यकता के बारे में बात करना शुरू किया। उन्होंने आगे कहा, “दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं, लेकिन वे बहुत दुर्लभ हैं, जो इस ऊर्जा के किसी महान भंडार या संचयक (Great Reservoir or Accumulator) से जुड़े हुए हैं... जो लोग इस ऊर्जा को प्राप्त कर सकते हैं, वे दूसरों की सहायता करने का माध्यम बन सकते हैं।” संकेत स्पष्ट था कि गुर्जिएफ़ स्वयं ऐसे व्यक्ति थे और उन्होंने बेनेट को उसके रहस्यमय अनुभव के लिए आवश्यक ऊर्जा “प्रदान” की थी। उन्होंने आगे कहा, “आज तुम्हें जो मिला है, वह तुम्हारे लिए संभव चीज़ों की केवल एक झलक है। अब तक तुम इन चीज़ों के बारे में केवल सैद्धांतिक रूप से जानते थे, लेकिन अब तुम्हारे पास इनका प्रत्यक्ष अनुभव है।”

     बेनेट जंगल में आगे बढ़ गए, लेकिन उनके अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी था।

उस्पेन्स्की का एक व्याख्यान मेरे मन में आया। उन्होंने उन बहुत संकीर्ण सीमाओं के बारे में बात की थी, जिनके भीतर हम अपने कार्यों को नियंत्रित कर सकते हैं। फिर उन्होंने कहा था, “यह आसानी से सत्यापित किया जा सकता है कि अपनी भावनाओं पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। कुछ लोग सोचते हैं कि वे जब चाहें क्रोधित या प्रसन्न हो सकते हैं, लेकिन कोई भी व्यक्ति यह सत्यापित कर सकता है कि वह अपनी इच्छा से ‘आश्चर्यचकित’ नहीं हो सकता।” उन शब्दों को याद करते हुए मैंने अपने आप से कहा, “मैं आश्चर्यचकित होऊँगा।” और उसी क्षण मैं विस्मय से अभिभूत हो गया. न केवल अपनी अवस्था को लेकर, बल्कि जिस चीज़ को भी मैं देख रहा था या जिसके बारे में सोच रहा था, हर चीज़ को लेकर। हर पेड़ अपने आप में इतना विशिष्ट था कि मुझे लगा मैं हमेशा के लिए जंगल में घूमता रह सकता हूँ और फिर भी आश्चर्य करना कभी समाप्त नहीं होगा। फिर मेरे मन में “भय” का विचार आया। तुरंत मैं आतंक से काँपने लगा। अनाम भयावहताएँ मुझे चारों ओर से धमकाने लगीं। मैंने “आनंद” के बारे में सोचा और महसूस किया कि मेरा हृदय उल्लास से फट जाएगा। फिर “प्रेम” शब्द मेरे मन में आया और मैं कोमलता तथा करुणा की इतनी सूक्ष्म अनुभूतियों से भर गया कि मुझे समझ में आया कि प्रेम की गहराई और विस्तार का मुझे दूर-दूर तक कोई अंदाज़ा नहीं था। प्रेम हर जगह था और हर चीज़ में था। वह आवश्यकता की प्रत्येक सूक्ष्म छाया के अनुरूप स्वयं को अनंत रूप से ढाल सकता था। कुछ समय बाद यह मेरे लिए बहुत अधिक हो गया। मुझे लगा कि यदि मैं प्रेम के रहस्य में इससे अधिक गहराई तक उतर गया तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। मैं इस शक्ति से मुक्त होना चाहता था। उस शक्ति से, जिसके द्वारा मैं अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी भावना अनुभव कर सकता था। और उसी क्षण वह शक्ति मुझसे चली गई।

बेनेट ने स्पष्टतः “Great Reservoir or Accumulator” अर्थात् “महान ऊर्जा-भंडार या ऊर्जा-संचयक” के बारे में गुर्जिएफ़ की बात को बहुत महत्व दिया। लेकिन जो व्यक्ति गुर्जिएफ़ के विचारों के सार को समझने का प्रयास कर रहा हो, उसके लिए इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बेनेट ने अपनी भावनाओं पर इतना पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था। क्योंकि यही हमारी केंद्रीय मानवीय समस्या है, हम लगभग लगातार अपनी भावनाओं के शिकार बने रहते हैं। हम भीतर की एक ऐसी उतार-चढ़ाव भरी सवारी पर लगातार ऊपर-नीचे होते रहते हैं। भावनाओं पर हमारा कुछ नियंत्रण अवश्य है। हम अपने विचारों या भावनाओं को इस तरह निर्देशित कर सकते हैं कि उन्हें और अधिक तीव्र बना दें। यही निस्संदेह मनुष्य की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है— कल्पना। जानवरों को अपनी अनुभूति उत्पन्न करने के लिए वास्तविक भौतिक उद्दीपन की आवश्यकता होती है। लेकिन मनुष्य किसी पुस्तक में या दिवास्वप्न में पीछे हट सकता है और भौतिक संसार से स्वतंत्र होकर कुछ अनुभवों को जी सकता है। उदाहरण के लिए, वह किसी यौन अनुभव की केवल कल्पना कर सकता है और न केवल उससे संबंधित सभी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को महसूस कर सकता है बल्कि यहाँ तक कि यौन चरमोत्कर्ष का अनुभव भी कर सकता है। ऐसी विचित्र क्षमता किसी भी जानवर की क्षमता से बहुत आगे की बात है।

फिर भी कल्पना के हमारे अनुभव से हमें यह विश्वास होता है कि अपने स्वभाव के कारण वह “वास्तविक” अनुभव की केवल एक धुँधली-सी नकल भर हो सकती है। और इस अचेतन धारणा के परिणाम हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक हैं। इसका अर्थ यह है कि हम यह मान लेते हैं कि भौतिक वास्तविकता की दुनिया की तुलना में मन की दुनिया बहुत घटिया या द्वितीय श्रेणी की चीज़ है... एक तरह का छलावा, एक काल्पनिक दुनिया। इसलिए जब हमारा सामना किसी पीड़ादायक भावना या किसी शारीरिक समस्या से होता है तो हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति पीछे हट जाने और हार मान लेने की होती है। हम केवल थकान की उन अवस्थाओं के सामने ही नहीं रुक जाते, जिनका पालन करना हमने आदत के कारण सीख लिया है बल्कि आत्म-दया और ऊब की कुछ निश्चित अवस्थाएँ भी हमें रोक देती हैं। बेनेट का अनुभव संकेत देता है कि यदि हम केवल पर्याप्त प्रयास करें तो हम अपनी भावनाओं पर ऐसी मात्रा में नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं, जो वर्तमान समय में हमें चमत्कारी प्रतीत होगी। उपन्यासकार प्रूस्त ने कुछ सेकंड के लिए अपने अतीत की वास्तविकता के प्रति अत्यंत तीव्र चेतना का अनुभव किया था। उन्होंने इसका वर्णन स्वानस वे (Swann’s Way) में किया है और अपने शेष जीवन को उस विचित्र शक्ति को फिर से खोजने की कोशिश में लगा दिया। लेकिन ऐसी झलक तो उस प्रकार के नियंत्रण का केवल एक गौण परिणाम होती, जैसा नियंत्रण बेनेट ने अनुभव किया था। यदि हम इस बात को सचेत रूप से जान लें, यदि हमें यह एहसास हो जाए कि हमें इतनी जल्दी और इतनी आसानी से अपनी सीमा तक पहुँचकर टूट जाने के लिए बनाया ही नहीं गया है तो इससे मनुष्य का अपने जीवन और उसकी समस्याओं के प्रति पूरा दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से बदल जाएगा।

मानव चेतना में ऐसा परिवर्तन उत्पन्न करना ही गुर्जिएफ़ का केंद्रीय उद्देश्य था।



[1] एक खास तरह की गोल, ऊँची और कुछ कड़ी टोपी से है, जो आम तौर पर घने घुँघराले ऊन/फर से बनी होती है। “Astrakhan” नाम रूस के Astrakhan क्षेत्र से जुड़ा है।  इसमें प्रायः कराकुल (Karakul) भेड़ के मेमने की घुँघराली खाल/फर का इस्तेमाल होता है। दक्षिण एशिया में इसी प्रकार की टोपी को कभी-कभी कराकुल टोपी या अस्त्रखान टोपी कहा जाता है।

खलील जिब्रान (Khalil Gibran) की प्रसिद्ध पुस्तक द प्रोफेट (The Prophet) का हिंदी अनुवाद (संपूर्ण पुस्तक)

  द प्रोफेट जहाज़ का आगमन   अलमुस्तफ़ा, चुना हुआ और प्रिय, जो अपने ही युग के लिए प्रभात के समान था , बारह वर्षों से   नगर में उस जहाज़...